लखीमपुर खेरी की हकीकत जो मीडिया कभी नही बताएगा

मोदी-योगी विरोधी अक्सर यह आरोप लगाते नज़र आते हैं कि मोदी ने मीडिया को खरीद लिया है। यदि मोदी ने मीडिया को खरीद लिया होता तो मीडिया तथाकथित किसान प्रदर्शन से 26 जनवरी लाल किला कांड, आंदोलन स्थलों पर बंट रही शराब, हो रहे बलात्कार से लेकर लखीमपुर खेरी कांड की सच्चाई कभी नहीं छुपाती। आखिर क्या कारण है कि मीडिया तथाकथित किसानों द्वारा किये जा रहे उपद्रवों की सच्चाई छुपा रही है? क्या मीडिया भी सच्चाई को छुपाकर योगी-मोदी को बदनाम कर सत्ता से हटाने में काम कर रही है? यह वह कटु सच्चाई है, जिसे हर देशप्रेमी को समझना पड़ेगा।  
लखीमपुर काण्ड का मुख्य उद्देश्य 
केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा को उनके पद से हटाना, क्योंकि अजय मिश्रा ने ऐसा बयान दिया था कि तराई में अवैध कब्जेधारी भूमाफिया भयग्रस्त हो गये थे। ऐसे में राकेश टिकैत से विचार विमर्श के बाद लखीमपुर काण्ड की पटकथा लिखी गई।

लखीमपुर कांड : ये किसान नहीं,दुधवा नेशनल पार्क की सैकड़ों-हजारों एकड़ जमीन कब्जा कर बैठे भूमाफिया थे। लखीमपुर की हकीकत को मीडिया कभी नही बताएगी। सच्चाई कुछ और ही है जिसे छुपाया जा रहा है। 

लखीमपुर घटना को लेकर वही नैरेटिव सेट किया जा रहा है जो दिल्ली दंगो को लेकर कपिल मिश्रा के बयान को लेकर किया गया था। आगे बढ़ने से पहले अजय मिश्रा का तथाकथित विवादित बयान भी जान लीजिए। कुछ दिन पूर्व जब मिश्र इस क्षेत्र में पहुंचे तो उन्हें अवैध कब्जाधारी भूमाफियाओं द्वारा काले झंडे दिखाए गए। इस पर मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा कि ये सब बन्द करो। हमें आपकी हरकतें पता है शीघ्र ही कड़ी कार्रवाई होगी। इसी बयान को मीडिया विवादित बयान कहकर घटना का जिम्मेदार बता रहा है।

किन्तु प्रश्न ये उठता है आखिर क्या है वो हरकत जिस पर केंद्रीय मंत्री ने इशारा किया था? क्या ये आन्दोलनजीवियों की कमजोर नस है जो दब गई? इसके लिये आपको घटनास्थल के आसपास के क्षेत्र की भौगोलिक और डेमोग्राफिक स्थिति समझना होगी। आप देखेंगे तो ये पूरा क्षेत्र दुधवा फौरेस्ट के नजदीक है। यहां पर शारदा, घाघरा जैसी नदियां है जिससे ये क्षेत्र सिंचित क्षेत्र कहलाता है जो कि खेती के लिए आदर्श स्थिति है। डेमोग्राफी देखें तो पूरे लखीमपुर जिले की लगभग आधी भूमि पर भूमाफियाओं का अधिकार है और लखीमपुर खीरी जिला ही क्यों आप निरीक्षण करेंगे तो पता लग जाएगा कि पंजाब से आकर सिखों ने उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी,बहराइच,गोंडा सहित तमाम जिलों में कृषि योग्य हजारों लाखों बीघा जमीन पर बड़े बड़े फॉर्म हाउस बना रखे हैं ।लखीमपुर खीरी के तिकुनिया क्षेत्र मे जहां पर ये घटना घटी १५ प्रतिशत पंजाबी हैं जिनके अधिकार मे अधिकांश भूमि अवैध है। यहां के तथाकथित किसान कोई गरीब मजबूर किसान नहीं हैं। अधिकतर के सैकड़ों एकड़ में फैले फार्महाउस है जो उन्होंने अतिक्रमण कर बनाए हैं। यहां साढ़े बारह एकड़ भूमि सीलिंग नियम के अंतर्गत आती है, इसलिए किस तरह से यहां सैकड़ों एकड़ में फार्महाउस बनाए गए बताने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए कृषि बिल का विरोध है क्योंकि बिल गरीब किसानों के लिए ही है जिससे धन्ना किसानों को अपनी जमीदारी खिसकती दिख रही है।

