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जो पत्रकार नहीं एडिटर्स गिल्ड को उसकी चाहिए रिहाई, जो एडिटर इन चीफ उस पर खानापूर्ति: जुबैर और अर्नब में ऐसे फर्क करता है इकोसिस्टम

नूपुर शर्मा के मुद्दे पर निष्पक्ष रूप से कहा जा रहा है कि हिन्दू नूपुर को इस्लामिक किताब में लिखी बात को बोलने के लिए उकसाने वाले तस्लीम रहमानी, और उसी बात को पैगम्बर का अपमान बताकर देश में हंगामा करवाने वाले altnews के मोहम्मद जुबेर का कोई नाम नहीं लेता, क्यों? चलो देर आये दुरुस्त आये, हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा फ़ैलाने वाले मोहम्मद जुबेर को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर उचित न्याय की ओर सही कदम है। ये वही जुबेर है जो एक ही दिन में हिन्दू घृणा वाले 28 ट्वीट डिलीट करता है।  
हिन्दू देवी-देवताओं का खुलेआम अपमान करने वाले मोहम्मद जुबैर की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी पर ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने लंबा-चौड़ा बयान जारी किया है। इसमें AltNews के सह-संस्थापक की गिरफ़्तारी की निंदा करते हुए कहा गया है कि 2018 के एक ट्वीट को लेकर 27 जून, 2022 को ये कार्रवाई की गई। EGI ने दिल्ली पुलिस से मोहम्मद जुबैर को तुरंत रिहा करने की माँग की है।

गिल्ड ने अपने बयान में कहा, “घटनाओं को विचित्र मोड़ देते हुए दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मोहम्मद जुबैर को पूछताछ के लिए बुलाया था। ये 2020 का मामला था, जिसमें उच्च न्यायालय ने उन्हें गिरफ़्तारी से राहत दे रखी है। जब जुबैर ने समन पर प्रतिक्रिया दी तो उन्हें इसी महीने शुरू की गई एक आपराधिक जाँच के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। एक अज्ञात पहचान वाले ट्विटर हैंडल ने उनके 2018 के एक ट्वीट पर धार्मिक भावनाएँ भड़काने का आरोप लगाया था।” मोहम्मद ज़ुबैर ट्विटर पर कह चुका है कि वो पत्रकार नहीं है, फिर उसके लिए EGI सामने क्यों आया?

इस बयान में कहा गया है कि IPC की धाराओं 153 और 295 लगा कर मोहम्मद जुबैर को गिरफ्तार किया जाना काफी आकुल करने वाला है, क्योंकि उसकी वेबसाइट AltNews ने पिछले कुछ समय में फेक न्यूज़ को चिह्नित करने में ‘उदाहरण पेश करने वाले’ कार्य किए हैं और ‘दुष्प्रचार अभियानों को काटा’ है। EGI का कहना है कि मोहम्मद जुबैर ने ये सब तथ्यात्मक और वस्तुनिष्ठ तरीके से किया है। साथ ही संस्था ने कहा कि टीवी पर सत्ताधारी पार्टी के एक प्रवक्ता के ‘ज़हरीले बयान’ का खुलासा था, जिस कारण पार्टी को बदलाव करना पड़ा।

अर्णब गोस्वामी EGI के लिए पत्रकार होते हुए भी पत्रकार नहीं हैं। मोहम्मद जुबैर खुद को पत्रकार न बताते हुए भी इनके लिए पत्रकार है। तभी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया सेलेक्टिव आउटरेज का एक बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है, जहाँ वो खुद चुनता है कि कब किसकी गिरफ़्तारी को छिपाना है और किसे उठाना है। अब संस्था बताए कि क्या वो जुबैर के हिन्दू देवी-देवताओं वाले ट्वीट्स-पोस्ट्स का समर्थन करता है? वो खुद को खुलेआम हिन्दू विरोधी घोषित कर दे फिर।

