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उत्तर प्रदेश में बुआ(मायावती) बबुआ(अखिलेश) को त्यागने को तैयार

SP BSP Alliance
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। कौन कब और कैसे किस की पीठ में छुरा मार दे, कुछ नहीं पता।सियासत अनिश्चिताओं का खेल है और जनता मूर्ख बन जाती है। सियासत सबसे अधिक बेवफा हसीना है। 
गठबन्धन होते समय अमर सिंह ने ठीक ही कहा था, "जब तक अखिलेश माया की जी-हजूरी करते रहेंगे, तभी तक यह गठबंधन चलेगा।" मायावती को अपनी डूबती नाव को बचाने के लिए समाजवादी पार्टी से समझौता किया, जो पूरा हो गया। कांग्रेस से दूरी इसलिए बनाई थी कि अमेठी और रायबरेली से बाहर कांग्रेस लगभग आधारहीन है, बस अब बबुआ को सत्ता का लालच दो और अपनी डूबती नैया को बचाओ, अपने इस खेल में मायावती सफल हो गयीं। बबुआ को इतना भी ज्ञान की, कोई नारी अपने शील(गेस्ट हाउस काण्ड) पर हुए हमले को कभी नहीं भूल सकती।
यदि बबुआ ने गठबन्धन नहीं किया होता, निश्चित रूप से मोदी सुनामी में बुआ की नैया तो डूब ही गयी थी और उत्तर प्रदेश में जिस तरह कांग्रेस मात्र अपने अस्तित्व के लिए चुनाव लड़ती है, लगभग वही स्थिति बसपा की होती। लेकिन बबुआ ने खुद ही अपने पॉव पर कुल्हाड़ी दे मारी। इस गठबंधन से बसपा को जितना अधिक लाभ हुआ है, उससे कहीं अधिक नुकसान बबुआ की पार्टी को हुआ है।    
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने लोकसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन पर क्षेाभ व्यक्त करते हुये पार्टी के पदाधिकारियों से ‘गठबंधनों’ पर निर्भर रहने के बजाय अपना संगठन मजबूत करने का निर्देश दिया है। मायावती ने आगामी उपचुनाव भी बसपा द्वारा अपने बलबूते लड़ने की बात कह कर भविष्य में गठबंधन नहीं करने का संकेत दिया है। 
लोकसभा चुनाव के परिणाम की समीक्षा के लिये मायावती ने जून 3 को उत्तर प्रदेश के पार्टी पदाधिकारियों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की बैठक में कहा कि बसपा को जिन सीटों पर कामयाबी मिली उसमें सिर्फ पार्टी के परंपरागत वोटबैंक का ही योगदान रहा। सूत्रों के अनुसार बसपा अध्यक्ष ने लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बावजूद बसपा के पक्ष में यादव वोट स्थानांतरित नहीं होने की भी बात कही है। उन्होंने विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में किये गये गठबंधन से उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलने का हवाला देते हुये कहा कि अब बसपा अपना संगठन मजबूत कर खुद अपने बलबूते चुनाव लड़ेगी। 
सूत्रों के अनुसार दिल्ली स्थित बसपा कार्यालय में हुई बैठक में पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष आर एस कुशवाहा, राज्य में पार्टी के सभी विधायक, नवनिर्वाचित सांसद, प्रदेश के सभी जोनल कोऑर्डिनेटर के अलावा सभी जिला अध्यक्षों को भी बुलाया गया था। समीक्षा बैठक में मायावती ने लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने के लिये गठित की गयी भाईचारा समितियों को आगे भी काम करते रहने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि बसपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान बहुजन समाज और पिछड़े वर्गों को चुनाव में एकजुट करने के लिये इन समितियों का गठन किया था। बसपा अध्यक्ष ने पार्टी के संगठन में पिछड़े वर्गों की भागीदारी और जिम्मेदारी बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया है। पार्टी प्रमुख ने मंडल स्तर पर कुछ बसपा कोऑर्डीनेटरों की जिम्मेदारियों में फेरबदल किया है।
मायावती ने लोकसभा चुनाव में कुछ विधायकों के सांसद बनने के कारण रिक्त हुयी विधानसभा सीटों पर आने वाले दिनों में होने वाले उपचुनाव भी अपने बलबूते लड़ने का पार्टी नेताओं को निर्देश दिया है। उन्होंने इस बाबत पार्टी पदाधिकारियों से उपचुनाव की तैयारियों में जुट जाने के लिये कहा।उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के 11 विधायकों के चुनाव जीतने के बाद इन सीटों पर उपचुनाव प्रस्तावित है। बैठक में शामिल पार्टी के एक नेता ने बताया कि बसपा के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष कुशवाहा सहित किसी अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी के खिलाफ फिलहाल कोई कार्रवाई नहीं की गयी है। इसके उलट कुशवाहा को मध्य प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है। 
 चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन से नाराज मायावती ने जून 1 की बैठक में दो राज्यों, मध्य प्रदेश और दिल्ली के बसपा अध्यक्षों सहित छह राज्यों के पार्टी प्रभारियों को पद से हटा दिया था। इनमें कुशवाहा भी शामिल थे। उन्हें उत्तराखंड के प्रभारी पद से हटा कर मायावती ने एम एल तोमर को राज्य का नया प्रभारी बनाया था।
बसपा प्रमुख मायावती लोकसभा चुनाव परिणाम की पिछले तीन दिनों से राज्यवार समीक्षा कर रही हैं। लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बावजूद पार्टी को उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिल सके। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही बसपा को हाल ही में संपन्न हुये चुनाव में उत्तर प्रदेश से महज 10 सीटों पर जीत हासिल हो सकी है। 

क्या सपा-बसपा गठबन्धन अपने अन्तिम पड़ाव पर है?