इसलिए जब कुछ दिन पूर्व मंत्री अजय मिश्रा ने कहा कि हम आपकी हरकतें जानते हैं और बड़ी कार्रवाई होगी तब यहां के बाहुबली किसानो में खलबली मच गई। ध्यान रहे अजय मिश्रा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री है और योगी सरकार भी माफियाओं के ऊपर शिकंजा कसने के लिए जानी जाती है। अतः मंत्री की चेतावनी से घबराए आन्दोलनजीवियों ने अपने आकाओं को खबर दी, जिन्होंने मौका देख कर चौका मारने का इशारा दे दिया ताकि किसी भी कीमत पर अजय मिश्रा को मंत्री पद से हटवाया जाए।

क्या थी पूरी घटना? 

शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि इस क्षेत्र में श्राद्ध के दौरान दंगल का आयोजन होता है जो वर्षो से चला आ रहा है। अजय मिश्रा का लखीमपुर जिले में गृहक्षेत्र है। वे स्वयं पहलवान रहे हैं और क्षेत्र के सम्मानित व्यक्ति हैं। वे अक्सर इस आयोजन में जाते रहें हैं,अतः आयोजकों ने इसमें शामिल होने के लिए उपमुख्यमंत्री मौर्य और अजय मिश्रा को आमंत्रित किया। भनक लगते ही हजारों की संख्या में भूमाफियाओं ने हेलिपेड को घेर लिया। तब मौर्य सड़क के रास्ते से निकल गए क्योंकि अराजकतावादियों का निशाना तो अजय मिश्र थे। 

जैसे ही मिश्र का काफिला संवेदनशील (पालघर जैसी) जगह से निकला, सैंकड़ो की संख्या में पंजाब से आए गुंडों ने आगे चल रही चार गाड़ियों को रोककर ताबड़तोड़ हमला कर दिया, जिसमें एक गाड़ी पलटने से दो आंदोलनकारियों की गाड़ी से दबकर और दो की धक्का लगने से मौत हो गई। गुस्साई अराजक आन्दोलनजीवी भीड़ ने गाड़ी से खींच कर 5 लोगों को डंडों से पीट पीटकर बेरहमी से तड़पा तड़पा कर हत्या कर दी। कहने की जरूरत नहीं कि ये पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित देशद्रोही तत्व थे, जिन्हें कांग्रेस, सपा तथा तृणमूल कांग्रेस जैसी भारतीय राजनीतिक दलों का आशीर्वाद और खुला समर्थन प्राप्त है।

जैसे 1761 में देश विरोधी तत्वों ने अहमद शाह अब्दाली को निमंत्रण देकर पानीपत के मैदान में मराठों का विनाश कराया था, उसी तरह इस बार उन्हीं अराजक तत्वों को आमंत्रित करके भाजपा की केंद्र तथा राज्य सरकार को मिटाने का षड्यंत्र रचा गया है।

इस दर्दनाक घटना के बाद अराजकजीवियो ने प्लान B के तहत मृतक परिवारो को आगे कर टिकैत को बुलाने की मांग की। योगी सरकार ने मामला समझते हुए तुरंत राजनीति करने आए विपक्षी गिद्धों को नजरबंद कर, टिकैत को जाने दिया, और समझौता करवाकर बड़े षड्यंत्र को असफल कर दिया।

