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महात्मा गाँधी के चारों तरफ महिलाएं होती थीं, मोहन भागवत के साथ क्यों नहीं?--राहुल गाँधी

अपने विवादित बोलों के लिए चर्चित राहुल गाँधी कब क्या बोल दें, कुछ नहीं पता, परिणाम यह होता है कि बाद में परिवारभक्तों को सफाई देने आना होता है। एक बात समझ नहीं जिस नेता की वजह से पार्टी नितरोज गड्डे में जा रही है, ऐसे नेता को पार्टी बाहर क्यों नहीं करती। 
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सितम्बर 14 को अखिल भारतीय महिला कांग्रेस समिति को समर्पित एक नए लोगो का अनावरण किया। इस दौरान राहुल गांधी ने केंद्र के खिलाफ विचारधाराओं में अंतर सहित कई विषयों को लेकर अपनी बात रखी, भाजपा के सिद्धांतों पर सवाल उठाया।

आरएसएस की विचारधाराओं पर हमला करते हुए राहुल गांधी ने कहा, “जिस आदमी ने हिंदू धर्म को समझा और उसे अमल में लाया, वह महात्मा गांधी है। अगर महात्मा गांधी हिंदू धर्म को समझते थे, तो आरएसएस की विचारधारा ने उनके सीने में 3 गोलियां क्यों चलाईं? महात्मा गांधी इसका उदाहरण हैं। उन्होंने अहिंसा को सबसे उचित रूप से समझा, और अहिंसा हिंदू धर्म की नींव है। 

राहुल गांधी ने कहा, मैं अन्य विचारधाराओं के साथ समझौता कर सकता हूं, लेकिन मैं आरएसएस और भाजपा की विचारधारा से कभी समझौता नहीं कर सकता।” इसके बाद राहुल गांधी ने अपने संबोधन में दावा किया कि भाजपा वाले जहां भी जाते हैं, एक जगह, यहाँ वे लक्ष्मी को मारते हैं, वहाँ वे दुर्गा को मारते हैं।”

https://fb.watch/81Rj4_G2Fq/

राहुल गांधी ने बीजेपी को ‘नकली हिंदू’ बताते हुए कहा, “वे किस तरह के हिंदू हैं? वे हिंदुओं का उपयोग करते हैं, वे धर्म का व्यापार करते हैं लेकिन वे हिंदू नहीं हैं।” इसके अतिरिक्त, उन्होंने टिप्पणी की, “जब आप (महात्मा) गांधी की तस्वीर देखते हैं, तो आप उनके चारों ओर 2-3 महिलाएं देखेंगे। क्या आपने मोहन भागवत की किसी महिला के साथ तस्वीर देखी है?”

हिंदू-मुस्लिम का डीएनए एक है तो …..

डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत

भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करेंगे, समान नागरिक संहिता लाएंगे, जनसंख्या नियंत्रण के लिए कठोर कानून लाया जाएगा, मुस्लिम तुष्टिकरण की चल रही राजनीतिक परंपरा को समाप्त किया जाएगा , ‘यदि भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम कहना होगा’ – इन जैसे अन्य कई नारे या जनता को दिए गए वचन लगता है आरएसएस और भाजपा के लिए सत्ता प्राप्ति का एकमात्र साधन थे। देश के लोगों ने भाजपा को रोजी रोटी की दैनिक चिंताओं से ऊपर उठकर इसलिए अपना वोट दिया था कि वह सत्ता में आकर उन समस्याओं से देश को स्थाई समाधान प्रदान करेंगे जो इस समय देश के लिए जी का जंजाल बन चुकी हैं।

परंतु यथार्थ में ऐसा हुआ नहीं, अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू मुस्लिम का डीएनए एक होने की बात कहकर नए प्रश्नों को जन्म दे दिया है। 

अगर हिन्दू मुसलमानों का डीएनए एक है, डॉ भगवत फिर अब से पहले किसी ने इस मुद्दे को क्यों नहीं उठाया? यह तो वही बात हो गयी, कि महात्मा गाँधी "ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, रघुपति राघव राजा राम" कहकर हिन्दुओं को गुमराह करते रहे थे, वही काम अब संघ भी कर रहा है, आखिर कब तक हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दुओं को छला जाता रहेगा? कब तक हिन्दुओं की अस्मिता से खिलवाड़ होता  रहेगा? अगर दोनों का डीएनए एक है, फिर किस आधार पर अयोध्या में राममंदिर का विरोध किया जा रहा था? क्यों जगह-जगह विरोध की आड़ में हिन्दू मंदिरों को तोडा गया? क्या संघ भी अब कांग्रेस और अन्य पार्टियों की भांति किसी भी विवाद के लिए हिन्दुओं को ही दोषी करार देगी? कुसी की खातिर कितना नीचे गिरा जा सकता है।       

 

