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कभी-कभी ह्यूमन एरर हो जाता है… रेल मंत्री रहते दुर्घटना पर बोलती थी ममता बनर्जी, लालू के समय 550 बार पटरी से उतरी ट्रेनें

ओडिशा के बालासोर में हुए शुक्रवार (2 जून 2023) की शाम को हुए भीषण रेल हादसे में अब तक 288 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इसको लेकर देश में राजनीति तेज हो गई है। विपक्षी दल रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव से इस्तीफा माँग रहे हैं। हालाँकि, रेल मंत्री कह रहे है कि यह राजनीति करने का वक्त नहीं है।

अश्विनी से इस्तीफा माँगने वालों में रेल बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शामिल हैं। ये तीनों ही नेता केंद्र की विभिन्न सरकारों में रेल मंत्री रह चुके हैं। इनका आरोप है कि ये अब तक सबसे बड़ी रेल दुर्घटना है, इसलिए रेल मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए।

ममता बनर्जी तो इसके लिए मौत के आँकड़ें तक बढ़ाने की कोशिश करती नजर आईं। उन्होंने यहाँ तक झूठा दावा कर दिया कि बालासोर में दुर्घटनाग्रस्त हुईं दो बोगियों में फँसे लोगों को रेस्क्यू करने का भी काम नहीं किया गया। हालाँकि, मौके पर मौजूद अश्विनी ने ममता को बीच में रोका और उन्होंने मौत के आँकड़ें सही बताए और रेस्क्यू की बात को झूठा साबित किया।

साल 2010 में ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहते हुए पश्चिम बंगाल के सैंथिया में एक बड़ा रेल हादसा हुआ था। इस हादसे में सैकड़ों लोग मारे गए थे। राहत और बचाव कार्य की ऐसी स्थिति थी कि समय पर सहायता नहीं मिलने के कारण कई लोगों की जान चली थी। घटनास्थल से मलबे को हटाने में कई दिन लग गए थे। मृतकों के अंतिम संस्कार तक की उचित व्यवस्था नहीं की गई थी।

हालाँकि, इन तीनों लोगों के रेल मंत्री के रूप में कार्यकाल देखें तो वो ग्रस्त सवालों के घेरे में आ जाएँगे। आँकड़े बताते हैं कि रेलमंत्री के रूप में सबसे अधिक रेल दुर्घटनाएँ और लोगों की मौत नीतीश कुमार के कार्यकाल में हुए और उसके बाद ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहते हुए।

 रेलमंत्री के रूप में नीतीश कुमार

बिहार के सीएम नीतीश कुमार पहली बार अटल सरकार में रेल मंत्री बने थे। नीतीश कुमार के पहले ही कार्यकाल के दौरान 1999 में गैसल में बड़ा रेल हादसा हुआ था, जिसमें 285 लोगों की मौत हुई थी। हालाँकि, इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके पहले रेलमंत्री रहते हुए एक हादसे के बाद लाल बहादुर शास्त्री भी इस्तीफा दे चुके थे। नीतीश कुमार दूसरे रेलमंत्री थे।
साल 2001 में एक बार फिर नीतीश को रेल मंत्रालय मिला। इस पर वह साल 2004 तक रहे। नीतीश कुमार के कार्यकाल में कुल 79 रेल हादसे हुए, जिनमें कुल 1,527 लोगों की मौत हुई। वहीं, नीतीश कुमार के रेल मंत्री रहते ट्रेन के बेपटरी होने की 1000 घटनाएँ हुईं।

रेल मंत्री ममता बनर्जी हादसे को लेकर संसद में जवाब दी थीं

ममता बनर्जी दो बार रेल मंत्री रह चुकी हैं। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल 1999 में और दूसरा यूपीए-2 के दौरान 2009 में। ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहते हुए 54 रेल दुर्घटनाएँ हुईं थीं, जिनमें कुल 1451 लोगों की मौत हुई थीं। इसके साथ ही ममता के कार्यकाल में ट्रेनों के पटरी से उतरने की 839 घटनाएँ हुई थीं।
इस दौरान ममता बनर्जी पर सवाल भी खूब उठे थे। इसको लेकर उन्हें संसद में जवाब भी देना पड़ा था। लोकसभा में बोलते हुए ममता बनर्जी ने कहा था, “कभी ह्यूमन एरर (मानवीय गलती) हो जाता है। वो भी हमलोग देखता है कि इसे नहीं होना चाहिए। इसको जितना जल्दी चेंज करके अपडेट करना है।”

रेलमंत्री रूप में लालू यादव

राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली यूपीए-1 सरकार में रेल मंत्री बने थे। लालू के 5 साल के कार्यकाल में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के कार्यकाल की तुलना में कम हादसे हुए थे। लालू के कार्यकाल में कुल 51 हादसे हुए। इन हादसों में कुल 1,159 लोगों की जान गई। ट्रेनों के पटरी से उतरने की 550 घटनाएँ हुईं।

