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हिंदू-मुस्लिम का डीएनए एक है तो …..

डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत

भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करेंगे, समान नागरिक संहिता लाएंगे, जनसंख्या नियंत्रण के लिए कठोर कानून लाया जाएगा, मुस्लिम तुष्टिकरण की चल रही राजनीतिक परंपरा को समाप्त किया जाएगा , ‘यदि भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम कहना होगा’ – इन जैसे अन्य कई नारे या जनता को दिए गए वचन लगता है आरएसएस और भाजपा के लिए सत्ता प्राप्ति का एकमात्र साधन थे। देश के लोगों ने भाजपा को रोजी रोटी की दैनिक चिंताओं से ऊपर उठकर इसलिए अपना वोट दिया था कि वह सत्ता में आकर उन समस्याओं से देश को स्थाई समाधान प्रदान करेंगे जो इस समय देश के लिए जी का जंजाल बन चुकी हैं।

परंतु यथार्थ में ऐसा हुआ नहीं, अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू मुस्लिम का डीएनए एक होने की बात कहकर नए प्रश्नों को जन्म दे दिया है। 

अगर हिन्दू मुसलमानों का डीएनए एक है, डॉ भगवत फिर अब से पहले किसी ने इस मुद्दे को क्यों नहीं उठाया? यह तो वही बात हो गयी, कि महात्मा गाँधी "ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, रघुपति राघव राजा राम" कहकर हिन्दुओं को गुमराह करते रहे थे, वही काम अब संघ भी कर रहा है, आखिर कब तक हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दुओं को छला जाता रहेगा? कब तक हिन्दुओं की अस्मिता से खिलवाड़ होता  रहेगा? अगर दोनों का डीएनए एक है, फिर किस आधार पर अयोध्या में राममंदिर का विरोध किया जा रहा था? क्यों जगह-जगह विरोध की आड़ में हिन्दू मंदिरों को तोडा गया? क्या संघ भी अब कांग्रेस और अन्य पार्टियों की भांति किसी भी विवाद के लिए हिन्दुओं को ही दोषी करार देगी? कुसी की खातिर कितना नीचे गिरा जा सकता है।       

 

आरएसएस और भाजपा के लोग ही थे जो जनता को बताया करते थे कि मुसलमान कभी इस देश का नहीं हो सकता, क्योंकि उसका चिंतन और चरित्र दोनों ही इस देश के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए अनुमति नहीं देते। उसकी आस्था काबा में है इसलिए भारत के प्रति वह कभी भी आस्थावान या निष्ठावान नहीं हो सकता। तब ये लोग मजहब के आधार पर इस्लाम को यह कहकर कोसा करते थे कि इसके आक्रमणकारियों ने भारत की संस्कृति और धर्म का सत्यानाश कर दिया। भारत के लोगों को इनके द्वारा तब यह भी समझाया जाता था कि दारुल हरब और दारुल इस्लाम मुसलमानों के डीएनए की मौलिक सोच है। कहने का अभिप्राय है कि उस समय भाजपा और आरएसएस दोनों ही हिंदू समाज को यह बता रहे थे कि हिंदू और मुसलमान का डीएनए अलग है, पर आज अचानक कुछ दूसरी बात हो गई लगती है । मुसलमान अपने मूलतत्ववाद अर्थात मौलिक चिंतन या मौलिक डीएनए के आधार पर संसार में उपद्रव, उत्पात और उग्रवाद की खेती करते हैं। इसलिए संघ का यह स्पष्ट संदेश और आवाहन रहता था कि भारत को इनसे बचाने के लिए उसे यथाशीघ्र हिंदू राष्ट्र घोषित करना पड़ेगा।
अब उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव 2022 के दृष्टिगत अचानक आरएसएस और भाजपा के नेताओं के स्वरों में बदलाव दिखाई दे रहा है। इसी बदलाव के अंतर्गत आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदू और मुस्लिम का डीएनए एक है। डीएनए का अभिप्राय यदि मानवतावादी संस्कार से है तो यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि हिंदू मुस्लिम का डीएनए एक ही है। दारुल हरब और दारुल इस्लाम के अपने मूलतत्ववाद के वशीभूत होकर इस्लाम को मानने वाले लोग आज भी संसार में उत्पात और उग्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं । भारत भी आजादी के बाद से निरंतर मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होता रहा है, जिसमें केवल और केवल इस्लाम की मौलिक सोच में समाविष्ट वितण्डावाद ही एकमात्र कारण है। इस्लाम के इस सच को मोहन भागवत भली प्रकार जानते हैं। उसके बाद भी वह बिल्ली को देखकर कबूतर की तरह आंख बंद कर रहे हैं तो यह उचित नहीं कहा जा सकता। जो लोग सोए हुए हिंदू समाज की आंखें खोलने का काम कर रहे थे, वही अब स्वयं सोने का काम कर रहे हैं ।जब मुंसिफ ही कातिल हो जाए तो क्या कहा जा सकता है ?

