Showing posts with label barkha dutt. Show all posts
Showing posts with label barkha dutt. Show all posts

नककटा, नालायक, लंगोट का ढीला… बागेश्वर सरकार के दरबार में आया बरखा दत्त की Mojo स्टोरी का पत्रकार, पर्चा देख कान पकड़कर माँगी माफी

                        बागेश्वर सरकार के मंच पर खुद को मोजो स्टोरी का पत्रकार बताने वाला हर्षित शर्मा
सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें खुद को पत्रकार बताने वाला एक शख्स बागेश्वर धाम सरकार पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा के बीच कुछ टिप्पणी करता नजर आ रहा है। हालाँकि माइक नहीं होने की वजह से उसकी आवाज स्पष्ट नहीं है। इसके बाद बागेश्वर सरकार उसे मंच पर बुलाते हैं। वह खुद को पत्रकार बताते हुए कहता है कि दिल्ली से आया है और ‘मोजो स्टोरी’ से जुड़ा हुआ है। मोजो स्टोरी वामपंथन पत्रकार बरखा दत्त की अगुवाई में चल रहा है।

यह शख्स अपना नाम हर्षित शर्मा बताता है। वीडियो में आप देख सकते हैं कि जब पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री इस कथित पत्रकार का पर्चा निकालते हैं तो वह थोड़ी देर के लिए निरुत्तर हो जाता है। वह हाथ जोड़ने लगता है। कान पकड़कर माफी माँगता है। शुरुआत में शर्मा कहता है कि वह दिल्ली से कथा कवर करने आया है। बाद में वह बताता है कि वह छतरपुर की कथा में आई एक महिला की मृत्यु को लेकर सवाल पूछने आया है। इस बीच बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने चिर-परिचित अंदाज में नककटा, नालायक, ठठरी बाँधने जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते भी दिखते हैं।

आप वीडियो की शुरुआत में देख सकते हैं कि खुद को पत्रकार बताने वाला शर्मा मंच के नीचे से कुछ टिप्पणी करता है। इस पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने खास अंदाज में बोलते हुए कहते हैं, “क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ? अर्जी लगाओ और सीताराम जपो। तुम्हें बोलने की तमीज नहीं है। तुम अपने कक्का (परिजन) को बुला लो मैं उनका भी और तुम्हारा भी बता दूँगा कि तुम लंगोट के ढीले हो। तुम कम नहीं हो। तुम प्लांटेड हो।” इसके बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उसे मंच पर बुलाते हैं।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री इसके बाद पत्रकार को मंच पर बुलाकर सवाल करते हैं कि तुम्हें बीच में बोलने के लिए किसने कहा? इस पर पत्रकार कहता है कि यह उसने अपनी इच्छा से किया। फिर बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर फिर पूछते हैं कि इसके पीछे कौन है?

इसके बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पत्रकार को दो कागज दिखाते हुए कहते हैं कि क्या वह बता सकता है कि इन दोनों पर क्या लिखा है? इस पर पत्रकार कहता है कि उसे नहीं पता। इस पर शास्त्री कहते हैं तुम्हें जो पूछना है इस पर वही लिखा है। फिर वह पत्रकार का परिचय पूछते हैं। इस पर वह अपना नाम हर्षित शर्मा और खुद को मोजो स्टोरी का पत्रकार बताता है।

इसके बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री कहते हैं कि उन्होंने मोजो स्टोरी के बारे में कभी नहीं सुना। लेकिन जब वह दरबार में बैठे थे तब दो पर्चे पहले ही लिखकर रख लिए थे। इसके बाद वह पहले से लिखा हुआ एक कागज पत्रकार को दिखाते हुए पढ़ते हैं, “एक व्यक्ति परीक्षा लेने आएगा। बदतमीजी करेगा। नालायक है। उसको बुलाने की जरूरत नहीं। ठिकाने लगा देना है। टीम मोजो से आएगा। पर्चा नहीं देना है।”

इसके बाद शास्त्री दूसरा कागज दिखाते हुए कहते हैं तुम्हारा एक और पर्चा रखा हुआ है। इसके बाद पत्रकार सवाल पूछने की कोशिश करता है। लेकिन इससे पहले ही धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री रोकते हुए कहते हैं कि उन्हें सब पता है। आरोप लगते रहते हैं। फिर पत्रकार ने उनकी कथा में आई महिला की मृत्यु को लेकर सवाल पूछने के साथ ही कहा कि क्या लोगों का यह मानना जरूरी है कि वह सिर्फ आपके पास आकर ही ठीक होंगे या फिर डॉक्टर के पास जाना भी जरूरी है। इस पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री दूसरा कागज दिखाते हुए पढ़ते हैं, “यहाँ परेशान व्यक्ति आ सकते हैं। चिंता न करें, दुआ, दवा और कृपा सबकी आवश्यकता है।” इस वीडियो में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के कहने पर ‘मोजो स्टोरी’ का पत्रकार बार-बार माफी माँगता दिखाई देता है।

