Showing posts with label sanjay gandhi. Show all posts
Showing posts with label sanjay gandhi. Show all posts

भारतीय राजनीति की कुछ सदाबहार प्रेमकहानियां

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
प्रेम की मशाल को लैला-मजनूं, हीर-रांझा से लेकर शीरी-फरहाद ने जलाए रखा। आज भी उस मशाल की रोशनी गवाही दे रही है कि, प्रेम अभी जवान है। ऐसे में स्मरण होता है, फिल्म 'कटी पतंग' का चर्चित गीत "प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है..." प्यार हर किसी को कभी न कभी अपने आगोश में ले ही लेता है। प्रेम एक जज्बा होता है, कई परिस्थितियों में प्यार त्याग भी मांग बैठता है। शादी का स्वाद सभी चख लेते हैं, लेकिन प्यार का स्वाद शायद के नसीब में नहीं होता। सच्चा प्यार सामने वाले/वाली की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करता। और जो ऐसा करते/करती हैं, उसे प्यार नहीं हवस का नाम दिया जाता है। खैर, प्रेम से राजनेता भी इससे अछूते नहीं हैं। 
राजनेताओं के प्रेम-संबंध कई बार उनकी राजनीति को भी प्रभावित करते हैं और कई बार प्रेम भी राजनीति बन जाता है। आज हम आपको ऐसे ही कुछ नेताओं की महशूर प्रेम कहनियां बताने जा रहे है जो काफी चर्चा का विषय रही।
नेहरु-एडविना के रोमांस
कहते हैं इश्क की कोई उम्र नहीं होती और इस प्रेम कहानी में भी कुछ ऐसा ही रहा। जब ये प्रेम कहानी शुरू हुयी उस समय जवाहरलाल नेहरू की उम्र 58 और एडविना की उम्र 47 साल थी। नेहरू की पत्नी कमला कौल का पहले ही निधन हो चुका था। जबकि जानकारों का कहना है कि एडविना  नेहरू और जिन्ना एक ही कॉलेज में पढ़ते थे, तब एडविना नेहरू और जिन्ना के प्रेमजाल में बंधी थी। मॉउन्टबेटन से एडविना का विवाह अब इतिहास है।नेहरू  ने खुद भी स्वीकार किया है कि वो अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं थे जिसका एक कारण ये भी हो सकता है कि जहाँ कमला एक सीधी-सादी कश्मीरी लडक़ी थीं तो नेहरू की जिन्दगी शान-ओ-शौकत में बीती थी। ऐसे में मानसिक मतभेद होना लाजमी था। कमला की मौत के बात जहाँ नेहरू अकेले थे वहीं एडविना और डिकी यानी लार्ड माउंटबेटन के बीच सिर्फ दोस्ताना सम्बन्ध ही रह गए थे। माउंटबेटन जब भारत आए तो नेहरू का इस परिवार में अच्छा खासा आना-जाना हो गया।
एडविना पंडित नेहरू की शख्सियत से अत्याधिक प्रभावित थीं। दोनों का अकसर मिलना जुलना होता था। कई बार वे बाहर साथ घूमने भी गए। माउंटबेटन जब हिंदुस्तान छोडक़र जा रहे थे तो उससे एक दिन पहले भारत सरकार ने उनके सम्मान में डिनर का आयोजन किया था। खाने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने एडविना के सम्मान में एक भाषण दिया जो उनकी मोहब्बत की गहराई को साफ तौर पर दर्शाता है, भाषण पूरा करते वक्त नेहरू फूट फूटकर रोने लगे तो दूसरी तरफ एडविना भी रोने लगी थी। जवाहरलाल नेहरू के एडविना माउंटबेटन से संबंधों पर भारत से ज्यादा चर्चा विदेश में हुई है। इस विषय पर इंग्लैंड में एक किताब लिखी गयी तो माउंटबेटन ट्रस्ट ने उसे छापने की बाकायदा इजाजत दी। नेहरू ने जितने भी पत्र एडविना को लिखे, उन्हें उस किताब में शामिल किया गया।
एक किस्सा है कि एक बार एडविना नेहरू के साथ नैनीताल गयीं थीं। एक शाम दोनों आलिंगन में बंधे हुए थे कि तभी वहां उत्तरप्रदेश के गवर्नर होमी मोदी का बेटा रूसी मोदी पहुँच गया, उसने ये नजारा देखा। उसके बाद तो राजनीतिक गलियारों में यह आम चर्चा का विषय हो गया। वैसे, नेहरू और पद्मजा नायडू के बीच भी इश्क रहा। कहा जाता है कि पद्मजा को लेकर नेहरू और इंदिरा में टकराव भी होता था।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के कोट में गुलाब का फूल और दिल में प्रेम सदा रहता था. यह प्रेम नेहरु-एडविना के इश्क के नाम से भी जाना जाता गया.
जवाहरलाल नेहरु और लार्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन के संबंधों पर स्वदेश में तो दबी-ढकी पर विदेश में काफी चर्चा हुई.
इंग्लैंड में माउंटबेटन ट्रस्ट द्वारा माउंटबेटन के जीवन पर छपी किताब में भी नेहरु-एडविना के रोमांस का जिक्र है. उसमे नेहरु के वो सरे पत्र शामिल किए गए, जो उन्होंने एडविना को लिखे थे.
रंगीले राम मनोहर लोहिया 
समाजवाद के पुरोधा राम मनोहर लोहिया जीवनभर कुंआरे रहें. मगर महिलाओं के मामले में कोरे कतई नहीं रहे. एक पुरुष और औरत के बीच तब तक सब कुछ स्वीकार योग्य है, जब तक कि उनके संबंधों के बीच कोई जबरदस्ती या कोई वादाखिलाफी न हो.
लिव इन रिलेशनशिप की कल्पना उस समय कोई कर भी नहीं सकता था. लोहिया ने अविवाहित रहकर भी अपना काफी समय दिल्ली विश्वविद्यालय की एक लेक्चरर रमा के साथ रहकर गुजारा. आश्चर्य की बात यह की उस दौर में भी किसी ने इस बात पर कोई ऐतराज नहीं जताया.
कई साहित्य में कुछ जगहों पर तो इस बात का भी जिक्र है कि, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब लोहिया गिरफ्तार किए गए. तो उस समय वे कोई आंदोलनकारी गतिविधि नहीं कर रहे थे बल्कि वे एक कम्युनिस्ट नेता की बहन के साथ एकांतवास में थे.
कांग्रेस के दिवगंत वरिष्ठ नेता वसंत साठे ने एक जगह कहा है कि, उन्होंने लोहिया को कई अन्य महिला मित्रों के साथ भी देखा था. साठे के अनुसार लोहिया स्पष्टवादी थे. उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला. इसलिए उनके इन निजी संबंधों का उनके सार्वजनिक जीवन पर कोई असर नहीं पड़ा.
vajpeyi kuchhnaya.com
वाजपेयी का अटल प्रेम