माना जा सकता है कि 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत मोहन भागवत का यह बयान कूटनीतिक आधार पर दिया गया बयान है। इस पर हमारा मानना है कि संघ चाहे कितना ही प्रयास कर ले लेकिन कोई भी मुसलमान उसके साथ आकर खड़ा नहीं हो सकता । क्योंकि मुसलमान का किसी भी राष्ट्र इस राष्ट्र की संस्कृति के प्रति कोई लगाव नहीं होता। अंबेडकर जी के शब्दों में उसका भ्रातृत्व भी केवल अपने मुस्लिम भाइयों तक सीमित होता है। गैर मुस्लिमों को बेवफाई नहीं मानता। वह कभी भी हिंदू राष्ट्र या हिंदू विचारधारा या भारतीय राष्ट्र की हिंदूवादी मान्यताओं के प्रति आस्थावान नहीं हो सकता। इसलिए कूटनीतिक जाल उन पर फेंकना किसी भी दृष्टिकोण से वाणी विलास के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। यदि कूटनीति की बात की जाए तो मुसलमान इस समय अपनी कूटनीति में सफल हो रहा है और वह हिन्दू समाज के अंग दलित वर्ग को बहुत तेजी के साथ अपने साथ ले जा रहा है। इस कूटनीति को समझते हुए मोहन भागवत जैसे नेताओं को प्रयास करना चाहिए कि अपने दलित भाइयों को अपने साथ लगाएं और हिंदू एकता के आधार पर सत्ता संचालन का कार्य सुनिश्चित करें। यह ध्यान रहे कि मुसलमानों को दलितों के साथ जाने देने में उनका वर्तमान बयान भी सहायक सिद्ध होगा।

मोहन भागवत जी को यह बात समझनी चाहिए कि इस देश की आम सहमति उनसे किसी प्रकार की ऐसी कूटनीति की अपेक्षा नहीं करता जिसका बुरा प्रभाव भारतीय जनमानस या राष्ट्रवाद पर पड़े । इसके विपरीत भारतीय आम सहमति भारत के इन महान नेताओं से यही अपेक्षा करती है कि वह समान नागरिक संहिता लागू करें, पर्सनल ला की वकालत करने वाले लोगों को कड़ा संदेश दें, इसके साथ ही जनसंख्या नियंत्रण को लाकर इस देश की सत्ता पर अपनी हुकूमत कायम कर ‘हिंदू विनाश’ के सपने संजोने वाले लोगों की मानसिकता को कुचलने का कार्य करें । आरएसएस राष्ट्र निर्माण के लिए है , वह दोगली बातों के आधार पर देश विरोधी शक्तियों को प्रोत्साहित करने वाली सोच से अलग मानी जाती है। निश्चित रूप से उसे अपनी सोच का परिचय देना चाहिए। आरएसएस प्रमुख को कूटनीति अवश्य अपनानी चाहिए लेकिन इस बात का ध्यान रखते हुए कि उससे हिंदू राष्ट्र निर्माण की दिशा में कार्य हो ना कि हिंदू विनाश के लिए आधारशिला रखी जाए। कूटनीति के आधार पर सबको साथ लेकर चलने की बातें कांग्रेस ने करनी आरंभ की थीं. उसका परिणाम क्या निकला ? – तुष्टीकरण । इसी तुष्टीकरण को यदि मोहन भागवत जी अपनी कूटनीति का आधार बना रहे हैं तो देश इसे स्वीकार नहीं करेगा। कूटनीति इसमें नहीं है कि आप दोनों का डीएनए एक बता दें, बल्कि कूटनीति इसमें है कि कुरान की उन 24 आयतों को बड़ी सावधानी के साथ निकालने के लिए मुस्लिमों को तैयार कर लिया जाए जो देश में ही नहीं बल्कि संसार में उग्रवाद और आतंकवाद को बढ़ावा देती हैं। क्या मोहन भागवत जी ऐसा कर पाएंगे?

