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75 साल में सुरक्षा परिषद बैठक की अध्यक्षता करने वाले नरेंद्र मोदी बनेंगे पहले भारतीय प्रधानमंत्री

अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक और इतिहास रचने जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनि​धि सैयद अकबरुद्दीन ने 1 अगस्त 2021 को बताया कि देश के आजाद होने के बाद पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक की अध्यक्षता करने वाले हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता संभाल ली है।

सैयद अकबरुद्दीन के मुताबिक, 9 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता पीएम मोदी कर सकते हैं। 75 साल में ये पहला मौका होगा, जब एक भारतीय प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र के 15 सदस्यीय निकाय के एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। अकबरुद्दीन ने साल 2019 की पीएम मोदी की संयुक्त राष्ट्र की अंतिम तस्वीर साझा करते हुए ट्वीट किया, ”हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता करने में दिलचस्पी दिखाई है। इससे ये साबित होता है कि हमारे लीडर अब फ्रंट से लीड करना चाहते हैं।”

उन्होंने बताया कि सुरक्षा परिषद में भारत का ये 8वाँ कार्यकाल है। नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे, जो सुरक्षा परिषद की किसी मीटिंग की अध्यक्षता करेंगे। उन्होंने कहा कि भले ही ये वर्चुअल मीटिंग होगी, लेकिन हमारे लिए ऐतिहासिक है।

भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे टीएम तिरुमूर्ति ने बताया कि इस दौरान भारत तीन हाई लेवल मीटिंग करने जा रही है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, शांति स्थापना और आतंकवाद का मुकाबला जैसे गंभीर मामलों पर चर्चा की जाएगी।

सुरक्षा परिषद का हर सदस्य देश, एक महीने के लिए परिषद की अध्यक्षता संभालता है। अगस्त 2021 में सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भारत के पास रहेगी। सुरक्षा परिषद के 15 सदस्य हैं, जिनमें से 5 चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका स्थायी हैं। वहीं 10 अस्थायी सदस्य हैं।

भारत भी इसके अस्थायी देशों में से एक है। अस्थायी सदस्य के तौर पर भारत को दो साल का कार्यकाल मिला है, जो 1 जनवरी 2021 से शुरू हो चुका है। वहीं, भारत ने सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष की कमान संभाल ली है, जो एक महीने (अगस्त 2021) तक रहेगी। बताया जाता है कि हर महीने अंग्रेजी के लैटर के आधार पर अध्यक्षता बदलती रहती है। अब भारत को दिसंबर 2022 में फिर से अध्यक्षता करने का मौका मिलेगा।

रिचर्ड निक्सन ने इंदिरा गाँधी को "बुढ्ढी कुतिया" क्यों कहा था?

जब अमेरिका के राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी को बुड्ढी कुतिया कहा Indira Gandhi  and Nixon By India IQ - YouTubeलैटिन भाषा में एक कहावत है- वर्बा वोलांट, स्क्रिप्टा मानेंट. माने- कहे हुए शब्द ख़त्म हो जाते हैं, मगर लिखे हुए शब्द हमेशा के लिए रह जाते है। ये कहावत करीब दो हज़ार साल पुरानी है। तब आवाज़ रेकॉर्ड करने की टेक्नॉलजी नहीं थी। इसीलिए इंसान के मरने के बाद भी उसकी रिकॉर्डिंग ज़िंदा रह जाती है। आज आपको ऐसी ही कुछ रिकॉर्डिंग्स के बारे में बताएंगे जब एक अमेरिकी राष्ट्रपति के दिमाग और ज़ुबान से भारत के लिए निकली गंदगी।
इस अमेरिकी राष्ट्रपति को पाकिस्तान की तानाशाही हुकूमत से हमदर्दी थी।पाकिस्तान के हाथों हो रहा भीषण नरसंहार उसके लिए कोई मुद्दा नहीं था। उसके लिए मुद्दा था भारतीय महिलाओं का रूप-रंग। उसे भारतीय महिलाएं दुनिया में सबसे ज़्यादा कुरूप लगती थीं। वो कहता था कि भारतीय महिलाओं को देखकर वो ‘टर्न ऑफ’ हो जाता है। हैरान होता है कि भारतीय महिलाएं बच्चे कैसे पैदा कर लेती हैं। उसका कहना था कि अफ्रीका के लोगों में फिर भी जानवरों वाला चार्म होता है। मगर हिंदुस्तानी, वो तो बिल्कुल बेकार और बर्बाद होते हैं।

