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बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश विवाद पर ट्टीट कर सवाल उठाए

TASLIMA NASREENसबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश विवाद पर  बांग्‍लादेश की विवादास्‍पद लेखिका तसलीमा नसरीन भी कूद पड़ी हैं। तसलीमा नसरीन ने इस मामले में सक्रिय महिला एक्टिविस्टों पर निशाना साधा है। तस्लीमा ने ऐसी महिलाओं से कहा है कि क्यों वो सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के लिए इतनी उत्सुक हैं जबकि और भी महिलाओं से जुड़े तमाम अहम इश्यूज हैं।
तसलीमा नसरीन ने ट्वीट करके कहा है कि-मैं समझ नहीं पा रही हूं कि क्यों महिलाओं में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के लिए उतावलापन है। मेरे हिसाब से  उन्हें गांवों में जाना चाहिए जहां औरतें घरेलू हिंसा, रेप, सेक्सुअल अभद्रता, नफरत की शिकार हैं, जहां लड़कियों को शिक्षा का, स्वास्थ्य का अधिकार नहीं है ना ही समान मेहनताने वाले रोजगार का अधिकार है वहां काम करने की जरूरत है।'

I do not understand why women activists are so eager to enter Sabarimala. Better they should enter the villages where women suffer from domestic violence, rape, sexual abuse,hate, where girls have no access to education, heath-care,and no freedom to take a job or get equal pay.

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कुछ समय पहले भी तसलीमा ने कहा था कि भारत में पर्याप्‍त मुस्लिम हैं और उसे अब पड़ोसी देशों के और ज्‍यादा मुसलमानों की जरूरत नहीं है। पश्चिम बंगाल में प्रवेश की अनुमति नहीं देने के लिए उन्‍होंने ममता बनर्जी पर भी हमला बोला था। 
तसलीमा ने ट्वीट कर कहा था, 'यह देखकर अच्‍छा लगा कि ममता बनर्जी 40 लाख बांग्‍ला बोलने वालों के लिए इतनी ज्‍यादा सहानुभूति रखती हैं। उन्‍होंने यहां तक कह दिया है कि वह असम बाहर किए जाने वाले लोगों को वह शरण देंगी। उनकी यह सहानुभूति तब कहां थी जब उनकी विरोधी पार्टी ने मुझे पश्चिम बंगाल से बाहर कर दिया था।'
बांग्‍लादेशी लेखिका ने कहा था, 'ममता के अंदर सभी बेघर बांग्‍ला बोलने वालों के लिए के सहानुभूति नहीं है। यदि उनके अंदर होता तो उनके अंदर मेरे लिए भी होती और उन्‍होंने मुझे भी पश्चिम बंगाल में आने की अनुमति दी होती।' उन्‍होंने सुझाव दिया कि किसी भी व्‍यक्ति को अवैध प्रवासी नहीं कहा जाना चाहिए। बांग्‍लादेश के लोग जो अवैध तरीके से भारत आए, उनका काम भारतीय कानून के मुताबिक अवैध है लेकिन वे अवैध नहीं हैं।' 
वहीं सितंबर में बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने को सर्वोच्च न्यायालय के तीन तलाक को खत्म करने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह निश्चित रूप से महिलाओं की आजादी नहीं है और इससे आगे जाकर '1400 साल पुराने कुरान के नियमों को खत्म करने की जरूरत है।'
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केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर रूढ़ियों और कानून के बीच शक्ति प्रदर.....

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार केरल के विवादित सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यहां विरोध प्रदर्.....
तसलीमा ने कहा था, '1400 साल पुराने कुरान के कानून खत्म होने चाहिए। हमें बराबरी पर आधारित आधुनिक कानून की जरूरत है।'

सबरीमाला: जिसकी लाठी उसकी भैंस, क्या महिला जज सही थीं?

