Showing posts with label smriti irani. Show all posts
Showing posts with label smriti irani. Show all posts

भारत विरोधी अरबपति जॉर्ज सोरोस की करीबी महिला के साथ राहुल गाँधी क्यों?

राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा एक बार फिर से विवादों में है। बीजेपी ने अमेरिका यात्रा के दौरान संसद से अयोग्‍य घोषित हो चुके राहुल गांधी की भारत विरोधी अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस की करीबी सुनीता विश्वनाथ और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े तजीम अंसारी के साथ बैठक पर सवाल उठाए हैं। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि कई दस्तावेज प्रमाण दे रहे हैं कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार को हटाने की बात डंके की चोट पर कहने वाले जार्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित महिला सुनीता विश्वनाथ और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े तजीम अंसारी के साथ अमेरिका में राहुल ने बैठक की। सोरोस के ही संस्थान ओपन सोसाइटी के ग्लोबल उपाध्यक्ष सलिल शेट्टी ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी हिस्सा लिया था। इससे साफ जाहिर है कि सत्ता के लिए कांग्रेस आज इतना नीचे गिर गई है कि वह देशविरोधी लोगों से भी हाथ मिलाने से गुरेज नहीं कर रही। सत्ता के लिए राहुल गांधी देश को कमजोर करने और देश को नीचा तक दिखाने के लिए तैयार हैं।

जार्ज सोरोस के सहयोगी से मिलने की राहुल की क्या है मजबूरी?

भाजपा मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत में स्मृति ईरानी ने कहा कि भाजपा ने इस विषय को पहले भी उठाया था कि कैसे जार्ज सोरोस भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को हटाना चाहते हैं। सोरोस के इरादे हर भारतवासी को पता थे, तब भी ऐसी क्या मजबूरी थी कि राहुल गांधी ने जार्ज सोरोस के एक सहयोगी के साथ अमेरिका में बैठक की। ईरानी ने सवाल किया कि राहुल को जवाब देना चाहिए कि वे लोगों के साथ क्या बात कर रहे थे? स्मृति ईरानी ने कहा कि राहुल गांधी अमेरिका दौरे पर 4 जून को जमाते इस्लामी से संबंधित एक इस्लामी संगठन से मिले थे। इस मुलाकात पर सवाल उठाते हुए स्मृति ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा पर चर्चा करते हुए कहा कि इस दौरान भी सोरोस के ओपन सोसायटी के मेंबर सलिल सेठी भी राहुल गांधी के साथ दिखाई दिए थे। उन्होंने कहा कि इतने गंभीर मुद्दे को उठाने पर बीजेपी नेता के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई है। यह सच को दबाने की कोशिश है। उन्होंने पूछा कि जो भारत की सरकार को गिराना चाहता है उसके साथ राहुल गांधी आखिर क्या कर रहे हैं। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में फोटो भी शेयर किए।

अमित मालवीय ने राहुल की सच्चाई दिखाई तो कांग्रेस को मिर्ची लगी

दरअसल, कर्नाटक में भाजपा के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) विभाग के प्रमुख अमित मालवीय के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के सदस्य रमेश बाबू ने यह शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया है कि मालवीय ने कांग्रेस और राहुल गांधी का मजाक उड़ाते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर माहौल बिगाड़ने और लोगों को उकसाने का काम किया। जबकि इस वीडियो इसमें उन्हीं बातों को दिखाया गया है जो कि राहुल गांधी अपने ब्रिटेन और अमेरिकी दौरे पर कहते रहे हैं। इसमें दिखाया गया है कि वे भारत के विरोधी हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने के लिए विदेशों में भारत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।
सुनीता विश्वनाथ ने किया था पीएम मोदी के दौरे का विरोध
सुनीता विश्वनाथ हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (एचएफएचआर) की कोफाउंडर हैं। वह अमेरिका में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के साथ कई कार्यक्रमों में शिरकत करती हैं। यह एक कट्टर संगटन है। खबरों के अनुसार इस संगठन का पश्चिम में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के साथ सांठगांठ है। संदिग्ध संगठन ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे का विरोध किया था। इसके खिलाफ प्रोपेगेंडा के लिए विशेष टूलकिट लेकर आया था। संगठन द्वारा जारी टूलकिट उसके मोदी विरोधी अभियान का हिस्सा था। “मोदी प्रोटेस्ट टूलकिट” शीर्षक वाला 24 पेज का दस्तावेज़ एचएफएचआर की वेबसाइट पर खुले तौर पर उपलब्ध था।
अमेरिका में राहुल का जमात, सुनीता विश्वनाथ कनेक्शन, फोटो ने खोल दी पोल
राहुल गांधी पीएम मोदी के अमेरिका दौरे से पहले 30 मई को अमेरिका पहुंचे थे। राहुल गांधी के विदेश दौरे का उद्देश्य भारत को नीचा दिखाना, पीएम मोदी और भाजपा को बदनाम करना और भारत में मुसलमान खतरे हैं, यही बताना रहता है। यह काम वह पिछले कई विदेश दौरे से करते आ रहे हैं। लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया पर उनका एक फोटो वायरल हुआ उसने उनकी पोल खोलकर रख दी है। जिस अमेरिकी अरबपति कारोबारी जार्ज सोरोस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर उगला था, जिसने पीएम मोदी को सत्ता से हटाने की बात कही थी, जिसने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 100 अरब डॉलर का फंड देने की बात कही थी, अब राहुल गांधी उसी के करीबी सहयोगी सुनीता विश्वनाथ के साथ बैठते करते देखे गए। आखिर राहुल गांधी देश विरोधी लोगों से क्यों मिल रहे थे? क्या भारत को कमजोर करने की जार्ज सोरोस की साजिश में वे भी शामिल हैं? राहुल गांधी का जमात, ISI और जॉर्ज सोरोस से जुड़े लोगों से मिलना यह साबित करता है कि वे भारत से प्रेम नहीं करते बल्कि सत्ता के लिए देश को कमजोर करने से लेकर किसी भी हथकंडे को अपना सकते हैं।
जॉर्ज सोरोस की प्रतिनिधि हैं सुनीता विश्वनाथ

सुनीता विश्वनाथ जॉर्ज सोरोस की प्रतिनिधि हैं, जिसने विपक्षी नेताओं, थिंक टैंक, पत्रकारों, वकीलों और कार्यकर्ताओं के एक नेटवर्क के माध्यम से भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने के लिए 1 अरब डॉलर देने का वादा किया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राहुल गांधी सत्ता पाने के लिए इस हद तक समझौता कर रहे हैं। अमेरिकी एक्टिविस्ट सुनीता विश्वनाथ वही हैं जिन्हें तीन साल पहले अयोध्या में एंट्री से रोक दिया गया था।
कुछ समय पहले विवादित ‘काली’ वेब सीरीज पर उठे विवाद पर इस महिला ने आकर सीरीज की निर्माता के पक्ष में हिंदू देवताओं के लिए उल-जुलूल बातें की थीं। अपने लेख में सुनीता ने महादेव की चिलम फूँकती तस्वीर लगाकर कहा था कि हिंदुओं में शराब और सिगरेट कुछ भी निषेध नहीं है। देवताओं को ये सब चढ़ता है।
सुनीता ने अपने लेख में सेक्स और समलैंगिकता को घुसाकर ये तक लिखा था कि धर्मग्रंथों में अनगिनत ऐसी कहानियाँ भरी पड़ी हैं, जिन्हें पढ़कर समलैंगिकता से पैदा हुए बच्चों का पता चलता है। सुनीता ने यह भी लिखा था कि हिंदुओं के कुछ देवता तो समलैंगिक भी हैं। काली के आपत्तिजनक दृश्यों को सपोर्ट करने के लिए सुनीता ने साफ लिखा था कि हिंदू देवता धूम्रपान, मदिरापान करते हैं। इसके अलावा वो मांस भी खाते हैं।