कवि मन वाजपेयी का प्यार कई मायने में अनोखा है. वह जीवन भर कुंवारे ही रहे. लेकिन दिल तो उनके पास भी था तो किसी न किसी के लिए धड़कना लाजमी था.
पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई के ‘परिवार’ पर दबेज़ुबान कुछ चर्चा भले ही होती रही हो लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता पर बिल्कुल फर्क नहीं पड़ा। वाजपेई ने कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्त राजकुमारी कौल के साथ विवाह नहीं किया लेकिन उनकी शादी के बाद उनके पति के घर रहने लगे। राजकुमारी कौल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बीएन कौल से शादी की। प्रो. कौल भी अटल के अच्छे दोस्त थे। जब प्रो. कौल अमेरिका चले गए तो श्रीमती कौल अटल के निवास स्थान पर उनके साथ रहने आ गईं। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो श्रीमती कौल का परिवार 7 रेस कोर्स में स्थित प्रधानमंत्री आवास में ही रहता था। उनकी दो बेटियां थीं। जिनमें से छोटी बेटी नमिता को अटल ने गोद ले लिया था। नमिता की शादी रंजन भट्टïाचार्य से हुयी। रंजन भट्टाचार्य वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में ओएसडी (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) थे।
एक पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार में राजकुमारी कौल ने कहा, ‘मैंने और अटल बिहारी वाजपेई ने कभी इस बात की जरूरत नहीं महसूस की कि इस रिश्ते के बारे में कोई सफाई दी जाए।’ राजकुमारी कौल का कुछ दिनों पहले निधन हो गया लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में उनकी शख्सियत के बारे में इसलिए चर्चा नहीं हुई क्योंकि उनके बारे में लोगों को कुछ पता ही नहीं था। राजकुमारी कौल की दोस्त तलत जमीर कहती हैं, ‘वो बहुत ही खूबसूरत कश्मीरी महिला थीं, बहुत ही मीठा बोलती थीं। प्रधानमंत्री निवास में सब लोग उन्हें माता जी कहा करते थे। अटलजी के खाने की सारी जिम्मेदारी उनकी थी। उनको टीवी देखने का बहुत शौक था और सभी सीरियल्स डिस्कस किया करती थीं।
उनके रिश्तों की भी चर्चा हुई पर दबी जुबान से. वाजपेयी की सबसे अच्छी दोस्त थी उनके कॉलेज के दिनों की सखी और कश्मीरी महिला राज कुमारी कौल.
गहरी मित्रता के बावजूद वाजपेयी और कौल की कहानी अधूरी रह गयी और दोनों की शादी नहीं हुई, मगर कौल की शादी के बाद वाजपेयी कौल के पति के घर जरुर रहे.
बाद में जब अटल बिहारी प्रधानमंत्री बन गए थे तो लोगों ने राजकुमारी कौल को भी प्रधानमंत्री निवास में मौजूद पाया. दोस्‍ती की नैतिकता को निभाते हुए उन्होंने अटलजी की बहुत सेवा की. अटल जी के खाने की पसंद उन्हें मालूम थी इसलिए रसोइया उनसे ही पूछ कर खाना बनाता था.
sonia kuchhnaya.com
सोनिया और  फ्रैंको की प्रेम कहानी 
जब सोनिया महज 14 साल की उम्र में फ्रैंको लुइसोन से जेसोलो के समुद्र किनारे मिली थी.
कुछ साल पहले एक इटली के मैगज़ीन ‘जेंटे’, को दिए गए अपने साक्षात्कार में फ्रैंको ने अतीत का जिक्र करते हुए बताया कि, ”साठ के दशक में अंतोनिआ माइनो (सोनिया गांधी का इटालियन  नाम) के साथ मेरा प्रेम प्रसंग एक आशीर्वाद था. हम हर जगह प्रेम और खुशी में थे.”
सोनिया के साथ उनका प्रेम प्रसंग चार साल तक चला. फ्रैंको ने आगे खुलासा किया कि, उनके परिवारों ने उनके रिश्ते को सहमति दी थी. सोनिया गांधी के माता-पिता खुशी से हर बार फ्रैंको का स्वागत करते थे
Image result for उमा भारती-गोविंदाचार्यउमा भारती की प्रेम कहानी
हर लड़की का सपनों का एक राजकुमार होता है. अपने प्रियतम में वो उस राजकुमार की छवि ढूंढने लगती हैं.
फायर ब्रांड छवि और बेबाक बयानबाज़ी से राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली साध्वी उमा भारती और संघ परिवार, भाजपा की रीति-नीति व राजनीति के लंबे समय तक शिल्‍पकार रहे केएन गोविंदाचार्य के दिल में भी किसी वक़्त प्रेम की लहर कुछ वैसी ही उठी थी जैसी सामान्‍य मनुष्‍य के अंदर उठती है.
फायर ब्रांड छवि और बेबाक बयानबाज़ी से राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली साध्वी उमा भारती और संघ परिवार, भाजपा की रीति-नीति व राजनीति के लंबे समय तक शिल्‍पकार रहे केएन गोविंदाचार्य के दिल में भी किसी वक़्त प्रेम की लहर कुछ वैसी ही उठी थी जैसी सामान्‍य मनुष्‍य के अंदर उठती है.
ईमानदारी और सच्‍चे भाव से स्‍वीकार करते हुए गोविंदाचार्य ने कहा भी था कि उमा भारती के लिये मेरे दिल में एक समय प्रेम भाव था और उन्होंने उमा भारती की तस्‍वीर अपने दिल में बिठा रखी थी.
दूसरी तरफ अंग्रेजी पत्रिका द वीक को दिए एक इंटरव्यू में उमा भारती ने भी कहा था कि, वह पूर्व विचारक गोविंदाचार्य से प्यार करती थीं.
इस इंटरव्यू में उमा भारती ने स्वीकार किया था, ”हां, मैं उन (गोविंदाचार्य) से प्यार करती थी और उनसे शादी भी करना चाहती थी. मगर संघ के उसूल और नियम कानूनों ने उनके प्‍यार को सफल नहीं होने दिया और दोनों ने अपने ही हाथों अपने प्‍यार के एहसास को सूली पर टांग दिया.”
इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व जॉइंट डायरेक्टर एमके धर ने अपनी किताब ओपन सीक्रेट्स में लिखा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विवाह की इजाजत न मिलने के कारण गोविंदाचार्य और उमा भारती विवाह नहीं कर पाये.
About this website
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम पटौदी खानदान से ताल्लुक रखने वाले सैफ अली खान ही नहीं उनकी पूर्व पत्नी अमृता सिंह का रिश्ता भी बड़े खा...

