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गुजरात : ‘आंगनवाड़ी को मदरसा न बनाया जाए’: कहीं बच्चों से पढ़वाया नमाज़ तो कहीं लगवाए ‘या हुसैन’ के नारे

                                                                                                    प्रतीकात्मक चित्र साभार: Bing AI
जामनगर के बाद अब वडोदरा के करनाली आंगनवाड़ी में बच्चों को नमाज पढ़ाने पर विवाद खड़ा हो गया है। खबर सामने आई है कि हिंदू बच्चे सिर पर रुमाल बाँधकर ईद मना रहे हैं। पूरी घटना पर स्थानीय हिंदू संगठनों ने विरोध जताया है। इतना ही नहीं, बल्कि वडोदरा के विधायक शैलेश मेहता ने भी इस घटना पर विरोध जताया है। विधायक ने घटना की जानकारी राज्य के शिक्षा मंत्री को दी है। इसके अलावा उन्होंने कहा है कि आंगनवाड़ी केंद्रों को मदरसा न बनने दिया जाए। उन्होंने पूरे मामले में कार्रवाई की माँग की है।

जानकारी के मुताबिक, वडोदरा के दाभोई स्थित करनाली आंगनवाड़ी में बच्चों को नमाज अदा की गई है। पाठ्यक्रम में ईद पर कोई पाठ न होने के बावजूद हिंदू बच्चों को जश्न मनाने का यह तरीका सिखाया जाने पर हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया है। आरोप है कि आंगनबाडी संचालिका ने बच्चों के सिर पर रूमाल बाँधकर ईद मनाई और इस दौरान उन्हें नमाज अदा करना सिखाया। स्थानीय हिंदू संगठनों ने घटना की सूचना शिक्षा प्राधिकरण को दी है और तत्काल कार्रवाई की माँग की है।

पूरे मामले में विधायक शैलेश मेहता का भी बयान सामने आया है। उन्होंने कहा है कि करनाली करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। शुक्रवार (12 जुलाई, 2024) को यहाँ एक आंगनवाड़ी में छोटे बच्चों को ईद और नमाज पढ़ाई गई। छोटे-छोटे बच्चों के सिर पर रूमाल बाँधकर प्रार्थना कराने का प्रयास किया गया। विधायक ने कहा कि ये घटना बेहद दुखद है, जैसे ही घटना उनके संज्ञान में आई, उन्होंने कलेक्टर, डीडीओ, दाभोई प्रांतीय अधिकारी आदि से संपर्क किया और उन्हें जानकारी दी। इसके अलावा उन्होंने व्हाट्सएप्प के जरिए राज्य के शिक्षा मंत्री को भी इसकी सूचना दी गई।

उन्होंने आगे कहा, “घटना के बाद हमने मुख्यमंत्री के निजी सचिव को भी सूचित किया। ये मामला बेहद गंभीर है। छोटे बच्चों को दूसरे मजहब की शिक्षा देना बहुत गंभीर मामला है। बच्चे शिक्षा के लिए आंगनबाड़ियों में जाते हैं, वहाँ मजहबी ज्ञान की जरूरत नहीं है। यदि वह धार्मिक शिक्षा प्राप्त करना चाहता है, यदि वह मुस्लिम है, तो वह मदरसे में जाएगा। लेकिन आंगनबाड़ियों को मदरसे में बदलने का चल रहा कार्यक्रम बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि जामनगर की आंगनवाड़ी में भी इस तरह की घटना हुई, यह गंभीर मामला है, सरकार को भी इसे गंभीरता से लेना होगा। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी, गुजरात में किसी भी आंगनवाड़ी को मदरसा नहीं बनने दिया जाएगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि सोमवार को आंगनवाड़ियाँ खुलते ही इस पर कार्रवाई की जाएगी और अगर नहीं हुई तो हम इस मामले को गंभीरता से लेकर गाँधीनगर तक जाएँगे।

