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नाम छुपाकर व्यापार करने वाले की हिमायत करने वाले महामूर्खों को नहीं मालूम इमरजेंसी में संजय गाँधी ने शुरू किया था; महामूर्खों पहलगाम से तुलना मत करों जेहादियों ; Victim Card मत खेलो; सनव्वर चला रहा था ‘पंडित जी शुद्ध वैष्णो भोजनालय’, गोपाल नाम वाला निकला तजम्मुल: UP पुलिस ने मालिक सनव्वर, आदिल, जुबैर समेत 5 पर FIR; मुजफ्फरपुर की घटना

आज देश में राजनीति नहीं बल्कि राजनीति के नाम पर सियासत हो रही है। वो भी निचले स्तर की। और जनता भी इन जेहादी प्रवित्ति वालों को नेता मान इनकी तिजोरियां भर अपना नुकसान कर रही है। मेरी आयु वालों को-आम नागरिक से लेकर जजों तक-देश में इमरजेंसी का दौर याद करना चाहिए। ऐसा अपराध करने वालो और उनके हिमायतियों शुक्र मनाओ संजय गाँधी नहीं है। वरना कभी का तुम दोनों का ढोल बना दिया होता। याद है, जब संजय गाँधी की एक आवाज़ पर हर दुकानदार को सबकुछ उजागर करने के साथ-साथ हर पदार्थ की कीमत उस पदार्थ के डिब्बे/कनस्तर पर लगानी जरुरी थी। ऐसा नहीं करने दुकानदार पर कार्यवाही की जाती थी। नाम छुपाकर कर व्यापार करने वाला अपनी दुर्भावना अपने आप जाहिर कर रहा है। ऐसे जेहादियों का समर्थन सबसे बड़े जेहादी है। ऐसे लोगों से देश चलाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और ना ही नाम छुपाकर कोई भी व्यापार करने वालों की हिमायत लेने वालों को एक भी वोट देना चाहिए। आने वाली तुम्हारी पीढ़ियां कोसेंगी तुम्हे। जीते जी ही मरने के बाद का जीवन भी सुधार लो। सनातन को अपमानित भी करेंगे और सनातन के नाम से धंधा भी करेंगे। करना है करो अपनी पहचान क्यों छुपा रहे हो?  
उत्तर प्रदेश में दिल्ली-देहरादून नेशनल हाईवे के बाईपास पर मुस्लिम संचालक द्वारा हिंदू नाम से भोजनालय चलाने का मामला गर्माता जा रहा है। ताजा खबर यह है कि ‘पंडित जी शुद्ध वैष्णो भोजनालय’ के संचालक सनव्वर सहित पांच लोगों पर केस दर्ज किया गया है।

यह मामला उस समय चर्चा में आया, जब बघरा स्थित योग साधना यशवीर आश्रम के महंत स्वामी यशवीर महाराज बीती 28 जून को कांवड़ यात्रा मार्ग पर संचालित ढाबों और होटलों पर चेकिंग करने निकले थे। यशवीर महाराज एक-एक होटल और ढाबे में जा रहे थे और संचालकों के साथ ही कर्मचारियों के पहचान-पत्र देख रहे थे।

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दिल्ली-देहरादून हाईवे पर मुस्लिम लोग ‘पंडित जी वैष्णो’ नाम से ढाबा चला रहे थे। पुलिस ने हिंदू संगठन के विरोध के बाद मालिक सनव्वर, उसके बेटे आदिल, जुबैर और दो अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

दरअसल, मामला रविवार (29 जून 2025) का है। जब हिंदू संगठन की टीम काँवड़ के रूट पर स्थित होटलों और ढाबों की जाँच कर रही थी। इस दौरान सामने आया कि हिंदू नाम की पहचान से दिल्ली-देहरादून NH-58 स्थित पंडित जी वैष्णो ढाबा सनव्वर नाम का एक मुस्लिम व्यक्ति चला रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यहाँ हिंदू संगठन ने ढाबे के मालिक से आधार कार्ड माँगा, लेकिन उन्होंने देने से इनकार कर दिया। इसके बाद ऑनलाइन पेमेंट वाले स्कैनर में ‘जाबिर’ नाम लिखा था, जबकि बाहर ‘दीक्षा शर्मा’ नाम का बोर्ड लगा था। का मालिक का असली नाम पता लगा।