आरएसएस और भाजपा के लोग ही थे जो जनता को बताया करते थे कि मुसलमान कभी इस देश का नहीं हो सकता, क्योंकि उसका चिंतन और चरित्र दोनों ही इस देश के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए अनुमति नहीं देते। उसकी आस्था काबा में है इसलिए भारत के प्रति वह कभी भी आस्थावान या निष्ठावान नहीं हो सकता। तब ये लोग मजहब के आधार पर इस्लाम को यह कहकर कोसा करते थे कि इसके आक्रमणकारियों ने भारत की संस्कृति और धर्म का सत्यानाश कर दिया। भारत के लोगों को इनके द्वारा तब यह भी समझाया जाता था कि दारुल हरब और दारुल इस्लाम मुसलमानों के डीएनए की मौलिक सोच है। कहने का अभिप्राय है कि उस समय भाजपा और आरएसएस दोनों ही हिंदू समाज को यह बता रहे थे कि हिंदू और मुसलमान का डीएनए अलग है, पर आज अचानक कुछ दूसरी बात हो गई लगती है । मुसलमान अपने मूलतत्ववाद अर्थात मौलिक चिंतन या मौलिक डीएनए के आधार पर संसार में उपद्रव, उत्पात और उग्रवाद की खेती करते हैं। इसलिए संघ का यह स्पष्ट संदेश और आवाहन रहता था कि भारत को इनसे बचाने के लिए उसे यथाशीघ्र हिंदू राष्ट्र घोषित करना पड़ेगा।
अब उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव 2022 के दृष्टिगत अचानक आरएसएस और भाजपा के नेताओं के स्वरों में बदलाव दिखाई दे रहा है। इसी बदलाव के अंतर्गत आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदू और मुस्लिम का डीएनए एक है। डीएनए का अभिप्राय यदि मानवतावादी संस्कार से है तो यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि हिंदू मुस्लिम का डीएनए एक ही है। दारुल हरब और दारुल इस्लाम के अपने मूलतत्ववाद के वशीभूत होकर इस्लाम को मानने वाले लोग आज भी संसार में उत्पात और उग्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं । भारत भी आजादी के बाद से निरंतर मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होता रहा है, जिसमें केवल और केवल इस्लाम की मौलिक सोच में समाविष्ट वितण्डावाद ही एकमात्र कारण है। इस्लाम के इस सच को मोहन भागवत भली प्रकार जानते हैं। उसके बाद भी वह बिल्ली को देखकर कबूतर की तरह आंख बंद कर रहे हैं तो यह उचित नहीं कहा जा सकता। जो लोग सोए हुए हिंदू समाज की आंखें खोलने का काम कर रहे थे, वही अब स्वयं सोने का काम कर रहे हैं ।जब मुंसिफ ही कातिल हो जाए तो क्या कहा जा सकता है ?

माना जा सकता है कि 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत मोहन भागवत का यह बयान कूटनीतिक आधार पर दिया गया बयान है। इस पर हमारा मानना है कि संघ चाहे कितना ही प्रयास कर ले लेकिन कोई भी मुसलमान उसके साथ आकर खड़ा नहीं हो सकता । क्योंकि मुसलमान का किसी भी राष्ट्र इस राष्ट्र की संस्कृति के प्रति कोई लगाव नहीं होता। अंबेडकर जी के शब्दों में उसका भ्रातृत्व भी केवल अपने मुस्लिम भाइयों तक सीमित होता है। गैर मुस्लिमों को बेवफाई नहीं मानता। वह कभी भी हिंदू राष्ट्र या हिंदू विचारधारा या भारतीय राष्ट्र की हिंदूवादी मान्यताओं के प्रति आस्थावान नहीं हो सकता। इसलिए कूटनीतिक जाल उन पर फेंकना किसी भी दृष्टिकोण से वाणी विलास के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। यदि कूटनीति की बात की जाए तो मुसलमान इस समय अपनी कूटनीति में सफल हो रहा है और वह हिन्दू समाज के अंग दलित वर्ग को बहुत तेजी के साथ अपने साथ ले जा रहा है। इस कूटनीति को समझते हुए मोहन भागवत जैसे नेताओं को प्रयास करना चाहिए कि अपने दलित भाइयों को अपने साथ लगाएं और हिंदू एकता के आधार पर सत्ता संचालन का कार्य सुनिश्चित करें। यह ध्यान रहे कि मुसलमानों को दलितों के साथ जाने देने में उनका वर्तमान बयान भी सहायक सिद्ध होगा।

मोहन भागवत जी को यह बात समझनी चाहिए कि इस देश की आम सहमति उनसे किसी प्रकार की ऐसी कूटनीति की अपेक्षा नहीं करता जिसका बुरा प्रभाव भारतीय जनमानस या राष्ट्रवाद पर पड़े । इसके विपरीत भारतीय आम सहमति भारत के इन महान नेताओं से यही अपेक्षा करती है कि वह समान नागरिक संहिता लागू करें, पर्सनल ला की वकालत करने वाले लोगों को कड़ा संदेश दें, इसके साथ ही जनसंख्या नियंत्रण को लाकर इस देश की सत्ता पर अपनी हुकूमत कायम कर ‘हिंदू विनाश’ के सपने संजोने वाले लोगों की मानसिकता को कुचलने का कार्य करें । आरएसएस राष्ट्र निर्माण के लिए है , वह दोगली बातों के आधार पर देश विरोधी शक्तियों को प्रोत्साहित करने वाली सोच से अलग मानी जाती है। निश्चित रूप से उसे अपनी सोच का परिचय देना चाहिए। आरएसएस प्रमुख को कूटनीति अवश्य अपनानी चाहिए लेकिन इस बात का ध्यान रखते हुए कि उससे हिंदू राष्ट्र निर्माण की दिशा में कार्य हो ना कि हिंदू विनाश के लिए आधारशिला रखी जाए। कूटनीति के आधार पर सबको साथ लेकर चलने की बातें कांग्रेस ने करनी आरंभ की थीं. उसका परिणाम क्या निकला ? – तुष्टीकरण । इसी तुष्टीकरण को यदि मोहन भागवत जी अपनी कूटनीति का आधार बना रहे हैं तो देश इसे स्वीकार नहीं करेगा। कूटनीति इसमें नहीं है कि आप दोनों का डीएनए एक बता दें, बल्कि कूटनीति इसमें है कि कुरान की उन 24 आयतों को बड़ी सावधानी के साथ निकालने के लिए मुस्लिमों को तैयार कर लिया जाए जो देश में ही नहीं बल्कि संसार में उग्रवाद और आतंकवाद को बढ़ावा देती हैं। क्या मोहन भागवत जी ऐसा कर पाएंगे?