संजय गांधी और सुल्ताना की प्रेम कहानी
राजीव के छोटे भाई संजय गांधी का भी नाम कई महिलाओं से जोड़ा गया। उनमें से एक रुखसाना सुल्ताना भी थीं। रुखसाना सुल्ताना कोई बहुत बड़ी हस्ती नहीं थीं लेकिन उनको संजय गाँधी ने आगे बढ़ाया। उनकी लाइफस्टाइल था, उस जमाने में मेक अप करके, हाई हील्स पहन कर निकला करती थीं। उनका एक डॉमिनेटिंग कैरेक्टर था। कांग्रेस के लोग कहते थे कि वो संजय पर अपना हक जताती थीं और वो एक ऐसा हक था जिसे किसी रिश्ते का नाम नहीं दिया गया था। संजय का कई लड़कियों के साथ उठना बैठना था। बल्कि जब संजय की मेनका से शादी का पता चला तो कई लोगों को हैरत हुई कि ऐसा कैसे हो गया और कई लड़कियों के दिल टूट गए।
फिल्म अभिनेत्री अमृता सिंह की मां रुखसाना सुल्ताना के साथ संजय गांधी का काफी उठना-बैठना था. इमरजेंसी के आसपास के उस समय में रुखसाना सुल्ताना ‘सोशल बटरफ्लाई’ कही जाती थीं.
उनकी स्टाइल और आधुनिकता के काफी चर्चे थे. कांग्रेस के अनेक लोगों ने रुखसाना सुल्तान को संजय गांधी पर हक जताते देखा था. हालांकि यह हक किसी रिश्ते में तब्दील नहीं हो पाया.
सिर्फ रुखसाना ही नहीं बल्की कई और लड़कियों से भी संजय गांधी का मेल था. ऐसे में जब संजय और मेनका गांधी की शादी हुई तो एकाएक लोगों को इस पर सहज विश्वास ही नहीं हुआ था.
Related image
मुलायम सिंह की प्रेम कहानी से सभी थे अनजान 
मुलायम सिंह यादव राजनीति के ही नहीं प्रेम के भी बड़े खिलाड़ी हैं. मुलायम सिंह ने अपने प्रेम को अपने प्रशंसकों से सालों तक छुपाये रखा.
लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले में जब सिंह ने कोर्ट में दिए एक हलफनामे में कहा की, उनकी दूसरी पत्नी और एक लड़का भी है तो लोग चौंक उठे.
अवलोकन करें:-



