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‘एक मोहल्ला, एक होलिका’ का ज्ञान देने वाले ईद पर ‘एक मोहल्ला, एक बकरा’ वाली सलाह देंगे? लिबरल गिरोह एक्टिव

होली आ गई है। होली, मतलब रंग-गुलाल का त्योहार। हिन्दू त्योहार। अब चूँकि त्योहार हिन्दुओं का है, इसीलिए इस पर हंगामा मचाया जाना और इसके प्रति घृणा फैलाई जानी तो स्वाभाविक है। ऐसा करने वाले वामपंथी होते हैं, जिनका साथ कट्टर इस्लामी लोग बखूबी देते हैं।  हिन्दू त्योहारों के खिलाफ प्रोपेगंडा में मीडिया, बुद्धिजीवी और सेलेब्रिटीज का एक पूरा का पूरा गठबंधन शामिल रहता है। होली, दीपावली, करवाचौथ, दशहरा और शिवरात्रि आदि हिन्दू त्योहारों को लेकर भी समय-समय पर ज्ञान दिए जाते रहे हैं। समय रहते हिन्दुओं को चेतना होगा, हिन्दू त्योहारों पर विधवा विलाप कर ज्ञान बांटने वालों का उनके परिवार सहित सामाजिक बहिष्कार करना होगा। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बावजूद होली पर व्यवधान डालने वाले भूल रहे हैं कि जिस दिन हिन्दू का संयम टूटा तब कोई गंगा-जमुनी तहजीब, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग रोने वाला गैंग आकर छातियां न पीटे। 

ये कोई नई बात भी नहीं है। होली को लेकर पहले भी ज्ञान दिया जाता रहा है। जैसे, होली आते ही सब ‘वॉटर एक्टिविस्ट’ बन जाते हैं और पानी बचाने की बातें करने लगते हैं। ऐसे सेलेब्रिटी जो अपने घर में स्विमिंग पूल में नहा-नहा कर रोज हजारों लीटर पानी बर्बाद करते हैं, वो भी होली पर पानी बचाने का ज्ञान देते नजर आते हैं। कभी ‘सूखी होली’ खेलने को कहा जाता है तो कभी केवल फूलों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।

जब रंग ही गायब हो जाए तो होली कैसी? अब ‘दैनिक जागरण’ के एक विज्ञापन को देखिए। ये स्पष्ट नहीं है कि ये विज्ञापन कब का है, लेकिन ये होलिका दहन को लेकर ही है। ‘दैनिक जागरण की पहल’ के नाम पर अख़बार ‘एक मोहल्ला, एक होलिका’ नाम से एक विज्ञापन लेकर आ गया। इसमें उसने लिखा, “इस बार होली पर प्रयास करें कि थोड़ी दूर पर अलग-अलग होलिका जलाने की जितना जगह हो सके, एक मोहल्ले में एक ही होलिका जलाएँ। इससे प्रदूषण घटेगा, अपमापन बढ़ेगा।” साथ ही कुछ ‘दिशानिर्देश’ भी दिए गए।

ईद-क्रिसमस पर जम कर बधाइयाँ देने वाली मीडिया होली पर जम कर हिन्दुओं को नीचा दिखाती है। ‘दैनिक जागरण’ ने भी हिन्दुओं को ये सलाह दिया – यातायात बाधित न करें, इससे हमें और आपको ही परेशानी होगी, हाईटेंशन व अन्य तारों को बचाएँ, लकड़ी की जगह उपलों का प्रयोग करें, ताकि बचे रहें हमारे पेड़, ऐसा कोई सामान न जलाएँ जिससे पर्यावरण में प्रदूषण पैदा हो। क्या ईद-क्रिसमस पर ऐसे ज्ञान निकलते हैं?