वहीं अर्णब गोस्वामी को जब उन्हें और उनके परिवार को प्रताड़ित करते हुए उद्धव ठाकरे सरकार की मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था, तब EGI ने काफी दबाव के बाद दो पैराग्राफ में बयान जारी कर इतना लिख इतिश्री कर ली थी कि पुलिस उनके साथ अच्छा व्यवहार करे। रिहाई की माँग नहीं की गई थी और जिन आरोपों के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था, उन्हें हाइलाइट किया गया था। जबकि जुबैर के मामले में उसके अपराधों के बारे में कुछ नहीं बताया गया है और सीधा उसे छोड़ने की माँग की गई है।

वहीं मोहम्मद जुबैर के समय EGI खुद ही जज बन बैठा है और कह रहा है कि AltNews की ‘सतर्क चौकसी’ ने उन लोगों को नाराज़ कर दिया था, जो दुष्प्रचार को एक हथियार बना कर समाज का ध्रुवीकरण करते हैं और राष्ट्रवादी भावनाओं को उकसाते हैं। एक तरह से ऐसा लग रहा है जैसे ये किसी विपक्षी पार्टी का बयान हो, पूर्णतः राजनीतिक। लोकतंत्र को लेकर G7 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता की याद दिलाते हुए एडिटर्स गिल्ड ने ऑफलाइन और ऑनलाइन कंटेंट्स की सुरक्षा की सलाह दी है।

अब सवाल उठता है कि जो खुलेआम खुद को पत्रकार ही नहीं मानता, उसकी रिहाई के लिए ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने क्यों दिन-रात एक किया हुआ है? जबकि जो उस समय भारत के सबसे ज्यादा टीआरपी वाले चैनल का मैनेजिंग डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ है, उसके लिए सिर्फ खानापूर्ति की गई थी। EGI ने जैसे अर्णब गोस्वामी के समय आत्महत्या के लिए उकसाने वाले आरोप का जिक्र किया था, अब उसने मोहम्मद जुबैर के सारे हिन्दूफोबिया वाले ट्वीट्स का जिक्र क्यों नहीं किया?

अगर ये संस्था पत्रकारों के हितों की बात करती है तो फिर इसे राष्ट्रवाद से क्या दिक्कत? हिन्दू एकता को ध्रुवीकरण का नाम देकर इसे क्यों भला-बुरा कह रहे ये? पत्रकारिता की बात करें ना। सत्ताधारी पार्टी से इनकी क्या दुश्मनी? बंगाल में पत्रकारों पर हमले पर हमले होते हैं, तब ये कहाँ चले जाते हैं? तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या TMC का नाम तो छोड़िए, एक बयान तक नहीं आता। छत्तीसगढ़ और आंध्र में पत्रकार गिरफ्तार किए जाते हैं तब इनकी घिग्घी बँधी रहती है, क्योंकि वहाँ इनके आकाओं की सरकार होती है।

अवलोकन करें:-

‘हनीमून होटल’ को ‘हनुमान होटल’ बताने वाला मोहम्मद जुबेर गिरफ्तार ; राहुल गाँधी ने कहा- ऐसी हजार

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‘हनीमून होटल’ को ‘हनुमान होटल’ बताने वाला मोहम्मद जुबेर गिरफ्तार ; राहुल गाँधी ने कहा- ऐसी हजार

असल में इनका काम पत्रकारिता है ही नहीं। इनका कार्य है कॉन्ग्रेस और TMC जिसे दलों के साथ मिल कर भाजपा विरोधी एजेंडा चलाना और इसी के तहत ये तय करते हैं कि किस पत्रकार को मार भी डाला जाए तो चूँ नहीं करना है और किसे मच्छर भी काट ले तो देश-दुनिया में हंगामा मचाना है। अब इनकी कोशिश होगी कि हर एक घटना के नैरेटिव का उर्दू और अरबी में अनुवाद कर के अपने क़तर के आकाओं को भेजें और उनसे बयान जारी करवाएँ।

अर्नब प्रकरण : अन्वय नाइक की पत्नी और उद्धव ठाकरे की पत्नी के बीच करोड़ों का जमीन सौदा --किरीट सोमैया, भाजपा नेता का दावा

रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी के मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। दरअसल, महाराष्ट्र भाजपा के तेज-तर्रार नेता किरीट सोमैया ने दावा किया है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के परिवार का स्वर्गीय अन्वय नाइक के परिवार के साथ जमीन की लेनदेन का मामला था। भाजपा नेता सोमैया ने कहा कि उनके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं, जो ठाकरे और नाइक परिवार के बीच हुए जमीन के सौदे को साबित करते हैं।

किरीट सोमैया ने ट्विटर के जरिए यह खुलासा करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र सरकार की वेबसाइट में मौजूद मुरुद रायगढ़ के भूमि रिकॉर्ड के मुताबिक उद्धव ठाकरे की पत्नी का अन्वय नाइक के परिवार के साथ भूमि का लेनदेन हुआ था। इस मामले से जुड़े दस्तावेज उन्होंने एसपी और कलेक्टर को भेज दिए हैं।

आगे उन्होंने लिखा है कि उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे ने मनीषा रविंद्र वायकर के साथ मिलकर दिवंगत अन्वय नाइक और अक्षिता नाइक से मार्च 2014 में 2.20 करोड़ रुपए की जमीन खरीदी थी। गौरतलब है कि अक्षिता नाइक, अन्वय नाइक की पत्नी हैं। इतना ही नहीं, अर्नब के मामले को जमीन के इस लेनदेन से जोड़ते हुए किरीट सोमैया ने उद्धव ठाकरे पर आरोप लगाया और पूछा कि क्या यह अर्नब गोस्वामी को फंसाने की वजह भी हो सकती है? उन्होंने अपने ट्वीट में कुछ दस्तावेज शेयर किया, जिन्हें वे इस जमीन सौदे से जुड़ा हुआ बता रहे हैं। 

अर्नब की तरह ही समित ठक्कर के खिलाफ भी महाराष्ट्र सरकार गुंडागर्दी पर उतारू

महाराष्ट्र सरकार की ज्यादतियों का शिकार बने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गई, लेकिन ऐसे और भी कई नाम हैं, जिन्हें महाराष्ट्र के जंगलराज का कोपभाजन बनना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के नेतृत्व में रोज-ब-रोज जंगलराज का नमूना पेश किया जा रहा है। उद्धव ठाकरे सरकार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सरकार के खिलाफ बोलने वालों को सरकारी अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है। ठाकरे के विरोध में आवाज उठाने वालों का दमन किया जाना आम बात हो गई है। ट्विटर पर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ टिप्पणी करने पर समित ठक्कर को नागपुर पुलिस ने 24 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया था। जमानत मिलने पर फिर उसे दूसरी जगह की पुलिस द्वारा फिर उठा लिया जाता है। एक खास मामले में जमानत मिलने पर उसे फिर गिरफ्तार कर लिया जाता है। दरअसल, सिर्फ एक ट्वीट के कारण समित ठक्कर को बार-बार गिरफ्तार कर उसके ऊपर अत्याचार किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ लोग मुखर हो रहे हैं और समित ठक्कर को रिहा करने की गुहार लगा रहे हैं।

अर्नब गोस्वामी : सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार, पूछा- आप किसी को कैसे धमका सकते हैं?

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी मामले पर आज (नवंबर 6, 2020) सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूरे मामले पर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके उनके पत्र पर उनसे दो हफ्तों में जवाब माँगा है।

इसके साथ ही कोर्ट ने अर्णब को राहत प्रदान करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि उन्हें वर्तमान कार्यवाही के बाद गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

लाइव लॉ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीजेआई ने महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को शीर्ष न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का नोटिस जारी किया और इसमें उनसे कारण बताने को कहा गया कि आखिर क्यों उनके द्वारा लिखे पत्र के विरुद्ध कार्यवाही नहीं शुरू की जानी चाहिए।

आज सुप्रीम कोर्ट में अर्णब की गिरफ्तारी का पूरा मामला वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने उठाया और अर्णब को किसी भी प्रकार की कार्रवाई से बचाने की अपील की। उन्होंने अर्णब की ओर से बताया कि उन्हें धमकी दी जा चुकी थी, “तुमने हमें गाली दी है। ये दीवाली तुम जेल में बिताओगे।”

कोर्ट ने सारा पक्ष सुनकर पूरे मामले पर हैरानी जताई कि आखिर किसी नागरिक को कोर्ट जाने से कैसे रोका सकता है। उसे कैसे धमकाया जा सकता है। सीजेआई ने नाराजगी महाराष्ट्र विधानसभा सचिव पर जाहिर करते हुए कि आखिर अनुच्छेद 32 किसलिए है?