SP-BSP-RLD Coalition
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
उत्तर प्रदेश में पांचवें चरण के चुनाव की समाप्ति के बाद कुल 80 में से 53 सीटों पर चुनाव संपन्न हो चुके है। पांचवें चरण की कुल 14 सीटों पर चुनाव हुए हैं, उन में कई हाई प्रोफाइल सीटें भी हैं। लखनऊ लोकसभा सीट से केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं, तो अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ स्मृति इरानी मैदान में हैं। वहीं, रायबरेली में भी मतदान हो रहा है, जहां कांग्रेस अध्यक्ष की मां सोनिया गांधी चुनाव लड़ रही हैं। 
लेकिन इस बार के चुनाव में सपा-बसपा और रालोद के एक साथ आ जाने से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए हैं। यहां पर इस बार किसी की लहर जैसी कोई बात नहीं देखी जा रही है। हां इतना जरूर है कि गठबंधन के पक्ष में लोग जरूर लामबंद हुए हैं। सपा-बसपा के कैडर के एक साथ आने से समाज के अंतिम व्यक्ति तक यह संदेश जा रहा है कि मायावती और अखिलेश यादव एक साथ हैं और अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह दिया है कि भाजपा को हराने के लिए वो दो कदम पीछे भी हटने को तैयार हैं। वैसे पीछे मायावती भी हटी हैं, किसी नारी के शील पर हुए हमले(गेस्ट हाउस काण्ड) को भुलाना, उसके लिए बहुत हिम्मत की बात है। विशेषकर, यह जानते हुए की जिस व्यक्ति विशेष के इशारे पर गेस्ट हाउस कांड हुआ था, संभव है वह व्यक्ति जब उम्मीदवार होगा, तो उसका समर्थन भी करना पड़ सकता है और हुआ भी। ऐसे कई पहलु थे, जिन पर मायावती ने खून के घूँट पीये होंगे। तमाम लोग यह चाह रहे थे कि ऐसा न हो और समय-समय पर गेस्ट हाउस कांड की याद को ताजा किया जाता था। लेकिन मायावती ने अपने वक्तव्य में कहा कि वह एक दुर्घटना थी, जिसे नहीं होना चाहिए था। गठबन्धन में  मतलब बिल्कुल साफ है कि अगर भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल नहीं होता है और थर्ड फ्रंट जैसी कोई बात सामने आती है, तो शायद अखिलेश यादव पहले व्यक्ति होंगे जो मायावती का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाएंगे।  
अब भारतीय जनता पार्टी की तरफ से जो बयानबाजी की जा रही है कि सपा-बसपा का गठबंधन 23 मई को चुनाव नतीजों के बाद टूट जाएगा। जिस तरह से सपा और कांग्रेस का गठबंधन नतीजों के बाद खुद ही खत्म हो गया था। अब भाजपा की इन बातों में कितना दम है। इस पर भी चर्चा करना जरूरी है। वैसे भाजपा की सम्भावनाओं से इंकार भी नहीं किया जा सकता। क्योकि इस गठबन्धन का जो प्रभाव उत्तर प्रदेश में है, कहीं और नहीं। यदि गठबंधन को आशानुरूप सफलता नहीं मिलने की स्थिति में दोनों एक दूसरे पर वार करते नज़र आएंगे। फिर यह भी संभव है कि अगर किसी पार्टी को बहुमत हासिल न हो तो भारतीय जनता पार्टी खुद सरकार न बनाकर छोटी-छोटी पार्टियों को एक करके बाहर से समर्थन देकर सरकार बना दे और चाबी अपने पास रखे। इसलिए भाजपा नेताओं की बातों में सच्चाई भी हो सकती है। लेकिन अखिलेश यादव और मायावती ने जिस तरह से अपने सभी मतभेदों को भुलाकर गठबंधन किया है। उससे इस बात की गुंजाइश बहुत कम लगती है कि ऐसा संभव हो पाएगा। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए। उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। जब तक देश में यूपीए सरकार थी, समाजवादी और बहुजन समाजवादी तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी के इशारे पर नाच रहे थे और उत्तर प्रदेश में प्रभावहीन हुई कांग्रेस से दूरी बना ली। परन्तु अमेठी और रायबरेली में गठबन्धन ने किसी उम्मीदवार को न उतार कर कांग्रेस से स्पष्ट रूप में दूरी भी नहीं बनाई। जिस कारण सपा-बसपा गठबंधन भी लोगों के समझ से परे था। 
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखना कोई बुरी आदत नहीं, कम से कम उमंगें तो जवां रहती है, और हो.....

उसके बाद से जो भी फैसले हुए दोनों ही दलों के नेताओं ने मिलकर किया और आज तक वह बिल्कुल सही तरीके से चलता आ रहा है। दोनों ही दलों का शीर्ष नेतृत्व एक साथ मिलकर किसी काम को करते हैं और एक साथ रैलियां कर रहे हैं। मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव के साथ मायावती ने मंच साझा करके यह संदेश दे दिया कि गठबंधन धर्म को वो बिल्कुल समझती हैं और गंभीरता पूर्वक निभाना भी जानती हैं। इसके अलावा कन्नौज की रैली में डिंपल यादव का मायावती का पैर छूने से समाज में बहुत बड़ा संदेश गया और मायावती ने जिस तरह से डिंपल यादव को आशीर्वाद दिया उससे लग रहा था कि उनके दिल में इन लोगों के लिए खास जगह बन गई है।
अब भाजपा नेताओं का यह कहना कि यह गठबंधन बहुत जल्द टूट जाएगा, तो थोड़ा अजीब सा लगता है या यह कह सकते हैं कि निराशाजनक लगता है। अखिलेश यादव कहते हैं कि गठबंधन धर्म निभाने के लिए हम हमेशा दो कदम पीछे चलने के लिए तैयार हैं। अगर किसी वजह से इनका गठबंधन टूट जाता है, तो यह बहुत बड़ी राजनीतिक भूल साबित होगी। जबकि इसी तरह की प्रतिक्रिया अखिलेश ने राहुल के साथ हुए गठबंधन के दौरान भी कही थी, यानि राजनीती में ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, कहना मुश्किल है।  

इनके(जया प्रदा) नीचे का अंडरवियर खाकी रंग का है : आज़म खान

VIDEO: आजम खान ने पार की सारी हदें, जया प्रदा को लेकर दिया बेहद आपत्तिजनक बयान
उत्तर प्रदेश के रामपुर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आजम खान ने बीजेपी प्रत्याशी और अभिनेत्री जया प्रदा को लेकर बेहद आपत्तिजनक बयान दिया है। रामपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए आजम खान ने कहा कि जिसको हम उंगली पकड़कर रामपुर लाए, आपने 10 साल जिनसे अपना प्रतिनिधित्व कराया। उसकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लग गए मैं 17 दिनों में पहचान गया था कि इनके नीचे का अंडरवियर खाकी रंग का है इस रैली में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मौजूद थे
महागठबंधन प्रत्याशी आजम खान और बीजेपी प्रत्याशी जया प्रदा के बीच इससे पहले भी जुबानी जंग हो चुकी है इससे पहले बीजेपी प्रत्याशी जया प्रदा ने समाजवादी पार्टी उम्मीदवार आजम खान पर तंज कसा था उन्होंने एक रैली के दौरान कहा था कि मैं तो आजम खान को अपना भाई मानती थी लेकिन वह मुझे बहन बुलाने के साथ मेरे बीमार होने की भी कामना करते रहे जया प्रदा ने आगे कहा कि क्या आपका भाई आपको नाचने वाली के तौर पर देख सकता है यही वजह थी कि मैं रामपुर छोड़ने चाहती थी
वहीं, कुछ ही दिन पहले आजम खान ने रामपुर के शाहाबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए आरोप लगाया था कि जब बीजेपी के कैंडिडेट ने अपने सफर की शुरुआत की तो उन्होंने कहा कि मैं दानव का वध करने के लिए जा रही हूं। आजम खान ने कहा था कि उन्होंने रामपुर के बच्चों के लिए भीख मांग कर के स्कूल बनवाया, लाचार बच्चों के लिए एक अजीम-ओ-शान यूनिवर्सिटी बनवाई। लोगों को कोई परेशानी न हो इसलिए सड़क और पानी का काम कराया। लेकिन बीजेपी वालों के लिए मैं दानव हूं और इस बार मेरा वध होगा
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Azam Khan says in Rampur(in apparent reference to jaya prada), "Jisko hum ungli pakadkar Rampur laaye, aapne 10 saal jinse apna pratinidhitva karaya...Uski asliyat samajhne mein aapko 17 baras lage,main 17 din mein pehchan gaya ki inke niche ka underwear khaki rang ka hai"
आजम खान के इस बयान के बाद बीजेपी प्रत्याशी जयाप्रदा ने पलटवार करते हुए पुराने गंज में जनसभा के दौरान उन्होंने आजम खान को भाई कहकर संबोधित करते हुए कहा था कि मैंने कभी आपको अभद्र शब्द नहीं कहे। ये मेरे संस्कार हैं। उन्होंने कहा था कि मेरी मां ने मुझे संस्कार दिया हैं जयाप्रदा ने कहा था कि मैं आपके सामने आकर बोल सकती हूं कि आप झूठे हैं आप झूठ बोलकर भ्रम फैलाते हैं कि मैं रामपुर से भाग जाऊं
जया प्रदा ने 2004 और 2009 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की थी। उन्हें 2010 में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने और अमर सिंह के संपर्क में रहने की वजह से पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। ध्यान हो कि आजम खान ने कुछ समय पहले जया प्रदा को एक नाचने वाली बताया था। आजम खान हमेशा से ही अपने विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में बने रहते हैं