ढाबे के मालिक और अन्य कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि मुस्लिम होने की पुष्टि करने के लिए उनकी पैंट भी उतरवाई गई। जबकि हिंदू संगठन से सुमित बजरंगी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।

QR Code से हुई पहचान

यशवीर महाराज के समर्थकों ने ‘पंडित जी शुद्ध वैष्णो भोजनालय’ पहुंचकर वहां लगे QR Code को स्कैन किया, तो एक कोड सनव्वर के नाम से मिला। वहीं दूसरा क्यूआर कोड अनीता के नाम से था। इसके बाद समर्थक भड़क गए और हंगामा करने लगे। इन लोगों ने अन्य ढाबों पर भी भगवा झंडे लगाए और भगवान वराह के चित्र चस्पा किए।

पहचान उजागर करने पर हुई थी मैनेजर की पिटाई

  • यशवीर महाराज अपने समर्थकों के साथ ‘पंडित जी शुद्ध वैष्णो भोजनालय’ पहुंचे, तो पता चला कि इसका संचालन एक मुस्लिम द्वारा किया जा रहा है। यहां हंगामे के बीच मैनेजर की पिटाई कर दी है।
  • होटल संचालक और उसके साथियों ने अपने ही कर्मचारी मैनेजर को इस आरोप के साथ पीटा कि उसने यशवीर महाराज के सामने यह खुलासा कर दिया कि यहां का संचालक मुस्लिम है।
  • खुद होटल मैनेजर ने यह आरोप लगाया। मैनेजर धर्मेंद्र शर्मा ने बताया कि यशवीर महाराज ने उससे होटल मालिक का नाम पूछा तो उसने सच-सच बता दिया। इस पर उसकी पिटाई कर दी गई।
  • इसके बाद 30 जून को होटल मैनेजर और यशवीर महाराज ने एसएसपी कार्यालय पहुंचकर पुलिस को पूरी घटना बताई। उन्होंने बताया कि 29 जून की रात लगभग 9 बजे होटल संचालक सनव्वर, जुबेर पुत्र सनव्वर, आदिल खान और एक अज्ञात व्यक्ति ने मैनेजर को पीटा और बाद में नौकरी से भी निकाल दिया गया।

असम : सरकार नहीं, पुजारी ही चलाएँगे कामाख्या मंदिर: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कामाख्या मंदिर में मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की इजाजत दी (साभार: सीएम सरमा/Kamakhya Temple गुवाहाटी फेसबुक अकाउंट)
असम के कामाख्या मंदिर में दान को लेकर दिए गए गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। साल 2017 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इस मंदिर में भक्तों से प्राप्त दान को डिप्टी कमिश्नर को देने और दान की राशि के लिए अलग खाता खोलने का निर्देश दिया था। इस फैसले से मंदिर के विकास कार्यों की देखरेख मंदिर के मुख्य पुजारी, जिसे डोलोई कहा जाता है, के हाथों से प्रशासन के हाथ में आ गई थी।

इसके बाद पुजारी समाज ने गुवाहटी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस पंकज मित्तल की बेंच ने 10 नवंबर 2023 के आदेश में कहा कि कामाख्या मंदिर के प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था पर गुवाहाटी HC का आदेश लागू नहीं होगा। इस मामले में असम सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपनी रखी थी।

अपने हलफनामे में असम सरकार ने कहा, “डोलोई (पुजारी समाज) स्थानीय प्रशासन के साथ गहरे तालमेल के साथ मंदिर प्रशासन के मामलों को संतोषजनक ढंग देख रहा है और ये व्यवस्था जारी रह सकती है।” असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार प्रधानमंत्री डिवाइन योजना के तहत माँ कामाख्या मंदिर के विकास के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने साल 2015 में डिप्टी कमिश्नर को मंदिर में जनता और भक्तों से मिले दान को लेने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही इस तरह के दान के लिए अलग बैंक खाता खोलकर इस पैसे को मंदिर के विकास के कामों में खर्च करने के लिए कहा था। बाद में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एक समीक्षा याचिका दाखिल की गई।