The Sunday Tribune - Spectrum
ये वही नस्लीय सोच वाला अमेरिकी राष्ट्रपति है, जिसने हमारी प्रधानमंत्री को ‘चुड़ैल’ कहा था। इस पूर्व राष्ट्रपति की भारत से जुड़ी अपमानजनक टिप्पणियां पहले भी कई बार उजागर हो चुकी हैं। जिन पर अमेरिका को काफी शर्मिंदा होना पड़ा था। अब एक बार फिर अमेरिका को अपने इस पूर्व राष्ट्रपति की भारत पर की गई नस्लीय टिप्पणियों से शर्मसार होना पड़ रहा है। 
ये किस राष्ट्रपति की बात कर रहे हैं हम?
बात 49 साल पुरानी है। तारीख़ - 25 मार्च, 1971।स्थान यूनिवर्सिटी ऑफ ढाका, जहां दो हॉस्टल हैं- इक़बाल हॉल और जगन्नाथ हॉल। इकबाल हॉल में मुस्लिम छात्र रहते थे। जगन्नाथ हॉल में हिन्दू छात्र। रात के साढ़े 11 बजे चार M-47 टैंक इन दोनों हॉस्टल्स के सामने रुके। पाकिस्तानी फ़ौज की एक टुकड़ी ये टैंक लेकर वहां पहुंची थी। बिना किसी चेतावनी के इन चारों टैंकों ने छात्रावासों पर बम दागने शुरू किए। करीब पांच मिनट बाद पाकिस्तानी सैनिक हॉस्टल में घुसे और अंधाधुंध गोलियां चलाईं और ज़िंदा बचे छात्रों को हॉस्टल के बाहर दीवार की सीध में खड़ा करके तोप से भून दिया गया। 15-20 मिनट के भीतर करीब 200 छात्रों की हत्या कर दी गई।
ये रात पूर्वी पाकिस्तान, वर्तमान बांग्लादेश, के इतिहास में काली रात कहलाती है। इसी रात के बाद पाकिस्तान के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के बीच गृह युद्ध शुरू हुआ। नौ महीने तक चले इस सिविल वॉर का अंत किया भारत ने। दिसंबर 1971 में भारत को इस युद्ध में शामिल होना पड़ा। हमने पाकिस्तानी सेना को हराया और इसके बाद जाकर गठन हुआ बांग्लादेश का।
President Yahya Khan interview on east Pakistan - YouTube
याहिया खान 
पूर्वी पाकिस्तान नरसंहार का दोषी कौन?
बांग्लादेश के गठन की कहानी एक भीषण नरसंहार पर लिखी गई है। इस नरसंहार में पूर्वी पाकिस्तान नरसंहार, जिसमें करीब पांच लाख लोग मारे गए। कई अनुमान मृतकों की संख्या 30 लाख तक बताते हैं। मगर इस जेनोसाइड के लिए अकेले पाकिस्तान दोषी नहीं था। इसमें पाकिस्तान के हाथ मज़बूत करने वाले, उसे नरसंहार के औज़ार देने वाले, उसके लिए इंटरनैशनल सपोर्ट जुटाने वाले उसके दो सबसे बड़े मददगार थे- निक्सन और किसिंगर।
अमेरिका के 37वें राष्ट्रपति थे रिचर्ड निक्सन। 1969 से 1974 तक वह इस पद पर रहे। निक्सन के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे हेनरी किसिंगर। इन दोनों के कार्यकाल का सबसे बड़ा धब्बा है 1971 का पूर्वी पाकिस्तान नरसंहार। इन दोनों को भारत से नफ़रत थी। वो भारत और सोवियत की नज़दीकी से बिफ़रे हुए थे। उन्हें ये बर्दाश्त नहीं था कि भारत सरकार अमेरिका के खिलाफ़ जाकर पूर्वी पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे नरसंहार पर स्टैंड ले। अपनी इस नफ़रत के कारण वो न केवल पाकिस्तान के तानाशाह याह्या ख़ान की मदद करते रहे, बल्कि पाकिस्तानी सेना जब आज के बांग्लादेश में नरसंहार कर रही थी, तब ये ही दोनों उस जेनोसाइड की कामयाबी पर खुश भी थे।
Scavengers, Sexless, Suck Up Experts, Pathetic': NYT contributor scoops  deeply misogynistic Kissinger-Nixon remarks on Indians • Canindia News
निक्सन और किसिंगर की पूर्वी पाकिस्तान पॉलिसी क्यूरिस केस है
दरअसल, निक्सन प्रशासन का एक बड़ा हिस्सा अपनी सरकार की पूर्वी पाकिस्तान पॉलिसी से असहमत था। उन दिनों भारत में अमेरिका के राजदूत थे किनिथ कीटिंग। वो निक्सन और किसिंगर से बार-बार कह रहे थे कि पाकिस्तान अपने पूर्वी हिस्से में नरसंहार कर रहा है। इसीलिए अमेरिका को उसकी मदद रोक देनी चाहिए। पता है, कीटिंग के इस स्टैंड पर निक्सन ने उनके पीठ पीछे किसिंगर से क्या कहा था? निक्सन ने कहा था-
70 साल के कीटिंग को बस में कर सके, क्या ये कला हिन्दुस्तानियों के पास है?
इसके जवाब में किसिंगर ने कहा था-
मिस्टर प्रेज़िडेंट, हिन्दुस्तान के लोग चापलूसी में महारथी होते हैं। चाटुकारिता में उनका कोई जोड़ नहीं। ऐसे ही ख़ुशामद कर-करके तो वो 600 सालों से सर्वाइव कर रहे हैं। बड़े ओहदों पर बैठे लोगों की चापलूसी में बहुत पारंगत होते हैं भारतीय।
निक्सन और किसिंगर ने इतने बरस पहले वाइट हाउस में क्या बातचीत की?