भाजपा नेता ने बताया काम का रिकॉर्ड

इन नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों और रेलमंत्री की इस्तीफे की माँग के बाद भाजपा नेता अमित मालवीय ने एक ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने बताया है कि नीतीश कुमार के कार्यकाल में रेल हादसों की कितनी घटनाएँ हुईं, कितने लोग मारे गए और कितनी रेलगाड़ियाँ बेपटरी हुईं। वहीं, ममता बनर्जी के कार्यकाल में इस तरह की कितनी घटनाएँ हुईं और लालू के कार्यकाल में कितनी। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि भाजपा के कार्यकाल में रेलवे में कितना काम हुआ है।
मालवीय ने ट्वीट किया, “पिछले कुछ वर्षों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए भारतीय रेलवे द्वारा उठाए गए कुछ कदम इस प्रकार हैं: पटरियों के रखरखाव और नवीनीकरण के लिए रिकॉर्ड काम किया गया है। अकेले वर्ष 2022-23 में ही 5,227 किलोमीटर के ट्रैक नवीनीकरण और रखरखाव का काम किया गया है। पिछले दस वर्षों में कुल 37,159 किलोमीटर ट्रैक का नवीनीकरण किया गया। औसतन 3,716 किमी प्रति वर्ष। इसकी तुलना में वर्ष 2013-14 में केवल 2,885 किलोमीटर ट्रैक का नवीनीकरण किया गया।”
मालवीय ने आगे लिखा, “ब्रॉडगेज मार्ग पर सभी मानवरहित फाटकों को समाप्त कर दिया गया है। रेलवे मार्गों पर ट्रेन टक्कर बचाव प्रणाली (TCAS) या कवच लगाने का काम तेजी से चल रहा है। देश भर में रोड अंडर ब्रिज (आरयूबी) और रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण तेजी से किया जा रहा है। पारंपरिक पुराने कोचों को अति सुरक्षित और अत्याधुनिक एलएचबी कोचों से बदलने का कार्य भी तेजी से किया जा रहा है।”

‘जमानत जब्त कराने के लिए कांग्रेस को सीट दें? क्या होता है गठबंधन?’ : लालू यादव

जेल से छूटने बार बिहार पहुँचे लालू यादव
एक समय था, जब लालू यादव गाँधी परिवार के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे, लेकिन आज कांग्रेस की इतनी दयनीय स्थिति हो गयी है, जिसके मन में जो आता है कांग्रेस को कह रहा है। 
बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के मुखिया लालू यादव ने कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी भक्तचरण दास को ‘भकचोन्हर’ करार दिया है। जमानत पर जेल से छूटने के बाद पहली बार बिहार दौरे पर जा रहे लालू यादव ने मीडिया से ये बात कही। लालू यादव 24 अक्टूबर, 2021 को पटना पहुँच रहे हैं। बिहार में कुशेश्वर स्थान और तारापुर – इन दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है।

इससे पहले लालू यादव ने कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन की बातों को नकार दिया। उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन के सवाल पर कहा, “अरे, बेकार की बात है। गठबंधन क्या होता है? क्या होता है कांग्रेस का गठबंधन? हारने के लिए उसे सीट दे देते हम? जमानत जब्त करवाने के लिए? भक्तचरण दास तो ‘भकचोन्हर’ है ही। उसे कुछ पता है क्या? मैं पटना जा रहा हूँ।” लालू यादव पर आरोप लगे हैं कि उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर जमानत मिला है, इसीलिए वो चुनाव प्रचार नहीं कर सकते।

हालाँकि, उन्होंने इन आरोपों को नकार दिया है। बिहार कांग्रेस के प्रभारी भक्तचरण दास ने कहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार की सभी 40 सीटों पर कांग्रेस अकेले लड़ेगी। साथ ही उन्होंने राजद पर साथ न देने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि राजद ने महागठबंधन धर्म नहीं निभाया। साथ ही बताया कि कांग्रेस नेता चुनाव प्रचार के लिए बिहार पहुँच चुके हैं। राजद और कांग्रेस, दोनों इस उपचुनाव में अलग-अलग लड़ रहे हैं।

41 महीने बाद बिहार पहुँच रहे लालू यादव के स्वागत के लिए राजद कार्यकर्ता भी जोश में हैं और राबड़ी देवी के सरकारी आवास की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। 27 अक्टूबर को उनकी रैलियाँ हो सकती हैं। 30 अप्रैल को जमानत मिलने के बाद से ही वो अपनी बेटी मीसा भारती के दिल्ली स्थित आवास पर रह रहे थे। वो अक्टूबर में ही बिहार आने वाले थे, लेकिन तब डॉक्टरों ने उन्हें मना कर दिया था। राबड़ी-मीसा भी उनके साथ बिहार आ रही हैं।

वो लगभग साढ़े 3 साल जेल में बंद रहने के बाद निकले हैं। हालाँकि, इस दौरान राँची में उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट देने के आरोप भी हेमंत सोरेन की सरकार पर लगे। राबड़ी देवी के पटना स्थित आवास पर मेडिकल टीम की निगरानी में उनकी देखरेख के लिए एक अलग कमरा तैयार किया गया है। केवल परिवार के सदस्यों को उनके कमरे में जाने की इजाजत होगी। कोशिश रहेगी कि उन्हें भीड़ का सामना न करना पड़े, इसीलिए इस पर संशय है कि वो कार्यकर्ताओं से मिलेंगे या नहीं।

बिहार चुनाव 2020 : लालू यादव का समीकरण : मुस्लिमों को बीजेपी का डर भी दिखाया, ‘जात’ देख कर आरोपित को भी बचाया

बिहार में लालू यादव का ‘माई समीकरण (MY)’ बहुचर्चित रहा है, जिसके तहत वो मुस्लिमों और यादवों का गठबंधन बना कर जीत का चक्रव्यूह रचा करते थे। दोनों ही समुदाय बिहार की आबादी में सबसे बड़े समुदाय हैं। जहाँ हिन्दुओं में सबसे बड़ी जनसंख्या यादवों की है, वहीं अल्पसंख्यकों में मुस्लिमों की जनसंख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन, इन सबके बावजूद उन्होंने भागलपुर दंगा मामले में कामेश्वर यादव को कैसे बचाया, इसकी चर्चा ज़रूरी है।

‘आप दंगा फैलाने वाली यात्रा रोक दीजिए। अगर आप ये यात्रा करेंगे तो हम आपको छोड़ेंगे नहीं क्योंकि बड़ी मुश्किल से हमने भाईचारा कायम किया है बिहार में।‘ – राम रथयात्रा से पहले लालू यादव ने दिल्ली में में लालकृष्ण आडवाणी से मिल कर ये बातें कही थीं। खैर, यात्रा हुई और कहीं मुलायम सारा लाइमलाइट न लूट ले जाएँ, इसीलिए लालू यादव ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। लालू यादव ने भागलपुर दंगा से उबरे समाज में खुद को शांति का मसीहा कह कर प्रचारित किया।