कौन हैं जॉर्ज सोरोस

92 साल के जॉर्ज सोरोस एक अमेरिकी अरबपति हैं, जो स्टॉक मार्केट में निवेश करके लाभ कमाते हैं। उनका जन्म 1930 में पश्चिमी देश हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में एक यहूदी परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब यहूदियों पर अत्याचार हो रहा था, तब उन्होंने झूठा पहचान पत्र बनाकर अपना और अपने परिवार की जान बचाई थी।
जब विश्वयुद्ध खत्म हुआ और हंगरी में कम्युनिस्ट सरकार बनी तो वे 1947 में इंग्लैंड की राजधानी लंदन चले गए। वहाँ उन्होंने रेलवे स्टेशन पर कुली और क्लबों में वेटर का भी काम किया। इस दौरान वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई की। इसके बाद कुछ समय तक उन्होंने लंदन मर्चेंट बैंक में भी काम किया।
साल 1956 में वे लंदन छोड़कर अमेरिका आ गए और फाइनांस एवं इन्वेस्टमेंट में कदम रखा। उसके बाद उनकी किस्मत चमक उठी और रात दूनी दिन चौगुनी तरक्की करने लगे और खूब संपत्ति इकट्ठा की। वित्तीय पत्रिका फोर्ब्स मैगजीन के अनुसार 17 फरवरी 2023 तक उनके पास 6.7 बिलियन डॉलर (लगभग 55,455 करोड़ रुपए) की संपत्ति है।
सन 1973 में उन्होंने सोरोस फंड मैनेजमेंट की स्थापना की और कथित अत्याचार पीड़ितों की मदद करने लगे। इस दौरान उन्होंने ब्लैक लोगों की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप देना शुरू किया। उनका दावा है कि उन्होंने अब 32 अरब डॉलर (2.62 लाख करोड़ रुपए) जरूरतमंदों को दे चुके हैं। सन 1984 में उन्होंने ओपन सोसायटी नामक संस्था की स्थापना की। आज यह संस्था 70 से अधिक देशों में कार्यरत है।
इन सब मानवीय सेवाओं और दानों के पीछे उनका एक विकृत चेहरा भी है। उन्होंने लाभ कमाने के लिए कई संस्थानों और देशों में वित्तीय संकट खड़ा कर दिया। इसके अलावा, उन्होंने कई देशों की सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने और उन्हें गिराने के लिए फंडिंग करने का काम किया। ओपन सोसायटी का इसमें नाम आया है। इस तरह के आरोप उन पर लगते रहे हैं।
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को हटाने के लिए अथाह पैसे खर्च किए थे। साल 2003 में उन्होंने कहा था कि जॉर्ज बुश को हटाना उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल है। उन्होंने कहा था कि अगर बुश को सत्ता से हटाने की अगर कोई गारंटी लेता है और वे अपनी पूरी संपत्ति उस पर लुटा देंगे। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ बुश की कार्रवाई का भी खूब विरोध किया था। बुश को हराने के लिए उन्होंने 250 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए थे।
सोरोस को चीन, भारत के नरेंद्र मोदी, ब्लादिमीर पुतिन, अमेरिका पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता पसंद नहीं हैं। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को ठग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तानाशाह कहा था। और यही बोली भारत में मोदी विरोधी बोल रहे हैं। उन्होंने दुनिया में ‘राष्ट्रवाद’ के बयार से लड़ने के लिए लगभग 100 अरब डॉलर की फंड की स्थापना की है। इन फंड का इस्तेमाल इन लोगों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने के लिए किया जाता है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में उन्होंने कहा था कि दुनिया में राष्ट्रवाद तेजी से बढ़ रहा है। इसका सबसे खतरनाक नतीजा भारत में देखने को मिला है।

सोरोस ने वित्तीय संकट पैदा किया और लाभ कमाया

जॉर्ज सोरोस को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, जिसने बैंक ऑफ इंग्लैंड को बर्बाद कर दिया। बैंक ऑफ इंग्लैंड यूनाइटेड किंगडम का केंद्रीय बैंक और यह भारत के RBI के समानांतर है। हेज फंड मैनेजर सोरोस ने अपनी साजिशों से ब्रिटिश मुद्रा पाउंड की वैल्यू को गिरा दिया था। इससे उन्होंने लगभग 1 बिलियन डॉलर (8277 करोड़ रुपए) का लाभ कमाया था। उन्हें वित्तीय युद्ध अपराधी तक कहा गया है।
यह कुछ हिंडनबर्ग रिसर्च की तरह ही है। हिंडनबर्ग भी अपनी रिपोर्ट में किसी कंपनी की वित्तीय स्थिति को खराब बताया है। इससे उसके शेयर गिरने लगते हैं और उसे शॉर्ट सेल करके लाभ कमाता है। अडानी मामले में भी हिंडनबर्ग ने यही तरीका अपनाया। इसके पहले भी वह ऐसा ही करता है। जॉर्ज सोरोस ने बैंक ऑफ इंग्लैंड के मामले में लगभग यही रणनीति अपनाई थी।
साल 1997 में थाईलैंड की मुद्रा बाहत पर सट्टेबाजी हमलों (Speculative Attack) के लिए सोरोस को जिम्मेदार ठहराया गया था। थाईलैंड की मुद्रा में आई गिरावट के कारण उस साल एशिया के अधिकांश देशों में वित्तीय संकट फैल गया था। मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महाथिर बिन मोहम्मद ने भी वहाँ की मुद्रा रिंगित की गिरावट के लिए सोरोस को जिम्मेदार ठहराया था। हालाँकि, सोरोस ने इसका खंडन किया था।
इसके अलावा, सोरोस पर अन्य अनैतिक तरीकों से संपत्ति कमाने का आरोप लगा है। वर्ष 2002 में फ्रांस की अदालत ने सोरोस को अनैतिक और अनधिकृत व्यापार का दोषी पाते हुए उन पर 23 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया था। सोरोस ने अदालत के इस फैसले को फ्रांस की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने सोरोस पर लगाए गए इस जुर्माने को बरकरार रखा।
अमेरिका में भी जॉर्ज सोरोस पर बेसबॉल खेलों में पैसा लगाकर अनैतिक तरीके से लाभ कमाने का आरोप लगा। इसी तरह इटली की फुटबॉल टीम एएस रोमा को लेकर भी सोरोस विवादों में आए था। इतना ही नहीं, सोरोस ने साल 1994 में खुलासा किया था कि उन्होंने आत्महत्या करने में अपनी माँ मदद की थी।

सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा और भारत

राफेल डील में जाँच के लिए फंडिंग: फ्रांस से भारत ने 36 राफेल विमानों को खरीदा था। इसको लेकर विपक्षी दल कांग्रेस ने हंगामा किया था और कहा था कि इसमें दलाली हुई है। हालाँकि, यहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था। इसके बाद फ्रांस की एनजीओ शेरपा एसोसिएशन ने इसमें भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराकर जाँच की माँग की थी। इस एनजीओ को जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से फंड जारी किया जाता है।
भारत जोड़ो यात्रा और सोरोस: कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा से भी जॉर्ज सोरोस के नाम जुड़े हैं। 31 अक्टूबर 2022 को सलिल शेट्टी नाम का एक व्यक्ति राहुल गांधी की कर्नाटक के हरथिकोट में उनकी भारत जोड़ी यात्रा में शामिल हुआ। सलिल शेट्टी जॉर्ज सोरोस द्वारा स्थापित ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन के वैश्विक उपाध्यक्ष हैं। इसके पहले शेट्टी एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े थे।
CAA प्रोटेस्ट: सीएए प्रोटेस्ट में भी जॉर्ज सोरोस का नाम जुड़ा है। कहा जाता है कि नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर हुए विरोध को हवा देने के लिए जॉर्ज सोरो ने फंडिंग की थी। इसकी पुष्टि उनके बयानों से भी होती है। सोरोस ने भारत में लागू किए जा रहे NRC और CAA को मुस्लिम विरोधी बताया था।
कश्मीर से धारा 370 का खात्मा: इसी तरह कश्मीर से जब केंद्र की मोदी सरकार ने धारा 370 को खत्म कर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त किया था, तब भी सोरोस सामने आए थे। उन्होंने मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध किया था। सोरोस ने कहा था कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा है। इसी तरह किसान आंदोलन और भारत द्वारा कोरोना का वैक्सीन बनाने के बाद उसके खिलाफ वैश्विक मुहिम चलाने में भी सोरोस का नाम आ चुका है।
दरअसल, जॉर्ज सोरोस की भूमिका उन हर बातों में लगभग सामने आई, जो केंद्र की भाजपा सरकार और नरेंद्र मोदी के खिलाफ रही। जॉर्ज सोरोस की नरेंद्र मोदी के खिलाफ कितनी नफरत है, इसका वे तानाशाह कहकर सबूत दे चुके हैं और समय-समय पर अन्य आरोपों के जरिए इसकी पुष्टि भई करते रहते हैं। वैसे तो सोरोस की कहानी सैकड़ों पन्नों में भी नहीं खत्म होगी, लेकिन फिलहाल संक्षिप्त में इतना ही।

CARA में ईसाई मिशनरी गिरोह : कोरोना के दौरान भारत से अनाथ बच्चों को इटली, माल्टा, जॉर्डन भेजा गया