अब जरा सोचिए। क्या ईद पर मीडिया लोगों को ये सलाह देती है कि एक मोहल्ले में एक ही बकरा काटें, क्योंकि जीव-जंतुओं की हत्या करना ठीक नहीं है? क्या ऐसे सलाह दिए जाते हैं कि जानवरों के खून को सड़क पर न बहाया जाए और बचे हुए मांस के टुकड़ों को सड़क पर न फेंका जाए? इससे तो बीमारी पैदा ही होती ही है। इस्लामी मुल्कों में सड़क पर खून की नदियाँ बहती दिखती हैं। ऐसे ही, ईद पर कभी ये ज्ञान नहीं दिया जाता कि सड़क जाम कर के नमाज न पढ़ें, इससे तो सचमुच यातायात बाधित होता है।

इसी तरह क्रिसमस और ईसाई नववर्ष के मौके पर कभी ये ज्ञान नहीं दिया जाता कि पटाखे न जलाएँ। दीवाली खत्म होते ही इस तरह का ज्ञान देने की तारीख़ एक्सपायर हो जाती है। क्रिसमस पर कभी आर्टिफिसियल पेड़ों को घर पर न लाने की सलाह नहीं दी जाती। कभी ये नहीं कहा जाता कि पार्टियों में पानी और भोजन बर्बाद न करें। उलटा और खुल कर जश्न मनाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि सारे पर्यावरण का ठेका हिन्दुओं ने ही ले रखा है जो प्रकृति की पूजा करते हैं।

क्या हम ‘दैनिक जागरण’ से ये पूछ सकते हैं कि अख़बारों के लिए कागज कैसे बनता है? इसके लिए पेड़ काटे जाते हैं या नहीं? क्या ‘दैनिक जागरण’ लोगों को ये सलाह देते हुए खबर प्रकाशित करेगा कि आप अखबर न खरीदें, क्योंकि इसके लिए जो कागज आता है वो पेड़ काट कर बनाया जाता है। लेकिन नहीं, जिन्हें ‘एक मोहल्ला, एक बकरा’ और ‘एक मोहल्ला, एक क्रिसमस ट्री’ लिखने की हिम्मत नहीं है, वो एक मोहल्ला, एक होलिका’ लिख रहे हैं।

होलिका दहन एक ऐसा त्योहार है, जिसे भक्त प्रह्लाद के राक्षसों के अत्याचार के बावजूद ज़िंदा बच जाने की कहानी कहता है। अब देखिए, एक यूट्यूबर और कथित महिला एक्टिविस्ट ने तो होलिका दहन को ही महिला विरोधी त्योहार बताते हुए पूछ दिया कि एक सभ्य समाज में स्त्री को ज़िंदा जलाना कहाँ तक उचित है? ऐसी बातें वही करते हैं, जिन्हें न तो हमारे पर्व-त्योहारों के पीछे का कॉन्सेप्ट पता है और न इसका इतिहास और इसकी कथा।

होलिका दहन के बारे में हिन्दुओं को पता है कि होलिका अपने मासूम भतीजे प्रह्लाद को ज़िंदा जलाने के लिए आग में बैठ गई थी, लेकिन वो जल गई और भक्त प्रह्लाद बच गए। अगर होलिका जलाना स्त्री-विरोधी है तो क्या हर साल रावण को दशहरा के मौके पर जलाए जाने को पुरुष विरोधी बता कर आंदोलन खड़ा कर दिया जाना चाहिए? स्त्रियों की जहाँ पूजा होती है, उस हिन्दू धर्म में इस तरह के पाश्चात्य वोक एक्टिविज्म की ज़रूरत ही नहीं है।

होली रंगों का त्योहार है। रंग और पानी के बिना इसे हम क्यों मनाए? ऐसे ही, महाशिवरात्रि पर दूध बचाने का ज्ञान दिया जाता है। दीवाली पर कहा जाता है कि दीये मत जलाओ और पटाखे मत उड़ाओ। दुर्गा पूजा कर हिन्दुओं को ये कह कर नीचा दिखाया जाता है कि भारत में बलात्कार होते हैं। गणेश चतुर्थी के मौके पर प्रतिमा जल में न विसर्जित करने को कहा जाता है। अर्थात, जितने हिन्दू त्योहार उतने ही किस्म के नए-नए ज्ञान।

त्योहार हमेशा से वैसे ही मनाए जाने चाहिए जैसा हमारे शास्त्रों पर वर्णित है और जैसे हमारे पूर्वज पूरे उत्साह के साथ मनाते रहे हैं। हिन्दू त्योहारों में न तो हिंसा के लिए कोई जगह है और न ही किसी और को नुकसान पहुँचाया जाता है। उत्सव के दौरान सब जश्न में डूबे रहते हैं, एक-दूसरे से मिलते हैं और ईश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं। इसमें लिबरल गिरोह के ज्ञान के लिए कोई जगह नहीं है। गया की ज़रूरत जिन्हें है, उन्हें देने में इनकी हालत पस्त हो जाती है क्योंकि वो ‘सिर तन से जुदा’ कर देते हैं।

