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लखीमपुर खेरी की हकीकत जो मीडिया कभी नही बताएगा

मोदी-योगी विरोधी अक्सर यह आरोप लगाते नज़र आते हैं कि मोदी ने मीडिया को खरीद लिया है। यदि मोदी ने मीडिया को खरीद लिया होता तो मीडिया तथाकथित किसान प्रदर्शन से 26 जनवरी लाल किला कांड, आंदोलन स्थलों पर बंट रही शराब, हो रहे बलात्कार से लेकर लखीमपुर खेरी कांड की सच्चाई कभी नहीं छुपाती। आखिर क्या कारण है कि मीडिया तथाकथित किसानों द्वारा किये जा रहे उपद्रवों की सच्चाई छुपा रही है? क्या मीडिया भी सच्चाई को छुपाकर योगी-मोदी को बदनाम कर सत्ता से हटाने में काम कर रही है? यह वह कटु सच्चाई है, जिसे हर देशप्रेमी को समझना पड़ेगा।  
लखीमपुर काण्ड का मुख्य उद्देश्य 
केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा को उनके पद से हटाना, क्योंकि अजय मिश्रा ने ऐसा बयान दिया था कि तराई में अवैध कब्जेधारी भूमाफिया भयग्रस्त हो गये थे। ऐसे में राकेश टिकैत से विचार विमर्श के बाद लखीमपुर काण्ड की पटकथा लिखी गई।

लखीमपुर कांड : ये किसान नहीं,दुधवा नेशनल पार्क की सैकड़ों-हजारों एकड़ जमीन कब्जा कर बैठे भूमाफिया थे। लखीमपुर की हकीकत को मीडिया कभी नही बताएगी। सच्चाई कुछ और ही है जिसे छुपाया जा रहा है। 

लखीमपुर घटना को लेकर वही नैरेटिव सेट किया जा रहा है जो दिल्ली दंगो को लेकर कपिल मिश्रा के बयान को लेकर किया गया था। आगे बढ़ने से पहले अजय मिश्रा का तथाकथित विवादित बयान भी जान लीजिए। कुछ दिन पूर्व जब मिश्र इस क्षेत्र में पहुंचे तो उन्हें अवैध कब्जाधारी भूमाफियाओं द्वारा काले झंडे दिखाए गए। इस पर मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा कि ये सब बन्द करो। हमें आपकी हरकतें पता है शीघ्र ही कड़ी कार्रवाई होगी। इसी बयान को मीडिया विवादित बयान कहकर घटना का जिम्मेदार बता रहा है।

किन्तु प्रश्न ये उठता है आखिर क्या है वो हरकत जिस पर केंद्रीय मंत्री ने इशारा किया था? क्या ये आन्दोलनजीवियों की कमजोर नस है जो दब गई? इसके लिये आपको घटनास्थल के आसपास के क्षेत्र की भौगोलिक और डेमोग्राफिक स्थिति समझना होगी। आप देखेंगे तो ये पूरा क्षेत्र दुधवा फौरेस्ट के नजदीक है। यहां पर शारदा, घाघरा जैसी नदियां है जिससे ये क्षेत्र सिंचित क्षेत्र कहलाता है जो कि खेती के लिए आदर्श स्थिति है। डेमोग्राफी देखें तो पूरे लखीमपुर जिले की लगभग आधी भूमि पर भूमाफियाओं का अधिकार है और लखीमपुर खीरी जिला ही क्यों आप निरीक्षण करेंगे तो पता लग जाएगा कि पंजाब से आकर सिखों ने उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी,बहराइच,गोंडा सहित तमाम जिलों में कृषि योग्य हजारों लाखों बीघा जमीन पर बड़े बड़े फॉर्म हाउस बना रखे हैं ।लखीमपुर खीरी के तिकुनिया क्षेत्र मे जहां पर ये घटना घटी १५ प्रतिशत पंजाबी हैं जिनके अधिकार मे अधिकांश भूमि अवैध है। यहां के तथाकथित किसान कोई गरीब मजबूर किसान नहीं हैं। अधिकतर के सैकड़ों एकड़ में फैले फार्महाउस है जो उन्होंने अतिक्रमण कर बनाए हैं। यहां साढ़े बारह एकड़ भूमि सीलिंग नियम के अंतर्गत आती है, इसलिए किस तरह से यहां सैकड़ों एकड़ में फार्महाउस बनाए गए बताने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए कृषि बिल का विरोध है क्योंकि बिल गरीब किसानों के लिए ही है जिससे धन्ना किसानों को अपनी जमीदारी खिसकती दिख रही है।

इसलिए जब कुछ दिन पूर्व मंत्री अजय मिश्रा ने कहा कि हम आपकी हरकतें जानते हैं और बड़ी कार्रवाई होगी तब यहां के बाहुबली किसानो में खलबली मच गई। ध्यान रहे अजय मिश्रा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री है और योगी सरकार भी माफियाओं के ऊपर शिकंजा कसने के लिए जानी जाती है। अतः मंत्री की चेतावनी से घबराए आन्दोलनजीवियों ने अपने आकाओं को खबर दी, जिन्होंने मौका देख कर चौका मारने का इशारा दे दिया ताकि किसी भी कीमत पर अजय मिश्रा को मंत्री पद से हटवाया जाए।

क्या थी पूरी घटना? 

शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि इस क्षेत्र में श्राद्ध के दौरान दंगल का आयोजन होता है जो वर्षो से चला आ रहा है। अजय मिश्रा का लखीमपुर जिले में गृहक्षेत्र है। वे स्वयं पहलवान रहे हैं और क्षेत्र के सम्मानित व्यक्ति हैं। वे अक्सर इस आयोजन में जाते रहें हैं,अतः आयोजकों ने इसमें शामिल होने के लिए उपमुख्यमंत्री मौर्य और अजय मिश्रा को आमंत्रित किया। भनक लगते ही हजारों की संख्या में भूमाफियाओं ने हेलिपेड को घेर लिया। तब मौर्य सड़क के रास्ते से निकल गए क्योंकि अराजकतावादियों का निशाना तो अजय मिश्र थे। 

जैसे ही मिश्र का काफिला संवेदनशील (पालघर जैसी) जगह से निकला, सैंकड़ो की संख्या में पंजाब से आए गुंडों ने आगे चल रही चार गाड़ियों को रोककर ताबड़तोड़ हमला कर दिया, जिसमें एक गाड़ी पलटने से दो आंदोलनकारियों की गाड़ी से दबकर और दो की धक्का लगने से मौत हो गई। गुस्साई अराजक आन्दोलनजीवी भीड़ ने गाड़ी से खींच कर 5 लोगों को डंडों से पीट पीटकर बेरहमी से तड़पा तड़पा कर हत्या कर दी। कहने की जरूरत नहीं कि ये पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित देशद्रोही तत्व थे, जिन्हें कांग्रेस, सपा तथा तृणमूल कांग्रेस जैसी भारतीय राजनीतिक दलों का आशीर्वाद और खुला समर्थन प्राप्त है।

जैसे 1761 में देश विरोधी तत्वों ने अहमद शाह अब्दाली को निमंत्रण देकर पानीपत के मैदान में मराठों का विनाश कराया था, उसी तरह इस बार उन्हीं अराजक तत्वों को आमंत्रित करके भाजपा की केंद्र तथा राज्य सरकार को मिटाने का षड्यंत्र रचा गया है।

इस दर्दनाक घटना के बाद अराजकजीवियो ने प्लान B के तहत मृतक परिवारो को आगे कर टिकैत को बुलाने की मांग की। योगी सरकार ने मामला समझते हुए तुरंत राजनीति करने आए विपक्षी गिद्धों को नजरबंद कर, टिकैत को जाने दिया, और समझौता करवाकर बड़े षड्यंत्र को असफल कर दिया।

अब शायद आपको घटना की सच्चाई समझ आ गई होगी। षडयंत्र का मुख्य हिस्सा कैसे भी करके अजय मिश्र को मंत्रिपद से हटवाना है। यदि ऐसा हुआ तो षडयन्त्रकारियों की जीत होगी और उनके हौसले और भी बुलंद होंगे। आगे जाकर इसकी आंच गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे तक भी पहुंच सकती है।

योगी सरकार के लिए भी ये परीक्षा की घड़ी है। योगी जी को अब इस क्षेत्र में बने फार्म हाउसों पर जांच बैठा देनी चाहिए। जांच होने दीजिए, शीघ्र ही सच सामने आ जाएगा।

अक्टूबर 5 को कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादियों ने पंडित मखन लाल बिंदरु और ठेला चलाने वाले विरेंद्र पासवान की हत्या कर दी। पंडित नेहरू के ख़ानदान वाले एक शब्द नहीं बोलेंगे इन हिंदुओं की हत्याओं और इस्लामिक आतंकवाद पर,ना ही वहाँ जाएंगे। आतंकवादियों की मौत पर ज़रूर रो लेते हैं। जब पंजाब और राजस्थान में किसानों पर लाठीचार्ज हुआ, न मीडिया ने शोर मचाया और न ही किसी भाजपा विरोधी ने, क्योकि वहां भाजपा की सरकार नहीं थी। इन्हें हंगामा तो भाजपा शासित राज्य में करना है। वहां जरा-सी घटना का ढोल पीट अराजकता जो फैलानी है। परन्तु किसी गैर-भाजपाई राज्य में गंभीर घटना पर मीडिया से लेकर भाजपा विरोधी तनाव फ़ैलाने में व्यस्त हो जाते हैं, वरना जल्दी इतनी कि प्रियंका रात में ही लखीमपुर के लिए निकल गई !