1989 में भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दंगे उस समय स्वतंत्र भारत में सबसे बड़े दंगे थे क्योंकि इसमें 1000 से भी अधिक लोगों की मौत हो गई थी। उसी साल अक्टूबर 24 को रामशिला यात्रा जा रही थी, जिसे मुस्लिमों ने अपने मोहल्ले से गुजरने से मना कर दिया था। डीएम दोनों समुदायों को समझाने-बुझाने में लगे हुए थे, तभी हिन्दू काफिले पर मुस्लिमों की तरफ से हमला कर दिया गया। इस वारदात ने दंगे में ‘आग में घी’ का काम किया।

कहते हैं, इस दंगे के बाद बिहार राजनीति में बड़ा बदलाव आया था। कांग्रेस तब असमंजस की स्थिति में जी रही थी क्योंकि शाहबानों प्रकरण में उसकी जम कर किरकिरी हुई थी। तब उसे सवर्णों के साथ-साथ मुसलमानों के भी वोट मिला करते थे। तब जनता दल में रहे लालू यादव ने मुस्लिमों के लिए जम कर सहानुभूति जताई। उन्होंने उनकी लड़ाई लड़ने की बातें की। लेकिन, उनका मुख्य मकसद यादव वोट बैंक को साधना था।

कामेश्वर यादव के अलावा कई ऐसे आरोप थे, जो यादव थे। ऐसे में अगर उनके खिलाफ लालू यादव की सरकार कोई भी कार्रवाई करती तो उनका यादव वोट बैंक चला जाता, इसीलिए इसके कुछ ही महीनों बाद मुख्यमंत्री बनने वाले लालू यादव ने भी आरोपितों पर कोई कार्रवाई नहीं होने दी। जस्टिस आरएन प्रसाद की जाँच रिपोर्ट लालू के लिए वरदान बन कर सामने आई। उसमें पुलिस को क्लीन-चिट देते हुए मुस्लिमों को ही किसी न किसी रूप में दोषी बताया गया था।

लालू यादव ने मुस्लिमों के वोट बैंक के लिए बाद में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवाया। साथ ही, राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा का विरोध कर के भी इस वोट बैंक को साधा। उन्हें जम कर भाजपा का डर दिखाया। इससे वो मुस्लिमों के मसीहा भी बने रहे और यादवों का वोट भी उन्हें मिलता रहा। भागलपुर दंगा मामले में आरोपितों पर कार्रवाई भी नहीं की और वो मुस्लिमों के रहनुमा भी बने रहे, आज भी ये वोट बैंक उनका ही माना जाता है।

जब 2015 में नीतीश कुमार ने जस्टिस एनएन सिंह की जाँच समिति की रिपोर्ट विधानसभा में रखी, तो इसमें तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार को दोषी माना गया, जिसके मुखिया सत्येन्द्र नारायण सिंह हुआ करते थे। और जब ये रिपोर्ट आई, जब नीतीश कुमार के साथ कांग्रेस बिहार में सत्ता कि मलाई चबा रही थी। वो राजद भी उनके साथ थी, जिसने दोनों तरफ से वोट लूटे थे लेकिन साथ अंत में अपनी जाति का दिया।

वहीं, जब राजग सरकार आई तो इस मामले में जाँच हुई और कार्रवाई हुई। ये इसीलिए संभव हो सका, क्योंकि उस सरकार ने जात-पात देखे बिना ही कार्रवाई की। उसने सरनेम नहीं देखा। भले ही बाद में नीतीश कुमार के कई यू-टर्न्स के कारण ये मुद्दा फिर उलझ गया, लेकिन राजग सरकार ने लालू यादव ने ब्लन्डरों को सही करने का प्रयास किया। फिर भी भाजपा पर ही सांप्रदायिक होने के आरोप लगाए जाते हैं।

एक समय जिस कामेश्वर यादव की सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए तारीफ हुई थी, उसे ही भागलपुर दंगों का मुख्य आरोपित बनाया गया था। इस मामले में कुल 27 मुकदमे दायर किए गए थे। इस दंगे के बाद भाजपा को भी लोगों ने एक विकल्प में देखना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें इस्लामी कट्टरवाद से डर लगने लगा था। नीतीश कुमार और भाजपा 2005 में सत्ता में आए, जिसके बाद इन दंगों की फ़ाइलें फिर से खोली गई थीं।

लेकिन, फरवरी 2006 में गठित की गई टीम की रिपोर्ट 2015 में तब आई, जब बिहार में विधानसभा चुनाव होने थे और लालू यादव व नीतीश कुमार की पार्टी कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने वाली थी और दूसरी तरफ भाजपा ने जीतन राम माँझी की ‘हम’ और रामविलास पासवान की लोजपा के साथ गठबंधन किया था। भागलपुर में हुए दंगों में 200 से भी अधिक गाँव इसके लपेटे में या गए थे। सरकार ने इसकी रिपोर्ट विधानसभा सत्र के ठीक आखिरी दिन पेश किया।

जबकि ये फरवरी 2015 में ही सरकार को सौंप दी गई थी। जाहिर है कि तीनों पार्टियाँ मुस्लिमों के वोट बैंक के लिए चुनाव का इंतजार कर रही थीं और उन्होंने भाजपा के खिलाफ जो डर मुस्लिमों के मन में बिठाया था, उसे इस रिपोर्ट के माध्यम से और मजबूत करने में आसानी हुई। भले ही इसके लिए कांग्रेस को अपनी ही सरकार को गाली क्यों न देनी पड़े। खैर, उस चुनाव में उन्हें जम कर वोट मिले थे और भाजपा चारों खाने चित हो गई थी।