इसीलिए, खूब अच्छे से होली मनाइए। रंग लगाइए एक-दूसरे को। पानी में रंग घोल कर एक-दूसरे पर उड़ेलिए। हाँ, बस हमें ऐसे रंगों का प्रयोग नहीं करना है जिससे हमारा नुकसान हो जाए। ब्रज में फूलों की होली खेलिए, काशी में चिताभस्म की होली खेलिए और मोहल्ले में अबीर-गुलाल सबका प्रयोग कर के होली खेलिए। पकवान खाइए, पूजा-पाठ कीजिए और ज्ञान देने वाले को दिखा-दिखा कर ये सब कीजिए। कोई ‘दैनिक जागरण’ या फिर कोई ‘निर्देश सिंह’ ये डिसाइड नहीं कर सकते कि हिन्दू अपने त्योहार कैसे मनाएँ।

राजस्थान : होली आते ही बाड़मेर में लगी धारा-144 : ना रंग फेंकें ना गुब्बारे, ना गाना बजाएँ

सेकुलरिज्म के नाम पर आखिर कब तक हिन्दुओं पर अत्याचार किया जाता रहेगा? आखिर कब तक छद्दम सेक्युलर मुस्लिम तुष्टिकरण के आगे घुटनों पर बैठे रहेगें? आखिर कब तक हिन्दुओं के संयम की अग्नि-परीक्षा ली जाती रहेगी? कहाँ है 'गंगा-जमुनी तहजीब', 'संविधान की दुहाई' और 'अधिकारों की दुहाई' देने वाला गैंग? क्या इस गैंग के सामाजिक बहिष्कार का समय आ गया है? क्योकि जब तक इन तुष्टिकरण पुजारियों का परिवार सहित सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा, इन्हें सेकुलरिज्म का अर्थ समझ नहीं आने वाला। क्या इसी का नाम सेकुलरिज्म है? क्या हर हिन्दू को योगी आदित्यनाथ बनने का समय आ गया है? राजस्थान को कोई वसुंधरा नहीं अब योगी की जरुरत है। 

राजस्थान में हिंदुओं के त्योहार आते ही प्रशासन प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिया। बाड़मेर जिले के कलेक्टर की ओर से जिले में धारा 144 लगा दी है। प्रशासन के इस निर्णय पर विवाद हो गया है। ऑर्डर में लिखा है कि कोई भी इस तरीके से रंग न खेले कि किसी दूसरे की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचे। इसका भाजपा और हिंदू संगठनों ने विरोध किया है।

बाड़मेर के जिलाधिकारी लोकबंधु द्वारा जारी किए गए इस ऑर्डर पर राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के उपनेता राजेंद्र राठौड़ ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि यह हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के साथ कुठाराघात है। यह आदेश अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार पर कलंक है।

इस मामले को राजेंद्र राठौड़ ने विधानसभा में भी उठाया और कहा कि होली का पर्व रंगों का त्योहार है। उन्होंने कहा, “बाड़मेर कलेक्टर का एक आदेश मेरे हाथ में है। कलेक्टर ने 2 से 12 मार्च तक धारा 144 लागू की है। होली पर धारा 144 लागू करना हमारी धार्मिक भावना के साथ खिलवाड़ है।” उन्होंने सरकार इस ऑर्डर पर जवाब दे।

                              बाड़मेर जिलाधिकारी द्वारा निकाला गया आदेश (साभार: दैनिक भास्कर)

जिला कलेक्टर द्वारा निकाले गए आदेश में गाना बजाने और नारे लगाने पर पाबंदी लगाई है। आदेश में कहा गया है कि किसी भी धर्म का कोई व्यक्ति कोई ऐसा ऑडियो गाना नहीं चलाएगा और ना ही नारे लगाएगा, जिससे किसी दूसरे धर्म या व्यक्ति की भावना को ठेस पहुँचे।

आदेश में आगे कहा गया है कि होली पर इस तरह रंग ना खेलें कि दूसरे व्यक्ति की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचे। किसी व्यक्ति की इच्छा के विरूद्ध उस पर रंग ना डाले, जिससे कि साम्प्रदायिक या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचे।