अमेरिका में डिक्लासिफ़िकेशन की एक रवायत है। यहां एक तय समय के बाद पुरानी सरकारों से जुड़े कई दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जाते हैं। कई बार सूचना के अधिकार के तहत आए आवेदनों पर भी पुराने रेकॉर्ड्स सार्वजनिक होते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत निक्सन अडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े कई रेकॉर्ड्स भी पब्लिक हुए। इनमें दस्तावेज़ भी हैं और ऑडियो रिकॉर्डिंग्स भी। ये ही रिकॉर्डिंग्स हमें निक्सन और किसिंगर द्वारा भारत को लेकर कही गई अपमानजनक टिप्पणियों का ब्योरा देती हैं।
निक्सन से जुड़े रेकॉर्ड कई चरणों में सार्वजनिक हो रहे हैं। मई 2020 में भी इन दस्तावेज़ों की एक खेप आई।वाइट हाउस ने अपनी वेबसाइट पर निक्सन की कई रिकॉर्डिंग्स को पब्लिक किया। मगर काफी दिनों तक इस पर किसी की नज़र नहीं गई। फिर 3 सितंबर को गैरी बेस ने न्यू यॉर्क टाइम्स में इस पर एक लेख लिखा। गैरी बेस इंटरनैशनल अफेयर्स में प्रोफेसर हैं। निक्सन, किसिंगर और 1971 के युद्ध पर उन्होंने काफी काम किया है। इस विषय पर 2013 में ‘दी ब्लड टेलिग्राम’ नाम की उनकी क़िताब भी आई थी।
निक्सन की कुछ ओछी टिप्पणियां
NYT में छपे गैरी बेस के लेख के बाद से ही निक्सन की इन नई रिकॉर्डिंग्स पर ख़बरें होने लगीं। इनमें भारत और भारतीय महिलाओं पर की उनकी कई ओछी टिप्पणियां भी शामिल हैं। ये टिप्पणियां 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के भीतर हो रहे नरसंहार के दौरान की गयीं थीं। देखिए उन ओछी टिप्पणियों को:-
1. हिन्दुस्तानी औरतें दुनिया में सबसे बदसूरत होती हैं। इस बात में कोई शक़ नहीं।
2. ये हिन्दुस्तानी लोग सबसे ज़्यादा सेक्सलेस इंसान हैं। लोग ब्लैक अफ्रीकन्स को लेकर बोलते हैं। मैं कहता हूं कि उनमें तो फिर भी जानवरों वाला थोड़ा सा चार्म होता है, मगर ईश्वर, वो भारतीय, छी। वो तो बिल्कुल बेकार होते हैं।
3. हिन्दुस्तानियों को देखकर मेरा मज़ा किरकिरा हो जाता है। मैं टर्न ऑफ़ हो जाता हूं। हेनरी, बताओ तो ज़रा। इनको देखकर कोई टर्न ऑन कैसे होता होगा?
4. हिन्दुस्तानियों को देखकर घृणा होती है। उन पर सख़्त होना आसान है।
5. मुझे नहीं पता कि हिन्दुस्तानी बच्चे कैसे पैदा करते हैं?
निक्सन के बयान पर पहले भी कई बार हंगामा हो चुका है
इससे पहले साल 2000 और 2005 में भी अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने निक्सन से जुड़े कुछ दस्तावेज़ पब्लिक किए थे। इनमें सामने आया कि निक्सन चाहते थे भारत में भुखमरी और अकाल आ जाए। इन डॉक्यूमेंट्स में 5 नवंबर, 1971 को निक्सन और किसिंगर के बीच हुई एक बातचीत पर ख़ूब हंगामा हुआ था। उस समय भारत में कांग्रेस की सरकार थी। पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी ने निक्सन और किसिंगर की इंदिरा पर की गई फब्तियों की काफी निंदा की थी। ये मामला इंटरनैशनल मीडिया में भी काफी रिपोर्ट हुआ था। इससे शर्मिंदा हेनरी किसिंगर ने तब इंदिरा पर की गई अपमानजनक टिप्पणियों के लिए माफ़ी भी मांगी थी। किसिंगर ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि वो कोल्ड वॉर के दौर की बात है। तब तनाव और गुस्से में ग़लत बातें निकल गईं।
निक्सन और किसिंगर की इंदिरा पर कही जो बात सबसे ज़्यादा रिपोर्ट हुई, वो तब की है जब नवंबर 1971 में इन दोनों ने भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। मीटिंग के बाद इंदिरा के बारे में गॉसिप करते हुए निक्सन ने किसिंगर से कहा था-
देखिए इंदिरा गांधी और अमेरिका के राष्ट्रपति के बीच क्या बात हुई थी. -  YouTubeहमने तो उस बूढ़ी चुड़ैल के ऊपर थूक ही दिया।
इसके जवाब में किसिंगर बोले- भारत के लोग वैसे भी बास्टर्ड होते हैं।
निक्सन और इंदिरा की ये मीटिंग क्यों हुई थी?
ये मीटिंग नवंबर 1971 में उस वक़्त हुई थी, जब इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर गई थीं। उनका मकसद था अमेरिका को ये बताना कि पूर्वी पाकिस्तान में कितना बड़ा नरसंहार हो रहा है। इस नरसंहार के कारण भारत में भी बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया। भारत के उत्तर पूर्वी इलाकों में पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आ रहे शरणार्थियों की बाढ़ आ गई थी। एक करोड़ से ज़्यादा संख्या में आए ये शरणार्थी भारत के लिए मानवीय आपदा थे। भारत बार-बार इस संकट की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहा था। मगर सोवियत के सिवाय किसी ने भारत की अपील नहीं सुनी। ऐसे में इंदिरा गांधी नवंबर 1971 में निक्सन से आमने-सामने की बातचीत के लिए अमेरिका पहुंचीं। इंदिरा ने कहा कि पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे घटनाक्रम के कारण भारत में जो संकट पैदा हो हुआ है, उसे देखते हुए अब और चुप बैठना नई दिल्ली के लिए मुमकिन नहीं है।
