लैटिन भाषा में एक कहावत है- वर्बा वोलांट, स्क्रिप्टा मानेंट. माने- कहे हुए शब्द ख़त्म हो जाते हैं, मगर लिखे हुए शब्द हमेशा के लिए रह जाते है। ये कहावत करीब दो हज़ार साल पुरानी है। तब आवाज़ रेकॉर्ड करने की टेक्नॉलजी नहीं थी। इसीलिए इंसान के मरने के बाद भी उसकी रिकॉर्डिंग ज़िंदा रह जाती है। आज आपको ऐसी ही कुछ रिकॉर्डिंग्स के बारे में बताएंगे जब एक अमेरिकी राष्ट्रपति के दिमाग और ज़ुबान से भारत के लिए निकली गंदगी। इस अमेरिकी राष्ट्रपति को पाकिस्तान की तानाशाही हुकूमत से हमदर्दी थी।पाकिस्तान के हाथों हो रहा भीषण नरसंहार उसके लिए कोई मुद्दा नहीं था। उसके लिए मुद्दा था भारतीय महिलाओं का रूप-रंग। उसे भारतीय महिलाएं दुनिया में सबसे ज़्यादा कुरूप लगती थीं। वो कहता था कि भारतीय महिलाओं को देखकर वो ‘टर्न ऑफ’ हो जाता है। हैरान होता है कि भारतीय महिलाएं बच्चे कैसे पैदा कर लेती हैं। उसका कहना था कि अफ्रीका के लोगों में फिर भी जानवरों वाला चार्म होता है। मगर हिंदुस्तानी, वो तो बिल्कुल बेकार और बर्बाद होते हैं।
ये वही नस्लीय सोच वाला अमेरिकी राष्ट्रपति है, जिसने हमारी प्रधानमंत्री को ‘चुड़ैल’ कहा था। इस पूर्व राष्ट्रपति की भारत से जुड़ी अपमानजनक टिप्पणियां पहले भी कई बार उजागर हो चुकी हैं। जिन पर अमेरिका को काफी शर्मिंदा होना पड़ा था। अब एक बार फिर अमेरिका को अपने इस पूर्व राष्ट्रपति की भारत पर की गई नस्लीय टिप्पणियों से शर्मसार होना पड़ रहा है। ये किस राष्ट्रपति की बात कर रहे हैं हम? बात 49 साल पुरानी है। तारीख़ - 25 मार्च, 1971।स्थान यूनिवर्सिटी ऑफ ढाका, जहां दो हॉस्टल हैं- इक़बाल हॉल और जगन्नाथ हॉल। इकबाल हॉल में मुस्लिम छात्र रहते थे। जगन्नाथ हॉल में हिन्दू छात्र। रात के साढ़े 11 बजे चार M-47 टैंक इन दोनों हॉस्टल्स के सामने रुके। पाकिस्तानी फ़ौज की एक टुकड़ी ये टैंक लेकर वहां पहुंची थी। बिना किसी चेतावनी के इन चारों टैंकों ने छात्रावासों पर बम दागने शुरू किए। करीब पांच मिनट बाद पाकिस्तानी सैनिक हॉस्टल में घुसे और अंधाधुंध गोलियां चलाईं और ज़िंदा बचे छात्रों को हॉस्टल के बाहर दीवार की सीध में खड़ा करके तोप से भून दिया गया। 15-20 मिनट के भीतर करीब 200 छात्रों की हत्या कर दी गई। ये रात पूर्वी पाकिस्तान, वर्तमान बांग्लादेश, के इतिहास में काली रात कहलाती है। इसी रात के बाद पाकिस्तान के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के बीच गृह युद्ध शुरू हुआ। नौ महीने तक चले इस सिविल वॉर का अंत किया भारत ने। दिसंबर 1971 में भारत को इस युद्ध में शामिल होना पड़ा। हमने पाकिस्तानी सेना को हराया और इसके बाद जाकर गठन हुआ बांग्लादेश का।
याहिया खान
पूर्वी पाकिस्तान नरसंहार का दोषी कौन? बांग्लादेश के गठन की कहानी एक भीषण नरसंहार पर लिखी गई है। इस नरसंहार में पूर्वी पाकिस्तान नरसंहार, जिसमें करीब पांच लाख लोग मारे गए। कई अनुमान मृतकों की संख्या 30 लाख तक बताते हैं। मगर इस जेनोसाइड के लिए अकेले पाकिस्तान दोषी नहीं था। इसमें पाकिस्तान के हाथ मज़बूत करने वाले, उसे नरसंहार के औज़ार देने वाले, उसके लिए इंटरनैशनल सपोर्ट जुटाने वाले उसके दो सबसे बड़े मददगार थे- निक्सन और किसिंगर। अमेरिका के 37वें राष्ट्रपति थे रिचर्ड निक्सन। 1969 से 1974 तक वह इस पद पर रहे। निक्सन के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे हेनरी किसिंगर। इन दोनों के कार्यकाल का सबसे बड़ा धब्बा है 1971 का पूर्वी पाकिस्तान नरसंहार। इन दोनों को भारत से नफ़रत थी। वो भारत और सोवियत की नज़दीकी से बिफ़रे हुए थे। उन्हें ये बर्दाश्त नहीं था कि भारत सरकार अमेरिका के खिलाफ़ जाकर पूर्वी पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे नरसंहार पर स्टैंड ले। अपनी इस नफ़रत के कारण वो न केवल पाकिस्तान के तानाशाह याह्या ख़ान की मदद करते रहे, बल्कि पाकिस्तानी सेना जब आज के बांग्लादेश में नरसंहार कर रही थी, तब ये ही दोनों उस जेनोसाइड की कामयाबी पर खुश भी थे।