उधर, कलेक्टर ने कहा कि यह ऑर्डर सभी त्योहारों से पहले निकाले जाते हैं। इसमें लोगों के इकट्ठा होने पर रोक नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर लोग शराब ना पीएँ, धारदार हथियार ना निकालें और लड़ाई-झगड़े आदि ना हों, इसलिए ऑर्डर निकाला गया है। ये ऑर्डर कई सालों से निकल रहे हैं।

पिछले साल भी हिंदुओं के त्योहारों से पहले राजस्थान के कई जिलों में धारा 144 लागू की गई थी। पिछले साल अप्रैल में कॉन्ग्रेस सरकार (Congress Government) ने अजमेर जिले में हिंदू त्योहारों से पहले धारा 144 लागू किया था। इस फरमान में आयोजनों के दौरान धार्मिक चिन्ह वाले झंडों को नहीं लगाने की हिदायत दी गई थी।

उस भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अजमेर नगर निगम के डिप्टी मेयर नीरज जैन हिंदुस्तानी ने कॉन्ग्रेस शासन की तुलना मुगलराज से की थी। नीरज जैन ने ट्वीट कर लिखा था, “कोटा, बीकानेर, जोधपुर और अब अजमेर सहित अन्य शहर में गहलोत साब का नादिरशाही फ़रमान। किसी धार्मिक चिन्ह के झण्डे लगाना, DJ बजाना अपराध है! गौरतलब है कि एक और महावीर जयंती, दुर्गा अष्टमी, अम्बेडकर जयंती, राम नवमी और हनुमान जयंती के जुलूस और शोभा यात्रा पर ये आदेश।“

उस साल 10 अप्रैल को रामनवमी, 14 अप्रैल को महावीर जयंती और 16 अप्रैल को हनुमान जयंती थी। इन अवसरों पर हिंदू समुदाय धूमधाम से झाँकी एवं जुलूस निकालते हैं और पर्व को मनाते हैं। हालाँकि, राजस्थान सरकार ने फरमान जारी कर आयोजनों के दौरान धार्मिक झंडे पर रोक लगा दी थी। इसके बाद काफी बवाल हुआ था।

राजस्थान के करौली में 2 अप्रैल 2022 को पथराव की घटना के बाद कॉन्ग्रेस सरकार ने घरों पर धार्मिक झंडे फहराने पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा जुलूसों और शोभा यात्राओं के दौरान डीजे बजाने को लेकर पाबंदियाँ लगाई थी। ये पाबंदियाँ दुर्गा अष्टमी, राम नवमी, महावीर जयंती और हनुमान जयंती आदि हिंदू त्योहारों को चिह्नित करने के लिए की गईं।

राज्य के कई जिलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 लागू कर दी गई है। राजस्थान सरकार ने अपने आदेश में यहाँ तक कहा था कि इस दौरान लोगों को घर के आगे से गुजरने वाली शोभा यात्रा को देखने के लिए अपने घरों की छतों पर खड़े होने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

इससे पहले 28 अक्टूबर 2021 को झुंझनू जिले के जिलाधिकारी उमर दीन खान ने दीपावली त्योहार के चलते धारा 144 लागू करने का आदेश जारी कर दिया था। इस दौरान धार्मिक ऑडियो चलाने से लेकर जयकारा लगाने तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद खूब बवाल हुआ। बवाल के बाद जिलाधिकारी को अपने आदेश में बदलाव करना पड़ा था।

लेफ्ट लिबरल और इस्लामिक गैंग प्रोपेगेंडा के साथ लौटा : महिलाओं के साथ ‘छेड़छाड़’ के लिए होली है

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
रंगों का त्योहार होली आते ही वामपंथियों, लिबरलों और इस्लामवादियों का प्रोपेगेंडा भी शुरू हो गया है। वो हमेशा की तरह हिन्दू त्यौहार को नीचा दिखाने की अपनी हरकत में लग गए हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक करवाचौथ पर 'मै क्यों भूखी रहूं', शिवरात्रि पर 'शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की बजाए किसी गरीब को दूध दो', और दीपावली पर आतिशबाज़ी से प्रदुषण होता है' आदि आदि। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि कब्रों पर चादर चढ़ाने की बजाए किसी गरीब को दे दी जाये, और जिस दिन यह बात हिन्दुओं ने उछाल दी यही गैंग संविधान और गंगा-यमुना तहजीब का स्वांग इस्लामवादियों और उनके वैचारिक कॉमरेडों ने एक बार फिर से हिन्दू पर्व की छवि को खराब करने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने होली के पर्व को महिलाओं के खिलाफ दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने आरोप लगाया कि होली के त्योहार के दौरान हिन्दू पुरुष, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते हैं और उनका उत्पीड़न करते हैं।

