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दिल्ली : एक्टिविस्ट ‘दिखने’ की चाहत में टूटी झुग्गियों में पहुँचे राहुल गाँधी, SC के आदेश पर हुई डिमोलिशन ड्राइव से की पॉलिटिकल माइलेज लेने की कोशिश: फिर भी रहे खाली ‘हाथ’


जब से सियासत में अरविन्द केजरीवाल का पदापर्ण हुआ है, लाख केजरीवाल की सभी आलोचना करते रहे, लेकिन उसकी नीतियां केजरीवाल का हर विरोधी अपना रहा है। फ्री की रेवड़ियां और ऐसी बयानबाज़ी करो कि मीडिया में छाए रहो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो विकास के नाम पर वोट मांगने की हैसियत रखते है, वह भी फ्री की रेवड़ियां बांट रहे हैं। केजरीवाल ने जनता को इतना मुफ्तखोर बना दिया कि, जैसे कुत्ते को हड्डी दिखाओ तुम्हारे आगे दुम हिलाता रहेगा, जब तक कोई रेवड़ी नहीं देगा मुफ्तखोर उस पार्टी को वोट ही नहीं देंगे। बीजेपी अपने विपक्ष पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती हैं, लेकिन खुद कितना तुष्टिकरण कर रही है सब खामोश है। दिल्ली में जितने भी अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं 90% हिन्दू क्षेत्रों में। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कितना अतिक्रमण है आँखों पर बहुत मोटी पट्टी बांधे हुए हैं। वहीं दूसरी ओर, राहुल गाँधी LoP होते हुए भी ऐसी बयानबाज़ी और हरकतें कर रहे कि मीडिया भी काम पर लग जाती है। 
साभार सोशल मीडिया 

जहां तक योगी-मोदी को टक्कर देने की बात है कांग्रेस को गाँधी परिवार का त्याग कर स्वयं निर्णय लेने वाला कद्दावर नेता चाहिए। वरना जब तक गाँधी परिवार का बोलबाला रहेगा बीजेपी को सत्ता से कोई नहीं हटा सकता।  

कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी शुक्रवार (25 जुलाई 2025) को दिल्ली के अशोक विहार और वजीरपुर के जेलर वाला बाग की झुग्गियों में पहुँच गए। ये वही जगह है, जहाँ पिछले महीने डीडीए (दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने झुग्गियों पर बुलडोजर चलाया था। राहुल गाँधी ने वहाँ मौजूद लोगों से मुलाकात की, उनकी बात सुनी और आश्वासन दिया कि कांग्रेस उनकी लड़ाई को कोर्ट तक ले जाएगी और संसद में भी यह मुद्दा उठाएगी।

हालाँकि सवाल यह है कि क्या यह दौरा वाकई लोगों की मदद के लिए था या फिर यह सिर्फ पॉलिटिक्स का एक और मौका था, जिसे राहुल गाँधी ने भुनाने की कोशिश की?

पूरा मामला 

जेलर वाला बाग में डीडीए ने 16 जून 2025 को एक बड़ा डिमोलिशन ड्राइव चलाया था। इस कार्रवाई में करीब 500 से ज्यादा झुग्गियों को तोड़ा गया, जिसके बाद कई परिवार बेघर हो गए। डीडीए का कहना है कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई, क्योंकि इन झुग्गियों ने डीडीए की जमीन और रेलवे पटरी के आसपास अवैध कब्जा किया था। डीडीए ने पहले लोगों को नोटिस भी जारी किए थे, लेकिन कई लोगों ने जमीन खाली करने में इंटरेस्ट नहीं दिखाया।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू यह है कि सरकार ने इन झुग्गीवासियों के लिए पुनर्वास की योजना बनाई थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अशोक विहार फेज-2 में स्वाभिमान अपार्टमेंट बनाए गए हैं, जहाँ 1675 ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) फ्लैट्स तैयार किए गए हैं।