सबरीमाला मंदिर खुलने से पहले तनाव, बेस कैंप में भक्तों ने महिलाओं को रोकाकेरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर रूढ़ियों और कानून के बीच शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला जारी है. महिलाओं की बराबरी की बात करने वाले नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का राष्ट्रीय स्तर पर रस्मी स्वागत किया, पर अब केरल में वोट बैंक की राजनीति से अदालती फैसला शहीद हो रहा है. संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश का कानून बन जाता है, तो फिर केरल में इसका पालन क्यों नहीं हो रहा.
अल्पमत की महिला जज क्या सही थीं- सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं के हक में 28 सितंबर को फैसला दिया था जिस पर महिला जज इंदु मल्होत्रा ने असहमति व्यक्त की थी. सीनियर एडवोकेट से सीधे सुप्रीम कोर्ट की जज बनीं जस्टिस मल्होत्रा ने 74 पेज के पृथक फैसले में अनेक महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर अपनी राय प्रकट की थी. उनके अनुसार संविधान के अनुच्छेद 14 के समानता के सिद्धांत को मंदिर और परंपराओं में नहीं लागू किया जा सकता. उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अयप्पा के 1000 अन्य मंदिरों में अनावश्यक विवाद बढ़ेंगे. जस्टिम मल्होत्रा द्वारा दिए गए तर्कों के आधार पर फैसले के बाद श्रद्धालुओं ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की, जिस पर छुट्टियों के बाद सुनवाई होगी.
सबरीमाला मामले में संवैधानिक प्रावधानों की गलत व्याख्या
वरिष्ठ वकील के. राममूर्ति ने एमिकस क्यूरी के तौर पर सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का विरोध किया था. उनके अनुसार संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत होटल और दुकानों की तर्ज पर मंदिरों में प्रवेश के नियम सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय नहीं किए जा सकते. अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता को परंपराओं की विविधता के अधिकार से एमिकस क्यूरी ने जोड़ा. 
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मंदिरों में खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश की वर्जना को अनुच्छेद 17 के अस्पृश्यता के प्रावधान से तुलना करने का विधिक कुतर्क अब समाज ने भी स्वीकार नहीं किया है. केरल के शिक्षित और मातृसत्तातमक समाज को सबरीमाला के नाम पर दकियानूसी और पुरुषप्रधान बताने से अदालत और समाज के बीच खाई गहरी होती दिख रही है.
उत्तराखंड में पीआईएल पर जजों के अजीबोगरीब फैसले
उत्तराखंड हाईकोर्ट के जजों ने पीआईएल में अजब फैसले दिए, जिनका क्रियान्वयन नामुमकिन है. गंगा नदी और हिमालय के ग्लेशियर को विधिक व्यक्ति का दर्जा देकर अदालत ने खुद को स्वयंभू संरक्षक भी नियुक्त कर लिया. एक अन्य फैसले में जजों ने हवा, पानी और पृथ्वी में रहने वाले सभी जीवों को विधिक व्यक्ति का दर्जा देते हुए उन्हें मनुष्यों की तरह अधिकार दे दिए. ऐसे फैसले मीडिया की सुर्खियां बन जाते हैं पर इन्हें लागू करने का सिस्टम नहीं बनने से, अदालती फैसले कानून की भीड़ में गुम हो जाते हैं.
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत पीआईएल का बढ़ता दुरुपयोग
अध्याय 3 में दिए गए मूल अधिकारों के प्रावधान को डॉ. आम्बेडकर ने संविधान की आत्मा बताया था. इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट और अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल का अधिकार लोगों को दिया गया. अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के मामले गढ़ कर पीआईएल दायर करने के बढ़ते रिवाज से न्यायिक फैसलों का रसूख कम हो रहा है. पीआईएल में सरकार से राहत की मांग की जाती है. इसलिए सबरीमाला जैसे मंदिरों के निजी प्रशासन के खिलाफ पीआईएल के फैसले को लागू करने की चुनौती, अदालतों के लिए एक सबक है. 
सती और नरबलि की कुरीति से सबरीमाला की तुलना क्यों
राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद के समय से समाज और धर्म की अनेक कुरीतियों के खात्मे के लिए कानून बनाने का सिलसिला जारी है. सती, जौहर, नरबलि और पशुबलि जैसी परंपरायें मनुष्यता के विरुद्ध अपराध थीं, जिनके विरुद्ध कानून बनना ही चाहिए था. बाल विवाह, भ्रूण हत्या, तीन तलाक और हलाला जैसे मामलो में भी न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी था. 
धार्मिक विधि-विधान परंपराओं से चलते हैं, जिन्हें तर्क और कानून की कसौटी पर कसने से पैदा हुए न्यायिक कुतर्क लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं हैं. समाज में अनेक उत्सवों में सिर्फ महिलाओं की भागीदारी होती है तो क्या उनमें पुरुषों के प्रवेश के लिए न्यायिक नियम बनाना चाहिए? मिस इंडिया जैसे प्रतियोगिताओं के लिए लड़कियों की उम्र, रंग, सुंदरता और फिगर के लिए अनेक मापदंड बने हैं तो क्या उन्हें अदालत में चुनौती दी जा सकती है? सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार मिले, इस पर न्यायिक फैसले की बजाय सामाजिक प्रयासों से सहमति बने तभी देश में लाठी की बजाय, कानून का राज होगा.
(लेखक विराग गुप्‍ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
---साभार 