अखिलेश बहुत सवेरे निकल पड़े !

ओबैसी हैदराबाद से चल पडे !

कोलकाता से लेकर मुम्बई तक बयानबाजी शुरू हो गई !

राकेश टिकैत बॉर्डर से चल पड़े !

जाना आप वालों को भी था , वे चूक गए !

तेजस्वी जाएंगे , संजय राउत ने सामना में भड़ास निकाल ली !

हुआ क्या, यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। भाजपा नेताओं का घेराव करने निकले " किसानों " में भिंडरावाले के चित्र वाले टी शर्ट पहने वाले सिक्ख कौन थे, किसी को मालूम नहीं । हाँ इतना पता जरूर था कि केशवदेव मौर्य का चॉपर उतरने नहीं देना है। यह पता था कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा की कार ड्राइवर सहित फूंक डालनी है। जो नौ लोग मरे थे, उसमें कितने किसान थे, कितने कार्यकर्ता, कोई नहीं जानता, न किसी ने जानना चाहा। बस एक ही रट चलो लखीमपुर चलो लखीमपुर। हमसे पहले कोई और दल न पहुंच जाए, जल्दी चलो लखीमपुर।

लखीमपुर के किसानों का यह सच बहुत कड़वा है लेकिन यही सच उस खतरनाक सच को बता रहा है, जिसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा...

उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जनपद की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 40.6 लाख थी। अब लगभग 45 लाख है। इसमें लगभग 2 से ढाई लाख जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है। शेष 42-43 लाख लोगों का संबंध ग्रामीण क्षेत्रों से ही है। 2011  की जनगणना के अनुसार लखीमपुर में सिक्खों की जनसंख्या 1.06 लाख थी। आज यह अधिकतम लगभग डेढ़ लाख होगी। आप बड़ी सरलता से स्वंय ही यह अनुमान लगा लीजिए कि उत्तरप्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान करनेवाले लखीमपुर में कितने किसान सिक्ख हैं। और कितने किसान गैर सिक्ख हैं.?

अब जरा एक तथ्य पर ध्यान दीजिए....

लखीमपुर में हुए बर्बर हत्याकांड के जो दर्जनों वीडियो अब तक सामने आए हैं। उन सभी वीडियो में हाथ में झंडे डंडे लाठी तलवार पत्थर लेकर हमला कर रहे तथाकथित किसानों में लगभग 80-90 प्रतिशत सिख ही नजर आ रहे हैं? उस भीड़ में लखीमपुर की शेष 43 लाख जनसंख्या का हिस्सा, गैर सिक्ख किसान क्यों नहीं दिखाई दे रहे? यह सवाल लखीमपुर में हुए हत्याकांड की जड़ का खतरनाक शर्मनाक सच उजागर कर रहा है। उत्तरप्रदेश की पुलिस और केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के दस्तावेजों में भी दशकों से यह सच्चाई दर्ज है कि लखीमपुर और पीलीभीत के सिख  बहुलता वाले ग्रामीण इलाकों में कुख्यात खालिस्तानी आतंकियों के अड्डे रहे हैं। यह सिलसिला लगभग डेढ़ दशक तक बहुत तेजी से  चला था। आज भी खालिस्तानी आतंकियों और पंजाब से फरार अपराधियों की इन इलाकों में गतिविधियों के समाचार यदाकदा सामने आते रहते हैं। डंडों तलवारों से पीट रहे हत्यारों के बदन पर दिख रही खालिस्तान की टीशर्ट और उनके अगल बगल लहरा रहे खालिस्तानी झंडे  बता रहे हैं कि लखीमपुर में हुआ हत्याकांड किसानों के आक्रोश का नहीं बल्कि खालिस्तानी गुंडों हत्यारों द्वारा किए गए देशविरोधी तांडव का परिणाम है।

सत्ता के लिए लार टपकाते घूम रहे राजनीतिक भेड़िए लखीमपुर हत्याकांड के दोषी अपराधी खालिस्तानी हत्यारों को किसान बताकर उन्हें बचाने का दबाव सरकार पर बना रहे हैं। इसलिए उस दबाव के खिलाफ आवाज़ उठाना, लोगों तक सच पहुंचाना हमारा आपका भी दायित्व है।

उफ ! सत्ता की हवस भी क्या चीज है? कुर्सी का दर्द भी क्या दर्द है? राजनीतिक ग्लैमर खो देने की पीड़ा कितनी असह्य है। सत्ता पाने का जब कोई रास्ता नहीं बचा तो डेरा डालो घेरा डालो। हुआ क्या, क्यों सोचें, भड़का दो, वायरल कर दो, आग लगा दो, फैला दो।  हकीकत कुछ दूसरी हुई तो क्या हुआ, कुछ और वोट तो पक्के। अब उत्तर प्रदेश है तो खेला भी पक्का। मुकाबला योगी से है तो मानों मोदी और अमित शाह से है। अब 2024 तक  कौन बाट जोहे, तो चल पड़े रातों रात। कर दो बवाल पर बवाल, जब तक असलियत सामने आए, धूम मचा दो आग लगा दो, आसमान सर पर उठा दो। जब सुबह होगी, देखा जाएगा। हकीक़त क्या है, जब पता चलेगा तब चलेगा। अभी तो गर्मी है, होश जला दो।

लखीमपुर में किसान भी मरे, भाजपाई भी, मजदूर भी, पत्रकार भी और इंसानियत भी। यदि मंत्री और उसके बेटे ने किसानों को कुचला है, तब बेशक भीड़ के डर से उपजी भगदड़ हो, मंत्री, उनका बेटा और नेता  जिम्मेदार हैं। बहुत सारे वीडियो वायरल हैं। कुछ में साफ है कि किसानों को मारा जा रहा था और कुछ में भीड़ लाठी डंडे बरसा रही थी। लाठियां फटकार कर भीड़ से लोगों को बचाती पुलिस भी नजर आई। खैर, अब पूर्व न्यायाधीश उच्चस्तरीय जांच करेंगे, तो खुलासा हो जाएगा।

एक आश्चर्यजनक घटना भी हुई। वह थी टिकैत का समझौतावादी रुख। जहां प्रियंका और अखिलेश दियासलाई लेकर आग लगाने आए थे, टिकैत ने उनके मंसूबों पर पानी की बौछार कर दी। टिकैत ने डीजीपी , पीड़ित परिवारों और मध्यस्थों के साथ बैठकर बहुत जल्द समझौता करा दिया। शायद ही किसी घटना में पहले कभी 45-45 लाख मुआवजा और सरकारी नौकरी दी गई हो। टिकैत के समझौतावादी रवैये से जहाँ सभी खुश हैं, प्रियंका, राहुल और योगेंद्र यादव खफा हैं। भिंडरावाले के छापे वाले खालिस्तानी गुस्से में हैं। उनके हाथों से आग भड़काकर सत्ता पाने का मौका यूँ ही निकल गया। 

लकीमपुर की हकीकत जो मीडिया कभी नही बताएगा.

आखिर लखीमपुर में ऐसा क्या हुआ जो इतनी विकराल घटना घटित हुई। क्या वही सच है जो मीडिया द्वारा बताया जा रहा है। क्या अजय मिश्रा का पूर्व बयान घटना का कारक है जैसा मीडिया, विपक्ष और आन्दोलनजीवी बता रहे है या सच्चाई कुछ और ही है जिसे छुपाया जा रहा है। 

लखीमपुर घटना को लेकर वही नरेटिव सेट किया जा रहा है जो दिल्ली दंगो को लेकर कपिल मिश्रा के बयान को लेकर किया गया था। आगे बढ़ने से पहले अजय मिश्रा का तथाकथित विवादित बयान भी जान लीजिए। 

कुछ दिन पूर्व जब मिश्र इस क्षेत्र में पहुंचे तो उन्हें पगड़ी किसानों द्वारा काले झंडे दिखाए गए इस पर मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा कि ये सब बन्द करो हमे आपकी हरकतें पता है शीघ्र ही कड़ी कार्रवाई होगी। इसी बयान को मीडिया विवादित बयान कहकर घटना का जिम्मेदार बता रहा है। 

किन्तु प्रश्न ये उठता है आखिर क्या है वो हरकत जिस पर केंद्रीय मंत्री ने इशारा किया था? क्या ये आन्दोलनजीवीयो की कमजोर नस है जो दब गई। इसके लिये आपको घटनास्थल के आसपास के क्षेत्र की भौगोलिक और डेमोग्राफिक स्थिति समझना होगी। 

आप देखेंगे तो ये पूरा क्षेत्र दुधवा फारेस्ट के नजदीक है। यहां पर शारदा, घाघरा जैसी नदिया है जिससे ये क्षेत्र सिंचित क्षेत्र कहलाता है जो कि खेती के लिए आदर्श है।  

डेमोग्राफी देखे तो पूरे लखीमपुर जिले में कुल 2.35% लगभग सिख आबादी और 20.7% के लगभग टिड्डा आबादी है। 2001 में इस जिले को अल्पसंख्यक बाहुल्य जिला घोषित किया गया था। शब्दावली पर ध्यान दे "अल्पसंख्यक बाहुल्य"

समस्या कहां है ?