इनमें से 1078 पात्र परिवारों को फ्लैट्स अलॉट हो चुके हैं। प्रत्येक फ्लैट की लागत 25 लाख रुपये है, लेकिन पात्र लोगों को सिर्फ 1.42 लाख रुपये और 30,000 रुपये रखरखाव के लिए देने हैं। बाकी लागत सरकार वहन कर रही है। डीडीए का कहना है कि यह योजना ‘जहाँ झुग्गी, वहीं मकान’ के तहत चल रही है, जिसे 2015 में तत्कालीन दिल्ली सरकार ने मंजूरी दी थी।

राहुल गाँधी का दौरा झुग्गी वासियों की मदद या सियासत?

राहुल गाँधी का यह दौरा तब हुआ, जब संसद का मानसून सत्र चल रहा था। अचानक जेलर वाला बाग पहुँचकर उन्होंने वहाँ के लोगों से बात की और उनकी समस्याएँ सुनीं। उन्होंने लोगों से पूछा कि यह इलाका कितने एकड़ में है और डीडीए ने कितने एकड़ में बुलडोजर चलाया। जवाब में एक व्यक्ति ने कहा कि 100 एकड़। इस पर राहुल गाँधी का जवाब था, “भइया, सौ एकड़ तो मैं पैदल चला हूं।” इस बातचीत का वीडियो कांग्रेस ने अपने ‘X’ अकाउंट पर शेयर किया, जिसमें लिखा गया कि राहुल गाँधी ने प्रभावित परिवारों का दर्द बाँटा और उनकी शिकायतें सुनीं।

लेकिन सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ आईं। कुछ यूजर्स ने राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पर तंज कसा। एक यूजर पीतांबरा दत्त शर्मा ने लिखा, “इनमें से किसी ने जगह को मोल खरीदा है क्या? जो लोग सरकार से मोल प्लॉट खरीद कर टैक्स देकर मकान बनाते हैं, वो तो मूर्ख ही हुए न?”

एक अन्य यूजर, मुकेश अग्रवाल ने सवाल उठाया कि क्या राहुल गाँधी कभी पाकिस्तान से आए विस्थापितों की झुग्गियों में गए? राजेश जैन नाम के यूजर ने तो कांग्रेस पर ही आरोप लगाया कि वह रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को दोबारा बसाने की कोशिश कर रही है।

झुग्गियों को ढहाने के मामले की क्या है सच्चाई?

राहुल गाँधी और कांग्रेस का दावा है कि डीडीए की कार्रवाई से लोग बेघर हो गए और उन्हें फ्लैट्स में पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि फ्लैट्स में साफ पानी, सफाई और बुनियादी सुविधाओं की कमी है। वहीं, कुछ ने यह भी आरोप लगाया कि हाई कोर्ट के स्टे ऑर्डर के बावजूद उनके घर तोड़े गए।

लेकिन डीडीए पक्ष इससे अलग है। डीडीए का कहना है कि जिन लोगों को फ्लैट्स अलॉट किए गए हैं, उन्हें सस्ती कीमत पर पक्के मकान दिए जा रहे हैं। जो लोग पात्र नहीं थे, उनके पास 2015 से पहले का वैध राशन कार्ड या मतदाता सूची में नाम नहीं था। ऐसे लोगों को अपीलीय प्राधिकरण में अपील करने का मौका दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई इस कार्रवाई को लेकर बीजेपी ने साफ कहा कि दिल्ली सरकार झुग्गीवासियों को पक्के मकान देकर अपना वादा पूरा कर रही है। यह योजना न सिर्फ कानूनी है, बल्कि लोगों को बेहतर जीवन देने का प्रयास भी है। हालाँकि राहुल गाँधी और कांग्रेस इसे बीजेपी की नाकामी बता रहे हैं और इसे एक प्रोपेगेंडा के तौर पर पेश कर रहे हैं कि बीजेपी लोगों को बेघर कर रही है।