सबरीमला मंदिर क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है?

protest at sabrimala temple
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
केरल के विवादित सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यहां विरोध प्रदर्शन शुरू है। यहां हर रोज की तरह आज भी श्रद्धालुओं और प्रदर्शनकारियों का तांता लगा हुआ है। इस बीच लगभग 250 पुलिसकर्मी के साथ सुरक्षा से लैस हैदराबाद की एक टीवी पत्रकार कविता जक्काल मंदिर की तरफ बढ़ रही है। उनके साथ खुद केरल के आईजी श्रीजीत भी हैं। मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं और प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है।

परंपरा और फैसले के बीच जंग

अगर महिला टीवी पत्रकार कविता जक्काल मंदिर में सफलतापूर्वक प्रवेश कर जाती है तो ऐतिहासिक रूप से वह सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिला होंगी। वहीं प्रदर्शनकारी विरोध प्रदर्शन करने के दौरान जोर-जोर से अयप्पा भगवान के नारे भी लगा रहे हैं। मंदिर के बाहर इनकी भीड़ को देखते हुए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था भी किए गए हैं। 
आईजी ने संभाला मोर्चा, कहा-
इस बीच आईजी श्रीजीत प्रदर्शनकारियों से बात करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि हम यहां आपको कोई नुकसान पहुंचाने नहीं आए हैं। हम बस कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यहां मौजूद हैं। कृप्या हमारी तैयारियों को देखकर गलतफहमी ना पालें। हमारा उद्देश्य आपको चोट पहुंचाना नहीं है। हम भी भगवान अयप्पा के मानने वाले हैं। लेकिन हमें कोर्ट के आदेश को भी मानना है। हम कानून से बंधे हैं।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों से पूछा कि आप राज्य सरकार से और क्या वादा चाहते हैं? हम केवल आपके विश्वास की रक्षा नहीं कर सकते हमें कानून व्यवस्था की भी रक्षा करनी है। आप एक कोने में बैठकर अपने नारे लगा सकते हैं। लेकिन हमें अपना काम करने दें। दरअसल प्रदर्शनकारी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा रहे हैं। उनका कहना है कि वे इसके लिए अपनी जान भी देने को तैयार हैं।
Image may contain: 3 people, crowd and outdoorपम्बा से सन्निधानम की ओर जा रही कविता के साथ कई पुलिसकर्मी भी हैं। उनमें आईजी श्रीजीत भी शामिल थे। 200 पुलिसकर्मियों के साथ कविता नीलिमाला तक पहुंची जो मुख्य मंदिर से तीन किमी दूर है। कविता के साथ कोच्चि की एक अन्य स्थानीय महिला भी थी। जानकारी के मुताबिक कविता के साथ एक महिला कार्यकर्ता रेहना फातिमा भी हैं। 
सन्निधानम स्थित सबरीमाला मंदिर में आए एक श्रद्धालु ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कहना सही है कि महिला और पुरुष सभी बराबर हैं। लेकिन यहां की एक संस्कृति है कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को यहां मंदिर में प्रवेश करने देने की अनुमति नहीं है। ये हमारा रिवाज है। चूंकि भारत एक रीति-रिवाजों वाला देश है तो हमें अपने इन रिवाजों को मानना होगा।
पुणे से महिला कार्यकर्ता हिरासत में
इसी मामले से संबंधित पुणे में कार्यकर्ता त्रुप्ति देसाई को शुक्रवार को हिरासत में लिया गया। उन्होंने कल अहमदनगर एसपी को लेटर लिखा था कि वे पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सबरीमाला मंदिर मुद्दे पर चर्चा करना चाहती हैं। उसने पीएम मोदी के काफिले को रोकने की धमकी भी दी थी। उसका कहना था कि प्रदर्शन करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। 