जर्मनी में कीचड़ मलती ‘गोरी’ पत्रकार बर्खास्त, लेकिन भारत में भ्रमित रिपोर्टिंग पर कोई कार्यवाही नहीं

एक खबर आई है जर्मनी से। जर्मनी की एक टीवी रिपोर्टर ने ऐसा कुछ किया है, जिससे एक बार फिर से पत्रकारिता के मानक पर सवाल उठने लगे हैं। 39 वर्षीय टीवी रिपोर्टर सुजाना ओहलेन ने बाढ़ग्रस्त इलाकों में लोगों की मदद करने का दिखावा करने के लिए झूठी कहानी रच डाली, लेकिन बदकिस्मती से पास से गुजर रहे एक व्यक्ति ने सच्चाई को कैमरे में कैद कर लिया। इसके बाद जब रिपोर्टर का झूठ दुनिया के सामने आया तो उसे नौकरी से निकाल दिया गया।

अपनी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिए पत्रकार ने पहले कीचड़ को अपने कपड़ों पर लगाया, इसके बाद उन्होंने थोड़ी मिट्टी चेहरे पर भी लगा ली। फिर वो कैमरे के सामने पहुँची और बाढ़ग्रस्त लोगों की मदद के दावे करना शुरू कर दिए। हालाँकि, जब सुजाना ओहलेन अपने कपड़ों पर कीचड़ लगा रही थीं, पास ही मौजूद एक शख्स ने उन्हें कैमरे में कैद कर लिया। शख्स ने वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया और कुछ ही देर में यह वायरल हो गया और पत्रकार की नौकरी चली गई।

ये तो बात हो गई जर्मनी की, लेकिन भारत में भी ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं है जो नैतिकता को ताक पर रख कर शवों पर, चिताओं पर, शमशान घाटों से रिपोर्टिंग करते हैं। भारत में भी पत्रकारिता के ऐसे कई उदाहरण हैं, जब फैक्ट को अपने हिसाब से फिक्स किया गया। इन एजेंडा पत्रकारों का उद्देश्य है कि चाहे दुनिया भर में देश की बदनामी हो, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नीचा दिखाने का यह अवसर हाथ से नहीं निकलना चाहिए।

इसके लिए श्मशानों से लाइव रिपोर्टिंग के साथ जलती चिताओं की तस्वीरें छापकर यह बताने की कोशिश की गई कि भारत में स्थिति काफी खराब है और सरकार इसको नियंत्रित करने में नाकाम रही है। हालात को ऐसे पेश किया गया मानो कोरोना से संक्रमित होने वाला हर मरीज मर रहा है, जबकि कोरोना से ठीक होकर घर लौटने वालों के आँकड़े और सरकार के प्रयास नदारद थे।

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters के भारत में चीफ फोटोग्राफर दानिश सिद्दीकी ने हिन्दुओं के अंतिम संस्कार और चिताओं की तस्वीरें शेयर कर के पूरी दुनिया में भारत की ऐसी छवि बनाने की कोशिश की, जैसे कोरोना वायरस संक्रमण के लिए हिन्दू ही जिम्मेदार हैं और वही मर रहे हैं। यही नहीं, भावनाओं में बँधी इन तस्वीरों को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए भी रखा। यह हिंदुओं की संवेदनाओं का अनादर है, जो नहीं चाहते कि उनके परिजनों की जलती चिताएँ सार्वजनिक दृश्य बनें।

लेकिन, भारत और हिन्दुओं की भावनाओं का अनादर करते हुए उनकी जलती चिताओं को सरकार पर हमले का हथियार बना दिया गया। जब दानिश की मौत के बाद उनकी तस्वीरें शेयर की जाने लगीं तो लिबरल गिरोह का अनर्गल प्रलाप शुरू हो गया और इसे ‘असंवेदनशील’ बताया जाने लगा।

दानिश की मौत के बाद उन्हें निष्पक्ष और सेक्युलर पत्रकार मानने वालों से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने कोरोना से मरने वाले मुस्लिम लाश की दफन होती कोई तस्वीर क्यों नहीं खींची थी और उस तस्वीर को वायरल क्यों नहीं किया था? अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कोरोना से कोई एक या दो नहीं, बल्कि 50 से अधिक मुस्लिम प्रोफेसर मरे थे, पर उनकी तस्वीरें खींचकर दानिश ने वायरल क्यों नहीं किया था?