उत्तर प्रदेश : कानपुर में कहाँ है गठबन्धन ?

कानपुर से आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कभी एक म्यान में दो तलवारें नहीं समां सकती, और यह बात चरितार्थ होती है, सपा और बसपा के बीच हुए गठबंधन पर। अब यह गठबंधन कितना सार्थक सिद्ध होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, क्योकि पिछले चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन को भी अखिलेश यादव में अभूतपूर्व गठबंधन कहा था। जो ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। 
उत्तर प्रदेश में अखिलेश और मायावती के बीच हुए गठबन्धन में कितनी गहराई है, कानपुर में प्रतीत है, जहाँ दोनों पार्टियाँ अपनी ढपली, अपना राग सरीखा माहौल जान पड़ रहा है। प्रत्याशी घोषित होने के बाद भी साइकिल और हाथी की राहें एक नहीं हो पा रही हैं।
जिसे देख आभास होता है, दोनों केवल वर्जस्व बनाये रखने के लिए भाजपा के विरुद्ध गठबंधन कर जनता को पागल बना रहे हैं। उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों में अल्पकाल के लिए भाजपा को हराने में सफल होने को बहुत जीत मानने के हसीन सपने देखने शुरू कर दिए। दूसरे, हारी लड़ाई को लड़ गपच्ची पहलवान बनने का प्रयास किया जा रहा है। जहाँ तक बसपा की बात है, कांशी राम से लेकर आज मायावती तक ने कभी किसी उपचुनाव में अपना उम्मीदवार खड़ा ही नहीं किया, जो एक इतिहास है, और ऐसे में किसी अन्य दल को अपना समर्थन देने को कोई गठबंधन की जीत मानता है, यह उनकी और साथ ही साथ जनता की भी बहुत बड़ी भूल है।  
दरअसल कानपुर नगर सीट के लिए दोनों दलों की ओर से अभी तक एक भी संयुक्त सम्मेलन नहीं किया गया है। बसपा नेता सपाइयों को भाव नहीं दे रहे तो सपाई बसपाइयों के साथ खुद से तालमेल बैठाने के कोई जतन करते नजर नहीं आ रहे। 
सपा बसपा गठबंधन में अकबरपुर सीट बसपा के खाते में और कानपुर नगर सीट सपा के खाते में आई है। अपनी ढपली, अपना राग सरीखे माहौल को इस वजह से भी बल मिला है, क्योंकि अभी तक बसपा का पूरा फोकस सिर्फ अकबरपुर सीट पर ही दिखा है।
बसपा यहां पर खुद को मजबूत मानती है। हालांकि शुरुआत में बसपा यहां भी अपने दम पर ही प्रचार करती नजर आई थी। एकजुटता न होने की खबरें मीडिया में आने और सपाइयों की नाराजगी के बाद कुछेक सम्मेलन यहां संयुक्त रूप से हुए।
अब यही स्थिति नगर सीट में देखने को मिल रही है। सपा बसपा गठबंधन के बाद से नगर सीट पर दोनों दलों के बड़े नेता और कार्यकर्ता एक बार भी एक साथ नहीं आए। पिछले दिनों बसपा के जोनल इंचार्ज ने कानपुर जिले की सभी 10 विधानसभा क्षेत्रों के पदाधिकारियों के साथ एक बैठक भी की थी।
इसमें सपा नेताओं को नहीं बुलाया गया था। अभी तक माना जा रहा था कि सपा से प्रत्याशी घोषित न होने की वजह से दोनों दलों का तालमेल नहीं बन पा रहा है लेकिन अब प्रत्याशी भी घोषित और नामांकन प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।
बावजूद इसके नगर सीट के लिए संयुक्त सम्मेलनों की रणनीति नहीं बन पाई। चर्चा तो यहां तक है कि बसपाई सपा प्रत्याशी को लेकर खुश नहीं हैं। उधर कई दावेदार टिकट न मिल पाने की वजह से भी अलग अलग धड़ों में बंटे नजर आ रहे हैं।
बसपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी मानते हैं कि संयुक्त सम्मेलन में देरी हुई है लेकिन भविष्य के लिए प्लान तैयार है। उसे रणनीति के तहत अमल में लाया जाएगा। 
जनता द्वारा गठबंधन के विषय में पूछने पर मालूम हुआ, कि जिस तरह राहु और केतु कभी मिल नहीं सकते, उसी तरह यह गठबंधन कारगर सिद्ध नहीं होगा, क्योकि दोनों ही पार्टियों के नेता टिकट मिलने के आस लगाए हुए हैं और जहाँ जिस पार्टी के नेता को टिकट नहीं मिला, वह अन्दरखाने घोषित उम्मीदवार को हराने का प्रयत्न करेगा। उस स्थिति में गठबंधन को वोट देने से अच्छा है, भाजपा को ही वोट दे दिया जाये, वोट ख़राब तो नहीं होगा। कानपुर में गठबंधन में अंदरखाने चल रही गुटबाज़ी से उत्तर प्रदेश के अन्य ज़िलों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।    

