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जो पत्रकार नहीं एडिटर्स गिल्ड को उसकी चाहिए रिहाई, जो एडिटर इन चीफ उस पर खानापूर्ति: जुबैर और अर्नब में ऐसे फर्क करता है इकोसिस्टम

नूपुर शर्मा के मुद्दे पर निष्पक्ष रूप से कहा जा रहा है कि हिन्दू नूपुर को इस्लामिक किताब में लिखी बात को बोलने के लिए उकसाने वाले तस्लीम रहमानी, और उसी बात को पैगम्बर का अपमान बताकर देश में हंगामा करवाने वाले altnews के मोहम्मद जुबेर का कोई नाम नहीं लेता, क्यों? चलो देर आये दुरुस्त आये, हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा फ़ैलाने वाले मोहम्मद जुबेर को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर उचित न्याय की ओर सही कदम है। ये वही जुबेर है जो एक ही दिन में हिन्दू घृणा वाले 28 ट्वीट डिलीट करता है।  
हिन्दू देवी-देवताओं का खुलेआम अपमान करने वाले मोहम्मद जुबैर की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी पर ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने लंबा-चौड़ा बयान जारी किया है। इसमें AltNews के सह-संस्थापक की गिरफ़्तारी की निंदा करते हुए कहा गया है कि 2018 के एक ट्वीट को लेकर 27 जून, 2022 को ये कार्रवाई की गई। EGI ने दिल्ली पुलिस से मोहम्मद जुबैर को तुरंत रिहा करने की माँग की है।

गिल्ड ने अपने बयान में कहा, “घटनाओं को विचित्र मोड़ देते हुए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मोहम्मद जुबैर को पूछताछ के लिए बुलाया था। ये 2020 का मामला था, जिसमें उच्च न्यायालय ने उन्हें गिरफ़्तारी से राहत दे रखी है। जब जुबैर ने समन पर प्रतिक्रिया दी तो उन्हें इसी महीने शुरू की गई एक आपराधिक जाँच के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। एक अज्ञात पहचान वाले ट्विटर हैंडल ने उनके 2018 के एक ट्वीट पर धार्मिक भावनाएँ भड़काने का आरोप लगाया था।” मोहम्मद ज़ुबैर ट्विटर पर कह चुका है कि वो पत्रकार नहीं है, फिर उसके लिए EGI सामने क्यों आया?

इस बयान में कहा गया है कि IPC की धाराओं 153 और 295 लगा कर मोहम्मद जुबैर को गिरफ्तार किया जाना काफी आकुल करने वाला है, क्योंकि उसकी वेबसाइट AltNews ने पिछले कुछ समय में फेक न्यूज़ को चिह्नित करने में ‘उदाहरण पेश करने वाले’ कार्य किए हैं और ‘दुष्प्रचार अभियानों को काटा’ है। EGI का कहना है कि मोहम्मद जुबैर ने ये सब तथ्यात्मक और वस्तुनिष्ठ तरीके से किया है। साथ ही संस्था ने कहा कि टीवी पर सत्ताधारी पार्टी के एक प्रवक्ता के ‘ज़हरीले बयान’ का खुलासा था, जिस कारण पार्टी को बदलाव करना पड़ा।

अर्णब गोस्वामी EGI के लिए पत्रकार होते हुए भी पत्रकार नहीं हैं। मोहम्मद जुबैर खुद को पत्रकार न बताते हुए भी इनके लिए पत्रकार है। तभी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया सेलेक्टिव आउटरेज का एक बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है, जहाँ वो खुद चुनता है कि कब किसकी गिरफ़्तारी को छिपाना है और किसे उठाना है। अब संस्था बताए कि क्या वो जुबैर के हिन्दू देवी-देवताओं वाले ट्वीट्स-पोस्ट्स का समर्थन करता है? वो खुद को खुलेआम हिन्दू विरोधी घोषित कर दे फिर।