निक्सन और किसिंगर की पूर्वी पाकिस्तान पॉलिसी क्यूरिस केस है दरअसल, निक्सन प्रशासन का एक बड़ा हिस्सा अपनी सरकार की पूर्वी पाकिस्तान पॉलिसी से असहमत था। उन दिनों भारत में अमेरिका के राजदूत थे किनिथ कीटिंग। वो निक्सन और किसिंगर से बार-बार कह रहे थे कि पाकिस्तान अपने पूर्वी हिस्से में नरसंहार कर रहा है। इसीलिए अमेरिका को उसकी मदद रोक देनी चाहिए। पता है, कीटिंग के इस स्टैंड पर निक्सन ने उनके पीठ पीछे किसिंगर से क्या कहा था? निक्सन ने कहा था- 70 साल के कीटिंग को बस में कर सके, क्या ये कला हिन्दुस्तानियों के पास है? इसके जवाब में किसिंगर ने कहा था- मिस्टर प्रेज़िडेंट, हिन्दुस्तान के लोग चापलूसी में महारथी होते हैं। चाटुकारिता में उनका कोई जोड़ नहीं। ऐसे ही ख़ुशामद कर-करके तो वो 600 सालों से सर्वाइव कर रहे हैं। बड़े ओहदों पर बैठे लोगों की चापलूसी में बहुत पारंगत होते हैं भारतीय। निक्सन और किसिंगर ने इतने बरस पहले वाइट हाउस में क्या बातचीत की? अमेरिका में डिक्लासिफ़िकेशन की एक रवायत है। यहां एक तय समय के बाद पुरानी सरकारों से जुड़े कई दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जाते हैं। कई बार सूचना के अधिकार के तहत आए आवेदनों पर भी पुराने रेकॉर्ड्स सार्वजनिक होते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत निक्सन अडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े कई रेकॉर्ड्स भी पब्लिक हुए। इनमें दस्तावेज़ भी हैं और ऑडियो रिकॉर्डिंग्स भी। ये ही रिकॉर्डिंग्स हमें निक्सन और किसिंगर द्वारा भारत को लेकर कही गई अपमानजनक टिप्पणियों का ब्योरा देती हैं। निक्सन से जुड़े रेकॉर्ड कई चरणों में सार्वजनिक हो रहे हैं। मई 2020 में भी इन दस्तावेज़ों की एक खेप आई।वाइट हाउस ने अपनी वेबसाइट पर निक्सन की कई रिकॉर्डिंग्स को पब्लिक किया। मगर काफी दिनों तक इस पर किसी की नज़र नहीं गई। फिर 3 सितंबर को गैरी बेस ने न्यू यॉर्क टाइम्स में इस पर एक लेख लिखा। गैरी बेस इंटरनैशनल अफेयर्स में प्रोफेसर हैं। निक्सन, किसिंगर और 1971 के युद्ध पर उन्होंने काफी काम किया है। इस विषय पर 2013 में ‘दी ब्लड टेलिग्राम’ नाम की उनकी क़िताब भी आई थी। निक्सन की कुछ ओछी टिप्पणियां NYT में छपे गैरी बेस के लेख के बाद से ही निक्सन की इन नई रिकॉर्डिंग्स पर ख़बरें होने लगीं। इनमें भारत और भारतीय महिलाओं पर की उनकी कई ओछी टिप्पणियां भी शामिल हैं। ये टिप्पणियां 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के भीतर हो रहे नरसंहार के दौरान की गयीं थीं। देखिए उन ओछी टिप्पणियों को:- 1. हिन्दुस्तानी औरतें दुनिया में सबसे बदसूरत होती हैं। इस बात में कोई शक़ नहीं। 2. ये हिन्दुस्तानी लोग सबसे ज़्यादा सेक्सलेस इंसान हैं। लोग ब्लैक अफ्रीकन्स को लेकर बोलते हैं। मैं कहता हूं कि उनमें तो फिर भी जानवरों वाला थोड़ा सा चार्म होता है, मगर ईश्वर, वो भारतीय, छी। वो तो बिल्कुल बेकार होते हैं। 3. हिन्दुस्तानियों को देखकर मेरा मज़ा किरकिरा हो जाता है। मैं टर्न ऑफ़ हो जाता हूं। हेनरी, बताओ तो ज़रा। इनको देखकर कोई टर्न ऑन कैसे होता होगा? 4. हिन्दुस्तानियों को देखकर घृणा होती है। उन पर सख़्त होना आसान है। 