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Pune: Activist Trupti Desai detained by police, earlier this morning. She wrote a letter to SP Ahmednagar y’day demanding to meet PM Modi to discuss issue ahead of his Shirdi visit today. She had also threatened to stop his convoy if he doesn't meet.
इस बीच सन्निधानम से प्रदर्शन की लगातार खबरें आ रही हैं। प्रदर्शनकारी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि किसी भी महिला को मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा , हम सबरीमाला की रक्षा कर रहे हैं।

सबरीमला मंदिर क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है?

केरल में सबरीमला के मशहूर स्वामी अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे विवाद के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित एक्टिविस्ट भी कम से कम एक बार यहां घुसने को बेताब हैं। इस बात को समझने के लिए हमें केरल के इतिहास और यहां इस्लामी और राज्य में बीते 4-5 दशक से चल रही ईसाई धर्मांतरण की कोशिशों को भी समझना होगा। मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था को तोड़ना है, ताकि इस पूरे इलाके में बसे लाखों हिंदुओं को ईसाई और इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों में लाया जा सके। केरल में चल रहे धर्मांतरण अभियानों में सबरीमला मंदिर बहुत बड़ी रुकावट बनकर खड़ा है। पिछले कुछ समय से इसकी पवित्रता और इसे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा था। लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही थी। लेकिन आखिरकार महिलाओं के मुद्दे पर ईसाई मिशनरियों ने न सिर्फ सबरीमला के अयप्पा मंदिर बल्कि पूरे केरल में हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सबसे बड़ी चाल चल दी है। 
सबरीमला के इतिहास को समझिए
1980 से पहले तक सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता था। केरल और कुछ आसपास के इलाकों में बसने वाले लोग यहां के भक्त थे। 70 और 80 के दशक का यही वो समय था जब केरल में ईसाई मिशनरियों ने सबसे मजबूती के साथ पैर जमाने शुरू कर दिए थे। उन्होंने सबसे पहला निशाना गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को बनाया।  इस दौरान बड़े पैमाने पर यहां लोगों को ईसाई बनाया गया। इसके बावजूद लोगों की मंदिर में आस्था बनी रही। इसका बड़ा कारण यह था कि मंदिर में पूजा की एक तय विधि थी। जिसके तहत दीक्षा आधारित व्रत रखना जरूरी था। सबरीमला उन मंदिरों में से है जहां पूजा पर किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं। किसी भी जाति का हिंदू पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करके मंदिर में प्रवेश पा सकता था। सबरीमला में स्वामी अयप्पा को जागृत देवता माना जाता है। यहां पूजा में जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है। मान्यता है कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं। जो लोग व्रत को ठीक ढंग से नहीं पूरा करते उन्हें यह दर्शन नहीं होते। जिसे एक बार इस चंद्रमा के दर्शन हो गए माना जाता है कि उसके पिछले सभी पाप धुल जाते हैं।
सबरीमला से आया सामाजिक बदलाव