वहीं अर्णब गोस्वामी को जब उन्हें और उनके परिवार को प्रताड़ित करते हुए उद्धव ठाकरे सरकार की मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था, तब EGI ने काफी दबाव के बाद दो पैराग्राफ में बयान जारी कर इतना लिख इतिश्री कर ली थी कि पुलिस उनके साथ अच्छा व्यवहार करे। रिहाई की माँग नहीं की गई थी और जिन आरोपों के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था, उन्हें हाइलाइट किया गया था। जबकि जुबैर के मामले में उसके अपराधों के बारे में कुछ नहीं बताया गया है और सीधा उसे छोड़ने की माँग की गई है।

वहीं मोहम्मद जुबैर के समय EGI खुद ही जज बन बैठा है और कह रहा है कि AltNews की ‘सतर्क चौकसी’ ने उन लोगों को नाराज़ कर दिया था, जो दुष्प्रचार को एक हथियार बना कर समाज का ध्रुवीकरण करते हैं और राष्ट्रवादी भावनाओं को उकसाते हैं। एक तरह से ऐसा लग रहा है जैसे ये किसी विपक्षी पार्टी का बयान हो, पूर्णतः राजनीतिक। लोकतंत्र को लेकर G7 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता की याद दिलाते हुए एडिटर्स गिल्ड ने ऑफलाइन और ऑनलाइन कंटेंट्स की सुरक्षा की सलाह दी है।

अब सवाल उठता है कि जो खुलेआम खुद को पत्रकार ही नहीं मानता, उसकी रिहाई के लिए ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने क्यों दिन-रात एक किया हुआ है? जबकि जो उस समय भारत के सबसे ज्यादा टीआरपी वाले चैनल का मैनेजिंग डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ है, उसके लिए सिर्फ खानापूर्ति की गई थी। EGI ने जैसे अर्णब गोस्वामी के समय आत्महत्या के लिए उकसाने वाले आरोप का जिक्र किया था, अब उसने मोहम्मद जुबैर के सारे हिन्दूफोबिया वाले ट्वीट्स का जिक्र क्यों नहीं किया?

अगर ये संस्था पत्रकारों के हितों की बात करती है तो फिर इसे राष्ट्रवाद से क्या दिक्कत? हिन्दू एकता को ध्रुवीकरण का नाम देकर इसे क्यों भला-बुरा कह रहे ये? पत्रकारिता की बात करें ना। सत्ताधारी पार्टी से इनकी क्या दुश्मनी? बंगाल में पत्रकारों पर हमले पर हमले होते हैं, तब ये कहाँ चले जाते हैं? तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या TMC का नाम तो छोड़िए, एक बयान तक नहीं आता। छत्तीसगढ़ और आंध्र में पत्रकार गिरफ्तार किए जाते हैं तब इनकी घिग्घी बँधी रहती है, क्योंकि वहाँ इनके आकाओं की सरकार होती है।

अवलोकन करें:-

‘हनीमून होटल’ को ‘हनुमान होटल’ बताने वाला मोहम्मद जुबेर गिरफ्तार ; राहुल गाँधी ने कहा- ऐसी हजार

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
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असल में इनका काम पत्रकारिता है ही नहीं। इनका कार्य है कॉन्ग्रेस और TMC जिसे दलों के साथ मिल कर भाजपा विरोधी एजेंडा चलाना और इसी के तहत ये तय करते हैं कि किस पत्रकार को मार भी डाला जाए तो चूँ नहीं करना है और किसे मच्छर भी काट ले तो देश-दुनिया में हंगामा मचाना है। अब इनकी कोशिश होगी कि हर एक घटना के नैरेटिव का उर्दू और अरबी में अनुवाद कर के अपने क़तर के आकाओं को भेजें और उनसे बयान जारी करवाएँ।

भाजपा को बदनाम करने के लिए फेक न्यूज फैलाती एडीटर्स गिल्ड की नई अध्यक्ष सीमा मुस्तफा