5. मुझे नहीं पता कि हिन्दुस्तानी बच्चे कैसे पैदा करते हैं? निक्सन के बयान पर पहले भी कई बार हंगामा हो चुका है इससे पहले साल 2000 और 2005 में भी अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने निक्सन से जुड़े कुछ दस्तावेज़ पब्लिक किए थे। इनमें सामने आया कि निक्सन चाहते थे भारत में भुखमरी और अकाल आ जाए। इन डॉक्यूमेंट्स में 5 नवंबर, 1971 को निक्सन और किसिंगर के बीच हुई एक बातचीत पर ख़ूब हंगामा हुआ था। उस समय भारत में कांग्रेस की सरकार थी। पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी ने निक्सन और किसिंगर की इंदिरा पर की गई फब्तियों की काफी निंदा की थी। ये मामला इंटरनैशनल मीडिया में भी काफी रिपोर्ट हुआ था। इससे शर्मिंदा हेनरी किसिंगर ने तब इंदिरा पर की गई अपमानजनक टिप्पणियों के लिए माफ़ी भी मांगी थी। किसिंगर ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि वो कोल्ड वॉर के दौर की बात है। तब तनाव और गुस्से में ग़लत बातें निकल गईं। निक्सन और किसिंगर की इंदिरा पर कही जो बात सबसे ज़्यादा रिपोर्ट हुई, वो तब की है जब नवंबर 1971 में इन दोनों ने भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। मीटिंग के बाद इंदिरा के बारे में गॉसिप करते हुए निक्सन ने किसिंगर से कहा था- हमने तो उस बूढ़ी चुड़ैल के ऊपर थूक ही दिया। इसके जवाब में किसिंगर बोले- भारत के लोग वैसे भी बास्टर्ड होते हैं। निक्सन और इंदिरा की ये मीटिंग क्यों हुई थी? ये मीटिंग नवंबर 1971 में उस वक़्त हुई थी, जब इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर गई थीं। उनका मकसद था अमेरिका को ये बताना कि पूर्वी पाकिस्तान में कितना बड़ा नरसंहार हो रहा है। इस नरसंहार के कारण भारत में भी बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया। भारत के उत्तर पूर्वी इलाकों में पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आ रहे शरणार्थियों की बाढ़ आ गई थी। एक करोड़ से ज़्यादा संख्या में आए ये शरणार्थी भारत के लिए मानवीय आपदा थे। भारत बार-बार इस संकट की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहा था। मगर सोवियत के सिवाय किसी ने भारत की अपील नहीं सुनी। ऐसे में इंदिरा गांधी नवंबर 1971 में निक्सन से आमने-सामने की बातचीत के लिए अमेरिका पहुंचीं। इंदिरा ने कहा कि पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे घटनाक्रम के कारण भारत में जो संकट पैदा हो हुआ है, उसे देखते हुए अब और चुप बैठना नई दिल्ली के लिए मुमकिन नहीं है। मगर इंदिरा की अपील पर निक्सन ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई उल्टा पीठ पीछे उन्हें ‘बिच’ और ‘चुड़ैल’ कहा। भारत इसके बाद भी संयम दिखाता रहा। वो तो जब 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर हवाई बमबारी शुरू की, तब भारत आधिकारिक तौर पर इस युद्ध में शामिल हुआ। इस हमले की ख़बर मिलते ही निक्सन ने किसिंगर को फोन मिलाया। इस टेलिफ़ोनिक बातचीत में निक्सन ने कहा- हमने उस बिच (प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संदर्भ में) को चेतावनी दी थी। उनसे कहो कि पश्चिमी पाकिस्तान के हमले पर भारत द्वारा शिकायत करना ऐसा ही है, जैसे रूस ये दावा करे कि फिनलैंड ने उस पर हमला कर दिया। भारत और पाकिस्तान के बीच 3 दिसंबर, 1971 को शुरू हुआ ये युद्ध 14 दिन तक चला। इस दौरान शुरुआती एक हफ़्ते में ही पाकिस्तान की हालत ख़राब होने लगी। किसी भी क़ीमत पर इस्लामाबाद की मदद को आमादा निक्सन और किसिंगर, पाकिस्तान के लिए इंटरनैशनल सपोर्ट जुटाते रहे। दोनों ने चीन से भी भारत पर दबाव बनाने को कहा। मगर सोवियत के प्रेशर में चीन इस मामले से पीछे रहा। बाद के सालों में जारी इस बातचीत के ब्योरे के मुताबिक, निक्सन ने तब किसिंगर से कहा था- ये हिंदुस्तानी तो कायर होते हैं न? इसके जवाब में किसिंगर बोले थे- हां, कायर तो होते हैं। मगर