हालाँकि अशोक विहार में डिमोलिशन ड्राइव के समय ऑपइंडिया की टीम भी मौके पर पहुँची थी। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि ये सब कुछ बीजेपी और दिल्ली सरकार को बदनाम करने की कोशिश है, जबकि सच्चाई ये है कि रेखा गुप्ता की सरकार अपने वादों को पूरा कर रही है। रेखा गुप्ता की बीजेपी सरकार झुग्गी में रहने वालों को पक्का मकान देने का वादा पूरा कर रही है।

राहुल गाँधी की पॉलिटिक्स का पुराना पैटर्न

राहुल गाँधी का यह कोई पहला मौका नहीं है, जब वह किसी मुद्दे को लेकर चर्चा में आए हों। चाहे वह किसान आंदोलन हो, बेरोजगारी का मुद्दा हो या कोई और सामाजिक मसला, राहुल गाँधी अक्सर ऐसे मौकों पर लोगों के बीच पहुँचते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन क्या इन वादों का कोई ठोस नतीजा निकलता है? यह सवाल बार-बार उठता है।

उदाहरण के लिए, 2020 में जब दिल्ली में दंगे हुए थे, तब भी राहुल गाँधी ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया था और सरकार पर निशाना साधा था। लेकिन उनके इस दौरे का कोई खास असर नहीं हुआ।

इसी तरह साल 2023 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी, जब वहाँ 1000 से ज्यादा झुग्गियों को तोड़ा गया था। उस वक्त राहुल गाँधी ने इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया। सोशल मीडिया यूजर्स ने इस बार भी यही सवाल उठाया कि जब कांग्रेस की सरकार थी, तब राहुल गाँधी को गरीबों का दर्द क्यों नहीं दिखा? यह सवाल उनके इरादों पर संदेह पैदा करता है।

राहुल गाँधी की छवि एक ऐसे नेता की रही है, जो मुद्दों को उठाता तो है, लेकिन उसका कोई ठोस समाधान पेश नहीं करता। उनकी रैलियों और बयानों में अक्सर भावनात्मक बातें होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत से उनका कनेक्शन कम ही दिखता है। जेलर वाला बाग के मामले में भी यही लगता है कि राहुल गाँधी ने इसे एक पॉलिटिकल मौके के तौर पर देखा, न कि वाकई लोगों की मदद करने के इरादे से।

लोगों को गुमराह करने की कोशिश?

राहुल गाँधी और कांग्रेस का यह दावा कि बीजेपी लोगों को बेघर कर रही है, कई मायनों में भ्रामक लगता है। डीडीए की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई थी, और यह पूरी तरह कानूनी थी। जिन लोगों को फ्लैट्स अलॉट किए गए हैं, उन्हें सस्ती कीमत पर पक्के मकान मिल रहे हैं। जो लोग पात्र नहीं थे, उनके लिए अपील का रास्ता खुला है। ऐसे में यह कहना कि बीजेपी लोगों को बेघर कर रही है, हकीकत से परे है।
कांग्रेस का यह प्रोपेगेंडा लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश लगता है। राहुल गाँधी ने अपने दौरे में लोगों से मुलाकात तो की, लेकिन क्या वह इस मामले में कोई ठोस समाधान लेकर आए? नहीं। उनके आश्वासनों में कोर्ट और संसद में मुद्दा उठाने की बात तो थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि इससे लोगों को तुरंत राहत कैसे मिलेगी। यह सब सिर्फ पॉलिटिकल पॉइंट्स स्कोर करने की कोशिश नजर आती है।
सोशल मीडिया पर भी लोग इस बात को समझ रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “कांग्रेस को गरीबों का दर्द सिर्फ कैमरे के सामने दिखता है।” यह टिप्पणी राहुल गाँधी की मंशा पर सवाल उठाती है। अगर वह वाकई लोगों की मदद करना चाहते, तो शायद वह डीडीए और सरकार से बातचीत करके कोई रास्ता निकालने की कोशिश करते। लेकिन इसके बजाय, उन्होंने इसे सिर्फ एक पॉलिटिकल इवेंट बना दिया।