इससे पहले जामनगर के सोनलनगर स्थित आंगनवाड़ी में भी ऐसी ही घटना सामने आई थी। सोशल मीडिया पर आंगनवाड़ी का एक वीडियो वायरल हो गया। इसमें व्यवस्थापक बच्चों को ईद के बारे में पढ़ा रहा था और बच्चों से दुआ पढ़वा रहा था। इतना ही नहीं बच्चों से ‘या हुसैन’ के नारे भी लगवाए गए। व्यवस्थापक बच्चों को बिरयानी बनाकर ईद के दिन सुबह जल्दी उठकर मस्जिद में नमाज अदा करने के लिए प्रेरित भी कर रहा था। इस घटना के बाद भी हिंदू संगठनों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया और कार्रवाई की माँग की।

न्यूयॉर्क : इस्लाम अमनपसंद मजहब है, यह बताने के लिए मुस्लिमों ने ब्लॉक कर दी सड़क

                              न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर पर पढ़ी गई नमाज (फोटो साभार: @HSajwanization)
अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित विश्व प्रसिद्ध टाइम्स स्क्वायर (Times Square) पर पहली बार नमाज पढ़ी गई। शनिवार (3 अप्रैल 2022) को बड़ी संख्या में यहाँ मुस्लिम तरावीह की नमाज (Tarawih Prayers) अदा करने को पढ़े। इसकी वजह से व्यस्त टाइम्स स्क्वायर का रास्ता बंद होने को लेकर विवाद हो गया है। इसके कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हैं।

गल्‍फ टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सैकड़ों मुस्लिमों ने टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ी है। इस कार्यक्रम के आयोजकों ने स्थानीय मीडिया को बताया कि अमेरिका में रहने वाले मुसलमान चाहते थे कि रमजान को न्‍यूयॉर्क सिटी के इस बहुचर्चित स्‍थान पर मनाया जाए और लोगों को यह बताया जाए कि इस्‍लाम एक शांतिपूर्ण मजहब है। आयोजकों ने यह भी कहा कि इस्‍लाम को लेकर पूरी दुनिया में कई गलत धारणाएँ हैं।

आयोजकों ने कहा, “हम सभी लोगों को अपने मजहब के बारे में बताना चाहते थे, जो इसके बारे में भली-भाँति नहीं जानते। इस्‍लाम शांति का मजहब है।” रमजान का महीना शनिवार से शुरू हुआ है। चाँद दिखाई देने के बाद रमजान का ऐलान किया गया था। टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ने को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया यूजर्स इसकी कड़ी आलोचना भी कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर खासा एक्टिव रहने वाले यूएई के हसन सजवानी लिखते हैं, “इस तरह से भीड़-भाड़ वाली जगह पर नमाज पढ़ने से अन्य लोगों को असुविधा होती है। केवल न्यूयॉर्क सिटी (NYC) में ही 270 से अधिक मस्जिदें हैं, और इबादत करने के लिए उचित स्थान हैं। अपने मजहब का प्रदर्शन करने के लिए लोगों का रास्‍ता रोकने की कोई जरूरत नहीं है। इस्‍लाम हमें यह नहीं सीखाता है।”

खलीफा नाम के एक अन्य यूजर ने लिखा, “मैं एक मुसलमान हूँ, लेकिन टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ने का समर्थन नहीं करता हूँ। यह गलत संदेश दे सकता है कि इस्‍लाम ‘आक्रमण’ या घुसपैठ करने वाला है। इसलिए मस्जिदों में ही नमाज पढ़ें।”