लखीमपुर जिले में भले ही 2.35% सिख है लेकिन जहाँ ये घटना घटी वहां आसपास का क्षेत्र मिलाकर कुल 15% सिख है साथ ही टिड्डे भी ये ठीक उसी प्रकार है जैसे पालघर। यहां अधिकतर सिख नवसिक(मिशनरीज प्रेरित) बन चुके है जिनका झुकाव खाली स्थान की तरफ है

यहां के तथाकथित किसान कोई गरीब मजबूर किसान नही है। अधिकतर के सैकड़ों एकड़ में फैले फार्महाउस है। जो उन्होंने अतिक्रमण कर बनाए है। यहां साढ़े बारह एकड़ भूमि सीलिंग नियम के अंतर्गत आती है। इसलिए किस तरह से यहां सेकड़ो एकड़ में फार्म हाउस बनाए गए ये बताने की आवश्यकता नही है। इसलिए कृषि बिल का विरोध है क्योंकि बिल गरीब किसानों के लिए ही है जिससे धन्ना किसानों को अपनी "जमीन" खिसकती दिख रही है

इसलिए जब कुछ दिन पूर्व मंत्री अजय मिश्रा ने कहा कि हम आपकी हरकतें जानते है और बड़ी कार्रवाई होगी तब यहां के बाहुबली किसानों में खलबली मच गई। ध्यान रहे, अजय मिश्रा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री है और योगी सरकार भी माफियाओं के ऊपर शिकंजा कसने के रूप में जानी जाती है। अतः मंत्री की चेतावनी से घबराए आन्दोलनजीवीयो ने अपने आकाओं को खबर दी। जिन्होंने मौका देखकर चौका मारने का इशारा दे दिया, ताकि किसी भी कीमत पर अजय मिश्रा को मंत्री पद से हटवाया जाए

क्या थी पूरी घटना?

शायद बहुत कम लोग जानते है कि इस क्षेत्र में श्राद्ध के दौरान दंगल का आयोजन होता है जो वर्षो से चला आ रहा है। अजय मिश्रा का लखीमपुर जिले में गृहक्षेत्र है। वे स्वयं पहलवान रहे है और क्षेत्र के सम्मानित व्यक्ति है। अक्सर इस आयोजन में जाते रहे है। अतः आयोजको ने इसमें शामिल होने के लिए उपमुख्यमंत्री मौर्य और अजय मिश्रा को आमंत्रित किया। भनक लगते ही हजारों की संख्या में नवपगड़ी और टिड्डों ने हेलीपैड को घेर लिया। तब मौर्य सड़क रास्ते से निकल गए क्योंकि अराजकवादियो का निशाना तो अजय मिश्र थे

जैसे ही मिश्र का काफिला संवेदनशील(पालघर जैसी) जगह से निकला सैंकड़ो की संख्या में नव सिखों ने आगे चल रही चार गाड़ियों को रोक कर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। जिसमें एक गाड़ी पलटने से दो आंदोलनकारियों की गाड़ी में दबकर और दो की धक्का लगने से मौत हो गई। गुस्साई अराजक आन्दोलनजीवी भीड़ ने गाड़ी से खींचकर 5 लोगों की डंडों से पीट पीटकर लिंचिंग कर दी

दर्दनाक घटना के बाद अराजकजीवियो ने प्लान B के तहत आंदोलनकारी मृतक परिवारो को आगे कर बकैत को बुलाने की मांग की। योगी सरकार ने मामला समझते हुए तुरंत राजनीति करने आए विपक्षी गिद्धों को नजरबंद कर बकैत को लखीमपुर जाने दिया और अपनी शर्तों पर समझौता करवाकर बड़े षड्यंत्र को असफल कर दिया

अब शायद आपको घटना की सच्चाई समझ आ गई हो गई जो टूलकिट मीडिया नही बता रही और ना ही कोई विपक्ष और ना ही कोई विश्लेषनकर्ता

लेकिन षड्यंत्र का मुख्य हिस्सा कैसे भी करके अजय मिश्र को मंत्रिपद से हटवाना है। यदि ऐसा हुआ तो षड्यन्त्रकारियों की जीत होगी और उनके हौसले और भी बुलंद होंगे क्योंकि ये घटना एक तरह से लिटमस टेस्ट की तरह थी

योगी सरकार के लिए भी परीक्षा की घड़ी है फिलहाल वो लिटमस टेस्ट पास कर चुकी है। लेकिन अराजकवादियो पर कार्रवाई के लिए मशहूर योगी जी को अब इस क्षेत्र में बने फार्म हाउस पर जांच बैठा देनी चाहिए

SFJ प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने सीएम योगी और अजय मिश्रा का घेराव करने के लिए भड़काया, कहा- “अब खालिस्तान ही एकमात्र रास्ता है। किसान हल खालिस्तान।”

जिस किसान आंदोलन को मोदी विरोधी तन, मन और धन से अपना समर्थन दे रहे, 
लखीमपुर हिंसा मामले को जहां कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं  देश विरोधी ताकतें भी इसका फायदा उठाने में लगी हैं।
 जो इस बात को दर्शाती है कि मोदी-योगी विरोधियों को देश से नहीं बल्कि देश विरोधी ताकतों से कितना लगाव है। 4 अक्टूबर, 2021 को खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस के मुखिया गुरपतवंत सिंह पन्नू ने एक वीडियो और एक पत्र जारी किया था। इसमें पन्नू ने 9 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा का घेराव करने के लिए भड़काया था। साथ ही ड्रोन और ट्रैक्टर का इस्तेमाल करने की सलाह दी थी।

अपने बयान में पन्नू ने कहा, “आज यूपी के लखीमपुर में चार किसानों की हत्या कर दी गई। किसानों के विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं। अब खालिस्तान ही एकमात्र रास्ता है। किसान हल खालिस्तान।” पन्नू ने कहा आगे कहा, “योगी और अजय मिश्रा को घेरो। हथियार मत उठाओ। कानूनी आतंक का प्रयोग करो। उन्हें घर में ही नजरबंद कर दो। केवल खालिस्तान ही आपकी समस्याओं का समाधान कर सकता है। अगर सैकड़ों मौतें आजादी के लिए होतीं तो हम अब तक आजादी पा चुके होते।”

लखीमपुर खीरी में मारे गए किसानों के परिजनों से गुरपतवंत सिंह पन्नू ने कहा कि वे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दी गई मुआवजा राशि वापस कर दें। वह उन्हें दोगुनी राशि प्रदान करेगा। पन्नू ने एक पत्र जारी कर घटना में मारे गए हर किसान के परिवार को 7,500 डॉलर देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही उसने यह भी उल्लेख किया कि 9 अक्टूबर ही वह दिन है, जब सुखा और जिंदा को जनरल एएस वैद्य की हत्या के मामले में दोषी पाए जाने के बाद फांसी दी गई थी।

किसान आंदोलन की आड़ में सिख फॉर जस्टिस लगातार साजिशों को अंजाम दे रहा है। गुरपतवंत सिंह पन्नू ने गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने वालों के लिए नकद पुरस्कार की घोषणा की थी। पॉप सिंगर रिहाना को किसान आंदोलन के समर्थन में पोस्ट करने के बदले 2.5 मिलियन डॉलर यानि करीब 18 करोड़ रुपये मिले थे। इस डील के पीछे कनाडा की पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन का हाथ था, जिसने दिल्ली में प्रदर्शन की प्लानिंग की थी और टूलकिट नाम का एक डॉक्यूमेंट तैयार किया था।

पन्नू की धमकी के बाद केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां और राज्य पुलिस मुख्यमंत्री योगी की सुरक्षा को लेकर सचेत हो गई हैं। मुख्यमंत्री योगी के सुरक्षा घेरे और रूट को लेकर कुछ बदलाव किए जा रहे हैं। भारत में देशविरोधी कैंपेन चलाने के आरोप में साल 2019 में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से सिख फॉर जस्टिस पर बैन लगाया गया था। एनआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि मौजूदा समय में पन्नू भारत का नागरिक नहीं है। उसके खिलाफ कार्रवाई में यही सबसे बड़ी बाधा बन गई है। हालांकि एनआईए ने पंजाब और हरियाणा में पन्नू के खिलाफ कई केस दर्ज किए हैं।

लखीमपुर खीरी में गिद्धों की जमात

मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”, समाचार संपादक, उगता भारत 

लखीमपुर खीरी में गिद्धों की जमात एकत्रित हो रही है। लाल, नीले, सफेद कपड़े पहने कई जवान और बूढ़े गिद्ध वहां मंडरा रहे हैं, लाशों को नोचने को तैयार हैं। उन गिद्धों में होड़ सी मची है कौन ज़्यादा नोचकर ले जाएगा। यह मांसाहार नहीं सत्ताधारी गिद्ध हैं जिन्हें मांस नहीं भाता है बल्कि वोट की लालसा रहती है। इतनी गर्मियों में भी यह गिद्ध उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में डेरा डाले पड़े हैं, कोई श्रीनगर जाने को तैयार नहीं है। लाशें तो वहां भी हैं, दो-दो मासूम और निर्दोष शिक्षकों की, लेकिन समस्या यह है कि उन लाशों को नोचने से वोट नहीं मिल सकते। वहां गोलियां मिलती हैं, गद्दियां नहीं। वहां “शांतिदूत” रहते हैं इसलिए यह “क्रांतिदूत” वहां जाने को तैयार नहीं है। क्योंकि यह जानते हैं कि अगर वहां गए तो सीधे गोलियां मिलेंगी, गद्दियां नहीं। और अगर इन्हें किसी ने गोली मार दी तो इनकी लाशों पर कोई रोने वाला भी नहीं मिलेगा। इनके अपने ही इनकी।लाशों को नोचने लगेंगे, क्योंकि गिद्धों को तो लाश चाहिए नोचने के लिए, भले ही वह उनके अपनों की ही क्यों न हो। इसलिए उत्तरप्रदेश में आराम फरमा रहे हैं, छातियाँ पीट रहे हैं।
एक लोमड़ी ने आवाज़ लगाई और हजारों गिद्ध पहुंच गए दावत के लिए। लोमड़ी धूर्त और मक्कार है, वह जानती है कि श्रीनगर में रोने से कुछ नहीं मिलेगा, लेकिन उत्तरप्रदेश में विलाप करने से “कुछ” मिल सकता है। इस लोमड़ी ने जिस बूढ़े गिद्ध को कंधे पर बैठा रखा है उसके पंख और नाखून भी झड़ने लगे हैं, लेकिन शायद लखीमपुर खीरी में उसे पुनर्जीवन मिल जाये। लखीमपुर खीरी उस बूढ़े गिद्ध के लिए संजीवनी सिद्ध हो सकती है, बस इसी आशा में लोमड़ी वहाँ साफ-सफाई कर रही है।