मीडिया में भारतीय जनता पार्टी विरोधी पत्रकारों की कोई कमी नहीं, भारतीय जनसंघ की स्थापना लेकर आज तक आज तक एक लम्बी सूची है। वास्तव डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले दिन से तत्कालीन कांग्रेस ने मीडिया को जनसंघ वर्तमान भाजपा के विरुद्ध ऐसी डोज़ दे थी, जिसका असर अभी और कितने वर्ष रहेगा कहना मुश्किल है। 

भाजपा एवं संघ समर्पित पत्र-पत्रिकाओं को छोड़ किसी भी अन्य ने आज तक यह बताने की आखिर सरकार की कश्मीर को लेकर बनी घातक नीति के कारण डॉ मुखर्जी ने केन्द्रीय मंत्री पद त्याग भारतीय जनसंघ की स्थापना की और अपने उद्देश्य की पूर्ति करने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। लेकिन उन प्राणों की आहुति के कई वर्षों उपरांत कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त हुआ। 

कहने का अभिप्राय है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया का अध्यक्ष शेखर गुप्ता हो सीमा मुस्तफा, हैं सभी भाजपा विरोधी।   
सीमा मुस्तफा को एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का नया अध्यक्ष चुना गया है। लेकिन इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठने वाली यह महिला पत्रकार मोदी सरकार और भाजपा की धुर विरोधी है। सीमा मुस्तफा भाजपा से इतनी अधिक नफरत करती हैं कि वे उसके खिलाफ और भाजपा की सरकारों के खिलाफ फेक न्यूज फैलाने से भी नहीं चूकती हैं।

सीमा मुस्तफा के कुछ ट्वीट दिखाते हैं जो यह साबित करते हैं कि यह महिला पत्रकार किस प्रकार कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों की पिछलग्गू है।

कांग्रेस और लेफ्ट परस्त पत्रकार के एडीटर्स गिल्ड की अध्यक्ष बनने पर सोशल मीडिया पर जमकर गुस्सा निकाल रहे हैं।


क्या एडिटर्स गिल्ड के चीफ शेखर गुप्ता पत्रकार बिरादरी के खिलाफ काम कर रहे हैं?

क्या एडिटर्स गिल्ड के चीफ शेखर गुप्ता पत्रकार बिरादरी के खिलाफ काम कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि क्योंकि आज जब कुछ लोग पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहे हैं, तब शेखर गुप्ता पत्रकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने के बजाय विरोधी पक्ष के साथ खड़े हैं।

अक्टूबर 5 को बॉलीवुड के प्रमुख निर्माताओं ने फिल्म जगत की छवि बिगाड़ने का आरोप लगाकर रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ न्यूज चैनल और चार पत्रकारों के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर किया। चार पत्रकारों में रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी और पत्रकार प्रदीप भंडारी, टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक राहुल शिवशंकर और समूह संपादक नविका कुमार शामिल हैं। याचिका में बॉलीवुड को लेकर गैर जिम्मेदाराना, अपमानजनक और बदनाम करने वाली बयानबाजी और मीडिया ट्रायल्स करने से रोकने की अपील की गई है। याचिका दायर करने वालों में चार फिल्म इंडस्ट्री एसोसिएशनों के साथ आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान, करण जौहर, अजय देवगन, अनिल कपूर, रोहित शेट्टी के प्रोडक्शन हाउस भी शामिल हैं।

फिल्म निर्माताओं की ओर से दायर ये याचिका पत्रकारों को खबर तक पहुंच और आम लोगों तक जानकारी को पहुंचाने से रोकने के लिए हैं। ऐसे में एडिटर्स गिल्ड की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है कि सभी पत्रकार एक साथ आकर इस तरह के कदम को विरोध करें, लेकिन एडिटर्स गिल्ड के चीफ शेखर गुप्ता खुद पत्रकारों की जगह बॉलीवुड के समर्थन में आगे आ गए हैं। शेखर गुप्ता ने ट्वीट किया, “झूठे इल्जामों के खिलाफ सामूहिक कानूनी कार्रवाई बॉलीवुड के लिए एक टर्निंग प्वाइंट हो सकती हैं। इससे ‘उद्योग’ को एक संस्था की तरह देखने की हिम्मत मिलेगी और एक संस्था में हमेशा रीढ़ होनी चाहिए।”