कोरोना काल में तबलीगी जमात के हजारों लोग पुलिस और डॉक्टर-नर्सों पर सरेआम थूक रहे थे और कोरोना फैला रहे थे। सरेआम थूकने वाले मुस्लिमों की कोई तस्वीर उन्होंने वायरल क्यों नहीं किया था? लॉकडाउन को लागू कराते समय उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में मुस्लिम भीड़ ने सरेआम पुलिस को पीटा, तब मुस्लिम भीड़ की कोई तस्वीर उन्होंने क्यों नहीं वायरल किया था?

सीएए कानून के खिलाफ प्रदर्शनों की तो उन्होंने खूब तस्वीरें खींची थी, लेकिन विरोध प्रदर्शनों के दौरान मुसलमानों द्वारा पत्रकारों और आम लोगों की हुई पिटाई की तस्वीरें दानिश ने क्यों नहीं वायरल किया था? मॉब लिंचिंग में हिंदुओं की हुई बर्बर हत्या की कोई तस्वीर उन्होंने क्यों नहीं वायरल किया था?

                                                            दानिश सिद्दीकी का ट्वीट
फोटो जर्नलिस्ट दानिश ने दिल्ली दंगा से लेकर कुंभ मेला तक, हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए कई तस्वीरें क्लिक की थीं। कुंभ की तस्वीरों में कोरोना का जिक्र किया गया था, लेकिन ‘किसान आंदोलन’ की तस्वीरों में भीड़ होने के बावजूद उसका महिमामंडन किया गया था। 

वहीं, भारत के एजेंडा पत्रकारों ने जलती चिताओं में अपने निजी हितों की लकड़ी डालकर चिंगारी को और भड़काने का काम किया है। जलती चिताओं की तपिश को विदेशों तक फैलाकर मोदी सरकार की छवि झुलसाने की कोशिश की। कुछ पत्रकारों ने ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जो पूरी तरह से देश के हित के खिलाफ है।

                                हिन्दुत्व को बदनाम करने शमशान से पत्रकारिता करती बरखा दत्त 
बरखा दत्त ने कहा कि भारत एक ‘टूटा हुआ राष्ट्र’ है, जहाँ ‘असंवेदनशीलता और अयोग्यता हमें मार रही’ है। कुछ ही दिनों पहले हमने बरखा दत्त को कैमरे और लैपटॉप सहित सभी साजोसामान के साथ ऐसे ही एक श्मशान में देखा था। गौर करने वाली बात यह है कि सभी पत्रकार हिन्दुओं के ही अंतिम संस्कार स्थलों पर घूमते रहे। एक-एक मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल भी ब्रांडिंग और प्रोपेगंडा के लिए हो रहा। बरखा दत्त द्वारा एक श्मशान के बाहर अड्डा जमाकर पूछना कि ‘क्या कोई मुर्दों की गिनती कर रहा है?’, इससे अधिक अनैतिक और क्या हो सकता है।

अब राना अयूब को ही ले लीजिए। राना अयूब खुद को पत्रकार बताती हैं और कई अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों के लिए लिखती भी हैं। उनके अधिकतर लेख भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बदनाम करने के इरादे से लिखे गए होते हैं। फिलहाल ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ ने उन्हें ग्लोबल एडिटर बना रखा है। Time, NYT, गार्डियन, FP और ‘द न्यूयॉर्कर’ जैसे मीडिया संस्थानों ने उन्हें लिखने के लिए जगह दी है। हाल ही में उन्होंने गंगा में लाशें बहने और कोरोना को लेकर दुनिया भर में भारत को बदनाम करने का प्रयास किया था।

कोविड-19 के लिए फंड्स इकट्ठा करने का दावा करने वाली राना अयूब को लेकर विवाद भी हुआ था। आशंका जताई गई थी कि इस कैम्पेन में वह देश के FCRA कानूनों का उल्लंघन कर रही हैं। बाद में उन्होंने इस फंड्स कैम्पेन को समाप्त कर दिया। कोरोना के दौरान उन्होंने ये फेक न्यूज़ भी फैलाया था कि साढ़े चार वर्ष का एक प्रवासी बच्चा दूध न मिलने के कारण श्रमिक ट्रेन से रेलवे स्टेशन तक पहुँचने से पहले ही मर गया।

NDTV के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार अक्सर फेक न्यूज़ फैलाते पाए जाते हैं। पिछले दिनों उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी धूर्तता को छोटी-सी गलती की तरह दिखाते हुए माफी माँगने का ढोंग भी रचा। ‘किसान आंदोलन’ की आग में घी डालने के लिए रवीश ने कृषि उत्पाद खरीद मामले में सरकार पर ही गलत आँकड़े पेश करने का आरोप मढ़ दिया था। जिसके बाद उन्होंने फेसबुक पर इसे ‘गलती’ बताते हुए ‘सार्वजनिक सूचना’ दिया।