अब शायद आपको घटना की सच्चाई समझ आ गई होगी। षडयंत्र का मुख्य हिस्सा कैसे भी करके अजय मिश्र को मंत्रिपद से हटवाना है। यदि ऐसा हुआ तो षडयन्त्रकारियों की जीत होगी और उनके हौसले और भी बुलंद होंगे। आगे जाकर इसकी आंच गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे तक भी पहुंच सकती है।

योगी सरकार के लिए भी ये परीक्षा की घड़ी है। योगी जी को अब इस क्षेत्र में बने फार्म हाउसों पर जांच बैठा देनी चाहिए। जांच होने दीजिए, शीघ्र ही सच सामने आ जाएगा।

अक्टूबर 5 को कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादियों ने पंडित मखन लाल बिंदरु और ठेला चलाने वाले विरेंद्र पासवान की हत्या कर दी। पंडित नेहरू के ख़ानदान वाले एक शब्द नहीं बोलेंगे इन हिंदुओं की हत्याओं और इस्लामिक आतंकवाद पर,ना ही वहाँ जाएंगे। आतंकवादियों की मौत पर ज़रूर रो लेते हैं। जब पंजाब और राजस्थान में किसानों पर लाठीचार्ज हुआ, न मीडिया ने शोर मचाया और न ही किसी भाजपा विरोधी ने, क्योकि वहां भाजपा की सरकार नहीं थी। इन्हें हंगामा तो भाजपा शासित राज्य में करना है। वहां जरा-सी घटना का ढोल पीट अराजकता जो फैलानी है। परन्तु किसी गैर-भाजपाई राज्य में गंभीर घटना पर मीडिया से लेकर भाजपा विरोधी तनाव फ़ैलाने में व्यस्त हो जाते हैं, वरना जल्दी इतनी कि प्रियंका रात में ही लखीमपुर के लिए निकल गई !

अखिलेश बहुत सवेरे निकल पड़े !

ओबैसी हैदराबाद से चल पडे !

कोलकाता से लेकर मुम्बई तक बयानबाजी शुरू हो गई !

राकेश टिकैत बॉर्डर से चल पड़े !

जाना आप वालों को भी था , वे चूक गए !

तेजस्वी जाएंगे , संजय राउत ने सामना में भड़ास निकाल ली !

हुआ क्या, यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। भाजपा नेताओं का घेराव करने निकले " किसानों " में भिंडरावाले के चित्र वाले टी शर्ट पहने वाले सिक्ख कौन थे, किसी को मालूम नहीं । हाँ इतना पता जरूर था कि केशवदेव मौर्य का चॉपर उतरने नहीं देना है। यह पता था कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा की कार ड्राइवर सहित फूंक डालनी है। जो नौ लोग मरे थे, उसमें कितने किसान थे, कितने कार्यकर्ता, कोई नहीं जानता, न किसी ने जानना चाहा। बस एक ही रट चलो लखीमपुर चलो लखीमपुर। हमसे पहले कोई और दल न पहुंच जाए, जल्दी चलो लखीमपुर।

लखीमपुर के किसानों का यह सच बहुत कड़वा है लेकिन यही सच उस खतरनाक सच को बता रहा है, जिसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा...

उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जनपद की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 40.6 लाख थी। अब लगभग 45 लाख है। इसमें लगभग 2 से ढाई लाख जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है। शेष 42-43 लाख लोगों का संबंध ग्रामीण क्षेत्रों से ही है। 2011  की जनगणना के अनुसार लखीमपुर में सिक्खों की जनसंख्या 1.06 लाख थी। आज यह अधिकतम लगभग डेढ़ लाख होगी। आप बड़ी सरलता से स्वंय ही यह अनुमान लगा लीजिए कि उत्तरप्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान करनेवाले लखीमपुर में कितने किसान सिक्ख हैं। और कितने किसान गैर सिक्ख हैं.?

अब जरा एक तथ्य पर ध्यान दीजिए....