उनकी पीठ पर रूस है। रूस ने ईरान और तुर्की समेत कई देशों को धमकी दी है। कहा है कि अगर वो पाकिस्तान की मदद करते हैं, तो बहुत बुरा होगा। रूसियों ने सारा खेल ख़राब कर दिया है। क्या सच में सोवियत ने ही पाकिस्तान को जिताने का अमेरिकी खेल बिगाड़ दिया था? जवाब है, हां। अमेरिका की तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान युद्ध में पिछड़ रहा था। ऐसे में निक्सन प्रशासन ने अमेरिकी नौसेना की 7वीं फ्लीट को बंगाल की खाड़ी के लिए रवाना किया। ये उस समय दुनिया का सबसे बड़ा वॉरशिप था। साथ ही, ब्रिटिश नौसेना ने भी अपने एयरक्राफ्ट ईगल को भारतीय समुद्री सीमा के नज़दीक रवाना कर दिया। ये दोनों फ्लीट्स न्यूक्लियर पावर्ड थे। ख़ुद को सबसे महान बताने वाले दो देश मिलकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को न्यूक्लियर हमले की धमकी दे रहे थे। वो भी किसके लिए? लाखों लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तान को जिताने के लिए।अमेरिका और ब्रिटेन की प्लानिंग भारत पर दोतरफ़ा हमला करने की थी। ऐसे में भारत की मदद के लिए फिर आगे आया सोवियत। उसने अपनी एक न्यूक्लियर नौसैनिक फ्लीट भारत की मदद के लिए रवाना की। सोवियत ने साफ कर दिया कि अगर ये दोनों भारत पर हमला करेंगे, तो सोवियत उसका जवाब देगा। भारत का फाइनेस्ट मिलिटरी मोमेंट सोवियत से मिली इस मदद के कारण 16 दिसंबर, 1971 को भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया। इतिहास इस जीत को भारत का फाइनेस्ट मिलिटरी मोमेंट मानता है। यही इतिहास निक्सन और किसिंगर की पूर्वी पाकिस्तान पॉलिसी को अमेरिका का नैतिक और सामरिक पतन भी मानता है। इतिहासकार कहते हैं कि निक्सन और किसिंगर ने अपनी कुंठा को अपनी विदेश नीति पर हावी होने दिया। भारत के प्रति अपनी नस्लीय नफ़रत के कारण उन्होंने एक नरसंहार को समर्थन दिया। ये चैप्टर न केवल निक्सन प्रशासन, बल्कि अमेरिकी इतिहास के सबसे शर्मनाक एपिसोड्स में गिनी जाती है। निक्सन से जुड़े कई दस्तावेज़, कई रिकॉर्डिंग्स अभी पब्लिक होनी बाकी है। कई पब्लिक हुई रिकॉर्डिंग्स ऐसी हैं, जहां कई हिस्सों को बीप करके जारी किया गया है। अमेरिका के कई लोग इन रिकॉर्डिंग्स को समूचा जारी करने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए वो सूचना के अधिकार जैसे संवैधानिक राइट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।कितनी अद्भुत बात है कि हम अमेरिकी सिस्टम की ही बदौलत उनकी सरकार के सबसे घृणित कारनामों के बारे में जान पाए हैं।
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार गाँधी परिवार अपने आपको देश का बहुत बड़ा हितैषी और देशभक्त बताता है। 1971 के युद्ध को कांग्रेस तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी की जीत और उपलब्धि बताती रही है। लेकिन इस युद्ध से जुड़े अनेक तथ्य जनता से छुपाए गए हैं, जिस तरह कश्मीर में अलगाववादी नेता अपने बच्चों को कश्मीर से बाहर रख, बेकसूर कश्मीरियों को बलि का बकरी बना रहे हैं। उसी तरह तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी ने अपने पुत्र राजीव को युद्ध से दूर रखा। ऐसे में जनता जानना चाहती है कि "आधार पर कांग्रेस राष्ट्रहित की बात करती है? जब युद्ध घोषित होने पर किसी भी कारण से छुट्टियों पर समस्त पायलट अपनी छुट्टियाँ रद्द कर, काम पर लौट आये थे, प्रधानमंत्री का पुत्र राजीव क्यों नहीं आया? क्यों इटली में बैठा रहा? क्या राजीव गाँधी भारत माता का लाल नहीं था या इटली की लड़की से शादी कर इटैलियन बन गया था?" 