जरा स्थिति को उलटा कर के देखिए। मान लीजिए कि सरकार की जगह किसान संगठनों ने कोई आँकड़ा दिया होता और सुधीर चौधरी या अर्णब गोस्वामी ने उसे गलत रूप में पेश कर दिया होता तो फिर यही वामपंथी मीडिया उन दोनों पर किसान विरोधी होने का तमगा लगा कर हल्ला मचा रहा होता और सोशल मीडिया में भी मजाक बनाया जाता। लेकिन, चूँकि मामला रवीश कुमार का था, इसीलिए सब जान-बूझ कर गहरी नींद में सोते रहे।

गुलाम भारत में पत्रकारिता एक जोखिम भरा काम था, एक मिशन थी पत्रकारिता। आज पत्रकारिता बीच बाजार खड़ी है बिकने को तत्पर, खुद को और खुद की गढ़ी खबरों को बेचने की जुगत में। मिशन की डगर से चली पत्रकारिता विभिन्न पड़ावों से चलती आज बीच बाजार में खड़ी है। तल्ख हकीकत ये है कि आज गलाकाट व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा ने मूल्यों, मानकों को हाशिये पर धकेल दिया है। तकनीकी दृष्टि से पत्रकारिता समृद्ध होती नजर आती है, पर नैतिकता व मूल्यों की कसौटी पर हम पत्रकारिता के पतनकाल से रूबरू हैं।

रेटिंग की होड़, एक्सक्लूसिव की मृग मरीचिका में फँसी पत्रकारिता अब अपुष्ट खबरों को परोसने से भी परहेज नहीं करती। आलम यह है कि रेटिंग की भूख और एक्सक्लूसिव की मृग मरीचिका के शिकार मीडिया हाउस खबरें पैदा करने लगे हैं। बाजारीकरण का घुन मीडिया की विश्वसनीयता को चाट रहा है। पेड खबरों के बाद अब मीडिया का एक नया चेहरा हमारे सामने है। छवि बनाने, छवि बिगाड़ने की सुपारी ली जाने लगी है। इन सबको देख कर तो यही लगता है कि पत्रकार और कुछ नहीं, पिपली लाइव ही है।

शमशान घाट पर प्रोपैगैंडा चलाने के लिए जगह मिल सकती है, लेकिन बाप के अंतिम संस्कार पर पुलिस की मदद?

                 शमशान घाट पर प्रोपैगैंडा चलाने के लिए जगह मिल सकती है, लेकिन बाप की मौत पर पुलिस की मदद?
पत्रकार बरखा दत्त को अप्रैल 29, 2021 को उनके पिता एसपी दत्त के निधन की दुखद सूचना मिली। बरखा दत्त ने ट्वीट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कोविड पॉजिटिव पाए जाने के बाद उनके पिता का 
निधन हो गया। एयर इंडिया के पूर्व अधिकारी (एसपी दत्त) ने अप्रैल 27, 2021 को कोरोना वायरस संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया।

देश इस समय कोरोना वायरस की दूसरी लहर से जूझ रहा है। इस विकट परिस्थिति में बरखा दत्त सड़क पर निकल कर रिपोर्टिंग कर रही हैं। और इसी बीच बरखा दत्त ने अपने पिता को खो दिया।

अपने पिता की मौत के कुछ दिनों बाद, सीएनएन के किम ब्रूनहुबर के साथ एक इंटरव्यू में बरखा दत्त ने कहा, “मेरे पिता ने मुझसे अंतिम शब्द कहा था कि मुझे घुटन हो रही है। कृपया मेरा इलाज करें और मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। जो प्राइवेट एंबुलेंस उन्हें लेकर हॉस्पिटल गई, उसमें लगा ऑक्सीजन सिलेंडर काम नहीं कर रहा था।”

बरखा दत्त ने कहा, “उन्हें लाने में देरी हो गई, क्योंकि शहरों में अभी भी एंबुलेंस के लिए कोई ग्रीन कॉरिडोर नहीं है। जब तक हम अस्पताल पहुँचे, उनका ऑक्सीजन स्तर गिर गया था क्योंकि एंबुलेंस में लगा ऑक्सीजन (सिलेंडर) फेल हो चुका था। उन्हें इंटेनसिव केयर यूनिट (ICU) में ले जाना पड़ा। इसके बाद वो फिर वापस नहीं आए।”

बरखा दत्त ने आगे कहा, “इस घटना के 48 घंटे भी नहीं हुए थे, जब हम उनका अंतिम संस्कार करने के लिए शमशान घाट गए। यहाँ पर जगह नहीं थी। कई परिवारों के बीच लड़ाइयाँ हो रही थीं। मुझे मेरे पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए पुलिस को बुलाना पड़ा। ऐसी मुश्किल घड़ी में ये सब करना काफी कष्टप्रद रहा।”