मगर इंदिरा की अपील पर निक्सन ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई
उल्टा पीठ पीछे उन्हें ‘बिच’ और ‘चुड़ैल’ कहा। भारत इसके बाद भी संयम दिखाता रहा। वो तो जब 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर हवाई बमबारी शुरू की, तब भारत आधिकारिक तौर पर इस युद्ध में शामिल हुआ। इस हमले की ख़बर मिलते ही निक्सन ने किसिंगर को फोन मिलाया। इस टेलिफ़ोनिक बातचीत में निक्सन ने कहा-
हमने उस बिच (प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संदर्भ में) को चेतावनी दी थी। उनसे कहो कि पश्चिमी पाकिस्तान के हमले पर भारत द्वारा शिकायत करना ऐसा ही है, जैसे रूस ये दावा करे कि फिनलैंड ने उस पर हमला कर दिया।
भारत और पाकिस्तान के बीच 3 दिसंबर, 1971 को शुरू हुआ ये युद्ध 14 दिन तक चला। इस दौरान शुरुआती एक हफ़्ते में ही पाकिस्तान की हालत ख़राब होने लगी। किसी भी क़ीमत पर इस्लामाबाद की मदद को आमादा निक्सन और किसिंगर, पाकिस्तान के लिए इंटरनैशनल सपोर्ट जुटाते रहे। दोनों ने चीन से भी भारत पर दबाव बनाने को कहा। मगर सोवियत के प्रेशर में चीन इस मामले से पीछे रहा। बाद के सालों में जारी इस बातचीत के ब्योरे के मुताबिक, निक्सन ने तब किसिंगर से कहा था-
वो बदनाम अमेरिकी राष्ट्रपति, जिसने भारतीय प्रधानमंत्री को गाली दी थी -  Richard Nixon called Indian prime minister Indira Gandhi a bitch in 1971ये हिंदुस्तानी तो कायर होते हैं न?
इसके जवाब में किसिंगर बोले थे-
हां, कायर तो होते हैं। मगर उनकी पीठ पर रूस है। रूस ने ईरान और तुर्की समेत कई देशों को धमकी दी है। कहा है कि अगर वो पाकिस्तान की मदद करते हैं, तो बहुत बुरा होगा। रूसियों ने सारा खेल ख़राब कर दिया है।
क्या सच में सोवियत ने ही पाकिस्तान को जिताने का अमेरिकी खेल बिगाड़ दिया था?
जवाब है, हां। अमेरिका की तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान युद्ध में पिछड़ रहा था। ऐसे में निक्सन प्रशासन ने अमेरिकी नौसेना की 7वीं फ्लीट को बंगाल की खाड़ी के लिए रवाना किया। ये उस समय दुनिया का सबसे बड़ा वॉरशिप था। साथ ही, ब्रिटिश नौसेना ने भी अपने एयरक्राफ्ट ईगल को भारतीय समुद्री सीमा के नज़दीक रवाना कर दिया। ये दोनों फ्लीट्स न्यूक्लियर पावर्ड थे।
ख़ुद को सबसे महान बताने वाले दो देश मिलकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को न्यूक्लियर हमले की धमकी दे रहे थे। वो भी किसके लिए? लाखों लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तान को जिताने के लिए।अमेरिका और ब्रिटेन की प्लानिंग भारत पर दोतरफ़ा हमला करने की थी। ऐसे में भारत की मदद के लिए फिर आगे आया सोवियत। उसने अपनी एक न्यूक्लियर नौसैनिक फ्लीट भारत की मदद के लिए रवाना की। सोवियत ने साफ कर दिया कि अगर ये दोनों भारत पर हमला करेंगे, तो सोवियत उसका जवाब देगा।
भारत का फाइनेस्ट मिलिटरी मोमेंट
सोवियत से मिली इस मदद के कारण 16 दिसंबर, 1971 को भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया। इतिहास इस जीत को भारत का फाइनेस्ट मिलिटरी मोमेंट मानता है। यही इतिहास निक्सन और किसिंगर की पूर्वी पाकिस्तान पॉलिसी को अमेरिका का नैतिक और सामरिक पतन भी मानता है। इतिहासकार कहते हैं कि निक्सन और किसिंगर ने अपनी कुंठा को अपनी विदेश नीति पर हावी होने दिया। भारत के प्रति अपनी नस्लीय नफ़रत के कारण उन्होंने एक नरसंहार को समर्थन दिया। ये चैप्टर न केवल निक्सन प्रशासन, बल्कि अमेरिकी इतिहास के सबसे शर्मनाक एपिसोड्स में गिनी जाती है।
निक्सन से जुड़े कई दस्तावेज़, कई रिकॉर्डिंग्स अभी पब्लिक होनी बाकी है। कई पब्लिक हुई रिकॉर्डिंग्स ऐसी हैं, जहां कई हिस्सों को बीप करके जारी किया गया है। अमेरिका के कई लोग इन रिकॉर्डिंग्स को समूचा जारी करने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए वो सूचना के अधिकार जैसे संवैधानिक राइट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।कितनी अद्भुत बात है कि हम अमेरिकी सिस्टम की ही बदौलत उनकी सरकार के सबसे घृणित कारनामों के बारे में जान पाए हैं।