सबरीमला मंदिर की पूजा विधि देश के बाकी मंदिरों से काफी अलग और कठिन है। यहां दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा दी जाती है। इस दौरान रुद्राक्ष जैसी एक माला पहननी होती है। साधक को रोज मंत्रों का जाप करना होता है। इस दौरान वो काले कपड़े पहनता है। जमीन पर सोता है। जिस किसी को यह दीक्षा दी जाती है उसे स्वामी कहा जाता है। यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा। इसके बजाय वो स्वामी कहलाएगा। इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया। मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाए। ऐसे लोगों का समाज में बहुत ऊंचा स्थान माना जाता है। यानी यह मंदिर एक तरह से जाति-पाति को तोड़कर भगवान के हर साधक को वो उच्च स्थान देने का काम कर रहा था जो कोई दूसरी संवैधानिक व्यवस्था कभी नहीं कर सकती। 
ईसाई मिशनरियों के लिए मुश्किल
सबरीमला मंदिर में समाज के कमजोर तबकों की एंट्री और वहां से हो रहे सामाजिक बदलाव ने ईसाई मिशनरियों के कान खड़े कर दिए। उन्होंने पाया कि जिन लोगों को उन्होंने धर्मांतरित करके ईसाई बना लिया वो भी स्वामी अयप्पा में आस्था रखते हैं और कई ने ईसाई धर्म को त्यागकर वापस सबरीमला मंदिर में ‘स्वामी’ के तौर पर दीक्षा ले ली। यही कारण है कि ये मंदिर ईसाई मिशनरियों की आंखों में लंबे समय से खटक रहा था। अमिताभ बच्चन, येशुदास जैसे कई बड़े लोगों ने भी स्वामी अयप्पा की दीक्षा ली। इन सभी ने भी मंदिर में रहकर दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा ली। इस दौरान उन्होंने चप्पल पहनना मना होता था। और उन्हें भी उन्हीं रास्तों से गुजरना होता था जहां उनके साथ कोई रिक्शेवाला, कोई जूते-चप्पल बनाने वाला स्वामी चल रहा होता था। नतीजा यह हुआ कि ईसाई संगठनों ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर ‘चंद्र दर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे। ईसाई धर्म के इस फर्जीवाड़े के बावजूद सबरीमला मंदिर की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को मुद्दा बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी। यह याचिका हिंदू नाम वाले कुछ ईसाइयों और एक मुसलमान की तरफ से डलवाई गई।
1980 में सबरीमला मंदिर के बागीचे में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था। ( देखें तस्वीर) उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है। इसलिए यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिए।  उस वक्त आरएसएस के नेता जे शिशुपालन ने इस क्रॉस को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था और वो इसमें सफल भी हुए। इस आंदोलन के बदले में राज्य सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया। 
केरल में हिंदुओं पर सबसे बड़ा हमला
केरल के हिंदुओं के लिए यह इतना बड़ा मसला इसलिए है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है। राज्य में हिंदू धर्म को बचाने का उनके लिए यह आखिरी मौका है। केरल में गैर-हिंदू आबादी तेज़ी के साथ बढ़ते हुए 35 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है। अगर सबरीमला की पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो ईसाई मिशनरियां प्रचार करेंगी कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं। ऐसे में ‘चंद्र दर्शन’ कराने वाली उनकी नकली दुकानों में भीड़ बढ़ेगी। नतीजा धर्मांतरण के रूप में सामने आएगा। यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। क्योंकि जिन तथाकथित महिला एक्टिविस्टों ने अब तक मंदिर में प्रवेश की कोशिश की है वो सभी ईसाई मिशनरियों की करीबी मानी जाती हैं। जबकि जिन हिंदू महिलाओं की बराबरी के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है वो खुद ही उन्हें रोकने के लिए मंदिर के बाहर दीवार बनकर खड़ी हैं।

RSS विजयादशमी उत्सव : अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से देश में बढ़ेगा सद्भाव -- मोहन भागवत