nigamrajendra.blogspot.com
मुलायम सिंह यादव कुनबे में बीच कलह उस समय क्लाइमेक्स पर पहुंच गई, मंत्रियों की…
वास्तव में पहली पत्नी मालती देवी के जीवित रहते हुए ही मुलायम दूसरी स्त्री साधना गुप्ता से एक पुत्र के पिता बन गए थे. मगर दुनिया को इसका पता फरवरी 2007 में लगा.
digvijay singh kuchhnaya.com
दिग्विजय सिंह और अमृता की प्रेम कहानी 
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह हमेशा अपने बयानों और विरोधियों पर तीखे हमले करने की वजह से सुर्ख़ियों में रहते हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर टीवी पत्रकार अमृता संग उनकी प्यार भरी तस्वीर ने उन्हें रोमांस की दुनिया का भी वरिष्ठ खिलाड़ी बना दिया.
दिग्विजय सिंह की पत्नी आशा सिंह की मृत्यु 2013 में कैंसर से हो गयी थी .
कहा गया है कि, भूख न जाने बासी भात, नींद न जाने टूटी खाट और प्यार न जाने ओछी जात. प्यार में न उम्र की सीमा होती है न जन्म का कोई बंधन. जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन. प्यार सिर्फ दिल को पहचानता है और जिसमें उसे सादगी, सच्चाई और वफाई नज़र आ जाए उसे अपनी आगोश में ले लेता है.

मौलाना आजाद

नेहरू के सचिव रहे एमओ मथाई अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज’ में लिखते हैं कि मौलाना आजाद को जीवन की बेहतरीन चीजों का शौक था। एक बार जब वो ब्रिटेन की यात्रा पर गए थे तो वहाँ भारत की उच्चायुक्त विजयलक्ष्मी पंडित ने उनके सम्मान में एक भोज दिया था जिसमें एंथनी ईडन और लॉर्ड माउंटबेटन जैसे लोगों को बुलाया गया था। जैसे ही खाना खत्म हुआ मौलाना कमरे से बाहर निकल आए। ईडन ने पूछा भी कि मौलाना गए कहां? विजयलक्ष्मी पंडित को कूटनीतिक झूठ बोल कर बहाना बनाना पड़ा जबकि सच ये था कि मौलाना अपने कमरे में बैठ कर शैंपेन का अंनंद ले रहे थे। बताया जाता है कि वो शाम के सात बजे के बाद पीना शुरू करते थे और इसको छिपाते भी नहीं थे। अपनी किताब ‘गुबारे ख़ातिर’ में जब भी वो जिक्र करते थे कि वो चाय पी रहे हैं, वो वास्तव में विहस्की पी रहे होते थे।

ये चर्चे भी खूब रहे


  • विद्याचरण शुक्ला, चंद्रशेखर के इश्क के बारे में बात होती थी।
  • नारायणदत्त तिवारी के काफी अफेयर्स बताए जाते हैं। सबसे चर्चित मामला उज्जवला तिवारी का रहा जिनके पुत्र रोहित शेखर ने दावा किया कि एनडी उसके पिता हैं। मामला कोर्ट में गया और अंतत: एनडी ने ये सच्चाई स्वीकार की। एनडी तिवारी जब आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे तब एक बार वो कुछ लड़कियों के साथ अंतरंग स्थिति में पकड़े गए। मामला इतना उछला कि तिवारी को इस्तीफा देना पड़ा था।
  • पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पाकिस्तानी पत्रकार अरूसा आलम के बीच अफेयर २००७ में सुर्खियों में रहा। दोनों की मुलाकात २००४ में हुई थी जब अमरिंदर सिंह पाकिस्तान के दौरे पर गए थे।
  • आंध्र के तीन बार मुख्यमंत्री रहे एनटी रामाराव ने ७० वर्ष की उम्र में लक्ष्मी पार्वती से विवाह किया था। दोनों में नजदीकियां उस वक्त आयीं जब लक्ष्मी एनटीआर के जीवन पर किताब लिख रही थीं।
  • कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और टीवी एंकर अमृता राय के बीच अफेयर और शादी भी खूब चर्चित रही है। पत्नी की मौत के 6 महीने बाद ही दिग्विजय सिंह का अमृता राय से अफेयर शुरू हो गया था। पत्नी की मौत के बाद से दिग्विजय और अमृता लिव इन रिलेशन में रहने लगे थे।
  • समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज की टीचर रमा मित्रा से प्रेम संबंधों की एक दौर में खूब चर्चा होती थी।

  • मायावती और कांशीराम के बीच संबंध भी चर्चा में रहे हैं। मायावती कांशीराम का बहुत ख्याल रखती थीं और इसे भाई-बहन का रिश्ता बताती रही हैं। मायावती का इतना प्रभाव था कि वो किसी को कांशीराम के पास फटकने नहीं देती थीं।
  • इंदरजीत गुप्त का एक अलग किस्म का सूफियाना किस्म का इश्क था। 62 साल की उम्र में उन्होंने शादी की।
  • आरके धवन ने भी 74 साल की उम्र में अपनी शादी को सार्वजनिक रूप से स्वीकारा।



आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे--इंदिरा गाँधी

Image result for केवल रतन मलकानी
इमरजेंसी में बंद होने वाले सम्पादक
केवल रतन मलकानी 
Related imageआर.बी.एल.निगम 
आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण आपातकाल के दंश से गुजरना पड़ा। 25-26 जून 1975 की रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना कि भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था।
प्रेस पर सेंसरशिप की तलवार 
आज मीडिया और विपक्ष खूब शोर मचाता है कि मोदी सरकार व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर पाबन्दी लगाने का प्रयास कर रही है, लेकिन कांग्रेस और इनके समर्थकों ने इमरजेंसी में कितने अत्याचार किये थे, उस पर कोई यह पूछने का साहस तक नहीं कर पाता। 
जून 1975 का महीना था। देश में इमरजेंसी लग चुकी थी। जेपी आंदोलन से डरीं इंदिरा गांधी और उनके सिपहसालारों की टोली अखबार मालिकों और संपादकों को सेंसरशिप से हंटर हांक रही थी। ज्यादातर संपादक साष्टांग दंडवत कर चुके थे। कोई आधा झुका था। कोई लेट चुका था। संजय गांधी सरकार में सीधे तौर पर नहीं कुछ होते हुए भी सब कुछ थे। मां देश की प्रधानमंत्री थीं। बेटा उनके नाम पर कुछ भी करने की हैसियत रखता था। प्रेस को कैसे काबू में रखना है और संपादकों से कैसे अपने पक्ष में मुनादी करवानी है, इसकी प्लानिंग संजय गांधी और उनके हुकुम के गुलाम मंत्री दिन रात कर रहे थे। तीन दिन के भीतर सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को सिर्फ इसलिए योजना आयोग में शंट कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने मां की जगह बेटे की बात न मानकर हुक्म उदूली करने की गुस्ताफी कर दी थी।
अखबारों में क्या छपेगा क्या नहीं यह संपादक नहीं, सेंसर अधिकारी तय करते थे । राज्यों के सूचना विभाग, भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) और जिला-प्रशासन के अधिकारियों को सेंसर-अधिकारी बनाकर अखबारों पर निगरानी रखने का काम दिया गया था। ये अधिकारी संपादकों-पत्रकारों के लिए निर्देश जारी करते थे और इन सेंसर अधिकारियों को ये निर्देश दिल्ली के उच्चाधिकारियों, कांग्रेस नेताओं, ख़ासकर इंदिरा गांधी और उनके छोटे बेटे संजय गांधी से प्राप्त होते थे । इन आदेशों पर अमल करना अनिवार्य था अन्यथा गिरफ्तारी से लेकर प्रेस-बंदी तक हो सकती थी।
वी सी शुक्ला के नाम से डरता था मीडिया 
दिल्ली के अखबारों और मीडिया में रैली की कम कवरेज से इंदिरा गांधी गुजराल से गुस्सा हो गईं और पांच दिन के अंदर उन्हें राजदूत बनाकर मॉस्को भेज दिया गया। इंद्र कुमार गुजराल की जगह पर वीसी शुक्ल को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया। मीडिया उनके नाम से कांपता था। शुक्ल कहते थे कि अब पुरानी आजादी फिर से नहीं मिलने वाली। कुछ अखबारों ने इसके विरोध में संपादकीय की जगह खाली छोड़नी शुरू कर दी। इसपर शुक्ला ने संपादकों की बैठक बुलाकर धमकाते हुए चेतावनी दी कि अगर संपादकीय की जगह खाली छोड़ी तो इसे अपराध माना जाएगा और इसके परिणाम भुगतने के लिए संपादकों को तैयार रहना होगा। यही नहीं, सरकार ने किसी भी खबर को बिना सूचित किए छापने पर प्रतिबंध लगा दिया। मीडिया को खबरों को छापने से पहले सरकारी अधिकारी को दिखाना पड़ता था।
गुजराल की जगह संजय के सबसे खास दरबारी और ढिंढोरची विद्या चरण शुक्ला को सूचना प्रसारण मंत्रालय की कमान सौंप दी गई थी। शुक्ला संजय का हुक्म बजाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। इमरजेंसी के नाम पर कायदे-कानून को अपने जेब में रखने वाले वीसी शुक्ला को संजय गांधी ने कुलदीप नैयर को कंट्रोल करने का टास्क दिया था।
इंदिरा गाँधी के कसीदे पढ़ते सम्पादक 
खुशवंत सिंह जैसे मठाधीश पत्रकार इंदिरा गांधी और संजय गांधी की शान में सजदे कर रहे थे, तब कुलदीप नैयर जैसे फाइटर पत्रकार-संपादक ही थे, जो सलाखों की परवाह किए बगैर चौथे खंभे की बुनियाद थामे बैठे थे। एक तरफ अखबारों का गला घोंटकर घुटने पर लाने की कवायद में जुटी संजय गांधी की सेना, दूसरी तरफ कुलदीप नैयर जैसे चंद पत्रकार। इमरजेंसी पर लिखी उनकी किताब - EMERGENCY RETOLD और ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में उस दौर की दास्तान दर्ज हैं।