शपथ समारोह में पाकिस्तान से बनाई दूरी

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नरेन्द्र मोदी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री के पद की शपथ 30 मई को लेने जा रहे हैं। देश में ऐसा पहली बार होगा जब कोई  गैरकांग्रेसी सत्ता में रहते हुए दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेगा। भारतीय लोकतंत्र में यह एक मील का पत्थर बनेगा।
भारत के 130 करोड़ जनता के रसायन बल ने भाजपा को 303 सीटें और एनडीए गठबंधन को 353 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया। यह न्यू इंडिया की उस सोच को दर्शाता है जिसमें कुछ कर गुजरने का जज्बा, विश्वास और इंडिया फर्स्ट के विचार छाए रहते हैं। 
भाजपा ने अकेले 303 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इससे पहले किसी भी गैरकांग्रेसी राजनीतिक दल इतनी सीटें नहीं मिली हैं। इस तरह से भाजपा ने 37.4 प्रतिशत मतों पर भी कब्जा कर लिया। 2014 की तुलना में 6.4 प्रतिशत मतों और 21 सीटों का इजाफा हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह इस बार भी काफी भव्य होगा। 30 मई को जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, पीएम मोदी को शपथ दिलाएंगे तो बिम्सटेक समेत आठ देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसके गवाह बनेंगे। पिछली बार प्रधानमंत्री मोदी ने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था, वहीं इस बार बिम्सटेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाया है।
बिम्सटेक के अलावा किरगिस्तान और मॉरीशस को भी आमंत्रण
BIMSTEC यानि ‘बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फ़ॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन’ में भारत के अलावा भूटान, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश हैं।

बताया गया है कि मोदी सरकार की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति के तहत बिम्सटेक को आमंत्रण भेजा गया है। इसके अलावा किरगिस्तान के राष्ट्रपति सोरोनबाय जेनेबकोव और मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्राविन्द जगन्नाथ को भी आमंत्रित किया गया है।’
प्राविन्द जगन्नाथ इस वर्ष के प्रवासी भारतीय दिवस में मुख्य अतिथि थे। किरगिस्तान के राष्ट्रपति को आमंत्रण इसलिए दिया गया है क्योंकि वह अभी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के अध्यक्ष हैं। एससीओ के शीर्ष नेताओं की बैठक 14-15 जून, 2019 को होनी है और उसमें प्रधानमंत्री मोदी भाग लेने जाने वाले हैं।
दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान से बनाई दूरी
2014 में प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सभी सदस्य देशों को बुलाया गया था। पाकिस्तान भी सार्क का सदस्य है। तब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसमें हिस्सा लिया था।