एकतरफा नरेटिव गढ़ने की कोशिश हुई ध्वस्त

बीजेपी और डीडीए का कहना है कि यह पूरी कार्रवाई पारदर्शी और कानूनी थी। ‘जहाँ झुग्गी, वहीं मकान’ योजना के तहत सरकार ने झुग्गीवासियों को पक्के मकान देने का वादा किया था, जिसे वह पूरा कर रही है। 1675 फ्लैट्स में से 1078 पहले ही अलॉट हो चुके हैं, और बाकी जल्द ही अलॉट किए जाएँगे। यह योजना न सिर्फ लोगों को बेहतर जीवन दे रही है, बल्कि दिल्ली को और व्यवस्थित बनाने की दिशा में भी एक कदम है।
हाँ, यह सच है कि कुछ लोगों को अभी तक फ्लैट्स नहीं मिले, और कुछ ने फ्लैट्स की सुविधाओं पर सवाल उठाए हैं। लेकिन डीडीए का कहना है कि इन समस्याओं को जल्द ही हल किया जाएगा। डीडीए का यह भी तर्क है कि अवैध कब्जों को हटाना जरूरी था, क्योंकि यह शहर की सुरक्षा और विकास के लिए जरूरी है।

पॉलिटिकल माइलेज लेने की कोशिश या लोगों का भला?

राहुल गाँधी का जेलर वाला बाग दौरा और उनकी बातें सुनने में तो भावनात्मक लगती हैं, लेकिन गहराई से देखें तो यह सिर्फ पॉलिटिक्स की चमक नजर आती है। बीजेपी और डीडीए अपनी योजना के तहत लोगों को पक्के मकान दे रहे हैं, और यह पूरी प्रक्रिया कानूनी है। ऐसे में राहुल गाँधी का इसे प्रोपेगेंडा बनाकर बीजेपी को घेरने की कोशिश लोगों को गुमराह करने जैसा लगता है।
कांग्रेस और राहुल गाँधी को अगर वाकई लोगों की चिंता है, तो उन्हें सरकार के साथ मिलकर समस्याओं का समाधान ढूँढना चाहिए। सिर्फ कैमरे के सामने जाकर आँसू बहाने और बड़े-बड़े वादे करने से कुछ नहीं होगा। दिल्ली के लोग अब समझने लगे हैं कि कौन उनकी मदद कर रहा है और कौन सिर्फ पॉलिटिक्स की रोटियाँ सेंक रहा है। राहुल गाँधी और कांग्रेस को एक बार फिर से शायद निराशा ही ‘हाथ’ लगने वाली है।

उत्तराखंड : बेशर्म कांग्रेस कह रही – कोर्ट के बजाय मौलवी-मौलानाओं से आदेश लेते: हल्द्वानी में कट्टरपंथियों के साथ खड़ी पार्टी

                     हल्द्वानी दंगा और विधायक सुमित हृदयेश (साभार: अमर उजाला/X-SumitHridayesh)
जिस तरह कांग्रेस इस्लामिक कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक सेकुलरिज्म का ढोल पीट हिन्दुओं को पागल बना राज करती रही, वही काम भाजपा से उम्मीद कर रही है। दूसरे, देश में जितने दंगे कांग्रेस ने करवाए है, और हज़ारों मुसलमानों की जानें गयी, फिर भी मुसलमान कांग्रेस पर विश्वास करता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक़्फ़ बोर्ड, शाहबानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निरस्त करने, पाकिस्तानी/बांग्लादेशी/रोहिंग्या घुसपैठियों को सरकारी सुविधाएं देकर आबाद करना और अतिक्रमण आदि से मुस्लिम हितैषी नहीं। अब कांग्रेस का इस्लामिक चेहरा हल्द्वानी दंगों में सामने आ गया है। समस्त हिन्दुओं और शांतिप्रिय मुसलमानों को कांग्रेस से सतर्क रहने की जरुरत है। देश में कानून का राज होगा, शरीयत का नहीं, जो अवैध अतिक्रमण को हटाने के लिए मौलवी-मौलानाओं से आदेश लेने को कांग्रेस बोल रही है। 

