आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
केरल के विवादित सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यहां विरोध प्रदर्शन शुरू है। यहां हर रोज की तरह आज भी श्रद्धालुओं और प्रदर्शनकारियों का तांता लगा हुआ है। इस बीच लगभग 250 पुलिसकर्मी के साथ सुरक्षा से लैस हैदराबाद की एक टीवी पत्रकार कविता जक्काल मंदिर की तरफ बढ़ रही है। उनके साथ खुद केरल के आईजी श्रीजीत भी हैं। मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं और प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है।
परंपरा और फैसले के बीच जंग
अगर महिला टीवी पत्रकार कविता जक्काल मंदिर में सफलतापूर्वक प्रवेश कर जाती है तो ऐतिहासिक रूप से वह सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिला होंगी। वहीं प्रदर्शनकारी विरोध प्रदर्शन करने के दौरान जोर-जोर से अयप्पा भगवान के नारे भी लगा रहे हैं। मंदिर के बाहर इनकी भीड़ को देखते हुए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था भी किए गए हैं।
आईजी ने संभाला मोर्चा, कहा-
इस बीच आईजी श्रीजीत प्रदर्शनकारियों से बात करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि हम यहां आपको कोई नुकसान पहुंचाने नहीं आए हैं। हम बस कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यहां मौजूद हैं। कृप्या हमारी तैयारियों को देखकर गलतफहमी ना पालें। हमारा उद्देश्य आपको चोट पहुंचाना नहीं है। हम भी भगवान अयप्पा के मानने वाले हैं। लेकिन हमें कोर्ट के आदेश को भी मानना है। हम कानून से बंधे हैं।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों से पूछा कि आप राज्य सरकार से और क्या वादा चाहते हैं? हम केवल आपके विश्वास की रक्षा नहीं कर सकते हमें कानून व्यवस्था की भी रक्षा करनी है। आप एक कोने में बैठकर अपने नारे लगा सकते हैं। लेकिन हमें अपना काम करने दें। दरअसल प्रदर्शनकारी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा रहे हैं। उनका कहना है कि वे इसके लिए अपनी जान भी देने को तैयार हैं।
पम्बा से सन्निधानम की ओर जा रही कविता के साथ कई पुलिसकर्मी भी हैं। उनमें आईजी श्रीजीत भी शामिल थे। 200 पुलिसकर्मियों के साथ कविता नीलिमाला तक पहुंची जो मुख्य मंदिर से तीन किमी दूर है। कविता के साथ कोच्चि की एक अन्य स्थानीय महिला भी थी। जानकारी के मुताबिक कविता के साथ एक महिला कार्यकर्ता रेहना फातिमा भी हैं।
सन्निधानम स्थित सबरीमाला मंदिर में आए एक श्रद्धालु ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कहना सही है कि महिला और पुरुष सभी बराबर हैं। लेकिन यहां की एक संस्कृति है कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को यहां मंदिर में प्रवेश करने देने की अनुमति नहीं है। ये हमारा रिवाज है। चूंकि भारत एक रीति-रिवाजों वाला देश है तो हमें अपने इन रिवाजों को मानना होगा।
पुणे से महिला कार्यकर्ता हिरासत में
इसी मामले से संबंधित पुणे में कार्यकर्ता त्रुप्ति देसाई को शुक्रवार को हिरासत में लिया गया। उन्होंने कल अहमदनगर एसपी को लेटर लिखा था कि वे पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सबरीमाला मंदिर मुद्दे पर चर्चा करना चाहती हैं। उसने पीएम मोदी के काफिले को रोकने की धमकी भी दी थी। उसका कहना था कि प्रदर्शन करना हमारा संवैधानिक अधिकार है।
इस बीच सन्निधानम से प्रदर्शन की लगातार खबरें आ रही हैं। प्रदर्शनकारी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि किसी भी महिला को मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा , हम सबरीमाला की रक्षा कर रहे हैं।
सबरीमला मंदिर क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है?