एक सोशल मीडिया यूजर ने ट्विटर पर सेक्सिस्ट टिप्पणी करते हुए लिखा कि होली के नाम पर पूरे देश में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ किया जाता है।

मिनी नायर नाम की एक महिला, जो कि लेखक होने का दावा करती है, लिखती है कि होली उसके लिए काफी भयानक थी, क्योंकि पिछले साल वह केरल में इस त्योहार के दौरान बेचैनी महसूस कर रही थी। ‘फेमिनिस्ट’ मिनी नायर पुरुषों को ‘राक्षस’ बुलाते हुए कहती है कि भांग उसकी परेशानी का सबब बना था।
शची नेली नाम की एक अन्य हिंदूफोबिक सोशल मीडिया यूजर ने शनिवार को ट्विटर पर दावा किया कि वह होली नहीं खेलती है, क्योंकि अतीत में होली खेलने खेलने के दौरान उसके साथ छेड़छाड़ की गई थी। नेली यह भी कहती है कि इस त्योहार को मनाते समय जब ‘होली है’ का उद्घोष किया जाता है, तो ये उसे एक युद्ध की तरह लगता है।
सोशल मीडिया पर एक इस्लामिक ट्रोल Opus of Ali ने भी इसी तरह के हिंदूफोबिक ट्वीट्स का सहारा लिया है, जिसमें कहा गया कि होली छेड़छाड़ का त्योहार है। कट्टरपंथी इस्लामवादी ने लगातार एक के बाद एक कई ट्वीट करते हुए लिखा कि छेड़छाड़ से बचने के लिए लोगों को होली को ना कहना चाहिए।
एक अन्य ट्वीट में Opus of Ali ने होली मनाने वाले हिंदुओं पर झूठे दावे करते हुए कहा कि इस दौरान महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता है।
इसके साथ ही ‘Baudhkaro’ नामक एक अल्ट्रा-लेप्ट समूह ने होली पर हमला किया। ये खुद को डॉ. बीआर अंबेडकर की शिक्षाओं का फॉलोवर होने का दावा करता है। इसमें दो वामपंथी कट्टरपंथी द्वारा ‘त्योहार- द एंटी होली सॉन्ग’ गाया जाता है। इसमें से एक कट्टरपंथी विवादास्पद वामपंथी विश्वविद्यालय जेएनयू से पीएचडी छात्र है, जो भड़काऊ टिप्पणी करता है और दावा करता है कि होली एक जातिवादी त्योहार है, जिसमें ऊँची जाति के हिंदुओं द्वारा निचली जातियों की महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता है।

इनका रीति-रिवाजों और परंपराओं को कोसना केवल हिंदू त्योहारों तक ही सीमित है। गैर-हिंदू त्योहारों की प्रतिगामी प्रथाओं की बात आते ही ये आँखें मूंद लेते हैं। हकीकत यह है कि लिबरल देश की गैर-स्वदेशी संस्कृति के सभी पहलुओं को छुपाते हैं, जबकि वे सभी हिंदू त्योहारों को खत्म करने का प्रयास करते हैं।
लेफ्ट मीडिया ने पिछले साल भी होली पर निशाना साधा था। फेक न्यूज वेबसाइट ‘द क्विंट’ ने हिंदुओं के रंगों के त्योहार की छवि को खराब करने के लिए इस पर्व को बच्चों द्वारा सड़कों पर आतंक फैलाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अवसर के रूप में ब्रांड बनाने के लिए आगे बढ़ाया था। इसी तरह से वामपंथी मीडिया पोर्टल स्क्रॉल ने भी होली के खिलाफ जहर उगले थे।

