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शोभा डे ने की पाकिस्तान की मदद

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शोभा डे जानी-मानी लेखिका हैं और अक्सर विवादों में रहती हैं। खासतौर पर जब से नरेंद्र मोदी सत्ता में हैं, वो अक्सर अपने ट्वीट्स के जरिए सरकार और पार्टी को निशाने पर लेती रही हैं। कश्मीर से धारा 370 हटाने के फैसले के बाद भी उन्होंने एक ट्वीट किया था, जिसके चलते उनका काफी मजाक उड़ा था। अब पाकिस्तान के पूर्व हाई कमिश्नर अब्दुल बासित ने शोभा डे के बारे में ऐसा खुलासा किया है, जिससे उनकी और ज्यादा किरकिरी होनी तय है। इस खुलासे से ये तो कम से कम साबित होगा ही कि पाकिस्तान के इशारे पर भी भारतीय स्तम्भकार अखबारों में लेख लिख रहे हैं।
अब्दुल बासित ने हाल ही में ये खुलासा पाकिस्तान में एक कार्यक्रम में किया है, जिसमें वह कह रहे हैं कि बुरहान वानी की कश्मीर में एनकाउंटर में मौत के बाद जिस तरह पैलट गन्स का इस्तेमाल किया गया, इकोनोमिक शट डाउन हुआ, वो भारत की मेनलैंड से किसी जर्नलिस्ट को ढूंढ रहे थे कि कोई तो इसके खिलाफ कुछ लिखता, लेकिन कोई तैयार ही नहीं हो रहा था। तभी एक खातूना मिलीं, शोभा डे और उन्होंने शोभा डे को कन्विंस किया। बासित ने बताया कि अपने लेख के आखिर में शोभा डे ने लिखा कि अब समय आ गया है कि कश्मीर मुद्दे का निपटारा होना चाहिए और वो भी जनमंत संग्रह से। ये वाकई में चौंकाने वाला खुलासा है।
पढ़िए शोभा डे का लेख:-

TIMESOFINDIA.INDIATIMES.COM
‘Paradise on fire’ screamed a headline last week. And millions of heart sank. Not again. Yes, again! And it will continue to happen again and again and…

कभी ऐसा ही बयान सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने दिया था और एक हिंदू ग्रुप ने उनके दफ्तर में घुसकर उनकी पिटाई की थी। जनमत संग्रह की बात कभी नेहरूजी के वक्त हुई थी, लेकिन शर्त के मुताबिक पाकिस्तान को भी पीओके से अपनी फौज हटानी थी और पाकिस्तान इसके लिए तब तैयार नहीं हुआ था, नतीजा ये हुआ कि जनमत संग्रह का मामला खटाई में पड़ गया था।
ऐसे में जनमत संग्रह के जरिए कश्मीर समस्या का हल अब भारत सरकार का स्टैंड नहीं रहा है, वैसे भी लाखों कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाने के बाद तो ये मुमकिन ही नहीं रहा है। लेकिन उसके बारे में कोई भारतीय बात करे तो ये तो मुद्दा बनता ही है, लेकिन अगर यही काम वो किसी पाकिस्तानी अधिकारी के इशारे पर करे, तो वाकई में आपत्तिजनक है। ऐसे में कल को ट्विटर पर कोई शोभा डे को देशद्रोही कहने लगे, तो उनको बचाव करना मुश्किल हो जाएगा।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार पाकिस्तानी ही अपने निर्णय का मजाक बनाने पर उतारू हैं, क्योकि एक तरफ पाकिस्तान सरकार भ....

हाल ही में जब 370 हटाने का ऐलान हुआ था, तब भी शोभा डे ने एक ट्वीट किया था कि कश्मीर की समस्या तो सुलझा दी अमित शाह जी, अब साकी नाके के चौक के जाम की समस्या भी सुलझा दो। बाद में इसी ट्वीट को लेकर उनका मजाक भी उड़ा, क्योंकि ये ट्वीट किसी कॉमेडियन की वॉल से चोरी किया गया था। जो भी हो शोभा डे को ये सब शोभा नहीं देता, खासतौर पर पाक के इशारे पर उनके एंगल से लेख लिखना। हालांकि ये विडियो किस कार्यक्रम का है, हमारे पास इसकी कोई जानकारी नहीं है। लेकिन आप अब्दुल बासित का ये विडियो देखकर शोभा डे के बारे में ये खुलासा खुद सुन सकते हैं—