Mohan Bhagwatराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी समारोह में कहा कि हमारा समाज भारत की अवधारणा से सहज भाव से उपजे जब स्‍व की भावना के सत्‍य को भूल गया और स्‍वार्थ प्रबल हो गए तो हम अत्‍याचार के शिकार हो गए. समाज में अपनी कमियां थी. शासकों ने तो किसी को भी नहीं छोड़ा. बाबर ने ना हिंदू को बख्शा, ना मुस्लिम को बख्‍शा. भारत को इतना शक्तिशाली बनने की जरूरत है कि कोई भी देश हमसे लड़ने की हिम्मत न करे। हालांकि, उन्होंने कहा कि युद्ध की स्थिति में दोनों पक्षों को नुक्सान उठाना पड़ता है। अपने वार्षिक विजयादशमी भाषण में संघ प्रमुख ने राम मन्दिर, राफेल मुद्दा और सबरीमाला मंदिर विवाद पर अपनी राय रखी।
देश में हालिया दौर में हुए आंदोलनों का जिक्र करते हुए ने कहा कि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' कहने वालों का संविधान में यकीन नहीं है. देश में छोटी-छोटी बातों पर आंदोलन होने लगे हैं. बंदूक की नली के आधार पर सत्ता प्राप्त करेंगे, भारत तेरे टुकड़े होंगे जो नारे लगाते हैं, ऐसे भी चेहरे आंदोलन में रहते हैं. हमारे देश में जो हो रहा है, असंतोष का राजनीतिक लाभ लिया जा रहा है. गलत बातों का सोशल मीडिया पर प्रचार हो रहा है.
राफेल सौदे पर जारी विवाद का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि विदेशी देशों के साथ इस तरह के करार होते रहने चाहिए लेकिन रक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्म-निर्भर बनने के बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा, 'हमें अपनी सुरक्षा के लिए जिन चीजों की जरूरत है, हमें उनका उत्पादन करना चाहिए।'
संघ प्रमुख ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार एससी और एसटी सब प्लान के लिए आवंटित धन खर्च नहीं कर रही है। उन्होंने कहा, 'यदि मदद समय पर नहीं पहुंचती तो इसे मदद के रूप में नहीं देखा जा सकता। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की योजनाओं को लागू नहीं किया गया। इन योजनाओं के लिए धन क्यों नहीं खर्च हुआ?'
सबरीमाला मंदिर विवाद पर संघ प्रमुख ने कहा कि महिला और पुरुष समान माने गए हैं। उन्होंने कहा, 'इस मसले पर हमें आपसी सहमति बनानी चाहिए थी। भक्तों से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था।'
सबरीमाला
सबरीमाला का निर्णय देखिए, क्या हुआ, बात करनी थी मन बनाना था. भावनाएं नहीं देखी गईं, पंथ समुदाय अपना-अपना होता है अमुख बात धर्म के लिए है कि नहीं, समझना चाहिए था. ये परंपराएं हैं भइय्या, कुछ कारण होते हैं. वहां तो आंदोलन खड़ा हो गया, वहां तो असंतोष पैदा हो गया. प्रबोधन करना पड़ेगा, मन परिवर्तन करना पड़ेगा. हम समानता लाना चाहते हैं, लेकिन समाज में अस्थिरता पैदा हो जाती है. इसके साथ ही कहा कि राम मंदिर पर जल्‍द निर्णय आना चाहिए. राम मंदिर पर सरकार कानून बनाए.