शेखर गुप्ता का ट्वीट पोस्ट होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें लताड़ लगानी शुरू कर दी।

कहते हैं अगर व्यक्ति सकारात्मक सोंच रखता है, वह किसी बुराई से भी सकारात्मक शब्द निकालने में समर्थ होता, परन्तु नकारात्मक सोंच वाले को सकारात्मक में भी नकारात्मक ही हाथ लगता है। जिसे चरितार्थ कर रहे हैं कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री मनीष तिवारी, जो अपने अनुभव अपने ट्वीट में बता रहे हैं। यानि जो जैसा होता है सामने वाले को भी वैसा ही समझता है। जिस तरह इन्होंने अपने यूपीए कार्यकाल में मीडिया को अपने कब्जे में कर, इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेगुनाह हिन्दू साधु-संतों को जेलों में डाल रहे थे। इन्हीं के तत्कालीन गृह मंत्री सुशील शिंदे "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" नाम से हिन्दू होते हुए हिन्दू धर्म को अपमानित कर रहे थे। चलो देर आए दुरुस्त आए, सच्चाई कबूल दी।   


क्या EGI अध्यक्ष शेखर गुप्ता झूठी खबर फ़ैलाने में विशेषज्ञ हैं?

शेखर गुप्ता - विकिपीडिया
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
पत्रकारिता जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, को एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष पद पर बैठे शेखर गुप्ता ही कलंकित कर रहे हैं। इतने प्रतिष्ठित पद पर आसीन ही भ्रामक समाचार प्रसारित करेंगे, दूसरों को क्या कहें? अगर इनसे किसी पत्रकार के विरुद्ध भ्रामक यानि फेक न्यूज़ के विरुद्ध शिकायत करने पर क्या किसी कार्यवाही की अपेक्षा की जा सकती है? पत्रकार होते हुए, शेखर को इस बात का भी ज्ञान होना चाहिए कि भ्रामक ख़बरों से देश का माहौल ख़राब होता है। दूसरे, कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा तुष्टिकरण के चलते भारत के वास्तविक इतिहास धूमिल करने से देश का कितना अपमान हुआ है, देशवासी को अपने असली इतिहास से अज्ञान होने के कारण किस तरह साम्प्रदायिक आग में कितने लोगों की जानें स्वाह हो चुकी हैं। विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहाँ वास्तविक इतिहास की बात करने वालों को हिन्दुवादी, साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, देश में शांति का दुश्मन और पता नहीं कितने नामों से बदनाम किया जा रहा है। 
वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट शेखर गुप्ता फेक न्यूज फैलाने के लिए कुख्यात हैं। एक बार फिर उन्होंने गलत खबर फैला कर कर्नाटक सरकार और बेंगलुरु पुलिस को बदनाम करने की कोशिश की, लेकिन Asianet News ने शेखर गुप्ता की पोल खोल दी।
दरअसल, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के नाते शेखर गुप्ता ने एक पत्र जारी किया जिसमें लिखा गया है कि 11 अगस्त को नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में खबर करने गए कारवां के पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई और उसी दिन बेंगलुरु में खबर कवर कर रहे इंडिया टुडे, द न्यूज मिनट और सुवर्ण न्यूज 24X7 के पत्रकारों पर सिटी पुलिस द्वारा हमला किया गया। ये सभी पत्रकार उस समय ड्यूटी पर थे। ये दोनों घटनाएं निंदनीय है। 
आखिर किसके इशारे पर शेखर ने इस फेक न्यूज़ को फैलाया और क्यों? क्या शेखर ने पत्रकारिता नियमों का उल्लंघन नहीं किया? 80 के दशक तक फिल्म पत्रकारिता "येलो जर्नलिज्म" कहलाती थी, लेकिन शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों ने सारी पत्रकारिता को "येलो जर्नलिज्म" बना दिया। अगर शेखर जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते देश के वास्तविक इतिहास को प्रकाश में लाने का प्रयास किया होता, देश में साम्प्रदायिक दंगों में बेगुनाहों को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ता।
 