कुछ ऐसे भी हैं जो टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ने का समर्थन कर रहे हैं। इनमें से एक सलमान निजामी भी हैं, जो न्यूज चैनलों पर कॉन्ग्रेस का पक्ष रखते नजर आते हैं। ट्विटर पर वीडियो शेयर कर उन्होंने लिखा है, “दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के विश्‍व प्रसिद्ध टाइम्‍स स्‍क्‍वायर की सड़कों पर मुसलमानों ने तरावीह की नमाज अदा की। सहिष्णुता तो तब होती है, जब आप अपनी विविधता का जश्न मनाते हैं। बीजेपी का गुरुग्राम में नमाज पढ़ने से रोकना उनकी कट्टरता को दर्शाता है।”

अयोध्या विवाद: 'मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्‍लाम का अटूट हिस्‍सा नहीं'--सुप्रीम कोर्ट

baba ramdev says Lord Ram is not the issue of politicsसुप्रीम कोर्ट सितम्बर 27 को सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के अपने फैसले में कहा है कि 'नमाज पढ़ना मस्जिद का अभिन्न हिस्सा नहीं है।' इस्माइल फारूकी ने अयोध्या में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपनी अर्जी लगाई थी जिसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अपना अहम फैसला सुनाया था। यह केस मुख्य मामले अयोध्या टाइटिल सूट से अलग है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उसे भी प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट यदि इस मामले को संविधान पीठ के पास भेज देता है तो मुख्य मामले की सुनवाई लटक सकती है।अयोध्‍या विवाद से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्‍यवस्‍था देते हुए अपने 1994 के फैसले को बरकरार रखा है. इस्‍माइल फारुखी मामले (1994) में सुप्रीम कोर्ट ने व्‍यवस्‍था दी थी कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्‍लाम का अटूट हिस्‍सा नहीं है. इस बात को कोर्ट ने आज फिर दोहराते हुए कहा कि नमाज पढ़ना इस्‍लाम का अटूट हिस्‍सा नहीं है. यानी कोर्ट ने साफ कर दिया कि इस्‍माइल फारुखी (1994) के फैसले पर पुनर्विचार नहीं होगा.

CJI और जस्टिस भूषण के फैसले की किन बातों पर जस्टिस अब्दुल नजीर ने जताई असहमति

फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फैसले में दो राय हैं. तीन सदस्‍यीय बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण की इसमें एक राय है और दूसरी राय जस्टिस एस अब्‍दुल नजीर की है. हालांकि तीसरे जज जस्टिस एस अब्‍दुल नजीर ने अलग राय रखते हुए कहा कि इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए. बहुमत के फैसले में कहा गया कि नमाज पढ़ना इस्‍लाम का अटूट हिस्‍सा नहीं है. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि 29 अक्‍टूबर से राम मंदिर केस की सुनवाई शुरू होगी. 
मस्जिद में नमाज पढ़ने का मसला बड़ी बेंच को नहीं भेजने के पक्ष में दो जज। केस को बड़ी बेंच को सौंपने की जरूरत नहीं। न्यायमूर्ति अशोक भूषण कहते हैं, 'सभी धर्मों और धार्मिक स्थानों को समान सम्मान देने की आवश्यकता है। अशोक के शिलालेख दूसरों के विश्वास के लिए सहिष्णुता का प्रचार करते हैं।
क्‍या था मुद्दा
1. अयोध्या मामले के एक मूल वादी एम सिद्दीक ने एम इस्माइल फारूकी के मामले में 1994 के फैसले में इन खास निष्कर्षों पर ऐतराज जताया था जिसके तहत कहा गया था कि मस्जिद इस्लाम के अनुयायियों द्वारा अदा की जाने वाली नमाज का अभिन्न हिस्सा नहीं है. सिद्दीक की मृत्यु हो चुकी है और उनका प्रतिनिधित्व उनके कानूनी वारिस कर रहे हैं.

2. वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने सिद्दीक के कानूनी प्रतिनिधि की ओर से पेश होते हुए कहा था कि मस्जिदें इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है, यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने बगैर किसी पड़ताल के या धार्मिक पुस्तकों पर विचार किए बगैर की.
3. मुस्लिम समूहों ने चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह दलील दी थी कि इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन पर पांच सदस्यीय पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि इसका बाबरी मस्जिद-राम मंदिर भूमि विवाद मामले पर असर पड़ेगा.
4. हालांकि इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने शीर्ष न्यायालय से कहा था कि कुछ मुस्लिम समूह ‘इस्लाम का अभिन्न हिस्सा मस्जिद के नहीं होने’ संबंधी 1994 की टिप्पणी पर पुनर्विचार करने की मांग कर लंबे समय से लंबित अयोध्या मंदिर-मस्जिद भूमि विवाद मामले में विलंब करने की कोशिश कर रहे हैं. अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने उप्र सरकार की ओर से पेश होते हुए कहा था कि यह विवाद करीब एक सदी से अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहा है.
2-1 से आया इस मामले में फैसला...
जस्टिस नजीर ने इस मामले में अपनी राय रखते हुए कहा, 'मैं अपने भाई जजों की राय से सहमत नहीं हूं.' खतने पर सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले का जिक्र करते हुए जस्टिस नजीर ने कहा कि इस मामले को बड़ी बेंच में भेजा जाना चाहिए. जस्टिस नजीर ने कहा कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है, इस विषय पर फैसला धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए, उसपर गहन विचार की जरूरत है. जस्टिस नजीर ने कहा कि जो 2010 में इलाहाबाद कोर्ट का फैसला आया था, वह 1994 फैसले के प्रभाव में ही आया था. इसका मतलब इस मामले को बड़ी पीठ में ही जाना चाहिए था.

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अयोध्या में राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर 1990 में पहली बार पूरे देश में…
महंत सतेंद्र दास, मुख्य पुजारी ने कहा कि बीजेपी ने सरकार में आने पर मंदिर बनाने का वादा किया था। अब पूर्ण बहुमत की सरकार है। राज्य और केंद्र में भी सरकार है। मंदिर बनाना मकसद नहीं था, सत्ता बनाना मकसद था। अब रामलला को भूल गए हैं। 
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मेंबर जफरयाब जिलानी ने कहा, 'अनिवार्यता का निर्णय लेने से पहले आपको उस धर्म के मूल धार्मिक पाठ को ध्यान में रखना होगा।' 
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले बीजेपी नेता विनय कटियार ने कहा कि इससे मेन टाइटल सूट पर असर नहीं पड़ेगा। वो कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी देश को दिग्भ्रमित कर रही है। वो किसी भी कीमत पर राम मंदिर का निर्माण नहीं होने देना चाहती है। 
हम चाहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण जल्द से जल्द हो। हम सभी लोग अधीर हो रहे हैं। राहुल गांधी झूठे हैं। जब वो चित्रकूट जाते हैं तो रामभक्त बन जाते हैं, अमेठी आते हैं तो शिवभक्त बन जाते हैं। इसके अलावा कर्नाटक या मानसरोवर जाते हैं तो कुछ और ही बन जाते हैं।
विनय कटियार ने कहा कि वो राहुल गांधी को चुनौती देते हैं कि अयोध्या आकर राम मंदिर निर्माण में सहयोग करें। उन्हें लगता है कि राम मंदिर निर्माण से पहले राम जन्मभूमि एक और बलिदान की मांग कर रही है। 
हम हिंदू अब व्यग्र हैं, पहले ये बताया गया था कि इस मामले की रोजाना सुनवाई होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सरकार को सोमनाथ की तर्ज पर इस मुद्दे पर कानून लाना चाहिए। इसके अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। 
अयोध्या विवाद से पक्षकार रहे दिवंगत हाशिम अंसारी के बेटे ने कहा कि वो चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस तरह से फैसला सुनाए ताकि आगे चलकर विवाद की गुंजाइश न हो। उन्होंने कहा नमाज का पढ़ना और मस्जिद से संबंध संवेदनशील मुद्दा है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला महत्वपूर्ण है।