लखीमपुर में हुए बर्बर हत्याकांड के जो दर्जनों वीडियो अब तक सामने आए हैं। उन सभी वीडियो में हाथ में झंडे डंडे लाठी तलवार पत्थर लेकर हमला कर रहे तथाकथित किसानों में लगभग 80-90 प्रतिशत सिख ही नजर आ रहे हैं? उस भीड़ में लखीमपुर की शेष 43 लाख जनसंख्या का हिस्सा, गैर सिक्ख किसान क्यों नहीं दिखाई दे रहे? यह सवाल लखीमपुर में हुए हत्याकांड की जड़ का खतरनाक शर्मनाक सच उजागर कर रहा है। उत्तरप्रदेश की पुलिस और केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के दस्तावेजों में भी दशकों से यह सच्चाई दर्ज है कि लखीमपुर और पीलीभीत के सिख  बहुलता वाले ग्रामीण इलाकों में कुख्यात खालिस्तानी आतंकियों के अड्डे रहे हैं। यह सिलसिला लगभग डेढ़ दशक तक बहुत तेजी से  चला था। आज भी खालिस्तानी आतंकियों और पंजाब से फरार अपराधियों की इन इलाकों में गतिविधियों के समाचार यदाकदा सामने आते रहते हैं। डंडों तलवारों से पीट रहे हत्यारों के बदन पर दिख रही खालिस्तान की टीशर्ट और उनके अगल बगल लहरा रहे खालिस्तानी झंडे  बता रहे हैं कि लखीमपुर में हुआ हत्याकांड किसानों के आक्रोश का नहीं बल्कि खालिस्तानी गुंडों हत्यारों द्वारा किए गए देशविरोधी तांडव का परिणाम है।

सत्ता के लिए लार टपकाते घूम रहे राजनीतिक भेड़िए लखीमपुर हत्याकांड के दोषी अपराधी खालिस्तानी हत्यारों को किसान बताकर उन्हें बचाने का दबाव सरकार पर बना रहे हैं। इसलिए उस दबाव के खिलाफ आवाज़ उठाना, लोगों तक सच पहुंचाना हमारा आपका भी दायित्व है।

उफ ! सत्ता की हवस भी क्या चीज है? कुर्सी का दर्द भी क्या दर्द है? राजनीतिक ग्लैमर खो देने की पीड़ा कितनी असह्य है। सत्ता पाने का जब कोई रास्ता नहीं बचा तो डेरा डालो घेरा डालो। हुआ क्या, क्यों सोचें, भड़का दो, वायरल कर दो, आग लगा दो, फैला दो।  हकीकत कुछ दूसरी हुई तो क्या हुआ, कुछ और वोट तो पक्के। अब उत्तर प्रदेश है तो खेला भी पक्का। मुकाबला योगी से है तो मानों मोदी और अमित शाह से है। अब 2024 तक  कौन बाट जोहे, तो चल पड़े रातों रात। कर दो बवाल पर बवाल, जब तक असलियत सामने आए, धूम मचा दो आग लगा दो, आसमान सर पर उठा दो। जब सुबह होगी, देखा जाएगा। हकीक़त क्या है, जब पता चलेगा तब चलेगा। अभी तो गर्मी है, होश जला दो।

लखीमपुर में किसान भी मरे, भाजपाई भी, मजदूर भी, पत्रकार भी और इंसानियत भी। यदि मंत्री और उसके बेटे ने किसानों को कुचला है, तब बेशक भीड़ के डर से उपजी भगदड़ हो, मंत्री, उनका बेटा और नेता  जिम्मेदार हैं। बहुत सारे वीडियो वायरल हैं। कुछ में साफ है कि किसानों को मारा जा रहा था और कुछ में भीड़ लाठी डंडे बरसा रही थी। लाठियां फटकार कर भीड़ से लोगों को बचाती पुलिस भी नजर आई। खैर, अब पूर्व न्यायाधीश उच्चस्तरीय जांच करेंगे, तो खुलासा हो जाएगा।