जिन लोगों ने दीर्घकाल तक भारत में खून खराबा आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा के माध्यम से लाखों करोड़ों हिंदुओं का कत्ल किया उनका डीएनए कत्लोगारत का डीएनए तो हो सकता है, इंसानियत का डीएनए कभी नहीं हो सकता। जो लोग आज भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से हिंदुओं को चुन चुन कर भगा रहे हैं, उनकी बहू बेटियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं, कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को जिन्होंने भगाने का काम किया है और जो आज भी धारा 370 और 35a को स्थापित करने की मांग कर रहे हैं, उन लोगों का डीएनए भारत के हिंदू समाज के मानवतावादी और उधार डीएनए के समान नहीं हो सकता।
वास्तव में डीएनए एक सोच है, एक कार्यशैली है, एक विचारधारा है, एक संस्कार है। यह सब मिलकर व्यक्ति की जीवन शैली व कार्य व्यवहार का निर्धारण करते हैं ।भारत में इस्लाम के मानने वाले और वैदिक हिंदू धर्म के मानने वाले एक ही मिट्टी से बने होकर भी अपने इन मानवीय गुणों के कारण अपनी विशिष्ट जीवन शैली, कार्य व्यवहार और कार्य योजना को अलग – अलग रखते हुए देखे जाते हैं। जहां हिंदू अपनी उदारता विनम्रता और मानवतावादी सोच के कारण अपने मानवीय संस्कारों को प्रबलता प्रदान करता है ,वहीं कुरान में आस्था रखने वाले मुसलमान कुरान की 24 आयतों से ऊर्जा लेते हुए देखे जाते हैं, जो गैर मुस्लिमों के खिलाफ मुसलमानों को उकसाती हैं और हिंसा करने के लिए प्रेरित करती हैं।
मोहन भागवत जी जैसे बड़े कद के नेता को यह बात पता होगी कि डीएनए व्यक्ति की अंतरंग जगत की गहराइयों में रचने बसने वाली चीज है और अंतरंग जगत में रचने बसने वाली इसी चीज से लोग प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त करके अपने बाहरी जगत के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। क्या मोहन भागवत जी हिंदू और मुस्लिम दोनों के डीएनए के एक होने की बात कहकर दोनों समुदाय के लोगों को एक मंच पर एक साथ बैठा कर भारत माता की जय और वंदे मातरम का उद्घोष करा सकते हैं ? यदि नहीं तो उन्हें ऐसी भ्रामक बातों को कहने से पहले 10 बार सोचना चाहिए ।राजनीति और सत्ता ही सब कुछ नहीं है। संघ वैसे भी सत्ता के लिए पैदा नहीं हुआ है। यह एक आंदोलन है ,जो बड़ी से बड़ी ताकत के विरुद्ध आवाज बुलंद करने का हौसला रखता रहा है । इसके इस चरित्र को बदलने का प्रयास यदि कोई मोहन भागवत जैसा नेता करता है तो यह सच में दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने यह भी कहा है कि यह सिद्ध हो चुका है कि हम 40 हजार साल से एक ही पूर्वज के वंशज हैं। उनके ऐसा कहने से कुछ ऐसा आभास होता है कि वह भारत जैसे सत्य सनातन राष्ट्र और सत्य सनातन वैदिक धर्म की अवस्था 40000 वर्ष ही मानते हैं । जबकि यह राष्ट्र करोड़ों वर्ष पुराना है। सृष्टि के प्रारंभ में भी आर्यावर्त था और आज भी है। इस सच को 40000 वर्ष के कालखंड में मोहन भागवत जी ने कैसे समेट दिया ? – कुछ समझ नहीं आया। यह तब और भी अधिक विचारणीय हो जाता है जब संघ प्रतिवर्ष हिंदू नव वर्ष के अवसर पर वैदिक सृष्टि संवत का बार-बार उल्लेख करता है।

मोहन भागवत का बयान और अखण्ड भारत

 

ललित गर्ग

बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनैतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत जब हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर करते हुए कहा है कि संघ भले हिन्दुओं का संगठन है, लेकिन वह दूसरे धर्म वालों से नफरत नहीं करता। सभी भारतीयों का डीएनए एक है, के कथन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के आपत्ति एवं असहमति के स्वर राष्ट्रीय एकता की बड़ी बाधा है। अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का आदर्श रहा है। यहां अनेक धर्म, संप्रदाय, जाति, वर्ण, प्रांत एवं राजनैतिक पार्टियां हैं, भिन्नता और अनेकता होने मात्र से सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय एकता को विघटित नहीं किया जा सकता। निश्चित ही मेवाड़ विश्वविद्यालय में दिया गया मोहन भागवत का उद्बोधन देश की एकता को बल देने का माध्यम बनेगा, देश के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय परिवेश को एक नया मोड़ देगा। यह एक दिशासूचक बना है, गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, यह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है। यह कुतुबनुमा है, जो हर स्थिति में सही दिशा एवं दृष्टि को उजागर करता रहेगा।

2022 में उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसके चलते तमाम कट्टरपंथियों सहित पूरी "छद्दम सेक्युलर जमात" एक वर्ग विशेष के मन में आरएसएस और भाजपा के विरुद्ध नफरत और घृणा का ज़हर भर रही है। पिछले कुछ समय से प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगे भड़काने की भी कई कोशिशें हो चुकी हैं, जिन्हें योगी सरकार की सूझबूझ के चलते नाकाम कर दिया गया। दरअसल हिन्दू विरोधी मानसिकता के लोगों का यह षड्यंत्र है कि प्रदेश में सुनियोजित तरीके से दंगा भड़काकर उसका पूरा ठीकरा आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदुवादी संगठनों पर फोड़ दिया जाए। ठीक उसी प्रकार जैसे कि दिल्ली दंगों का ठीकरा कपिल मिश्रा सहित कुछ भाजपा नेताओं के सर पर मढ़ दिया गया था।