दूसरे, यह कि जब किसी गैर-मुस्लिम के इष्ट देवी-देवताओं पर व्यंग किया जाता है, क्यों ये ही पत्रकार खामोश रहते हैं? यही देश में फिरकापरस्ती का माहौल फैलाते हैं, जब व्यंग बर्दाश्त नहीं होता, फिर दूसरों पर भी नहीं करना चाहिए। जब पेंटर एम.एफ.हुसैन हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बना रहा था, देश के कितने पत्रकारों ने उसका विरोध किया था? और चर्चित होने पर जब उसी हुसैन पेंटर को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था, तब भी सब चुप्पी साधे रहे, क्यों? क्या इसी का नाम पत्रकारिता है, कि सरकारी प्रलोभन के लिए सरकारी तुष्टिकरण का पालन करते रहो? 

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट शेखर गुप्ता के इस पत्र का Asianet News (सुवर्ण न्यूज) ने गलत बताया है। Asianet News Network Private Limited ने लेटर जारी कर कहा है कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है। उनके पत्रकारों पर हमला बेंगलुरु सिटी पुलिस द्वारा नहीं बल्कि उन्मादी भीड़ द्वारा किया गया और उनके पत्रकारों को पिटा गया। उसके तीन रिपोर्ट्स घायल हैं और इस संबंध में बेंगलुरु में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है।
शेखर गुप्ता की इस फेक न्यूज़ के कारण ट्विटर पर लोगों की प्रतिक्रियाएं :

 

शेखर गुप्ता फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं और अब नया मामला उनके एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के नाते सामने आया है। सवाल यह है कि हकीकत जाने बगैर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और शेखर गुप्ता ने आखिर बेंगलुरु पुलिस को बदनाम करने की कोशिश क्यों की?
फिर शेखर जैसे किसी भी पत्रकार ने नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में हो रहे धरनों और प्रदर्शनों में मुखरित हो रहे हिन्दू और हिन्दुत्व के विरुद्ध लग रहे नारों का विरोध नहीं किया। अगर यही नारे इस्लाम के विरुद्ध लग रहे होते, तब इनकी नींद खुलती और "हिन्दू आतंकवाद", "भगवा आतंकवाद" और "हिन्दू साम्प्रदायिक" आदि नामों से इस्लाम के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए आसमान सिर पर उठाए आधी रात को अदालतें खुलवा देते। 

