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मौलाना को सिखाया ‘धर्मनिरपेक्षता’ का पाठ, एक तरफा तहजीब कब तक निभाए हिन्दू?

Zee न्यूज़ मौलाना धर्मनिरपेक्षता
जी न्यूज के एंकर ने मौलाना को सिखाया सेक्युलरिज्म
सोमवार (मई 18, 2020) को जी न्यूज के प्रोग्राम ‘ताल ठोक के’ के एंकर अमन चोपड़ा ने एक मौलाना को ‘धर्मनिरपेक्षता’ का पाठ पढ़ाया। दरअसल, प्रोग्राम में चर्चा हाल ही में कर्नाटक के दावणगेरे जिले में हुई सांप्रदायिक घटना पर आधारित थी, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू दुकानों से कपड़े खरीदने के लिए कट्टरपंथी निशाना बनाते हैं, धमकी देते हैं और गाली-गलौज करते हैं।
चोपड़ा ने प्रोग्राम की शुरुआत करते हुए मौलाना नदीमुद्दीन से कहा कि वो इस्लामिक कट्टरपंथियों ने जो हरकत की है उसकी निंदा करें। जी न्यूज एंकर अमन चोपड़ा को वीडियो में कहते हुए सुना जा सकता है, “गंगा-जमुनी तहजीब की जिम्मेदारी सिर्फ एक समुदाय की थोड़ी न है, ताली दोनों हाथों से बजेगी।”
उन्होंने आगे कहा, “हमने आम तौर पर देखा, जब हम मिलते हैं तो सलाम, अस्सलाम वालेकुम, सब कुछ कहते हैं, लेकिन क्या आप लोग राम-राम कहते हैं? आप लोग नहीं कहते हैं। हमने मंदिरों में इफ्तारी भी देखी है और नमाज भी देखी है। लेकिन मस्जिदों में हवन-पूजा होता है क्या? लंगर होता है क्या? नहीं होता। एक हाथ से ताली नहीं बजेगी न।”
इसके बाद एंकर अमन चोपड़ा मौलाना से बार-बार राम-राम और जय श्री राम बोलने के लिए कहते हैं, लेकिन जब वो नहीं बोलते हैं तो फिर एंकर बार-बार इस्लामिक अभिवादन करके उन्हें समझाते हैं कि वो सांप्रदायिक नहीं है, वो उनका अभिवादन कर सकते हैं, तो फिर वो राम-राम बोलकर क्यों नहीं कर सकते।
बार-बार बोलने के बाद भी जब मौलाना नहीं बोलता है, तो फिर अमन चोपड़ा कहते हैं, “दो हाथों से ताली बजाइए न, मिलकर भी रहना है, गंगा-जमुनी तहजीब भी दिखानी है, आप नहीं बोलेंगे। ताली दो हाथों से बजती है, एक हाथ से नहीं बजती, गंगा जमुनी तहजीब पर भाषण देना बहुत आसान होता है। एक सेकेंड में जुबान बंद हो जाती है आपलोगों की।”
गौरतलब है कि पिछले दिनों कई सारे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिसमें हिन्दू दुकान से सामान खरीदने पर मुस्लिम महिलाओं के साथ मुस्लिम भीड़ को गाली-गलौज करते हुए देखा जा सकता है।
वीडियो में देखा जा सकता है कि रमजान के पवित्र महीने में जैसे ही हिंदुओं के स्वामित्व वाली एक लोकप्रिय कपड़े की दुकान ‘बीएस चन्नबसप्पा एंड संस’ से बुर्का-पहने महिलाएँ बाहर निकलती हैं कि मुस्लिमों की भीड़ उन पर आक्रामक हो जाती है। उनको चारों तरफ से घेर लिया जाता है और सवाल-जवाब किए जाते हैं।
उनके हाथ से कपड़ों की थैली भी छीन ली जाती है और कपड़े रखकर थैली को फेंक दी जाती है। शायद इसलिए क्योंकि उस थैली का रंग ‘भगवा’ था। वीडियो में महिलाओं को आक्रामक मुस्लिम भीड़ से जाने देने की विनती करते हुए देखा जा सकता है।
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इसी तरह, एक अन्य मुस्लिम भीड़ ने दावणगेरे शहर के एक अन्य हिस्से में इसी तरह एक दुकान पर खरीददारी के लिए गई दो महिलाओं और एक बच्चे को धमकी दी। वीडियो में देखा जा सकता है कि उर्दू में बात कर रहे एक शख्स बुर्का पहने महिला और उसके बच्चे को कपड़े की दुकान में प्रवेश नहीं करने के लिए धमकाता है।

सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाने वाली तबलीगी जमात के बचाव में उतरा लिबरल गैंग

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार  
देश की राजधानी दिल्ली में निजामुद्दीन कोरोना वायरस का एक खतरनाक हॉटस्पॉट बनकर सामने आया है। दिल्ली में धारा 144 लागू होने के बावजूद निजामुद्दीन इलाके में एक धार्मिक जलसा हुआ, जिसमें करीब 2000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। लेकिन इस जलसे में शामिल होने वाले 10 लोगों की मौत और 24 लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाये जाने के बाद हड़कंप मच गया और फिर इन्हें अस्पतालों में भेजने का सिलसिला शुरू हुआ। इस जलसे के आयोजन से संबंधित जांच में हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। सामने आए तथ्यों से स्पष्ट हुआ है कि तबलीगी जमात द्वारा सारे नियम-कायदों और सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाकर मस्जिद में मजहबी कार्यक्रम आयोजित किए गए। वहीं इस घटना की निंदा करने की जगह इसके बचाव में लिबरल गैंग सक्रिय हो गया है। 
पुलिस ने मौलानाओं को थमाया था नोटिस

दिल्ली पुलिस ने 23 मार्च को ही तबलीगी जमात के मौलानाओं को थाने बुलाकर समझाया था, कि मरकज में हमेशा डेढ़-दो हजार लोग जुटते हैं, इसे रोकना चाहिए।सीसीटीवी के सामने पुलिस ने बता दिया था कि सारे धार्मिक स्थान बंद हैं और 5 लोगों से ज्यादा की जुटान पर रोक है। पुलिस ने ये भी बताया था कि हम लोग आपलोगों की सुरक्षा के लिए हैं। मौलानाओं को बताया गया था कि सोशल डिस्टेंसिंग का जितना पालन किया जाएगा, उतना अच्छा रहेगा क्योंकि ये कोरोना वायरस कोई धर्म या मजहब देख कर आक्रमण नहीं करता है। पुलिस ने मौलानाओं को नोटिस थमाते हुए कहा था कि सभी दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए। उस समय भी मरकज के लोगों ने स्वीकार किया था कि उनकी इमारत में 1500 लोग मौजूद हैं और 1000 लोगों को वापस भेजा जा चुका है। पुलिस ने इन्हें सख्त शब्दों में चेतावनी दी थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। इन पत्रकारों ने यह नहीं बताया कि मंदिरों में हुए जुटान से कितने लोगों को अबतक कोरोना का संक्रमण हुआ है। कितने लोगों की मौत हुई है। जब तबलीगी जमात के कार्यक्रम में जुटे लोगों में कोरोना संक्रमण पाया गया है। कई लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है। तबलीगी जमात के लोगों के दिल्ली के साथ ही कई राज्यों में फैलने से पूरे देश को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति उन लोगों का खुलेआम बचाव कैसे कर सकता है, जो सार्वजनिक रूप से सरकारी दिशा-निर्देशों और मेडिकल सलाहों को धता बताया हों?