कुलदीप नैयर ने अपनी किताब में लिखा है- मुझे सबसे ज्यादा ठेस यह सुनकर पहुंची थी कि कुछ संपादक इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा गांधी को बधाई देने पहुंचे थे तो उन्होंने पूछा था कि हमारे ‘नामी’ पत्रकारों को क्या हो गया था क्योंकि एक भी कुत्ता नहीं ‘भौंका’ था।  मैंने कुछ अखबारों और न्यूज एजेंसियों के चक्कर लगाकर 28 जून की सुबह दस बजे प्रेस क्लब में जमा होने को कहा। अगली सुबह मैं वहां पत्रकारों का जमघट देखकर हैरान रह गया था, जिनमें कुछ संपादक भी शामिल थे। बकौल कुलदीप नैयर उस दिन प्रेस क्लब में उनकी तरफ से तैयार सेंसर विरोधी प्रस्ताव पर एन मुखर्जी, आर वाजपेयी, बीएच सिन्हा, राजू नागराजन, एन मणि, वीरेन्द्र कपूर, आनंद वर्धन, बलवीर पुंज, विजय क्रांति, सुभाष किरपेकर, प्रभाष जोशी, वेदप्रताप वैदिक, चांद जोशी समेत 27 पत्रकारों ने दस्तखत किए थे। बाद में इसी प्रस्ताव के बारे में जानने के लिए वीसी शुक्ला ने कुलदीप नैयर को अपने दफ्तर बुलाया था, जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है।
photo-2-1
आपातकाल के दौरान जो पत्रिकाएं छप रही थीं उनमें से अधिकतर पत्रिकाएं आपातकाल के समर्थन में ही अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहीं थीं जैसे मासिक पत्रिका ‘आजकल’ ने अपने जून, 1976 के अंक में ऐसी कुछ तस्वीरें छापकर आपातकाल के फायदों को दिखलाया। जिसे देखकर यह साफ हो जाता है कि बड़ी पत्रिकाओं ने सरकार के अंधभक्त होने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. “इस अंक में ‘आपातकाल से पहले’….और “अब…”एक शीर्षक दिया गया – जिसमें पत्रिका ने एक बस के पास अस्त-व्यस्त भीड़ को,छात्रों के विरोध चित्र को, कुछ जला दी गयीं बसों के चित्रों को छापा और ‘अब…..’ शीर्षक के अंतर्गत तस्करों की धरपकड़ वाली तस्वीर, बस के सामने पंक्ति में खड़े लोग, कॉलेज में पढ़ने जा रहे छात्र-छात्राओं की तस्वीरें,परिवार नियोजन से मुस्कुराती महिलाओं की तस्वीरें आदि छापकर” आपातकाल के फायदों की बात प्रस्तुत की । साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी लोकप्रिय पत्रिका भी सेंसरशिप लागू होते ही सरकार के पक्ष मेंछापने लगे थे जैसे चुनाव की घोषणा के बाद  6 फरवरी, 1977 के अंक में – ‘राजनीतिक शतरंज के पुराने खिलाड़ी और नए मोहरे’ शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कांग्रेस का पलड़ा चुनाव में भारी है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी आपातकाल से पहले ‘सरिता’ पत्रिका में कुछ व्यंग्यपूर्ण एवं धारदार लेख प्रकाशित होते रहते थे लेकिन आपातकाल के दौरान इस पत्रिका की वैचारिकता पर भी सेंसरशिप नाम का ग्रहण लग चुका था, हालांकि आपातकाल के दौरान इस पत्रिका ने सम्पादकीय कॉलम लिखना छोड़ दिया था।
सबसे पहले गिरफ्तार होने वाले सम्पादक Motherland के केवल रतन मलकानी 
हालाँकि इमरजेंसी लगते ही, सबसे पहले दैनिक Motherland और साप्ताहिक Organiser के मुख्य संपादक विश्व विख्यात केवल रतन मलकानी को गिरफ्तार किया गया था। Motherland ऑफिस और मलकानी के निवास चारों तरफ से घेर लिया था। उनके बचकर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए थे। लेकिन Motherland साहसिक पत्रकारों ने इमरजेंसी लगने के अगले ही दिन एक पृष्ठ का सप्लीमेंट निकाल गिरफ्तार किये जा चुके विपक्ष नेताओं और पत्रकारों के नाम प्रकाशित कर दिए, 10 पैसे का वह सप्लीमेंट एक-एक रूपए में खूब बिक ही रहा था कि पुलिस हरकत में आ गयी। पुलिस आता देख बेचने वाला ही बचे अख़बार हवा में उड़ा जान बचाकर भागने में सफल तो हो गया, लेकिन उसके बाद से पहाड़ गंज पुलिस ने सरकारी आदेश मिलते Motherland में डेरा डालकर चौकीदार सुन्दर सिंह और सफाई कर्मचारी जौहरी लाल को छोड़, सारा दफ्तर खाली करवा, दैनिक का प्रकाशन रुकवा दिया। सम्पादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया आदि का पता पूछने पर इन दोनों कर्मचारियों ने पुलिस के लठ्ठ खाए थे। प्रो भाटिया सूचना मिलते ही अंडरग्राउंड हो गए थे। वैसे कई स्थानों पर पुलिस ने बेकसूरों को बचाने के लिए अपनी नौकरी दॉँव लगा रखी थी।  
Indira-Collageइमरजेंसी लगते ही संजय गांधी सबसे पहले कुलदीप नैयर की गिरफ्तारी क्यों चाहते थे?
सरकार और शुक्ला जैसे मंत्रियों को इतनी ताकत उन बड़े पत्रकारों के समर्थन से भी मिली थी, जो इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा गांधी को बधाई देने पहुंचे थे। जिस दिन वीसी शुक्ला ने कुलदीप नैयर को गिरफ्तारी का डर दिखाने के लिए बुलाया था, उसी दिन इंडियन एक्सप्रेस में उनका साप्ताहिक कॉलम छपा था- ‘नाट इनफ्फ मिस्टर भुट्टो’। लेख लिखा तो गया था पाकिस्तान के बारे में लेकिन इशारा भारत के हालात की तरफ था। पाकिस्तान में जुल्फीकार अली भुट्टो और फील्ड मार्शल अयूब खान के कार्यकाल की तुलना करते हुए नैयर ने लिखा था- ‘सबसे बुरा कदम उन्होंने लोगों का मुंह बंद करके उठाया है। प्रेस के मुंह पर ताला लगा है और विपक्ष के बयानों को सामने नहीं आने दिया जा रहा है। मामूली सी आलोचना भी बर्दाश्त नहीं की जा रही है।’