माया ने अखिलेश को दिया 2 दिन का टाइम, रायबरेली और अमेठी से उम्मीदवार घोषित करो

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जब तक देश में यूपीए सरकार थी, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव  और मायावती कांग्रेस के साथ खड़े थे। और जब मोदी के विरुद्ध महागठबन्धन बना, तब भी मायावती कांग्रेस के साथ खड़ी थीं, परन्तु महागठबंधन बिखरा, मायावती कांग्रेस के दूरी बनाए रखने का कोई मौका नहीं छोड़ रही।   
प्रियंका गांधी के मेरठ पहुंचकर भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई हैं। इधर प्रियंका गांधी, चंद्रशेखर से मुलाकात कर रहीं थीं वहीं, प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सियासी सरगर्मी तेज हुई और सपा अध्यक्ष अखिलेशमायावती से मिलने पहुंचेसूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के रवैये से नाराज बसपा सुप्रीमो मायावती के प्रस्ताव से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहमत नहीं हैं इसके लिए उन्होंने अखिलेश को खरी-खरी सुना दी बताया जा रहा है कि घोषणा पत्र को लेकर दोनों नेताओं के बीच में मुलाकात हुई 
सूत्रों की माने तो चंद्रशेखर रावण और प्रियंका गांधी की मुलाकात से मायावती बेहद नाराज थीं मेरठ में इस मुलाकात के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश को अपने निवास माल एवेन्यू में बुलाया और कांग्रेस के तेवरों को देख रायबरेली और अमेठी में भी गठबंधन के उम्मीदवार को उतारने की बात कहीमायावती ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से दो दिन के अंदर उम्मीदवारों के नामों को लेकर फैसला लेने को कहा है सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव ने कहा है कि अमेठी और रायबरेली से भी गठबंधन चुनाव लड़ेगा  
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इस बैठक में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ सपा के राज्यसभा सांसद संजय सेठ भी मौजूद थेकरीब डेढ़ घंटे की मुलाकात में होली के बाद संयुक्त चुनावी रैलियां करने पर भी विचार किया गया. इसके साथ ही घोषणा पत्र को लेकर बी चर्चा हुई सूत्रों के मुताबिक, सपा के मेनिफेस्टो में बसपा का एजेंडा दिखाई देगा, क्योंकि बसपा ने अब तक किसी भी चुनाव में पार्टी का घोषण पत्र जारी नहीं किया है 
बैठक में कांग्रेस के तथाकथित वादों के बाद बदलती परिस्थितियों को देखते अमेठी और रायबरेली के अलावा कुछ अन्य सीटों पर भी सपा-बसपा प्रत्याशियों में बदलाव करने पर भी गंभीरता से विचार-विमर्श किया मुलाकात में कांग्रेस के प्रत्याशियों के उतारने से गठबंधन को होने वाले नुकसान पर भी चर्चा की गई 
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एक तरफ समस्त भारतीय जनता पार्टी विरोधी मोदी को पटकनी देने गठबन्धन कर रहे हैं, किन्तु इन्हीं में इतने मतभेद हो रहे ह....

मायावती पिछले दिनों ये साफ कर चुकी हैं कि बसपा कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में कोई गठबंधन नहीं करने वाली हैं मायावती के इस बयान के बाद बुधवार (13 मार्च) को प्रियंका गांधी वाड्रा मेरठ पहुंची और उन्होंने भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात की 

उत्तर प्रदेश : समाजवादी-बहुजन पार्टी गठबन्धन में मार दी सेंध

कांग्रेस ने RLD को दिया ये ऑफर!केंद्र की सत्ता के लिए बेहद अहम माने जाने वाले उत्तर प्रदेश का सियासी पारा लगातार बढ़ता जा रहा है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती के महागठबंधन में जगह ना मिलने के बाद कांग्रेस ने अपने 'तुरुप के पत्ते' के तौर पर प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के रण में उतारा है। प्रियंका के अलावा कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रियंका गांधी जहां कार्यकर्ताओं से संवाद बनाकर पूर्वांचल में कांग्रेस को मजबूत बनाने में जुटी हैं, तो वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया भी वेस्ट उत्तर प्रदेश की रणनीति बनाने में लगे हैं। सूत्रों की मानें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी रणनीति के तहत राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी से मुलाकात कर गठबंधन का गणित बिठाने की कोशिश में लगे हैं।
कांग्रेस ने RLD को दिया ये ऑफर! 

सूत्रों के हवाले से खबर है कि कांग्रेस की ओर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महासचिव के तौर पर नियुक्त किए ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार इस कोशिश में हैं कि राष्ट्रीय लोकदल को साथ लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरा जाए। इसी रणनीति के तहत पिछले एक हफ्ते के भीतर सिंधिया आरएलडी नेता जयंत चौधरी से दो बार मुलाकात कर चुके हैं। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस की तरफ से जयंत चौधरी को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए 11 सीटों का ऑफर दिया गया है। कांग्रेस ने आरएलडी के समक्ष 10 सीटें यूपी और 1 सीट राजस्थान में दिए जाने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि आरएलडी की तरफ से सपा-बसपा का साथ ना छोड़ने की बात कहते हुए कांग्रेस को ना कर दिया गया है।
क्या है महागठबंधन का फॉर्मूला 

अखिलेश यादव और मायावती ने उत्तर प्रदेश की 2 सीटों- अमेठी और रायबरेली को छोड़ते हुए, बाकी सभी 78 सीटों पर महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कांग्रेस को महागठबंधन में शामिल नहीं किया गया है। शुरुआत में इस महागठबंधन में आरएलडी को भी जगह नहीं दी गई थी, लेकिन बाद में खबर आई कि राष्ट्रीय लोकदल को भी 3 सीटें देते हुए महागठबंधन में शामिल किया गया है। खबर है कि आरएलडी को मुजफ्फरनगर, बागपत और मथुरा सीटें दी गई हैं। हालांकि आरएलडी ने 4 सीटों की मांग की थी, जिसमें अभी एक सीट को लेकर पेंच फंसा हुआ है। बताया जा रहा है कि एक सीट पर सपा उम्मीदवार को आरएलडी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव यूपी की कैराना लोकसभा सीट पर पहले ही ऐसा ही एक सफल प्रयोग कर चुके हैं।
प्रियंका गांधी की एंट्री से किसे नुकसान 

गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर पूर्वी यूपी की महासचिव के तौर पर नियुक्त हुईं प्रियंका गांधी के आने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में काफी जोश देखने को मिल रहा है। पिछले दिनों 'इंडिया टुडे पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज' के तहत 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रियंका गांधी को लेकर सर्वे भी किया गया। हालांकि सर्वे में शामिल 57 फीसदी लोगों का मानना था कि सक्रिय राजनीति में प्रियंका गांधी की एंट्री से यूपी में कांग्रेस के पुनरुद्धार में कोई मदद नहीं मिलेगी। 
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समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ कार्यक्रम में ज.....


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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील और कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने दलील दी है जिस तरह से राम हिंदुओं के लिए आस्था का...