सीजेआई ने कहा, “हमारे पास पत्र लिखने वाले के लिए गंभीर सवाल है और हमारे लिए इसे अनदेखा करना बेहद मुश्किल है।” सीजेआई विधानसभा सचिव के पत्र पर बोले, “ये न्याय की प्रक्रिया में व्यवधान है, पत्र लिखने वाले की भाषा अर्णब को धमकाने वाली है। ऐसा लगता है जैसे पत्र लिखने वाली की मंशा याचिकाकर्ता को डराने वाली थी क्योंकि उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।”

अर्णब गोस्वामी को बुधवार को बिना समन जारी किए जबरदस्ती घर से उठाया गया था। कुछ पुलिस अधिकारी उनके घर पहुँचे थे और उनके साथ मारपीट करते हुए उन्हें एक पुराने केस में गिरफ्तार किया था।

इसके बाद अर्णब की कई वीडियोज सामने आई थी। वीडियो में उनके शरीर पर मारपीट के निशान साफ नजर आए थे, जिसे देख जगह-जगह मुंबई पुलिस के रवैये की आलोचना हुई थी।

देर रात तक अदालत की सुनवाई चलने के बाद अर्णब को कल 18 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया जबकि मुंबई पुलिस लगातार 14 दिन की हिरासत का अनुरोध कर रही थी। अदालत ने पुलिस से कहा कि हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत नहीं है।

कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी से खतरे में प्रेस फ्रीडम

इन्दिरा गांधी की कांग्रेसी सरकार ने 25 जून, 1975 को भारतीय लोकतंत्र और प्रेस की आजादी को लेकर एक काला अध्याय जोड़ा था, लेकिन 4 नवंबर, 2020 को महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना सरकार उससे भी आगे निकल गई है।

इन्दिरा गाँधी ने आपातकाल में प्रेस सेंसरशिप लगा दी थी, लेकिन किसी पत्रकार को इस बेशर्मी से नहीं पकड़ा। मुझसे भी वरिष्ठ पत्रकार और नेता इस बात को जानते होंगे कि दैनिक The Motherland और Organiser साप्ताहिक के मुख्य संपादक (स्व)केवल रतन मलकानी और इन्दिरा के बीच 36 का आंकड़ा था, आपातकाल लगाते ही पुलिस ने दीनदयाल शोध संस्थान(उस समय The Motherland और Organiser साप्ताहिक यहाँ से प्रकाशित होते थे), झंडेवालान और राजेंद्र नगर स्थित मलकानी के निवास स्थान को चारों तरफ घेर बिना किसी बदतमीजी किये उन्हें मीसा में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन शिव सेना-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने तो इंदिरा गाँधी को भी बहुत पीछे छोड़ दिया। 

अगर महाराष्ट्र सरकार ने अर्नब के विरुद्ध उस पुराने मुद्दे, जिसकी किन्ही कारणों से, फाइल पहले ही बंद हो चुकी है, उसको खोल छोटे पेंगुइन को बचाने के लिए अर्नब की आवाज़ दबाने के जो लिए कुचक्र किया है, वह बहुत ही निंदनीय है। पहले अर्नब को नोटिस देना था, संतुष्ट न होने पर कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी थी, लेकिन जल्दीबाजी की हड़बड़ी में सबकुछ चौपट हो गया। दूसरे, चर्चा यह भी है कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नीस और उद्धव ठाकरे के बीच क्या बातचीत हुई थी? क्योंकि जिस केस को खोला गया है, वह देवेंद्र के कार्यकाल का है। सुशांत सिंह हत्या परिचर्चा में अर्नब ने इस मीटिंग पर भी वार किया था।