चूंकि इमरजेंसी की वजह से सीधे तौर पर इंदिरा सरकार के खिलाफ नहीं लिखा जा सकता था इसलिए कुलदीप नैयर ने चालाकी से पाक के बहाने भारत का हाल बयान किया था। वीसी शुक्ला ने नैयर को कहा कि ‘सरकार में बैठे लोग बेवकूफ नहीं है। कोई भी समझ सकता है कि इमरजेंसी और इंदिरा गांधी की बात की जा रही है।
कुलदीप नैयर ने 10 जुलाई 1975 को लिखा- प्रजातंत्र का उपदेश देने वालों के हाथ खून से रंगे पाए गए।
कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी और इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोल रखा था कि सरकार के सिपहसालार बौखलाए हुए थे। सेंसर को चमका देने के लिए कुलदीप नैयर ने वीसी शुक्ला की धमकी के बाद दो लेख और लिखे। इस बार दोनों लेखों में अमेरिका के बहाने इशारों में भारत की बात की गई। कुलदीप नैयर ने 10 जुलाई 1975 को लिखा- प्रजातंत्र का उपदेश देने वालों के हाथ खून से रंगे पाए गए। राष्ट्रपति निकसन किसी भी दूसरे राष्ट्रपति की तुलना में ज्यादा मतों से जीते थे फिर प्रेस और जनमानस के आगे उन्हें झुकना पड़ा और सत्ता से बाहर होना पड़ा। इस लेख के छपते ही सेंसर अधिकारियों ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को निर्देश दिया कि कुलदीप नैयर या उनके किसी छद्म नाम से कोई भी लेख सेंसर को दिखाए बिना अखबार में नहीं छपना चाहिए। इसी के बाद कुलदीप नैयर की गिरफ्तारी हो गई थी।
गिरफ्तारी के पहले कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी के खिलाफ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कड़ी चिट्ठी लिखी थी। कुलदीप नैयर लिखा था-
‘मैडम, किसी अखबार वाले के लिए यह तय करना मुश्किल होता है कि उसे कब मुंह खोलना चाहिए। वह जानता है कि ऐसा करके वह कहीं न कहीं किसी न किसी को नाराज करने का खतरा उठा रहा है। एक आम आदमी की तुलना में सरकार में सच्चाई को छिपाने और इसके प्रकट होने पर भयभीत होने की प्रवृति कहीं ज्यादा होती है। प्रशासन में ऊंचे पदों पर बैठे व्यक्ति यह मानकर चलते हैं कि वे और सिर्फ वे यही बात जानते हैं कि राष्ट्र को कब, कैसे और कितना बताना चाहिए। इसलिए अगर कोई ऐसी खबर छपती है, जिसे वो नहीं बताना चाहते तो उन्हें बहुत गुस्सा आता है। एक स्वतंत्र समाज में इमरजेंसी के बाद आप कई बार कह चुकी हैं कि आप इस धारणा में निष्ठा रखती हैं। प्रेस को जनता को सूचित करने के अपने कर्तव्य का पालन करना पड़ता है। अगर प्रेस सिर्फ सरकारी वक्तव्यों और सूचनाओं का प्रकाशन करता रहेगा तो चूकों, कमियों और गलतियों पर कौन उंगली उठाएगा?’
कुछ अखबार विपक्षी मोर्चे का अभिन्न अंग बन गए थे--शारदा प्रसाद, इंदिरा के सूचना सलाहकार 
कुलदीप नैयर के इस पत्र का जवाब इंदिरा गांधी की तरफ से उनके सूचना सलाहकार शारदा प्रसाद ने दिया। शारदा प्रसाद ने इमरजेंसी के दौरान प्रेस सेंसर को सही ठहराते हुए लिखा- ‘अगर पिछले कुछ हफ्तों से सेंसरशिप लागू की गई है तो इसका कारण कोई व्यक्तिगत या सरकारी अति संवेदनशीलता नहीं है। इसका कारण यह है कि कुछ अखबार विपक्षी मोर्चे का अभिन्न अंग बन गए थे। इन पार्टियों को राष्ट्रीय जीवन को अस्त व्यस्त करने की उनकी योजना को कार्यान्वित करने से रोकना जरुरी हो गया था। प्रेस पर लगाए प्रतिबंधों के बाद पिछले कुछ दिनों में स्थिति में सचमुच सुधार हुआ है। प्रेस की आजादी व्यक्तिगत आजादी का ही हिस्सा है, जिसे किसी भी देश को राष्ट्रीय आपातकाल के समय में अस्थाई रुप से सीमित करना पड़ता है।’
बाद के सालों में इंदिरा के करीबी रहे आरके धवन ने सफाई देते हुए कुलदीप नैयर को कहा था कि संजय गांधी चाहते थे कि सभी बड़े पत्रकारों का मुंह बंद कर दिया जाए। धवन ने नैयर साहब को ये भी बताया था कि एक गोपनीय बैठक में सबसे पहले गिरफ्तारी के लिए उनका ही नाम लिया गया था क्योंकि उन्हें बड़ा पत्रकार माना जाता था। नैयर को गिरफ्तार करने वाले असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर बरार तक ने अपनी बेचारगी जाहिर करते हुए कहा था कि यह गिरफ्तारी मेरी आत्मा पर बोझ बनी रहेगी क्योंकि मैं एक निर्दोष आदमी को गिरफ्तार कर रहा हूं।