उन्होंने कहा, 'शबरीमल्ला देवस्थान के सम्बंध में सैकड़ों वर्षों की परम्परा, जिसकी समाज में स्वीकार्यता है, उसके स्वरूप व कारणों के मूल का विचार नहीं किया गया। धार्मिक परम्पराओं के प्रमुखों का पक्ष, करोड़ों भक्तों की श्रद्धा, महिलाओं का बड़ा वर्ग इन नियमों को मानता है, उनकी बात नहीं सुनी गई।' 
संघ प्रमुख ने कहा, 'यह वर्ष श्रीगुरु नानक देव जी के प्रकाश का 550वां वर्ष है। उन्होंने अपने जीवन की ज्योति जलाकर समाज को अध्यात्म के युगानुकूल आचरण से आत्मोद्धार का नया मार्ग दिखाया, समाज को एकात्मता व नवचैतन्य का संजीवन दिया।' 
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर भागवत ने कहा,  'श्रीराम मंदिर का बनना स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है। मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा। राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के संदर्भ में अपने करोड़ों देशवासियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि पर राष्ट्र के प्राणस्वरूप धर्ममर्यादा के विग्रहरूप श्रीरामचन्द्र का भव्य राममंदिर बनाने के प्रयास में संघ सहयोगी है।
शहरी नक्‍सल
शहरी नक्‍सलवाद पर टिप्‍पणी करते हुए कहा कि नक्‍सलवाद हमेशा शहरी ही रहा है. इसका कंटेंट पाक, अमेरिका और क्या इटली से आता है? अर्बन नक्सल की कार्यपद्धित है, अर्बन नक्सल हमेशा अर्बन ही रहा है. छात्रावासों में जाओ, असत्य प्रचार करके भड़काओ, छोटे-छोटे आंदोलन करो. नेतृत्‍व को पहचान कर श्रंखला चलाओ. प्रचलित नेतृत्‍व को ढहा दो. मालिकों के बंदों को स्थापित करो. सभी जगह का इतिहास हमारे सामने है. बंदूक की नली से सत्ता तो आ गई, अर्बन माओवादी बड़े-बड़े शहरों में बुद्धिजीवी बन कर बैठे रहते हैं, ऐसे हजारों विद्वान खड़े हैं. द्वेष पैदा करना ही उनका उद्देश्‍य है, जहां जाएंगे भारत की निंदा करेंगे. आपस में सांठगांठ करके युद्ध चलाया जा रहा है, हम सभी के बीच, मानवशास्त्रीय युद्ध है.
इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि ऐसी घटनाएं ही ना घट पाएं ऐसी चौकसी समाज को भी रखनी पड़ेगी, शासन प्रशासन के साथ इन कारणों को मिटाने का तरीका यही है कि जनहित की योजनाएं अंत तक जाएं. फूट को स्थान नहीं मिलना चाहिए. अभी तक ब्रिटिशों का राज था, लेकिन हमें लोकतंत्र का पालन करना पड़ेगा. हमारा व्यवहार ही हमें बचाएगा, नियम कानून नहीं.
मोहन भागवत ने कहा कि उकसाने वाली शक्तियों से भी बचना होगा. संस्कार लाना चाहिए.  परिवार में संस्कार बनना चाहिए. क्या ये भारत वर्ष है, कड़ा कानून चाहिए बात ठीक है.... सरकार धीरे-धीरे चलती है. प्रशासन आराम से चलता है. जैसे लेट गाड़ी होती है ना, फिर करते-करते दो घंटे लेट हो जाती है. साढ़े 4 साल तो हो गए. घर को पक्का करना पड़ेगा, संस्कार लाना पड़ेगा.
इंटरनेट से तो सब आता है, लेकिन लेने वाले की मानसिकता क्या है इसकी तो कोई व्यवस्था ही नहीं है. जो आता है, खोलता है, मिल जाता है, कानून बनेगा, उसमें देर लगेगी, हम ऐसा वातावरण बनाएं कि देखने की इच्छा ही ना हो. क्या हमें घर की चिंता भी सरकार पर डाल देना चाहिए? उपाय, सद्भावना औऱ प्रेम के सिवाय कुछ भी नहीं है.
एकमात्र भारतीय सभ्यता ही विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के बावजूद अभी तक बची हुई है और वह हिन्दू बहुलता वाला एकमात्र देश है. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय के जीवन पर आधारित एक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम के दौरान भागवत ने उक्त बात कही.