सर्वे में सामने आया कि केवल 27 फीसदी लोग सोचते हैं कि प्रियंका गांधी के आने से यूपी में कांग्रेस का चुनावी सितारा चमकेगा। सर्वे में शामिल लोगों से जब पूछा गया कि प्रियंका के आने से यूपी में कौन सी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान होगा तो 56 फीसदी लोगों का कहना था कि सपा-बसपा के गठबंधन पर प्रियंका की एंट्री भारी पड़ेगी। इन 56 फीसदी लोगों में वो 27 प्रतिशत लोग भी शामिल थे, जिन्होंने यह माना कि प्रियंका गांधी की एंट्री कांग्रेस को यूपी में संजीवनी प्रदान करेगी। सर्वे में 31 फीसदी लोगों का कहना है कि प्रियंका यूपी में भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगी।

जनता सावधान : मोदी विरोधियों ने दुष्प्रचार के लिए खरीदी बिकाऊ पत्रकारों की भीड़



R.B.L.Nigam, Sr Journalist
68 journalists, writers and bureaucrats given 2-5 lakh/month to write against PM Modi through Cambridge Analytica.
1. Sekhar Gupta. 
2. Mitali Saran, 
3. Mihir Sharma, 
4. Colin Gonsalvez,
5. Kancha Ilaya Sephard, 
6. Akar Patel, 
7. Paranjay Guha, 
8. Pronay James Roy. 
9. Nidhi Razdan, 
10. Sagarika Ghosh, 
11. Monibina Gupta, 
12. S Vardarajan 
13. C K Venue,  
14. Rajdeep Sardesai, 
15. Arundhoti Suzzane Ray, 
16. Prof. Sazzad, 
17. Karan Thapar, 
18. Vinod Dua, 
19. Rabies Kumar, 
20. Ganesh Naddar, 
21. Harsh Mandar, 
22. Sanjeev Bhatt dismissed IPS, 
23. Vikram Chandra,
24. Rohini Singh, 
25. Nayantara Sehgal, 
26. Ashok Dasgupta, 
27. Suva Prasanna, 
28. Aparna Sen, 
29. Suva Datta, 
30. Mk Vadrakumar. 
31. TN Srini Raghavan. 
32. Kana's Dasgupta, 
33. S Bhatia, 
34. Amulya Ganguli, 
35. Rana Ayub alias Maithli Jha, 
36. Burqua Dutt, 
37. Sanjay Jha, 
38. Yogendra Yadav, 
39. Nandini Dash, 
40. Debi Goenka. 
41. Archis Mohan. 
More names in the below link.

https://postcard.news/68-journalists-writers-and-bureaucrats-given-2-5-lakh-month-to-write-against-pm-modi-through-cambridge-analytica/
Furthermore, the nation wants answer from the above senior journalists under which circumstances, say pressure, why they remained mum on Sonia's education, religion and her activation with an organisation working against India on Kashmir issue; Sonia's anti-Hindu activities as described by Hon'ble former President of India Pranab Mukherji in his book? There are thousands of queries these journalists to answer. And if the above report is upto the mark, no doubt, such journalists have made the journalism yellow journalism.

हाल ही में सपा-बसपा के चुनावी गठबंधन पर राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि गठबंधन तो ठीक है लेकिन मायावती के द्वारा मुलायम पर किए गए मुकदमे का अब क्या होगा? बता दें कि राज्यसभा सांसद अमर सिंह मकर संक्रांति के मौके पर स्नान के लिए हरिद्वार पहुंचे हुए थे। यहां पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने ये बातें कहीं। 
ये है मौकापरस्त राजनीति, मेरी प्रतिबद्धता मोदी जी के साथ : अमर सिंह 
अमर सिंह ने आगे कहा कि गेस्ट हाउस कांड मामले में जो मायावती ने अखिलेश यादव पर मुकदमा दायर किया था उसका अब क्या होगा? गठबंधन से कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि सपा और बसपा दोनों ऐसी पार्टियां हैं जो अपने-अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं, इसी कारण दोनों ने गठबंधन किया है। बीजेपी पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
इतना ही नहीं अमर सिंह ने हरिद्वार के वीआईपी घाट पर गंगा स्नान किया और आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के लिए प्रार्थना की। इसके अलावा पीएम नरेंद्र मोदी के फिर से सत्ता में आने के लिए पूजा-अर्चना भी की।
राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने इतना तक कहा कि लोकसभा चुनाव 2019 का परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन इसमें मोदी और उनकी नीतियों की ही जीत होगी। साथ ही मुलायम सिंह यादव पर तंज कसते हुए अमर सिंह ने कहा कि वे बिना हाथी की सवारी किए बिना अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते।
इतना ही नहीं सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा और सपा के बागी नेता शिवपाल को अमर सिंह ने पार्टी की रीढ़ कहा। अंत में अमर सिंह ने कहा कि मेरी प्रतिबद्धता मोदीजी के साथ है, बहुत राजनीति कर ली अब राष्ट्रनीति करुंगा। 
कभी एक दूसरे के खून के प्यासे थे सपा-बसपा, अब बना लिया गठबंधन- सी पी ठाकुर
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दिग्गज नेता और सांसद सीपी ठाकुर ने उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए बने समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गठबंधन से कांग्रेस को दूर रखने पर बयान देते हुए कहा है कि विपक्ष का महागठबंधन तो शुरुआत में ही बिखर गया. यह केवल दो पार्टियों का गठबंधन बनकर रह गया. 
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यूपी में जो दो पार्टियां एक साथ आई हैं, वो कभी एक-दूसरे के खून की प्यासी हुआ करती थी. सीपी ठाकुर ने कहा है कि सपा और बसपा का गठबंधन लोकसभा चुनाव तक टिकेगा, इस बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता है. इसके साथ ही ठाकुर ने इस गठबंधन को कांग्रेस के लिए तगड़ा झटका करार दिया है. उन्होंने कहा कि, सपा-बसपा के गठबंधन से भाजपा को यूपी, बिहार और झारखंड में कोई नुकसान नहीं होने वाला है. मीडिया से चर्चा करते हुए भाजपा सांसद ने कहा है कि कांग्रेस को कभी इसके लिए प्रयास भी नहीं करना चाहिए कि दुनिया के सबसे बड़ी पार्टी को वो मात दे सकेगी. इस दौरान उन्होंने मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए सवर्ण आरक्षण पर भी प्रतिक्रिया दी है. सीपी ठाकुर ने कहा है कि 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण से जनता प्रसन्न हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि सवर्ण आरक्षण का विरोध करने के लिए राजद को खामियाजा भुगतना होगा.
बुलंदशहर पर विधवा-विलाप करने,
#mob lynching, #intolerance,
#not in my name,  और
#metoo आदि षड्यंत्र रचने वाले
गिरोह अखिलेश यादव के कार्यकाल में
मुज़फ्फर नगर में हुए दंगों में
जब हिन्दुओं का दमन किया जा रहा था
तब क्या इन सबको साँप सूंघ गया था।  
सरकारी संस्थानों के अस्तित्व पर खतरा 
समस्त भाजपा विरोधियों द्वारा सरकार पर सरकारी संस्थानों जैसे सीबीआई आदि संस्थानों की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगा दिया है, लेकिन भूल गए कि इन्ही के कार्यकाल में इसी सीबीआई को सरकारी तोता के नाम से पुकारा जा रहा था। तुष्टिकरण पुजारी अपनी कुर्सी को बचाने हिन्दू साधु, सन्त एवं साध्वियों को झूठे केसों में जेलों में भर रहे थे। बेकसूर स्वामी असीमानंद, कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा को अमानवीय रूप से प्रताड़ित किया गया था? आतंकवादियों को खूब बिरयानी खिलाई जा रही थी और इन बेकसूरों को अभद्र एवं अमानवीय प्रताड़ना दी जा रही थी, किस तरह जाँच एजेंसियों द्वारा दबाव डाला जा रहा था, है किसी के पास कोई जवाब ! इन एजेंसियों का दुरूपयोग पिछली सरकार द्वारा किया जा रहा था। एनकाउंटर में आतंकवादियों के मारे जाने पर किस तरह जाँच एजेंसियों को आपस में ही भिड़वा दिया था। आंतकवादियों के मारे जाने पर आँसू भी बहाते देखा गया। 
संविधान खतरे में 
इस गठबंधन द्वारा संविधान को खतरे की बात भी बड़े जोर-शोर के साथ उछाली जा रही है। अगर इनके सहयोग से चल रही पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल में संविधान के विरुद्ध क्या नहीं किया? प्रधानमन्त्री के सम्मुख उन्ही के अध्यादेश को फाड़ना क्या संविधान के अनुरूप था? क्या प्रधानमंत्री को अपने आप किसी काम को करने की इजाजत थी? जिसका विस्तार से संजय बरुआ ने अपनी पुस्तक The Accidental Prime Minister में लिखा है और अब इसी पुस्तक पर फिल्म भी प्रदर्शित हो गयी है। जिस पर कांग्रेस चीख-चिल्ला रही है। फिल्म किस्सा कुर्सी का, आँधी, चर्चित गायक किशोर कुमार के गीतों का रेडियो पर प्रसारण पर रोक, फिल्म रोटी, कपडा और मकान के गीत हाय महंगाई तू कहाँ से आयी, मोहम्मद यूनुस की पुस्तक पर प्रतिबन्ध, रामजन्मभूमि का समाधान होते देख राजीव गाँधी ने कौन से संविधान के आधार पर चंद्रशेखर की सरकार को गिराया था? आदि एक लम्बी सूची है, जो पिछली सरकारों द्वारा संविधान को ताक पर रख दिया गया था। 
अब सोशल मीडिया पर प्रकाशित निम्न लेख को भी देखिये, जिसे बिना संपादन के प्रस्तुत किया जा रहा है :-