आपातकाल लगाने  की वजह

इसकी जड़ में 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। और श्रीमती गांधी के चिर प्रतिद्वंदी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था।
राजनारायण सिंह की दलील थी कि इन्दिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा था कि इन्दिरा गांधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।
इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गईं। इन्दिरा गांधी ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई।
उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी। इस दौरान जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।

सरकार के पास थे असीमित अधिकार


आपातकाल के दौरान सत्ताधारी कांग्रेस आम आदमी की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। इसका आधार वो प्रावधान था जो धारा-352 के तहत सरकार को असीमित अधिकार देती थी। 
-इंदिरा जब तक चाहें सत्ता में रह सकती थीं।
-लोकसभा-विधानसभा के लिए चुनाव की जरूरत नहीं थी।
-मीडिया और अखबार आजाद नहीं थे
-सरकार कैसा भी कानून पास करा सकती थी।

मीसा-डीआईआर का कहर
मीसा और डीआईआर के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के नायक जय प्रकाश नारायण की किडनी कैद के दौरान खराब हो गई थी । उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए। एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं। बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला। 
एक तरफ नेताओं की नई पौध राजनीति सीख रही थी, दूसरी तरफ देश को इंदिरा के बेटे संजय गांधी अपने दोस्त बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता की तिकड़ी के जरिए चला रहे थे। संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी, जिसने भी इनकार किया उसे जेलों में डाल दिया गया।।

संजय गांधी ने चलाया था पांच सूत्रीय कार्यक्रम

संजय गांधी (फाइल फोटो)एक तरफ देशभर में सरकार के खिलाफ बोलने वालों पर जुल्म हो रहा था तो दूसरी तरफ संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पांच सूत्रीय एजेंडे परिवार नियोजन, दहेज प्रथा का खात्मा, वयस्क शिक्षा, पेड़ लगाना, जाति प्रथा उन्मूलन पर काम करना शुरू कर दिया था।
बताया जाता है कि सुंदरीकरण के नाम पर संजय गांधी ने एक ही दिन में दिल्ली के तुर्कमान गेट की झुग्गियों को साफ करवा डाला लेकिन पांच सूत्रीय कार्यक्रम में ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। लोगों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई। कहा तो ये भी जाता है कि पुलिस बल गांव के गांव घेर लेते थे और पुरुषों को पकड़कर उनकी नसबंदी करा दी जाती थी।

पहले ही बन चुकी थी आपातकाल की योजना

इमरजेंसी के बहुत बाद एक साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा था कि उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है। लेकिन, इस शॉक ट्रीटमेंट की योजना 25 जून की रैली से छह महीने पहले ही बन चुकी थी। 8 जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के मुताबिक ये योजना तत्कालीन कानून मंत्री एच आर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बांबे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।
आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे--इंदिरा गाँधी 
आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी जिस विरोध को शांत करना चाहती थीं, उसी ने 19 महीने में देश का बेड़ागर्क कर दिया। संजय गांधी और उनकी तिकड़ी से लेकर सुरक्षा बल और नौकरशाही सभी निरंकुश हो चुके थे। एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे, लेकिन 19 महीने में उन्हें गलती और लोगों के गुस्से का एहसास हो गया। 18 जनवरी 1977 को उन्होंने अचानक ही मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों ही हार गए। 21 मार्च को आपातकाल खत्म हो गया लेकिन अपने पीछे लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक छोड़ गया।
kisa
बॉलीवुड भी नहीं रहा अछूता
आपातकाल के खौफ से बॉलीवुड भी अछूता नहीं रहा इस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म निर्माताओं, गीतकारों और अभिनेताओं से इंदिरा और केंद्र सरकार की प्रशंसा के गीत गाने और इसी तरह की फिल्म बनाने के लिए दबाव डाला गया। मशहूर गायक किशोर कुमार ने जब मना कर दिया तो वीसी शुक्ला ने इसे व्यक्तिगत खुन्नस मानकर पहले तो रेडियो से उनके गानों का प्रसारण बंद करा दिया और फिर उनके घर पर इनकम टैक्स के छापे डलवाए। उन्हें रोज धमकियां दी जाती थी जिस से अंत में परेशान होकर उन्होंने सरकार के आगे हार मान ली। इससे वीसी शुक्ला की हिम्मत और बढ़ गई।
इस खौफ के आतंक में अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का और मशहूर गीतकार गुलजार की फिल्म आंधी पर भी पाबंदी लगा दी गई। किस्सा कुर्सी का के तो सारे प्रिंट जला दिए गए और जगह–जगह प्रिंट को ढूंढने के लिए छापे डाले गए। अमृत नाहटा को जमकर प्रताड़ित किया गया। मनोज कुमार की फिल्म 'रोटी कपडा और मक़ान' के महंगाई पर चर्चित गीत 'हाय तू कहाँ से आयी....' के प्रसारण के अलावा फिल्म में से भी निकलवा दिया था। इस तरह के कारनामों की वजह से कई फिल्म निर्माताओं ने अपने नए प्रोजेक्ट टाल दिए। कुछ ने अपनी फिल्मों का निर्माण धीमा कर दिया। फिल्म धर्मवीर को रिलीज होने में पांच महीने लग गए।
वीसी शुक्ला के बंगले पर फिल्मी सितारों को विशेष कार्यक्रम पेश करने के लिए मजबूर किया जाने लगा और इन कार्यक्रमों में जो मंत्री महोदय के बंगले पर होते उनमें संजय गांधी खासतौर पर मौजूद रहते थे ।