दीपक कुमार, CARA, ईसाई, स्मृतिअनाथ बच्चों के दत्तक प्रक्रिया का नियमन करने वाली संस्था केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के सीईओ/मेंबर सेक्रेटरी दीपक कुमार को पद से हटाने के निर्णय के बाद कई खुलासे हो रहे हैं। ऑपइंडिया के सूत्रों का कहना है कि दीपक कुमार की अगुवाई में कारा में एडॉप्शन प्रक्रिया की धज्जियाँ उड़ाने की अनेक सूचनाएँ प्राप्त हुई हैं। ईसाई मिशनरियों का बोलबाला रहा। इनकी तानाशाही और अवैधानिक कार्यशैली के तमाम किस्से हैं जो अबतक दबाए जाते रहे हैं।
ईसाई मिशनरीज से दीपक कुमार की सांठगांठ  
मंत्रालय में दीपक कुमार के खिलाफ मिली दर्जनों शिकायतों को नजरअंदाज करने में वहाँ के एक शीर्ष ईसाई अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। यह भी जानकारी मिली है कि उसी बड़े अधिकारी ने दीपक कुमार का कार्यकाल बढ़ाने के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने की कोशिश भी की लेकिन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने दीपक कुमार का कार्यकाल बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया और हटाने का फरमान सुना दिया।
आश्चर्य की बात है कि मंत्रालय के उक्त तथाकथित ईसाई अधिकारी ने दीपक कुमार के रिलिविंग लेटर को भी रोक रखा था। आमतौर पर किसी प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी को तीस दिन पूर्व रिलीव होने की सूचना दे दी जाती है लेकिन यहाँ दीपक कुमार के मामले में उन्हें मात्र एक सप्ताह पूर्व पत्र जारी किया गया। ऑपइंडिया के हाथ लगे दस्तावेजों के अनुसार, दीपक कुमार के कार्यकाल में प्रवासी भारतीयों (NRI) को बच्चा गोद लेने के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है।
ऐसे भारतीयों को कारा से बच्चा गोद लेने के लिए तीन से सात साल तक प्रतीक्षा सूची में रहना पड़ता है लेकिन विदेशी ईसाई परिवारों को बहुत कम समय में बच्चा मिल जाता है। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव का आलम यह है कि कारा के सीईओ दीपक कुमार ने कोरोना संकट और लॉकडाउन के समय भी बच्चों को विदेश भेजा। अप्रैल माह में भी विशेष विमान से ये बच्चे इटली, अमेरिका, माल्टा और जॉर्डन भेजे गए।
हैरान करने वाली बात यह भी है कि जिस समय विशेष विमान से इटली बच्चे भेजे गए, उस समय इटली में कोरोना से मौतों का कोहराम मचा हुआ था। कोरोना से वहाँ दुनिया में सर्वाधिक मौतें हो रही थीं और स्थिति ये थी कि लाशें उठाने वाले भी लोग नहीं थे। अमेरिका की भी यही स्थिति थी। प्रवासी भारतीयों को प्रतीक्षासूची में रखना और इटली वाले ईसाईयों को विशेष विमान से कोरोना काल में बच्चे भेजने की व्यवस्था करने में दीपक कुमार की मंशा सवालों के घेरे में है।
ऑपइंडिया ने अंदरूनी सूत्रों से बात कर के पाया है कि विदेशी एडॉप्शन कराने वाली एजेंसियाँ अप्रत्यक्ष रूप से कारा के उच्च अधिकारियों को आर्थिक फायदा पहुँचाती हैं और मनमाने तरीके से काम करवाने में सफल हो जाती हैं। कहने को यह मामला मानवीय दृष्टि से सही जताया जा सकता है लेकिन जिस प्रकार की तेजी विदेशियों के मामले में दीपक कुमार द्वारा दिखाई जाती है वह उनकी कार्यशैली को संदेहास्पद बनाती है।
वर्ष 2016 में दीपक कुमार के कारा में कार्यभार संभालने के बाद से अप्रत्याशित रूप से विदेशी एडॉप्शन में बढ़ोत्तरी हुई है। आँकड़े बयान करते हैं कि दीपक कुमार के आने के बाद देश के भीतर गोद लेने की संख्या घटी और विदेशों में बच्चे भेजने की संख्या बढ़ गई। दिलचस्प यह है कि ज्यादातर बच्चों को ‘विशेष आवश्यकता (Special Need)’ की केटेगरी में डाल कर फॉरेन एडॉप्शन का खेल जारी है।
ऐसे ही एक मामले में CARA में बच्चों के हित के विरुद्ध कार्यशैली पर दीपक कुमार के विरुद्ध बाम्बे हाइकोर्ट में याचिका सं FAP-41-19 (फ़रवरी 17, 2020) तथा जबलपुर हाइकोर्ट द्वारा Writ Petition No. 28071/2018 (मार्च 19, 2020) में कोर्ट ने फटकार भी लगाई थी। दीपक कुमार ने अपनी एक टीम बना रखी थी, जिसमें दर्जन भर ऐसी महिलाओं की संविदा पर नियुक्ति कर रखी है जिनमें से अधिकांश ईसाई समुदाय से आती हैं और ‘Young Women’s Christian Association’ से किसी न किसी रूप में जुड़ी हैं।
CARA में ईसाई महिलाओं का बोलबाला 
इनमें Cecilia Maria और Libia Marium Paul जैसी कई ईसाई महिलाएँ हैं जो दत्तक प्रक्रिया को मनमाने ढंग से अंजाम दे रही हैं। गौरतलब है कि Cecilia Maria को अज्ञात कारणों से दो माह के भीतर ही जूनियर से सीनियर प्रोफेशनल के पद पर प्रमोट कर दिया गया। आश्चर्य है कि इनका दत्तक कार्यों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। बताया जाता है कि ये पहले किसी मिशनरी स्कूल में कार्यरत थीं।
सूत्रों का कहना है कि दीपक कुमार की यह संविदा टीम केवल मिशनरियों, दक्षिण भारतीय या भावी ईसाई दत्तक माता-पिता (Missionaries & South Indian or Christian Prospective Adoptive Parents) को ही संरक्षण देते हैं और ईसाई मिशनरी के अनुयायियों के रूप में काम करते हैं। इनके कारण लगभग 70% दत्तक माता-पिता दक्षिण भारत से आते हैं। विदेशी के रूप में वे केवल ईसाई दम्पति का चयन करते हैं।
आश्चर्यजनक रूप से CARA के अंदर संविदा पर नियुक्त इन सभी महिलाओं के पास ही दत्तक प्रक्रिया का प्रभार है। दीपक कुमार ने कारा में कार्यरत नियमित व स्थाई महिला अधिकारियों एवं कर्मचारियों को दत्तक मामलों से दूर रखा है। हमारे पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, कारा में मिन्नी जार्ज (Minnie George) नामक इसाई महिला संविदा पर कार्यरत हैं जो कि इसी मंत्रालय के अधीन दूसरे संगठन NIPCCD में ज्वाइंट डायरेक्टर केसी जार्ज की पत्नी हैं।
केसी जार्ज भी स्वयं CARA में संयुक्त निदेशक रह चुके हैं। उनके प्रभाव से ही इस महिला ने इस संस्था में नियुक्ति हासिल की। हाल ये है कि मिन्नी जार्ज के इशारे के बिना कोई भी विदेशी दत्तक प्रक्रिया (Foreign Adoption Process) पूरी नहीं हो सकती। आंतरिक सूत्रों का कहना है कि वह विदेशी ईसाई दम्पतियों को बच्चे दिलाने में अधिक रुचि रखती हैं। ये संविदा कर्मचारी गोद प्रक्रिया में गुप्त रूप से बेईमानी के खेल में शामिल हैं, जिसमें बच्चों को वर्षों तक रोकना भी शामिल है।
अपर्णा शर्मा और मिन्नी जार्ज ने दत्तक मामलों पर अपना एकाधिकार विकसित किया है। मिन्नी जॉर्ज के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं, लेकिन CEO दीपक कुमार ने दबा दिया। अपर्णा शर्मा को भी बच्चों के आँकड़ों को गुप्त रखने/रोकने का दोषी पाया गया है। हैरानी की बात है कि ऑनलाइन सिस्टम में बच्चों की संख्या ब्लॉक करके रखा जाता है और गुप्त रूप से केवल ईसाई मिशनरियों को इसकी जानकारी दी जाती है अथवा उन देशों को ही ऑनलाइन बच्चे दिखाई देंगे जिनको ये लोग दिखाना चाहते हैं। हाल ही में ऐसे कई विदेशी पेरेंट्स लॉकडाउन के कारण भारत में ही फँस गए थे।
अपर्णा शर्मा को इसी मामले में कारा प्रशासन ने जनवरी 22, 2020 को दोषी पाया था लेकिन CEO दीपक कुमार ने वह फाइल दबा ली और काफी निचले स्तर के कुछेक कर्मचारियों को निकालकर खानापूर्ति कर दी। बताया जाता है कि ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में दीपक कुमार ने एक नियम बनवा लिया है कि कोई भी विदेशी एजेंसी भारत में अपना एजेंट नियुक्त कर सकती है और उसी एजेंट के माध्यम से वह विदेशी दत्तक (Foreign Adoption) की प्रक्रिया को सम्पन्न कर सकती है।
ईसाई एजेंटों को दी जाती थी भारीभरकम रकम 
इसका मतलब ये है कि उन्हें प्रत्यक्ष उपस्थित न होने की छूट मिल गई। गौरतलब है कि जो भारत में एजेंट कार्यरत हैं, वे सभी ईसाई संगठनों के एजेंट हैं जिन्हें वेतन के रूप में बड़ी रकम दी जाती है। कारा के सूत्रों का कहना है कि दीपक कुमार तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में उन सभी लोगों को बर्बाद कर दिया जिसने उनके विरुद्ध थोड़ी भी आवाज उठाई। कारा में ही कार्यरत एक स्थाई महिला सहकर्मी ने दीपक कुमार पर प्रताड़ना की शिकायत की थी लेकिन मंत्रालय के कुछ अधिकारियों ने उन्हें बचा लिया।
इसके बाद उल्टा उस महिला का ही शोषण शुरू कर दिया गया था। हमें ये भी पता चला है कि ICMR के पूर्व वैज्ञानिक एसकेडी विश्वास ने कारा में प्रतिनियुक्ति के दौरान दीपक कुमार की कार्य़शैली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी तथा गृह मंत्री को पत्र लिखकर दीपक कुमार के कारनामों को उजागर किया था। लेकिन, अंततः वे इतने प्रताड़ित किए गए थे कि उन्होंने कारा छोड़ने का फैसला किया।
दीपक कुमार के नेतृत्व में विगत कुछ वर्षों में साजिश के तहत अनेक राष्ट्रवादी संस्थाओं पर जानबूझकर जुर्माना ठोका गया है और उनकी फंडिंग रोकी गई हैं ताकि ईसाई मिशनरियों को लाभ मिले तथा ये संस्थाएँ बदनाम हों जाएँ। पता चला है कि राष्ट्रवादी संस्थाओं को बदनाम कर के वनवासी क्षेत्रों में सक्रिय मिशनरियों को लाभ पहुँचाया गया है। दीपक कुमार ने अपने मूल विभाग के उच्च अधिकारियों की घर में बैठी पत्नियों को भी CARA में नौकरी दे रखा है।
शालिनी पीयूष उनके बॉस की पत्नी हैं जिनको दत्तक कार्य का कोई अनुभव नहीं है लेकिन CARA में वह अच्छे वेतन पर नौकरी कर रही हैं। मिन्नी जार्ज महाराष्ट्र की प्रभारी हैं। उन्होंने एक संस्था से एक बच्चे को बेल्जियम के एक अस्वस्थ ईसाई दंपत्ति को गोद लेने हेतु विभाग से अनापत्ति पत्र (NOC) जारी करवा दिया था। महाराष्ट्र की उस संस्था ने इसके विरुद्ध बाम्बे हाइकोर्ट में याचिका (संख्या FAP-41-19) दाखिल की थी।
उच्च न्यायालय ने उक्त प्रकरण मे CARA के निदेशक व ज्वाइंट डायरेक्टर को बुलाकर फटकार लगाई थी व इस संदर्भ मे दिनांक फ़रवरी 17, 2020 को आदेश पारित कर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए थे। न्यायालय ने अपने उक्त आदेश में CARA द्वारा बच्चे के भविष्य की परवाह न करने तथा अन्य अनियमितताओं का उल्लेख किया है। दीपक कुमार के इस रवैये पर मीडिया क्यों शांत है, ये भी चर्चा का विषय है।
ईसाई मिशनरियों के साथ दीपक कुमार के संबंधों का खुलासा 
इससे पहले ऑपइंडिया ने खुलासा किया था कि जब से दीपक कुमार ने कारा (CARA) के सीईओ का प्रभार सँभाला, तभी से नियमों को ताक पर रख कर बच्चों को गोद दिए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाने लगी। सूत्रों का ये भी कहना है कि दीपक कुमार ने अनियमितताएँ बरतते हुए अपने करीबियों को CARA में बिठाया और इसका एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह संचालन शुरू कर दिया। मंत्रालय को काफी शिकायतें मिलीं कि एडॉप्शन की प्रक्रिया में संविदा कर्मचारियों द्वारा रक़म की वसूली की जा रही है।
दीपक कुमार को इतना बड़ा पद दिए जाने के पीछे भी कुछ बड़े अधिकारियों की मिलीभगत थी। सूत्रों के अनुसार, एक साजिश के तहत 2016 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ही कुछ बड़े अधिकारी उन्हें लेकर आए थे। वो आर्मी के सिग्नल कोर में फाइबर इंजिनियर थे और उनकी शिक्षा-दीक्षा भी इंजीनियरिंग में ही हुई है। CARA के कामकाज का जो तरीका है, उसे लेकर उन्हें न कोई अनुभव था और ही कोई ज्ञान।
मनमाफिक कामकाज की प्रक्रिया अपनाने के लिए दीपक कुमार ने कारा के कई नियमों को बदल भी दिया था। उन्होंने अपने सम्बन्धियों को कारा में घुसाने के लिए भी बड़ी चालाकियाँ की। सबसे पहले तो उन्हें चपरासी के रूप में नियुक्ति दी और फिर धीरे-धीरे उनको कारा में एडवाइजर बना कर मोटी रकम देनी शुरू कर दी। भर्ती किए गए संविदाकर्मी फिर विदेशी एजेंसियों के साथ साँठगाँठ कर ख़ुद भी कमाई करने लगे।
अवलोकन करें:-
About this website
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
CARA को मिशनरियों का अड्डा बनाने वाले दीपक कुमार केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण अथवा ‘सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर...
इसमें भारतीय पेरेंट्स को जम कर इंतजार कराया गया और उनकी सीनियोरिटी को धता बताते हुए विदेशियों को प्राथमिकता दी गई। भारतीय पेरेंट्स इंतजार करते रहे। भारत में अगर किसी को इस प्रक्रिया में लाभ पहुँचाया भी गया तो उन्हें ही जो काफी संपन्न थे। मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को भी ख़ासी परेशानी हो रही है, जिन्हें उन संस्थाओं में रहने को मजबूर किया उनके देखरेख और पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की गई।