कामेश्वर यादव को लालू यादव की सरकार के दौरान तो बरी कर दिया गया था लेकिन उन पर फिर से नकेल कसनी शुरू हो गई। कामेश्वर यादव पर असानंनपुर के मोहम्मद कयूम की हत्या कर लाश गायब करने का आरोप कयूम के पिता नसीरुद्दीन ने लगाया था और मामला दर्ज कराया गया था। हिन्दू महासभा से बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके कामेश्वर यादव ने जुलाई 2017 में जेल से निकलते ही भाजपा से टिकट मिलने की उम्मीद जताई थी।

पतबत्ती निवासी कामेश्वर यादव की अच्छी-खासी फैन-फॉलोइंग है और जेल से निकलने के बाद समर्थकों का इतना बड़ा हुजूम उमड़ आया था कि पुलिस ने उन्हें जेल से घर तक पहुँचाया था। पटना उच्च-न्यायालय ने अंततः उन्हें रिहा कर दिया। लेकिन, लालू यादव ने भी उन्हें अपने 15 साल के शासन में बचाने की जम कर कोशिश की। उन्होंने कहा था कि रिहाई के रूप में ईश्वर का वरदान मिला और उन्हें बचपन से ईश्वर पर भरोसा था।

बाद में रंजन यादव और पप्पू यादव जैसों की बगावत के बाद लालू की पकड़ यादव वोट बैंक में कमजोर जरूर पड़ी लेकिन मुस्लिमों के वो एकमात्र मसीहा बने रहे क्योंकि उन्हें बार-बार ये डर दिखाया कि भाजपा या जाएगी तो उनका क्या होगा? हालाँकि, नीतीश-भाजपा के काल में ऐसा कोई दंगा नहीं हुआ। फिर भी, लालू यादव के दोनों बेटे आज उसी MY समीकरण के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जगत भिड़ा रहे हैं।

भागलपुर दंगा मामले में कामेश्वर यादव को बचाने वाले लालू आज जेल में हैं और चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता हैं। कामेश्वर यादव भी रिहा होकर अपने घर में हैं लेकिन भागलपुर आज भी संवेदनशील बना हुआ है, लालू यादव के 15 साल के शासन की बदौलत। वहाँ लोकसभा में पिछले 7 में से 4 चुनावों में भाजपा को जीत मिली है और 1 बार राजद व 1 बार सीपीएम की जीत हुई है। 2019 में ये सीट जदयू ने जीती, तो इस हिसाब से 7 में से 5 बार राजग यहाँ से जीता है।

जहाँ तक भागलपुर विधानसभा क्षेत्र की बात है, ये जनसंघ का पुराना गढ़ रहा है। यहाँ हुए अब तक कुल 15 चुनावों में से 8 बार जनसंघ या भाजपा ने जीत दर्ज की है। हालाँकि, अश्विनी कुमार चौबे के सांसद व केन्द्रीय मंत्री बनने के बाद से ये सीट भाजपा के हाथ से फिसल गई और कांग्रेस के हाथों में चली गई। मौजूदा विधायक कारोबारी अजीत शर्मा बॉलीवुड अभिनेत्रियों नेहा शर्मा और आयशा शर्मा के पिता हैं। दोनों बहनें चुनावों में अपने पिता का खूब प्रचार करती हैं।

टी.वी. चैनल वाले चुनावी कैलकुलेशन करते समय, क्षेत्रवार जनसंख्या प्रतिशत करके बताते हैं तो कुछ इस प्रकार से दिखाते हैं कि इस चुनाव क्षेत्र में

28 % मुस्लिम

10 % ब्राह्मण

08 %ठाकुर

04% जाट

05 % लोध राजपूत

16%दलित

12%कुर्मी

02%सिख

15%अन्य जाति के मतदाता हैं, वो कभी यह क्यों नहीं दिखाते कि इस क्षेत्र में

72 % हिन्दुओं के अलावा

16% सुन्नी और 12% शिया हैं

अब से ये बदलाव आना चाहिए

हिन्दू 72%

कसाई -------------- 01 % 

गद्दी ----------------- 02 % 

अंसारी ------------- 02 % 

हज्जाम ------------- 02 % 

कायमखानी -------- 02 %

सय्यद -------------- 02 % 

पठान --------------- 02 % 

शेख ----------------- 03 % 

शैफी ----------------- 02 %

मनिहार ------------ 01 %

सलमानी ( धोबी) -- 01 %

इदरीसी ( दर्जी) --- 01 %

मंसूरी (धुनें) ------- 0.5 %

बाबर्ची ------------- 01 %

मिरासी ------------ 0.5 %

भांड ---------------- 01 %

अन्य --------------- 04 %

कभी देखा है किसी ने ऐसा टी.वी. या अखबार में ?

तो फिर केवल हिन्दुओं का ही ऐसा बटवारा क्यों?
हिन्दुओं को इसी तरह जाति में बांटकर मुगलों और अंग्रेज़ों ने हिन्दुओं पर राज किया था।

बिहार चुनाव : जंगलराज के डर से लालू से अपने भी काट रहे कन्नी

बिहार का इस बार का विधानसभा चुनाव कई मामलों में अलग दिख रहा है। मसलन, 90 के बाद यह पहला चुनाव है जिसकी चर्चा के केंद्र में लालू प्रसाद यादव नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो 23 अक्टूबर को राज्य में पहली चुनावी रैली करने वाले हैं, उन पर विपक्ष सीधे हमले से बच रहा है।

साभार :सोशल मीडिया 
राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन के उम्मीदवार भी सार्वजनिक रूप से बेरोजगारी, पलायन और विकास की बात कर रहे हैं। वे उस कथित सांप्रदायिकता का डर भी वोटरों को नहीं दिखा रहे हैं, जिसे लालू पहले आडवाणी और बाद में मोदी का ‘डर’ दिखाकर बेचा करते थे। न ही लालू के कथित सामाजिक न्याय की कोई चर्चा हो रही है।

सबसे हैरानी की बात है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का शोर मचाकर, जनता को गुमराह करने वाली पार्टियों ने कन्हैया कुमार को टिकट न देकर अपनी असलियत सामने प्रस्तुत करने के साथ-साथ अपने दोगलेपन का प्रमाण भी दे दिया है। 