लेकिन इस बार सार्क के बजाय बिम्सटेक को तरजीह दी गई है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए ही सार्क देशों को नहीं बुलाया गया है।
इस बार आमंत्रण से स्पष्ट संकेत दिया गया है कि सरकार दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान से दूरी बनाए रखेगी। लेकिन, बाकी पड़ोसी देशों के साथ संबंध बढ़ाए जाएंगे।
पाकिस्तान से दूरी बनाए रखने का मुख्य कारण है, आतंकवाद पर नकेल डालने में असमर्थ रहे पाकिस्तान के कारण भारत माता कई बार लहूलुहान हुई, और मोदी सरकार से पूर्व रही यूपीए सरकार भी इन लहूलुहान के खेल में बराबर की हिस्सेदार रही। यूपीए सरकार ने इस्लामिक आतंकवादियों और पाकिस्तान को संरक्षण देने की खातिर बेकसूर हिन्दू साधु, संत और साध्वियों को जेलों में डाल "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर विश्व में हिन्दू समाज को कलंकित किया। लेकिन प्रधानमन्त्री मोदी ने हिन्दुओं पर लगे इस कलंक को पाकिस्तान और आतंकवादियों पर प्रहार कर उनके खून से धोकर विश्व में हिन्दू समाज को खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करवाने का जनता ने प्रचंड बहुमत से पुनः भारत का प्रधानमन्त्री बना, तुष्टिकरण करने वालों को मुँह तोड़ जवाब दिया है। 
पिछली मोदी सरकार ने देश को क्या दिया या क्या नहीं दिया, लेकिन हिन्दुओं को आत्मसम्मान से फलीफुत किया। जबकि समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्ष कभी जनेऊधारी हिन्दू, कभी दत्तात्रेय गोत्र बताकर, मन्दिर-मन्दिर माथा टेकते नज़र आये। अपने आपको हिन्दू सिद्ध करने का पाखंड करने वाले कभी अपने दादा फिरोज जहांगीर गाँधी की कब्र पर नहीं गए।   
भाजपा का रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन
इस लोकसभा चुनाव में भाजपा को 224 सीटों पर कुल डाले गये मतों का 50 प्रतिशत से भी अधिक मत मिले जबकि 2014 में ऐसी सीटों की संख्या 136 थी।
15 राज्य व केन्द्र शासित राज्यों में भाजपा को गठबंधन के साथी दलों के साथ 50 प्रतिशत से अधिक मत मिले।
इस बार भाजपा को 15 सीटों पर 5 लाख से अधिक मतों से जीत मिली है जबकि 2014 में ऐसी सीटों की कुल संख्या 6 थी।
10 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में भाजपा ने पूरी की पूरी सीटें जीतकर Clean Sweep किया, लेकिन बिहार और मध्यप्रदेश ऐसे दो राज्य रहे जहां एक दो सीटों से भाजपा का Clean Sweep रुक गया।
Hindi Heartland में भाजपा को 141 सीटों पर जीत मिली। इस तरह से भाजपा का इस क्षेत्र में Strike Rate 71% रहा। यहां की सभी सीटों पर भाजपा को कुल डाले गये मतों का 50 प्रतिशत से भी अधिक मत मिला।
सात चरणों के चुनाव में भाजपा के लिए Undercurrent था, इसका पता हर चरण में भाजपा के लिए बढ़ते मत प्रतिशत से लगता है। पहले चरण में भाजपा का मत प्रतिशत जहां 1.9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई, वहीं  छठवें चरण तक यह बढ़ते हुए 12.8 प्रतिशत तक पहुंच गया। सातवें चरण के मतों में बढ़ोत्तरी 7.6 प्रतिशत 7.6 रही।
20 राज्यों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली है, उसका खाता ही नहीं खुल सका।
यूपी में लोकसभा की 80 सीटों में से 73 पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा लेकिन सिर्फ 2 सीटों पर ही इसके नेता ही अपनी जमानत बचा पाए हैं। बाकी के सभी दिग्गज जो पहले केंद्र में भी मंत्री रहे, अपनी जमानत नहीं बचा पाए।
भाजपा को शहरों और गांवों में भी जमकर समर्थन मिला
ग्रामीण भारत में भाजपा को उज्‍ज्‍वला और हाउसिंग फॉर ऑल योजना का जबरदस्त फायदा मिला। भाजपा ने ग्रामीण भारत की कुल 342 सीटों में से 197 सीटों पर विजय हासिल की हैं। यहां कि सिर्फ 30 सीटें ही कांग्रेस के खाते में आ सकीं।