होली पर आतंकियों की नापाक हरकत, सोपोर में ग्रेनेड हमले

J&K: होली पर आतंकियों की नापाक हरकत, सोपोर में ग्रेनेड हमले में दो पुलिसकर्मी घायल
होली (Holi 2019) पर भी आतंकी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं. मार्च 21 को आतंकियों ने जम्मू कश्मीर के सोपोर में ग्रेनेड से हमला किया. इस हमले में एक अधिकारी सहित दो पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं. दोनों घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. हमले के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों और सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी है. हमलावरों की तलाश की जा रही है.
एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि उत्तरी कश्मीर जिले में सोपोर के मुख्य चौक पर आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों पर एक ग्रेनेड फेंका. उन्होंने बताया कि विस्फोट में डांगीवाचा थाना के प्रभारी सहित दो पुलिसकर्मी मामूली रूप से घायल हो गये. घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. अधिकारी ने कहा कि सुरक्षा बलों ने हमलावरों को पकड़ने के लिए इलाके की घेराबंदी की है और तलाशी अभियान शुरू किया है.
बुधवार (20 मार्च) को अलगाववादियों की ओर से यहां एक युवक की मौत के विरोध में बुलाए गए बंद से कश्मीर घाटी में जनजीवन प्रभावित रहा. युवक की पुलिस हिरासत में सोमवार को मौत हो गई थी. दक्षिण कश्मीर के अवंतीपोरा से गिरफ्तार किए जाने के तीन दिन बाद श्रीनगर में पुलिस हिरासत में रिजवान असद पंडित (28) की मौत हो गई.
युवक की हिरासत में मौत की निंदा कश्मीर के राजनीतिक व सामाजिक हलकों में की गई. युवक एक निजी स्कूल में शिक्षक था. अधिकारियों ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 176 के तहत मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए हैं.
दुकानें, सार्वजनिक परिवहन व दूसरे व्यापारिक व शैक्षिक संस्थान श्रीनगर शहर में व घाटी के अन्य जिला मुख्यालयों में बंद रहे. श्रीनगर शहर में इक्का-दुक्का वाहन चले. अंतर-जिला परिवहन बंद रहे.
अधिकारियों ने घाटी में कानून व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस व अर्धसैनिक बलों की भारी संख्या में तैनाती की है. दक्षिण कश्मीर के जिलों में मोबाइल व इंटरनेट सुविधाएं निलंबित की गई है, जबकि घाटी के अन्य हिस्सों में इसकी गति में कमी की गई है.

आखिर कब तक हिन्दू त्यौहारों का अपमान होता रहेगा?

हिंदू धर्म के त्योहारों के अपमान का सिलसिला जारी है। इस बार ये जिम्मेदारी संभाली है हिंदी अखबार दैनिक भास्कर ने। अखबार ने सोशल मीडिया पर एक कैंपेन शुरू किया कि ‘मैं राखी नहीं बांधूंगी’। ऐसे जैसे कि राखी बांधना कोई घटिया काम हो। त्योहार के पीछे मकसद चाहे जो हो लेकिन ऐसे वक्त में जब भाई-बहन के प्यार का ये प्रतीक लोग खुशी के साथ मना रहे हों, एक अखबार का ये रवैया बेहद असंवेदनशील लग रहा है। रक्षाबंधन ही नहीं, हिंदुओं के तमाम दूसरे त्यौहारों को भी इसी तरह अपमानित करने की कोशिश अक्सर होती रहती है। दैनिक भास्कर अखबार ही इससे पहले दिवाली, होली और शिवरात्रि जैसे त्यौहारों को लेकर भद्दे अभियान चला चुका है।

रक्षाबंधन को लेकर क्या है ऐतराज

रक्षाबंधन पर बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं। ऐसा कहते हैं कि बदले में भाई उनकी रक्षा का प्रण लेते हैं। हो सकता है कि किसी वक्त के समाज में ऐसा होता रहा हो, लेकिन अब यह बात पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ चुकी हैं। कई महिलाएं अपने भाइयों और पूरे परिवार की देख-रेख भी करती हैं।सांकेतिक तौर पर भाई-बहन के प्यार का दुनिया में यह सबसे अनोखा त्योहार है। सवाल यह है कि जब फ्रेंडशिप डे पर दोस्त एक-दूसरे को बिना किसी कारण फ्रेंडशिप बैंड बांध सकते हैं तो रक्षाबंधन से ऐसा कौन सा पहाड़ टूट जाएगा? रक्षाबंधन की नकल पर अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में पिछले कुछ साल से सिस्टर्स डे मनाया जाता है। यह फेस्टिवल भी अगस्त में ही पड़ता है। 
इस सन्दर्भ में अवलोकन करें:--

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
SINCE Independence,what is the position of Hindus in India? They are dishonoured. All rules and laws are against Hindus in the name of secu...

