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नरेंद्र मोदी को भगवान श्रीराम ने ही चुना, प्राण प्रतिष्ठा से पहले बोले आडवाणी: पांचजन्य-ऑर्गेनाइज़र सम्पादकीय मीटिंग में अडवाणी ने कहा था: "जब तक केंद्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की बहुमत की सरकारें नहीं होंगी मंदिर नहीं बनेगा"

90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी के साथ वर्तमान पीएम मोदी (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)
राम मंदिर को जनआंदोलन में बदलने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि रथयात्रा के समय उन्हें अहसास हो गया था कि नियति ने तय कर दिया है कि अयोध्या में राम मंदिर ही बनेगा। उन्होंने खुद को सारथी बताया। साथ ही राममंदिर के सुख क्षण लाने के उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई भी दी। 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा समारोह में आडवाणी भी मौजूद रहेंगे।

स्मरण आती है, माननीय श्री अडवाणी जी की वह बात, जब केंद्र में भाजपा के समर्थन से वी पी सिंह की सरकार बनने के बाद पाञ्चजन्य के तत्कालीन संपादक श्री तरुण विजय जी के निमंत्रण पर अडवाणी जी Panchajanya-Organiser के कार्यालय आये थे, तब दोनों सम्पादकियों की संयुक्त मीटिंग में अन्य बातों के चलते अयोध्या में प्रभु श्रीराम के जन्मस्थल पर मंदिर बनवाने पर प्रश्न करने पर उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था:"जब तक केंद्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा की बहुमत वाली सरकार नहीं होगी, तब तक शायद अयोध्या में राममंदिर केवल एक स्वप्न रहेगा।" कारण पूछने पर बोले कि "केंद्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकारें होने पर रोड़े अटकाने वाली सरकारें नहीं होंगी।"  कालचक्र ऐसा घुमा दोनों ही जगह सत्ता में भाजपा है और तब दिखने वाला "स्वप्न" आज इतिहास ही नहीं, रचने जा रहा, भारत के साथ-साथ समस्त विश्व का भूगोल बदलने जा रहा है।  

लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से अपनी ‘रथयात्रा’ की शुरुआत की थी। इस रथयात्रा के संयोजक उस समय नरेंद्र मोदी थे। यह यात्रा 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ समाप्त हुई थी। कहा जाता है कि जब विवादित ढाँचा टूटा था, उस समय लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या में ही थे।

देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि मंदिर सभी भारतीयों को भगवान राम के गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करेगा। उन्होंने कहा, “उस समय (सितंबर 1990 में यात्रा शुरू होने के कुछ दिन बाद) मुझे लगा कि नियति ने तय कर लिया है कि एक दिन अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनाया जाएगा… अब यह केवल समय की बात है।”

राष्ट्रधर्म नाम की एक पत्रिका से बात करते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने आगे कहा, “और, ‘रथयात्रा’ शुरू होने के कुछ कुछ दिनों बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ एक सारथी था। मुख्य संदेश यात्रा ही थी… वह ‘रथ’ पूजा के योग्य था, क्योंकि यह भगवान राम के जन्मस्थान पर जा रहा था।” उन्होंने रथयात्रा को अपने राजनीतिक करियर की सबसे निर्णायक और परिवर्तनकारी घटना बताया।

आडवाणी ने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि यह रथयात्रा जनआंदोलन का रूप ले लेगी। इसे ‘खुद को खोजने’ का एक मौका बताते हुए उन्होंने कहा, “यात्रा के दौरान, कई अनुभव हुए जिन्होंने मेरे जीवन को प्रभावित किया। दूरदराज के गाँवों से ग्रामीण मेरे पास आते थे, रथ देखकर भावना से अभिभूत होते थे। वे नमस्कार करते थे। ‘राम’ का जाप करते थे और चले जाते थे। यह एक संदेश था।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए आडवाणी ने कहा कि कहा कि भगवान राम ने अपने मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए नरेंद्र मोदी के रूप में अपना भक्त चुना, जिनकी देखरेख में मंदिर की इमारत बन रही है। उन्होंने कहा, “अब जब पीएम मोदी मंदिर का अभिषेक करेंगे तो वह भारत के प्रत्येक नागरिक का प्रतिनिधित्व करेंगे।”