CARA बना ईसाई मिशनरियों का अड्डा, विदेश भेजे बच्चे

CARA, ईसाई, दीपक, एडॉप्शन
CARA को मिशनरियों का अड्डा बनाने वाले दीपक कुमार
केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण अथवा ‘सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्सेज अथॉरिटी’ (CARA) के कामकाज पर सवालिया निशान लगे हैं, क्योंकि इसमें सीईओ दीपक कुमार द्वारा ईसाई मिशनरियों के पैठ बनाने की बात पता चली है। ये संस्था केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत आता है।
इस संस्था का काम है कि देश भर में अनाथ बच्चों को गोद लिए-दिए जाने (एडॉप्शन) पर फ़ैसला लेना। बताया गया है कि हर वर्ष 4000 के क़रीब बच्चे गोद लिए जाते हैं और इनमें से अधिकतर विदेश जाने वालों की संख्या है। इस पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग यही ताक़तवर निकाय करता है।
सूचना मिली है कि पिछले 4 सालों में विदेश भेजे जाने वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। मंत्रालय में तैनात संयुक्त सचिव आस्था खतवानी से कारा का प्रभार वापस ले लिया गया है। CARA के सीईओ व सेक्रेट्री दीपक कुमार को भी पद से हटाने का फैसला हुआ। दीपक कुमार के खिलाफ कई तरह की अनियमितताएँ सामने आई थीं, जिसके बाद ये निर्णय लिया गया।
कहा जा रहा है कि दीपक कुमार के कार्यकाल के दौरान दुनियाभर में भारत से गोद लिए गए बच्चों को लेकर कई शिकायतें सामने आ रही थीं। दरअसल, ये पूरा मामला जबरन ईसाई धर्मान्तरण से जुड़ा है। बच्चों को गोद लेकर ईसाई बना दिए जाने की कई शिकायतें सामने आई थीं। इसी कारण दीपक कुमार के विरुद्ध क़दम उठाए गए। अब सवाल उठता है कि आखिर ईसाई मिशनरियों की इन करतूतों के पीछे लोगों का ध्यान क्यों नहीं गया?
सूत्रों के अनुसार, जब से दीपक कुमार ने कारा(CARA) के सीईओ का प्रभार सँभाला, तभी से नियमों को ताक पर रख कर बच्चों को गोद दिए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाने लगी। सूत्रों का ये भी कहना है कि दीपक कुमार ने अनियमितताएँ बरतते हुए अपने करीबियों को CARA में बिठाया और इसका एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह संचालन शुरू कर दिया। मंत्रालय को काफी शिकायतें मिलीं कि एडॉप्शन की प्रक्रिया में संविदा कर्मचारियों द्वारा रक़म की वसूली की जा रही है।
इसके बाद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में जाँच की और मामले को संज्ञान में लिया। दीपक कुमार को हटाने जाने के बाद कारा में तैनात कई अन्य अधिकारियों पर भी गाज गिरना तय मना जा रहा है। उधर आस्था की जगह अनुराधा चगति को कारा का प्रभार सौंपा गया है। अब इस मामले में मंत्रालय सख्त कार्रवाई करने की तैयारी में जुट गया है।