दत्त ने कहा, “मैं इसलिए बोल रही हूँ क्योंकि मुझे इस बात का एहसास है कि इस क्षति के बावजूद मैं ज्यादातर भारतीयों की तुलना में भाग्यशाली हूँ। आज, मैं भारत के अनाथों के बारे में सोच रही हूँ।” उन्होंने यह भी कहा कि अस्पतालों के बाहर इंतजार कर रहे परिवारों या मृतक का अंतिम संस्कार करने की स्थिति को देख कर उनका दिल टूट गया है। दत्त ने यह भी दावा किया कि कोरोना वायरस मरीजों में से एक के भाई ने उन्हें बताया कि परिवार को भगवान के भरोसे पर छोड़ दिया गया है।

एम्बुलेंस ड्राइवर सोनू का स्पष्टीकरण 

बरखा दत्त द्वारा किए गए खुलासे के बाद, हमें बताया गया है कि एम्बुलेंस के ड्राइवर और केयरटेकर को अपने मालिक की तरफ से काफी कुछ सुनना पड़ा। जबकि ड्राइवर ने समझाया था कि जब भी किसी की मौत होती है, तो उसे दुख होता है। उन्होंने यह भी कहा कि शायद संकट के समय किए गए दावे पूरी तरह से सच नहीं होंगे। इसके बाद, एम्बुलेंस ड्राइवर और उसके मालिक ने इस आरोप से इनकार किया कि वाहन में ऑक्सीजन सिलेंडर काम नहीं कर रहा था।

एम्बुलेंस चालक सोनू ने कहा कि ऑक्सीजन सिलेंडर भरा हुआ था और बरखा दत्त ने खुद ही सप्लाय की जाँच की थी। ऑडियो बातचीत को पल्स द्वारा प्रकाशित किया गया था। उन्होंने कहा कि पत्रकार ने ऑक्सीजन की आपूर्ति के बारे में एडवांस में पूछताछ की थी। उनके अनुसार, उन्होंने अपने पिता को अस्पताल पहुँचाने से पहले मास्क और ऑक्सीजन के प्रवाह दोनों की जाँच की थी।

सोनू ने दावा किया, “उन्होंने यात्रा के दौरान मुझे बाधित किया और बार-बार मुझसे ऑक्सीजन की आपूर्ति की जाँच करने के लिए कहा। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि यह ठीक काम कर रहा है। हम बिना किसी समस्या के अस्पताल पहुँचे थे। हमारे साथ उनके दो वाहन भी थे। मरीज का केयरटेकर भी उनके साथ था। मैं भी 15-20 मिनट के लिए आपातकालीन विभाग के बाहर खड़ा था। मरीज बिना किसी परेशानी के एम्बुलेंस से नीचे उतर गया।”

उसने दोहराया, “मैंने उनके घर की पहली मंजिल से एम्बुलेंस तक मरीज को व्यक्तिगत रूप से पहुँचाया था। वह झूठ क्यों बोल रही है? मैंने उन्हें दिखाया था कि मास्क, ऑक्सीजन सिलेंडर ठीक से काम कर रहा था। बरखा दत्त के दो ड्राइवरों और एक सुरक्षा गार्ड सहित कई गवाह थे। मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ।” सोनू ने आगे कहा कि एम्बुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर गायब होने के दावे झूठे हैं और उन्होंने पत्रकार को इसका डेमो भी दिया था।

एंबुलेंस के ड्राइवर ने कहा कि मरीज (बरखा के पिता) के एंबुलेंस में चढ़ने से पहले बरखा ने एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर की जाँच करने के लिए कहा। ड्राइवर का दावा है कि बरखा ने उससे पूछा कि बड़ा सिलेंडर है या छोटा? इतना ही नहीं, बरखा ने उससे यह सवाल भी किया कि छोटी एंबुलेंस में बड़ा ऑक्सीजन सिलेंडर क्यों है? बरखा द्वारा जाँच कर लेने के बाद ड्राइवर ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने मरीज के लिए ऑक्सीजन मास्क रखा है? इस पर बरखा ने कहा कि क्यों उसके पास नहीं है? इसका जवाब देते हुए ड्राइवर ने कहा कि उसके पास एक है लेकिन ज्यादातर मरीज अपना ऑक्सीजन मास्क इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। मगर यदि उनके पास नहीं है तो एंबुलेंस में एक है।

सोनू ने आगे कहा कि हॉस्पिटल जाने के दौरान एंबुलेंस को बीच में रोक कर फिर से सिलेंडर के सुचारू रूप से काम करने पर सवाल उठाया गया था। उस समय ड्राइवर ने दिखाया था कि ऑक्सीजन सिलेंडर वास्तव में काम कर रहा था। उसने यह भी दावा किया कि बरखा दत्त झूठ बोल रही थीं और अगर वह सच कह रहीं, तो उन्होंने एक फोटो खींची थी।