लालकृष्ण आडवाणी ने ये सारी बातें राष्ट्रधर्म नाम की एक मासिक पत्रि‍का से बातचीत में ये बातें कहीं। ‘श्रीराममंदिर: एक दिव्‍य स्‍वप्‍न की पूर्ति’ नाम से यह लेख 15 जनवरी 2024 को प्रकाशि‍त होगा। बता दें कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने पिछले दिनों कहा था कि राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में लालकृष्ण आडवाणी शामिल रहेंगे। 


रथ यात्रा रोकने की साजिश: एक अनजाने NGO को इतने बड़े वकील उतारने के लिए फंड कहाँ से आए?

रथयात्रा
रथ यात्रा रोकने की साजिश किसकी?
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो रोक लगाई थी उसे हटा लिया है। सोमवार (जून 22, 2020) को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ रथयात्रा निकालने की अनुमति दी है।
यात्रा पर रोक लगाए जाने के बाद कई याचिकाएँ दाखिल कर शीर्ष अदालत से पुनर्विचार का आग्रह किया गया था। इन याचिकाओं में कहा गया था कि जगन्नाथ रथयात्रा सदियों पुरानी परंपरा है। इससे करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। इस यात्रा को सिर्फ पुरी में ही निकालने की इजाजत दी जाए।
याचिका में माँग की गई थी कि पुरी की मुख्य रथ यात्रा को ही अनुमति दे दी जाए। कोर्ट से आग्रह किया गया कि यात्रा निकालने और पूजा के लिए लाखों लोगों के बजाय सिर्फ 500-600 लोगों को ही अनुमति दी जाए। इस दौरान कोरोना से बचाव संबंधी सभी गाइडलाइन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने का भरोसा भी दिलाया गया।
गौर करने वाली बात ये है कि जगन्नाथ यात्रा को रोकने के लिए ‘ओडिशा विकास परिषद’ की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी गई थी। ‘ओडिशा विकास परिषद’ NGO का नाम शायद ही कभी प्रकाश में आया हो। ये एक अनजाना सा ही नाम है, मगर इसने मुकुल रोहतगी, रंजीत कुमार जैसे वरिष्ठ वकील को अपना पक्ष रखने के लिए रखा।
ऐसे में ये सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है कि ये NGO नक्सलियों द्वारा या फिर ईसाई मिशनरियों द्वारा बनाया गया है, या फिर पहले से ही था।
इससे पहले इस एनजीओ ने 5 जून को होने वाले स्नान पूर्णिमा पर रोक लगाए जाने को लेकर ओडिशा हाईकोर्ट का रुख किया था कि अगर ये उत्सव मनाया गया तो महामारी फैल जाएगा। जब देश पहले से ही कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी से जूझ रही है, ऐसे में इस तरह की बातें करना भय को बढ़ावा देने से ज्यादा कुछ नहीं है।
अगर ओडिशा विकास परिषद को कोरोना को फैलने से रोकने, लोगों को इसके प्रति जागरुक करने या फिर उनकी स्वास्थ्य को लेकर इतनी ही चिंता थी, तो क्या उन्होंने इसको लेकर किसी प्रकार का अभियान चलाया? किसी तरह की सेवा प्रदान की? इस बारे में कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। 
खैर, ये एक अनजाना सा नाम है, जिसे एक जरिया के तौर पर इस्तेमाल किया गया। ये लोग स्नान पूर्णिमा को रुकवाना चाहते थे। इस मामले में केंद्र सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए थे कि यह राज्य सरकार का विषय है कि वो इसे करवाना चाहती है या नहीं।