क्या दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए केजरीवाल ने मीडिया को खरीद लिया है?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लोकसभा चुनावों में महागठबन्धन के नाम पर आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भाजपा विरोधियों के संपर्क साध रहे थे, उनका उद्देश्य पंजाब के अतिरिक्त अन्य राज्यों से लोकसभा सीटें प्राप्त कर अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर लाना था। भाजपा विरोधी केवल दिल्ली के ही आधार पर केजरीवाल का साथ प्रसंद था, अन्यथा केजरीवाल की पार्टी और कांग्रेस की स्थिति एक जैसी है। इस बात से भी सभी पार्टियाँ अच्छी तरह परिचित हैं कि जितने उम्मीदवारों की जमानत इस पार्टी की जब्त हुई हैं, शायद ही किसी पार्टी के उम्मीदवारों की हुई हों। 
लेकिन केजरीवाल कई मामलों में मोदी को भी पीछे छोड़ते रहे हैं। जब कभी दिल्ली में नगर निगम और विधानसभा चुनाव हुए हैं, केजरीवाल ने मीडिया का भरपूर लाभ उठाया है। ऐसी ही अब होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में देखने को मिल रहा है। जिस कारण शंका हो रही है कि पिछले बार की तर्ज पर क्या दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रिंट मीडिया को खरीद लिया है? क्या केजरीवाल अखबारों में पेड न्यूज दे रहे हैं? क्या दिल्ली के पत्रकारों ने केजरीवाल के आगे सरेंडर कर दिया है? 
आखिर हम ये सवाल क्यों कर रहे हैं? दरअसल आज, 23 जुलाई को दिल्ली से छपने वाले ज्यादातर अखबारों में एक जैसी खबर छपी हुई है। सिर्फ मेन टाइटल को छोड़ दें तो सारी की सारी खबर एक जैसी है। जी हां, अखबार कई हैं, लेकिन उनमें खबर एक जैसी है। अखबार की भाषा एक है, लोगों की तस्वीर और उनके बयान एक हैं। अब सोचिए ये कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि सभी अखबारों के रिपोर्टर अलग-अलग है, संपादक अलग-अलग हैं, तो फिर खबर हू-ब-हू एक जैसी कैसे? ये साफ संकेत हैं कि अरविंद केजरीवाल अखबार में दिल्ली सरकार की झूठी तारीफ के लिए पैसे दे रहे हैं। पेड न्यूज के जरिए लोगों को गुमराह करने की साजिश में दिल्ली के बड़े अखबार भी शामिल हो गए हैं।
दैनिक जागरण अखबार के दिल्ली एडिशन में ‘कॉलोनियों के नियमितिकरण में केंद्र की शर्तों को मानने का निर्देश’ टाइटल से विस्तृत खबर छपी हुई है। इसमें नौ लोगों का इंटरव्यू भी है।
नवभारत टाइम्स में पूरी की पूरी यही खबर ‘ दिल्ली में कच्ची कॉलोनियां, कितनी बदली तस्वीर?’ शीर्षक से छपी है। इसमें भी उन्हीं नौ लोगों के साथ बातचीत हू-ब-हू प्रकाशित की गई है।
इसके बात पंजाब केसरी अखबार में भी यही खबर ‘कच्ची कॉलोनियों में रहने वालों ने कहा, केजरीवाल ने बदल दी जिंदगी’ नाम से छपी है। इसमें भी उन्हीं नौ लोगों के साथ की गई बातचीत को जगह दी गई है।
इन खबरों से लोगों को गुमराह करने की कोशिश की गई है। ऐसे में यह सवाल उठना सही है कि क्या केजरीवाल ने प्रिंट मीडिया को खरीद लिया है?
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आइए देखते हैं-
4.5 करोड़ के काम और 22.75 करोड़ का विज्ञापनपूरी दुनिया में ईमानदारी का ढोल पीटने वाले दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री ने ऐसा कारनामा कर दिखाया, जो राजधानी में किसी भी नागरिक के गले नहीं उतरा। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने महज 4.50 करोड़ रुपये के काम के लिए 22.75 करोड़ रुपये विज्ञापन पर लुटा दिए। वैसे भी केजरीवाल काम से ज्यादा ढिंढोरा पीटने में विश्वास करते हैं। गौरतलब है कि वेस्ट लक्ष्मी मार्केट और खुरेजी खास में सीवर लाइन बदलने के समारोह का विज्ञापन दिया गया। ध्यान रहे कि सीवर लाइन डलवाने पर 4 करोड़ 50 लाख रुपये खर्च आएगा, जबकि कार्य के शुभारंभ के लिए 22.75 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च किया गया। बाद में केजरीवाल ने दिल्ली के अलग अलग इलाके और मोहल्लों के नाम पर अलग-अलग विज्ञापन छपवाया, जिससे खर्च में भारी इजाफा हुआ और दिल्ली के सभी अखबारों में विज्ञापन पर करोड़ों रुपये लुटा दिया गया।
विज्ञापन घोटाला
केजरीवाल पर विज्ञापनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का भी आरोप है। इसके लिए उनकी पार्टी से 97 करोड़ रुपये वसूले भी जाने हैं। जांच में पाया गया है कि सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से केजरीवाल ने अपनी और अपनी पार्टी का चेहरा चमकाने की कोशिश की है। इनमें से उनकी पार्टी की ओर से दिए गए कई झूठे और बेबुनियाद विज्ञापन भी शामिल हैं। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार भी केजरीवाल सरकार पर दूसरे राज्यों में अपने दल का प्रचार करने के लिए दिल्ली की जनता के खजाने पर डाका डालने का आरोप है। पहले साल के काम-काज पर तैयार रिपोर्ट कहती है कि पहले ही साल में केजरीवाल सरकार ने 29 करोड़ रुपये दूसरे राज्यों में अपने दल के विज्ञापन पर खर्च किए। 2015-16 में केजरीवाल ने जनता के 522 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च कर किए थे।

पत्रकारों के जरिए केजरीवाल करते हैं मीडिया को मैनेज!
दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी छवि चमकाने के लिए मीडिया का जमकर इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए उन्होंने पत्रकारों की एक फौज भी खड़ी की हुई है। उनकी टीम में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने पहले तो पत्रकारिता करते हुए उनकी मदद की और बाद में उनकी पार्टी से ही जुड़ गये। ऐसे पत्रकारों की भी तादाद बड़ी है जिन्हें केजरीवाल सरकार ने पत्रकारिता की नौकरी से अलग कहीं न कहीं ‘एडजस्ट’ कर रखा है। 
केजरीवाल ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को खड़ा करने के लिए पत्रकारों का बहुत ही सधे अंदाज में इस्तेमाल किया। शुरुआती दौर में मीडिया हाउस और पत्रकारों को साधने का काम उनके आंदोलन में सहयोगी बने पत्रकार मित्र मनीष सिसौदिया, आशुतोष, शाजिया इल्मी, योगेन्द्र यादव, अभिनंदन शेखरी, नागेंद्र और उनके स्वयंसेवी संस्थाओं के मित्र संजय सिंह, प्रशांत भूषण, हर्ष मंदर, शेखर सिंह आदि मित्रों ने बखूबी निभाई।
केजरीवाल जब आंदोलन का पाला बदलकर राजनीति में घुसे तो जिन पत्रकारों और चैनलों ने उनका विरोध किया, उन पत्रकारों और चैनलों को केजरीवाल बिका हुआ बताने लगे। लेकिन दिलचस्प बात यह कि केजरीवाल ने खुद पत्रकारों और मीडिया को खरीदने का एक सरकारी तंत्र खड़ा किया, केजरीवाल की राजनीति का यह एक रोचक घटनाक्रम है-
केजरीवाल के मीडिया और पत्रकारों से शुरुआती मधुर रिश्ते 
केजरीवाल ने साल 2000 में भारतीय राजस्व सेवा की नौकरी छोड़ी और शहरों के गरीबों के हक की आवाज उठाने के लिए परिवर्तन नाम की संस्था अपने पत्रकार मित्र मनीष सिसौदिया के साथ शुरु की। 2006 में परिवर्तन को छोड़कर आरटीआई के लिए अरुणा राय के साथ काम किया फिर इसे भी छोड़कर 2011 में इंडिया अंगेस्ट करप्शन और अन्ना के साथ जुड़कर जनलोकपाल के लिए आंदोलन खड़ा किया। इस यात्रा में उनके पत्रकारों और मीडिया चैनलों के साथ अच्छे संबंध रहे।

