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ईसाई मिशनरियाँ अब नहीं बदलवाती नाम, सरकारी योजनाओं-आरक्षण का लाभ लेने के लिए जारी रखते हैं पुरानी पहचान: पूर्वांचल में धर्मांतरण का सीक्रेट ट्रेंड, आशा वर्कर बन रही हथियार


पूर्वांचल के कई जिलों में धर्मांतरण का एक नया ट्रेंड सामने आया है। अब ईसाई मिशनरियाँ धर्म परिवर्तन कराने वालों से नाम या सरनेम बदलने को नहीं कह रही हैं। लोग अपनी पहचान, जाति और सरकारी दस्तावेज वही रखते हैं लेकिन धर्म बदल चुके होते हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सरकारी योजनाओं, आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ पहले की तरह मिलता रहे और किसी को शक भी न हो।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं, इसका प्रयोग पहले दिल्ली में हो चुका है, लेकिन दुर्भाग्य से 2014 में सत्ता परिवर्तन होते ही सबके सब अपने आप हिन्दू धर्म में उसी तरह वापस आ गए जिस तरह चुपचाप ईसाई बने थे। इतना ही नहीं हर रविवार रोहिणी के एक होटल में इस तरह का काम होता था, जब वहां के हिन्दू नेताओं ने पुलिस में इसकी शिकायत की, उल्टे उन्हीं नेताओं पर पुलिस ने केस बनाने शुरू कर दिए। लेकिन नेता होने के कारण पुलिस को केस वापस लेने पड़े। यहाँ भी 2014 में सत्ता परिवर्तन होते ही ईसाई धर्मांतरण का खेल बंद हो गया। 

जिस तरह देशव्यापी ईसाई मिशनरीज सक्रीय है तो हमारा गुप्तचर विभाग और हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं क्यों खामोश है? मदर टेरेसा के रहते जो धर्मांतरण का खेल शुरू हुआ आज तक चल रहा है। दूसरे, जब मोदी सरकार गरीबों को मुफ्त राशन और मकान बनाकर दे रही है फिर क्यों ये लोग लालच में आकर धर्मांतरण कर रहे हैं। सरकार को ऐसे लोगों को चिन्हित कर ब्लैकलिस्टेड करना चाहिए, ताकि धन के लालच में दूसरे मजहब में जाने की सजा का अहसास हो। सरकार को इनके समर्थन में खड़े होने वाले नेता, पार्टियों, अदालतों और मानवाधिकारियों आदि के साथ भी सख्ती से पेश आना होगा। यही समय की मांग भी है। जातियों के नाम पर बनने वाली पार्टियां किसी पनवाडी की दुकान से कम नहीं।    

धर्मांतरण का नया तरीका

जाँच में खुलासा हुआ है कि मिशनरियाँ अब सीधे तौर पर प्रचार नहीं कर रहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच रहकर गुप्त तरीके से धर्मांतरण करवा रही हैं। इसके लिए उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं, स्थानीय महिलाओं और कुछ बिचौलियों को जोड़ रखा है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, जौनपुर की एक आशा कार्यकर्ता ने खुद मजहब बदला है और अब दूसरों को भी जोड़ने का काम कर रही है। वह कहती है, “पहचान वही है, बस एक लॉकेट पहन लिया है जो कपड़ों के अंदर रहता है। नाम बदलने की कोई जरूरत नहीं, बस प्रभु का नाम दिल में रखो।”

आशा कार्यकर्ता ने कहा कि जौनपुर में सख्ती के कारण सब लोग वाराणसी जाते हैं। पिछली बार 10-11 लोग टेंपो से बनारस के भुल्लनपुर क्षेत्र में गए थे। वहाँ 250 से 300 लोग जुटे थे। इस रविवार को फिर जाना है।

इतना ही नहीं अब ‘चंगाई सभा’ (प्रार्थना सभा) का तरीका भी बदल गया है। पुलिस की सख्ती के बाद अब ये सभाएँ ऑनलाइन या मोबाइल के जरिए होती हैं। हर रविवार और शुक्रवार को मुंबई से वीडियो के माध्यम से नए-नए लोगों को जोड़ा जाता है।

पैसे और सहानुभूति से धर्मांतरण

जाँच में पता चला है कि गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों को निशाना बनाया जा रहा है। मिशनरियाँ सीधे परिवारों को नहीं, बल्कि उनके बच्चों के जरिए प्रवेश करती हैं। शिक्षा, शादी या इलाज के नाम पर आर्थिक मदद देकर सहानुभूति हासिल की जाती है।

एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाने पर 25 से 50 हजार रुपए तक का कमीशन तय होता है। धीरे-धीरे परिवार चर्च की सभाओं में शामिल होने लगता है और अंततः धर्मांतरण कर लेता है।

जौनपुर के वीरेंद्र विश्वकर्मा ने बताया कि उनसे इलाज और शादी के बहाने धर्म परिवर्तन करवाया गया था। वह अब अपने मूल धर्म में लौट चुके हैं। उनका कहना है कि हर गुरुवार को सुबह और शाम सभाएँ होती हैं, जहाँ लोगों को ‘यीशु के नाम का पानी’ पिलाया जाता है और नाम रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं।

पुलिस की सख्ती और मिशनरियों की नई रणनीति

जौनपुर पुलिस ने इस साल धर्मांतरण के चार केस दर्ज किए और कई लोगों को गिरफ्तार किया। एसपी डॉ कौस्तुभ का कहना है, “जहाँ भी लोभ-लालच देकर धर्मांतरण के मामले सामने आते हैं, वहाँ छापेमारी कर सख्त कार्रवाई की जाती है।”

हालाँकि पुलिस की सख्ती के बावजूद मिशनरियों ने अब और चालाकी अपनाई है। अब वे सरनेम नहीं बदलवातीं, ताकि सरकारी रिकॉर्ड में व्यक्ति हिंदू ही दिखाई दे और आरक्षण व सरकारी लाभ जारी रहे।

छत्तीसगढ़ में भी खुलासा

ऐसा ही पैटर्न छत्तीसगढ़ के कोरबा और जांजगीर जिलों में भी सामने आया था। वहाँ महिला प्रचारक (लेडी मिशनरी) अपनी असली पहचान छिपाकर चंगाई सभा के नाम पर महिलाओं और बच्चियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रही थीं।

वो पहले दोस्ती करतीं, फिर बीमारियों और परेशानियों से जूझ रही महिलाओं को प्रार्थना के जरिए मुक्ति का रास्ता बतातीं। जब महिलाएँ चर्च जाने लगतीं, तो वहाँ आवेदन भरवाकर हर रविवार ‘प्रभु की प्रार्थना’ का वादा लिया जाता। 90% महिलाएँ धीरे-धीरे ईसाई महजब अपनातीं, जबकि 10% तब लौट आतीं जब कोई लाभ नहीं दिखता।

पूर्वांचल से लेकर छत्तीसगढ़ तक, धर्मांतरण का तरीका अब बदल चुका है। अब न नाम बदले जा रहे हैं, न कपड़े या रूप-रंग बस आस्था बदली जा रही है। सरकारी दस्तावेजों में लोग हिंदू दिखते हैं, मगर दिल से किसी और मजहब के अनुयाई बन चुके होते हैं

उत्तर प्रदेश में बढ़ रहे ‘पगड़ी वाले ईसाई’, नेपाल से आकर पादरी करवा रहे धर्मांतरण: गाँवों में घरों पर लगे क्रॉस

                       क्रॉस का निशान, ईसाई धर्मांतरण से सिख संगठनों की बढ़ी चिंता (फोटो साभार: AAJ TAK)
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में भारत-नेपाल सीमा से सटे सिख बहुल गाँवों में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का मामला सामने आया है। यह मुद्दा न केवल धार्मिक पहचान से जुड़ा है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित एक सुनियोजित साजिश की आशंका को भी जन्म देता है। ऑल इंडिया सिख पंजाबी वेलफेयर काउंसिल के अनुसार, बीते कुछ साल में 3,000 से ज्यादा सिखों का धर्मांतरण कर उन्हें ईसाई बनाया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीलीभीत के हजारा थाना क्षेत्र के गाँवों – बैल्हा, टाटरगंज, बम्मनपुरा भगीरथ और सिंघाड़ा में सिख समुदाय की बड़ी आबादी निवास करती है। इन गाँवों में लगभग 20,000 से 30,000 सिख रहते हैं, जो मुख्य रूप से खेती और छोटे-मोटे व्यवसायों पर निर्भर हैं। स्थानीय लोगों और सिख संगठनों के अनुसार, 2020 से नेपाल सीमा से सटे इन क्षेत्रों में धर्मांतरण की गतिविधियाँ तेज हुई हैं। इन गतिविधियों का केंद्र नेपाल से आए प्रोटेस्टेंट पादरी और कुछ स्थानीय लोगों को बनाए गए पास्टर हैं, जो कथित तौर पर आर्थिक प्रलोभन, अंधविश्वास और रोग निवारण सभाओं के जरिए सिखों को ईसाई मजहब अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