शुक्रवार(जून 19) तक जब तक कि रोक हटवाने की मुहिम पब्लिक मूवमेंट नहीं बनी थी, न तो केंद्र सरकार, न राज्य सरकार और न ही कोई भी पार्टी इसको लेकर गंभीर थी। किसी भी बीजेपी नेता ने न तो इसको लेकर ट्वीट किया और न ही कोई मुहिम चलाई।
हम चाहते हैं कि रथ यात्रा की परंपरा चलती रहे, लेकिन हम ये नहीं चाहते कि लोग इकट्ठा हों, क्योंकि ये महामारी का समय है। अगर हम भी ऐसा करेंगे तो तबलीगी जमात और हम में क्या अंतर रह जाता है। स्नान पूर्णिमा के दिन वहाँ पर पुजारियों और संतों के अलावा एक भी इंसान नहीं आया। इतनी समझ तो है हिंदू में।
मगर ओडिशा विकास परिषद का तो ये मकसद था ही नहीं। ये नक्सली, आतंकियों के हिमायती, हिंदू से घृणा करने वाले और वामपंथी विचारधारा की पूरी लॉबी हिंदुओं के हर प्रतीक को नष्ट करना चाहती है। महामारी के इस समय में हिंदुओं के परंपरा को तोड़ना चाहती है।
और फिर बाद में इसको लेकर ताना भी देती है कि हमने जगन्नाथ रथ यात्रा रुकवा दिया। हमने तो तुम्हारे भगवान को 70 सालों तक टेंट में बैठाकर रखा। इसे सुनकर हिंदुओं के मन में हीन भावना आती है कि 80% आबादी हमारी है, सरकार भी इसी मुद्दे पर सत्ता में आती है, लेकिन इसके बावजूद ओडिशा विकास परिषद जैसा संस्थान सीधा सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाता है। लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाते हैं। 
जब सुप्रीम कोर्ट ने रथ यात्रा की इजाजत दे दी तो लिबरल गिरोह ने एक नया प्रपंच फैलाना शुरू किया कि आफताब हुसैन नाम के मुस्लिम लड़के ने रथ यात्रा की परंपरा टूटने से बचा लिया। हाँ, ये सच है कि मुस्लिम लड़के ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। मगर वो इकलौता नहीं था। और भी लोग थे जिन्होंने याचिका दायर की।
गजपति महाराज जैसे लोग थे जो सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद से ही इसे हटाने के लिए अलग-अलग स्तरों पर प्रयास कर रहे थे। लेकिन लिबरल गिरोह का प्रोपेगेंडा देखिए, पहले तो रथ यात्रा न हो इसके लिए तमाम प्रयास किए और जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ, कोर्ट ने मंजूरी दे दी तो सिक्यूलर छवि के नाम पर एक मुस्लिम याचिकाकर्ता को हीरो बनाया जा रहा है।
केंद्र सरकार, राज्य सरकार, बीजेपी नेता संबित पात्रा, जगन्नाथ संस्कृत जन जागरण मंच, अंतरराष्ट्रीय हिंदू महासभा संघ, लक्ष्मी बिस्बाल आदि की तरफ से कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दी गई थी, जिसमें कहा गया कि मंदिर में 1172 सेवक हैं। इन सभी का कोविड-19 टेस्ट किया जा चुका है जो निगेटिव आया है। तीनों रथ खींचने के लिए 750 लोगों की आवश्यकता होती है। मंदिर के पास 1172 सेवक हैं। ये लोग ही रथों को खींचकर गुंडिचा मंदिर तक ले जा सकते हैं। इस तरह रथयात्रा बिना बाहरी लोगों के शामिल हुए भी निकाली जा सकती है।
मगर एनडीटीवी, द वायर जैसी कई मीडिया संस्थान मे मुस्लिम लड़के आफताब का ऐसे महिमामंडन किया कि उसने हिंदुओं की परंपरा को टूटने से बचा लिया और हिंदुओं को इसके लिए उसका आभारी होना चाहिए। मीडिया पोर्टल ने इसके माध्यम से मुस्लिम की हिन्दू देवताओं के प्रति ‘आस्था’ दिखाने का भी भरसक प्रयास किया।