अरविंद केजरीवाल ने जब आप पार्टी बनायी तो कई पत्रकारों ने परोक्ष- अपरोक्ष रुप से आप का समर्थन किया। इसी दौरान टीवी पत्रकार आशुतोष ने आप को ज्वाइन कर लिया। तहलका और गुलेल न्यूज पोर्टल में काम करने वाले आशीष खेतान भी आप में शामिल हो गये। केजरीवाल ने जब पहली बार दिल्ली में सरकार बनायी तो उनके मीडिया से आपसी संबंध वैसे नहीं रहे जैसे आंदोलन के समय थे।
पत्रकार और मीडिया कांग्रेस से उनके होने वाले गठजोड़ और जनलोकपाल बिल पर विरोध में खड़ी दिखाई पड़ी। केजरीवाल ने जब 2015 में 70 में से 67 सीट जीत कर फिर से सरकार बनायी तो उनके सामने मीडिया के साथ इस तरह के रिश्ते रखने की चुनौती थी जिससे सरकार की सकारात्मक छवि ही जनता के सामने आये। मीडिया से बनने वाले ऐसे रिश्ते को दिल्ली डायलाग कमीशन नाम दिया गया।
दिल्ली डायलाग कमीशन 
दिल्ली डायलाग कमीशन को पूर्व पत्रकार आशीष खेतान के साथ-साथ मनीष सिसौदिया को सौंप दिया गया। केजरीवाल इसके चेयरमैन और आशीष खेतान वाइस चेयरमैन बने। सिसौदिया सदस्य के रुप में इससे जुड़ गये। इस कमीशन को तमाम तरह की नागरिक सुविधाओं, महिला सुरक्षा, सफाई, जल प्रबन्धन इत्यादि पर समाधान प्राप्त करना था। ऑड- ईवेन कार्यक्रम का विचार इसी कमीशन की उपज थी। इस डायलाग में पत्रकारों को आमंत्रित किया जाने लगा। इस डायलाग के दौरान दिल्ली सरकार की सकारात्मक खबरों को देने की व्यवस्था हुई, जिससे खबरें जनता के पास पहुंचे। खबरों के साथ- साथ पत्रकारों को कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी में मनोनीत किया जाने लगा। 

इस तरह से दिल्ली के 28 कालेजों मे 27 पत्रकारों को केजरीवाल ने गवर्निंग बॉडी का सदस्य बनाया। ये सभी पत्रकार जमकर केजरीवाल सरकार की अपने लेखों या ब्लॉग में तारीफ करते रहे, उनमें से कुछ इस तरह से हैं
सबा नकबी
पत्रकार सबा नकबी को 2015 में ही कमला नेहरु कालेज के गवर्निंग बॉडी का सदस्य नियुक्त कर दिया गया। उन्होंने दिल्ली चुनावों के ऊपर एक किताब The Capital Conquest: How the AAP’s Victory has Redefined Indian Elections लिखी है। इस किताब में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के तारीफों के पुल बांधे गये हैं। जनवरी 2016 में Scroll.in के लिए केजरीवाल सरकार की पहली वर्षगांठ पर एक जबरदस्त सकारात्मक लेख लिखा।

राजेश रामचन्द्रन
इकनॉमिक टाइम्स में राजनीति संपादक को मैत्रयी कालेज की संचालन समिति में नियुक्त किया गया। इसके बाद इन्होंने अपने ब्लॉग में दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की प्रसंशा की।

नेहा लालचंदानी
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टर नेहा आप के बारे में रिपोर्ट लिखती रही हैं। उन्हें गार्गी कालेज की संचालन समिति में सदस्य बनाया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या उपराज्यपाल के साथ होने वाली जबानी जंग में केजरीवाल को शब्दों से नायक साबित करती रही हैं। उनके अनुसार केजरीवाल के पास भविष्य का एक विज़न है और वह सिस्टम को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

शरद शर्मा
शरद शर्मा एनडीटीवी में पत्रकार हैं। केजरीवाल की सरकार ने उन्हें कमला नेहरु कालेज की संचालन समिति में सबा नकबी के साथ नियुक्त किया। वह केजरीवाल की ईमानदारी और अखंडता के गीत गाते रहते हैं।

अभय कुमार दूबे
राजनीति समीक्षक व विश्लेषक अभय दूबे को दिल्ली कालेज ऑफ आर्ट्स एण्ड कामर्स की संचालन समिति में नियुक्त किया गया। 6 जून 2016 को एनडीटीवी में रविश कुमार के डिबेट शो में योगेन्द्र यादव और प्रशात भूषण के सामने केजरीवाल का जमकर बचाव किया। दोनों योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण ने केजरीवाल के मनमाने तौर-तरीकों को लेकर काफी विरोध किया था, जिसके परिणामस्वरुप दोनों को आप से अप्रैल 2015 में बाहर होना पड़ा था। अभय दूबे को दिल्ली सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति का भी सदस्य बनाया।

अनुराग धंडा
अनुराग धंडा टीवी पत्रकार हैं। केजरीवाल की सरकार ने उन्हें दिल्ली के शहीद सुखदेव कालेज ऑफ बिजनेस स्टडीज़ की संचालन समिति में सदस्य नियुक्त किया। दो भाग के अपने ब्लॉग- आप की महाभारत का सच– में केजरीवाल की भूषण और यादव से हुई सार्वजनिक जूतम-पैजार के बारे में लिखा है। ब्लॉग में उन्होंने साफ- साफ केजरीवाल के साथ खड़े होने के बारे में लिखा है। वह लिखते है कि केजरीवाल से इस झगड़े के पीछे की असली वजह योगेन्द्र यादव का अतिमहत्वाकांक्षी होना है। वह भूषण के साथ मिलकर केजरीवाल की सत्ता पलटना चाहते थे। उनके ब्लॉग का यही निष्कर्ष है कि आप पार्टी ने एक साथ मिलकर योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से निकाला था, इस तरह से पूरी पार्टी केजरीवाल के साथ थी।

भाषा सिंह
पत्रकार भाषा सिंह को दिल्ली सरकार ने महर्षि वाल्मिकी कालेज की संचालन समिति में सदस्य के रुप में नियुक्त किया। वह केजरीवाल का अक्सर इंटरव्यू करती रहती हैं। विधान सभा चुनाव से पहले और बाद में, या सरकार की वर्षगांठ पर। इन सभी इंटरव्यू में केजरीवाल को प्रधानमंत्री मोदी या केन्द्र सरकार पर हमला करने का मौका देने वाले प्रश्न पूछे जाते हैं।

सईद फाज़ील अली
पत्रकार सईद फाज़ील अली को केजरीवाल सरकार ने दिल्ली कालेज ऑफ कॉमर्स एण्ड आर्ट्स के संचालन समिति में सदस्य नियुक्त किया। उनके लेखों से आप की राजनीति पर उनका रुख एकदम से स्पष्ट हो जाता है, उदाहरण के लिए- “AAP Made A Tryst With Destiny… At The Stroke Of The Midnight Hour, When The World Was Half Asleep, Prashant, Yogendra Were expelled.”