ऐसे में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कोई भी बयान अंतराष्ट्रीय स्तर पर देखा-सुना और विश्लेषित किया जाना स्वाभाविक है। और विपक्ष किसी ऐसे ही बयान की तलाश में है जिसे मुद्दा बनाकर पूरे विश्व में आरएसएस और भाजपा की छवि को धूमिल किया जा सके और येन-केन प्रकारेण "भगवा आतंक" की परिकल्पना को मूर्तरूप दिया जा सके।

यदि आप इस पूरे षड्यंत्र को बिना पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए गम्भीरता और निष्पक्षता के साथ समझने का प्रयास करेंगे तो शायद आप संघ प्रमुख की रणनीति की सराहना किये बिना नहीं रह सकेंगे।

विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, वर्ग के लोगों का एक साथ रहना भारतीय लोकतंत्र का सौन्दर्य है, राजनीतिक स्वार्थों के चलते इस सौन्दर्य को नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय एकता को खंडित करता है। भिन्नताओं का लोप कर सबको एक कर देना असंभव है। ऐसी एकता में विकास के द्वार भी अवरुद्ध हो जाते हैं। लेकिन अनेकता भी वही कीमती है, जो हमारी मौलिक एवं राष्ट्रीय एकता को किसी प्रकार का खतरा पैदा न करे। जैसे एक वृक्ष की अनेक शाखाओं की भांति एक राष्ट्र के अनेक प्रांत हो सकते हैं, उसमें अनेक जाति एवं धर्म के लोग रह सकते हैं, पर उनका विकास राष्ट्रीयता की जड़ से जुड़कर रहने में है, जब भेद में अभेद को मूल्य देने की बात व्यावहारिक बनेगी, उसी दिन राष्ट्रीय एकता की सम्यक् परिणति होगी और उसी दिन भारत अखंड बनेगा।

मोहन भागवत ने कहा कि अगर कोई हिंदू कहता है कि यहां कोई मुसलमान नहीं रहना चाहिए, तो वह व्यक्ति हिंदू नहीं है। गाय एक पवित्र जानवर है लेकिन जो लोग दूसरों को मार रहे हैं वे हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे हैं। कानून को बिना किसी पक्षपात के उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। हिंदू-मुस्लिम एकता शब्द ही भ्रामक है। हिंदू-मुस्लिम अलग हैं ही नहीं, हमेशा से एक हैं। जब लोग दोनों को अलग मानते हैं तभी संकट खड़ा होता है। हमारी श्रद्धा आकार और निराकार दोनों में समान है। हम मातृभूमि से प्रेम करते हैं क्योंकि ये यहां रहने वाले हर एक व्यक्ति को पालती आई है और पाल रही है। जनसंख्या के लिहाज से भविष्य में खतरा है, उसे ठीक करना पड़ेगा। भारत को यदि विश्वगुरु बनाना है तो अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की शब्दों की लड़ाई में नहीं पड़ना होगा। अल्पसंख्यकों के मन में यह बिठाया गया है कि हिंदू उनको खा जाएंगे। अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज आंखों से पट्टी हटाए और सबको गले लगाए। कट्टरता को छोड़कर आपसी भाई-चारे की राह अपनाए। यही एक आदर्श स्थिति की स्थापना है और इसी के प्रयास में संघ जुटा है।

संघ सिर्फ राष्ट्रवाद के लिए काम करता है। राजनीति स्वयंसेवकों का काम नहीं है। संघ जोड़ने का काम करता है, जबकि राजनीति तोड़ने का हथियार बन जाती है। राजनीति की वजह से ही हिंदू-मुस्लिम एक नहीं हो सके हैं। बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनैतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत जब हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे। इस कोशिश से यही प्रकट हुआ कि कुछ लोगों की दिलचस्पी इसमें है कि हिंदू-मुस्लिम के बीच की दूरी खत्म न हो। इस संदर्भ में संघ प्रमुख ने यह सही कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें इस अर्थ में भ्रामक हैं, क्योंकि वे तो पहले से ही एकजुट हैं और उन्हें अलग-अलग देखना सही नहीं। कायदे से इसका स्वागत करते हुए अपने-अपने स्तर पर ऐसी कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय समाज एकजुट हो और उसके बीच जो भी वैमनस्य है, जो भी दूरियां हैं, वह खत्म हो। निःसंदेह कुछ लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते और इसीलिए किसी ने संघ की कथनी-करनी में अंतर का उल्लेख किया तो किसी ने भीड़ की हिंसा का जिक्र।