सूत्रों के अनुसार, दीपक कुमार के बारे में मंत्रालय को जो शिकायतें मिली हैं, उनमें विदेशी संस्थाओं से साँठगाँठ कर बच्चों का विदेश में एडॉप्शन कराने का रास्ता साफ़ करने का मामला सबसे प्रमुख है। विदेशी एजेंसियों से मिलीभगत कर के बच्चों को गोद दिए जाने के इस गोरखधंधे में कई भारतीय संस्थाएँ भी शामिल हो सकती हैं। कई बीमार दम्पतियों को भी बच्चे गोद दिए गए, जिससे इन आरोपों को बल मिला है। आइए, आगे बढ़ने से पहले एडॉप्शन के आँकड़ों पर एक नज़र डालते हैं:

                    वर्ष        देश में एडॉप्शन     विदेश में एडॉप्शन
20105693628
20115964629
2012-134694308
2013-143924430
2014-153988374
2015-163011666
2016-173210578
2017-183276651
2018-193374653
दीपक कुमार के अंतर्गत कारा में चल रहे नियम-विरोधी कामकाज को लेकर कुछ राज्यों ने पहले ही असंतोष जताया था। इसके अलावा कुछ मामलों में मुंबई व जबलपुर की हाईकोर्ट द्वारा उन्हें फटकार भी लगाया गया था। बावजूद इसके वे पद पर बने रहने में कामयाब रहे थे। अब जब उन्हें निकाल बाहर किया गया है, निष्पक्ष जाँच में इसकी सारी कड़ियाँ सामने आने की उम्मीद है।
दीपक कुमार को इतना बड़ा पद दिए जाने के पीछे भी कुछ बड़े अधिकारियों की मिलीभगत थी। सूत्रों के अनुसार, एक साजिश के तहत 2016 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ही कुछ बड़े अधिकारी उन्हें लेकर आए थे। वो आर्मी के सिग्नल कोर में फाइबर इंजिनियर थे और उनकी शिक्षा-दीक्षा भी इंजीनियरिंग में ही हुई है। CARA के कामकाज का जो तरीका है, उसे लेकर उन्हें न कोई अनुभव था और ही कोई ज्ञान।
नियमानुसार, ऐसी पद पर आसीन होने से पहले मानविकी विषय में डिग्रीधारी होना आवश्यक है। इस तरह उनके कामकाज के साथ-साथ उनकी नियुक्ति भी जाँच के घेरे में है। कई अधिकारियों में तो उनकी रंगमिजाजी के किस्से भी चर्चा में रहते हैं। मंत्रालय के उच्चाधिकारियों को उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स पर भी कुछ आपत्तिजनक कंटेंट्स मिले, जिसका उन्हें हटाए जाने में अहम रोल है।
सूत्रों का ये भी कहना है कि मनमाफिक कामकाज की प्रक्रिया अपनाने के लिए दीपक कुमार ने कारा के कई नियमों को बदल भी दिया था। उन्होंने अपने सम्बन्धियों को कारा में घुसाने के लिए भी बड़ी चालाकियाँ की। सबसे पहले तो उन्हें चपरासी के रूप में नियुक्ति दी और फिर धीरे-धीरे उनको कारा में एडवाइजर बना कर मोटी रकम देनी शुरू कर दी। भर्ती किए गए संविदाकर्मी फिर विदेशी एजेंसियों के साथ साँठगाँठ कर ख़ुद भी कमाई करने लगे।
चूँकि ये मामला अनाथ बच्चों से जुड़ा हुआ है, इसीलिए जाँच में भी पूरी सावधानी और गोपनीयता बरती जा रही है क्योंकि बच्चों की पहचान बाहर नहीं आनी चाहिए। मंत्रालय के कुछ अधिकारी तो दीपक कुमार का कार्यकाल आगे बढ़ाए जाने के भी हिमायती थे। लेकिन, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दीपक कुमार को हटा कर मंत्रालय में तैनात मनोज कुमार को अस्थायी रूप से कारा का प्रभार सौंपा है।
ये तो थी निकाय में हुई गड़बड़ियों की बात। अब आते हैं CARA में ईसाई मिशनरियों और क्रिश्चियन संस्थाओं की पैठ पर क्योंकि पूरे मामले की जड़ यही है। दीपक कुमार द्वारा इसे तानाशाही तरीके से संचालित किया जा रहा था। उन्होंने जिन करीबियों की नियुक्ति की, उनमें भी कुछ सेना से थे। किसी भी पद के लिए योग्यता का ध्यान नहीं रखा गया। क्रिश्चियन संस्थाओं के इशारे पर भी कुछ नियुक्तियाँ हुईं।
उनके दो भतीजे हैं अमन और शिशिर। इन दोनों को पहले तीन महीने तक एमटीएस के पद पर 10 हजार रुपए के मासिक वेतन के साथ रखा गया, उसके बाद यंग प्रोफेशनल्स के पद पर बिठा कर वेतन तीन गुना बढ़ा दिया गया। 9 महीने बाद तो इन दोनों को सलाहकार का पद थमा दिया गया और 60 हज़ार रुपए प्रतिमाह दिए जाने लगे। इस तरह की उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि कई नियुक्तियाँ की हैं। उनकी अन्य संदिग्ध नियुक्तियों को देखिए:
*सेना से ही आने वाले संजय बारशीला को CARA में डायरेक्टर के पद पर बहाल किया गया।
*दीपक ने अपने मित्र किसी जॉर्ज की पत्नी मिनी जॉर्ज को सीनियर प्रोफेशनल के पद पर बिठा     दिया।
*सेना में अपने वरिष्ठ अधिकारी की पत्नी शालिनी पीयूष को भी सीनियर प्रोफेशनल का पद दिया   गया।
*अपनी क़रीबी क्षिप्रा और अपने लिए जासूसी करने वाले अनुराग पांडेय और दीपांशू मूँगनी को यंग   प्रोफेशनल के पद पर बिठा दिया।
*आर्मी से ही रिटायर्ड सुमित पाठक को जूनियर प्रोफेशनल का पद दिया गया।
*रत्ना मालेकर को भी पद दिया गया।
बच्चों को अडॉप्ट करने के लिए उन समूहों, विदेशी एजेंसियों को प्राथमिकता दी गई जिनके CARA के अधिकारियों से हित जुड़े थे। सीईओ दीपक कुमार के मित्र जगन्नाथ पति के बेटे का कनाडा में न सिर्फ़ एडमिशन कराया बल्कि उसके रहने की भी व्यवस्था की थी। इसके बदले एडॉप्शन की प्रक्रिया में उस एजेंसी को लाया गया और फिर उसे लाभ पहुँचाया गया।

इसमें भारतीय पेरेंट्स को जम कर इंतजार कराया गया और उनकी सीनियोरिटी को धता बताते हुए विदेशियों को प्राथमिकता दी गई। भारतीय पेरेंट्स इंतजार करते रहे। भारत में अगर किसी को इस प्रक्रिया में लाभ पहुँचाया भी गया तो उन्हें ही जो काफी संपन्न थे। मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को भी ख़ासी परेशानी हो रही है, जिन्हें उन संस्थाओं में रहने को मजबूर किया उनके देखरेख और पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की गई।
इसके अलावा प्रशिक्षण के लिए आने वाली धनराशि में भी घपला किया गया। स्वीकृत राशि को खर्च तो कर दिया गया लेकिन प्रशिक्षण के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई। अडॉप्ट किए गए बच्चों के फॉलोअप की कोई व्यवस्था नहीं की गई। साथ ही दीपक कुमार ने CARA में अपने द्वारा नियुक्त किए गए सभी कर्मचारियों व अधिकारियों का कार्यकाल भी 1 वर्ष के लिए बढ़ा दिया, ताकि उन्हें हटाने में मशक्कत करनी पड़े।
बच्चों की ज़िंदगी से किस तरह खेला गया, इसका एक उदाहरण देखिए। बिहार की एजेंसी में निवासरत सरस्वती को 2018 में अमेरिका के एक पेरेंट्स से रिफरल दे कर मैच कराया गया और उक्त एजेंसी को आदेश दिया गया कि वो प्रक्रिया पूरी करे। एडॉप्शन के बाद सरस्वती को अमेरिकन दम्पति द्वारा जम पर प्रताड़ित किया गया, उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया। अंततः सरस्वती की मृत्यु हो गई।
CARA के अधिकारियों ने ख़ुद के बचने के लिए बिहार की ही उक्त एजेंसी को जिम्मेदार ठहरा दिया और सरकार से उसकी मान्यता ख़त्म कराने के लिए अनुशंसा कर दी। ब्लेम गेम में वो ये भूल गए कि विदेश में अनाथ बच्चों को गोद देने के लिए CARA की अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा दीपक कुमार पर एलटीसी घोटाले में संलिप्त रहने के भी आरोप लगे हैं। मंत्रालय इन मामलों की जाँच में लगा हुआ है।
जहाँ तक ईसाई मिशनरियों कि बात है, भारत मे उनका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। बड़े पादरियों पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं। चर्चों मे ननों के यौन शोषण की की वारदातें सामने आई हैं। इन सबके अलावा अब बच्चों को गोद लेने के मामलों मे उनका दाखल ये बताता है कि वो धर्मांतरण के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। और उनकी मदद करते हैं दीपक कुमार जैसे लोग, जो सरकारी संस्थाओं मे जमे हुए हैं।