पंकज वोहरा
पत्रकार पंकज बोहरा को केजरीवाल सरकार ने शहीद सुखदेव कालेज ऑफ बिजनेस स्टडीज की संचालन समिति में सदस्य नियुक्त किया। वैसे तो वह आप के बारे में कम ही लिखते हैं लेकिन चैनलों के डिबेट शोज़ में केजरीवाल का बचाब करते हैं।

संजय मिश्रा
प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकार संजय मिश्रा को केजरीवाल सरकार ने श्री अरविंदो कालेज की संचालन समिति का सदस्य नियुक्त किया।

अंबिका पंडित
टाइम्स ऑफ इंडिया की अंबिका पंडित को दिल्ली की सरकार ने मैत्रयी कालेज की संचालन समिति में नियुक्त किया। लेकिन सभी पत्रकारों में मात्र यही एक थी जिन्होंने केजरीवाल सरकार की ऑड-ईवेन स्कीम और सरकार के जेडर रिसोर्स सेन्टर को बंद करने के फैसले की आलोचना की थी।

राजदीप सरदेसाई और पुण्य प्रसून वाजपेयी
आप संयोजक अरविंद केजरीवाल पत्रकारों की जिस फौज के साथ अपनी राजनीतिक लड़ाई जितना चाहते थे, उसमें ऐसे कई छुपे रुस्तम भी थे जो निष्पक्ष पत्रकारिता की आड़ में उनके साथ खड़े थे। इसमें सबसे पहले नाम आता है राजदीप सरदेसाई और पुण्य प्रसून वाजपेयी का। दोनों ही न्यूज चैनल के नामचीन एंकर हैं। राजदीप को प्रधानमन्त्री मोदी से विरोध था तो गरीब और मजदूरों की बात करने वाले साम्यवादी एंकर वाजपेयी को केजरीवाल के रूप में राजनीतिक स्तर पर मोदी का विरोध करने वाले एक प्लेटफार्म की जरूरत थी।

स्मरण हो, आजतक चैनल में तूफान उस समय आ गया था, जब प्रसून द्वारा केजरीवाल का साक्षात्कार पर हुई ड्रामेबाज़ी का वीडियो लीक हो गया था। जिसने प्रमाणित कर दिया था कि ये जो कुछ भी हो रहा है सबका सब प्रायोजित है। स्क्रिप्ट पहले से ही तैयार थी, केवल जनता को धोखा और भ्रमित करने मात्र ये सब नाटक हो रहा है।  
इनके साथ ही पत्रकार मुकेश केजरीवाल और रूपाश्री नंदा ने भी केजरीवाल को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
इतना ही नहीं केजरीवाल सरकार ने सरकारी विज्ञापनों की निगरानी के लिए वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया। कमिटी में थानवी के अलावा शैलेश कुमार और जगतीत सिंह देसवाल को सदस्य बनाया गया। केजरीवाल को राजनीति का एक अहम नायक बनाने में पत्रकार और मीडिया की फौज ने एक बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन सत्ता में आने के बाद जिन पत्रकारों और चैनलों ने केजरीवाल का विरोध किया उसे वो सुपारी पत्रकारिता की संज्ञा देकर बदनाम करने लगे।

साक्षी विवाद : मीडिया का दलित कार्ड खेल

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जब अपने ही दाँत अपनी जिव्हा काट दें, फिर किसे दोष दें। ऐसे में चर्चित कव्वाल हबीब पेंटर की एक कव्वाली "जब खून ही दुश्मन बने, फिर किसे दोष दीजियेगा।..." ,आज बरेली से भाजपा विधायक की बेटी साक्षी द्वारा एक दलित से प्रेम-विवाह करने को मीडिया ऐसे उछाल रही है, मानो यह कोई अनोखी शादी हुई है, पर शत-प्रतिशत चरितार्थ हो रही है। मीडिया द्वारा इस मुद्दे को उछाल केवल अपनी TRP बढ़ाकर क्या हांसिल करना चाहती है। एक अपनी TRP बढ़ाने के मीडिया ने कितनों की ज़िंदगी से खिलवाड़ किया है, नहीं जानती, उन्हें तो बस अपनी TRP से मतलब है। जिस दलित कार्ड को उछाला जा रहा है, क्या उस दलित लड़के के चरित्र को उजागर करने का तनिक भी प्रयास किया? आखिर किस कारण नेताओं से अधिक मीडिया ने इस मुद्दे को उछाला? यदि मीडिया वास्तव में निष्पक्ष है, तो उसी प्रमुखता से इस दलित लड़के के चरित्र को भी उछालिए, ताकि दलित ने नाम पर राजनीती करने वालों की भी आंखें खुलें, साथ ही ऐसे दोहरे चरित्र वालों से लड़कियाँ भी सचेत रहे। 
अभी-अभी(जुलाई 15) प्राप्त समाचारों के अनुसार: sakshi ajitesh seeks protection allahabad highcourt बरेली की लव स्टोरी चर्चा के केंद्र में है। साक्षी और उसके पति अजितेश की अर्जी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई जिसमें अदालत ने साक्षी के पिता राजेश मिश्रा को फटकार लगाई। इस बीच ये भी खबर आई कि अदालत परिसर में साक्षी और अजितेश के साथ मारपीट की गई। लेकिन पुलिस ने मारपीट से इनकार किया है। इस बीच राजेश मिश्रा को हिरासत में लिया गया है। 
हाईकोर्ट ने साक्षी और अजितेश को बालिग माना और साक्षी के पिता के व्यवहार को गलत माना। बता दें कि साक्षी ने एक वीडियो जारी कर ये बताया था कि उसकी और उसके पति की जान खतरे में है। उसके पिता गुंडों के जरिए उसका पीछा करा रहे हैं। ये बात अलग है कि बरेली के बिथरी चैनपुर से विधायक राजेश मिश्रा ऊर्फ पप्पू भरतौल ने आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि उनकी बेटी बालिग है और उसने जो फैसला किया है उससे उन्हें ऐतराज नहीं है। 