वास्तव में सुशांत कांड ने कई मुद्दों को उजागर कर दिया था, जिससे महाराष्ट्र सरकार, बॉलीवुड और ड्रग माफिया तक लपेटे में आ गए हैं। पुलिस कमिश्नर परवीन सिंह केवल एक मोहरा है, क्योंकि पुलिस को सरकार के आदेशों का पालन करना होता है। 

कोर्ट द्वारा उल्लेखित किये गए प्रश्नचिन्ह 

 पुलिस हिरासत में रखने का कोई आधार नहीं;

अदालत की अनुमति के बिना पुराने केस की बंद फाइल को खोला गया;

आत्महत्या और अर्नब गोस्वामी के बीच कोई सम्बन्ध नहीं;   

मुंबई पुलिस ने दावा करते हुए कहा था कि जिस मामले को अदालत ने साल 2018 में बंद कर दिया था उसमें पुलिस को नए सबूत हासिल हुए हैं। इसकी वजह से उन्हें मामले की जाँच के लिए अर्णब गोस्वामी को पुलिस हिरासत में रखने की माँग उठाई थी। 6 घंटे की मैराथन सुनवाई के बाद अदालत ने पुलिस हिरासत की माँग को ठुकराते हुए अर्णब को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। 

अदालत ने कहा इस मामले में पुलिस हिरासत के लिए कोई अर्थपूर्ण आधार नहीं हैं। इसके अलावा अदालत ने यह भी कहा कि मामले आत्महत्या और अर्णब गोस्वामी की भूमिका के बीच संबंधों की कोई कड़ी नज़र नहीं आती है। न्यायाधीश ने इस बात का भी उल्लेख किया कि यह एक पुराना मामला है जिसकी फाइल बंद हो चुकी थी और इसे बिना अदालत की अनुमति के शुरू किया गया है।

रिपब्लिक टीवी की रिपोर्ट्स के अनुसार अदालत ने अर्णब गोस्वामी के वकील को जमानत संबंधी दस्तावेज़ तैयार रखने के लिए कहा है। आज सुबह अलीबाग अदालत में इस मामले की सुनवाई होगी। इसी दौरान मुंबई उच्च न्यायालय साल अर्नब गोस्वामी द्वारा दायर की गई 2018 के इस मामले को ख़त्म करने की याचिका पर भी सुनवाई करेगी।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन चीफ अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार कर पत्रकार बिरादरी में खौफ पैदा करने की कोशिश की। महाराष्ट्र सरकार ने पत्रकारों को ये संदेश देने की कोशिश की है कि खिलाफ जाने पर हर हाल में भुगतना पड़ेगा। किसी समाचार चैनल के प्रमुख को बिना किसी पूर्व नोटिस के सुबह-सुबह एक आतंकवादी की तरह गिरफ्तार कर घसीटकर ले जाया जाना कांग्रेसी फासिज्म का उदाहरण है। अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर प्रेस बिरादरी के लोग आहत हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।

अर्नब की गिरफ़्तारी पर मिलीजुली प्रक्रियाएं :-


अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर AAP और कांग्रेस नेता-समर्थक खुलेआम मना रहे जश्न

फासीवाद का रोना रोने वाले आम आदमी पार्टी और कांग्रेस नेता और समर्थक मुंबई पुलिस द्वारा अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर जश्न मनाते हुए नजर आ रहे हैं। बता दें कि सत्ता में बैठे उद्धव सरकार के इशारे पर मुंबई पुलिस के अधिकारी AK-47 के साथ अर्णब के घर, उन्हें गिरफ्तार करने पहुँचे।

कथित तौर पर उन्होंने न सिर्फ रिपब्लिक चीफ अर्णब के बाल खिंचे बल्कि उनके बेटे को भी मारा और उनके ससुराल वालों से बद्तमीजी भी की। यह गिरफ्तारी पुलिस ने अदालत द्वारा बंद किए गए 2018 के केस में की है।