नीरज कुमार बातचीत में माहिर7 घंटे, (जनवरी 14,2019)  


पोस्ट लंबी है पर तथ्यपरक है, अवश्य पढ़ें।
अभी ताजा ताजा चर्चित दो ब्यूरोक्रेट्स से शुरू करता हूँ।
एक हैं बी चंद्रकला, तेलंगाना से,2008 बैच की IAS यूपी काडर मिला। चार साल बाद यूपी शासन ने डीएम का पद दे दिया, उसके बाद मैडम का जलवा शुरू हुआ, अचानक कहीं पहुँचना, काम में कोताही बरतने वाले अफसरों, ठेकेदारों, शिक्षकों की सरेआम जलालत, मलामत। एक पत्रकार ने फोन पर कुछ जानना चाहा, उसकी माँ-बहन एक कर दी, भेजूँ तेरी बहनिया के पास एक गैर मर्द को। जनता अभिभूत थी, हमें चाहिए भी ऐसे ही कड़क, दमदार, इमानदार और निष्पक्ष अफसर जो जनता के पैसे जाया न होने दें, सही काम हो। लोग लहालोट थे यह डायनामिज्म देखकर, प्रसिद्धि ऐसी फैली कि रातोंरात सोशल मीडिया की तारिका बन गयीं। फेसबुक पर 86 लाख फालोवर, ट्वीटर पर 8 लाख फैन क्लब्स।
फिर एकाएक एक न्यूज आती है, सीबीआई ने उनकी रिहायशों सहित 12 जगहों पर छापेमारी की। लोग आवाक थे, इतनी ईमानदार और कड़क आफिसर के विरूद्ध छापेमारी, फिर खबरें छनकर आने लगीं, रेत खनन के पट्टों के आबंटन गलत तरीके से, नियमों को ताक पर रखकर। मामला इतना गंभीर की तत्कालीन सीएम अखिलेश तक आँच पहुँच रही है। एफआईआर दर्ज हो गयी, बी चंद्रकला के अवैध आय का भी मामला बना।
आलोक वर्मा, सीबीआई डायरेक्टर, सांवैधानिक पद, जबरदस्त पावर, सीबीआई का नाम सुनते ही रूह कांप जाती है। एकदिन न्यूज आयी, सरकार ने जबरिया छुट्टी पर भेज दिया, उनके नायब राकेश अस्थाना सहित। बहुत बड़ी न्यूज थी, सीबीआई डायरेक्टर को छुट्टी पर भेजना। राजनीति शुरू हुई, मामला न्यायालय में, न्यायनिर्णय हुआ सेलेक्ट कमिटी ही हटा सकती है। सेलेक्ट कमिटी ने हटा दिया। भन्नाए आलोक वर्मा ने कहा वे आलरेडी रिटायर्ड पर्सन हैं, सो रिटायर समझा जाय। खबरें छनकर आयीं दिल्ली की 5 पाश कालोनियों में साहब की पाँच अट्टालिकाएं हैं। 10 कंपनियाँ हैं इनकी मिल्कियत, शराब का कारोबार है।
सवाल है ये दो ब्यूरोक्रेट्स कौन हैं ! बेशक ये भारतीय शासन व्यवस्था में सिस्टम के दो महत्वपूर्ण पद हैं जिनपर सरकार के नीतियों के कार्यावन्यवन की महती जिम्मेवारी है। एकदम झक सफेद टाइट कालर, चेहरे से रूआब बरसता हुआ, सामने देख लोग भय से रास्ता छोड़ देते हैं। पर वास्तविकता क्या है, ये सफेदपोश अंदर से बिल्कुल काले, भ्रष्ट, कानून की धज्जियां उड़ाते। चंद्रकला तो वंचित वर्ग से हैं, उन्हें जनता का दर्द शिद्दत से महसूस होना चाहिए था। ऐसा क्यों नहीं हुआ ? इसका कारण है कि हम भारतीयों में एक नयी संस्कृति विकसित हुई है, #आप_सुखी_तो_जग_सुखी
इन कार्रवाइयों पर राजनीति क्या कहती है, यूपी के दो भूतपूर्व सीएम का कहना है कि सीबीआई का मिसयूज किया जा रहा ब्लैकमेल करने को, डराने को। तो फिर क्यों नहीं नियम दिखाकर साबित कर देते कि पट्टे देने में निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ है। इ टेंडर करना था, नहीं किया। जिले के दो दबंगों को ही जिले के सारे पट्टे मिल गये, मतलब एजेंसियां अंधी हैं।
आलोक वर्मा के लिए तो पूरी कांग्रेस, पूरा विपक्ष, दलाल मीडिया उनके बचाव में उतरी हुई है।खड़गे दहाड़ रहा था, यार साबित कर दो न कि वेतन की कमाई से आलोक वर्मा ने ये सारी संपत्ति बनायी है,दे दो जवाब। अभी वर्मा की और कितनी परिसंपत्तियां हैं इसकी जाँच होनी है। ये दो उदाहरण बताते हैं कि सफेदपोश कितने बड़े दोगले हैं, जितना बड़ा ओहदा उतनी बड़ी लूट करते हैं।
ये दो उठाये गये सैंपल हैं टाप ब्यूरोक्रेट्स के जिनके जिम्मे सिस्टम में बहुत बड़ी जिम्मेवारी है सरकार के संपत्ति के रक्षा करने की। दोषियों को पकड़ने की,और ये खुद उसी दुष्कृत्य में संलिप्त हैं। इनका टेस्ट रिजल्ट नेगेटिव आया है। पूरी भारतीय जनता आश्वस्त है कि पूरे सिस्टम में कम से कम 70% आधिकारियों, कर्मियों के टेस्ट रिजल्ट नेगेटिव ही आयेंगे। आप कल्पना कीजिए कि जनता की कितनी धनराशि सिर्फ सरकारी कर्मी लूट रहे।
मैं ये क्यों लिख रहा हूँ , ये तो सब जानते हैं, मुश्किल से दस पाँच लोग ये पोस्ट पढ़ेंगे। निरर्थक मेहनत है, लेकिन मैं आश्वस्त हूँ कि यह मेहनत निरर्थक नहीं है।
1947 से 2014 तक यह सिस्टम विकसित और मजबूत होता आया है। 80 के दशक में समाजवादी भारत में प्रभावी हुए कांग्रेस का प्रबल प्रतिरोध कर के। समाजवाद की परिणति देश ने देखी। घरानों के उदय हुए, चारा घोटाला, मधुकोड़ा की लूट, मुलायम और मायावती का एम्पायर, ये समाज को न्याय देने अंतिम पायदान तक सरकारी लाभ पहुँचाने का वादा करके आये थे। इनका नकाब उतर गया, जल्दी ही इनके वास्तविक चेहरे सामने आ गये। पर तबतक ये जनता के पचासों हजार करोड़ डकार चुके थे। अंततः इन सबों ने कांग्रेस से गलबहियां कर लीं क्योंकि इनका मूल उद्देश्य भी यही था कि जनता की लूट का सुख #कांग्रेस अकेले क्यों भोगे। हमें भी राजनीति आती है, हम उससे क्यों #महरूम रहें। गले मिले और एका हो गया कि भाई हम #एक_होकर लूटें।