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को किया था आगाह
केंद्रीय गृहमंत्रालय का कहना है कि लॉक़डाउन से पहले ही 21 मार्च को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को पत्र लिखकर आगाह किया गया था। इसमें दिल्ली पुलिस के आयुक्त भी शामिल थे। तेलंगाना में जमात के कुछ लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि होते ही गृहमंत्रालय ने इसका उल्लेख करते हुए सभी राज्यों का कहा था कि इसमें शामिल सभी देशी-विदेशी लोगों की पहचान करने और उसके बाद उनकी कोरोना की जांच सुनिश्चित करने को कहा था।

आइबी ने भी राज्यों को दी थी खतरे की चेतावनी
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार खुफिया ब्यूरो (आइबी) ने भी 28 और 29 मार्च को सभी राज्यों के डीजीपी को पत्र लिखकर जमात से जुड़े लोगों से कोरोना के फैलने के खतरे के प्रति आगाह किया था। खुफिया ब्यूरो ने बताया था कि निजामुद्दीन के मरकज में भाग लेकर लौटने वाले तबलीगी कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं, इसलिए राज्यों को उनके संपर्क में आने वाले सभी लोगों की पहचान कर उन्हें आइसोलेशन में रखने का प्रबंध करना चाहिए। आइबी ने राज्यों को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने को कहा था।

13 मार्च को 200 से ज्यादा लोगों के जुटने पर लगी रोक
इससे पहले दिल्ली सरकार ने 13 मार्च को ही आदेश जारी कर 200 लोगों के जुटाने पर रोक लगा दी थी। उस समस्य इस आदेश की समयावधि 31 मार्च तक रखी गई थी। बावजूद इसके मरकज में कार्यक्रम आयोजित किए गए। 16 मार्च को ख़ुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया कि दिल्ली में कहीं भी 50 लोगों से ज्यादा की भीड़ नहीं जुटेगी। फिर 21 मार्च को 5 से ज्यादा लोगों के जुटान पर रोक लगा दी गई।

जान-बूझकर संक्रमण के ख़तरे को किया नजरअंदाज़
22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया। इसके एक दिन बाद भी वहां 2500 लोग मौजूद थे, जिनमें से 1500 के चले जाने का दावा मौलाना ने किया है। 25 मार्च को लॉकडाउन के दौरान भी 1000 मुसलमान वहां मौजूद थे। 28 मार्च को एसीपी ने दिल्ली मरकज को नोटिस भेजी लेकिन उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपील की थी कि जो जहाँ है वहीं रहे, इसीलिए वहां लोग रुके हुए हैं। साथ ही दावा किया गया कि इतने लोग काफ़ी पहले से यहां पर मौजूद हैं। उपर्युक्त सभी बातों से स्पष्ट पता चलता है कि तबलीगी जमात ने हर एक सरकारी आदेश की धज्जियां उड़ाई और जान-बूझकर इस संक्रमण के खतरे को नजरअंदाज़ कर पूरे देश को ख़तरे में डाल दिया।

मेडिकल सलाहों की उड़ाईं धज्जियां
अब हम आपको बताते हैं कि मरकज में कैसे जनता कर्फ्यू और उसके बाद हुए लॉकडाउन के दौरान भी धड़ल्ले से कार्यक्रम चल रहे थे और मौलाना-मौलवी कोरोना वायरस की बात करते हुए न सिर्फ़ तमाम मेडिकल सलाहों की धज्जियाँ उड़ा रहे थे, बल्कि अंधविश्वास भी फैला रहे थे। 24 मार्च को यूट्यूब पर ‘असबाब का इस्तेमाल ईमान के ख़िलाफ़ नहीं- हजरत अली मौलाना साद’ नाम से ‘दिल्ली मरकज’ यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया गया। इसमें मौलाना ने लोगों को एक-दूसरे के साथ एक थाली में खाने और डॉक्टरों की बात मानने की बजाए अल्लाह से दुआ करने की सलाह दी।

बचाव में उतरे एजेंडा पत्रकार और लिबरल गैंग
जब तबलीगी जमात पर प्रशासन और कानून का शिकंजा कसने लगा, तो एजेंडा पत्रकार और लिबरल गैंग उनके बचाव में सामने आ गए। राणा अयूब ने तबलीगी जमात को क्लीन-चिट देने की कोशिश करते हुए एक खबर की लिंक साझा की है। साथ ही दावा किया है कि जब 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान किया, तभी मरकज में सारे कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया गया। इसके बाद अयूब ने वहाँ इतनी संख्या में लोगों के छिपे होने के पीछे रेलवे का दोष गिना दिया है, क्योंकि देश भर में रेल सेवा बंद हो गई।