लाल-नीले गिद्ध भी ख़ूब शोर मचा रहे हैं, लेकिन लोमड़ी की चीख-चिल्लाहट के सामने भला इन लाल-नीले कमज़ोर गिध्दों की फुसफुसाहट का क्या मोल है। उधर एक भेड़िया भी बहुत परेशान है, क्योंकि सारी दावत पर तो उस ही का अधिकार था। वही तो है जिसने सारा चक्रव्यूह रचा था। पिछले कई माह से वह लाशों से ही तो पेट भर रहा है। कहाँ से नई लाश का इंतज़ाम हो, बस इसी को लेकर यह भेड़िया हमेशा परेशान रहता है। नित नई लाश का सौदा जो करना है।
गिद्ध, लोमड़ी और भेड़िया कभी किसी की मौत का मातम नहीं मनाते बल्कि यह तो सदैव जश्न मनाते हैं, केवल जश्न। क्योंकि मौत पर जश्न मनाना ही इनकी फ़ितरत है। लाशों पर नृत्य करते यह लोमड़ी, भेड़िए और गिद्ध अब धीरे-धीरे उड़ने लगेंगे, किसी नए शिकार की तलाश में, किसी नए श्मशान के आसपास, यह आपको फिर से मंडराते मिल जाएंगे।

लेकिन श्रीनगर नहीं जायेंगे क्योंकि वहां नोचने को कुछ नहीं है।

12 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार किए गए आशीष मिश्रा: सबूत के रूप में पुलिस को सौंपी पेन ड्राइव

लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में आशीष मिश्रा 'मोनू' की गिरफ़्तारी
                                                   (फाइल फोटो)
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा के मामले में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष मोनू को गिरफ्तार कर लिया गया है 12 घंटे तक चली लंबी पूछताछ के बाद उन्हें यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। निघासन विधानसभा क्षेत्र में खासे सक्रिय रहे आशीष मिश्रा ‘मोनू’ विधानसभा टिकट के लिए भी दावेदारी ठोक रहे थे। क्राइम ब्रांच के दफ्तर में उनसे पूछताछ की गई थी।

इससे पहले मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि आशीष मिश्रा के सामने 40 सवाल रखे गए, जिनके जवाबों से पुलिस संतुष्ट नहीं है। उनके ड्राइवर अंकित दास को भी हिरासत में लिया गया है। हालाँकि, मिश्रा ने भी पेन ड्राइव में लाकर कई वीडियो पुलिस को सौंपे हैं। इसके माध्यम से उन्होंने दावा किया है कि घटना के समय वो घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। उधर लखीमपुर खीरी में स्थिति सुधरने पर इंटरनेट सेवाएँ बहाल कर दी गई हैं।

 इस दौरान लखीमपुर खीरी में स्थित भाजपा दफ्तर के बाहर कार्यकर्ता भी नाराज दिखे, जो आशीष मिश्रा से पूछताछ से आक्रोश में थे। आशीष मिश्रा का फोन भी जब्त कर लिया गया है। वहीं उनके पुलिस के समक्ष पेश होने के बाद नवजोंत सिंह सिद्धू ने भी अपना अनशन तोड़ दिया। लखीमपुर खीरी में हुई ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ की हिंसा में 8 लोगों की जान चली गई थी। इसके बाद से ही विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध मुखर हैं।

इससे पहले मीडिया का एक वर्ग लगातार ये अफवाह फैलाने में लगा था कि आशीष मिश्रा नेपाल भाग गए हैं। पत्रकार अजीत अंजुम ने भी ट्वीट कर के लिखा था, “सुना है कि लखीमपुर खीरी का विलेन मंत्री पुत्र नेपाल भाग गया है। मोदी है तो मुमकिन है।” प्रोपेगंडा पत्रकार राना अयूब ने भी दावा किया था कि आशीष मिश्रा नेपाल भाग गए हैं। साथ ही उन्होंने धृतराष्ट्र की एक तस्वीर शेयर की, जिसमें वो कह रहे हैं, “ये क्या हो रहा है दुर्योधन।”

‘BJP वर्कर की हत्या करने वाले दोषी नहीं, वह एक्शन का रिएक्शन’: राकेश टिकैत

लखीमपुर खीरी हिंसा में BJP कार्यकर्ताओं की लिंचिंग
को गलत नहीं मानते राकेश टिकैत 
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने शनिवार (अक्टूबर 9, 2021) को कहा कि लखीमपुर खीरी हिंसा के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं की लिंचिंग को वह गलत नहीं मानते। उन्होंने कहा, “जो हुआ वो गलत नहीं था। मैं उनको दोषी नहीं मानता।” उनका कहना है कि पीट-पीट कर मारना उनकी नजर में हत्या नहीं है। ये बातें ‘किसान नेता’ ने दिल्ली प्रेस क्लब में मीटिंग के दौरान कहीं। इसमें भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत, दर्शन पाल सिंह, जोगिंदर उगराहां के साथ स्वराज अभियान के नेता योगेंद्र यादव भी मौजूद रहे। इसी दौरान राकेश टिकैत से उन लोगों के बारे में सवाल किया गया जिन्हें कथित तौर पर लाठी-डंडों से पीट-पीटकर मार दिया गया और जिन्हें भाजपा कार्यकर्ता बताया जा रहा है। इस पर टिकैत ने कहा –

“वे कौन थे जो गाड़ी में थे, जिन्होंने लोगों को मारा? जब जंगल में खूंखार कोई आदमी हो जाता है..एक्शन का रिएक्शन है वो, कोई प्लानिंग नहीं है। यहां पे दोषी किसको कहते हैं।  यहां गाड़ियां टकराती हैं तो तुरंत दोनों उतर के लड़ने लगते हैं सड़क के ऊपर वो क्या है।  वो रिएक्शन है, वो हत्या में नहीं आता। हम दोषी नहीं मानते।

 

टिकैत से पत्रकार ने फिर पूछा कि आप इनमें (लाठी चलाने वालों में) से किसी को दोषी नहीं मानते तो टिकैत ने साफ कहा कि- नहीं मानते। हालांकि टिकैत की बात को संभालते हुए योगेंद्र यादव ने फौरन कहा कि किसी की भी असामयिक मृत्यु दुर्भाग्यपूर्ण होती है इसलिए न्याय सभी को मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसान मोर्चा किसी की भी मृत्यु को सही ठहराने की कोशिश नहीं कर रहा है। 

लेकिन किसी पत्रकार ने टिकैत से यह नहीं पूछा कि तुम जो बात-बात पर बक्कल उखाड़ देंगे जैसे भड़काऊ भाषण देते हो, क्या उससे हिंसा को प्रोत्साहन नहीं नहीं मिलता? क्या तुम्हारी और खालिस्तानी पुन्नू की भाषाशैली एक नहीं। जब पंजाब और राजस्थान में किसानों पर लाठीचार्ज हुआ था, तब इन राज्यों के शासित कांग्रेस के विरुद्ध क्यों नहीं ऐसा आंदोलन किया?

 

जब मृत किसानों के परिवारों को मुआवजे की घोषणा हुई थी, तबसे अजय मिश्रा और आशीष मिश्रा मृत भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए भी मुआवजे की मांग उठाते आ रहे हैं। आशीष मिश्रा ने एक इंटरव्यू में आरोप लगाते हुए ये तक कहा था कि इन लोगों को लाठी-डंडे और नुकीले हथियारों से बेरहमी से मारा गया और ऐसा करने वाले किसान तो नहीं हो सकते। 

योगेंद्र यादव ने कहा –

“संयुक्त किसान मोर्चा की मांग है कि इस हत्याकांड के प्रमुख आरोपी मोनू मिश्रा और उसके हिस्ट्रीशीटर बाप अजय मिश्रा को गिरफ्तार किया जाए। अजय मिश्रा को यूनियन काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स से बर्ख़ास्त किया जाए। किसानों के लिए ये घटना जलियांवाला बाग से कम नहीं है। और पिछले छह दिन से सरकार ने किसानों के जख़्मों पर नमक ही डाला है। वो सरकार, जो ठोको की नीति पर काम करती है, अपराधियों के नाम पर पकड़कर गोली मार देती है, वो मंत्री के बेटे को 6 दिन बाद बुलाकर कॉफी पिला रही है.”