मामले का खुलासा तब हुआ जब बैल्हा गाँव की एक सिख महिला मंजीत कौर ने 13 मई 2025 को पीलीभीत के हजारा थाने में शिकायत दर्ज कराई। मंजीत ने आरोप लगाया कि उसके पति को पहले ही बहला-फुसलाकर ईसाई बनाया जा चुका है, और अब उस पर और उसके बच्चों पर भी धर्म परिवर्तन का दबाव डाला जा रहा है। उसने बताया कि जब उसने धर्म परिवर्तन से इनकार किया, तो उसके खेतों को नुकसान पहुँचाया गया और बच्चों के साथ मारपीट की गई। मंजीत के अनुसार, आरोपितों ने सरकारी योजनाओं का लाभ और दो लाख रुपये का लालच दिया, लेकिन कोई वादा पूरा नहीं किया गया। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने आठ नामजद और दर्जनों अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

ऑल इंडिया सिख पंजाबी वेलफेयर काउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष हरपाल सिंह जग्गी ने इस मामले को गंभीरता से उठाया। उन्होंने स्थानीय गुरुद्वारा श्री सिंह सभा में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि पीलीभीत के सिख बहुल गाँवों में करीब 3,000 सिखों का धर्म परिवर्तन हो चुका है। उन्होंने जिला प्रशासन को 160 परिवारों की सूची सौंपी, जिनके धर्म परिवर्तन की पुष्टि हुई है। जग्गी ने आरोप लगाया कि नेपाल से आए पादरी और कुछ स्थानीय पास्टर गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास का फायदा उठाकर सिखों को ईसाई बना रहे हैं।

उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ परिवारों के घरों पर क्रॉस के निशान बनाए गए हैं, जो धर्मांतरण का प्रतीक माने जा रहे हैं। हालाँकि, प्रशासनिक सख्ती के बाद कई परिवारों ने इन निशानों को हटा लिया है, लेकिन वे अब भी ईसाईयत का पालन कर रहे हैं। जग्गी ने कहा कि यह सिख समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर हमला है और इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है, जो नेपाल के रास्ते इस साजिश को अंजाम दे रही हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक और जिला प्रशासन से निष्पक्ष जाँच और सख्त कार्रवाई की माँग की।

आजतक की एक ग्राउंड रिपोर्ट ने इस मामले को और गहराई से उजागर किया। उनकी टीम ने बैल्हा गाँव का दौरा किया और स्थानीय लोगों, पीड़ितों और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से बातचीत की। इस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। स्थानीय लोगों ने बताया कि नेपाल से आने वाले पास्टर और पंजाब के कुछ मिशनरी लोग ‘चंगाई प्रार्थना सभाओं’ के जरिए सिखों को लुभा रहे हैं। ये सभाएँ बीमारी ठीक करने और आर्थिक मदद का वादा करती हैं, जिससे गरीब और अशिक्षित लोग आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

रिपोर्ट में एक पीड़ित परमिंदर सिंह ने बताया कि मिशनरी लोग बाहरी तौर पर यह नहीं दिखाते कि कोई धर्म परिवर्तन कर चुका है। वे सिखों को उनकी पारंपरिक वेशभूषा और नाम बरकरार रखने की सलाह देते हैं, ताकि धर्मांतरण का पता न चले। फिर भी कई लोग ‘उपचार सत्रों’ और आर्थिक लालच के कारण ईसाईयत की ओर झुक रहे हैं। हालाँकि लखविंदर सिंह और बलजीत सिंह जैसे लोग धर्म परिवर्तन के बाद ‘घर वापसी’ कर सिख धर्म में लौट आए हैं। लखविंदर ने बताया कि उनके बेटे की बीमारी ठीक न होने पर वे प्रार्थना सभाओं में गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, जिसके बाद उन्होंने सिख धर्म में वापसी की।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने बताया कि अब तक 160 परिवारों की ‘घर वापसी’ कराई जा चुकी है। इसके लिए कमेटी ने ‘अमृतपान’ जैसे धार्मिक कार्यक्रम शुरू किए हैं। साथ ही नौ ऐसे लोगों की सूची सार्वजनिक की गई है, जो सिख से ईसाई बनकर अब दूसरों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इन लोगों का सामाजिक बहिष्कार करने के लिए गुरुद्वारे में उनकी सूची लगाई गई है।