कोर्ट के आदेश के बाद उत्तराखंड के हल्द्वानी में प्रशासन ने अवैध अतिक्रमण के खिलाफ अभियान चलाया, जिसके बाद कट्टरपंथियों ने इतना उपद्रव मचाया कि इसमें कम-से-कम 6 लोगों की मौत हो गई है। ये अभियान कई दिनों से चल रहा था, जिसके तहत सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से कब्जा करके बनाए बनाए गए इमारतों को ध्वस्त किया जा रहा था। इन इमारतों में मकानों और धार्मिक स्थल भी थे।

प्रशासन गुरुवार (8 फरवरी 2024) को हल्द्वानी के बनफूलपुरा थाना इलाके के ‘मालिक के बगीचे’ में पहुँचा और अवैध रूप से बनी मस्जिद और मदरसे पर बुलडोजर चला दिया। इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। इस भीड़ में पुरुषों के साथ महिलाएँ भी शामिल थीं। हमले में कई पुलिस वाले घायल भी हो गए हैं।

हमले में पत्थरबाजी के साथ ही पेट्रोल-बम भी चलाए गए। दर्जनों गाड़ियों को आग लगा दिया गया। उन्मादी भीड़ ने पुलिस थाने को घेर लिया गया और पुलिस वालों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इस हिंसा में 6 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 300 से अधिक लोग घायल हैं। घायलों में अधिकांश पुलिसकर्मी और अधिकारी हैं। हालात को देखकर हल्द्वानी में अगले आदेश तक कर्फ्यू लगा दिया गया है।

दरअसल, कोर्ट के आदेश पर की गई प्रशासन द्वारा अवैध मस्जिदों और मदरसों पर की गई कार्रवाई के खिलाफ के बाद कट्टरपंथियों की कार्रवाई का कॉन्ग्रेस नेताओं ने एक तरह से समर्थन कर दिया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने जिस लहजे में इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया दी, उससे यही लगता है कि कोर्ट के आदेश बजाय प्रशासन को मौलवी एवं मौलानाओं से आदेश लेना चाहिए था और उनकी सहमति होती, तभी प्रशासन को कार्रवाई करनी चाहिए थी।

अधिकारियों को उतावला बताते हुए कॉन्ग्रेस के स्थानीय विधायक सुमित हृदयेश ने कहा, “ये प्रशासन और अधिकारियों की बहुत बड़ी चूक है। स्थानीय लोगों, मौलानाओं को कॉन्फिडेंस में लेकर बात की जानी चाहिए थी। आप (प्रशासन) एकदम से वहाँ पहुँच जाते हैं और बिना इन्फॉरमेशन के वहाँ ऐसी कार्रवाई को अंजाम दिया। जो भी हुआ, अनुचित हुआ। आजादी के बाद से ऐसा हमने हल्द्वानी शहर में ऐसा कभी नहीं देखा। ये बड़ा काला दिन है।”

ये वही सुमित हृदयेश हैं, जो रेलवे की जमीन पर कब्जा करके बसे हजारों लोगों की बस्तियाँ को हटाने के खिलाफ खड़े हो गए थे। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि यहाँ 20 इबादतगाह भी बनाए गए हैं। मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया तो अवैध कब्जाधारियों को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस के सलमान खुर्शीद खड़े हो गए। वहीं, कॉन्ग्रेस के स्थानीय विधायक सुमित हृदयेश भी खड़े हो गए।