विडम्बनापूर्ण है कि अपने देश में इस तरह की सीधी-सच्ची एवं आदर्श की बात पर भी सस्ती राजनीति की जा रही है, इसका उदाहरण है भागवत के इस प्रेरक एवं क्रांतिकारी उद्बोधन पर आपत्ति और असहमति भरी प्रतिक्रिया का होना। मायावती और असदुद्दीन ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह ने जैसी प्रतिक्रिया दी, उससे विरोध के लिए विरोध वाली मानसिकता का ही परिचय मिला। इनमें से किसी ने भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि मोहन भागवत अपने इस कथन के जरिये सभी देशवासियों में एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारे की भावना का संचार करने के साथ यह रेखांकित करना चाह रहे थे कि भारत के लोगों में जाति, मजहब, पूजा-पद्धति की कितनी भी भिन्नता हो, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे सब इस देश की संतान हैं और सबके पूर्वज एक हैं। इस विचार में ऐसा कुछ भी नहीं कि उस पर आपत्ति जताई जाए। बावजूद इसके किसी-न-किसी बहाने आपत्ति जताई गई और विमर्श को खास दिशा में मोड़ने की कोशिश की गई। इसका मकसद लोगों को गुमराह करना और अपने वोट बैंक को साधने के अलावा और कुछ नहीं नजर आता। ऐसा लगता है कतिपय राजनीतिक दलों की राजनीति एवं उनकी सोच विकृत हैं, उनका व्यवहार झूठा है, चेहरों पर ज्यादा नकाबें ओढ़ रखे हैं, उन्होंने सभी आदर्शों एवं मूल्यों को धराशायी कर दिया है। देश के करोड़ों लोग देश के भविष्य को लेकर चिन्तित हैं। वक्त आ गया है कि देश की साझा संस्कृति, गौरवशाली विरासत को सुरक्षित रखने के लिये भागवत जैसे शिखर व्यक्तियों को भागीरथ प्रयास करने होंगे, दिशाशून्य हुए नेतृत्व के सामने नया मापदण्ड रखना होगा। आज कोई ऐसा नहीं, जो धर्म की विराटता दिखा सके। सम्प्रदायविहीन धर्म को जीकर बता सके। समस्या का समाधान दे सके, विकल्प दे सके। जो कबीर, रहीम, तुलसी, मीरा, रैदास बन सके।

एक शुभ शुरुआत भी इसी दृष्टि से होने जा रही है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिखर व्यक्ति एवं मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक डॉ. इंद्रेश कुमार के नेतृत्व में 15 अगस्त 2021 से 15 अगस्त 2022 तक देश के आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाने एवं इस दौरान मुस्लिम संगठनों के साथ मिलकर 500 कार्यक्रमों का आयोजन करने की योजना है। इसके माध्यम से अखंड भारत के लक्ष्य को साधने का प्रयास होगा। मुस्लिम समाज के लोगों को यह समझाया जाएगा कि हमारी पूजा पद्धति भले अलग हो, लेकिन हम सब एक हैं। यही अखंड भारत की परिकल्पना है।

इंद्रेश सहित समस्त संघ परिवार इस बात से भी परिचित है कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सदस्य तक भाजपा को वोट तक नहीं देते। यह कोई आरोप नहीं, कटु सत्य है, जिसे यदा-कदा प्रमाण सहित प्रकाशित भी किया जाता रहा है। संक्षिप्त में, उस लेख के स्पष्ट लिखा था कि इस मंच का पदाधिकारी और सीताराम बाजार भाजपा अध्यक्ष के पोलिंग बूथ से भाजपा को जीरो वोट मिला था। इतना ही नहीं, हिन्दू क्षेत्रों से जीतते आ रहा भाजपा उम्मीदवार को मुस्लिम क्षेत्र में आकर अपनी जमानत जब्त करवानी पड़ती है।  

सांप्रदायिक एवं राजनीतिक स्वार्थ के उन्माद में उन्मत्त व्यक्ति कृत्य-अकृत्य के विवेक को खो देता है। इस संदर्भ में भागवत का सापेक्ष चिंतन रहा है। व्यक्ति अपने-अपने मजहब की उपासना में विश्वास करे, इसमें कोई बुराई नहीं, पर जहां एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के प्रति द्वेष और घृणा का प्रचार करते हैं, वहां देश की मिट्टी कलंकित होती है, राष्ट्र शक्तिहीन होता है तथा व्यक्ति का मन अपवित्र बनता है। राष्ट्रीय एकता को सबसे बड़ा खतरा उन स्वार्थी राष्ट्र नेताओं से है, जो केवल अपने हित की बात सोचते हैं। देश-सेवा के नाम पर अपना घर भरते हैं, तथा धर्म, संप्रदाय, वर्ग आदि के नाम पर जनता को बांटने का प्रयत्न करते हैं। पूरे विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम की शिक्षा देने वाला भारत आज इन्हीं ओछी राजनीति करने वालों के कारण अपनों से कटकर दीनहीन होता जा रहा है। राजनीतिक स्वार्थ का दैत्य उसे नचा रहा है। क्या इस देश की मुस्लिम जनता सौहार्द एवं भाईचारे की भूमिका पर खड़ी होकर नहीं सोच सकती? दलगत राजनीति और साम्प्रदायिक समस्याओं को उभारने में सक्रिय भूमिका निभाने वाले राजनीतिक दल अपने-अपने दल की सत्ता स्थापित करने के लिए कभी-कभी वे काम कर देते हैं, जो राष्ट्र के हित में नहीं है। सत्ता को हथियाने की स्पर्धा होना अस्वाभाविक नहीं है पर स्पर्धा के वातावरण में जैसे-तैसे बहुमत और सत्ता पाने की दौड़ में राष्ट्रीय एकता को नजरअंदाज करना कैसे औचित्यपूर्ण हो सकता है?(साभार : उगता भारत)

ओवैसी साहब किस मुगालते में कह रहे हो "भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था, ना है और न ही कभी बनेगा"?