इधर संयुक्त किसान मोर्चा ने लखीमपुर खीरी हिंसा के विरोध में 15 अक्टूबर को पुतला दहन का ऐलान किया है। किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि हिंसा का विरोध जताते हुए वह दशहरे के दिन पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का पुतला जलाएँगे। राकेश टिकैत ने ऐलान किया है कि 26 अक्टूबर को संयुक्त किसान मोर्चा बैठक कर पूरे देश में कलश यात्राएँ निकालेगा। इसके साथ ही 18 अक्टूबर को किसान संगठन 6 घंटे ट्रेन रोकेंगे।

वहीं, किसान नेता दर्शनपाल ने कहा कि किसानों को गाड़ी से कुचलकर दोषियों ने डर का माहौल बनाने की कोशिश की थी, लेकिन किसान नहीं डरेंगे। उन्होंने लखीमपुर खीरी हिंसा को पूर्व नियोजित बताया। वहीं, किसान नेता जोगिंदर सिंह उग्राहन ने कहा कि प्रदर्शनकारी किसानों के खिलाफ सरकार द्वारा हिंसक रूप अपनाया गया है। साथ ही उन्होंने साफ किया कि वह हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएँगे। इसके साथ ही उन्होंने भी मंत्री अजय मिश्रा और उनके बेटे आशीष की गिरफ्तारी की माँग की।

‘उसे राक्षसों ने मार डाला… वह वीडियो कभी नहीं भूलूँगी’: दो माँ जिनके बेटों को लखीमपुर खीरी में ‘किसानों’ ने मार डाला

                                           लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए हरिओम मिश्रा की माँ
लखीमपुर खीरी में 3 अक्टूबर 2021 को तथाकथित ‘किसानों’ द्वारा मारे गए दो लोगों के परिवार के सदस्यों ने उनके साथ की गई क्रूरता के बारे में बताया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, हरिओम मिश्रा (जिन्हें ‘किसानों’ द्वारा बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला गया था) की बहन ने घटना को याद करते हुए बताया कि कैसे हरिओम का शव देख कर परिजन टूट गए थे। हरिओम का शव सोमवार (4 अक्टूबर 2021) को घर लाया गया था।

हरिओम मिश्रा, बीजेपी सांसद अजय मिश्रा के बेटे आशीष के ड्राइवर थे। वह आशीष के साथ करीब पाँच साल से काम कर रहे थे। हरिओम परसेहरा गाँव के रहने वाले थे। उनके दो छोटे भाई-बहन हैं, उनकी माँ का नाम निशा और उनके पिता का नाम राधे श्याम है, वह मानसिक और शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं। राधेश्याम के काम न कर पाने के कारण परिवार हरिओम की कमाई पर निर्भर था।

हरिओम की बहन माहेश्वरी ने बताया कि उनका भाई दो-तीन दिन पहले काम पर गया था। माहेश्वरी रोते हुए कहती हैं, “मुझे कुछ नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ। उन्हें किसानों ने मार डाला।” हरिओम की माँ ने दुख जताते हुए कहा, “उसके साथ जो हुआ वह क्रूर और अमानवीय था। उसे राक्षसों ने मार डाला।” निशा विलाप करते हुए कहती हैं कि वह अपने मृत बेटे के शव को कैसे देख सकती हैं, जो 3 अक्टूबर को तथाकथित किसानों के क्रोध का शिकार हो गया।

वह वीडियो कभी नहीं भूलूँगी: श्याम सुंदर निषाद की माँ

वहीं एक अन्य पीड़ित श्याम सुंदर निषाद (30) की माँ ने कहा कि उनके बेटे की मौत की खबर मिलने से पहले ही घटना का वीडियो उनके पास पहुँच गया। श्याम सुंदर निषाद के परिवार को उसकी मौत का पता तब चला जब उन्हें व्हाट्सएप पर ‘किसानों’ की भीड़ द्वारा उसकी पिटाई का वीडियो मिला। श्याम सुंदर निषाद जिले के सिंघी क्षेत्र में भाजपा के ‘मंडल मंत्री’ थे।
निषाद की माँ फूलमती कहती हैं कि वह कभी भी उस वीडियो को नहीं भूल पाएँगी। उन्होंने कहा, “मेरे बेटे के आसपास लोग जमा हैं। उसके शरीर से खून बह रहा है, वह दया की भीख माँग रहा है, लेकिन लोग उससे सवाल कर रहे हैं।” फूलमती ने कहा कि नाराज ‘किसानों’ ने निषाद से सवाल किया कि क्या उन्हें मिश्रा ने भेजा था। उसके मना करने के बावजूद लोग उससे पूछते रहे कि क्या उसे जानबूझकर ‘एक्सीडेंट’ करने के लिए भेजा था। वह दया की गुहार लगाता रहा, लेकिन किसानों ने उसकी एक न सुनी।
फूलमती ने पुष्टि की कि उनका बेटा निषाद एक सक्रिय भाजपा कार्यकर्ता था और सांसद (मिश्रा) के गाँव में एक दंगल कार्यक्रम के लिए गया था। परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य को खोने के बाद निषाद के 52 वर्षीय पिता बालक राम को उनकी दो बेटियों की चिंता हो रही है। इनमें से एक की उम्र 3 साल और एक की 7 महीने है। उन्होंने कहा, “सरकार ने 45 लाख रुपए का चेक दिया है, लेकिन हम न्याय चाहते हैं। जिसने भी उसे मारा है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।”

‘दादा…दादा छोड़ दो’, निषाद का जान की भीख माँगता वीडियो वायरल

हिंसक दुर्घटना के बाद निषाद का वीडियो सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो गया था। उनका चेहरा खून से लथपथ था और उनकी आँखों में मौत का खौफ साफ तौर पर देखा जा सकता था। वे स्तब्ध और हिंसक भीड़ के अत्यधिक दबाव में थे। वीडियो में स्थिति साफ दिख रही थी।
उनकी अंतिम चीखें दिल दहला देने वाली थी। इससे हमारे-आपके रोंगटे भले खड़े हो जाएँ, लेकिन ‘किसान आंदोलनकारियों’ को जान की भीख माँग रहे एक निर्दोष पर जरा भी तरस नहीं आई। उसकी मॉब लिंचिंग कर दी गई। उनसे ‘किसान आंदोलनकारियों’ की भीड़ जबरन ये कबूल करने का दबाव बना रही थी कि वो ये बोलें कि मंत्री ने उन्हें किसानों को मारने के लिए भेजा है। भाजपा कार्यकर्ता श्याम सुंदर निषाद बार-बार ‘दादा… दादा, छोड़ दो’ की गुहार लगा रहे थे, लेकिन गुंडों का दिल नहीं पसीजा। उनसे जबरन कबूलवाया जा रहा था कि वो किसानों पर गाड़ी चढ़ाने आए हैं। वे हाथ जोड़ गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन उनकी एक न सुनी गई। श्याम सुंदर निषाद के भाई संजय निषाद ने भी ऑपइंडिया से बात की और बताया कि 3 अक्टूबर को क्या हुआ था।

राकेश टिकैत के खिलाफ कार्रवाई की माँग की

7 अक्टूबर को, ऑपइंडिया ने बताया कि हरिओम के परिवार के सदस्यों ने हिंसा के लिए विपक्षी नेताओं को जिम्मेदार ठहराया। इसके अलावा उनके परिवार के सदस्यों ने राकेश टिकैत को ‘आतंकवादियों का नेता’ कहा। हरिओम के परिजनों ने बीकेयू नेता को तथाकथित किसानों द्वारा पीट-पीट कर मार डालने वाले चारों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए टिकैत के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।
इस बीच, एक अन्य मृतक शुभम मिश्रा के चाचा ने भी कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हमला किए जाने के दावे झूठे हैं। उन्होंने कहा, ‘भाजपा कार्यकर्ताओं ने किसी पर हमला नहीं किया। आतंकवादियों (प्रदर्शनकारियों) ने पथराव करना शुरू किया था।”

लखीमपुर खीरी में आठ-आठ लाशें बिछाने वाले तथाकथित किसानो को सबक देना जरूरी

विष्णुगुप्त , उगता भारत 
अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार की तथाकथित किसान आंदोलन के प्रति नरम नीति काल बन रही है, देश की सुरक्षा, मानवता की सुरक्षा, निर्दोष लोगों की जान की सुरक्षा पर आंच आ रही है, आने-जाने के अधिकार का हनन जैसे गुनाह सामने आ रहे हैं। इसी का दुष्परिणाम है कि लखीमपुर खीरी में तथाकथित किसानों ने कोई एक-दो नहीं बल्कि आठ-आठ लाशें बिछा दी। अखिलेश यादव के घर पर पुलिस की गाड़ी सरेआम जला दी गयी, कानून और संविधान को बंधक बनाया जा रहा है। विपछी दल और राष्ट्र विरोधी शक्तियां की करतूत अब निर्दोष लोगों की जानें ले रही हैं।
लखीमपुर में हंगामा करने वाले राजस्थान और पंजाब में प्रदर्शनकारी किसानों पर हुए लाठीचार्ज पर क्यों चुप्पी साधे रहे? केवल इसलिए कि वहां भाजपा विरोधी सरकारें हैं। ये दोहरा मापदंड क्यों?

इतना ही देश को जानने के लिए जरुरी है कि क्या ये वास्तव में किसान हैं या फिर किसान की खोल में गुंडे? जहाँ तक राकेश टिकैत की बात है, उसके लिए आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति है। वह मोदी सरकार के विरुद्ध अराजक तत्वों के हाथ कठपुतली तो बन गया, क्योकि 26 जनवरी को हुए हंगामे से टिकैत खुद पशोपेश में आ गए थे, जिस कारण उसी दिन इस आंदोलन को समाप्त करने का मन बना चुके थे, लेकिन अराजक तत्वों ने उन्हें ऐसा नहीं करने का दबाव बनाया जिस कारण उन्हें रोते हुए मीडिया के सामने आने पड़ा था। इस कटु सच्चाई को राकेश टिकैत को ही बताना होगा। दुनियांभर की औरतें, बच्चे आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं लेकिन राकेश का परिवार गायब है, क्यों?हकीकत यह है कि अराजक तत्व मोदी विरोधी पार्टियों के संरक्षण में इस आंदोलन को लोक सभा 2024 चुनाव तक बनाए रखना चाहते हैं। 2024 तक देश में किसी न किसी बहाने उपद्रव कर जनता में भाजपा के विरुद्ध माहौल बनाओ।  

किसान खोल में गुंडे और देशद्रोहियों को हिंसा की छूट क्यों मिली है ?