पल्स ने बताया कि उन्हें सोनू और बरखा के बीच बातचीत का ऑडियो क्लिप मिला था। बरखा दत्त ने CNN से कहा कि ऑक्सीजन न मिलने की वजह से उनके पिता की हालत गंभीर हो गई, जबकि एंबुलेंस ड्राइवर ने दोहराया कि एंबुलेंस से उतरते वक्त मरीज सामान्य था। इसके साथ ही सोनू ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि बरखा दत्त ने अपने पिता के आवास से अस्पताल तक की यात्रा से पहले ऑक्सीजन की आपूर्ति और मास्क की कार्यप्रणाली की स्वयं जाँच की थी।

‘पत्रकारों को Bitch कहने वाली’ कपिल सिबल की पत्नी से बरखा दत्त ने मॉंगे सूद समेत ₹74 लाख

Image result for बरखा दत्त-कपिल सिब्बल
वास्तव में 2014 चुनावों के बाद से कांग्रेस में दरारें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। कोई पार्टी छोड़ रहा है, तो कोई गाँधी परिवार से दूरी बनाने में लगा हुआ है। और अब 2019 लोक सभा चुनाव हारने के 6 महीने के भीतर ही पत्रकारिता के समुदाय विशेष में दरारें पड़नी शुरू हो गईं हैं। हालिया मामले में एनडीटीवी की एंकर रहीं बरखा दत्त ने अपने पिछले चैनल के प्रमोटर और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल और उनकी पत्नी प्रमिला सिब्बल से ₹74 लाख सूद समेत लेने के लिए अदालत में मुकदमा दायर किया है। मामले के लिए 9 जनवरी को सुनवाई की तारीख मिली है।
NDTV के अपने कार्यकाल में राडिया कांड और उसके बाद वाशिंगटन पोस्ट में भारत और हिन्दुओं को कोसने के लिए जानी जाने वालीं बरखा दत्त ने लोक सभा चुनावों में कांग्रेस व वामपंथी मीडिया की शिकस्त के कुछ ही समय बाद ट्वीट किया था कि तिरंगा टीवी के कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना तथा मुआवजे के निकाला जा रहा है। उन्होंने प्रमिला सिब्बल पर चैनल की महिला कर्मचारियों को “कुतिया” कह कर अपमानित करने का आरोप भी लगाया था।

बरखा के आरोपों में इसके अतिरिक्त खुद को और चैनल के अन्य वरिष्ठ कर्मचारियों को एक साल से अधिक समय से वेतन न दिए जाने का भी आरोप था। इसके अलावा उन्होंने कहा था कि बिना कर्मचारियों को वेतन दिए सिब्बल दम्पति का लंदन में ऐश करना विजय माल्या जैसा कृत्य है। इसके लिए उन्होंने खुद को सिब्बल द्वारा मानहानि के मुकदमे से धमकाए जाने की बात भी ट्विटर पर कही थी।
उनके आरोपों के जवाब में सिब्बल ने दावा किया था कि यह सब ट्वीट करने के पहले ही बरखा दत्त को चैनल से बर्खास्त किया जा चुका है। इसके पीछे उन्होंने कारण अनुशासनहीनता बताया था। इसके अलावा उन्होंने दत्त को एक भी पैसा देने से साफ़ इनकार कर दिया था।

