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संविधान का मजाक बनाते क्षेत्रीय दल : कर्नाटक के बाद तमिलनाडु ने किया गुजरात के AMUL ब्रांड का विरोध, राजनीति के लिए क्षेत्रवाद की आग को दी जा रही हवा

बात बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किये जाने काम को संविधान के विरुद्ध बताने वाले अपने-अपने तरीके से देखिए किस प्रकार संविधान का मजाक उड़ा रहे हैं।  

गुजरात की मिल्क कॉपरेटिव सोसायटी अमूल (AMUL) का मामला कर्नाटक से होते हुए तमिलनाडु तक पहुँच गया है। यह व्यवसायिक से ज्यादा राजनीतिक नजर आ रहा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 से ठीक पहले अमूल बनाम राज्य की नंदिनी (Nandini) को लेकर राजनीति हुई थी। अब इस राजनीति में तमिलनाडु भी कूद गया है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एवं डीएमके के नेता एमके स्टालिन (MK Stalin) ने केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने कहा है कि अमूल को आविन के मिल्क शेड क्षेत्र से दूध खरीदने से रोकने का निर्देश दिया जाए। स्टालिन ने यह पत्र स्थानीय सहकारी क्षेत्र को बचाने के नाम पर लिखी है और अमूल का विरोध किया है। अमूल के विरोध की मुख्य वजह उसका गुजरात से होना है।

यही कारण है कि भाजपा और उसके नेताओं, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह (Amit Shah) से विरोधी भाव रखने वाले लोग अब गुजरात के इस दूध उत्पाद का का भी विरोध करने लगे हैं। इसके लिए ये नेता स्थानीय बनाम गैर-स्थानीय की विभाजनकारी राजनीति को हवा दे रहे हैं। बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में जदयू और राजद, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस एवं जेडीएस, तमिलनाडु में स्टालिन, महाराष्ट्र में MNS जैसे क्षेत्रीय नेता क्षेत्रवाद को अपनी राजनीति का केंद्र बनाकर रखा है।

केंद्रीय मंत्री अमित शाह को लिखे अपने पत्र में एमके स्टालिन ने लिखा, “अन्य राज्यों की मजबूत डेयरी सहकारी समितियों की तरह तमिलनाडु में भी सन 1981 से तीन स्तरीय डेयरी सहकारी प्रणाली प्रभावी ढंग से काम कर रही है। आविन हमारा सर्वोच्च सहकारी विपणन संघ है। आविन सहकारी के दायरे में 9,673 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। वे लगभग 4.5 लाख सदस्यों से 35 LLPD दूध खरीदते हैं।”

स्टालिन ने आगे लिखा, “हाल ही में यह हमारे संज्ञान में आया है कि कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ (अमूल) ने कृष्णागिरी जिले में चिलिंग सेंटर और एक प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने के लिए अपने बहुराज्यीय सहकारी लाइसेंस का उपयोग किया है। यह हमारे राज्य के कृष्णागिरी, धर्मपुरी, वेल्लोर, रानीपेट, तिरुपथुर, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जिलों और उसके आसपास के FPO और SHG के माध्यम से दूध खरीद योजना बना रहा है। इस तरह की क्रॉस-प्रोक्योरमेंट ‘ऑपरेशन व्हाइट फ्लड’ की भावना के खिलाफ है और देश में दूध की कमी के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला है।”

हिंदी का विरोध कर इसे क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ने वाले एमके स्टालिन अब आर्थिक क्षेत्र में भी इसे आजमा रहे हैं। इसी तहत उन्होंने Amul बनाम Aavin के जरिए अब स्थानीय बनाम गैर-स्थानीय की आग को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि वे अमित शाह से राज्य में अमूल के ऑपरेशन को रोकने की माँग की है। इस तरह की माँग करके क्षेत्रीयता की आग भड़काकर अपनी राजनीति चमकाने वाले स्टालिन पहले नेता नहीं हैं।