जब आप किसी चालक के उपर लाठियां बरसायेंगे, पत्थर बरसायेंगे तो फिर वाहन पर से चालक का नियंत्रण कैसे रह पायेगा? चालक अपने आप को कैसे बचा पायेंगे। जब किसी के उपर अचानक आफत आती है तो फिर वह बचने की कोशिश करता ही है। चालक ने भी बचने की कोशिश की थी, बचने की कोशिश में उसने अपने वाहन को भगाने की कोशिश की थी, सामने हिंसक किसान आ गये। किसान क्या यह नहीं जानते थे कि हम किसी वाहन पर पत्थर फेंकेगे और वाहन चालक पर सरेआम लाठियां बरसायेगें तो फिर वह बचने के लिए अपने वाहन को दोड़ाने का प्रयास नहीं करेगा? हर व्यक्ति को अपनी जान प्यारी होती है। किसानों की लड़ाई सरकार से है। उस वाहन चालक से आपकी लड़ाई थोडेे थी? फिर आपने उस वाहन चालक पर पत्थर क्यों बरसाने लगे, उस वाहन चालक पर लाठियां क्यों बरसाने लगे? क्या आपको कानून हाथ में लेने का अधिकार है, क्या आपको कानून और संविधान को बंधक बना कर रखने का अधिकार है,क्या आपको सड़कों को घेर कर बैठने का अधिकार है, क्या आपको तिरंगे को रौंदने का अधिकार है, क्या आपको तिरंगे को उतार फेंक कर अपना मजहबी झंडा लगाने का अधिकार है? क्या आपको भिडरावाले की प्रशंसा में कसिदे पढ़ने का अधिकार है, क्या आपको दुश्मन देश की वकालत करने का अधिकार है, क्या आपको विदेशी पैसे लेने का अधिकार है, क्या आपको किसी एक पार्टी के कार्यकर्ताओं को बंधक बनाने का अधिकार है? क्या आपको महिलाओं के साथ बदसूलकी का अधिकार है, क्या आपको महिलाओं के साथ बलात्कार करने का अधिकार है, क्या आपको मीडिया कर्मियों के साथ बदतमीजी करने का अधिकार है, क्या आपको मीडिया कर्मियों को धमकी देने का अधिकार है, क्या आपको मीडियाकर्मियों को सरेआम पिटने का अधिकार है? आखिर किसान के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी कब तक चलती रहेगी?
चोरी और सीनाजोरी इसी को कहते हैं, पहले इन्होनंे परस्थिति जन्य घटना को अंजाम देने के लिए बाध्य किया और यह कहना गलत नहीं होगा कि वाहन चालक को इन्होंने वाहन भगाने के लिए मजबूर किया। फिर इन्होंने ही हिंसा फैलायी। हिंसा किस तरह से फैलायी वह भी स्पष्ट है। इनकी हिंसा डराने वाली थी, इनकी हिंसा देश को अस्थिर करने वाली थी, इनकी हिंसा मानवता का खून करने वाली थी। इन्होने न केवल गाडि़यों को पलट दिया और उसमें आग भी लगायी। इन्होंने वाहन चालक सहित पांच भाजपा कार्यकर्ताओं को मौत का घाट उतार दिया। मृत शरीर पर अंधाधुंध लाठियां बरसाते रहे। क्या भाजपा के कार्यकर्ताओं की जानें प्यारी नहीं थी, क्या भाजपा के मारे गये कार्यकर्ताओं के परिजनों के सामने पहाड़ नहीं टूट आया है। मारे गये सभी भाजपा कार्यकर्ता कोई धनाढ़य वर्ग के तो थे नहीं, ये भी मध्यम वर्ग के थे। अगर इसी तरह आपके खिलाफ भी भाजपा के कार्यकर्ता हथियार उठा लेंगे तो फिर आपकी स्थिति क्या होगी?
केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अनिल मिश्र टेनी ने सही कहा है कि किसानों के नाम पर उपद्रवी तत्वों ने हिंसा फैलायी है। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अनिल मिश्र टेनी चूकि जिम्मेवार पद पर बैठे हैं, इसलिए उन्होंने संयमित प्रतिक्रिया दी है, अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने अन्य तत्वों के नाम का उल्लेख नहीं किया। पर लखीमपुर खीरी की घटना में कई प्रकार के तत्व पर पहले से ही उपस्थित थे। तत्वों के प्रकार जानेंगे तो आप हैरानी में पड़ जायेंगे? यह सोचने के लिए मजबूर हो जायेंगे कि हमारे राष्ट के खिलाफ इतने बड़े-बड़ते तत्व खड़े हैं और साजिश में लगे हुए हैं। एक तत्व भिंडरावाले का है, वही भिंडरावाले जो भारत की एकता और अखंड़ता को तोड़कर खालिस्तान का निर्माण करना चाहता था, वही भिंडरावाले जिसने हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान और आईएसआई के इसारे पर लट्टू की तरह नाचता था, वही भिंडरावाले जिसे राजीव गांधी ने आतंकवादी मानने से इनकार कर कहा था कि वे एक महान संत हैं और जिसे इन्दिरा गांधी ने राजनीतिक संरक्षण दे रखा था, वही भिंडरावाले जिसे मारने के लिए इन्दिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर मे सेना भेजकर ब्लू स्टार आपरेशन की थी। जानना यह भी जरूरी है कि जो किसान वाहन पर पत्थर बरसा रहे थे और भाजपा कार्यकर्ताओं पर लाठियां बरसा कर उनकी जान ली थी वे सभी भिंडरावाले लिखे हुए टीशर्ट पहने हुए थे और साथ ही साथ भिड़रावाले का नारा भी लगा रहे थे। वीडीओ फूटेज की अगर गहनता के साथ जांच होगी तो फिर इस तथ्य की सत्यता सामने आ जायेगी।
साजिश वाले तत्व समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के थे। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियां किसानों को भरमाने , किसानों को उपद्रवी, किसानो को हिंसक बनाने में कितने सहयोगी रहे है, यह स्पष्ट है। कांग्रेस का मुख्यमंत्री सरेआम कहता है कि मेरे राज्य में नहीं भाजपा राज्य और दिल्ली में जाकर आंदोलन करो। पहले किसानों को उकसाया, हिंसक बनाया और अब उन पर आंसू बहाने का कार्य भी कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियां कर रही है। लखनउ की घटना तो नोटिस मे लिया ही जाना चाहिए। लखनउ की घटना में अखिलेश यादव ने किस प्रकार से हिंसा का सहारा लिया है, यह भी स्पष्ट हो गया। अखिलेश यादव के घर के सामने सपा के कार्यकर्ताओं ने एक पुलिस गाड़ी को सरेआम जला दिया, पुलिस वालों पर बल का प्रयोग किया। अखिलेश यादव अपने घर पर नजरबंद हैं। उन्हें लखीमपुर खीरी जाकर हिंसा फैलाने की स्वीकृति नहीं मिली। इसी कारण अखिलेश यादव के इसारे पर पुलिस की गाड़ी में आग लगायी गयी। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब में बलात्कार और मुस्लिम लोमहर्षक हिंसा की दर्जनों घटनाएं हुई हैं, राजस्थान में मुस्लिम उग्रपंथियों और सांप्रदायिक तत्वो ने कई दलितों की हत्याएं की है पर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उन हताहत दलितों के घर नहीं गये। पर राजनीतिक लाभ के लिए लखीमपुर खीरी तक दौड़ लगा रहे है और हिंसा करने वाले और देश विरोधी तत्वों का उत्साह भी बढ़ा रहे हैं।
राकेश टिकैत की मुस्लिम परस्त मानसिकता कौन नहीं जानता है। राकेश टिकैत को कौन सा जन समर्थन है? इस तथ्य को हमेशा नकारा क्यो जाता है कि राकेश टिकैत का नजरिया और सक्रियता राजनीतिक है। वे विधानसभा का एक नहीं बल्कि दो-दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। दोनों बार विधान सभा चुनाव में जमानत जब्त करा चुके हैं। ये अजित सिंह की पार्टी के सदस्य हैं। हरियाणा में एक खास लोगों के वर्चस्व टूटना इन्हें पंसद नहीं है। क्या कोई यह बतला सकता है कि अल्ला हू अकबर किसानों का नारा हो सकता है? अगर नही ंतो फिर अल्ला हू अकबर का नारा राकेश टिकैत किस एजेंडे के तहत लगाते हैं, क्या हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए राकेश टिकैत अल्ला हू अकबर का नारा नहीं लगाता है? पंजाब और हरियाणा में भी क्या हिन्दुओ को निशाना नहीं बनाया गया है, हिन्दुओं को अपमानित नहीं गया है? क्या आप क्रिकेटर युवराज सिंह के बाप का बयान भूल गये जिसमें उन्होंने किसान बिल को लेकर हिन्दुओं को धमकाया था और अपमानित किया था?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की अन्य सरकारों की तारीफ होनी चाहिए। दस महीनो से इनका आंदोलन चल रहा है। दस महीनों तक दिल्ली में नरेन्द्र मोदी, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने कोई बल प्रयोग नहीं किया, बलप्रयोग होता तो निश्चित तौर पर किसानों के वेश में हिंसा कर रहे देश द्रोहियों को आठ-आठ लाशें बिछाने का अवसर नहीं मिलता? इनकी साजिश तो पहले दिन से ही हिंसा कराने की थी और नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने की थी। यह सबको पता है कि यह तथाकथित आंदोलन उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव तक चलना है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार निशाने पर है। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उत्तर प्रदेश में देशद्रोहियों का जो संहार किया है, अपराधियो को सही जगह पर रखा है उससे कांग्रेस, सपा और अन्य दलो की नींद उड़ी हुई है और तथाकथित किसानों के माध्यम से उत्तर प्रदेश में भाजपा का सफाया करना चाहते हैें। पर अब कड़े कदम की आवश्यकता है। तथाकथित किसानों को आठ-आठ लाशें बिछाने जैसी छूट नहीं मिलनी चाहिए।