वहीं न्यूज-24 के एंकर संदीप चौधरी तबलीगी जमात के बचाव में स्वास्थ्य मंत्रालय और अन्य मंदिरों के बंद होने की क्रोनोलॉजी समझाने लगे। संदीप चौधरी का समर्थन करते हुए ओम थानवी के साथ ही कई अन्य पत्रकारों ने भी ट्वीट किया।
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कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देशभर में लगे लॉकडाउन के दौरान दिल्ली के निजामुद्दीन से आई एक खबर ने पूरे द....
इन पत्रकारों ने यह नहीं बताया कि मंदिरों में हुए जुटान से कितने लोगों को अबतक कोरोना का संक्रमण हुआ है। कितने लोगों की मौत हुई है। जब तबलीगी जमात के कार्यक्रम में जुटे लोगों में कोरोना संक्रमण पाया गया है। कई लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है। तबलीगी जमात के लोगों के दिल्ली के साथ ही कई राज्यों में फैलने से पूरे देश को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति उन लोगों का खुलेआम बचाव कैसे कर सकता है, जो सार्वजनिक रूप से सरकारी दिशा-निर्देशों और मेडिकल सलाहों को धता बताया हों? 

1993 मुंबई ब्लास्ट: मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने मस्जिद में भी ब्लास्ट हुए, तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार बेनकाब

शरद पवार झूठ
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक कहावत है "झूठ के पैर नहीं होते" जो बदलते समय के साथ-साथ सच्चाई पर डाली गयी कीजड़ साफ होनी प्रारम्भ हो चुकी है। अब तक कांग्रेस भारतीय जनसंघ उर्फ़ भारतीय जनता पार्टी को मुस्लिम विरोधी बताकर डरा-धमका कर सत्ता पर काबिज़ रहे। आतंकियों को बचाने बेकसूर हिन्दुओं, हिन्दू साधु, संत और साध्वियों को "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से दुष्प्रचार करते रहे। और इस कुकृत्य में "जयचन्दी हिन्दू" एक गुलाम की भाँति तल्लीन रहे। अभी तक हम जयचन्द नाम इतिहासकारों से सुनते थे, लेकिन वर्तमान समय में बिना किसी कारण हिन्दू होते हुए भी हिन्दू धर्म को कलंकित करने में व्यस्त रहने ही जयचन्दों के वंशस हैं। लेकिन हिन्दू विरोधी सोनिया गाँधी के राजनीती में पदापर्ण होने के बाद से इन जयचन्दों की निरन्तर वृद्धि होती गयी। सोनिया के हिन्दू विरोधी होने का उल्लेख भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने अपनी पुस्तक में भी किया है। 
फिर जनता को भारतीय जनसंघ वर्तमान भाजपा के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की हत्या को मृत्यु बताकर देश की जनता से छल किया गया। यह जनता का ही बलिदान है कि जब जिसका मन हुआ जम्मू या कश्मीर चला जाता है। यदि डॉ मुख़र्जी ने केन्द्रीय उद्योग मन्त्री पद त्याग भरी संसद में नेहरू और शेख अब्दुल्ला को देश में चल रही कुप्रथाओं को समाप्त करने की चुनौती देकर, बिना परमिट जम्मू-कश्मीर के लिए कूच किया था, क्योकि उन दिनों कोई भी बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर की सीमा में नहीं घुस सकता था। जबकि हमें पढ़ाया जाता आ रहा है कि "कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है", लेकिन जम्मू-कश्मीर जाने के लिए पहले परमिट लेने की प्रथा थी, जैसे भारत के किसी प्रान्त की बजाए किसी विदेश में जा रहे हैं। फिर जनता स्वयं निर्णय करे और कांग्रेस की दोगली नीति को समझे, "क्या किसी देश में आज तक दो प्रधानमन्त्री होते हैं?" जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री था शेख अब्दुल्ला और शेष भारत का जवाहरलाल नेहरू। यह प्रथा भी डॉ मुख़र्जी के बलिदानं से ही समाप्त हुई थी। 
इस सन्दर्भ में निम्न लेखों का अवलोकन करें:-