जिन लोगों ने दीर्घकाल तक भारत में खून खराबा आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा के माध्यम से लाखों करोड़ों हिंदुओं का कत्ल किया उनका डीएनए कत्लोगारत का डीएनए तो हो सकता है, इंसानियत का डीएनए कभी नहीं हो सकता। जो लोग आज भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से हिंदुओं को चुन चुन कर भगा रहे हैं, उनकी बहू बेटियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं, कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को जिन्होंने भगाने का काम किया है और जो आज भी धारा 370 और 35a को स्थापित करने की मांग कर रहे हैं, उन लोगों का डीएनए भारत के हिंदू समाज के मानवतावादी और उधार डीएनए के समान नहीं हो सकता।
वास्तव में डीएनए एक सोच है, एक कार्यशैली है, एक विचारधारा है, एक संस्कार है। यह सब मिलकर व्यक्ति की जीवन शैली व कार्य व्यवहार का निर्धारण करते हैं ।भारत में इस्लाम के मानने वाले और वैदिक हिंदू धर्म के मानने वाले एक ही मिट्टी से बने होकर भी अपने इन मानवीय गुणों के कारण अपनी विशिष्ट जीवन शैली, कार्य व्यवहार और कार्य योजना को अलग – अलग रखते हुए देखे जाते हैं। जहां हिंदू अपनी उदारता विनम्रता और मानवतावादी सोच के कारण अपने मानवीय संस्कारों को प्रबलता प्रदान करता है ,वहीं कुरान में आस्था रखने वाले मुसलमान कुरान की 24 आयतों से ऊर्जा लेते हुए देखे जाते हैं, जो गैर मुस्लिमों के खिलाफ मुसलमानों को उकसाती हैं और हिंसा करने के लिए प्रेरित करती हैं।
मोहन भागवत जी जैसे बड़े कद के नेता को यह बात पता होगी कि डीएनए व्यक्ति की अंतरंग जगत की गहराइयों में रचने बसने वाली चीज है और अंतरंग जगत में रचने बसने वाली इसी चीज से लोग प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त करके अपने बाहरी जगत के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। क्या मोहन भागवत जी हिंदू और मुस्लिम दोनों के डीएनए के एक होने की बात कहकर दोनों समुदाय के लोगों को एक मंच पर एक साथ बैठा कर भारत माता की जय और वंदे मातरम का उद्घोष करा सकते हैं ? यदि नहीं तो उन्हें ऐसी भ्रामक बातों को कहने से पहले 10 बार सोचना चाहिए ।राजनीति और सत्ता ही सब कुछ नहीं है। संघ वैसे भी सत्ता के लिए पैदा नहीं हुआ है। यह एक आंदोलन है ,जो बड़ी से बड़ी ताकत के विरुद्ध आवाज बुलंद करने का हौसला रखता रहा है । इसके इस चरित्र को बदलने का प्रयास यदि कोई मोहन भागवत जैसा नेता करता है तो यह सच में दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने यह भी कहा है कि यह सिद्ध हो चुका है कि हम 40 हजार साल से एक ही पूर्वज के वंशज हैं। उनके ऐसा कहने से कुछ ऐसा आभास होता है कि वह भारत जैसे सत्य सनातन राष्ट्र और सत्य सनातन वैदिक धर्म की अवस्था 40000 वर्ष ही मानते हैं । जबकि यह राष्ट्र करोड़ों वर्ष पुराना है। सृष्टि के प्रारंभ में भी आर्यावर्त था और आज भी है। इस सच को 40000 वर्ष के कालखंड में मोहन भागवत जी ने कैसे समेट दिया ? – कुछ समझ नहीं आया। यह तब और भी अधिक विचारणीय हो जाता है जब संघ प्रतिवर्ष हिंदू नव वर्ष के अवसर पर वैदिक सृष्टि संवत का बार-बार उल्लेख करता है।