देखिए उस दलित लड़के का चरित्र 
विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल की बेटी साक्षी ने जिस युवक अजितेश के कारण बागी तेवर दिखाए, उसी के पड़ोसियों ने उसकी पोल खोलकर रख दी है। वीर सावरकर नगर नामक कॉलोनी में अजितेश उर्फ अभि का घर है। टीवी चैनलों से बातचीत के दौरान अजितेश के पड़ोसियों ने ही उसके चरित्र पर सवाल उठाए। इंजीनियर एके सिंह समेत कई लोगों का कहना था कि अजितेश नशे का आदी है और कॉलोनी में काफी दबंग तरीके से रहता था। कई लोगों से उसने मारपीट की थी तो रुतबा कायम करने के लिए अक्सर पिस्टल और नीली बत्ती लगी गाड़ी के साथ अपने फोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर चुका था। 
अजितेश की हो चुकी है किसी और लड़की से सगाई
पड़ोसियों का कहना था कि कॉलोनी में ही अजितेश पर लड़कियों से छेड़खानी करने के कई बार आरोप लगे, थाने में भी ये मामले पहुंचे। एक मामले में मारपीट के बाद अजितेश ने तीन लोगों के खिलाफ जानलेवा हमले की रिपोर्ट भी लिखाई थी। पड़ोसियों के आरोपों पर अजितेश और उसके पिता हरीश कुमार से फोन पर कई बार बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उनके फोन पर कॉल ही रिसीव नहीं हुई। साक्षी के फोन पर भी घंटी जाती रही, लेकिन उसने भी फोन नहीं उठाया।
विधायक राजेश मिश्रा ने कहा कि अजितेश उर्फ अभि उनके बेटे विक्की का दोस्त था। हालांकि उसकी और विक्की की उम्र में काफी अंतर है। उन्होंने बताया कि उन्हें विक्की से अजितेश की दोस्ती की तो जानकारी थी, लेकिन अजितेश उनके घर पर भी अक्सर आता-जाता था, यह उन्हें अब पता लगा है। दरअसल अजितेश तभी उनके घर आता था, जब वह नहीं होते थे। बेटी साक्षी के इस आरोप पर कि वह उसके साथ ज्यादा बात नहीं करते थे, उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है। बेटे और दोनों बेटियों से वह हमेशा दोस्ताना व्यवहार रखते थे। वह जब भी घर पहुंचते थे और कभी उन्हें कोई गुमसुम दिखता था तो वह हंसी-मजाक कर उसे बगैर हंसाए नहीं छोड़ते थे। 
परिवार को बगैर बताए घर से भागकर प्रेम विवाह करना और फिर विधायक पिता पर हत्या का आरोप लगाया जाना सोशल मीडिया को रास नहीं आया है। सिर्फ साक्षी ही नहीं, अपने टीवी चैनल की डिबेट में विधायक को खलनायक साबित करने की कोशिश करने वाली एंकर अंजना ओम कश्यप भी सोशल मीडिया में निशाने पर हैं। साक्षी और अजितेश को लोग खुलकर लानत-मलामत कर रहे हैं तो अंजना ओम पर भी सवाल दागने से लोग नहीं चूक रहे हैं। 
फेसबुक पर एक के बाद एक धड़ाधड़ पोस्ट की जा रही हैं। ये पोस्ट करने वालों में सिर्फ बरेली नहीं बल्कि दूसरे शहरों के भी लोग हैं। दो बार वीडियो वायरल कर और फिर टीवी चैनलों पर रोते हुए पिता पर हत्या की कोशिश के आरोप लगाने के बावजूद साक्षी के सपोर्ट में एक भी पोस्ट नहीं दिख रही। लोग आपस में दबी जुबान से उनकी बेटी के आरोपों पर चर्चाएं करते रहे। उसके पति अजितेश उर्फ अभि को लेकर उठ रहे सवाल भी इन चर्चाओं का हिस्सा बनते रहे।
सोशल मीडिया पर मीडिया का उड़ता मजाक 
अनावश्यक मुद्दे को तूल देने के कारण सोशल मीडिया पर जिस तरह मीडिया का मजाक बनाया जा रहा है, बहुत ही निंदनीय है। एक समय था जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ एवं सरकार और समाज का आईना बताया जाता था, आज वही मीडिया राजनेताओं के हाथ  बिकाऊ वस्तु बनकर रह गयी है। 
ये वही मीडिया है जो 2014 लोकसभा चुनाव से पूर्व हिन्दुत्व की बात करने से परहेज करती थी और "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर झूठे आरोपों में पकडे जा रहे साधु-संत और साध्वियों के चरित्र पर कीजड़ फेंक हिन्दू धर्म को अपमानित करने वाली भी यही मीडिया है। अरे कभी तो सच्चाई का आईना का दिखाने वाली मीडिया स्वयं भी अपने आपको आईने के सामने खड़ा करने का प्रयास करे। 
अगर मीडिया नेताओं की भाँति तुष्टिकरण का खेल खेलती रही, वह दिन भी दूर नहीं होगा, जब जनता समाचार चैनलों की बजाए केवल धारावाहिक और फिल्में देखने के लिए ही अपने टीवी को खोलेगी।  



जिसको जो तर्क देना है दे लेकिन मैं तो कहूंगा: एक समाजिक सच्चाई ये भी है कि बेटियों को गर्भ में ही मारने का एक प्रमुख कारण भागकर माँ बाप के मर्जी के खिलाफ विवाह भी है । आज के युग में कोई भी बाप बेटी को बेटा से कम लाड़ प्यार नहीं देता है । एक बाप जहाँ बेटा से आशा रखता है कि वो उसकी विरासत को सम्भालेगा, बुढापे में उसकी देखभाल करेगा, उसका वक़्त बदलेगा आदि आदि लेकिन बेटी से एक ही आशा रखता है कि वो उसकी इज्जत आबरू को बचा के रखेगी क्युकि प्राचीन काल से ही भारत में बेटियों को इज्जत का प्रतीक माना जाता है । आप इसे झूठी शान कहे, ढकोसला कहे या अमानवीयता लेकिन ग्रामीण भारत में आज भी ये एक समाजिक सच्चाई है ।