राहुल गांधी के दौरे से पहले सिख समुदाय ने लखनऊ में लगाया पोस्टर : ‘नहीं चाहिए फर्जी सहानुभूति’… 1984 दंगों की दिलाई याद

लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में कांग्रेस और विपक्षी दलों की सियासत जारी है। हिंसा में पीड़ित परिवारों से मुलाकात करने के लिए राहुल गांधी यूपी दौरे पर आने वाले है। वहीं कांग्रेस का अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है। राहुल गांधी के लखनऊ दौरे का विरोध शुरू हो गया है। उनके दौरे से पहले सिख समुदाय ने लखनऊ में जगह-जगह पोस्टर लगाकर अपना आक्रोश जताया है। साबेह श्री गोविंद सिंह सेवा समिति के अध्यक्ष सरदार त्रिलोचन सिंह ने पोस्टर लगाकर राहुल गांधी को 1984 दंगों की याद दिलाई है।

लखनऊ में एक पोस्टर गुरुनानक वाटिका कमिटी, आलमबाग के अध्यक्ष रविंद्र पाल सिंह की ओर से लगाया गया है। इसमें लिखा है, ‘नहीं चाहिए फर्जी सहानुभूति, जिन लोगों ने 1984 का कत्लेआम किया, उनका साथ नहीं चाहिए, हम न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं, दंगाइयों का साथ नहीं चाहिए।’

इसी तरह का एक और पोस्टर लखनऊ के पटेल नगर स्थित गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह बग्गा की ओर से लगाया गया है। इस पोस्ट में लिखा है, “राहुल गांधी वापस जाओ, प्रियंका गांधी वापस जाओ, सिखों के कातिल वापस जाओ, नहीं चाहिए तुम्हारा साथ…।”

उधर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राहुल गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को लखीमपुर खीरी का दौरा करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। घटना के बाद 3 अक्‍टूबर से ही यहां पर धारा 144 लागू है। इससे पहले कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने राज्‍य सरकार से कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को क्षेत्र का दौरा करने की इजाजत मांगी थी।

43 साल पुराना खूनी राजनीति का वही कांग्रेसी खेल आज फिर दोहराया जा रहा है। सत्ता पाने के लिए रक्तरंजित राजनीति का खतरनाक खेल कांग्रेस पहली बार नहीं खेल रही है। दिल्ली पंजाब हरियाणा में भयानक हिंसा के बाद उत्तरप्रदेश में कल लखीमपुर में हुआ बर्बर हत्याकांड उसी खूनी राजनीतिक खेल का नवीनतम पड़ाव है।

देश के कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने इसी वर्ष 5 फरवरी को संसद में कहा था कि कांग्रेस खून से खेती कर रही है। उन्होंने गलत नहीं कहा था।

कृपया बहुत ध्यान से पढ़ें और इस शर्मनाक तथ्य और सत्य को अधिकतम लोगों तक पहुंचाएं...

1977 में देश की जनता कांग्रेस को सत्ता से बुरी तरह बेदखल कर दो तिहाई बहुमत के साथ जनता पार्टी को सत्ता सौंप चुकी थी। पंजाब में भी जनता पार्टी और अकाली दल के गठबंधन ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था और कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री रहे ज्ञानी जैल सिंह द्वारा किये गए भयंकर भ्रष्टाचार की जांच के लिए गुरदयाल सिंह जांच आयोग बनाया था। इस आयोग की जांच की शुरूआत के साथ ही जैल सिंह का जेल जाना तय होने लगा था। इन परिस्थितियों से पार पाने के लिए कांग्रेस ने एक योजना तैयार की थी। इस योजना के तहत संजय गांधी और जैल सिंह ने पंजाब से सिक्ख समुदाय के दो धार्मिक नेताओं को दिल्ली बुलाकर बात की थी। संजय गांधी और जैल सिंह की जोड़ी को उन दोनों में से एक काम का नहीं लगा था क्योंकि वो उतना उग्र आक्रामक उजड्ड नहीं था जिसकी अपेक्षा संजय गांधी और जैल सिंह की जोड़ी कर रही थी। लेकिन दूसरा धार्मिक नेता उनकी उम्मीद से भी बहुत ज्यादा उग्र आक्रामक और उजड्ड निकला था। अतः संजय गांधी और जैल सिंह की जोड़ी ने उस उजड्ड को अपने प्लान की कमान सौंप दी थी। अब यह भी जान लीजिए कि पंजाब से आए उस उग्र आक्रामक उजड्ड का नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले। उसने कांग्रेस की धुन पर पंजाब में धार्मिक आधार पर खून खराबे का नंगा नाच शुरू कर दिया था। संजय गांधी जैल सिंह की जोड़ी के साथ हुई भिंडरावाले की उस मुलाकात में जिस भयानक हिँसक खूनी राजनीतिक षड़यंत्र की जो चिंगारी सुलगाई गई थी उसे जरनैल सिंह भिंडरावाले-कांग्रेस गठबंधन ने अगले 3-4 वर्षों में बड़े जतन से देशव्यापी भयानक आतंकवाद की आग का रूप दे दिया था। कांग्रेसी फौज शायद यह सोचती है कि लोग सम्भवतः भूल गए होंगे कि उस दौर में भिंडरावाले को रूपया देने की बात संजय गांधी और उसके साथी कमलनाथ ने स्वयं स्वीकारी थी। 

भिंडरावाले के आतंक के दम पर 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पंजाब में भारी जीत मिली थी। लोकसभा के लिए हुए उस चुनाव में भिंडरावाले पंजाब में कांग्रेस के चुनावी प्रचार के लिए तूफ़ानी दौरे कर के कांग्रेस के लिए वोट मांग रहा था। केन्द्र मेँ सरकार बनते ही कांग्रेस ने पंजाब में अकाली व जनता पार्टी की सरकार भंग कर के राष्ट्रपति शासन लगा दिया था और बाद में चुनाव करा के वहां जीत हासिल की थी। पंजाब में कांग्रेस की उस चुनावी जीत में भी जरनैल सिंह भिंडरवाले ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके परिणामस्वरूप पुरस्कार के रूप में उसे तत्कालीन कांग्रेसी सरकार का बेलगाम बेशर्म संरक्षण समर्थन किस प्रकार मिला था इसे इन दो तथ्यों से समझ लीजिए। अकाली दल को राजनीतिक धार्मिक चुनौती देने के लिए भिंडरावाले ने दल खालसा नाम के अपने आतंकी गुट की जब स्थापना की थी उस समय चंडीगढ़ के पंचतारा होटल एरोमा में हुई उसकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के खर्च का भुगतान तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के गृहमंत्री जैल सिंह ने बाकायदा अपने चेक से किया था। 

दूसरा तथ्य यह है कि 9 सितम्बर 1981 को जनरैल सिंह भिंडरावाले ने पंजाब नहीं बल्कि देश के प्रख्यात पत्रकार और पंजाब केसरी अखबार के संस्थापक सम्पादक लाला जगत नारायण की निर्मम हत्या दिन दहाड़े कर दी थी। लेकिन इस हत्याकांड में हुई उसकी गिरफ्तारी के बाद केन्द्र और पंजाब की तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के हस्तक्षेप के कारण उसको थाने से ही जमानत पर छोड़ दिया गया था। अपनी रिहाई पर वो अपने सैकड़ों हथियारबंद गुर्गों के जुलूस के साथ किसी विजेता की तरह थाने से बाहर निकला था और सड़कों पर हवाई फायर करती राइफलों और बन्दूकों के आतंकी धमाकों की दहशत फैलाते हुए अपने डेरे पर चला गया था। भिंडरावाले को तत्कालीन कांग्रेस सरकार के संरक्षण  समर्थन का एक अन्य उदाहरण मार्च 1982 में तब सामने आया था जब बाल ठाकरे की चुनौती के जवाब में अपने हथियारबंद  गुर्गों का 500 कारों मोटरसाइकिलों का काफिला लेकर भिंडरावाले मुम्बई पहुंच गया था। मुम्बई में वो उस दादर इलाके के गुरुद्वारे में 5 दिनों तक डेरा डाले रहा था जिस दादर इलाके में बाल ठाकरे का घर था। उन 5 दिनों के दौरान महाराष्ट्र पुलिस का भारी भरकम सुरक्षा घेरा भिंडरावाले के काफिले के साथ लगातार बना रहा था। बताने की जरूरत नहीं कि उस समय महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की सरकार थी। उस समय अटल बिहारी बाजपेयी जी ने देश और महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकारों से बार बार मांग की थी कि भिंडरावाले को मुम्बई जाने से रोका जाए। लेकिन उनकी मांग को अनसुना कर दिया गया था।