Editors Guild के शेखर गुप्ता को नहीं पता तेलंगाना-आंध्र में अंतर


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक समय था, जब पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ ही नहीं, बल्कि सरकार, नेता और समाज का आईना कहा जाता था। फिल्म लेखन को "पीली पत्रकारिता"(Yellow journalism) कहा जाता था, लेकिन 90 के दशक से पत्रकारिता के अर्थ बदलने लगे। पत्रकार और समाचारपत्र प्रकाशन समूह 'जहाँ दिखे तवा परत, वहीं बिता सारी रात' नीति पर चल निकले। यह कोई आरोप नहीं कटु सत्य है। देखिए प्रमाण :
कल तक युपीए के कार्यकाल तक जो मीडिया 2002 दंगे पर मोदी को, रामजन्मभूमि पर आरएसएस, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद्, शिव सेना और अन्य हिन्दू संगठनों को कटघड़े में खड़ा करती थी, आज अधिकतर मीडिया इन्हों को सिर माथे पर बैठाए हुए है। किसी आतंकवादी घटना को "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" से जोड़ हिन्दू धर्म को कलंकित कर रहे थे, अधिकतर मीडिया आतंकवादी घटना को पाकिस्तान के छद्दम युद्ध से जोड़ रही है। अब पीली पत्रकारिता का एक और उदाहरण देखिए, आखिर कहाँ जा रहा है, लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ?:-        
अपने आप को देश में पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से लेकर राजनीति और देश में पढ़ने-लिखने से जुड़ी हर चीज़ का चौधरी मानने वाले सम्पादकों के समूह एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने आंध्र सरकार की आलोचना करने में बहुत बड़ी बेवकूफ़ी कर दी- आंध्र प्रदेश को तेलंगाना और आंध्र के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी को तेलंगाना का मुख्यमंत्री बता दिया। यही नहीं, देश के सबसे ज़्यादा छपने और पढ़े जाने वाले अख़बारों में से एक होने का दम भरने वाले Times Of India ने भी वही गलत खबर को आगे बढ़ा दी- यानि देश के सबसे बड़े तोपची सम्पादकों, और ‘सबसे बड़े’ अंग्रेजी समाचारपत्र को चलाने वालों को या तो देश के मुख्यमंत्रियों के बारे में भी ठीक से जानकारी नहीं है, और या फिर एडिटर्स गिल्ड ने गलती की तो की, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भी ‘मालिक साहब’ लोगों से आई खबर को छापने से पहले पढ़ने तक की ज़हमत नहीं उठाई।
दो टीवी चैनलों पर अघोषित प्रतिबन्ध का आरोप 
एडिटर्स गिल्ड ने अपने पत्र/बयान में आंध्र के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी पर दो तेलुगु भाषी टीवी चैनलों TV5 और ABN पर अघोषित प्रतिबंध का आरोप लगाया था। माना जाता है कि दोनों चैनल राज्य सरकार सरकार की आलोचना करने वाले थे। एडिटर्स गिल्ड ने इसे प्रेस की आज़ादी के खिलाफ बताया और आंध्र प्रदेश सरकार से इस मामले पर स्पष्टीकरण की माँग की। उन्होंने पूछा कि क्या सरकार ने इन दोनों चैनलों के प्रसारण को रोकने वाला कोई आदेश दिया था, और अगर दिया था तो गिल्ड ने उसे हटाने की माँग की।
यहाँ तक तो बात सही थी, लेकिन गिल्ड ने गड़बड़ यह कर दी कि मूल बयान में आंध्र की जगह तेलंगाना लिख दिया, और उसी का सीएम जगन को बनाकर आलोचना शुरू कर दी।
Times of India ने भी बिना संपादन के प्रकाशित कर दिया 
यह अपने आप में इतनी बड़ी कोई बात न होती, लेकिन इसके बाद Times Of India ने जब उसी, इतनी ‘basic सी’ गलती को जस-का-तस दोहरा दिया तो यही चीज़ एक बड़ी भूल बन गई।
ये भी 'tyranny of distance' है क्या?

Editors Guild पर तंज़ कसते हुए रिपब्लिक टीवी की दक्षिण भारत ब्यूरो प्रमुख पूजा प्रसन्ना ने कहा कि आंध्र और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों का नाम न पता होना अक्षम्य है। उन्होंने साथ ही तन्ज़ कसा कि क्या यह भी ‘tyranny of distance’ के चलते हुए है। गौरतलब है कि जब लिबरल गैंग को इस बात पर घेरा गया था कि वह दादरी मॉब लिंचिंग को लेकर असहिष्णुता का पुलिंदा गढ़ने में जुटा है, जबकि बंगाल में बशीरहाट दंगों जैसी इस्लामी भीड़ की दर्जनों घटनाओं पर उसका ध्यान नहीं जाता, तो लिबरल गैंग के पत्रकारों ने इस ‘tyranny of distance’ के पीछे छिपने की कोशिश की थी। बहाना दिया था कि चूँकि बंगाल और अन्य कई राज्य उनके चैनलों के दिल्ली स्थित मुख्यालयों से दूर पड़ते हैं, इसलिए वहाँ की खबरें ठीक से कवर नहीं हो पातीं। यह मज़हबी भेदभाव या सेलेक्टिवनेस नहीं, दूरी की मजबूरी (‘tyranny of distance’) है।