‘Rape in India’ पर घिरे राहुल गाँधी : बपौती नहीं देश की महिलाएँ-- स्मृति ईरानी

स्मृति ईरानी-राहुल गॉंधी
रेप इन इंडिया वाले बयान को लेकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी बुरी तरह फॅंस गए है। लोकसभा में उनके इस बयान पर शुक्रवार को काफी हंगामा हुआ। इसके बाद लोकसभा की कार्रवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित करनी पड़ी। इससे पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी समेत कई महिला सांसदों ने राहुल गाँधी के बयान पर आपत्ति जताई और उनसे माँफी की माँग की। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी राहुल के बयान को आधार बनाकर पूछा है कि क्या ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को सदन में आना चाहिए?
झारखंड के राजमहल में गुरुवार को राहुल गाँधी ने चुनावी रैली को संबोधित करते हुए विवादित बयान दिया था। उन्होंने देश में बढ़ रही यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर अपनी चिंता व्यक्त करते-करते प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया था कि उन्होंने केंद्र की ‘मेक इन इंडिया’ को ‘रेप इन इंडिया’ बना दिया है। इससे वैश्विक स्तर पर देश की बदनामी हो रही है।
उनके इस बयान पर आज लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही भाजपा सदस्यों ने आपत्ति जताई। प्रश्नकाल आरंभ होने से पहले ही भाजपा की कई महिला सदस्य अपने स्थान पर खड़ी हो गईं और राहुल गाँधी से माफी की माँग करने लगीं।


स्मृति ईरानी ने कहा, “गाँधी खानदान के सदस्य ने कहा है कि महिलाओं का बलात्कार होना चाहिए, देश में हर कोई बलात्कारी नहीं है। जो बलात्कारी है, उसे कानून सजा देता है। हर महिला को कलंकित नहीं किया जा सकता है, इस पर एक्शन लेना चाहिए।”
ईरानी ने कहा, “देश की महिलाएँ उनकी बपौती नहीं हैं, रेप इन इंडिया का बयान देने का जो दुस्साहस उन्होंने किया है, उस पर एक्शन होना चाहिए।”
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी जाहिर की नाराजगी 
राहुल गाँधी के रेप इन इंडिया के बयान को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा, “मैं आहत हूँ, पूरा देश आहत हुआ है, क्या ऐसे लोग सदन में आ सकते हैं जो ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं? क्या उनको पूरा सदन ही नहीं, बल्कि पूरे देश से माफी नहीं माँगनी चाहिए?”
महिला सांसदों और रक्षा मंत्री के अलावा केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “राहुल खुलेआम कह रहे हैं कि रेप इन इंडिया, तो क्या वो दुनिया को भारत में आकर बलात्कार करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।”
वहीं, महिला भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने कहा,”मोदी जी ने कहा मेक इन इंडिया लेकिन राहुल गाँधी ने कहा रेप इन इंडिया, यानी वो स्वागत करते हैं उन लोगों का जो आएँ और बलात्कार करें। ये भारतीय महिलाओं और भारत माता का अपमान हैं।”
राहुल गांधी ने गुरुवार को झारखंड की मेहराना रैली में मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था, “देश में नरेंद्र मोदी ने कहा था मेक इन इंडिया, अब जहाँ भी देखो वहाँ मेक इन इंडिया नहीं, बल्कि रेप इन इंडिया है। अखबार खोलो तो झारखंड में महिला से बलात्कार, यूपी में नरेंद्र मोदी के विधायक ने महिला का रेप किया…हर प्रदेश में हर रोज रेप इन इंडिया।”
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से पहले सदन में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी ऐसा ही बयान दिया था। जहाँ उन्होंने भारत को रेप इन इंडिया बताया था। लेकिन काफी विरोध और आालोचनाएँ झेलने के बाद उन्होंने इस पर माफी माँग ली थी। 

राहुल गाँधी ने थाली में सजाकर अमेठी भाजपा की झोली में डाली

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
1977 में इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से 55,202 मतों से हार गईं थीं। 1977 में ही संजय गांधी अमेठी सीट पर करीब 76 हजार वोटों से हारे थे। इन दो मौकों को छोड़कर नेहरू-गांधी परिवार का कोई भी सदस्य कांग्रेस टिकट पर लड़ते हुए कभी भी चुनाव नहीं हारा था। अब तीसरी हार राहुल गांधी की हुई है। कांग्रेस अध्यक्ष की हार उसी अमेठी में हुई है, जहां इस परिवार को हराने की कोई कभी कल्पना भी नहीं करता हो।
मोदी की आंधी में विपक्षी ढेर हो गए। पूरे देशभर में भाजपा गठबंधन को 352 सीटें मिली हैं। उत्‍तर प्रदेश की अमेठी सीट पर रोचक मुकाबला देखने को मिला, स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 54731 वोटों से हरा दिया है, स्मृति ईरानी को 467598 वोट तो वहीं राहुल गांधी को 412867 वोट मिले हैं।
Related imageइस सीट पर राहुल गांधी तीन बार से सांसद थे और चौथी बार भी वह अमेठी से ही मैदान में थे। यहां मुकाबला काफी रोचक था क्‍योंकि केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी यहां से भाजपा के टिकट पर दोबारा चुनाव में उतरी थीं। 2014 में स्‍मृति ईरानी मामूली अंतर से हार गई थीं लेकिन इस बार उन्‍होंने राहुल गांधी को शिकस्‍त दे दी। उसके बावजूद राहुल ने अमेठी को कभी गंभीरता से नहीं लिया। किसी सलाहकार ने यह भी राय नहीं दी कि स्मृति हारने के बावजूद अमेठी के चक्कर काट रही हैं, दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि वह सारी ही दाल काली करने की व्यूरचना में व्यस्त है। या फिर दूसरे अर्थों में यही समझा जाए की राहुल 2014 के बाद से ही थाली में सजाकर अमेठी भाजपा की झोली में डालने का मन बना चुके थे।     
क्या राहुल की हार को यह कहकर सामान्य बता दिया जाए कि हारे तो इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी थे? उस समय देश में एक कांग्रेस पार्टी ही थी, जिसकी तूती बोलती थी। और तब इंदिरा और संजय तो जैसे देश की राजनीति के दो ऐसे चेहरे थे, जिनसे टक्कर लेने की कोई सोच भी नहीं सकता था। ये सारे तथ्य तो हैं, लेकिन इन तथ्यों को आधार बनाकर गढ़े गए तर्कों से राहुल की अमेठी में मिली हार को सामान्य नहीं ठहराया जा सकता। सच तो यही है कि अमेठी में राहुल की हार के संकेत और संदेश कांग्रेस पार्टी के लिए इंदिरा और संजय को मिली हार से ज्यादा खतरनाक और गंभीर हैं। 
इंदिरा गांधी और संजय गांधी को क्रमश: रायबरेली और अमेठी की जनता ने जो दंड दिया था वह उनकी उन ज्यादतियों के लिए था, जो उन्होंने इमरजेंसी के दौरान ढाए थे। यानी तब उनके खिलाफ वोट करने की एक मुख्य वजह थी। पर इस वक्त ऐसा कुछ भी नहीं है। राहुल की यही हार अगर 2014 में हुई होती, तब कुछ तर्क संगत वजहें गिनाई जा सकती थीं। तब तर्क दिया जा सकता था कि दूसरे कार्यकाल में जिस तरह से मनमोहन सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे यह उसी का नतीजा रहा। तब कहा जा सकता था कि राहुल ने सरकारी अध्यादेश फाड़ कर देश की पूरी सरकार की जो बेइज़्ज़त किया, यह उसी की प्रतिक्रिया थी। तब कहा जा सकता था। कई वरिष्ठ कांग्रेसियों का घमंड जिस तरह से सिर चढ़कर बोलने लगा था कि हिन्दू आतंकवाद और भगवा आतंकवाद के नाम पर निर्दोष हिन्दुओं, साधु, संत और साध्वियों को जेलों में डाल इस्लामिक आतंकवाद को संरक्षण दिया जा रहा था, यह उसी का परिणाम है। इन्दिरा गाँधी जो स्वयं रोहिंग्याओं के विरुद्ध थीं, लेकिन सोनिया से लेकर राहुल गाँधी तक वर्तमान कांग्रेस रोहिंग्याओं को आबाद करने में लगी रही, यह उसी का परिणाम है।
लेकिन 2019 में अमेठी में मिली हार की सिर्फ एक ही वजह दिखती है। वह वजह है राहुल की नाकामी। एक सांसद के तौर पर अमेठी की जनता की उम्मीदें पूरी करने में नाकामी। विपक्ष के सबसे बड़े नेता के तौर पर प्रभावशाली भूमिका निभाने में नाकामी। पार्टी नेता के तौर पर मजबूत नेतृत्व और रणनीति पेश करने में नाकामी। राहुल के खिदमददारों ने आलू से सोने बनाने की बात कहलवा दी, लेकिन उसको किर्याविन्त नहीं करवाया। चाहिए यह था कि देश के किसी अन्य प्रान्त की बजाए अगर अमेठी या रायबरेली में ही आलू के चिप्स बनाने की फैक्ट्री लगवा दी होती, लोगो को रोजगार भी मिलता और आलू से सोना भी, एक पांच रूपए के चिप्स के पैकेट में मुश्किल से एक मध्यम आकार के आलू के बराबर भी चिप्स नहीं होते। परन्तु जो हुआ सब हवा-हवाई। 
अवलोकन करें:-
इस वेबसाइट का परिचय
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर देश की बागडोर संभालने जा रहे हैं। एक गरीब चायव....