कांग्रेस बहुत पुरानी पार्टी है। उसमें एक से एक शातिर रणनीतिकार हैं। वह समझ चुकी थी कि जनता के बीच में से जबतक कुछ दलाल नहीं चुने जायेंगे हो हल्ला मचेगा, जो हानिकारक भी हो सकता है सो जनता को करप्ट बनाने का खेल शुरू हुआ। हर नेता अपने क्षेत्र में दलाल बनाने लगे जो प्रखंड से लेकर जिले तक लोगों का काम कराते, दलाली लेते, नेताजी का गुणगान करते, जनता को बताते नेताजी कितने त्यागी और महान हैं। यूपी बोर्ड की परीक्षा में कड़ाई होने पर 10 लाख छात्रों द्वारा परीक्षा का वहिष्कार और बिहार के इंटर टापर का पोलिटिकल साइंस को पोरोडिकल साईंस उच्चारित करना ये सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार नहीं बल्कि जनता का भी इस भ्रष्टाचार में कदम से कदम मिलाकर चलने का ज्वलंत उदाहरण है।
2004 से 2014 के बीच कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के नये रिकार्ड कायम किए, बैंकिंग व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया गया। आँख मूँदकर ऋण बाँटे गये, बैंकों का एनपीए बढ़कर 84 % हो गया। यूपीए सरकार बखूबी उसे 34 % प्रचारित करती रही, बैंक डूबने के कगार पर आ गये।
इसी राजनैतिक, आर्थिक और सामरिक परिदृश्य में आगमन हुआ मोदी का। कार्यभार संभालते ही दिमाग की चूलें हिल गयीं। डूबती अर्थव्यवस्था, सिस्टम में लूट का वर्चस्व, सामरिक रूप से कमजोर भारत, आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर, पाकिस्तान और चीन जैसे दो पारंपरिक दुश्मन दोनों तरफ से हमले को तैयार। कोई दूसरा होता तो चुपचाप सिस्टम के आगे सरेंडर कर देता, हालातों के आगे विवश। पर बंदा जिगरवाला है। राष्ट्रप्रेम हिलोरें ले रहा था दिल में, चैलेंज एक्सेप्ट किया और साथ मिला एक माहिर रणनीतिकार अजीत डोवाल का। चीजों की सच्चाई समझी और सबसे पहले पड़ोसी छोटे देशों भूटान, नेपाल, जापान की यात्रा कर चीन के विरूद्ध रणनीति तैयार की। फिर दौरा शुरू किया महाशक्तियों का। आतंकवाद के विरूद्ध लड़ने का अटल निश्चय दिखाकर पाकिस्तान को विश्व से अलग थलग किया और उनसे व्यापारिक तथा सामरिक रिश्ते प्रगाढ़ किये। फिर भारतीय वित्तीय संस्थानों की तरफ निगाह की और एक झटके में #नोटबंदी का एक ऐसा अभूतपूर्ल निर्णय लिया जो आत्मघाती था। इसके पूर्व भी इंदिरा जी के समय में इसकी बात उठी थी तो उन्होंने अपने वित्तमंत्री को झिड़के हुए कहा था : क्यों ? क्या आगे चुनाव नहीं लड़ना। एक कदम और जमाखोरों की कमर टूट गयी। आतंकियों और माओवादियों का शिराजा बिखर गया। बड़े बड़े राजनेता कंगाल हो गये लेकिन यह दुख ऐसा था कि #आपन_हारल_मेहरी_के_मारल इ दुख केहू से कहलो ना जाला। पर आज भी उनकी चीख जनता के नाम पर सुनाई देती है, उनकी व्यथा आप समझ सकते हैं। फिर एक और अभूतपूर्व निर्णय लिया #सर्जिकल_स्ट्राइक का और इसबार पाकिस्तान के हौसले तोड़ दिये। फिर #डोकलाम_विवाद पर चायना को तारे दिखाये। अब मोदी का ताप देख बैंक लुटेरों ने भागना शुरू किया। पर मोदी मोदी है, अब लुटेरे विदेश में बैठे कराह रहे हैं। मैं तो लौटाना चाहता हूँ। देश में तीस तीस साल से लंबित परियोजनाओं को मोदीराज में पूरा किया जा रहा है।
बिहार के लोग जानते हैं जब हमारे यहाँ कहा गया था : सड़क तुम गरीब का करेगा, बस त सब बड़ आदमी का चलता है, बढ़िया सड़क पर रेस बस चलायेगा त तुमलोग का बाल बच्चा पिचा जायेगा। पुलिस भी फट से तुम्हारे दुआरी पर पहुँच जायगी, और जनता ने जय जयकार किया था।
आज 6 लेन, 8 लेन, एक्सप्रेस वे, सुपर एक्सप्रेस वे बन रहीं। क्या रेलवे प्लेटफार्म पर की सफाई भी हमें नहीं दिखती।
गोरखपुर क्षेत्र में पिछले चालीस वर्षों से हर साल दसियों हजार बच्चे इन्सेफेलाइटिस से मरते थे और उसी बीमारी के नाम पर सरकारी लोग भारी माल लूटते थे। इस साल मौत की बात सुनी क्या ? योगी ने मौत की जड़ ही उखाड़ दी। यह साधारण अचीवमेंट है ?
कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष #सेलेक्टिव_विकास चाहते हैं, अपना और अपने दलालों का। मोदीजी देश को #सेट करना चाहते हैं। यह आपकी च्वाईस है कि आप अकेले खुश रहना चाहते हैं या पड़ोसी की भी खुशी चाहते हैं। एक बात जान लें अगर आपका पड़ोसी भूखे मर रहा, बेहाल है, त्रस्त है तो आप भी सुरक्षित नहीं, मरता क्या नहीं करता। हमारे हक में है कि पूरा भारत खुशहाल हो जिसके लिए मोदी अहर्निश मेहनत कर रहे। हमारा देश समृद्ध, स्वस्थ और सबल होगा तो हम भी समृद्ध और सबल होंगे। इसलिए यह हमारे आपके आत्ममंथन का दौर है कि हम लुटेरों को सत्ता सौंपे या एक नि:स्पृह कर्मयोगी को।
वंदे मातरम्, जयहिंद।
विश्राम त्रिपाठी , अधिवक्ता ।"
देश में जातिवाद 
वर्तमान मोदी सरकार पर एक आरोप देश में जातिवाद फ़ैलाने का भी लग रहा है। डॉ भीमराव आंबेडकर ने संविधान बनाने के बाद अपनी जाति के लिए 10 वर्ष का आरक्षण माँगा, जिसे स्वीकार कर लिया गया, लेकिन उसका दुरूपयोग होता देख, समय पूर्व इसे समाप्त करने को कहा था, क्यों नहीं माना गया? जातिवाद देश में किसने फैलाया? एक तरफ डॉ आंबेडकर का गुणगान किया जाता है, उसके विपरीत आज तक आरक्षण को लागू रख देश में जातिवाद को फ़ैलाने वाला कौन है? अपने वंश के लालन-पालन के लिए जाति के नाम पर पार्टियाँ बनाकर जातिवाद का जहर कौन फैला रहा है? 
अब देखिए अपने आपको जनेऊधारी हिन्दू कहने वाले    
राहुल  S/O राजीव गांधी
राजीव S/O फिरोज गांधी
फिरोज S/O जाहागीर खान
जहाँगीर S/Oजब्बार खान