महाराष्ट्र में राज ठाकरे

जब राज ठाकरे ने अपनी पार्टी ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ (MNS) की शुरुआत की थी तो उन्होंने साफ कर दिया था कि उनका कार्यक्षेत्र ‘महाराष्ट्र’ पर केंद्रित होगा। मराठी वोटों को उनकी भूख ने धार्मिक मुद्दों को भी दरकिनार कर दिया, जिसको लेकर शिवसेना का निर्माण किया गया था। राज ठाकरे ने नासिक जिले में स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर के हालिया विवाद में मराठी मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश की।
त्र्यंबकेश्वर मंदिर में मुस्लिमों द्वारा लोबान दिखाने और चादर चढ़ाने की कोशिश का बचाव करते हुए राज ठाकरे ने कहा, “अगर यह सदियों पुरानी परंपरा है तो इस पर रोक लगाना बेमानी है। यह त्र्यंबकेश्वर के लोगों का मुद्दा है। महाराष्ट्र में सैकड़ों मंदिर और मस्जिद हैं, जहाँ इस तरह का आपसी समन्वय देखने को मिलेगा। हमारा धर्म इतना कमजोर नहीं है कि किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति मंदिर में प्रवेश कर जाए तो वह भ्रष्ट हो जाए। मैं विभिन्न मस्जिदों में गया हूँ। हमारे कुछ मंदिरों में एक निश्चित जाति के लोगों को ही गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति है।”
राज ठाकरे दरअसल मराठी लोगों की राजनीति पर फोकस कर रहे हैं, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल हैं। यही कारण है कि त्र्यंबकेश्वर की घटना को वो आपसी सौहार्द्र बताकर मराठी मुस्लिमों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर रहे हैं। कभी हिंदुत्व की वकालत करने वाले राज ठाकरे महाराष्ट्र के दंगों को नजरअंदाज करते हुए कहा, “मराठी मुस्लिम जहाँ भी रहते हैं, वहाँ कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं है। यह मेरा अनुभव है। वे शांति से रहते हैं। कुछ लोग इस सद्भाव को भंग कर रहे हैं। एक हिंदू बहुल राज्य में हिंदू कैसे खतरे में हो सकता है?”
ये वही राज ठाकरे हैं, जिन्होंने MNS के गठन के शुरुआती दिनों में मराठी बनाम गैर-मराठी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। उनकी पार्टी बिहार और उत्तर प्रदेश से मुंबई और आसपास के शहरों जैसे ठाणे, पुणे और नासिक में काम कर रहे लोगों की नौकरी छिनकर स्थानीय मराठी लोगों देने की बात करते थे। उनकी पार्टी के कार्यकर्ता यूपी-बिहार के लोगों से आए दिन मारपीट करते थे। वे कहते थे कि इन्हीं लोगों के कारण मुंबई आदि शहरों में अपराध बढ़ा है।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस और JDS

राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कॉन्ग्रेस कई मौकों पर स्थानीय बनाम गैर-स्थानीय राजनीति का खेल खेला है। कॉन्ग्रेस ने कर्नाटक में चुनावों से पहले अमूल बनाम Nandini दूध ब्रांड का खेल खेलकर कन्नड़ बनाम गुजरात की राजनीति करने की कोशिश की थी। उसने जनता दल सेक्युलर द्वारा किए जा रहे अमूल के विरोध का खूब साथ दिया। इसको लेकर कॉन्ग्रेस ने खूब फेक न्यूज फैलाए।
दरअसल, दिसंबर 2022 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अमूल और नंदिनी के बीच अधिक सहयोग अपील की थी। नंदिनी का स्वामित्व कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (केएमएफ) के पास है। उन्होंने कहा था, “अमूल और केएमएफ मिलकर यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेंगे कि राज्य के हर गाँव में एक प्राथमिक डेयरी हो। कर्नाटक में सहकारी डेयरी को बढ़ावा देने के लिए अमूल और केएमएफ को मिलकर काम करना होगा।”
इस बयान को इस तरह लोगों के सामने रखा गया कि अमूल जल्द ही नंदिनी को खरीद सकता है। इस तरह स्थानीय डेयरी ब्रांड नंदिनी को कर्नाटक की पहचान और संस्कृति से जोड़ दिया गया। इसको मुद्दा बनाकर राज्य में क्षेत्रवाद की खूब आग भड़काई गई। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उस समय कन्नडिगों से अमूल ब्रांड का बहिष्कार करने की अपील की थी। वहीं, कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने इसे एक बड़ी साजिश बताया था।
जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी कुमारस्वामी ने तो यहाँ तक कह दिया, “अमूल को केंद्र सरकार के समर्थन से पिछले दरवाजे से कर्नाटक में स्थापित किया जा रहा है। अमूल कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (केएमएफ) और किसानों का गला घोंट रहा है। कन्नड़ लोगों को अमूल के खिलाफ बगावत करनी चाहिए। हमारे लोगों और ग्राहकों को प्राथमिकता पर नंदिनी उत्पादों का उपयोग करना चाहिए और किसानों की आजीविका को बचाना चाहिए।”