केरल में सबरीमला के मशहूर स्वामी अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे विवाद के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित एक्टिविस्ट भी कम से कम एक बार यहां घुसने को बेताब हैं। इस बात को समझने के लिए हमें केरल के इतिहास और यहां इस्लामी और राज्य में बीते 4-5 दशक से चल रही ईसाई धर्मांतरण की कोशिशों को भी समझना होगा। मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था को तोड़ना है, ताकि इस पूरे इलाके में बसे लाखों हिंदुओं को ईसाई और इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों में लाया जा सके। केरल में चल रहे धर्मांतरण अभियानों में सबरीमला मंदिर बहुत बड़ी रुकावट बनकर खड़ा है। पिछले कुछ समय से इसकी पवित्रता और इसे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा था। लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही थी। लेकिन आखिरकार महिलाओं के मुद्दे पर ईसाई मिशनरियों ने न सिर्फ सबरीमला के अयप्पा मंदिर बल्कि पूरे केरल में हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सबसे बड़ी चाल चल दी है।
सबरीमला के इतिहास को समझिए
1980 से पहले तक सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता था। केरल और कुछ आसपास के इलाकों में बसने वाले लोग यहां के भक्त थे। 70 और 80 के दशक का यही वो समय था जब केरल में ईसाई मिशनरियों ने सबसे मजबूती के साथ पैर जमाने शुरू कर दिए थे। उन्होंने सबसे पहला निशाना गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को बनाया। इस दौरान बड़े पैमाने पर यहां लोगों को ईसाई बनाया गया। इसके बावजूद लोगों की मंदिर में आस्था बनी रही। इसका बड़ा कारण यह था कि मंदिर में पूजा की एक तय विधि थी। जिसके तहत दीक्षा आधारित व्रत रखना जरूरी था। सबरीमला उन मंदिरों में से है जहां पूजा पर किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं। किसी भी जाति का हिंदू पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करके मंदिर में प्रवेश पा सकता था। सबरीमला में स्वामी अयप्पा को जागृत देवता माना जाता है। यहां पूजा में जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है। मान्यता है कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं। जो लोग व्रत को ठीक ढंग से नहीं पूरा करते उन्हें यह दर्शन नहीं होते। जिसे एक बार इस चंद्रमा के दर्शन हो गए माना जाता है कि उसके पिछले सभी पाप धुल जाते हैं।
सबरीमला से आया सामाजिक बदलाव
सबरीमला मंदिर की पूजा विधि देश के बाकी मंदिरों से काफी अलग और कठिन है। यहां दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा दी जाती है। इस दौरान रुद्राक्ष जैसी एक माला पहननी होती है। साधक को रोज मंत्रों का जाप करना होता है। इस दौरान वो काले कपड़े पहनता है। जमीन पर सोता है। जिस किसी को यह दीक्षा दी जाती है उसे स्वामी कहा जाता है। यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा। इसके बजाय वो स्वामी कहलाएगा। इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया। मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाए। ऐसे लोगों का समाज में बहुत ऊंचा स्थान माना जाता है। यानी यह मंदिर एक तरह से जाति-पाति को तोड़कर भगवान के हर साधक को वो उच्च स्थान देने का काम कर रहा था जो कोई दूसरी संवैधानिक व्यवस्था कभी नहीं कर सकती।
ईसाई मिशनरियों के लिए मुश्किल
सबरीमला मंदिर में समाज के कमजोर तबकों की एंट्री और वहां से हो रहे सामाजिक बदलाव ने ईसाई मिशनरियों के कान खड़े कर दिए। उन्होंने पाया कि जिन लोगों को उन्होंने धर्मांतरित करके ईसाई बना लिया वो भी स्वामी अयप्पा में आस्था रखते हैं और कई ने ईसाई धर्म को त्यागकर वापस सबरीमला मंदिर में ‘स्वामी’ के तौर पर दीक्षा ले ली। यही कारण है कि ये मंदिर ईसाई मिशनरियों की आंखों में लंबे समय से खटक रहा था। अमिताभ बच्चन, येशुदास जैसे कई बड़े लोगों ने भी स्वामी अयप्पा की दीक्षा ली। इन सभी ने भी मंदिर में रहकर दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा ली। इस दौरान उन्होंने चप्पल पहनना मना होता था। और उन्हें भी उन्हीं रास्तों से गुजरना होता था जहां उनके साथ कोई रिक्शेवाला, कोई जूते-चप्पल बनाने वाला स्वामी चल रहा होता था। नतीजा यह हुआ कि ईसाई संगठनों ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर ‘चंद्र दर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे। ईसाई धर्म के इस फर्जीवाड़े के बावजूद सबरीमला मंदिर की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को मुद्दा बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी। यह याचिका हिंदू नाम वाले कुछ ईसाइयों और एक मुसलमान की तरफ से डलवाई गई।

1980 में सबरीमला मंदिर के बागीचे में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था। ( देखें तस्वीर) उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है। इसलिए यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिए। उस वक्त आरएसएस के नेता जे शिशुपालन ने इस क्रॉस को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था और वो इसमें सफल भी हुए। इस आंदोलन के बदले में राज्य सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया।
केरल में हिंदुओं पर सबसे बड़ा हमला
केरल के हिंदुओं के लिए यह इतना बड़ा मसला इसलिए है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है। राज्य में हिंदू धर्म को बचाने का उनके लिए यह आखिरी मौका है। केरल में गैर-हिंदू आबादी तेज़ी के साथ बढ़ते हुए 35 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है। अगर सबरीमला की पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो ईसाई मिशनरियां प्रचार करेंगी कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं। ऐसे में ‘चंद्र दर्शन’ कराने वाली उनकी नकली दुकानों में भीड़ बढ़ेगी। नतीजा धर्मांतरण के रूप में सामने आएगा। यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। क्योंकि जिन तथाकथित महिला एक्टिविस्टों ने अब तक मंदिर में प्रवेश की कोशिश की है वो सभी ईसाई मिशनरियों की करीबी मानी जाती हैं। जबकि जिन हिंदू महिलाओं की बराबरी के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है वो खुद ही उन्हें रोकने के लिए मंदिर के बाहर दीवार बनकर खड़ी हैं।