कपिल सिब्बल पर फूटा बरखा का गुस्सा

Barkha-Kapil
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
समय से बड़ा बलवान कोई नहीं होता और न ही होगा, समय का चक्र जब चलता है, तो अच्छे-अच्छों के कन्ने कट जाते हैं। रोज करोड़ों कमाने वाले (पत्रकार बरखा दत्त के अनुसार) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील कपिल सिब्बल समय चक्र के लपेटे में आ जाएंगे, कभी नहीं सोंचा होगा। आज इस करोड़पति की ऐसी हालत हो गयी है, Tiranga चैनल को चलाने में असमर्थ हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आरोपित कर अपना दामन बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यह वही कपिल सिब्बल जिन्होंने अपने वोट बैंक की खातिर कोर्ट में अयोध्या में राममन्दिर मुद्दे पर झूठ बोलकर अड़चने डालते रहे। 
जमाने की आवाज उठाने वाले पत्रकार अपने साथ होने वाले शोषण के खिलाफ कुछ नहीं कर पाते। यही वजह है कि मीडिया हाउस मनमाने ढंग से पत्रकारों को ‘हांकते’ हैं। इसमें दो राय नहीं कि पत्रकार जो जन समस्याओं को उजागर करता है, उसके साथ जब अन्याय होता है, कोई नहीं बोलता। सोवियत संघ के विभाजन होने पर Patriot बंद हो गया, National herald में महीनों कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलता था, ऐसे अनेकों दैनिक और साप्ताहिक हैं, जहाँ कर्मचारियों पर होते अन्याय के विरुद्ध कोई नहीं बोलता, कहने को पत्रकारों की कितनी यूनियन बनी हुई है। वास्तव में पार्टियों ने अपने चमचों के खाने-पीने का एक मंच बना कर उन्हें पाल रहे हैं। कहने को खोजी पत्रकारों की भी कमी नहीं। लेकिन खोजी पत्रकार भी केवल पालन-पोषण करने वाले आकाओं के निर्देश पर ही हरकत में आते हैं, अन्यथा उन्हें तो इस बात का भी बोध नहीं होता कि बगल में क्या हो रहा है। यही कारण है कि आज पत्रकार नाम बदनाम हो गया है, जबकि दो दशक पूर्व तक पत्रकार तो क्या प्रेस में कार्यरत एक चपरासी तक से लोग डरते थे। जब से पत्रकार और मीडिया समूह नेताओं की मक्खनबाजी में व्यस्त हुए प्रेस नाम ही बदनाम हो गया। इस सच्चाई से शायद बरखा दत्त भी इंकार नहीं कर पाएँगी।  
कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री कपिल सिब्बल के न्यूज चैनल ‘तिरंगा’ में भी आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है। यहां लगभग 200 पत्रकारों को नौकरी से निकाला जा रहा है, वो भी नियमों  के तहत मिलने वाले वेतन के बिना। वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने इस मुद्दे को अपनी आवाज दी है। सोशल मीडिया पर उन्होंने ‘तिरंगा’ में पत्रकारों की स्थिति और कपिल सिब्बल के तानाशाही रवैये को उजागर किया है।
बरखा ने इस संबंध में एक के बाद एक कई ट्वीट किये हैं और अन्य पत्रकारों से भी इस पर मुखर होने की अपील की है। उन्होंने लिखा है,‘कपिल सिब्बल और उनकी पत्नी के @NewsHtn में भयावह स्थिति, 200 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा है और उन्हें 6 महीने का वेतन भी नहीं दिया जा रहा।’
बरखा ने आगे लिखा है, ‘तिरंगा से जुड़ने के लिए कई पत्रकारों ने अन्य ऑफरों को ठुकरा दिया था, क्योंकि कपिल सिब्बल ने आश्वासन दिया था कि न्यूजरूम को पेशेवर तरीके से चलाया जाएगा और पत्रकारों का कार्यकाल कम से कम 2 साल का होगा। लेकिन पति-पत्नी में से किसी ने भी स्टाफ से बात नहीं की, इसके बजाय लाइव प्रोग्रामिंग को 48 घंटों के लिए बंद कर दिया।’ बरखा दत्त ने कपिल और उनकी पत्नी के खिलाफ अपने दिल का सारा गुबार निकाल दिया। उन्होंने निशाना साधते हुए लिखा, ‘सिब्बल की पत्नी जो मीट फैक्ट्री चलाती हैं, वो बड़े ताव में अपने कर्मचारियों से कहती हैं कि मैं एक पैसा दिए बिना ही फैक्ट्री बंद कर दूंगी, फिर 6 महीने की सैलरी मांगने वाले ये पत्रकार कौन होते हैं।’ गौरतलब है कि बाकी पत्रकारों की तरह बरखा ने भी चैनल की लॉन्चिंग से पहले उसका दामन थमा था, लेकिन उनका कहना है कि वो जो कुछ सिब्बल के बारे में लिख रही हैं, उसका मकसद उन 200 कर्मचारियों को इंसाफ दिलाना है, जिन्हें नियमों को नजरअंदाज कर वेतन दिए बिना निकाला जा रहा है।
An appalling situation in @NewsHtn promoted by @KapilSibal & his wife, where more than 200 employees have had equipment confiscated and face sackings without even a 6 month pay out. Man who acts holier than though in public has treated journalists in a hideous way
अपनी लड़ाई वह अदालत में लड़ लेंगी। बरखा ने सिब्बल को विजय माल्या करार देते हुए कहा ‘सबसे ज्यादा शर्म की बात यह है कि हर रोज करोड़ों कमाने वाले सिब्बल 200 कर्मचारियों को नियमों के अनुसार 6 महीने या कम से कम 3 महीने का वेतन देने को भी तैयार नहीं हैं। वह 200 परिवारों की जिंदगी बर्बाद करने पर तुले हैं।’ बरखा ने अपने ट्वीट में यह भी कहा है कि सिब्बल और उनकी पत्नी का आरोप है कि चूंकि नरेंद्र मोदी ने उनका चैनल चलने नहीं दिया, इसलिए उन्हें मजबूरन कर्मचारियों को निकालना पड़ रहा है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। भारत सरकार की तरफ से इस तरह का कुछ नहीं किया गया है। कपिल और उनकी पत्नी ने कर्मचारियों से बात तक नहीं की, इसके बजाय दोनों छुट्टी मनाने लंदन चले गए। उनकी इस हरकत के चलते मैं उन्हें ‘माल्या’ कहने को मजबूर हूं। इतना ही नहीं बरखा ने मुताबिक, उन्हें इस मामले से पीछे हटने के लिए धमकियां भी मिल रही हैं।