बिहार में JDU और RJD

साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड), तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल और कॉन्ग्रेस ने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन तैयार किया था। इन नेताओं ने अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को ‘बाहरी’ बताते हुए बिहार के लोगों से महागठबंधन को वोट देने के लिए कहा था। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने इस प्रोपेगेंडा को खूब फैलाया। यहाँ भी नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की पीएम मोदी और अमित शाह के प्रति नफरत साफ दिखी।
नीतीश कुमार भाजपा के सहयोग से बिहार में सरकार का आनंद उठाते रहे हैं। हालाँकि, साल 2013 में उन्होंने NDA छोड़ दिया। उसके बाद साल 2017 में वे राजद और कॉन्ग्रेस से गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ आ मिले।हालांकि, मौका देखकर वे एक बार फिर साल 2022 में भाजपा से अलग होकर महागठबंधन का हिस्सा बन गए। वे अब भी गुजरात बनाम स्थानीय नेता का राग समय-समय पर अलापते रहते हैं।

बंगाल में ममता बनर्जी

क्षेत्रवाद की आग भड़काने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी भी पीछे नहीं हैं। साल 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने कहा था, “गुजराती (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) यूपी और बिहार से गुंडे लाकर बंगाल पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं।” हावड़ा की एक चुनावी रैली में उन्होंने यह भी कहा था कि वे बंगाल को गुजरात नहीं बनने देंगी।
इसी तरह साल वह 2019 में राज्य में हुई हिंसा के लिए उन्होंने ‘बाहरी लोगों’ को जिम्मेदार ठहराया है। इसी तरह के क्षेत्रवाद को उन्होंने साल 2021 के चुनावों के दौरान भी बढ़ावा दिया। उन्होंने बंगाली समुदाय के भीतर भय पैदा करने की खूब कोशिश की। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बंगाल की संस्कृति और भाषा को दूसरे राज्यों के प्रवासियों द्वारा नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

यूपी में अखिलेश यादव की सपा और राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस

साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी ने अपनी-अपनी विरासत को बचाने के लिए गठबंधन किया और इस गठबंधन को ‘यूपी के लड़के’ के रूप में प्रचारित किया। चूँकि उस दौरान राहुल गाँधी भी अमेठी से सांसद थे और अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे तो दोनों को खुद को यूपी के स्थानीय के रूप में प्रचारित किया।
इन दोनों नेताओं ने सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन पीएम मोदी, अमित शाह को परोक्ष रूप स बाहरी साबित करने की खूब कोशिश की थी। चुनावी रैलियों के दौरान वे दोनों नेताओं को गुजराती कहते थे। अखिलेश यादव ने उन्हें ‘गुजरात के गधे’ कहा था। इसका करारा जवाब देते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्हें गधे से प्रेरणा लेने पर गर्व है, जो बिना किसी पूर्वाग्रह और अपनी परवाह किए दिन रात अपने मालिक की सेवा करता है। मोदी ने कहा था, “देश की जनता मालिक है। मैं उनके लिए अथक रूप से काम करता हूँ और आगे भी करता रहूँगा।”
इस तरह देश में क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक स्वार्थ के लिए क्षेत्रीयता की आग को खूब हवा देते रहे हैं। चाहे वह पंजाब हो या केरल, हर जगह भाजपा से मुकाबला करने के लिए वाजिब मुद्दों के अभाव में इस तरह के मुद्दे उठाए जाते रहे हैं। एमके स्टालिन ने भी Amul बनाम Aavin के नाम पर केंद्र को पत्र लिखकर अपने राज्य में एक और मुद्दे को हवा देने की कोशिश की है।