वहीं एक पत्रकार की गिरफ्तारी की निंदा करने के बजाय, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक और नेता इस मामले में खुश होते हुए नजर आए।

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता ने ट्विटर पर कहा कि अर्णब किसी भी प्रकार से सहानुभूति के हकदार नहीं हैं। यह कह कर उन्होंने मुंबई पुलिस द्वारा किए गए बल प्रयोग को भी सही ठहराया। इसके अलावा कांग्रेस नेताओं ने अर्णब की गिरफ्तारी का श्रेय भी लिया।

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी का श्रेय लेने की होड़ में कांग्रेसी नेता इतना खो गए कि उन्होंने 2018 आत्महत्या के मामले में हुए उन्मूलन के बारे में गलत सूचना फैलाना शुरू कर दिया।

गौरव पांडे और रुचिरा चतुर्वेदी जैसे कांग्रेसी नेताओं ने 2018 में आत्महत्या मामले की रिपोर्ट का हवाला भी दिया। हालाँकि इन लोगों ने मुंबई पुलिस द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट के बारे में बताना सही नहीं समझा।

अन्य लोगों ने भी अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी की खुशी मनाई।

इस मामले में राहुल गाँधी के प्रशंसक ने भी मुंबई पुलिस की सराहना की।

फ्रीडम ऑफ स्पीच का हवाला देते हुए हमेशा से मातम मनाने वाले भी इस मामले में जश्न मनाने में पीछे नहीं दिखे।

मुखौटा पहनकर प्रोपेगैंडा फैलाने वाले फैक्टचेकर भी अर्णब की गिरफ्तारी पर अपने फ्रीडम ऑफ स्पीच की लड़ाई भूलते हुए नजर आए।

 अर्णब गोस्वामी ने खुद इस बात का खुलासा किया कि उन्हें जबरदस्ती ले जाया जा रहा और मुम्बई पुलिस ने उनसे और उनके परिजनों ने मारपीट की है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस समर्थक इन बातों से मुँह फेरते हुए पुलिस के इस कारनामे पर उनकी प्रशंसा करते हुए नजर आए। 

कल तक फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का रोने वालों का अर्नब की गिरफ़्तारी पर ख़ुशी व्यक्त करने पर लोगों ने ट्विटर पर इनको बेनकाब कर रहे हैं:-

क्या महाराष्ट्र में आपातकाल जैसे हालात हैं?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 

जिस तरीके से रिपब्लिक टीवी के मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार किया गया है, 1975 में देश में लगी इमरजेंसी के दौरान दैनिक The Motherland और Organiser साप्ताहिक के मुख्य संपादक केवल रतन मलकानी(स्व) की गिरफ़्तारी को तरोताजा कर दिया है। इमरजेंसी लगते ही, The Motherland के ऑफिस और मलकानी जी के घर को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया था। शायद मेरे से वरिष्ठ पत्रकार और नेता भी मलकानी जी गिरफ़्तारी को नहीं भूले होंगे और अगर भूल गए होंगे, तो अर्नब ने लगभग 45 वर्ष पूर्व मलकानी जी को याद करवा दिया है। 
महाराष्ट्र की कांग्रेस शिवसेना सरकार ने एक बार फिर इमरजेंसी की याद दिला दी है। उद्धव ठाकरे सरकार की मुंबई पुलिस ने बुधवार तड़के रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी के घर पहुंच उनके साथ मारपीट की फिर गिरफ्तार कर अपने साथ ले गई। फ्रीडम ऑफ प्रेस पर कांग्रेस-शिवसेना सरकार ने प्रहार किया है। कांग्रेस के साथ शिवसेना ने यह कदम उठाकर एक तरह से अघोषित आपातकाल का संकेत दे दिया है। अर्नब की गिरफ्तारी को लेकर सोशल मीडिया पर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर लोग अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं।