सनातन धर्म शाश्वत है और कुछ अगर शाश्वत है तो वह हिन्दुत्व है. मालवीय जैसे व्यक्तित्वों की वजह से ही वह विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के बावजूद बची रही है.
भारत एकमात्र ऐसी सभ्यता है जो विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के बावजूद बचा रहा है जबकि अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में सब कुछ नष्ट हो गया. देश अभी भी हिन्दू बहुल है. उन्होंने इस पर जोर दिया कि मालवीय ने हमेशा आरएसएस के साथ संबंध बनाए रखे और वह उनके सिद्धांतों के विरूद्ध नहीं थे. उन्होंने कहा कि देश को अब भी मालवीय जैसे व्यक्तित्व की जरूरत है.
इससे पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि विपक्षी पार्टियां भी अयोध्या में राम मंदिर का खुलकर विरोध नहीं कर सकती क्योंकि वह देश की बहुसंख्यक जनसंख्या के इष्टदेव हैं. भागवत ने हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ में संघ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राममंदिर निर्माण के प्रति संघ और भाजपा की प्रतिबद्धता जाहिर की थी. साथ ही यह भी कहा कि कुछ कार्यों को करने में समय लगता है .
उन्होंने कहा, ' कुछ कार्य करने में देरी हो जाती है और कुछ कार्य तेजी से होते हैं वहीं कुछ कार्य हो ही नहीं पाते क्योंकि सरकार में अनुशासन में ही रहकर कार्य करना पडता है . सरकार की अपनी सीमायें होती हैं .' संघ प्रमुख ने कहा कि साधु और संत ऐसी सीमाओं से परे हैं और उन्हें धर्म, देश और समाज के उत्थान के लिये कार्य करना चाहिए .
पाकिस्‍तान
परोक्ष रूप से पाकिस्‍तान के संदर्भ में मोहन भागवत ने कहा कि सुरक्षा को लेकर हम सजग हैं. सरकार किसी की भी हो हम किसी से भी शत्रुता नहीं करते. लेकिन बचने के लिए उपाय तो करना पड़ेगा. वहां परिवर्तन के बाद भी कुछ बदलता नजर नहीं आ रहा है. अपनी सेना को संपन्न बनाना होगा ताकि हमारी सेना का मनोबल कम न हो, संतुलन को रखकर काम करना होगा. इसी कारण संपूर्ण विश्व में हाल में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है. लेकिन हम विश्वास पैदा करने के लिए हम गोली का जवाब गोली से देने की हिम्मत रखते हैं.
इसके साथ ही कहा कि सीमा पर सुरक्षा कर रहे परिवारों की रक्षा का दायित्व हमारा है, उनकी चिंता कौन करेगा, शासन ने कदम तो बढ़ाए लेकिन गति बढ़ाने की जरूरत है. ये विश्‍वास पैदा होना चाहिए जवानों में कि हम यहां रक्षा कर रहे हैं लेकिन हमारे परिवार की रक्षा शासन कर लेगा.
मोहन भागवत ने कहा कि शासन के साथ समाज का भी कुछ दायित्व है. हमें सोचना होगा कि क्‍या हमने अपना देश सरकार को सौंप दिया है? ऐसा इसलिए क्‍योंकि पहला दायित्व तो हमारा है, सरकार को तो हम ही चुन कर भेजते हैं. सीमा केवल भू-सीमा नहीं होती, सागरी सीमा भी है, आजकल अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इसका महत्व भी बढ़ गया है. सभी छोटे-छोटे द्वीपों की रक्षा होनी चाहिए क्‍योंकि भारत के सामर्थ्य को कम करने के लिए लोगों ने गले के चारों ओर फांस बनाने की कोशिश तो कर ही ली है.
कैलाश सत्यार्थी मुख्य अतिथि
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित और सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वार्षिक ‘‘विजयादशमी’’ समारोह में अतिथि हैं. कार्यक्रम का आयोजन नागपुर के रेशमीबाग मैदान में आयोजित किया जा रहा है. उल्‍लेखनीय है कि मोहन भागवत ने पिछले वर्ष रोहिंग्या संकट, गोरक्षा, जम्मू-कश्मीर और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए थे.