पीलीभीत की भौगोलिक स्थिति इस मामले को और जटिल बनाती है। नेपाल सीमा से सटा होने के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से सीमापार गतिविधियों का केंद्र रहा है। जाँच एजेंसियों को शक है कि नेपाल से संचालित कुछ एनजीओ और मिशनरी संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में लिप्त हैं। हरपाल सिंह जग्गी ने दावा किया कि 2012 से नेपाल के पादरी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और विदेशी ताकतों के इशारे पर सिखों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि यह केवल धार्मिक मामला नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।

स्थानीय सिख नेताओं ने शिक्षा की कमी और गरीबी को धर्मांतरण का प्रमुख कारण बताया। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से हाशिए पर रहने वाले लोग आसानी से प्रलोभनों का शिकार हो जाते हैं। कई पीड़ितों ने शपथपत्र देकर बताया कि उन्हें दो लाख रुपये, आवास, शौचालय और अन्य सरकारी योजनाओं का लालच दिया गया, लेकिन बाद में कोई लाभ नहीं मिला।

पीलीभीत प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। डीएम संजय कुमार सिंह ने बताया कि एक विशेष जाँच टीम (SIT) गठित की गई है, जो मामले की तह तक जाएगी। एसपी अभिषेक यादव ने कहा कि मंजीत कौर की शिकायत पर आठ नामजद और दर्जनों अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। साथ ही एक अवैध चर्च को भी हटाया गया है। प्रशासन ने उन गाँवों में काउंसलिंग कैंप शुरू किए हैं, जहाँ धर्मांतरण की शिकायतें मिली हैं।

हालाँकि, पूरनपुर तहसील के SDM अजीत प्रताप सिंह का कहना है कि बड़े पैमाने पर सुनियोजित धर्मांतरण का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। उनका कहना है कि कुछ लोग अपनी आस्था के कारण प्रार्थना सभाओं में जा रहे हैं, जिन्हें रोका नहीं जा सकता। हालाँकि लोगों के शपथपत्र और गुरुद्वारा कमेटी की सूची इस दावे को चुनौती देते हैं।

इस बीच, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले का संज्ञान लिया है और सभी सीमावर्ती जिलों में सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने ‘उत्तर प्रदेश धर्म स्वतंत्रता कानून’ के तहत सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है, जिसके तहत जबरन या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण पर रोक लगाई गई है।

सिख संगठनों का कहना है कि यह मामला उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर हमला है। वे माँग कर रहे हैं कि जिन लोगों ने खुद अपनी मर्जी से धर्मांतरण किया है, उन्हें अपने दस्तावेजों में धर्म बदलने की जानकारी दर्ज करानी चाहिए। साथ ही वे दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और उच्चस्तरीय जाँच की माँग कर रहे हैं। गुरुद्वारा कमेटियों ने ‘घर वापसी’ के लिए बड़े पैमाने पर धार्मिक जागरूकता अभियान शुरू किया है।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट्स में बताया था कि कैसे नेपाल से सटे सीमावर्ती जिलों में ईसाई मिशनरियाँ धर्मांतरण का जाल फैला रही हैं। नेपाल से सटे 7 सीमावर्ती जिलों में ईसाई धर्मांतरण के मामलों के मामलों पर कार्रवाई भी हो चुकी है। बीते साल यूपी से लोगों को नेपाल ले जाने का मामला सामने आया था, जिसमें हिंदू संगठनों ने आरोपित पादरियों को पकड़कर न सिर्फ पीटा था, बल्कि उनके चेहरों पर कालिख भी पोत दी थी। ईसाई मिशनरियों के अयोध्या तक फैले जाल पर भी हमने रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