विपक्ष के निशाने पर नीतीश कुमार हैं और एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ रही चिराग पासवान की लोजपा के निशाने पर भी। पर चीजें इतनी भी सुलझी नहीं हुई है। एक सीट पर जो किसी उम्मीदवार की ताकत दिखती है, दूसरी सीट पर उसका लाभ नहीं दिख रहा। मसलन –

  • चकाई से सुमित सिंह बतौर निर्दलीय मैदान में हैं। चकाई ही नहीं आसपास की सीटों पर भी आप उनका नाम सुनेंगे। लोगबाग बताते हैं कि पिछला चुनाव हारने के बाद भी वे लगातार सक्रिय रहे। उनकी चुनावी संभावनाएँ बेहतर बताई जाती है। पर जमुई से रालोसपा के टिकट पर मैदान में उतरे अजय प्रकाश को पिछले चुनाव में हार के बाद भी इलाके में लगातार सक्रिय होते रहने का लाभ नहीं दिखता है। इस सीट पर यह चर्चा है कि उनको वोट देने से बीजेपी को नुकसान हो जाएगा। दिलचस्प यह है कि सुमित और अजय भाई हैं। लेकिन, चकाई के जदयू के खाते में होने की वजह से सुमित के पक्ष में यह काम करता दिख रहा है।
  • लखीसराय से मंत्री विजय कुमार सिन्हा को लेकर बीजेपी के भीतर भी नाराजगी थी। लेकिन उनकी उम्मीदवारी के ऐलान के बाद यह चर्चा आम है कि उनको वोट नहीं देने का नुकसान बीजेपी को हो सकता है।
  • झाझा की सीट पर पिछला चुनाव हार चुके दामोदर रावत को बढ़त दिखती है। चुनाव हारने से पहले रावत नीतीश सरकार में मंत्री हुआ करते थे। उस समय इलाके में कुछ काम हुए थे। उसकी चर्चा लोग करते हैं। हारने के बावजूद जदयू के सरकार में होने का लाभ भी रावत को मिला। यहाँ माई समीकरण प्रभावी है, लेकिन कई मजबूत यादव उम्मीदवारों के कारण उनका वोट बँटने से रावत को फायदा मिलने की बात कही जा रही है।

उम्मीदवारों का चेहरा कितना महत्वपूर्ण है यह जमुई में श्रेयसी सिंह का होना बताता है। अरसे से यहाँ की राजनीति जय प्रकाश यादव और नरेंद्र सिंह के बीच बँटी रही है। इस राजनीति से निकलने के लिए मतदाता श्रेयसी को अवसर के तौर पर देख रहे हैं। खासकर, महिलाओं और युवाओं के बीच उनका होना काफी असर डाल रहा है।

इसी तरह बीजेपी से लोजपा में आए रवींद्र यादव को वैसा लाभ झाझा में नहीं है, जैसा दिनारा में राजेंद्र सिंह के लिए दिखता है। यादव को दबंग छवि का नुकसान दिख रहा है। बीजेपी और संघ के कैडर भी खुलकर उनके साथ नहीं हैं। लेकिन, राजेंद्र सिंह को जमीन पर बीजेपी और संघ के कार्यकर्ताओं का खुलकर सम​र्थन मिल रहा है।

भले चिराग पासवान खुद को ‘मोदी का हनुमान’ बताए और बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व उनके दावों को खारिज कर रहा है, पर जमीन पर बीजेपी के उम्मीदवार भी मानते हैं कि लोजपा के उम्मीदवार नहीं उतारने का लाभ उन्हें है। लेकिन यह भी सच है कि हर सीट पर जदयू को लोजपा के उम्मीदवार का होना नुकसान भी नहीं पहुँचा रहा।

अब फिर से लौटकर उस सवाल पर आते हैं कि लालू चर्चा से क्यों गायब हैं? रिटायर्ड डॉक्टर और जमुई जिले में महादलितों तथा आदिवासियों के बीच काम करने वाले एसएन झा ने आपइंडिया को बताया, “इसका बड़ा कारण यह है कि लालू यादव की चर्चा होते ही बहस सिमट कर 1990 से 2005 के समय पर आ जाती है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि उनके आने के बाद ओबीसी वर्ग का उभर हुआ था। लेकिन तब विकास का कोई काम नहीं हुआ और गुंडई बहुत बढ़ गई थी। कोई लौटकर फिर से उसी समय में नहीं जाना चाहता है। पर लालू यादव का नाम आते ही जंगलराज की चर्चा होने लगती है। इसलिए इस बार विपक्ष चुनाव नीतीश कुमार के खिलाफ केंद्रित करने की कोशिश में है। नीतीश कुमार के टाइम में काम हुआ है। लेकिन अब लोग विकल्प भी खोजने लगे हैं, क्योंकि उनका ये टर्म बहुत अच्छा नहीं रहा है।”

झाझा के 45 साल के अशोक यादव ने बताया, “नीतीश कुमार ने काम तो किया है। सड़क सब बढ़िया कर दिए हैं। बिजली भी 18-20 घंटे रहता है। पहले रोड चलने लायक नहीं था। शाम होने के बाद झाझा बाजार से कोई अपने गाँव तरफ जाने का हिम्मत नहीं कर पाता था। अब 12 बजे, 1 बजे रात तक आराम से लोग चला जाता है। कोई डर नहीं होता। नल जल वाला पानी भी आना शुरू हो गया है। बहुत काम हुआ है।”

वैसे तो कई चुनावों से यह लग रहा है कि लालू के माई (मुस्लिम+यादव) समीकरण में दरार पड़ चुकी है। तो क्या यह दरार और गहरी हुई है? लखीसराय के सुधांशु श्रीवास्तव कहते हैं, “देखिए मुसलमान लोग तो आज भी उसी को वोट देगा जो बीजेपी के खिलाफ मजबूत है। लेकिन, यादव भी बाइ एंड लार्ज अभी राजद के साथ ही है। ये लोग भले नीतीश कुमार का प्रशंसा कर दे पर अंत में वोट लालटेन को ही देगा।”