क्षेत्रीय दलों को आधे से अधिक चंदा ‘अज्ञात’ स्रोत से : जगन-स्टालिन-चंद्रशेखर जैसे CM की पार्टी सबसे आगे, ADR की रिपोर्ट से खुलासा

कई दशकों से जनता से लेकर नेता तक देश में फैले भ्रष्टाचार पर अपनी चिंता जाहिर करते रहते हैं, जलपान आदि पर हज़ारों रूपये स्वाह कर मीटिंगें होती रहती है, और मूर्ख जनता समझती है कि "देखो हमने कितनी अच्छी सरकार चुनी है।" जबकि भ्रष्टाचार का स्रोत कहाँ है जनता नहीं अपने ऐशो आराम की ज़िंदगी जीने वाले नेताओं को मालूम होता है। कोई पार्टी इस कटु सच्चाई से इंकार नहीं कर सकती। जिस दिन सियासती पार्टियां गुप्त दान लेना बंद कर देंगी, खुले दान भी एक निश्चित सीमा तक समझ लो सरकार भ्रष्टाचार पर सख्त है। अन्यथा सत्ता पाने का मात्र एक लॉलीपॉप। गरीब दास बन चुनाव लड़ते हैं, लेकिन पांच साल बाद वही गरीब दास करोड़पति होता है। कभी सोंचा।  

देश में अब तक कितने घोटाले हुए हैं, कभी सोंचा कितने नेताओं को जेल हुई हुई और कितनी वसूली हुई। लेकिन आम जनमानस द्वारा टैक्स चोरी करने पर कितनी सख्ती की जाती है, नेता हैं, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। 
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने नवंबर 11 को अपनी रिपोर्ट जारी की। इसमें खुलासा किया गया है कि वित्त वर्ष 2019-20 में क्षेत्रीय दलों को मिले चंदे का 55 फीसदी से अधिक हिस्सा ‘अज्ञात’ स्रोतों से मिला था। इन स्रोतों का करीब 95 फीसदी हिस्सा यानि करीब 445 करोड़ रुपए से अधिक इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिले थे।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019-20 में देशभर के 25 क्षेत्रीय दलों को 803.24 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। इसमें से 445.7 करोड़ रुपए कहाँ से आए, इसका कोई हिसाब नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 426.233 करोड़ रुपए (95.616%) चुनावी बांड से आए, तो वहीं 4.976 करोड़ रुपए स्वैच्छिक दान से आए।

दक्षिण की पार्टियाँ लिस्ट में सबसे आगे

सबसे अहम बात ये है कि के चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS), चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (TDP), जगनमोहन रेड्डी की पार्टी YSR Congress, एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK और देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली JDS अज्ञात स्रोतों से चंदा पाने वाले क्षेत्रीय दलों की सूची में सबसे ऊपर हैं।
इसमें से TRS को 89.158 करोड़ रुपए का चंदा ‘अज्ञात’ स्त्रोतों से मिला। इसके अलावा TDP को 81.694 करोड़ रुपए, YSR Congress को 74.75 करोड़ रुपए, नवीन पटनायक की BJD को 50.586 करोड़ रुपए और DMK को 45.50 करोड़ रुपए को चंदा अज्ञात स्त्रोतों से मिला।