गांवों में भाजपा को शहरों से अधिक मत प्रतिशत मिले। गांवों  में भाजपा को 39.5% मत मिले तो शहरों में 33.9 % मत मिले।
भाजपा को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जबरदस्त लाभ मिला, भाजपा को शहरी क्षेत्रों(Urban) की 90 सीटों में 39 सीटों पर जीत मिली, जहां कुल 33.9 प्रतिशत मत मिले।  2014 में  ऐसी 40 सीटें थीं जिन पर 28.8 प्रतिशत मत मिले थे।
इसी तरह अर्द्धशहरी क्षेत्रों (Rurban) की 251 सीटों पर भाजपा ने 141 सीटों पर जीत हासिल करते हुए 37.1 प्रतिशत मत प्राप्त किए। 2014 में इन सीटों में से 127 सीटों पर 30.6 प्रतिशत मत के साथ जीत मिली थी।
ग्रामीण क्षेत्रों (Rural) की 202 सीटों में से भाजपा ने 123 सीटों पर जीत के साथ 39.5 प्रतिशत मत हासिल किए जबकि 2014 में  इन्हीं सीटों में से 115 सीटों पर 32.5 प्रतिशत मत मिले थे।
गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले अमेठी में भाजपा की स्मृति इरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 55,120 मतों से हरा दिया। 39 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है जब गांधी परिवार को अपने ही गढ़ में हार का मुंंह देखना पड़ा है।
भाजपा दक्षिण भारत की सबसे बड़ी पार्टी
भाजपा ने दक्षिण के पांच राज्यों -कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और केरल की 130 सीटों में से 30 सीटों पर कब्जा किया है जबकि कांग्रेस को 26 सीटों पर जीत मिली है। इस तरह से भाजपा दक्षिण भारत में भी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
भाजपा ने बंगाल में भी परचम लहराया
भाजपा को बंगाल में भी भारी सफलता मिली है। 42 सीटों में से 18 सीटों पर भाजपा को जीत मिली और इसका कुल 40.2 प्रतिशत मत मिले। 2014 में भाजपा को राज्य में 2 सींटे मिली थी। राज्य में वामपंथी दल को मिलने वाला मत 7.5 प्रतिशत पर ही सिमट कर रह गया, इस दल को कोई भी सीट नहीं मिल सकी।
इस बार की सतरहवीं लोक सभा में वामपंथी दलों के सदस्यों की सबसे कम संख्या होगी। कभी वामपंथ का गढ़ रहे बंगाल में इन दलों को कोई सीट नहीं मिली, केरल में भी मात्र एक सीट ही मिली है। यह हाल उस विचारधारा के दलों का है जिसका देश के पहले लोकसभा में , अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के रुप में सबसे बड़ा विपक्षी दल हुआ करता था।
भाजपा का उत्तर भारत के राज्यों में कमाल का प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और आरएलडी की जातिवादी महागठबंधन को भाजपा ने फेल कर दिया। भाजपा ने राज्य में 49.5 प्रतिशत मतों पर कब्जा करते हुए 62 सीटों पर जीत हासिल कर ली, जबकि सपा को 18.3 प्रतिशत मत के साथ 5 सीटें और 19.3 प्रतिशत के साथ बसपा को 10 सीटें मिली। कांग्रेस को मात्र 6.8 प्रतिशत मत के साथ रायबरेली की सीट ही मिल सकी। इस तरह बसपा और सपा के गठबंधन को मात्र 37.6 प्रतिशत मत मिले जो भाजपा से 12 प्रतिशत कम रहे।
अवलोकन करें:-
साध्वी को जबरदस्ती आतंकवाद का आरोप स्वीकार करवाने के लिए जिस तरह उन्हें और अन्य बेकसूरों को प्रताड़ित किया गया था, काश ऐसी प्रताड़ना किसी मुस्लिम के साथ हुई होती, #metoo, #intolerance, #not in my name, #mob lynching, #award vapsi आदि आदि जितने भी गैंग हैं, सबके सब सडकों पर आकर हेमंत करकरे के विरुद्ध प्रदर्शन कर उनको ऐसा निर्दयी निर्देश करने वालो को फांसी की माँग कर रहे होते। आधी रात को अदालतें खुलवा दी जाती। परन्तु, अफ़सोस, यह प्रताड़ना किसी मुस्लिम के साथ नहीं बल्कि एक हिन्दू के साथ हुई। आतंकवादियों को खूब बिरयानी खिलाई जाती थी, और बेकसूरों को बेल्टों से पिटाई और भूखा रखा जाता था?
काश! आज हेमंत जीवित होते, बताते प्रताड़ित करवाने वालों के नाम 