RSS विजयादशमी उत्सव : अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से देश में बढ़ेगा सद्भाव -- मोहन भागवत

Mohan Bhagwatराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी समारोह में कहा कि हमारा समाज भारत की अवधारणा से सहज भाव से उपजे जब स्‍व की भावना के सत्‍य को भूल गया और स्‍वार्थ प्रबल हो गए तो हम अत्‍याचार के शिकार हो गए. समाज में अपनी कमियां थी. शासकों ने तो किसी को भी नहीं छोड़ा. बाबर ने ना हिंदू को बख्शा, ना मुस्लिम को बख्‍शा. भारत को इतना शक्तिशाली बनने की जरूरत है कि कोई भी देश हमसे लड़ने की हिम्मत न करे। हालांकि, उन्होंने कहा कि युद्ध की स्थिति में दोनों पक्षों को नुक्सान उठाना पड़ता है। अपने वार्षिक विजयादशमी भाषण में संघ प्रमुख ने राम मन्दिर, राफेल मुद्दा और सबरीमाला मंदिर विवाद पर अपनी राय रखी।
देश में हालिया दौर में हुए आंदोलनों का जिक्र करते हुए ने कहा कि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' कहने वालों का संविधान में यकीन नहीं है. देश में छोटी-छोटी बातों पर आंदोलन होने लगे हैं. बंदूक की नली के आधार पर सत्ता प्राप्त करेंगे, भारत तेरे टुकड़े होंगे जो नारे लगाते हैं, ऐसे भी चेहरे आंदोलन में रहते हैं. हमारे देश में जो हो रहा है, असंतोष का राजनीतिक लाभ लिया जा रहा है. गलत बातों का सोशल मीडिया पर प्रचार हो रहा है.
राफेल सौदे पर जारी विवाद का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि विदेशी देशों के साथ इस तरह के करार होते रहने चाहिए लेकिन रक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्म-निर्भर बनने के बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा, 'हमें अपनी सुरक्षा के लिए जिन चीजों की जरूरत है, हमें उनका उत्पादन करना चाहिए।'
संघ प्रमुख ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार एससी और एसटी सब प्लान के लिए आवंटित धन खर्च नहीं कर रही है। उन्होंने कहा, 'यदि मदद समय पर नहीं पहुंचती तो इसे मदद के रूप में नहीं देखा जा सकता। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की योजनाओं को लागू नहीं किया गया। इन योजनाओं के लिए धन क्यों नहीं खर्च हुआ?'
सबरीमाला मंदिर विवाद पर संघ प्रमुख ने कहा कि महिला और पुरुष समान माने गए हैं। उन्होंने कहा, 'इस मसले पर हमें आपसी सहमति बनानी चाहिए थी। भक्तों से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था।'
सबरीमाला
सबरीमाला का निर्णय देखिए, क्या हुआ, बात करनी थी मन बनाना था. भावनाएं नहीं देखी गईं, पंथ समुदाय अपना-अपना होता है अमुख बात धर्म के लिए है कि नहीं, समझना चाहिए था. ये परंपराएं हैं भइय्या, कुछ कारण होते हैं. वहां तो आंदोलन खड़ा हो गया, वहां तो असंतोष पैदा हो गया. प्रबोधन करना पड़ेगा, मन परिवर्तन करना पड़ेगा. हम समानता लाना चाहते हैं, लेकिन समाज में अस्थिरता पैदा हो जाती है. इसके साथ ही कहा कि राम मंदिर पर जल्‍द निर्णय आना चाहिए. राम मंदिर पर सरकार कानून बनाए.