जिस घर की बेटी भाग जाए उस परिवार का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। एक कुटुंब के लिए मौत से बड़ी कोई त्रास्दी है तो वह यही है।
बात जाति से बाहर शादी करने की बिल्कुल नहीं है। बात है अपने माँ बाप का आशीर्वाद लिए बिना शादी करना और ऊपर से वीडियो डाल कर उनकी जगहंसाई करवाना।
मैं ऐसे दो-तीन केस जानता हूँ जहां घरवालों से अन्तरजातीय विवाह की अनुमति ना मिलने पर प्रेमी युगल 40 वर्ष की आयु तक अविवाहित रहे। पर घरवालों के ख़िलाफ़ जाकर, भाग कर शादी नहीं की। आखिरकाऱ घरवालों को उनके प्रेम के सामने झुकना पड़ा और उनकी शादी सबकी रजामंदी से करवा दी गई। इस तरह स्वार्थ व वासना से रहित प्रेम को घरवालों ने पहचान लिया उर उसे सहर्ष अंजाम तक पहुंचा दिया।
माफ़ करना छोटी बहन साक्षी पर तुम्हारा प्रेम प्रेम ना होकर ड्रामा लग रहा है। ना ही तुम्हारे प्रेम में सब्र नज़र आता है ना ही शुद्धता। तुम्हारा सम्मोहन तो मात्र 6 महीने में टूट जाएगा, लेकिन एक बाप अंदर से सदा के लिए मर जाएगा। एक लड़के को भी किसी की बेटी भगाने से पहले सो बार सोचना चाहिए। कर्म का चक्कर 360° घूमता है।
मान लो मेरी ही एक बेटी है, मिश्रा जी के स्थान पर खुद को रखता हूँ तो कांप जाता हूँ, खुद को विवश पाता हूँ। विवशता इसलिए कि कर ही क्या सकते हैं। शायद इससे बड़ा टॉर्चर एक बाप के लिए कोई और नहीं।
 तुमने प्रेम किया- स्वीकार है कोई समस्या नही।
● तुमने प्रेम दलित से किया-वो भी स्वीकार कोई समस्या नही,दलित भी इंसान और हिन्दू ही है।
● तुम्हे शादी शुदा से प्रेम हो गया- चलो वो भी स्वीकार भावनाएं और प्रेम शायद यह विभेद नही कर पाता।
● तुम्हे अपनी उम्र से 20 साल बड़े व्यक्ति से प्रेम हो गया- स्वीकार भावनाएं और प्रेम उम्र नही देखते।
●तुम्हे अपने भाई के मित्र से प्रेम हो गया- चलो वो भी स्वीकार,किसी को कोई समस्या नही।
● तुम्हे अपने घर के टुकड़े पर पलने वाले और 1 करोड़ का उधार लिए व्यक्ति से प्रेम हो गया- चलो वो भी स्वीकार भावनाएं और प्रेम शायद स्टेटस और बैंक बैलेंस नही देख पाता,हालांकि तुम्हारे प्रेमी(अब तथाकथित पति) ने ये सब देखा है।
● तुमने उससे भाग के शादी कर ली- यह भी स्वीकार है,कानूनन बालिग हो शादी करके उसके साथ रहो या बिना शादी किये कोई समस्या नही,कानून तुम्हारे साथ है।
मगर जो अस्वीकार है वो ये है कि...
तुम्हे इन सब के बाद कोई अधिकार नही था एक बाप की इज्जत को खबरिया कोठों पर दलालों के साथ बैठकर नीलाम करने का...तुम्हे कोई हक नही था एक माँ की ममता,बाप के प्यार और भाई के स्नेह को टीआरपी की भूखी  खबरिया गिद्धों के साथ चैनेलो पर  बैठकर गिद्ध बनकर नोचने का..साक्षी नोची तो तुम भी जाओगी अपने बाप की इज्जत की तरह या यूं कह लो गिद्ध तुम्हें भी नोच रहे हैं बस तुम्हे पता दो चार साल बाद चलेगा। उस समय न ये मीडिया आएगा और न ही नारीवाद का झंडा उठाये ये वामी..अगर उस बाप में जरा भी स्वाभिमान बचा होगा तो वो भी नही आएगा उस समय तुम्हारे साथ...तुमने अपनी नियति खुद चुनी है। प्रेम, प्रेम संबंध या विवाह से समस्या नही थी समस्या तुम्हारे द्वारा अपने बाप के खिलाफ चलाये जा रहे मीडियाई एजेंडे से थी है और रहेगी...



मै Rahul Shukla एक हालिया लव-मैरिज ड्रामा पे ज़बर्दस्त लिखा है. पढ़ने लायक..
साक्षी के नाम खुला पत्र..
#साक्षी तुम्हें पता भी है तुमने कितनी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद कर दी है।
साक्षी क्या तुम जानती हो कि तुमने कितनी लड़कियों के सपनों का गला घोंटा है। साक्षी क्या तुम जानती हो कि तुमने लड़कियों को कितने पीछे धकेल दिया है, बिलकुल वहीं..जहां से वे संघर्ष कर आगे बढ़ी थीं।
तुम्हारे प्रेम से दुनिया को कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन तुमने जो उसका तमाशा बनवाया है, उससे तुम ही आज कटघरे में खड़ी हो, और तुम्हारे साथ खड़ी हैं वे अनगिनत बेकसूर लड़कियां, जिन्हें अब उनके माँ, बाप, भाई ही शक की नज़र से देख रहे हैं।
तुम्हे यदि जान का खतरा था तो न्याय पाने के और भी तरीके थे। तुमने वीडियो जारी किया, चलो उसे भी जायज़ मान लिया जाए। लेकिन जिस तरह तुमने न्यूज़ चैनल में बैठकर अपने परिवार की इज्जत हवा में उछली है ना, उससे तुम्हारी नीयत पर शक पैदा होता है। तुम अकेली लड़की नहीं हो, जिसने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर विवाह किया है, लेकिन उन्होंने अपने पिता की इज्जत यूं तार-तार नहीं की। यदि प्रेम विवाह के बाद कि प्रतिक्रिया सहने के साहस नहीं था, तो ऐसा कदम ही क्यूं उठाया।
तुम्हारे कृत्य से षड्यंत्र की बू आ रही है। वीडियो में जिस तरह तुम अपने पिता का नाम ले रही थी ना, उसमें घृणा का भाव जाहिर हो रहा था। तुम अपने पिता को समझा नहीं धमका रही थीं। तुम्हारी भाषा से तो नहीं लगा कि तुम डरी हुई हो। जिस तरह से सजी संवरी बैठी थी, उसे देखकर भी नहीं लगा कि तुम जान बचाने के लिए मारी-मारी फिर रही थीं।
हर पिता अपनी बेटी को अरमानों के साथ विदा करना चाहता है, कोई बात नहीं कि तुमने अपने परिवार को विश्वास में लिए बिना ही रवाना हो गयी, पर एक बात याद रखना कि तुम्हारे कृत्य से (प्रेम विवाह करने से नहीं, बल्कि परिवार की भद्द पिटाने के कारनामे से) आज हम सब लड़कियां शर्मिंदा हैं। जो तुमने किया वो प्रेम नहीं केवल आकर्षण का शिकार होना है। क्योंकि जो अपने माता-पिता से प्रेम नहीं कर सकता, वो किसी से क्या प्रेम करेगा और क्या निभाएगा।
अंत में एक बात याद रखना, हमारे यहां कहावत है-- जो ना माने बड़ों की सीख, ले कटोरा मांगे भीख। और एक बात यदि किसी न्यूज़ चैनल में बैठकर समस्याएं हल हो जाती तो देश की 80 फीसदी समस्याओं का समाधान हो गया होता। मैं खुद मीडिया से हूँ और मुझे कहने में कोई समस्या नहीं कि हम लोगों की परेशानी कम करने के बजाए बढ़ा रहे हैं।
औऱ जाते-जाते सुन लो कि हमें ना तुम्हारी जान बचाने में रुचि है ना ही तुम्हारे पिता जी की इज्ज़त बचाने में कोई इंटरेस्ट। तुम्हारे जैसे मूर्ख केवल हमारी टीआरपी बढ़ाने के टूल हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं.
बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ की मुहिम में बेटियों का भी साथ चाहिए, #बिटिया_रानी कितनी बड़ी हो गई है ना ?
ये जो पहले चित्र में आदमी है ना, ये विधायक है।
साथ मे जो लड़की है वो इसकी बेटी है।
दूसरे चित्र में वही बेटी घर से भागने के बाद अपने प्रेमी के साथ दिख रही। 
ये बेटी कह रही है कि मुझे अपने बाप से जान का खतरा है।
जिस समय बेटियों को गर्भ में मारने का भयंकर सिलसिला चल रहा था तब इनके जन्म पर जश्न हुआ था।
ये वही बेटी है जो साल भर की होने पर चलने की कोशिश करती हुई बार बार गिरती थी तो इस बाप ने उसके नाजुक हाथो को थामा, उसे चलने को सहारा दिया, उसे चलना सिखाया।
कुछ दिन बाद साइकिल सिखाई, फिर स्कूटी की जिद हुई तो वो भी दिलाई। एक बार कहीं बाजार में किसी को स्कूटी से ठोक दिया।खुद भी चोट खाई सामने वाले को भी मरणासन्न कर दिया।
इसी बाप ने पूरा अस्पताल सर पर उठा लिया, एक से एक डॉक्टर की लाइन लगाकर खड़ा कर दिया।
जिसको ठोका था उसका इलाज करवाया, लाखो रुपये उसे देने पड़े।
इस बेटी को तो पता भी नही था कि लाखों रुपये कैसे कमाये जाते हैं। खैर ये ऐश आराम करते हुए बड़ी हुई।स्कूल से कॉलेज में आई।
फिर कहीं किसी से आंखे चार हो गई।
मोहब्बत की पींगे बढ़ी। साथ जीने मरने की कसमें खाई। दोनों की जात समान नही थी तो थोड़ी दिक्कत थी।लेकिन समाज मे फैलती नाजायज आजादी की हवा इन्हें भी छू गई। एक दिन अपने बाप के सिर पर पैर रखकर ये ऊंची छलांग लगा गई और प्रेमी के साथ वीडियो बनाकर डाला गया।
कि मेरा बाप मुझे और मेरे आशिक को मार डालना चाहता है।
पूरे देश मे हल्ला है,
विधायक की बेटी जो भागी है।
मीडिया वाले विधायक के पास भागे भागे जा रहे है उनसे सवाल कर रहे है कि आप प्यार के दुश्मन है ? आजाद पंछियो को क्यों कैद करना चाहते है ? 21 वी सदी में भी आप जातिवाद को बढ़ावा दे रहे है ? टीवी पर बेटी का इन्टरव्यू चल रहा बहुत सारे लोग जिन्होंने विधायक जी का इससे पहले नाम भी नहीं सुना था थोक के भाव में गालियां दे रहे।
सबके कैमरे विधायक जी के चेहरे पर लगे हैं, उसके मुंह से शब्द सुनने को आतुर हैं।लेकिन बाप की आंखे किसी को दिखाई नहीं दी, उसकी कंपकपाती जुबान, रुंधा हुआ गला..
कोई ध्यान नही दे रहा उसपे।
लड़का और लड़की दोनो हिन्दू है, भले ही किसी भी जाति के हों, दोनों ने प्यार किया और दोनों एक दूसरे के साथ खुश हैं तो किसी को भी कोई आपत्ति नही होनी चाहिये। हमें भी नहीं है, लेकिन प्रेमी के बहकावे में आकर निर्लज्जता और पब्लिसिटी की मारी बेटी ने इस घटना को जो जातीय रंग दिया है, वीडियो बनाकर, टीवी पर बैठकर बाप को जलील करके जो छिछलेदारी की है वो थोड़ा खराब लगा।
बेटी होना घर में लक्ष्मी का आगमन माना जाता है लेकिन यहां राजेश मिश्रा जैसे पिता अब भगवान से यही प्रार्थना कर रहे होंगे कि
अगले जनम मोहे बिटिया ना दीजो...