एक आश्चर्यजनक घटना भी हुई। वह थी टिकैत का समझौतावादी रुख। जहां प्रियंका और अखिलेश दियासलाई लेकर आग लगाने आए थे, टिकैत ने उनके मंसूबों पर पानी की बौछार कर दी। टिकैत ने डीजीपी , पीड़ित परिवारों और मध्यस्थों के साथ बैठकर बहुत जल्द समझौता करा दिया। शायद ही किसी घटना में पहले कभी 45-45 लाख मुआवजा और सरकारी नौकरी दी गई हो। टिकैत के समझौतावादी रवैये से जहाँ सभी खुश हैं, प्रियंका, राहुल और योगेंद्र यादव खफा हैं। भिंडरावाले के छापे वाले खालिस्तानी गुस्से में हैं। उनके हाथों से आग भड़काकर सत्ता पाने का मौका यूँ ही निकल गया। 

लकीमपुर की हकीकत जो मीडिया कभी नही बताएगा.

आखिर लखीमपुर में ऐसा क्या हुआ जो इतनी विकराल घटना घटित हुई। क्या वही सच है जो मीडिया द्वारा बताया जा रहा है। क्या अजय मिश्रा का पूर्व बयान घटना का कारक है जैसा मीडिया, विपक्ष और आन्दोलनजीवी बता रहे है या सच्चाई कुछ और ही है जिसे छुपाया जा रहा है। 

लखीमपुर घटना को लेकर वही नरेटिव सेट किया जा रहा है जो दिल्ली दंगो को लेकर कपिल मिश्रा के बयान को लेकर किया गया था। आगे बढ़ने से पहले अजय मिश्रा का तथाकथित विवादित बयान भी जान लीजिए। 

कुछ दिन पूर्व जब मिश्र इस क्षेत्र में पहुंचे तो उन्हें पगड़ी किसानों द्वारा काले झंडे दिखाए गए इस पर मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा कि ये सब बन्द करो हमे आपकी हरकतें पता है शीघ्र ही कड़ी कार्रवाई होगी। इसी बयान को मीडिया विवादित बयान कहकर घटना का जिम्मेदार बता रहा है। 

किन्तु प्रश्न ये उठता है आखिर क्या है वो हरकत जिस पर केंद्रीय मंत्री ने इशारा किया था? क्या ये आन्दोलनजीवीयो की कमजोर नस है जो दब गई। इसके लिये आपको घटनास्थल के आसपास के क्षेत्र की भौगोलिक और डेमोग्राफिक स्थिति समझना होगी। 

आप देखेंगे तो ये पूरा क्षेत्र दुधवा फारेस्ट के नजदीक है। यहां पर शारदा, घाघरा जैसी नदिया है जिससे ये क्षेत्र सिंचित क्षेत्र कहलाता है जो कि खेती के लिए आदर्श है।  

डेमोग्राफी देखे तो पूरे लखीमपुर जिले में कुल 2.35% लगभग सिख आबादी और 20.7% के लगभग टिड्डा आबादी है। 2001 में इस जिले को अल्पसंख्यक बाहुल्य जिला घोषित किया गया था। शब्दावली पर ध्यान दे "अल्पसंख्यक बाहुल्य"

समस्या कहां है ?

लखीमपुर जिले में भले ही 2.35% सिख है लेकिन जहाँ ये घटना घटी वहां आसपास का क्षेत्र मिलाकर कुल 15% सिख है साथ ही टिड्डे भी ये ठीक उसी प्रकार है जैसे पालघर। यहां अधिकतर सिख नवसिक(मिशनरीज प्रेरित) बन चुके है जिनका झुकाव खाली स्थान की तरफ है