Most people here, gave up other offers or left jobs on an assurance from @KapilSibal of a professionally run newsroom and a minimum tenure of 2 years. Neither husband nor wife have evenshowed up to talk to staff . But all live programming has been cancelled for 48 hrs..
Wife, who ran a meat factory, says loudly in the workplace, "I shut down factory withut giving a paisa to labour, who are these journalists to ask for 6 months salary." Her labour should have been paid better, but her disparaing remarks of journalists is sickening

What is most shameful is that @KapilSibal earns crores every day and wont pay 200 employees the industry norm of 6 months or at least 3 months pay out, ruining the lives of 200 plus people.
Am told @KapilSibal & wife wanted to use Modi as excuse to sack staff saying Modi didnt let channel run. But to be absolutely blunt. GOI has done nothing. Husband and wife have not faced staff, went on holiday to london, while shutting shop, prompting me to call him Mallya
अपने एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘कर्मचारियों के अधिकारों के लिए लड़ने की वजह से मुझे धमकाया जा रहा है, मुझसे यह भी कहा जा रहा है कि मैं कपिल सिब्बल की माल्या से तुलना न करूं, लेकिन मैं पीछे नहीं हटूंगी। मैं ‘तिरंगा’ चैनल के स्टाफ के साथ खड़ी हूं और अंत तक उनका साथ देती रहूंगी।’ सिब्बल दंपती पर आरोपों की बात यहीं खत्म नहीं होती। बरखा दत्त का कहना है कि कपिल और उनकी पत्नी महिला कर्मचारियों को संबोधित करने के लिए अपशब्द का प्रयोग करते थे।

For fighting for rights of staff, I have been threatened with defamation and ordered to "withdraw my emails" comparing @KapilSibal to Mallya. I have refused. I support the staff of @NewsHtn and will help them fight this legally, with a criminal case and complain
Worst of all, @KapilSibal & wife have referred to female staffers as "Kutiya"or Bitch. This is a fit case for NCW @sharmarekha & we will place signed affidavits to prove our case.

There has been more than ocassion when @KapilSibal has embarrassed himself. But a man who earns in the crores, duping and cheating journalists with a 2 year guarantee & then sacking them without the decency to even meet them, and then refusing to pay their dues- truly revolting
I would urge friends in the media fraternity and everyone with a voice to tweet @KapilSibal till he pays employees what is due to them instead of wriggling out with one month pay out and intimidating staff with threats of defamation & other Vakeel type tricks
बरखा ने सभी पत्रकारों से इस विषय में अपनी आवाज बुलंद करने की अपील करते हुए कहा, ‘मैं अपने सभी पत्रकार दोस्तों से कहना चाहूंगी कि वो कपिल सिब्बल को तब तक ट्वीट करना जारी रखें, जब तक कि वो सभी कर्मचारियों को नियमानुसार वेतन नहीं दे देते और कर्मचारियों को धमकाने से बाज नहीं आते। कई पत्रकारों ने बरखा को आश्वासन दिया है कि वो इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में उनका साथ देंगे। अब देखने वाली बात यह है कि क्या एडिटर्स गिल्ड और पत्रकार संघ जैसी संस्थाएं पत्रकारों के हक के लिए आगे आती हैं? 
सच्चाई यह है कि कांग्रेस ने जिस तरह अपने कार्यकाल में मीडिया और मीडिया संगठनों का दुरूपयोग कर सबकी बोलती बंद कर रखी है। भारतीय मज़दूर संघ को छोड़, अन्य कोई संगठन कर्मचारियों के हित के लिए नहीं खड़ा नहीं होगा। क्योंकि एडिटर्स गिल्ड हो या अन्य पत्रकार संघ सब जगह अभी कांग्रेस समर्पित लोग विराजमान हैं। 
अवलोकन करें:-

About this website
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
आपको जान कर हैरानी नहीं होनी चाइये की बीफ के निर्यातको में,कांग्रेस के नेताओ का नाम बड़े निर्यातको में आता है यही का....

कपिल अपने चैनल के कर्मचारियों का दमन कर रहे हैं, कोई नई बात नहीं। नेशनल हेराल्ड में क्या हुआ, क्यों बंद हुआ? राजीव गाँधी के निधन के बाद से परिवार तो क्या पार्टी ने जवाहर लाल नेहरू की इस विरासत को सुचारु रूप से नहीं संजोया, केवल संपत्ति से धन अर्जित करने में अपने आपको व्यस्त रखा।