इसके बाद मंदिर के पुजारियों ने एक समीक्षा याचिका दाखिल की और कहा कि मंदिर के प्रशासन और धार्मिक गतिविधियों पर उसका अधिकार है। इसके बाद साल 2017 में गुवाहटी हाईकोर्ट ने उस समीक्षा याचिका का निस्तारण कर दिया। उस निस्तारण याचिका के फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा था श्रद्धालुओं से प्राप्त दान केवल मंदिर की विकास के लिए होगा, न कि सामान्य चढ़ावे के लिए।

पुजारी समाज हाईकोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हुआ और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार से भी राय माँगी। सुप्रीम कोर्ट में 3 सितंबर 2023 को दायर अपने हलफनामे में असम सरकार ने बताया कि माँ कामाख्या कॉरिडोर से संबंधित मामलों पर चर्चा के लिए असम के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में 13 अगस्त 2023 को एक बैठक हुई थी। इसके बाद असम सरकार ने 8 नवंबर 2023 को एक और हलफनामा दायर किया था।

दरअसल, माँ कामख्या देवी के मुख्य मंदिर के पुजारियों के परिवार को बोर्डेउरिस और सहायक मंदिरों के पुजारियों के परिवारों को देउरिस कहा जाता है। ये नौ सहायक मंदिर उसी नीलांचल पहाड़ी पर स्थित हैं, जहाँ माँ कामाख्या का मंदिर है। कामाख्या मंदिर के मुख्य पुजारी को डोलोई कहा जाता है। डोलोई का चुनाव बोर्डेउरी और देउरिस द्वारा किया जाता है। साल 2021 में हुए चुनाव के बाद से कबींद्र प्रसाद सरमा कामाख्या देवी मंदिर के मुख्य पुजारी (डोलोई) हैं।

मंदिर पर कब्जे को लेकर सत्ता संघर्ष

कामाख्या मंदिर के प्रबंधन के अधिकार को लेकर 1990 के दशक में एक लंबा सत्ता संघर्ष देखा गया था। ये संघर्ष पुजारियों के परिवार के व्यक्तियों के साथ-साथ उन वर्गों के प्रतिनिधियों के बीच था, जिनका मंदिर चलाने में कोई भूमिका नहीं थी। विरोधियों ने कामाख्या डेब्यूटर बोर्ड का गठन किया था।
इस बोर्ड ने पुजारी समाज के अधिकारों और विशेषाधिकारों को अपने अधिकार में ले लिया। वहीं, पुजारी समाज ने आरोप लगाया कि डेबटर बोर्ड ने 1998 में सत्ता में आने के लिए हेरफेर किया था। बोर्ड ने कहा था कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि पुजारी समाज मंदिर को ‘अलोकतांत्रिक’ तरीके से चला रहा था।
साल 2012 में एक अंतरिम आदेश द्वारा सुप्रीम कोर्ट ने कामाख्या देवी मंदिर में जिम्मेदारियों को विभाजित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने डेबुटर बोर्ड को मंदिर का प्रशासन चलाने के लिए कहा, जबकि डोलोई (पुजारियों) की भूमिका को धार्मिक गतिविधियों तक सीमित कर दिया। हालाँकि, जुलाई 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य पुजारी समाज के पारंपरिक अधिकारों को बहाल कर दिया। साथ ही यह भी कह दिया कि डोलोई एवं अन्य पदों के लिए चुनाव होना चाहिए।
अक्टूबर 2022 में शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि मंदिर का रखरखाव ठीक से नहीं किया जा रहा है। पूजा स्थल में स्वच्छता मानकों पर कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उस समय, राज्य सरकार के साथ-साथ डोलोई समाज ने अदालत को आश्वासन दिया था कि मंदिर परिसर के आसपास स्वच्छता के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता पर लिया जा रहा है।