जमुई के ​निवर्तमान विधायक और राजद के उम्मीदवार विजय प्रकाश कहते हैं, “देखिए लालू जी हमेशा हमारे नेता रहेंगे। लेकिन, अभी तेजस्वी जी सब देख रहे हैं। वे भी युवा हैं और युवा लोगों का जमाना है। नीतीश कुमार 15 साल से हैं। लेकिन कोई फैक्ट्री नहीं खुला। नौकरी नहीं है। सबको कमाने के लिए बाहर जाना पड़ता है। युवा लोग ये सब देख रहा। रोड का इतना बात हो रहा आप देहात में जाकर देखिए क्या हाल है। खाली बाहर-बाहर सब चमक रहा है।”

एक चीज तो स्पष्ट है कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता और असर पर इस बार काफी सवाल हैं। लेकिन मोदी की स्वीकार्यता और प्रभाव अब भी बनी हुई है। इसलिए विपक्ष भी इस लड़ाई को नीतीश कुमार के आसपास ही समेट कर रखना चाहता है।

वैसे जमीन के उपर फिलहाल लहर जैसी कोई चीज नहीं दिख रही। विकास की बातें भले हो रही हैं पर निर्णायक उम्मीदवार का चेहरा और जातिगत समीकरण ही हैं। यह चर्चा जमीन पर जोर-शोर से है कि लोजपा के कुछ कैंडिडेट जीतने में सफल रहे और सुमित जैसे कुछ निर्दलीय भी जीत गए तो बीजेपी नीतीश कुमार को छोड़ देगी। मतदाताओं के बीच गहरे तक पैठ कर चुकी इस चर्चा का ही असर है कि सरकार से नाराजगी का सीधा फायदा विपक्ष को मिलता नहीं दिख रहा।

वीपी सिंह की सरकार को बचाने के लिए लालू ने किया था मंडल रिपोर्ट लागू करने का आग्रह

Image result for लालू वी पी सिंहवर्ष 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के गठन के बाद सत्ता के दो केंद्रों प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उपप्रधानमंत्री देवीलाल, के बीच तनाव बढ़ने लगा था। लालू प्रसाद यादव ने इसके हल के लिए वीपी सिंह को मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने की सलाह दी थी। राजद प्रमुख ने यह बात अपनी किताब "गोपाल गंज से रायसीना' में लिखी है। 
उन्होंने लिखा, 'वे (सिंह और देवीलाल) अक्सर परस्पर विरोधाभासी बयान जारी करते थे और इससे सरकार की स्थिरता के लिए खतरा पैदा होता' लालू लिखते हैं, 'मुझे चिंता होने लगी कि वीपी सिंह और देवीलाल के बीच बढ़ता तनाव राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के पतन का कारण बन सकता है, और इस प्रक्रिया में बिहार में मेरी सरकार को खतरा हो सकता है।' 
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मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने पर देश में आया उफान ; पता नहीं कितने
नवयुवकों  ने आत्मदाह किया था। 
इसके बाद उन्होंने अगस्त 1990 में वीपी सिंह सरकार को बचाने के लिए एक फार्मूला तैयार किया।उन्होंने प्रधानमंत्री से समय मांगा और उनसे कहा कि उन्हें देवीलाल के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए अन्यथा उनकी सरकार गिर जाएगी। 
'वीपी सिंह के पास तीक्ष्ण दिमाग और अच्छी राजनीतिक समझ थी। उन्होंने जवाब दिया, ‘देवी लाल जी जाटों और पिछड़ों के नेता हैं। अगर मैं उनके खिलाफ कार्रवाई करता हूं, तो वह भारत भर में यह प्रचार कर सकते हैं कि मैं पिछड़ा विरोधी और गरीब विरोधी गरीब हूं। 'मैंने जवाब दिया, 'एक रास्ता है'।  
किताब के अनुसार, उन्होंने कहा, 'मंडल आयोग ने 1983 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई है। वह सिफारिश आपके कार्यालय में धूल फांक रही है. इसे तत्काल प्रभाव से लागू करें।' यादव कहते हैं कि सिंह ने इसमें रूचि नही दिखाई, लेकिन वह उन्हें राजी कराने में सफल रहे और आखिरकार मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की गई। 
स्मरण हो, मंडल कमीशन के दूरगामी प्रभावों को देखते हुए, राजीव गाँधी और कांग्रेस ने भी इसको लागू करने की की बजाए ठंठे बस्ते में बंद रखा था, जिसका अनुभव भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और कांग्रेस को तत्कालीन प्रधानमन्त्री व्ही पी. सिंह द्वारा उस रिपोर्ट को लागू करने पर विरोध में उपजे जनउन्माद को देखने पर मिला। पता नहीं,कितने नवयुवकों ने चौराहों पर मिट्टी का तेल और पेट्रोल डालकर आत्मदाह किया था। लेकिन नेता अपनी डपली अपना राग करते हुए, अपनी कुर्सी की चिन्ता करने लगे। उस समय न कोई #metoo, #intolerance, #not in my name, #award vapsi आदि किसी गैंग को बनाने का साहस नहीं, क्योकि नवयुवक आत्मदाह भाजपा शासित राज में नहीं कर रहे थे।      
उस समय सरकार में शामिल वरिष्ठ नेताओं जैसे शरद यादव, रामविलास पासवान आदि को प्रधानमंत्री के साथ उनकी मुलाकात के बारे में जानकारी नहीं थी। उन्होंने उन नेताओं को विश्वास में लिया। वे लोग आश्चर्यचकित थे कि वीपी सिंह मंडल आयोग कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। 
लालू की किताब 'गोपालगंज से रायसीना: मेरी राजनीतिक यात्रा' रूपा से प्रकाशित हुई है और नलिन वर्मा इसके सह-लेखक हैं। 
वह लिखते हैं, 'मेरे बिहार भवन रवाना होने के बाद, वीपी सिंह ने कैबिनेट की बैठक बुलाई, और रिपोर्ट को लागू करने का निर्णय लिया गया। उन्होंने मुझे एक विशेष दूत से अधिसूचना की एक प्रति भेजी। मैंने इसे अपने ब्रीफकेस में रखा तथा जल्दी से पटना के लिए रवाना हो गया। 
उन्होंने इस किताब में कई अन्य मुद्दों की भी चर्चा की है। इनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ उनके संबंधों में उतार-चढ़ाव भी शामिल है। 
लालू लिखते हैं कि 2017 में महागठबंधन से नाता तोड़ने और राजग में शामिल होने के बाद, कुमार उनके साथ लौटना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि कुमार ने अपने दूत प्रशांत किशोर को पांच बार उनके पास भेजा था। हालांकि किशोर ने इसे खारिज कर दिया था। 
वह लिखते हैं कि पटना के मिलर हाई स्कूल में दाखिला लेने के बाद वह डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन उन्हें पता लगा कि इसके लिए उन्हें जीव विज्ञान का अध्ययन करना होगा और अपने प्रैक्टिकल कक्षाओं में मेंढकों की चीर-फाड़ करनी होगी। इसके बाद उन्होंने इस विचार को छोड़ दिया। 
रथयात्रा के दौरान दिग्गज भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी, सोनिया गांधी द्वारा संप्रग सरकार का नेतृत्व नहीं करने का फैसला और 2004 में प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह की उम्मीदवारी का यादव का समर्थन सहित कई अन्य चर्चित मुद्दों पर भी इस किताब में रोशनी डाली गयी है।(स्रोत :भाषा)

लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की शादी में दरार

लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की शादी में दरार, ऐश्वर्या से तलाक की दी अर्जी: सूत्र
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के घर में खटपट की खबर पहले से ही आ रही थी. लेकिन यह बात तेज प्रताप यादव और उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव को लेकर सामने आ रही थी. हालांकि अब लालू यादव के घर के अंदर से अलग ही चौंकाने वाली खबर आ रही है. दरअसल, सूत्रों के अनुसार खबर है कि तेजप्रताप यादव अपनी पत्नी ऐश्वर्या रॉय से तलाक लेने वाले हैं. उन्होंने ऐश्वर्या से तलाक लेने के लिए फैमि‍ली कोर्ट में अर्जी भी दे दी है.
सूत्रों के हवाले से खबरें आ रही हैं क‍ि तेज प्रताप और ऐश्‍वर्या पि‍छले चार महीने से साथ नहीं रह रहे हैं. इन्‍हीं खबरों के बीच ऐश्‍वर्या अपने पि‍ता चंद्रि‍का राय के साथ राबड़ी देवी के आवास पहुंच गए हैं. उधर तेज प्रताप यादव, लालू से मि‍लने के ल‍िए रांची रवाना होने वाले हैं. तेजप्रताप ने उमाशंकर द्वि‍वेदी की कोर्ट में तलाक की अर्जी दी है.
इस मामले में अब  29 नवंबर को सुनवाई होगी. बताया जाता है कि तेजप्रताप यादव और उनकी पत्नी ऐश्वर्या के बीच काफी अनबन चल रही थी. जिसके बाद तेजप्रताप यादव ने अपनी पत्नी के साथ नहीं रहने का फैसला किया है. इसके बाद उन्‍होंने अपनी पत्नी ऐश्वर्या को तलाक देने का फैसला किया है. खबरों के अनुसार तेजप्रताप यादव ने पटना के सिविल कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी भी दाखिल कर दी है.
लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव और चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या से करीब 5 माह पहले ही पटना में शादी हुई थी. तेज प्रताप यादव की शादी 12 मई को पटना में बड़े धूम-धाम से हुई थी. जिसमें भारी संख्या में लोग जुटे थे. वहीं, सजायाफ्ता लालू यादव को तेजप्रताप यादव की शादी के लिए पैरोल दिया गया था. वहीं, उनकी पत्नी ऐश्वर्या के राजनीति में एंट्री होने की भी खबर आई थी.
ऐश्वर्या राय बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की पौत्री और परसा विधानसभा क्षेत्र से राजद के विधायक चंद्रिका राय की बड़ी बेटी हैं. एश्वर्या राय ने अपनी स्कूल की पढ़ाई पटना से की है. और उच्च शिक्षा दिल्ली से पूरा किया है. हालांकि इस बारे में मुख्य कारण क्या है इस बात का खुलासा अभी नहीं हुआ है. वहीं, इस बारे में लालू यादव के परिवार की ओर से खारिज की जा रही है.

'मुझे जि‍स राधा की तलाश, वह ऐश्‍वर्या नहीं'-- तेजप्रताप 

लालू प्रसाद यादव के परिवार से एक बेहद चौंकाने वाली खबर आई है. लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप की शादी टूटने की खबरें आ रही हैं. इससे भी ज्‍यादा चौंकाने वाली खबर ये है कि तेजप्रताप ने प्रताड़ना का आरोप लगाया है. उन्‍होंने कहा है कि वह मानसिक रूप से परेशान हैं. उन्‍होंने यहां तक कहा कि वह कृष्‍ण की तरह रहना चाहते हैं, लेकिन ऐश्‍वर्या राधा नहीं बन पाईं. उन्‍होंने यहां तक कहा कि उन्‍हें जिस राधा की तलाश है, वह ऐश्‍वर्या नहीं हैं.
पटना से रांची जाते समय जब जब मीडिया वालों ने तेज प्रताप से जब पूछा कि क्या ये सही है, तब उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है. उन्‍होंने कहा वह रांची जा रहे हैं. हालांक‍ि बाद में जब उनकी मां राबड़ी देवी ने उनसे फोन पर बात की तो वह अपना कार्यक्रम बदल कर वापस घर लौट आए. उधर लालू का परि‍वार इन खबरों का लगातार खंडन कर रहा है, लेकि‍न ज‍िस तरह के हालात हैं, उनसे साफ है क‍ि तेज प्रताप के वैवाहि‍क जीवन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