महाराष्ट्र में आपातकल जैसी स्थिति हो गई है। उद्धव सरकार के खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने के लिए अब मुंबई पुलिस दमन पर उतर आई है। मीडिया का गला घोंटने के लिए मुंबई पुलिस ने आत्महत्या के एक पुराने और बंद पड़े मामले में बुधवार सुबह रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन चीफ अर्नब गोस्वामी पर कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया। यहां तक कि पुलिस ने बिना किसी दस्तावेज के, अर्नब के घर में घुसकर उनके साथ मारपीट की। इसके बाद गिरफ्तार कर अपने साथ पुलिस वैन में ले गई।

अर्नब ने पुलिस पर अपने साथ मारपीट का आरोप लगाया। रिपब्लिक टीवी ने अर्नब के घर के लाइव फुटेज भी दिखाए जिसमें पुलिस और अर्नब के बीच झड़प होती दिख रही है। अर्नब गोस्वामी का कहना है कि मुंबई पुलिस ने उनकी सास, सुसर, बेटे और पत्नी के साथ मारपीट की। रिपब्लिक टीवी पर प्ले की गई वीडियो के मुताबिक मुंबई पुलिस ने अर्नब गोस्वामी के साथ भी मारपीट की।

जब अर्नब को जबरदस्ती पुलिस वैन में बिठाया जा रहा था, तब उन्होंने कैमरे को देखकर कुछ बोलने की कोशिश की। वैन की खिड़की से उन्होंने बोला- “उन्होंने मेरे बेटे के साथ मारपीट की। मेरे रिश्तेदारों से मिलने नहीं दिया। मेरे साथ मेरे घर में मारपीट की गई। मैं चाहता हूं कि भारत की न्याय व्यवस्था और देश के लोग इसे देखें।”

सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर और अर्नब की पत्नी सम्यब्रता रे गोस्वामी ने कहा कि पुलिस ने अर्नब गोस्वामी के साथ गलत व्यवहार किया और जांच अधिकारी ने अर्नब को ये कहते हुए धमकी दी कि “मैं कुछ भी कर सकता हूं।” हमारे कैमरे तब तक चालू नहीं थे, लेकिन उन्होंने अर्नब की पिटाई कर दी, उन्होंने अपने भी कैमरे बंद कर दिए। उन्होंने उन्हें बालों से पकड़ रखा था। अर्नब ने कहा कि उन्हें वकील चाहिए। उन्होंने मुझे कुछ कागज पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया।

सम्यब्रता रे गोस्वामी ने कहा कि पुलिस ने अर्नब से कहा कि वे उन्हें रायगढ़ पुलिस स्टेशन ले जाएंगे। लगभग 20 मिनट तक अर्नब कहते रहे कि मुझे दवाइयां लेने दो, हम अपने माता-पिता को भी नहीं बता सके, वहां महिला पुलिसकर्मी थी जिन्होंने हमें रोका।”

गौरतलब है कि मुंबई पुलिस के एक दर्जन से अधिक अधिकारी सुबह 6:30 बजे मुंबई के परेल में अर्नब के आवास पर पहुंचे और सभी प्रवेश और निकास मार्गों को ब्लॉक कर दिया। पुलिस ने रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के संपादकों निरंजन नारायणस्वामी और संजय पाठक को भी अर्नब के निवास में प्रवेश करने से रोक दिया।

मुंबई पुलिस के एनकाउंटर-विशेषज्ञ एपीआई सचान वेज़ ने रिपब्लिक को पुष्टि की कि अर्नब गोस्वामी को एक ऐसे मामले में गिरफ्तार किया गया है, जिसका टीआरपी मामले से कोई लेना-देना नहीं है, जिसमें रिपब्लिक को फंसाने की कोशिश की गई है। मिली जानकारी के अनुसार अब उन्हें रायगढ़ पुलिस स्टेशन ले जाया गया। अर्नब गोस्वामी को 2018 में इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक और उनकी मां कुमुद नाइक की आत्महत्या की जांच के सिलसिले में गिरफ्तार किया है।

अर्नब के विरुद्ध की गयी इस कार्यवाही पर लोगों की प्रक्रियाएं :-