यह सवाल उठेगा कि खुद की नैया पार न उतार सकने वाले राहुल पूरी पार्टी के खेवनहार कैसे बन पाएंगे? इंदिरा और संजय की हार के बाद कांग्रेस के सामने सब कुछ खत्म हो जाने का अहसास नहीं था। राहुल की अमेठी में हार और उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट जीत सकने के बाद पार्टी बहुत कुछ खत्म होने के दर्द से जरूर गुजरेगी। इन्दिरा और संजय में पार्टी को जान फूंकने की जो क्षमता थी, वह राजीव परिवार में लेशमात्र भी नहीं। हाँ, यदि सोनिया गाँधी ने अपने अहँकार को त्याग मेनका गाँधी को वापस परिवार में सम्मिलित कर लिया होता, शायद कांग्रेस की ऐसी दुर्दशा नहीं होती, क्योंकि जो क्षमता मेनका और वरुण में है वह सोनिया और उनके बच्चों में बिल्कुल भी नहीं। परन्तु अब बहुत देर हो चुकी है। सोनिया तो मिशनरीज के जाल से बाहर ही नहीं निकल पायीं, कांग्रेस का क्या उद्धार करेंगी?   
राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठेंगे
पार्टी के बुरे प्रदर्शन और अमेठी में अपनी हार के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की। इस बात के आसार कम ही हैं कि उनकी पेशकश को स्वीकार कर लिया जाए। लेकिन अपने इस्तीफे की पेशकश सोनिया गांधी के सामने कर उन्होंने फिर एक बड़ी गलती कर दी। इससे पार्टी के सिर्फ एक परिवार पर टिके होने की विसंगति फिर से सामने आई। अच्छा होता कि वह ये पेशकश सिर्फ पार्टी के सामने करते और उन्हें फैसला लेने की आजादी देते। हालांकि इसके बाद भी ऐसे आसार कम ही होते कि राहुल का इस्तीफा मंजूर कर लिया जाता, लेकिन कम-से-कम परिवार के आगे महत्वहीन हो रही पार्टी का यश कुछ तो बढ़ता।
प्रियंका भी बन गईं अमेठी की हार में हिस्सेदार
इसी साल 23 जनवरी को सक्रिय राजनीति में आई प्रियंका को उत्तर प्रदेश की आधी से ज्यादा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन ठीक 5 माह बाद यानि 23 मई को पार्टी पाताल लोक की ओर अग्रसर हो गयी। राहुल गांधी की इस छोटी बहन ने सबसे ज्यादा वक्त अमेठी को दिया। प्रियंका कम-से-कम 7 बार अमेठी गईं। उनके इन अमेठी दौरों की तस्वीरें और बातें न्यूज चैनल्स पर घंटों दिखाई गईं। प्रियंका ने विरोधी उम्मीदवार स्मृति ईरानी पर अमेठी का मान-मर्यादा से खेलने के आरोप लगाए। प्रियंका के सामने छोटे-छोटे बच्चों ने प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द कहे। इन्हीं सबके बीच जब राहुल ने वायनाड की दूसरी सीट चुन ली, तो बीजेपी ने इसे कांग्रेस अध्यक्ष की अमेठी से हार का डर बताया। नतीजों ने बीजेपी के दावे पर मुहर लगाने का काम किया। पर इस पूरे घटनाक्रम में जो एक बात और हुई वह यह कि अमेठी की हार में वहां अपनी अतिसक्रियता की वजह से प्रियंका भी हिस्सेदार बन गईं।
इन्हीं चुनावों के दौरान 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव की जुटकर तैयारी करने की बात करने वाली प्रियंका गांधी पर भी सवाल होंगे। कांग्रेस की हार तो प्रियंका ने उसी दिन निश्चित कर दी थी, जिस दिन उन्होंने कहा था कि "चुन-चुनकर ऐसे लोगो को टिकट दिए हैं, जो भाजपा के वोट काट सके।" प्रियंका के इस व्यक्तत्व ने स्पष्ट रूप से यह सन्देश दे दिया था कि "कांग्रेस जीतने के लिए नहीं बल्कि वोट काटने के लिए आज़ाद उम्मीदवारों सवाल होंगे कि अपने भाई की हार टालने में नाकाम रहने वाली नेहरू-गांधी परिवार की ये सबसे युवा राजनेता 2022 के त्रिकोणीय या चतुर्कोणीय (अगर एसपी-बीएसपी अलग हो गई) मुकाबले में कांग्रेस के अस्तित्व को प्रदेश में कहां तक टिका पाएगी?
नेहरू-गांधी परिवार के भविष्य पर सवाल
सोनिया गांधी की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए कांग्रेस को नए नेतृत्व की जरूरत महसूस हुई। पार्टी ने निर्विवाद तरीके से कमान राहुल को सौंप दी। प्रियंका गांधी ने राजनीति में एंट्री का फैसला लिया। सीधे महासचिव के पद से उनके करियर की शुरुआत करा दी गई। प्रियंका की समझ और व्यक्तित्व पर कोई संदेह न भी हो, तो नतीजे देने का दबाव उन पर राहुल से भी ज्यादा होगा। यही नहीं, ये नतीजे उन्हें अगले कुछ महीनों से लेकर एक-दो साल में ही देने होंगे। जब एक के बाद एक कई राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव होंगे। राहुल के हिस्से में पहले ही चुनावी नाकामियों की लंबी फेहरिस्त जमा हो चुकी है। जब भाई-बहन की जोड़ी यहां से पार्टी को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, तो उनके पास वक्त नहीं होगा। क्योंकि वक्त पहले ही निकल चुका है। नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व अगर वोट दिलाने और चुनाव जिताने की स्थिति में नहीं होगा, फिर ऐसी विषम परिस्थितियों में या तो ‘राजनीतिक श्रद्धालु’ उस चौखट से निकल जाएंगे या फिर आए दिन उसकी अवहेलना-अवमानना करते नजर आएंगे।

क्या कांग्रेस ने हार स्वीकार कर ली है?

RAHUL GANDHI WAYNAD SEAT
जब राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल रही थी, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था "जितनी जल्दी हो, राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाइए", जो आज चरितार्थ हो रहा है। राहुल गाँधी एक विशेष परिवार से है, कोई प्रधानमन्त्री नहीं, फिर कांग्रेस की अपनी पारम्परिक अमेठी के साथ-साथ केरल से चुनाव लड़ने के पीछे क्या रहस्य है? क्या अमेठी में कांग्रेस ने हार स्वीकार कर ली है? प्रधानमन्त्री उम्मीदवार को ही दो सीटों से चुनाव लड़ते देखा है, किसी पार्टी अध्यक्ष को नहीं। अन्य दल भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो रहे हैं, लेकिन कांग्रेस को अलग रख रहे हैं? क्या आज कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव लग चुकी है? क्योकि सीपीआई(एम) भी भाजपा को हराने की बात कर रही है, साथ ही साथ वायनाड से राहुल गाँधी को भी हराने की बात कर रही है।   
कांग्रेस पार्टी ने मार्च 31 को ये साफ कर दिया कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के अमेठी के अलावा केरल के वायनाड निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। इसकी आधिकारिक घोषणा के साथ ही कई दिनों से इस पर बने सस्पेंस से भी पर्दा उठा दिया है। इस संबंध में कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व कांग्रेस मंत्री ए के एंटनी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जानकारी दी। उन्होंने राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने की कई वजहों का भी जिक्र किया।
पार्टी ने बताया कि पिछले कई सप्ताह से कांग्रेस के कार्यकर्ता ये अनुरोध कर रहे थे कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को साउथ में किसी एक सीट से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए। खासतौर पर ये अनुरोध कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से किए जा रहे थे। इससे पहले यहां ये जानना जरूरी है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में वायनाड में कांग्रेस की स्थिति क्या थी।
पिछले दो लोकसभा चुनाव 2009 और 2014 में कांग्रेस को वायनाड सीट पर जीत हासिल हुई थी। 2014 में यहां की सीट पर कांग्रेस को महज 20,870 वोटों के अंतर से जीत हासिल हुई थी। कांग्रेस उम्मीदवार एमआई शानवास को एलडीएफ (सीपीएम) के सत्यन मोकेरी से 1.81 फीसदी ज्यादा वोट मिले थे। यह फासला कुल पड़े वोटों में से था। 
केरल में अभी सीपीएम की सरकार है और राज्य की वायनाड सीट पर अभी कांग्रेस का कब्जा है। 2014 के पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में भी यह सीट कांग्रेस के हिस्से में आई थी। ऐसी स्थिति में राहुल गांधी के यहां चुनाव लड़ने से अब इस सीट पर सभी की नजरें टिक गई हैं। बहरहाल एक नजर डालते हैं इस सीट पर पिछले लोकसभा चुनावों के सियासी समीकरणों पर-
वायनाड संसदीय क्षेत्र
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि केरल के वायनाड को लोकसभा का संसदीय क्षेत्र बने हुए कुछ ही साल हो रहे हैं। 2008 में इसे लोकसभा का निर्वाचन क्षेत्र बनाया गया था। वायनाड लोकसभा सीट के अंतर्गत सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से तीन जिले वायनाड में आते हैं ये हैं- मानाथावाडी, सुल्तानबथेरी और कल्पेट्टा। इनके अलावा एक कोझिकोड जिले का थिरुवंबाडी है और तीन अन्य मलप्पुरम जिले के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र एननाड, नीलांबुर और वांडूर आते हैं। यह सीट पिछले साल से ही खाली है जब यहां के सांसद का निधन हो गया था। 