उन्होंने कहा, 'शबरीमल्ला देवस्थान के सम्बंध में सैकड़ों वर्षों की परम्परा, जिसकी समाज में स्वीकार्यता है, उसके स्वरूप व कारणों के मूल का विचार नहीं किया गया। धार्मिक परम्पराओं के प्रमुखों का पक्ष, करोड़ों भक्तों की श्रद्धा, महिलाओं का बड़ा वर्ग इन नियमों को मानता है, उनकी बात नहीं सुनी गई।' 
संघ प्रमुख ने कहा, 'यह वर्ष श्रीगुरु नानक देव जी के प्रकाश का 550वां वर्ष है। उन्होंने अपने जीवन की ज्योति जलाकर समाज को अध्यात्म के युगानुकूल आचरण से आत्मोद्धार का नया मार्ग दिखाया, समाज को एकात्मता व नवचैतन्य का संजीवन दिया।' 
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर भागवत ने कहा,  'श्रीराम मंदिर का बनना स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है। मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा। राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के संदर्भ में अपने करोड़ों देशवासियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि पर राष्ट्र के प्राणस्वरूप धर्ममर्यादा के विग्रहरूप श्रीरामचन्द्र का भव्य राममंदिर बनाने के प्रयास में संघ सहयोगी है।
शहरी नक्‍सल
शहरी नक्‍सलवाद पर टिप्‍पणी करते हुए कहा कि नक्‍सलवाद हमेशा शहरी ही रहा है. इसका कंटेंट पाक, अमेरिका और क्या इटली से आता है? अर्बन नक्सल की कार्यपद्धित है, अर्बन नक्सल हमेशा अर्बन ही रहा है. छात्रावासों में जाओ, असत्य प्रचार करके भड़काओ, छोटे-छोटे आंदोलन करो. नेतृत्‍व को पहचान कर श्रंखला चलाओ. प्रचलित नेतृत्‍व को ढहा दो. मालिकों के बंदों को स्थापित करो. सभी जगह का इतिहास हमारे सामने है. बंदूक की नली से सत्ता तो आ गई, अर्बन माओवादी बड़े-बड़े शहरों में बुद्धिजीवी बन कर बैठे रहते हैं, ऐसे हजारों विद्वान खड़े हैं. द्वेष पैदा करना ही उनका उद्देश्‍य है, जहां जाएंगे भारत की निंदा करेंगे. आपस में सांठगांठ करके युद्ध चलाया जा रहा है, हम सभी के बीच, मानवशास्त्रीय युद्ध है.
इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि ऐसी घटनाएं ही ना घट पाएं ऐसी चौकसी समाज को भी रखनी पड़ेगी, शासन प्रशासन के साथ इन कारणों को मिटाने का तरीका यही है कि जनहित की योजनाएं अंत तक जाएं. फूट को स्थान नहीं मिलना चाहिए. अभी तक ब्रिटिशों का राज था, लेकिन हमें लोकतंत्र का पालन करना पड़ेगा. हमारा व्यवहार ही हमें बचाएगा, नियम कानून नहीं.
मोहन भागवत ने कहा कि उकसाने वाली शक्तियों से भी बचना होगा. संस्कार लाना चाहिए.  परिवार में संस्कार बनना चाहिए. क्या ये भारत वर्ष है, कड़ा कानून चाहिए बात ठीक है.... सरकार धीरे-धीरे चलती है. प्रशासन आराम से चलता है. जैसे लेट गाड़ी होती है ना, फिर करते-करते दो घंटे लेट हो जाती है. साढ़े 4 साल तो हो गए. घर को पक्का करना पड़ेगा, संस्कार लाना पड़ेगा.
इंटरनेट से तो सब आता है, लेकिन लेने वाले की मानसिकता क्या है इसकी तो कोई व्यवस्था ही नहीं है. जो आता है, खोलता है, मिल जाता है, कानून बनेगा, उसमें देर लगेगी, हम ऐसा वातावरण बनाएं कि देखने की इच्छा ही ना हो. क्या हमें घर की चिंता भी सरकार पर डाल देना चाहिए? उपाय, सद्भावना औऱ प्रेम के सिवाय कुछ भी नहीं है.
एकमात्र भारतीय सभ्यता ही विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के बावजूद अभी तक बची हुई है और वह हिन्दू बहुलता वाला एकमात्र देश है. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय के जीवन पर आधारित एक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम के दौरान भागवत ने उक्त बात कही.