 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान से भड़के ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि भारत न कभी हिन्दू राष्ट्र था, ना है और न ही कभी बनेगा
आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत पर निशाना साधते हुए ओवैसी ने कहा कि मोहन भागवत भारत को हिन्दू राष्ट्र बताकर मेरे इतिहास को मिटा नहीं सकते हैं। आरएसएस सरसंघचालक भागवत यह नहीं कह सकते हैं कि हमारी संस्कृति, आस्था, पंथ और व्यक्तिगत पहचान समेत सब कुछ हिन्दू संस्कृति में शामिल है
ओवैसी साहब यह तो बताइए की भारत में मुग़ल युग से पूर्व किसका राज था? मुग़ल युग से पूर्व एक से बढ़कर एक हिन्दू सम्राट हुए, लेकिन वोट के भूखे ओवैसी जैसे तुष्टिकरण पुजारियों ने उस स्वर्णमयी इतिहास को धूमिल कर आतताइयों को महान बताया। अयोध्या, काशी और मथुरा आदि हज़ारों ऐसे स्थल हैं, जहाँ इन आतताइयों ने हिन्दू मन्दिरों और महलों का इस्लामीकरण कर दिया। 
2012 में आर्गेनाइजर साप्ताहिक से सेवानिर्वित होने उपरान्त एक हिन्दी पाक्षिक का संपादन करते अपने स्तम्भ में लिखा था कि "लाल किला किसने और कब  बनवाया?", जिसका मुस्लिम पाठकों ने अपशब्दों में आलोचना भी की थी, लेकिन सच्चाई को स्वीकारने से इंकार करते रहे। फिर आये 2014 लोकसभा चुनाव। एक चुनावी रैली को सम्बोधित करते तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह भाजपा पर ने इतिहास और भूगोल को भ्रमित किये जाने बयान पर अपने स्तम्भ "झोंक आँखों में धूल-चित्रगुप्त" में शीर्षक प्रधानमंत्री राष्ट्र को बताएँ ! में लाल किला से लेकर क़ुतुब मीनार और ताज महल आदि की वास्तविकता से जनता को अवगत करवाने का आग्रह किया था। सबको लाल किले पर झंडा फहराने का शौक एवं अरमान है, लेकिन लाल किला की सच्चाई बताने का नहीं, क्यों? 
कल तक सत्ता में रहने वाले जिस राम को एक काल्पनिक कहते थे, लेकिन हर वर्ष राम लीला मंचन में दशहरा पर राम का तिलक कर जनता को भ्रमित करने पहुँच जाते हैं। जब राम एक काल्पनिक थे, फिर राम का तिलक कर किस झूठ को प्रमाणित कर रहे हैं? इतना ही नहीं, कई रामलीला कमेटी के ये ही लोग संस्थापक सदस्य भी हैं, इसके बावजूद तुष्टिकरण के पुजारी अयोध्या में राममन्दिर में अवरोध ही नहीं कर रहे, मुस्लिम समाज को भी उकसा रहे हैं। 
ओवैसी साहब देश में साम्प्रदायिक जहर फ़ैलाने से बेहतर होगा, देश की जनता को बताएं दिल्ली में लाल किला कौन से सन में बना था, इसको बनवाने वाला कौन है? और उस समय किस नाम से चर्चित था? दूसरे, क़ुतुब मीनार किस सन में किसने बनवाई थी और यह किस नाम से प्रसिद्ध थी?
ओवैसी साहब भारत तो हिन्दू राष्ट्र आरएसएस के बजूद से पहले ही था, समस्या यह है कि हम भारतीय शिक्षित होते हुए भी अपने ही देश के वास्तविक इतिहास से अज्ञान हैं। और वास्तविकता की बात करने वाले को फिरकापरस्त, साम्प्रदायिक, गंगा-यमुना तहजीब का दुश्मन और देश में अशांति फ़ैलाने वाले न जाने कितने नामों से अलंकृत कर दिया जाता है। क्यों नहीं उल्टी-सीधी बातें से जनता को भ्रमित करने की बजाए वास्तविकता से अवगत करवाने का प्रयास किया जाता? आखिर कब तक देश को हिन्दू-मुसलमान की आग में झोंका जाएगा? ओवैसी साहब इन साम्प्रदायिक दंगों में किसी नेता के घर के परिन्दे तक को ठेस नहीं पहुँचती, मरता आम नागरिक है। फिर उनकी मौतों पर सियासत कर मालपुए खाने वाले भी नेता ही होते हैं। देश को चाहिए कि इन लोगों को पहचाने और इनसे दूरी बनाये रखने का प्रयास करें, इनका कुछ नहीं होगा, नुकसान जनजीवन का ही होगा। देश को ऐसे नेताओं के साथ-साथ #metoo, #not in my name, #mob lynching, #intolerance, #award vapsi आदि प्रायोजित गैंगों से भी सतर्क रहना होगा।     
आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि भारत हिन्दुओं का देश हैं। हम हिन्दू राष्ट्र हैं। हिन्दू  किसी पूजा का नाम नहीं, किसी भाषा का नाम नहीं और किसी प्रांत या प्रदेश का नाम नहीं है। हिन्दू एक संस्कृति का नाम है, जो भारत में रहने वाली सबकी सांस्कृतिक विरासत है
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ओवैसी साहब जिस दिन भारत का वास्तविक इतिहास उजागर होगा, अपने आप दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाएगा। 

योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत पर टिप्पणी करना हार्ड कौर को पड़ा भारी