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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार औरंगजेब, अन्य मुगलों तथा मुस्लिम हमलावरों ने भारत में हिन्दुओं का नरसंहार किया, हिन्दू महिलाओं के साथ बल...
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अक्टूबर 13 को प्रणब मुखर्जी की किताब का विमोचन हुआ। उस किताब में प्रणब मुखर्जी ने यूपीए सरकार और उसकी कई नीतियों और फैसलों के बारे में जिक...
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भारत के वरिष्ठतम नेताओं में से एक शरद पवार ने 1993 मुंबई बम ब्लास्ट के दौरान कुछ ऐसा किया था, जो आप सोच नहीं सकते। उस दौरान उन्होंने झूठ बोला था, वो भी सिर्फ़ कथित तौर पर सांप्रदायिक सौहार्द्र को बरकरार रखने के लिए। उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे पवार ने मुस्लिमों को भी पीड़ित दिखाने के लिए बम ब्लास्ट्स की संख्या बढ़ा दी थी। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने एक अतिरिक्त बम ब्लास्ट की ‘खोज’ कर ली थी, जो असल में हुआ ही नहीं था। भले ही आपको यह अविश्वसनीय लगे लेकिन यही सच है। 12 मार्च 1993 को मुंबई को दहलाने वाले 12 सीरियल बम धमाके हुए, जिसके बाद महानगर में अराजकता फ़ैल गई और लोगों में भारी खलबली मच गई।
ये ऐसा पहला आतंकी हमला था, जब भारत में आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया हो। 26/11 तरह ये हमले भी पूर्व नियोजित थे और इन्हें काफी प्लानिंग के बाद अंजाम दिया गया था। उन ब्लास्ट्स में 300 के क़रीब लोग काल के गाल में समा गए थे, वहीं 1400 के क़रीब लोग घायल हुए थे। यह भारत की ज़मीन पर आतंकी हमलों में हुई अब तक की सबसे बड़ी क्षति है। इस घातक आतंकी हमले में शिवसेना दफ़्तर को भी निशाना बनाया गया था।
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने हमलों के तुरंत बाद दूरदर्शन स्टूडियो में जाकर बोला था और घोषणा की थी कि कुल 13 धमाके हुए हैं। उन्होंने न जाने कहाँ से एक अतिरिक्त विस्फोट की ‘खोज’ कर ली थी। पवार ने कहा था कि मस्जिद बंदर में 13वाँ विस्फोट हुआ था। चूँकि इस हमले में हिन्दू बहुल क्षेत्रों को निशाना बनाया गया था, ऐसे में पवार ने मस्जिद में विस्फोट की कहानी गढ़ी ताकि मुस्लिमों को भी पीड़ित की तरह पेश किया जा सके। वास्तव में, सभी 12 धमाके हिन्दू बहुल इलाक़े में किए गए थे।
पवार ने दावा किया था कि उनके इस झूठ के लिए उनकी प्रशंसा की गई थी। एनसीपी सुप्रीमो ने इस हमले में मुसलमानों को बराबर पीड़ित दिखाने व सच्चाई को दबाने के लिए झूठ का सहारा लिया था। ऐसा स्वयं पवार ने स्वीकार किया था। उन्होंने इसे ‘संतुलन’ के लिए किया गया प्रयास बताया था। हमले के 22 वर्षों बाद पवार ने पुणे में आयजित 89वीं मराठी साहित्यिक बैठक को सम्बोधित करते हुए स्वीकार किया था कि उन्होंने जानबूझ कर एक अतिरिक्त बम ब्लास्ट की कहानी गढ़ी ताकि मुस्लिमों को पीड़ित दिखा कर सांप्रदायिक तनाव से बचा जाए क्योंकि ‘पाकिस्तान ऐसा ही चाहता था’। उन्होंने कहा कि उन्हें भी यह पता था कि ये सभी धमाके हिन्दू बहुल क्षेत्रों में हुए थे।
पवार ने कहा कि उन्होंने दूरदर्शन स्टूडियो जाकर ऐसा कहा क्योंकि यह सांप्रदायिक तनाव की स्थिति को बचाने के लिए सही था। वे लोगों को इस बात का एहसास दिलाना चाहते थे कि मुसलमान भी इस विस्फोट के शिकार हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग द्वारा उनके इस क़दम की सराहना की गई थी। यहाँ तक की पवार ने उस हमले का दोष लिट्टे पर भी मढ़ा था। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दंगे रोकने के लिए ऐसा करने का दावा किया। 78 वर्षीय पवार भारत सरकार में केंद्रीय रक्षा व कृषि मंत्री रह चुके हैं। अभी हाल ही में उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव न लड़ने का ऐलान किया है।
12 मार्च 1993 में इन स्थानों पर धमाके हुए थे- मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, नरसी नाथ स्ट्रीट, शिव सेना भवन, एयर इंडिया बिल्डिंग, सेंचुरी बाज़ार, माहिम, झावेरी बाज़ार, सी रॉक होटल, प्लाजा सिनेमा, जुहू सेंटॉर होटल, सहार हवाई अड्डा और एयरपोर्ट सेंटॉर होटल। इस धमाके का साज़िशकर्ता दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन था। इसकी पूरी साज़िश पाकिस्तान में रची गई थी। उस दिन को आज भी ब्लैक फ्राइडे के नाम से जाना जाता है।