लोगों का तो ये भी कहना है कि इन अवैध बस्तियों को बसाने में सुमित हृदयेश की माँ इंदिरा हृदयेश का भी बड़ा हाथ था। कहा जाता है कि वहाँ जब गफूर बस्ती के सीमांकन का काम होता था, तब भी यहाँ के लोग इसका विरोध करते थे और इंदिरा हृदयेश भी इसमें साथ रहती थीं। इंदिरा हृदयेश भी उत्तराखंड कॉन्ग्रेस की बड़ी नेता रही हैं। इस पूरे मामले में एकमुश्त वोट पाने की नीति की बहुत बड़ी भूमिका है।

दरअसल, उत्तराखंड विधानसभा में हाल में समान नागरिक संहिता (UCC) पारित किया गया है, जिसको लेकर भी विपक्षी दलों द्वारा माहौल खराब करने की कोशिश की गई। कॉन्ग्रेस के बड़े नेता एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी कहा था कि UCC से राज्य में अशांति हो सकती है। राज्य के हालत मणिपुर में तब्दील हो सकते हैं। उन्होंने UCC के बाद होने वाली हिंसा का उदाहरण कूकी-मैतेई समुदाय से जोड़कर दिया था।

इतना ही नहीं, मुस्लिम मौलानाओं ने भी सड़कों पर उतरने की धमकी दी थी। इसके बाद मुस्लिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और खुद को पीस पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बताने वाला शादाब चौहान मुस्लिमों की ताकत को कम ना आँकने की धमकी दी थी। शादाब चौहान ने हल्द्वानी दंगे (8 फरवरी, 2024) से दो दिन पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को धमकी देते हुए एक सोशल मीडिया पोस्ट लिखा था।

अपने पोस्ट में शादाब ने लिखा था, “किसी की औकात नहीं है जो भारत के मुसलमानों को अल्लाह के हुकुम और हमारे नबी के तरीके पर चलने से रोक सके। अगर तुम हमको कमजोर समझ रहे हो तो गलती कर रहे हो, हमारी ताकत का अंदाज़ा तुम नहीं लगा सकते। हम हर संवैधानिक संघर्ष के लिए तैयार हैं। हमारी ताकत संविधान का अनुच्छेद 25 है, जिसके सामने तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस, तुम्हारी भी जिम्मेदारी है कि इसके लिए संवैधानिक संघर्ष करो।”

ऑपइंडिया पत्रकार राहुल पांडे ने पिछले साल जनवरी 2023 में वहाँ जाकर स्थानीय लोगों से बात करके हालात को जानने का प्रयास किया था। हमें स्थानीय लोगों से पता चला था कि कैसे हल्द्वानी में बाहरी मुस्लिमों की संख्या तेजी से बढ़ी है। रामपुर, नजीमाबाद, बिजनौर, बुलंदशहर जैसी जगहों से मजदूरी के लिए वे आए और फिर जमीनों पर कब्जा करके बस गए। इनमें अवैध रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिमों की भी बड़ी संख्या है।

दरअसल, हल्द्वानी में जिस बनफूलपुरा में ये सारा बवाल हुआ, वो पूरा इलाका सरकारी जमीन पर बसा है। प्रशासन लगातार अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई कर रहा था। हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के आदेश के बाद ये कार्रवाई की जा रही थी। पिछले साल भी यहाँ बड़ा तनाव फैल गया था। इस बार अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत अवैध रूप से बने मस्जिद और मदरसा को हटाया जा रहा था।

प्रशासन की कार्रवाई लगभग पूरी भी हो गई थी, तभी वहाँ कट्टरपंथियों की भारी भीड़ पहुँची। इनमें महिलाएँ और किशोर उम्र के बालक भी थे। उन्होंने प्रशासनिक कर्मचारियों से बहस की और फिर देखते ही देखते आसपास की छतों से पत्थरबाजी शुरू हो गई। यहाँ करीब 800 की संख्या में मौजूद पुलिस वालों, मीडिया व अन्य प्रशासनिक कर्मचारियों-अधिकारियों को घेर लिया गया और हमला बोल दिया गया।