सनातन धर्म शाश्वत है और कुछ अगर शाश्वत है तो वह हिन्दुत्व है. मालवीय जैसे व्यक्तित्वों की वजह से ही वह विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के बावजूद बची रही है.
भारत एकमात्र ऐसी सभ्यता है जो विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के बावजूद बचा रहा है जबकि अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में सब कुछ नष्ट हो गया. देश अभी भी हिन्दू बहुल है. उन्होंने इस पर जोर दिया कि मालवीय ने हमेशा आरएसएस के साथ संबंध बनाए रखे और वह उनके सिद्धांतों के विरूद्ध नहीं थे. उन्होंने कहा कि देश को अब भी मालवीय जैसे व्यक्तित्व की जरूरत है.
इससे पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि विपक्षी पार्टियां भी अयोध्या में राम मंदिर का खुलकर विरोध नहीं कर सकती क्योंकि वह देश की बहुसंख्यक जनसंख्या के इष्टदेव हैं. भागवत ने हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ में संघ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राममंदिर निर्माण के प्रति संघ और भाजपा की प्रतिबद्धता जाहिर की थी. साथ ही यह भी कहा कि कुछ कार्यों को करने में समय लगता है .
उन्होंने कहा, ' कुछ कार्य करने में देरी हो जाती है और कुछ कार्य तेजी से होते हैं वहीं कुछ कार्य हो ही नहीं पाते क्योंकि सरकार में अनुशासन में ही रहकर कार्य करना पडता है . सरकार की अपनी सीमायें होती हैं .' संघ प्रमुख ने कहा कि साधु और संत ऐसी सीमाओं से परे हैं और उन्हें धर्म, देश और समाज के उत्थान के लिये कार्य करना चाहिए .
पाकिस्‍तान
परोक्ष रूप से पाकिस्‍तान के संदर्भ में मोहन भागवत ने कहा कि सुरक्षा को लेकर हम सजग हैं. सरकार किसी की भी हो हम किसी से भी शत्रुता नहीं करते. लेकिन बचने के लिए उपाय तो करना पड़ेगा. वहां परिवर्तन के बाद भी कुछ बदलता नजर नहीं आ रहा है. अपनी सेना को संपन्न बनाना होगा ताकि हमारी सेना का मनोबल कम न हो, संतुलन को रखकर काम करना होगा. इसी कारण संपूर्ण विश्व में हाल में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है. लेकिन हम विश्वास पैदा करने के लिए हम गोली का जवाब गोली से देने की हिम्मत रखते हैं.
इसके साथ ही कहा कि सीमा पर सुरक्षा कर रहे परिवारों की रक्षा का दायित्व हमारा है, उनकी चिंता कौन करेगा, शासन ने कदम तो बढ़ाए लेकिन गति बढ़ाने की जरूरत है. ये विश्‍वास पैदा होना चाहिए जवानों में कि हम यहां रक्षा कर रहे हैं लेकिन हमारे परिवार की रक्षा शासन कर लेगा.
मोहन भागवत ने कहा कि शासन के साथ समाज का भी कुछ दायित्व है. हमें सोचना होगा कि क्‍या हमने अपना देश सरकार को सौंप दिया है? ऐसा इसलिए क्‍योंकि पहला दायित्व तो हमारा है, सरकार को तो हम ही चुन कर भेजते हैं. सीमा केवल भू-सीमा नहीं होती, सागरी सीमा भी है, आजकल अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इसका महत्व भी बढ़ गया है. सभी छोटे-छोटे द्वीपों की रक्षा होनी चाहिए क्‍योंकि भारत के सामर्थ्य को कम करने के लिए लोगों ने गले के चारों ओर फांस बनाने की कोशिश तो कर ही ली है.
कैलाश सत्यार्थी मुख्य अतिथि
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित और सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वार्षिक ‘‘विजयादशमी’’ समारोह में अतिथि हैं. कार्यक्रम का आयोजन नागपुर के रेशमीबाग मैदान में आयोजित किया जा रहा है. उल्‍लेखनीय है कि मोहन भागवत ने पिछले वर्ष रोहिंग्या संकट, गोरक्षा, जम्मू-कश्मीर और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए थे.