आर.बी.एल.निगम 
रैपर और सिंगर हार्ड कौर  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ऊपर टिप्पणी को लेकर मुश्किल में फंस गई हैं। दरअसल, वाराणसी में सिंगर हार्ड कौर के खिलाफ योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत पर टिप्पणी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई है हार्ड कौर के खिलाफ आईपीसी की धारा  124ए (राजद्रोह), 153ए, 500, 505 और 66 आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है हार्ड कौर के खिलाफ वाराणसी के वकील शशांक शेखर ने एफआईआर दर्ज करवाई हैं।  
बॉलीवुड सिंगर हार्ड कौर ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की तस्वीर शेयर करते हुए उनके खिलाफ टिप्पणी की थी। हार्ड कौर ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में भी टिप्पणी की  थी। जिसको लेकर वाराणसी के एक वकील ने उनके खिलाफ थाने में मुकदमा दर्ज करवाया है 
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FIR registered in Varanasi against singer Hard Kaur for her comments against Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath and RSS Chief Mohan Bhagwat. (file pic)
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FIR registered under sections 124A (Sedition), 153A, 500 ,505 of the Indian Penal Code and 66 IT Act against singer Hard Kaur for her comments against Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath and RSS Chief Mohan Bhagwat. https://twitter.com/ANI/status/1141620792448315392 
हार्ड कौर के नाम से मशहूर तरन कौर ढिल्लों भारत में पैदा हुई थीं। जिसके बाद वे यूके चली गईं. सिंगर हार्ड कौर 'ग्लासी' और 'मूव यॉर बॉडी' गानों से बॉलीवुड में फेमस हुई थी हार्ड कौर ने 'सिंह इज किंग' , 'बचना ए हसीनों' , 'किस्मत कनेक्शन' जैसी फिल्मों में भी सुपरहिट सॉन्ग गाए हैं।  