डीएम वंदना सिंह ने बताया, “ये हमला छतों पर इकट्ठे किए गए पत्थरों के जरिए किया गया। 30 जनवरी तक उन छतों पर कोई भी पत्थर नहीं था। न्यायालय में जब सुनवाई चल रही थी, तब भी वहाँ पत्थर नहीं थे। जिस दौरान सुनवाई चल रही थी, उस दौरान छतों पर पत्थर इकट्ठे किए गए। इसका मतलब है कि ये पूरी तरह से प्लानिंग की गई थी कि जिस दिन अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया जाएगा, उस समय हमला किया जाएगा। ताकि प्रशासन बैकफुट पर चला जाए।”

डीएम वंदना सिंह ने कहा, “पत्थरों से हमला हुआ, तो हमारी टीम पीछे नहीं हटी। हमारी टीम काम करती रही, इसके बाद दूसरी टीम आई। उनके हाथों में पेट्रोल बम थे। उन्होंने हाथों में प्लास्टिक की बोतलें पकड़ी हुई थी, उन्होंने उसमें आग लगाकर फेंकना शुरू किया। हमारी टीम तब भी अवैध ढाँचे को तोड़ने में लगी रही।”

उत्तराखंड : उच्च न्यायालय द्वारा रेलवे लाइनों पर अतिक्रमण हटाने का आदेश आने पर शाहीन बाग़ जैसे उपद्रव की साजिश: विवादित जुबैर दे रहा हवा

                                      अवैध प्रदर्शनकारी कब्जेदारों को कांग्रेस का भी समर्थन
उत्तराखंड के हल्द्वानी में 31 दिसंबर, 2022 को सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम भीड़ ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन रेलवे की जमीन पर हुए अवैध अतिक्रमण को हटाने के आदेश के खिलाफ हो रहा था। अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन है। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर खुद को बेघर करने का आरोप लगाया। हाथों में ली गई तख्तियों में उन्होंने पहले खुद को बसाने की लाइनें लिखी थीं।

सोशल मीडिया में वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों के मुताबिक, शाहीन बाग़ वाले अंदाज में हो रहे इस प्रदर्शन में महिलाओं और बच्चों को आगे कर दिया गया था। ऑल्ट न्यूज़ के कथित फैक्ट चेकर विवादित मोहम्मद जुबैर द्वारा प्रदर्शनकारियों के समर्थन में शेयर किए गए एक वीडियो से पता चलता है कि लगभग 4500 परिवारों ने रेलवे की जमीन पर अवैध अतिक्रमण कर रखा है, जो अब बेघर होने की दुहाई दे रहे हैं। यहाँ ध्यान रखने योग्य है कि विवादित मोहम्मद जुबैर द्वारा शेयर हुए नूपुर शर्मा के एडिटेड वीडियो से देश के अलग-अलग हिस्सों में तनाव का माहौल बन गया था। सरकार को जुबेर के विरुद्ध भी कार्यवाही करनी चाहिए। 

वायरल करवाए जा रहे वीडियो के साथ ट्विटर पर #StandWithPeopleOfHaldwani व #SpeakUpForPeopleOfHaldwani नाम से हैशटैग भी चलाए जा रहे हैं। ज्यादातर वीडियो में लड़कियों को पढ़ाई से वंचित किए जाने व महिलाओं को बेघर होने की दुहाई देते सुना जा सकता है।

पूरा मामला

दरअसल, 27 दिसम्बर, 2022 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हल्द्वानी के वनभूलपुरा क्षेत्र में स्थित गफूर बस्ती में रेलवे की भूमि पर हुए अतिक्रमण को हटाने के आदेश दिए थे। इसके लिए न्यायालय ने प्रशासन को सप्ताह भर की समय सीमा दी थी। इसी आदेश में कोर्ट ने प्रशासन से वनभूलपुरा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लाइसेंसी हथियार भी जमा करवाने को कहा था। दिसंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट भी रेलवे की जमीनों पर अतिक्रमण को ले कर चिंता जताते हुए इसे जल्द से जल्द खाली करवाने के आदेश दे चुका है। रेलवे लाइनों पर अतिक्रमण सिर्फ उत्तराखंड नहीं, सभी जगह है। सरकार को इन अतिक्रमण को हटाने के साथ-साथ उन सभी नेताओं और अधिकारियों पर भी सख्त कार्यवाही की जरुरत है, जिन्होंने हर प्रकार की सरकारी सुविधा देकर धन का दुरूपयोग कर कानून का मजाक उड़ाया है। इन लोगों को मिलने वाली समस्त सरकारी सुविधायें तुरंत वापस लेकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई का आगाज करना चाहिए।   