2009 का लोकसभा चुनाव 
2009 के लोकसभा चुनाव में वायनाड सीट पर कुल 11,02,097 वोट पड़े थे जिसमें कांग्रेस के शानावास को 410,703 वोट मिले थे जो कुल वोट का 49.86 फीसदी था। उन्होंने सीपीआई के एम रामातुल्लम को हराया था जिन्हें 257,265 वोट मिले थे जो कुल वोट का महज 31.23 फीसदी था। इस चुनाव में बीजेपी के सी वासुदेवन मास्टर को 31,687 वोट मिले थे जो कुल पड़े वोटों का मात्र 3.85 फीसदी ही था। 

2014 का लोकसभा चुनाव
2009 की तुलना में 2014 के लोकसभा चुनाव में शानवास को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें 377,035 वोट मिले थे जो कुल वोटों का 30.18 फीसदी था जबकि उनके प्रतिद्वंदी सीपीआई के सत्यम मोकेरी को 356,165 वोट मिले थो जो कुल वोटों का 28.51 फीसदी था। इस चुनाव में भी बीजेपी तीसरे नंबर पर रही। बीजेपी उम्मीदवार पी आर रासमिलनाथ को 80,752 वोट ही मिले थे जो कुल वोटों का महज 6.46 फीसदी था।

क्या है वायनाड का वोट गणित 
केरल के वायनाड जिले की कुल जनसंख्या की बात की जाए तो 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी 8,17,420 है। इसमें से 401,684 पुरुष जबकि महिलाओं की संख्या 415,736 हैं। केरल देश के सबसे साक्षर राज्यों की श्रेणी में पहले स्थान पर आता है ऐसे में वायनाड जिले का साक्षरता प्रतिशत 89.03 प्रतिशत है।

वायनाड में हिंदू आबादी कुल 404,460 (49.48%) है। मुस्लिम आबादी 2,34,185 (28.65%) है। ईसाई) समुदाय की बात करें तो उनकी जनसंख्या 1,74,453 (21.34%) है। अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी 3.99 प्रतिशत जबकि अनुसूचित जनजाति (एसटी) की तादाद 18.53 प्रतिशत है। कुल आबादी के 96.14 फीसदी लोग शहरी इलाकों में रहते हैं  वहीं 3.86 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में निवास करते हैं। 
अमेठी में स्मृति को फायदा होगा क्या? 
केरल के वायनाड से राहुल के लड़ने की घोषणा हुई नहीं कि बीजेपी टूट पड़ी। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि- “राहुल हार के डर से अमेठी छोड़कर भाग निकले हैं। जहाज को डूबता देखकर कप्तान भाग गया है।” ये शुरुआत है। पूरे चुनाव के दरम्यान राहुल पर अमेठी छोड़ने के लिए हमले होने तय हैं। खासतौर से अमेठी में तो अब विरोधियों का एजेंडा ही राहुल के दूसरी सीट से चुनाव लड़ने का होगा। बीजेपी की उम्मीदवार स्मृति ईरानी के आरोपों की कल्पना आप अभी से कर सकते हैं। ऐसे में एक सवाल जरूर रहेगा कि क्या राहुल ने इस फैसले से स्मृति ईरानी को अमेठी में ऑक्सीजन दे दिया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि समर्थकों के विरोध की आशंका न भी हो, तो चाहने वालों के एक हिस्से के अपेक्षाकृत निष्क्रिय होकर बैठ जाने की आशंका रहेगी? ये अलग बात है कि कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला दावा करते हैं कि- “अमेठी से राहुल का रिश्ता बेजोड़ है। वह सिर्फ जनप्रतिनिधि के तौर पर अमेठी  से जुड़े हुए नहीं हैं। लेकिन ऐसी बातें तो कांग्रेस और कांग्रेसी प्रवक्ता के मुंह से स्वाभाविक ही है। 
दक्षिण का किस्मत कनेक्शन...दादी, मां और अब राहुल 
बहरहाल, इस बार के चुनावी समर के नतीजे जो भी हों, इतिहास खुद को दोहरा जरूर रहा है। इंदिरा गांधी ने 1978 में कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से उपचुनाव जीता था, जबकि सोनिया गांधी ने 1999 में बेल्लारी में सुषमा स्वराज को मात दी थी। एक बात गौर करने लायक है कि तब 1977 में सत्ता खोकर इंदिरा गांधी राजनीतिक तौर से सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहीं थीं, तो 1999 में सोनिया गांधी अपने परिवार की राजनीतिक विरासत और कांग्रेस के वजूद को बनाए रखने के लिए लड़ रही थीं। और अब 2014 में इतिहास के सबसे बड़े संकट काल से गुजरने के बाद राहुल भी खुद को साबित करने और कांग्रेस को फिर से जीवनदान देने की जंग में उलझे हैं। इंदिरा गांधी ने 1980 में और सोनिया ने 2004 में जीतकर के साथ सत्ता में वापसी की थीं। क्या राहुल के लिए भी दक्षिण का ये किस्मत कनेक्शन काम करेगा? 
राहुल गांधी को हमारी पार्टी बुरी तरह से हार का मुंह दिखाएगी।-- सीपीआई(एम) 
केरल के वायनाड से राहुल गांधी के लोकसभा चुनाव लड़ने की खबर के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। केरल के मुख्यमंत्री पीनाराई विजयन ने रविवार को कहा कि राहुल गांधी का वायनाड से चुनाव लड़ने का फैसला लेफ्ट को चैलेंज है यह बीजेपी के खिलाफ उनकी लड़ाई नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यह तय है कि राहुल गांधी को हमारी पार्टी सीपीआई (एम) बुरी तरह से हार का मुंह दिखाएगी। 
अब सीपीआई (एम) (CPI M) के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी का इसपर बयान आया है। उन्होंने राहुल गांधी के केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने पर अपना बयान दिया। येचुरी ने कहा हम इस पर स्पष्ट हैं। यह लोकसभा चुनाव बेहद अहम होने वाला है, इस चुनाव में सेकुलर डेमोक्रेसी की हार या जीत का साफ फैसला हो जाएगा। बीजेपी को हटाना हमारी प्राथमिकता है। 
कांग्रेस फैसला करे, क्या करना है 
राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने की खबर पर येचुरी ने कहा कि यहां आकर एलडीएफ के खिलाफ चुनाव लड़ना, इससे वे क्या संदेश देना चाहते हैं ये कांग्रेस को फैसला करना है। कोई भी पार्टी ये निर्णय ले सकती है कि कौन सा उम्मीदवार किस सीट से चुनाव लड़ेगा, लेकिन वे लोगों को क्या संदेश देना चाहते हैं ये उन्हें स्पष्ट करना होगा।
सीपीएम नेता प्रकाश करात ने भी कहा कि लेफ्ट के खिलाफ उम्मीदवार उतारने का मतलब है कि केरल में कांग्रेस लेफ्ट को टारगेट कर रही है। इस तरह के हालात में हम पुरजोर ढंग से राहुल गांधी का विरोध करने के साथ ये सुनिश्चित करेंगे कि वायनाड में उनकी हार हो।
S Yechury on Rahul Gandhi contesting from Wayanad: Coming here&fighting against LDF, what message this conveys, that Congress has to decide. Any party can decide which candidate will contest from which seat but what's the message they want to convey,they'll have to explain to ppl
इस संबंध में ए के एंटनी ने बताया कि केरल और कर्नाटक के कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल गांधी ने वायनाड सीट से लड़ने का आग्रह कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये दक्षिण भारत के कार्यकर्ताओं के लिए उत्साह में इजाफा करने के लिए जरूरी था। इसलिए कार्यकर्ताओं की इच्छा को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी ने ये फैसला लिया।