यहां के तथाकथित किसान कोई गरीब मजबूर किसान नही है। अधिकतर के सैकड़ों एकड़ में फैले फार्महाउस है। जो उन्होंने अतिक्रमण कर बनाए है। यहां साढ़े बारह एकड़ भूमि सीलिंग नियम के अंतर्गत आती है। इसलिए किस तरह से यहां सेकड़ो एकड़ में फार्म हाउस बनाए गए ये बताने की आवश्यकता नही है। इसलिए कृषि बिल का विरोध है क्योंकि बिल गरीब किसानों के लिए ही है जिससे धन्ना किसानों को अपनी "जमीन" खिसकती दिख रही है

इसलिए जब कुछ दिन पूर्व मंत्री अजय मिश्रा ने कहा कि हम आपकी हरकतें जानते है और बड़ी कार्रवाई होगी तब यहां के बाहुबली किसानों में खलबली मच गई। ध्यान रहे, अजय मिश्रा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री है और योगी सरकार भी माफियाओं के ऊपर शिकंजा कसने के रूप में जानी जाती है। अतः मंत्री की चेतावनी से घबराए आन्दोलनजीवीयो ने अपने आकाओं को खबर दी। जिन्होंने मौका देखकर चौका मारने का इशारा दे दिया, ताकि किसी भी कीमत पर अजय मिश्रा को मंत्री पद से हटवाया जाए

क्या थी पूरी घटना?

शायद बहुत कम लोग जानते है कि इस क्षेत्र में श्राद्ध के दौरान दंगल का आयोजन होता है जो वर्षो से चला आ रहा है। अजय मिश्रा का लखीमपुर जिले में गृहक्षेत्र है। वे स्वयं पहलवान रहे है और क्षेत्र के सम्मानित व्यक्ति है। अक्सर इस आयोजन में जाते रहे है। अतः आयोजको ने इसमें शामिल होने के लिए उपमुख्यमंत्री मौर्य और अजय मिश्रा को आमंत्रित किया। भनक लगते ही हजारों की संख्या में नवपगड़ी और टिड्डों ने हेलीपैड को घेर लिया। तब मौर्य सड़क रास्ते से निकल गए क्योंकि अराजकवादियो का निशाना तो अजय मिश्र थे

जैसे ही मिश्र का काफिला संवेदनशील(पालघर जैसी) जगह से निकला सैंकड़ो की संख्या में नव सिखों ने आगे चल रही चार गाड़ियों को रोक कर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। जिसमें एक गाड़ी पलटने से दो आंदोलनकारियों की गाड़ी में दबकर और दो की धक्का लगने से मौत हो गई। गुस्साई अराजक आन्दोलनजीवी भीड़ ने गाड़ी से खींचकर 5 लोगों की डंडों से पीट पीटकर लिंचिंग कर दी

दर्दनाक घटना के बाद अराजकजीवियो ने प्लान B के तहत आंदोलनकारी मृतक परिवारो को आगे कर बकैत को बुलाने की मांग की। योगी सरकार ने मामला समझते हुए तुरंत राजनीति करने आए विपक्षी गिद्धों को नजरबंद कर बकैत को लखीमपुर जाने दिया और अपनी शर्तों पर समझौता करवाकर बड़े षड्यंत्र को असफल कर दिया

अब शायद आपको घटना की सच्चाई समझ आ गई हो गई जो टूलकिट मीडिया नही बता रही और ना ही कोई विपक्ष और ना ही कोई विश्लेषनकर्ता

लेकिन षड्यंत्र का मुख्य हिस्सा कैसे भी करके अजय मिश्र को मंत्रिपद से हटवाना है। यदि ऐसा हुआ तो षड्यन्त्रकारियों की जीत होगी और उनके हौसले और भी बुलंद होंगे क्योंकि ये घटना एक तरह से लिटमस टेस्ट की तरह थी

योगी सरकार के लिए भी परीक्षा की घड़ी है फिलहाल वो लिटमस टेस्ट पास कर चुकी है। लेकिन अराजकवादियो पर कार्रवाई के लिए मशहूर योगी जी को अब इस क्षेत्र में बने फार्म हाउस पर जांच बैठा देनी चाहिए

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