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पिछले दिनों से बरेली से बीजेपी विधायक राजेश मिश्रा की बेटी और उसके पति अजितेश का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें बेटी ने अपने पिता से खुद को बचाने की गुहार लगाती दिखाई दे रही है। वायरल वीडियो के बाद राकेश मिश्रा की बेटी साक्षी अपने पति अजितेश कुमार के साथ आजतक के स्टूडियो पहुंचती है और आरोप लगाती है कि उनके पिता ने उन्हें पढ़ने नहीं दिया। मुझे घर से निकलने नहीं देते थे, मैं उनसे कहना चाहती हूं कि आप अपनी सोच बदलो और जितना महत्व बेटे को देते हो उतना ही मुझे और मेरी बहन को भी दो। आप बाहर दिखावा करते हैं कि बहुत प्रगतिशील हैं लेकिन घर के अंदर बेटा और बेटी के बीच अंतर करते हैं। इसी दौरान साक्षी ने अपने पिता से भी बात की जहां उनके पिता ने उन्हें खुश रहने का आशीर्वाद दिया और फोन काट दिया. लेकिन फिर से विधायक पिता से पूछा गया कि क्या वो बेटी और दामाद को स्वीकार करेंगे, लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे परेशान किया जा रहा है और परिवार के मामले में ऐसा सवाल करके उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर न किया जाए। फोन पर पिता की भराई हुई आवाज ये बता रही थी कि ऐसी बेटी जिसने पिता को कहीं मुंह दिखाने योग्य नहीं छोड़ा।
अब सवाल ये है कि क्या वो पुत्री सही हो सकती है जिसे पिता ने इतने साल पाल पोस कर जवान किया लेकिन बंदिशे इसलिए लगाई क्योंकि वो एक राजनेता है और राजनीति में दुश्मनों की कमी नहीं होती, ऐसे में अगर एक पिता अपनी बेटी को सबकी नजरों से बचाना चाहता है तो क्या गलत करता है। उस बेटी को बंदिशे नजर आई, लेकिन शर्म से झुका उनका कन्धा और आँखे नजर नहीं आई जो इस लड़की के कृत्य के बाद किसी से मिल नहीं पा रहीं। कितना दर्द होगा उस पिता के दिल में जिसकी बेटी ही उसकी इज़्ज़त की सरेआम धज्जियाँ उड़ा रही है। मैं अन्तर्जातीय विवाह की विरोधी नहीं हूँ लेकिन एक पिता को इस तरह पूरे समाज में अपनी ही बेटी के द्वारा सरेआम नंगा किये जाने के खिलाफ हूं। मैं उस पिता का दर्द दिल से महसूस करती हूं। वो एक शक्तिशाली राजनेता हुए तो क्या हुआ एक जिम्मेदार पिता भी तो हैं, जिन्होंने समाज के वहशीपन और हवस से बचाने के लिए अपने बच्चों को खुली छूट नहीं दी। ऐसी लड़कियां समाज की अच्छी लड़कियों को भी खराब करती हैं। थू है ऐसी बेटी पर जिसने अपने बाप की नजरों को जमाने के सामने झुका दिया और अपनी हवस के लिए बाप की पगड़ी उछाल दी
आजतक के न्यूज़ चैनल पर रोने लगी विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी जुलाई 12 को आजतक के स्टूडियो में अपने पति अजितेश कुमार के साथ पहुंचीं. इस दौरान आजतक ने विधायक राजेश मिश्रा से उनकी बेटी साक्षी की बात कराई. पिता से बात करते हुए साक्षी ने कहा कि पापा मुझे माफ कर दो. इस पर विधायक राजेश मिश्रा ने कहा कि जहां रहो खुश रहो, मैंने कल ही अपना बयान दे दिया. मेरे परिवार को चैन से रहने दो विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी से बातचीत.