गठबंधन में गांठ: 10 दिसंबर को विपक्ष की बैठक में मायावती के शामिल होने पर बना सस्‍पेंस

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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
एक पुरानी नहीं, प्राचीन कहावत है "गांव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए" या यूँ कहिए "इश्क में एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाने खूब सब्जबाग दिखाता है", ठीक वैसी ही स्थिति समस्त गैर-भाजपाइयों की हो रही है, जो 2019 में सत्ता से मोदी सरकार को हटाने में एक-दूसरे को सब्जबाग दिखा, एकजुट होने के लिए ललचा रहे हैं। और लगभग हर दल प्रेमिका की भाँति भाव दिखा रहा है। वैसे अधिकतर को कांग्रेस का साथ पसंद नहीं, तो किसी को किसी अन्य का। एक डर यह भी है कि कांग्रेस का विरोध करने पर कहीं कांग्रेस ही उनको बेनकाब न कर दे। सम्भावनाएं कुछ भी हो सकती हैं। उपचुनाव के गठबंधन और आम चुनाव के गठबंधन में जमीन और आसमान का अंतर होता है। जो प्रमाणित करता है कि इस सभी गैर-भाजपाइयों का विरोध मोदी सरकार से नहीं,बल्कि नरेन्द्र मोदी से है। इन सबको डर है कि 2019 में पुनः मोदी की वापसी इनके काले कारनामों को जनता के समक्ष लाकर इन्हें कहीं का नहीं छोड़ने वाले। 
सत्ता के गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि 2019 में नरेन्द्र मोदी की वापसी केवल कांग्रेस ही नहीं, वामपंथियों और दो या तीन क्षेत्रीय पार्टियों के अलावा कुछ बुद्धिजीविओं पर भी भारी पड़ने वाली है।यही कारण है कि ये लोग कहीं रामजन्मभूमि पर तो कहीं वंदे मातरम, तो कहीं गौ हत्या की आड़ में तो कहीं जाति के नाम पर उपद्रव कर सौहार्द बिगाड़ जनता के दिमाग में डर बैठाने का प्रयत्न कर रहे हैं। जिसका संकेत अभी संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में प्रधानमन्त्री मोदी ने राममन्दिर के विरोधियों को बेनकाब करने का प्रयास किया है। किस तरह कोर्ट में गलत बयान देकर हिन्दुओं को अपमानित कर मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने के प्रयास में मुस्लिम समाज को वास्तविकता से गुमराह करते रहे हैं। अब तो तत्कालीन पुरातत्व विभाग के निदेशक के.के.मोहम्मद भी परिचर्चाओं में खुदाई में मिले राममंदिर के अवशेषों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि कोर्ट को धोखा दिया गया। इन गैर-भाजपाई पार्टियों में जितने भी हिन्दू हैं, क्या कोर्ट में राममन्दिर के विरुद्ध झूठ बोले जाने का किसी ने विरोध किया? यदि यही झूठ मस्जिद के बोला जाता, सबके सब सड़क से लेकर संसद तक सियापा कर रहे होते। रातों को अदालतें खुलवाते, और झूठ बोलने वालों को जेल में भेजने के लिए खूब प्रदर्शन और घिराओ कर जेल पहुंचाकर ही आंदोलन शान्त होता। जिसे अब जनता भी समझ रही है। 
देखिए वीडियो  