‘राम मंदिर निर्माण की शुरू की जाएं तैयारियां’--योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इशारों ही इशारों में राम मंदिर निर्माण को लेकर तैयारियां शुरू करने की बात कही है. गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मन्दिर से भव्य विजय शोभायात्रा शुरू निकाली गई. विजय शोभायात्रा के दौरान सीएम योगी ने मंच से लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि रामलीलाओं की भव्यता के साथ-साथ समाज के इस भव्य मंदिर को भी उसी रूप में बनाने की तैयारी हमें करनी चाहिए जिस प्रकार से भव्य मंदिर के रूप में रामलीलाओं का आयोजन हम करते हैं. 
छुपे शब्दों में योगी ने जाहिर कर दी मंशा
विजय शोभायात्रा के दौरान एक मंच से बोलते हुए सीएम योगी ने इशारों ही इशारों में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर अपनी मंशा जाहिर कर दी. उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं को देखकर हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें. रामलीलाओं की भव्यता के साथ-साथ समाज के इस भव्य मंदिर को भी उसी रूप में बनाने की तैयारी हमें करनी चाहिए जिस प्रकार से भव्य मंदिर के रूप में रामलीलाओं का आयोजन हम करते हैं. उन्होंने कहा कि हमें राम मंदिर निर्माण की तैयारियां शुरू करनी चाहिए.
आरएसएस प्रमुख भागवत ने भी उठाया था राम मंदिर मुद्दा
बता दें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरूवार (18 अक्टूबर) ने सरकार से अपील की थी कि वह कानून बनाकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करे. संघ द्वारा आयोजित वार्षिक विजयदशमी पर्व में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा था कि राम जन्‍मभूमि के लिए स्‍थान का आवंटन अभी बाकी है, जबकि साक्ष्‍यों से यह स्‍पष्‍ट है कि उस जगह पर मंदिर था. यदि राजनीतिक हस्‍तक्षेप नहीं होता तो वहां पर मंदिर काफी पहले ही बन गया होता. हम चाहते हैं कि सरकार कानून बनाकर निर्माण के मार्ग को प्रशस्‍त करे. 
”राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के लिए जरूरी है राम मंदिर निर्माण- भागवत
मोहन भागवत ने कहा था, ”राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के संदर्भ में अपने करोड़ों देशवासियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि पर राष्ट्र के प्राणस्वरूप धर्ममर्यादा के विग्रहरूप श्रीरामचन्द्र का भव्य राममंदिर बनाने के प्रयास में संघ सहयोगी है. राम मंदिर का बनना स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है, मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा.” उन्होंने कहा कि कुछ तत्व नई-नई चीजें पेश कर न्यायिक प्रक्रिया में दखल दे रहे हैं और फैसले में रोड़े अटका रहे हैं. उन्होंने कहा कि बिना वजह समाज के धैर्य की परीक्षा लेना किसी के हित में नहीं है. आरएसएस प्रमुख ने कहा, ‘‘राष्ट्रहित के इस मामले में स्वार्थ के लिए सांप्रदायिक राजनीति करने वाली कुछ कट्टरपंथी ताकतें रोड़े अटका रही हैं. राजनीति के कारण राम मंदिर निर्माण में देरी हो रही है.’’
जिन्हें लगता है हिन्दुत्व मर गया, जान लें हम जिंदा हैं--अयोध्या कूच करने पर उद्धव ठाकरे 
Shiv Sena Chief Uddhav Thackeray says I will visit Ayodhya on 25th November in Mumbaiउधर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अक्टूबर 18 को शिवसेना की वार्षिक दशहरा रैली के दौरान ऐलान किया कि वे 25 नवंबर को वह अयोध्या जाएंगे। उद्धव ठाकरे ने राम मंदिर के बहाने केंद्र की राजग सरकार के साथ-साथ प्रधानमंत्री को भी खूब खरी-खोटी सुनाई और उन पर तीखे हमले किए। रैली के दौरान उन्होंने मोदी सरकार पर राम मंदिर, पेट्रोल-डीजल, रुपए की गिरती कीमत जैसे कई मुद्दों को लेकर सरकार पर निशाना साधा।
शिवाजी पार्क में शिवसेना की परंपरागत दशहरा रैली को संबोधित करते हुए ठाकरे ने सवाल किया कि साढ़े चार साल सत्ता में रहते हुए प्रधानमंत्री एक बार भी अयोध्या क्यों नहीं गए? उन्होंने कहा कि, हम उन लोगों को चेतावनी दे रहे हैं, जिन्हें लगता है कि हिन्दुत्व मर गया है। हम अभी भी जिंदा हैं। हमें दुख है कि अभी तक राम मंदिर नहीं बनाया गया है। मैं 25 नवंबर को अयोध्या जा रहा हूं।
उद्धव ने कहा कि शिवसेना 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ेगी। मैं 25 नवंबर को अयोध्या जाऊंगा और राम मंदिर कब बनेगा, इसका सरकार से जवाब मांगूंगा।" उन्होंने राम मंदिर निर्माण पर भाजपा को अपनी भूमिका बताने को कहा। उन्होंने पूछा कि राम मंदिर भी कहीं सरकार का एक और जुमला तो नहीं?
प्रधानमंत्री के अयोध्या न जाने के मुद्दे को उनके विदेश दौरों से जोड़ते हुए उद्धव ने कहा कि आप चीन जाते हैं, जापान जाते हैं, उन देशों में भी जाते हैं, जिनका नाम तक हमने भूगोल की किताब में नहीं पढ़ा। आप इन देशों में जरूर जाइए। देश का नाम रोशन कीजिए। लेकिन जहां से चुनकर आए, उसके पड़ोस में स्थित अयोध्या को कैसे भूल जाते हैं ?
उद्धव ठाकरे ने रैली को संबोधित करते हुए कहा, कई लोगों ने शिवसेना को खत्म करने की कोशिश की। मैं उन सभी लोगों को चुनौती देता हूं। आओ आमने-सामने देखते हैं कौन किसको खत्म करता है। धनुष्य बाण हमारा है, धनुष्य बाण के लिए छाती कितनी बड़ी है ये नहीं देखा जाता।
R.k. Sahu shared a post to Kumud Kanta Rai's timeline.
15 hrs
क्या देश के रहने वाले कुछ कट्टरपंथी मुसलमान, ईसाई इत्यादि हिंदुओं को किसी भी तरह नीचे रखने व् दिखाने का प्रयास कर रहे हैं, वैसे तो उनका यह एजेंडा, लक्ष्य उद्देशय बहुत पुराने समय से ही चल रहा है, जिसमे वह अधिकतर सफल भी रहे है, क्योकि हिन्दू बहुत ही ज्यादा टुकड़ो में बटा हुआ है, जिसका लाभ कांग्रेस ने उठा कर सदैव हिन्दुओ के विभाजन को अंग्रेजो की तर्ज़ पर अपने वोट बैंक के लिए इस्तेमाल कर धर्म विशेष का तुष्टिकरण किया जबकि पहले ही मज़हब के नाम पर देश का बॅटवारा हो चूका था, परंतु अभी यह दुष्ट घटनाएं अधिक ही स्पष्ट हो रही है कि कुछ कट्टरपंथी मुसलमान हमारे आराध्य भगवान श्री राम का मंदिर उन्ही की प्रमाणित जन्म भूमि पर ही ही नहीं बनना देना चाह रहे है और यदि मंदिर नहीं बन पाता या सुप्रीम कोर्ट का निर्णय हिंदुओं के विरुद्ध आता है तो यह कट्टरपंथी मुस्लिम अभी से खुशी मनाने की जैसे तैयारी कर रहे हो।
इसके अतिरिक्त सबरीमाला मंदिर पर जो भी महिलाओं के अधिकारों के हित के लिए याचिका दायर की गई वह हिन्दू धर्म को मानने वाली, पूजा करने वाली या मंदिर जाने वाली महिलाये नहीं है, वह सब गैर धर्मी, मुस्लिमों की कॉन्ट्रैक्ट मैरिज, तीन तलाक, हलाला व् समलैंगिक “LGTB” समुदाय की समर्थक है परंतु दुखद स्थिति यह है कि न्यायपालिका इस धार्मिक विषय में हिंदुओं के विरुद्ध निर्णय देकर बिना हित के केवल मनोरंजन के लिए याचिका दायर करने वाली चरित्रहीन महिलाओ का पूर्ण समर्थन कर रही है, बलात्कार के आरोपी पादरी को हमारे न्यायिक सिस्टम में सम्मानित किया जाता है,
मैंने 3 साल पहले कहा था जो आरएसएस प्रमुख ने अभी कहा है कि यदि राम मंदिर का निर्माण अभी नहीं हुआ तो जनता 2019 में उन्हें ही चुनेगी जो राम मंदिर कभी नहीं बनाएंगे लेकिन मंदिर बनाने का सपना दिखने वालो को देश की जनता पूर्णतया धूल धसरित कर देगी, राम मंदिर फिर बने या न बने लेकिन भाजपा अगले 30 सालों तक दुबारा सत्ता में नहीं आएगी, वाजपेयी सरकार किन कारणों से इंडिया शाइनिंग में भी 10 सालो के लिए गयी, यह सभी बुद्धिजीविओं को पता है, क्या वर्तमान सरकार उसी मार्ग पर अग्रसर है तो यह देश का भी दुर्भाग्य होगा क्योकि अभी समय नहीं बचा है जैसे 20 ओवर्स मैच का आखरी ओवर हो इसी में जो कुछ करना है कर लो वरना देश के विभाजन का एक नया अध्याय निश्चित ही है। Post by:-RK Sahu
— with Geeta Sahu and 15 others.

Chakradhar Jha
रेहाना फातिमा,
मेरी स्वीटी
और सैम डेनियल ....
गैरहिन्दू महिलाओं का पवित्र हिन्दू मंदिर में क्या काम?
इनको दंगा एक्ट और राज्य में अफरा तफरी फैलाने के जुर्म में गिरफ्तार करना चाहिए सरकार को ....
अरे हाँ...
मैं तो भूल ही गया कि
सबरीमाला मंदिर मे प्रवेश के लिए
PIL डालनेवाला भी तो गैरहिन्दू ही था
जिसपर वामी जजों ने फैसला सुनाया था...।
हर कोई हिन्दुओं के आस्थाओं पीछे ही क्यों पडा है भाई ?
(एजेंसी इनपुट)