ज्ञात लोगों ने कुल दान का केवल 22.98% दिया

रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि इन क्षेत्रीय दलों को 184.623 करोड़ रुपए का चंदा ज्ञात दानकर्ताओं द्वारा दिया गया, जो कि कुल चंदे का 22.98 फीसदी है। बता दें कि ये वो लोग हैं जिनका रिकॉर्ड चुनाव आयोग के पास उपलब्ध है। इसके अलावा 21.1 फीसदी यानी 172.843 करोड़ रुपए सदस्यता शुल्क, बैंक ब्याज, प्रकाशनों की बिक्री, पार्टी लेवी आदि जैसे ज्ञात स्त्रोतों से मिले।
23 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का विश्लेषण करने के बाद 2018-19 के लिए भी इसी तरह के आँकड़े दर्ज किए गए हैं।

डोनर्स की लिस्ट सार्वजनिक करने की माँग

एडीआर के प्रमुख मेजर जनरल अनिल वर्मा (सेवानिवृत्त) ने News18 से बात करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को डोनर्स द्वारा दिए गए चंदे की लिस्ट को सार्वजनिक करना चाहिए। संगठन ने कहा, “चूँकि राजनीतिक दलों की आय के एक बहुत बड़े हिस्से के मूल दाताओं का पता नहीं होता, इसलिए सभी दाताओं की पूरी जानकारी को आरटीआई के तहत उपलब्ध कराया जाना चाहिए।” इसमें आगे कहा गया है कि विदेशी फंडिग पाने वाले किसी भी संगठन को किसी उम्मीदवार या पार्टी का समर्थन करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है, “सभी दान के भुगतान का तरीका (20,000 रुपये से ऊपर), कूपन की बिक्री से आय, सदस्यता शुल्क आदि को पार्टियों द्वारा ऑडिट रिपोर्ट में बताया जाना चाहिए और इसे आयकर विभाग और चुनाव आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।”

डोनर्स नाम उजागर करने को तैयार नहीं

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) समेत कई दलों के नेताओं का कहना है कि ‘अज्ञात’ चंदा ज्यादातर ऐसे संगठनों या व्यक्तियों द्वारा दिया जाता है, जो सार्वजनिक रूप से अपना नाम नहीं बताना चाहते हैं।
इन पार्टियों का कहना है कि राजनीतिक दल चुनाव आयोग को ‘छुपाए नाम’ के बारे में बताते हैं। एनसीपी नेता मजीद मेमन ने कहा, “यदि फंड के मैनेजमेंट में कहीं कोई गड़बड़ी होती है तो चुनाव आयोग या राज्य चुनाव आयोग इसे राजनीतिक दलों के सामने उजागर कर सकता है।” हालाँकि, एडीआर प्रमुख ने पारदर्शिता से बचने के लिए इसे ‘सुविधाजनक कारण’ बताते हुए उनके बयानों को खारिज कर दिया।

बिना पैन विवरण के मिले 25 करोड़ रुपये से अधिक

अक्टूबर में जारी एक अन्य रिपोर्ट में एडीआर ने खुलासा किया था कि 16 से अधिक क्षेत्रीय दलों ने ऐसे 1026 चंदे (लगभग 25 करोड़ रुपये) प्राप्त किये, जिनके पैन कार्ड के विवरण नहीं थे। रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि शिवसेना, AIADMK, आम आदमी पार्टी, बीजेडी और वाईएसआर-सी जैसी पार्टियों ने साल 2019-20 में सबसे अधिक चंदा पाने की जानकारी दी थी। इतना ही नहीं, AAP और समाजवादी पार्टी को 2018-19 और वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान दान से होने वाली आय में जबरदस्त वृद्धि हुई।

एडीआर क्या है?

एडीआर की वेबसाइट पर बताया गया है कि ADR की स्थापना साल 1999 में इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM), अहमदाबाद के प्रोफेसरों ने मिलकर की थी। एडीआर ने उसी वर्ष दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक रिकॉर्ड का खुलासा करने की माँग की थी।
इसी के आधार पर 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों के लिए चुनाव आयोग के समक्ष हलफनामा दाखिल कर अपनी आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी देना अनिवार्य कर दिया था।