संजय गांधी जैल सिंह की जोड़ी के साथ हुई भिंडरावाले की मुलाकात ने पंजाब में भयानक हिँसक खूनी राजनीतिक षड़यंत्र की जो चिंगारी सुलगाई थी उसके कारण पंजाब के साथ साथ पूरे देश में भड़की आतंकवाद की भयानक आग 1981 से 1995 तक लगातार देश को जलाती रही थी। इस आग में लगभग 20,000 से अधिक निर्दोष नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

कांग्रेस की उस आतंकी कठपुतली जरनैल सिंह भिंडरावाले की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बाद में जाग गई थीं। कांग्रेस के लिए वो भस्मासुर बन गया था। अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए आवश्यक पैसों और हथियारों की भारी जरूरत पूरी करने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले ने अपने तार पाकिस्तान से जोड़ लिए थे। परिणाम स्वरूप 1984 में सेना ने उसको उसके 300 हथियारबंद गुर्गों के साथ ढेर कर दिया था। उसके बचे हुए गुर्गों ने इंदिरा गांधी समेत कई कांग्रेसी नेताओं की हत्या की थी। 

आज कांग्रेस 43 साल पुराना वही हिंसक खूनी राजनीतिक खेल फिर खेलने पर उतारू नजर आ रही है। फर्क बस इतना है कि 43 साल पहले उसने जरनैल सिंह भिंडरावाले को धार्मिक संत कह कर अपना संरक्षण समर्थन दिया था। आज 43 साल बाद लालकिले पर खालिस्तानी झंडा लहरा कर जिंदाबाद नारा लगाने वाले देशद्रोही गुंडों को किसान कह कर कांग्रेस अपना खुला संरक्षण समर्थन दे रही है।

अतः कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने 5 फरवरी को संसद में यह कह कर क्या गलत कह दिया  था कि कांग्रेस खून से खेती कर रही है.?

अंत में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि 30-35 साल पहले उस दौर में प्रख्यात अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार मार्क टुली और सतीश जैकब की जोड़ी ने अपनी किताब "अमृतसर: मिसेज गांधीज़ लास्ट बैटिल" में और देश के चरम परम् सेक्युलर पत्रकार रहे कुलदीप नैयर ने अपनी किताब "बियॉन्ड दी लाइंस" में उन सारे तथ्यों का बहुत विस्तार से वर्णन किया है जिनका उल्लेख मैंने अपनी इस पोस्ट में किया है।

लखीमपुर खेरी : शुभम मिश्रा की हत्या के बाद पर्स, सोने की चेन भी ले गए ‘किसान’

                               मृतक शुभम मिश्रा (बाएँ), पिता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत की कॉपी (दाएँ)
लखीमपुर खीरी में ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ ने जो हिंसा की, उसमें मारे गए लोगों में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा टेनी के ड्राइवर हरिओम मिश्रा, भाजपा कार्यकर्ता श्याम सुंदर निषाद और ‘ABP News’ के पत्रकार रमन कश्यप के अलावा एक नाम शुभम मिश्रा का भी है। शुभम मिश्रा युवा थे। डेढ़ साल पहले ही शादी हुई थी। वो भाजपा से जुड़े हुए थे। उनका एक छोटा सा बच्चा भी है। परिवार की स्थिति बदहाल है।

शुभम के पिता विजय मिश्रा ने पुलिस में जो तहरीर दी है, उसमें उन्होंने बताया है कि न सिर्फ उनके बेटे को मार डाला गया, बल्कि उनका पर्स और सोने की चेन भी गायब है। आशंका जताई जा रही है कि उनकी हत्या के बाद हत्यारे सोने की चेन और पर्स लेकर भी निकल गए। पिता ने तजिंदर सिंह विर्क नाम के एक नेता का नाम लिया है, जो समाजवादी पार्टी से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ उसकी तस्वीरें भी वायरल हो रही हैं।

भाजपा नेता व दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने शुभम मिश्रा के परिवार की मदद के बीड़ा उठाया है। उन्होंने लिखा, “फ़र्ज़ी किसान बने आतंकियों ने जिस युवा भाजपा कार्यकर्ता शुभम मिश्रा की पीट-पीट कर हत्या कर दी, उनका एक छोटा से बच्चा हैं। अभी डेढ़ साल पहले ही शादी हुई थी। शुभम के हत्यारे को और लखीमपुर खीरी को जलाने की साजिश करने वालों को माफ नहीं किया जा सकता है।”

उन्होंने बताया कि उनकी परिवार से बात भी हो गई है। उन्होंने इस घटना को दुःखद और असहनीय बताते हुए कहा कि हम सब इस दुःख में परिवार के साथ हैं और हत्यारों को पकड़ा जाना और न्याय मिलना बेहद ज़रूरी है। शहर के गढ़ी रोड निवासी शुभम मिश्रा का शव तिकुनिया से लखीमपुर लाया गया, जहाँ उनका अंतिम संस्कार हुआ। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की मानें तो उनके शरीर पर दर्जन भर जख्म के निशान हैं।

मेडिकल रिपोर्ट में भी पुष्टि हुई है कि डंडों से मारे जाने और घसीटे जाने के कारण उनकी मृत्यु हुई। तिकुनिया के बनवीरपुर वो कुश्ती प्रतियोगिता में शामिल होने गए थे, जिसका उद्घाटन उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को करना था। पिता विजय मिश्रा ने बताया है कि शुभम उसी गाड़ी में बैठे हुए थे, जिसको हरिओम मिश्रा ड्राइव कर रहे थे। ये लोग मुख्य अतिथि का स्वागत करने के लिए जा रहे थे।

भाजपा के आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने इस घटना पर बयान दिया है। उन्होंने शुभम के पिता विजय मिश्रा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत की प्रति शेयर करते हुए लिखा, “लखीमपुर में मारे जाने वाले शुभम मिश्रा के परिवार ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में तेजिंदर सिंह विर्क का नाम लिया है, जिसका लिंक समाजवादी पार्टी से है और जिसको अखिलेश यादव किसान नेता बता रहे थे। आंदोलन के नाम पर सपा और कॉन्ग्रेस लखीमपुर में राजनीति कर रहे है।”

पिता की शिकायत के अनुसार, कि अमनदीप सिंह सिंधु, महेंद्र सिंह और तजिंदर सिंह विर्क शुभम मिश्रा को तलवार व लाठियों से मार रहे थे। साथ ही पत्थरबाजी भी की जा रही थी। उन्होंने रिपोर्ट लिख कर कानूनी कार्रवाई करने का आग्रह किया है। अखिलेश यादव के साथ तजिंदर सिंह विर्क की कई तस्वीरें भी वायरल हुई हैं। बताया जा रहा है कि आजकल वो लाल की जगह हरी पगड़ी पहनता है। उसने अपने ट्विटर हैंडल पर अखिलेश यादव की सभाओं की तस्वीरें शेयर करते हुए ‘जय समाजवाद’ भी लिखा है।

लखीमपुर खीरी हिंसा : ‘जल्लादों ने वामपंथी तरीके से की हत्याएँ, ये किसान नहीं राजनीतिक दलों के लोग’ – भारतीय किसान संघ

                                                 लखीमपुर खीरी में 'किसान प्रदर्शनकारियों' ने की हिंसा
देश के सबसे बड़े किसान संगठनों में से एक ‘भारतीय किसान संघ’ ने लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि इसमें लिप्त लोग किसान नहीं थे। ‘भारतीय किसान संघ’ ने स्पष्ट कहा है कि ये विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग थे, जिन्होंने वामपंथी तरीकों से इस घटना को अंजाम दिया। संगठन ने कहा कि जिस तरह से लाठी-डंडों से पीट-पीट कर लोगों की निर्मम हत्या की गई, ऐसा काम किसान नहीं कर सकते।

‘भारतीय किसान संगठन’ ने कहा, “कानून हाथ में लेना, सरेआम हत्याएँ कराना… ऐसा लगता है जैसे प्रोफेशनल लोगों ने, जल्लादों ने ये कार्य किया हो। इस घटना की जितनी निंदा की जाए, कम है। इस प्रकार के कृत्यों में लिप्त लोगों को कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए। हम माँग करते हैं कि इस घटना की निष्पक्ष जाँच करा के जल्द से जल्द मृतकों के परिजनों को न्याय मिले। हम मृतकों के परिजनों के साथ संवेदना प्रकट करते हैं।”

                                              लखीमपुर खीरी हिंसा पर ‘भारतीय किसान संघ’ का बयान

वहीं योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 20 घंटों के भीतर पीड़ितों से बात कर के स्थिति को संभाल लिया, जिससे यहाँ गिद्धदृष्टि लगाए नेताओं को भी निराशा हाथ लगी है। बड़े पैमाने पर प्रदर्शन की योजना थी और कई विपक्षी नेताओं समेत एक्टिविस्ट्स भी यहाँ पहुँच रहे थे, लेकिन प्रशासन ने स्थिति संभाल लिया। नेताओं को यहाँ आने से रोका गया, ताकि तनाव न बढ़े। FIR भी की गई। मृतकों के आश्रितों के लिए मुआवजे की घोषणा हुई।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आदेश दिया है कि उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में RAF और SSB की दो-दो कंपनियों की तैनाती 6 अक्टूबर तक रहेगी। किसान नेताओं के साथ प्रशासन ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के समझौते का ऐलान किया। दिल्ली-NCR की सीमाएँ पहले ही बंद कर दी गई थीं। सपा समर्थकों ने राज्य भर में हिंसा की, लेकिन लखीमपुर खीरी में उन्हें टपने नहीं दिया गया। अभी भी वरिष्ठ अधिकारी वहाँ मौजूद हैं।