Image may contain: one or more people and people standingदेखिए इसमें मेरी नजर के हिसाब से साक्षी मिश्रा गलत है रीजन यह है की या तो साक्षी जी अपने पिताजी से अपने लवर्स के बारे में पहले बता देती तो क्या पता उसके पिताजी उसका सपोर्ट भी करते यह एक तरह से नादानी है साक्षी मिश्रा की एक पिता अपने बच्चे का कभी गलत नहीं कर सकता ऐसा मेरा मानना है तो इसको अपनी पूरी डिटेल अपने फादर के साथ शेयर करनी थी इसके बाद यदि कोई डिसीजन लेते तो इसमें इसकी भी बुलाई थी और उसके फादर की भी इज्जत बनी रहे
पिछले 3 दिनों से सोशल मीडिया और भारतीय मेनस्ट्रीम मीडिया में #शोषित #दलित बनकर विक्टिम कार्ड खेलने वाला यह #दुर्दांत #अपराधी 3 दिन पहले तक बरेली की जनता के ऊपर ठाकुर बनकर अत्याचार किया करता था। #बरेली के लोग इसको शुरू से ही #ठाकुर समझते आ रहे थे।आप लोग इस बात की गंभीरता को आसानी के साथ समझें कि ठाकुर बनकर बरेली की जनता के ऊपर अत्याचार किया इस #भेड़िये ने और बदनाम हुआ पूरा #ठाकुर समाज।
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बात केवल यहां पर ही खत्म नहीं हो जाती है। अत्याचार करते समय यह ठाकुर बना था और जब यह अपराधी एमएलए राजेश मिश्रा की बेटी को भगा ले गया, तब यह विक्टिम कार्ड खेलते हुए #दलित बन गया।
सोचिए यह व्यक्ति कितना #शातिर और #धूर्त रहा होगा। जिस परिवार ने इसके परिवार को अपना माना और अपने घर अंदर तक स्थान दिया, एक थाली में खाना खिलाया, उसके साथ ही इसने #गद्दारी की, यह बात शायद ही किसी व्यक्ति को अच्छी लगी होगी।
यदि कोई व्यक्ति दलित है तो उसे ठाकुर बनने की क्या आवश्यकता है? वह दलित बनकर ही समाज में उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है। लेकिन दलित होने के बाद फर्जी ठाकुर बनकर जनता पर अत्याचार करके ठाकुरों को #बदनाम करना कहां की #दलित राजनीति है? भारत के संविधान का कौन सा हिस्सा ऐसा करने की इजाज़त देता है?
मैं पुनः इस बात को कहना चाहता हूं कि माननीय विधायक श्री राजेश मिश्रा जी और उनके समर्थकों की आपत्ति इस व्यक्ति के दलित होने से बिल्कुल भी नहीं है। यदि यह व्यक्ति उनका सजातीय भी रहा होता तो भी माननीय विधायक जी इसके #आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए इसके साथ अपनी बेटी के रिश्ते को लेकर कभी भी हां नहीं कहते। इसके विपरीत यदि यह व्यक्ति एक साफ-सुथरा और नेक इंसान रहा होता तो राजेश मिश्रा जी अपनी बेटी के साथ इसके विवाह को लेकर शुरू में न सही लेकिन बाद में तैयार अवश्य हो जाते।
आज "मीठा-मीठा गपा गप और कड़वा कड़वा थू थू..." वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। जनता पर जुल्म करते समय ठाकुर और विधायक की बेटी को भगाते समय दलित बनकर यह कुख्यात अपराधी बाबासाहेब अंबेडकर के #संविधान की जमकर लंका लगा रहा है। इस व्यक्ति को #दलित बिल्कुल भी नहीं मानना चाहिए क्योंकि अभी तक यह व्यक्ति समाज में ठाकुर बनकर रह रहा था और समाज के ऊपर #अत्याचार कर रहा था।
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अच्छा हुआ जो बरेली का #धूर्त मक्कार परिवार टीवी पर पहुंच गया वरना इसकी सच्चाई कभी जनता के सामने न पहुंच पाती। बाप बेटे दोनों #धूर्त है और जितनी जानकारी निकलकर सामने आ रही है उससे लगता है कि ये बाप बेटे #ठगी का #धंधा भी करते हैं।

मसलन, बरेली के जिस वीर सावरकर कालोनी में यह परिवार रहता है वहां अपनी #जाति छिपा रखी है। वहां ये लोग अपने आपको #ठाकुर बताते हैं। लड़का खुद फेसबुक पर #अभी #सिंह के नाम से मौजूद है।

आज तक को लगा कि मामला बैक फायर कर गया है तो डैमेज कन्ट्रोल करने के लिए आज उनका पत्रकार स्वयं उस कालोनी में गया और कालोनी वालों ने इस ठग और धूर्त परिवार की सारी सच्चाई कैमरे पर बयान कर दी।
जहां तक चरसी बेटे का सवाल है तो उसका रिकार्ड कालोनी में ही इतना खराब है कि आते जाते लड़कियों को छेड़ता है। कच्चे नशे का आदी है। गांजा चरस पीता है और उसका वीडियो फेसबुक पर भी अपलोड करता है। इन्होंने भोपाल में झूठी सगाई करके ही लाखों नहीं उड़ाये, खबर है कि इन लोगों ने अलग अलग जगहों पर डेढ़ करोड़ रूपये की ठगी कर रखी है।
हो न हो किसी साजिश के तहत इस चरसी ठग ने विधायक परिवार का भरोसा जीता हो और लड़की को जानबूझकर अगवा किया हो ताकि बाद में विधायक जी से इसकी मोटी कीमत वसूल सके। शादी का जो #सर्टिफिकेट ये लोग दिखा रहे हैं वह भी जाली निकला। मंदिर के मुख्य पंडित ने #सर्टिफिकेट को जाली करार दिया है।
अब विधायक पप्पू भरतौल को चाहिए कि वो इस आदमी और उसके बाप के खिलाफ लड़की को अगवा करने, उससे जबर्दस्ती शादी करने और झूठा #प्रोपोगेण्डा फैलाने का केस करें। राज्य की योगी सरकार को भी चाहिए कि इस पूरे मामले की जांच करे और इस #ठग परिवार को कानून के कटघरे में खड़ा करें ताकि पूरे मामले में न्याय हो सके।