मी लॉर्ड की टिप्पणी ही नहीं, IMA की मंशा पर भी उठ रहे सवाल: पतंजलि पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ईसाई बनाने वाले पादरियों के ‘इलाज’ पर चुप्पी क्यों? जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने से पहले प्राचीनतम हिन्दू ग्रंथों को पढ़ना था ; मीडिया खामोश क्यों?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट बाबा रामदेव और पतंजलि के खिलाफ सुनवाई कर रहा है। IMA ने साल 2022 में याचिका दायर करते हुए पतंजलि पर भ्रामक विज्ञापन देने का आरोप लगाया था। 10 अप्रैल 2024 को भी इस मामले में सुनवाई हुई और इस दौरान केस में काफी सख्त टिप्पणी की गई। 
जब बाबा रामदेव ने प्रेस कांफ्रेंस कर 'नहीं झुकेंगे' बोलने पर माफ़ी मांग ली, तो क्या रामदेव की जान लोगे? जस्टिस होकर सड़कछाप भाषा बोलोगे? कम से कम अपने पद की गरिमा का मान रखा होता? जस्टिस अमानुल्लाह आयुर्वेद को संजीवनी देने का काम रामदेव ने ही किया है, वरना तुम्हारी जैसी गिरी हुई मानसिकता वालों ने तो सनातन को अपमानित करने के साथ-साथ आयुर्वेद को भी इतिहास ही बना दिया था। 
IMA ने हमदर्द के रूहअफजा पर बांग्लादेश लेबोरेटरी द्वारा दी गयी रिपोर्ट का संज्ञान क्यों नहीं लिया? उत्तर प्रदेश सरकार को हमदर्द उत्पादकों की जाँच करनी चाहिए, क्योकि बांग्लादेश ने जिस रूहअफजा को जनता के स्वास्थ्य के विरुद्ध बताया वह 'halala certified' था। IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने जिस वीणा के तारों को छेड़ा है, इसकी गूंज बहुत दूर जाने वाली है। किसी जस्टिस द्वारा रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने पर मीडिया क्यों खामोश है?   
IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को यह भी मालूम होना चाहिए कि जिस टूटी हड्डी को जोड़ने में हॉस्पिटल 2/3 महीने का समय लेते हैं, कटनी में बजरंगबली मंदिर में जड़ीबूटियों को खिला कर केवल 15 मिनट में जोड़ दी जाती है। जिस महिला के किसी कारणवश संतान न होने पर आधुनिक चिकित्सा पर हज़ारों रूपए लूट लेती है, एक माता का मंदिर ऐसा भी है जहाँ महिला के लेटते ही गर्भवती हो जाती है और लिंग भी पता लग जाता है। लगा दो पाबन्दी इन मंदिरों पर। तुष्टिकरण छोड़ वास्तविकता को पहचानो 

रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह इतने नाराज हो गए कि उन्होंने ‘बखिया उधेड़ देने’ जैसी बात कही। इसके अलावा पतंजलि द्वारा जो हलफनामा दिया गया कि वो बिन शर्त मामले में माफी माँगने को तैयार हैं, उसे भी कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया। कोर्ट का कहना है कि वो इस मामले में कोई उदारता नहीं दिखाने वाले।

जस्टिस की ऐसी टिप्पणी सुनने के बाद पतंजलि के मामले में दिखाई जा रही सख्ती पर सवाल उठने लगे हैं। पूछा जा रहा है कि IMA की शिकायत के बाद पतंजलि के साथ जो हो रहा है, उसके पीछे कारण भ्रामक प्रचार ही है या मंशा अलग है? 

यूजर्स उन उत्पादों के नाम बता रहे हैं जिन्हें फर्जी दावों के साथ बेचा जाता है, जो शरीर के लिए नुकसान दायक हैं लेकिन फिर भी कभी IMA ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की नहीं सोची। इन उत्पादों में लाइफब्वॉय जैसे प्रोडक्ट के उदाहरण हैं, जो कीटाणु मारने का दावा करता है; ऐसी खतरनाक ड्रिंक जिन्हें एनर्जी ड्रिंक कहकर बेचा जा रहा है।

गलती किसकी?

इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी उठाया है। 10 अप्रैल 2024 को उनके एक्स अकॉउंट पर साझा वीडियो में वो कहते हैं कि इस मामले में कुछ लोगों को लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट पतंजलि को बोलकर गलत कर रहा है, तो कुछ को लगता है कि बाबा रामदेव ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उन्हें फटकार लग रही है।
इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम में साल 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाए गए कानून का जिक्र किया। उन्होंने बताया इस कानून में कहा गया था कि कुछ बीमारी ( जैसे अंधापन, बहरापन, हकलाना, तुतलाना, कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, पागलपन, लकवा, नपुंसकता, बाझपन, टीबी, टयूमर ) के लिए प्रचार नहीं हो सकता।
अश्विनी उपाध्याय दावा करते हैं कि ये कानून नेहरू उस लॉबी के दबाव में लेकर आए थे जिनके पास इन बीमारियों का इलाज नहीं था। लॉबी ने उनसे कहा कि ऐसा कानून बनाओ और इनका प्रचार करने को अपराध बनाओ… आज चूँकि पतंजलि ऐसी बीमारियों का इलाज बता रहा है और अपना प्रचार कर रहा है तो उनके विरुद्ध सख्ती दिखाई जा रही है।
उन्होंने ये बात भी गौर करवाई कि जिन बीमारियों को ठीक करने के दावे करने पर IMA ने बाबा रामदेव और पतंजलि की शिकायत कर दी, उन्हीं बीमारियों को ठीक करने के दावे पंजाब में हो रहे हैं, और धर्मांतरण करवाया जा रहा है।
अश्विनी उपाध्याय का ऐसा आरोप पतंजलि मामले में सामने आया है लेकिन IMA का ईसाई धर्म के प्रति झुकाव की खबरें बहुत पहले से आती रही हैं। इसके अध्यक्ष ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में कह दिया था– “मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हूँ, और यह मेरे लिए एक अच्छा मौका है कि मैं ईसाई धर्म की उपचार पद्धतियों का प्रसार कर सकूँ।” जबकि जब बात आयुर्वेद को बढ़ावा देने की आई थी तो उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत में हिन्दू पद्धति पर सरकार ज़ोर दे रही है। 
IMA को निष्पक्ष होकर जनहित में बताना होगा कि आयुर्वेद यूनानी से उच्चतम क्यों है? पिछली सरकारों और पूर्व में रहे IMA अधिकारियों से पूछना होगा कि आयुर्वेद को क्यों गड्डे में डाल यूनानी को प्रोत्साहित किया गया? लेकिन हिम्मत नहीं, क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा का हिन्दू ग्रंथों में उल्लेख है। 
ऐसे समय में जब IMA की शिकायत पर पतंजलि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अपनी सुनवाई कर रहा है और ऐसी ईसाई संस्थाओं पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, तब सोशल मीडिया के यूजर्स लोगों का ध्यान इस ओर खिंचवा रहे हैं।
‘नो कन्वर्जन’ नाम के एक्स हैंडल ने पादरी अंकुर नरूला की वो वीडियो को शेयर की जिसमें वो दावा कर रहे थे कि उन्होंने उन महिलाओं को ठीक कर दिया है जिनका यूटरेस बाहर आ रहा था। इस वीडियो में वो साफ कह रहे हैं कि उन्होंने प्रार्थना करके महिलाओं को वाशरूम में भेजा कि वो चेक करें कि वो ठीक हुईं या नहीं। उन महिलाओं ने बाहर आकर बताया है कि वो ठीक हो गई हैं। इसमें पादरी कहता है ये भी कहता है कि परमेश्वर आज ठीक करने के लिए आया है आपको।
विजय गौतम लिखते हैं, “IMA का अध्यक्ष ईसाई है और उसने पतंजलि के खिलाफ केस किया है। बाबा रामदेव के पीछे बड़ी लॉबी पड़ी है। ये कोर्ट आखिर क्यों पादरियों के खिलाफ एक्शन नहीं लेती तो खुलेआम कहते हैं कि वो एड्स और कैंसर चर्च में प्रार्थना से ठीक कर सकते हैं।” उन्होंने इस मामले को पतंजलि बनान आयुर्वेद विरोधी गैंग कहा है।
अवलोकन करें:-
इसी प्रकार दक्षिणपंथी रतन शारदा इस मुद्दे को उठाते हैं और कहते हैं- “आईएमए पतंजलि के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। हां, पतंजलि पर जुर्माना लगना चाहिए, लेकिन आईएमए ने एक असोसिएशन के तौर पर ज्यादा बड़े उल्लंघनकर्ताओं पर चुप्पी साध रखी है। इसका अध्यक्ष डॉ. जयलाल भी रहा था। उसने एक इंटरव्यू में क्या कहा था, देख लीजिए।”