हिन्दू धर्म तो मृतात्माओं का सम्मान करने को कहता है। रावण की मृत्यु के बाद भगवान श्री राम ने उन्हें बाकायदा प्रणाम किया था और लक्ष्मण समेत दूसरों को भी उन्हें प्रणाम करने को कहा था, क्योंकि हिन्दू धर्म मृतकों का इसी तरह सम्मान करना सिखाता है। उसके बावजूद एक साध्वी एक मृतक को कलंकित कर रही है, क्यों? बल्कि चुनाव उपरान्त साध्वी प्रज्ञा को हेमंत करकरे की फाइल खुलवाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को मजबूर करना चाहिए। करकरे एक अफसर थे और उन्हें आदेशों को पालन करना था, जिस कारण वह बलि का बकरा बन गए और उनको आदेश देने वाले मालपुए खा रहे हैं। काश! आज हेमंत करकरे जीवित होते। राजनीति में भूचाल नहीं बवंडर आ गया होता, जब "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर बेकसूरों को प्रताड़ित करवाने वालों के नाम बोलते। वोट बैंक की राजनीति में देश की संस्कृति से खिलवाड़ किया गया और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी छूट गए।



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भाजपा ने हिमाचल प्रदेश में इतिहास बना दिया। हिमाचल प्रदेश के चुनावी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी ने लगातार दो लोकसभा चुनाव में Clean Sweep किया है। 2014 में भाजपा ने 53.3 प्रतिशत मतों से चारों सीटों पर कब्जा किया था तो इस बार के चुनाव में भी 69 प्रतिशत मतों से चारों सीटों पर कब्जा किया।