लालू की बेटी मीसा ने माना- तेजस्वी और तेजप्रताप के बीच है मनमुटाव

Tejashwi and Tejpratapपिछले काफी समय से इस तरह की खबरें लगातार मीडिया की सुर्खियों में है कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार में सब कुछ सहीं नहीं चल रहा है। लालू के बड़े बेटे तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव के बीच खटपट की खबरों ने सियासी गलियारों में जमकर चर्चा बटोरी थी। लालू परिवार अक्सर इस तरह के मनमुटाव की खबरों का खंडन करता रहा है। लेकिन अब लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती ने एक ऐसा बयान दिया है जो साफ करता है कि लालू के परिवार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।
बिहार : मीसा भारती ने स्वीकारा कि उनके दोनों भाइयों तेजस्वी और तेजप्रताप के बीच है मनमुटावदरअसल मीसा भारती लिट्टी चोखा कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पटना के मनेर पहुंची थी और वहां उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। मीसा ने कार्यकर्ताओं से एकजुटता की अपील की और कहा कि इस समय पार्टी को मजबूत करने की जरूरत है। मीसा ने आगे कहा, 'पीठ में खंजर मारोगे तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे, चाहे वो पार्टी के कोई भी वर्कर हों। आप लोग अपने को मजबूत करिए, अब समय आ गया है कि एकजुट हों। थोड़ा बहुत मनमुटाव किसके बीच नहीं होता, जब हमारे हाथ की पांच उंगली बराबर नहीं है, हमारे परिवार में भाई-भाई में मनमुटाव है तो फिर राष्ट्रीय जनता दल तो बहुत बड़ा परिवार है।'  थोड़ा बहुत मनमुटाव किसमें नहीं होता, हाथ की पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होतीं.
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने परिवार में किसी भी तरह मनमुटाव की खबरों का खंडन किया था। उन्होंने इस तरह खबरों के लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहराया था। लालू प्रसाद यादव के 71वें जन्मदिन के मौके अपने बड़े बेटे तेजप्रताप और छोटे बेटे तथा बिहार के पूर्व डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव एक साथ दिखे थे। 
राष्ट्रीय जनता दल ने भी मनमुटाव की खबरों को खारिज करते हुए ट्वीट किया था, 'हमारे परिवार में कलह की मनगढ़ंत झूठी अफ़वाह फैलवाने और न्यूज़ प्लांट करवाने के पीछे नीतीश कुमार हैं और वह राजद के समर्थकों का मनोबल तोड़ने के उद्देश्य से ऐसा कर रहे हैं। लेकिन पलटू चाचा हमारी पार्टी और परिवार आपकी तरह पलटीमार, अनैतिक व विश्वासघाती नहीं है।'

IRCTC घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू एंड फैमिली की कोर्ट में होगी पेशी

आईआरसीटीसी घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और अन्य अक्टूबर 6 को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेश होंगे. दरअसल, पिछली सुनवाई में कोर्ट ने लालू एंड फेमली के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की चार्जशीट पर संज्ञान लिया था. साथ ही कोर्ट ने लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और अन्य लोगों को बतौर आरोपी समन जारी कर 6 अक्टूबर को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था.
आईआरसीटीसी होटल आवंटन मामले में सीबीआई के बाद ईडी ने पटियाला हाउस कोर्ट में लालू एंड फेमली के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी.चार्जशीट में ईडी ने कई अहम सबूत की बात कही थी. चार्जशीट में ईडी ने लालू प्रसाद यादव, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव, पूर्व मंत्री प्रेमचंद्र गुप्ता, उनकी पत्नी सरला गुप्ता और तत्कालीन एमडी बीके अग्रवाल के अलावा अन्य लोगों को आरोपी बनाया था.  
इससे पहले आईआरसीटीसी टेंडर मामले में जहां एक ओर घोटाले की सीबीआई जांच कर रही थी. वहीं, दूसरी ओर ईडी मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रही थी.इससे पहले सीबीआई की ओर से दायर चार्जशीट पर कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए लालू एंड फेमली को तलब किया था.
तेजस्वी यादव और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से 31 अगस्त को राहत मिल गई थी. तेजस्‍वी यादव, राबड़ी देवी और अन्य आरोपियों को एक-एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर जमानत मिली थी जबकि जेल में रहने की वजह से लालू यादव कोर्ट में पेश नहीं हो सकते थे, इसलिए कोर्ट ने सीबीआई की मांग पर प्रोडक्शन वारंट जारी कर लालू यादव को 6 अक्टूबर को पेश होने का निर्देश दिया था. 
क्या है पूरा मामला?  

यह मामला इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कार्पोरेशन (आईआरसीटीसी) द्वारा रांची और पुरी में चलाए जाने वाले दो होटलों की देखरेख का काम सुजाता होटल्स नाम की कंपनी को देने से जुड़ा है. विनय और विजय कोचर इस कंपनी के मालिक हैं. इसके बदले में कथित तौर पर लालू को पटनामेंबेनामी संपत्ति के रूप में तीन एकड़ जमीन मिली. 
एफआईआर में कहा गया था कि लालू ने निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया. इसके बदले में उन्हें एक बेनामी कंपनी डिलाइट मार्केटिंग की ओर से बेशकीमती जमीन मिली.सुजाता होटल को ठेका मिलने के बाद  2010 और  2014 के बीच डिलाइट मार्केटिंग कंपनी का मालिकाना हक सरला गुप्ता से राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के पास आ गया. हालांकि इस दौरान लालू रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके थे.