अगर रक्षाबंधन से दिक्कत है तो फिर सिस्टर्स और ब्रदर्स डे से क्यों नहीं? रक्षा बंधन का विरोध करने वाले अपने दिमागी दिवालिएपन को प्रमाणित कर रहे हैं, इन पश्चिमी सभ्यता के पूजकों को नहीं मालूम की इन दोनों का अर्थ एक ही होता है। फिर इस विरोधियों को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि जब बहन राखी और भाईदूज के दिन अपने भाई के हाथ में कलावा/राखी बांधती है, तो वह अपने भाई की रक्षा और भलाई की अपने इष्ट देवता से कामना करती है। जबकि पश्चिमी सभ्यता के सिस्टर्स और ब्रदर्स डे पर ऐसा कुछ नहीं होता। फिर हिन्दू त्यौहारों को अपमानित करने वाले पश्चिमी सभ्यता के पुजारी यह बताएँ कि "क्या कारण है कि क्रिसमस दिवस पर रात्रि 11 बजे के बाद गैर-ईसाईयों के चर्च में जाने पर क्यों पाबन्दी होती है?" दूसरे, बकरीद पर सडकों और नालियों में बहने वाले टनों खून के विरुद्ध किसी की आवाज़ नहीं निकलती? 

0001246896-10-1-large2हिन्दू धर्म के खिलाफ ‘ग्लैमरस’ प्रचार

हैरत की बात है कि रक्षाबंधन ने इस अभियान का प्रचार एक मॉडल से करवा कर इस दकियानूसी अपील में ग्लैमर जोड़ने की कोशिश की है। यह अखबार इससे पहले होली न मनाने की अपील जारी करता रहा है। अपने एक पोस्टर में तो इन्होंने होली खेलने को अपराध तक बता दिया था। सवाल यह है कि दैनिक भास्कर वाले रोज लाखों लीटर पानी बर्बाद करने वाले वॉटर पार्कों या दूसरे धर्मों के ऐसे दकियानूसी त्यौहारों के खिलाफ अभियान चलाने की हिम्मत क्यों नहीं करता। किसी धर्म के त्यौहार पर इस तरह की भद्दी टिप्पणी करने का दैनिक भास्कर को किसने अधिकार दे दिया। अगर दिवाली, होली, रक्षाबंधन के खिलाफ अखबार ऐसे कमेंट्स कर रहा है तो बकरीद पर वो चुप्पी क्यों साधे रखता है? यही कारण है कि शक होता है कि अखबार के इस अभियान के पीछे किसी ईसाई या जिहादी संगठन की फंडिंग है।

बाकी हिंदू त्योहारों को लेकर भी छींटाकशी

रक्षाबंधन और होली ही नहीं, दिवाली, करवा चौथ और ऐसे तमाम त्यौहारों को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां आम बात हैं। जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त ने कुछ साल पहले ट्विटर पर करवा चौथ को दकियानूसी त्यौहार बताया था। उस वक्त इसे लेकर काफी हंगामा मचा था क्योंकि वो और वैसी कुछ दूसरी महिला पत्रकार बुरखा और बकरीद जैसी बुराइयों को सही ठहराने की कोशिश करती रही हैं। इसी तरह हाल ही में दही-हांडी और जलीकट्टू जैसे हिंदू त्यौहारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नियम कायदे तय किए हैं। जबकि दूसरे धर्मों के त्योहारों पर अदालतें हाथ डालने से बचती हैं। नागपंचमी के मौके पर पेटा ने एक अजीबोगरीब अभियान चलाया था। जिसमें लोगों से अपील की गई थी कि वो अपने घरों में नाग लाकर उन्हें न मारें। ऐसी कोशिशें हिंदू धर्म के खिलाफ चल रहे दुष्प्रचार की निशानी नहीं तो और क्या हैं।