1971 युद्ध के दौरान पायलट राजीव गाँधी इटली में शादी का आनन्द ले रहे थे 1971 युद्ध के समय राजीव गाँधी इंडियन एयरलाइन्स में पायलट थे। जैसाकि होता है की, युद्ध के दौरान समस्त पायलटो की छुट्टियाँ तक रद्द कर दी जाती हैं। किया भी गया वैसा, लेकिन समस्त युद्ध के दौरान केवल एक पायलट था, जो युद्ध से बेखबर अपनी छुट्टिओं का आनन्द ले रहा था और वह था कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के पिताश्री राजीव गाँधी। काश, किसी अन्य पायलट ने ऐसा दुस्साहस किया होता, निश्चित रूप से कार्यवाही के अंतर्गत नौकरी से हाथ धोना पड़ता। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री का पुत्र होने के कारण उस समय तो क्या, आज भी किसी माँ मुँह नहीं खुलता। क्यों नहीं राजीव गाँधी पर कोई कार्यवाही? हालाँकि उस समय यह समाचार काफी समय तक चर्चा में भी रहा था। कहते हैं कि शायद ही कोई ऐसा समाचार-पत्र/पत्रिका ने इस सनसनीखेज समाचार से अछूता रहा हो। वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता के विस्तृत लेख में बताया कि युद्ध प्रारम्भ होते ही देश आपातकालीन घोषित कर दी गयी थी। आपातकालीन नियमों के अनुसार, समस्त पायलट की छुट्टियाँ रद्द कर दी गयीं थीं। क्योकि लड़ाई के दिनों में युद्ध सामग्री आदि सामानों को लेकर जाने में नागरिक विमानों की कब जरुरत पड़ जाए, कहना कठिन होता है। सभी पायलट अपने काम पर लगे हुए थे, लेकिन केवल एक पायलट राजीव गाँधी जो अपनी नवविवाहित पत्नी सोनिया गाँधी उर्फ़ एंटोनियो माइनो के साथ इटली में शादी का आनन्द लेने चले गए थे। वो सोनिया गाँधी जो भारतीयता पर उठे विवाद पर कहती है कि "मै आखिरी साँस तक भारतीय हूँ।" राजीव और सोनिया की शादी 1968 में हुई थी। और 1970 में राहुल का जन्म हुआ। यानि युद्ध के समय राहुल की आयु एक वर्ष के लगभग थी। 3 से 16 दिसम्बर 1971 तक लड़ाई यानि 13 दिन तक चला था। इस दौरान राजीव, सोनिया और राहुल इटली में रह रहे थे। लेकिन वापस आये जब पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी ने सरेंडर के कागजात पर हस्ताक्षर नहीं कर दिए, और औपचारिक रूप से युद्ध की समाप्ति की घोषणा नहीं हो गयी।
1977 में भी राजीव भारत भागे थे 1971 युद्ध के बाद 1977 में आपातकाल के हटने पर हुए हुए चुनावों में ,कांग्रेस के हारने पर जनता पार्टी के सत्ता में आने पर राजीव और सोनिया एक बार फिर भारत छोड़ गए थे। चुनाव परिणाम आते ही सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों को लेकर चाणक्यपुरी स्थित इटली के दूतावास चली गयी थी। उस दौर में प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उनके साथ बहुत सारे बड़े-बड़े बैग,और अटैचियाँ थी। बाद में संजय गाँधी और मेनका के बहुत समझाने बाद ही घर लौटने को तैयार हुई। इस घटना का जिक्र उस समय के समाचार-पत्रों में खूब हुआ था। यह अपने आप में ऐसी मिसाल है, जो दर्शाती है कि सोनिया की भारत के प्रति कितनी निष्ठां है। भारतीय बनने से बचती रही सोनिया अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (14 मई 2004 तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन14 मई 2004 को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ "असुविधाजनक" प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक 17 मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह "त्याग" और "बलिदान" (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं - कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था... और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल... सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में, सिर पर पल्ला ओढ़ कर "नामास्खार" आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन 1984 तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये)। राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन 1968 में, भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन 1950 में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन 1974 तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद...यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन 1971 में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके। सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे। जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन 1977 में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। "माईनो" मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। 1984 में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले "धर्मनिरपेक्ष नेताओं" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर)। इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी, दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा 10 के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो। (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के "तीसरे भाग" में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और ये वो रहस्य हैं, जिन पर वर्षों तक पर्दा डाले रखा। अब जब इन रहस्यों से पर्दा हटना शुरू हो गया है, लोगों ने गाँधी परिवार से प्रश्न करने शुरू कर दिए हैं। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये! इतना ही नहीं, सोनिया ने अपनी शैक्षिक योग्यता से भी जनता और सरकार को भ्रमित कर रखा था। जिस रहस्य से एक सार्वजानिक कार्यक्रम में डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने पर्दा हटाया। उन्होंने आरोप लगाया कि "सोनिया गाँधी प्राइमरी है", इस कार्यक्रम की विस्तृत रपट एक पाक्षिक को सम्पादित करते प्रकाशित किया था।
भारत आज 47वां विजय दिवस मना रहा है। पाकिस्तान के खिलाफ 1971 का युद्ध हमने आज ही के दिन जीता था। महज 14 दिनों में जीत लिए गए इस युद्ध ने भूगोल और इतिहास को नए सिरे से गढ़ डाला। 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को चित कर देने के बाद भारतीय योद्धाओं ने अबके उसकी टेढ़ी पूंछ को काफी हद तक सीधा कर दिखाया था। उस युद्ध में बतौर सेकेंड लेफ्टिनेंट भाग लेने वाले रिटायर्ड मेजर जनरल गगन दीप बख्शी बताते हैं, 'हमने मात्र 14 दिन में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए ही मजबूर कर दिया था। 1965 के भारत-पाक युद्ध में मेरे बड़े भाई कैप्टन एसआर बख्शी शहीद हुए थे। भाई की शहादत के बाद मैंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) की परीक्षा पास की और सेना में बतौर कमीशन प्राप्त अधिकारी भर्ती हुआ।' '1971 के दिसंबर माह में मेरे बैच को पास आउट होना था, लेकिन देश पर खतरा देख बैच को नवंबर में ही पास आउट कर दिया गया। पासिंग आउट परेड के तुरंत बाद ही मुझे युद्ध के लिए भेज दिया गया। यह मेरे लिए विशेष अनुभूति वाला क्षण था। कई नदियां और नाले पार करके हमने सेना के साथ काफी दूर तक पैदल ही सफर तय किया।' 'मेरे साथ मेरे कई बैचमेट भी थे। हम पूर्वी सीमा तक पहुंचे। उधर से पाकिस्तानी टैंक गोले बरसा रहे थे। इधर भारतीय सेना मुस्तैद थी। मेरे बैचमेट अरुण खेत्रपाल ने पाकिस्तान के तीन टैंकों को ध्वस्त कर दिया और वीरगति को प्राप्त हुए। हमारा हर सैनिक इसी जज्बे से लड़ा।' '1971 का युद्ध सैन्य इतिहास की सबसे शानदार विजय थी। पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी के अहंकार को हमने नेस्तनाबूद कर दिया था। जनरल नियाजी कहता था की एक-एक पाकिस्तानी सैनिक एक-एक हजार भारतीय सैनिकों के बराबर है।'