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Mr K K MUHAMMED, Ex Regional Director, ASI, Demolished the theory of Babri Masjid spread by…  

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शुभ समाचार - आप सभी प्रशंसकों की Demand पर हम लेकर आये हैं नया Namokar Poetry Channel - https://www.yout…
विपक्षी महागठबंधन की सुगबुगाहट के बीच 10 दिसंबर को देश के सभी प्रमुख विपक्षी दलों की बैठक होने जा रही है. आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू इस बैठक के आयोजक हैं. लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बसपा सुप्रीमो और उत्‍तर प्रदेश की पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती के इसमें शामिल होने पर सस्‍पेंस बना हुआ है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मायावती संभवतया इस बैठक में शिरकत नहीं करेंगी. सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने उनके प्रतिनिधि सतीश चंद्र मिश्रा को इस संबंध में मनाने के प्रयास किए थे लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.
इससे पहले मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्‍थान चुनावों में बसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया था. उसके बाद मायावती के इस संभावित कदम को विपक्षी एकजुटता के लिहाज से बड़ा झटका माना जा रहा है.
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दरअसल इस साल मार्च में कर्नाटक चुनावों के बाद जेडीएस-कांग्रेस के गठबंधन बनाकर सरकार में आने और यूपी के गोरखपुर, कैराना, फूलपुर लोकसभा उपचुनावों में विपक्ष ने महागठबंधन बनाकर बीजेपी को शिकस्‍त दी थी. उसके बाद से ही 2019 के लोकसभा चुनावों में यूपी में सपा, बसपा और कांग्रेस के महागठबंधन की चर्चाएं चल रही हैं. लेकिन मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़ में जिस तरह मायावती ने कांग्रेस को नजरअंदाज किया, उससे इस तरह की संभावना पर प्रश्‍नचिन्‍ह लग गया है.
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जिस वामपंथ को जिग्नेश अपने साथ रखे हुए, क्या कभी इनसे पूछा कि "आपकी पार्टी में दलित या अनुसूचित जाति के कितने लोग पद.....

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अकेला मोदी, सब पर भारी आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 2019 में नरेन्द्र मोदी को मात देने को हर कोई लगा हुआ है, लेकिन अपने अ...

सपा-बसपा गठबंधन पर संशय
सपा नेता अखिलेश यादव भी कई बार कह चुके हैं कि यदि बसपा के साथ गठबंधन के मसले पर उनको दो कदम पीछे भी हटना पड़ेगा तो वो इसके लिए तैयार हैं. राजनीतिक विश्‍लेषकों के मुताबिक बसपा के साथ सीटों पर समझौते के लिहाज से अखिलेश यादव ने ये बात कही. लेकिन बसपा की तरफ से अभी तक सीधेतौर पर किसी भी दल के साथ गठबंधन को लेकर कुछ नहीं गया है. यूपी में विपक्षी दलों का गठबंधन इसलिए अहमियत रखता है क्‍योंकि राज्‍य की 80 लोकसभा सीटों में से पिछली बार बीजेपी के नेतृत्‍व में एनडीए ने 73 सीटें जीती थीं. ऐसे में बीजेपी को इस बार रोकने के लिए विपक्ष की नजर इस संभावित गठबंधन पर है लेकिन मायावती के रुख ने फिलहाल विपक्ष के लिए संशय की स्थिति उत्‍पन्‍न कर दी है.