जब्बार  S/O मोहम्मदनाशिर.खान

अब बताओ कौन से गोत्र के ब्राह्मण हुए ???
धर्म बदला....
जाती बदली....
बदल दिया है गौत्र....
दादा दबे ज़मीन में....
पंडित हो गए पौत्र....
मोदी विरोधी किस तरह मीडिया का दुरूपयोग कर रहे हैं। और अपने आपको खोजी पत्रकार कहने वाले क्या देशप्रेमी कहलाने योग्य हैं। देखिए मोदी और मोदी सरकार को बदनाम, जुमलेबाज और नकारा चिल्लाने वालों के नाम, इन पत्रकारों से कोई पूछे सोनिया गाँधी इलाज के लिए कब विदेश जाती थीं और कब वापस आती थीं, बताया कभी? सोनिया गाँधी और तथाकथित खोजी पत्रकारों की फौज कश्मीर विरोधी संस्था के सदस्य हैं, बताया कभी? कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ सुशील पंडित ठीक कहते हैं कि "पाकिस्तान क सबसे बड़ी ताकत भारत में रह रहे हज़ारों पाकिस्तान समर्थक और सैकड़ों मिनी पाकिस्तान हैं। 
अवलोकन करें:--· 



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सोनिया गांधी की बीमारी से जुड़ी जानकारी जितनी छिपाई गई उसका रहस्य उतना ही गहराता गया। अगस्त 2, 2016 को वाराणसी के रोड-श....

 आड़ में पर्दे के पीछे से गाँधी परिवार राज करता रहा, मंत्री तक नहीं बना। सत्ता में होते हुए पहली बार राष्ट्रपति बनाया श्रीमती प्रतिभा पाटिल और दूसरी बार बनाया श्री प्रणब मुखर्जी। .... दरअसल आजादी के बाद से कांग्रेस के कृत्यों पर गौर करें तो ये साफ है कि कांग्रेस पार्टी हिन्दू विरोधी और मुस्लिम परस्त रही है। विशेषकर, सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद से कांग्रेस में हिन्दू विरोध अधिक हो गया है, जिसका उल्लेख भूतपूर्व महामहिम श्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक तक में किया है।


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कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कांग्रेस के कई नेता भले ही मन्दिरों में जाकर खुद को ज़बरदस्ती हिन्दू दिख.....


फरवरी 2006 में इसी ब्लॉग पर शीर्षक "The story of two Lals --Motilal and Jawaharlal"(नीचे लिंक में देखें) लिखा था, कि नेहरू परिवार कोई ब्राह्मण नहीं, वास्तव में ब्रिटिश पुलिस के डर से मुस्लिम से परिवर्तित हिन्दू हैं। इन्दिरा गाँधी फ़िरोज़ से निकाह कर मैमुना बेगम बन गयी, परन्तु मोती लाल से लेकर राजीव गाँधी तक सभी का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति-रिवाज़ से ही हुआ। इनमें से किसी एक मुस्लिम रीति-रिवाज से दफनाया जाने पर जनता इनके ढोंग को समझ जाती। कई बार सोशल मीडिया पर भी इस परिवार की वं...
और देखें



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आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार फरवरी 2006 में इसी ब्लॉग पर शीर्षक "The story of…

खामोश मीडिया क्यों?
स्वतन्त्र भारत में इतनी भयानक घटना घटती है, मीडिया में कोई चर्चा ही नहीं होती। माना जा रहा है कि यह घटनाक्रम कांग्रेस समर्पित सरकार के राज में होने के कारण मीडिया इसे छुपाने की कोशिश कर रही है। यही नहीं, जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन अखिलेश यादव के कार्यकाल में एक मुस्लिम पदाधिकारी द्वारा के दलित को मूत्र पिलाये जाने पर भी मीडिया खामोश रही। उस समय भी किसी #metoo#mob lynching, #intolerance#not in my name, और #award vapsi आदि गैंग के मुँह से आवाज़ तक नहीं निकली थी।
अब प्रश्न यह है कि कांग्रेस अपने राज्यों में दलितों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने में असफल है। लेकिन राहुल गाँधी भी अब तक खामोश हैं।


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सोनिया गाँधी एक ऐसा नाम जिसको शायद ही किसी ने न सुना हो,और आज हम इन्ही के बारे में एक ऐसा विडियो दिखाने जा रहे हैं जिस...


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