1975 से हो रहा कब्ज़ा

एक दावे के मुताबिक, हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अवैध कब्ज़े की शुरुआत साल 1975 से हुई थी। पहले कच्ची झुग्गियाँ बनाई गईं, जो बाद में पक्के निर्माण में तब्दील हो गए। बाद में इसी अवैध कब्ज़े में न सिर्फ इबादतगाहें बल्कि अस्पताल तक बना डाले गए। आरोप है कि यह सब देखने के बाद भी तत्कालीन रेलवे सुरक्षा बल खामोश रहा। साल 2016 में नैनीताल हाईकोर्ट की कड़ाई के बाद रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने अवैध कब्जेदारों के खिलाफ पहला केस दर्ज करवाया, लेकिन तब तक लगभग 50 हजार लोग अवैध तौर पर वहाँ रहना शुरू कर चुके थे।
नैनीताल हाईकोर्ट के साल 2016 में आए आदेश के चलते कब्जेदारों ने लम्बी मुकदमे बाजी की। हालाँकि, वो अपने कब्ज़े का कोई ठोस प्रमाण नहीं पेश कर पाए। बताया जा रहा है कि अवैध कब्जेदारों के खिलाफ डेढ़ दशक पहले भी बड़ा अभियान चलाया गया था। तब भारी फ़ोर्स के साथ सिर्फ कुछ हिस्सों को खाली करवा पाया गया था। इस दौरान कब्जेदारों के घरों के नीचे रेलवे लाइनें तक निकली थीं। कुछ समय की शांति के बाद खाली करवाए गए स्थान पर फिर से अवैध कब्ज़ा हो गया।

कांग्रेस नेताओं पर अतिक्रमणकारियों के संरक्षण का आरोप

सोशल मीडिया पर सक्रिय अभिषेक सेमवाल ने कांग्रेस पार्टी पर अवैध कब्ज़ा करने वालों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। अभिषेक के मुताबिक, इसकी शुरुआत दिवंगत कांग्रेस नेत्री इंदिरा हृदयेश ने की थी जिस राह पर अब उनके बेटे सुमित हृदयेश भी हैं। यहाँ ये जानना जरूरी है कि कांग्रेस पार्टी ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के खिलाफ और कब्जेदारों के समर्थन में कैंडल मार्च निकाला है।

कोरोना काल में पुलिस पर किया था हमला

‘सुदर्शन न्यूज़’ ने 15 अप्रैल, 2022 को एक वीडियो शेयर किया था। इस वीडियो में एक भीड़ को सड़क पर हंगामा करते देखा जा सकता है। ‘सुदर्शन न्यूज़’ ने दावा किया था कि यह भीड़ लॉकडाउन 2 समय की है। तब हल्द्वानी के वनभूलपुरा इलाके में मुस्लिम भीड़ ने सड़कों पर उतर कर न सिर्फ डाक्टरों को बंधक बना लिया था, बल्कि उन्हें बचाने आई पुलिस से भी झड़प की थी।
अपनी कार्रवाई के पीछे रेलवे ने तर्क दिया है कि अवैध कब्ज़े से न सिर्फ विकास में दिक्कत आ रही बल्कि विस्तार भी प्रभावित हो रहा है। रेलवे का यह भी कहना है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से पहले अतिक्रमण करने वालों को कई नोटिस भेजी गई थी, लेकिन उस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला और न ही किसी ने खुद से अतिक्रमण हटाया।