Showing posts with label #IMA. Show all posts
Showing posts with label #IMA. Show all posts

पतंजलि के पीछे पड़े IMA ने हेकड़ी निकलने पर सुप्रीम कोर्ट से माँगी माफी, कहा- गरिमा को ठेस पहुँचाने का नहीं था कोई इरादा

                    IMA प्रमुख डॉ RV अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट से माँगी माफी (फोटो साभार : भास्कर/हिंदुस्तान)
बाबा रामदेव ने आयुर्वेद को नवजीवन देकर विश्व में चर्चित किया। जब से बाबा रामदेव ने आयुर्वेद को पुनर्जीवित करने अपने उत्पाद निर्मित करने शुरू किए, आयुर्वेद के दुश्मनों की रोटी-पानी हराम हो गया था। सदियों से प्रतिष्ठित आयुर्वेद को हमारे कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियों ने तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक वेदों में वर्णित दवाओं एवं उपचारों को धूमिल कर दिया था। आयुर्वेद के दुश्मनों को नहीं मालूम कि इसका जिक्र अरबों वर्षों पहले वेदों में उल्लेख है। भ्रमित विज्ञापनों से जनता को गुमराह कर अपनी तिजोरियां भरते रहे। लेकिन बाबा रामदेव भी चट्टान की तरह अडिग रहे, एक से बढ़कर एक तूफान झेल आयुर्वेद को जीवित रखने में संघर्षरत रहे। यह उन्हीं के संघर्ष का परिणाम है कि भारतीय संस्कृति विरोधियों के हाथो खेल रही IMA जैसी संस्थाओं को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया।  

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अध्यक्ष डॉ. आर. वी. अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) के खिलाफ अपनी टिप्पणी को लेकर सार्वजनिक रूप से माफी माँगी है। मामला सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गई टिप्पणी के संबंध में एक इंटरव्यू के दौरान अपने द्वारा दिए गए बयान से जुड़ा है। उन्होंने इस संबंध में बृहस्पतिवार (04 जुलाई 2024) को सार्वजनिक रूप से माफी माँगी। उन्होंने कहा कि वह अपने वक्तव्य के लिए खेद व्यक्त करते हैं। इस बारे में आईएमए ने बाकायदा प्रेस नोट भी जारी किया है। नोट में कहा गया है कि उनका (डॉ RV अशोकन का) सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को कम करने का कभी कोई इरादा नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने जिस मामले में सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी, उसमें आईएमए भी एक पक्षकार था।

डॉक्टरों के संगठन की ओर से जारी किए गए एक बयान में कहा गया कि आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर आर. वी. अशोकन ने आईएमए के एक पक्ष होने से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गई टिप्पणी के संबंध में प्रेस को दिए अपने बयान को लेकर सार्वजनिक रूप से माफी माँगी है। डॉ. अशोकन ने 23 अप्रैल के आदेश का जिक्र करते हुए एक बयान में कहा कि आईएमए भी कदाचार के मुद्दों के बारे में समान रूप से चिंतित है। सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से जुड़े भ्रामक विज्ञापन संबंधी मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि उसका मानना है कि आईएमए को भी अपना घर ठीक करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में भी डॉ. अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपने बयान को लेकर बिना शर्त माफी माँगी थी।

डॉ. अशोकन ने कहा कि आईएमए ने आधुनिक मेडिकल पेशेवरों के खिलाफ कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे भ्रामक विज्ञापन और दुर्भावनापूर्ण अभियानों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका दायर की है। एक इंटरव्यू के दौरान मेरे द्वारा दिए गए कुछ बयानों के संदर्भ में, मैंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष खेद व्यक्त किया है। मैंने बिना शर्त माफी माँगने के लिए अदालत में अपना हलफनामा भी जमा कर दिया है। उन्होंने अपने माफीनामे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के महत्व या गरिमा को कम करने का मेरा कभी कोई इरादा नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसोसिएशन के सदस्यों के बारे में कथित अनैतिक कृत्यों से संबंधित कई शिकायतें हैं जो मरीजों द्वारा उन पर जताए जाने वाले भरोसे को तोड़ते हैं। वे न केवल बेहद महँगी दवाएँ लिख रहे हैं, बल्कि टालने योग्य/अनावश्यक जाँच की भी सिफारिश कर रहे हैं। डॉ. अशोकन ने कहा कि नैतिक प्रथाओं का निरंतर अपडेट और प्रसार आईएमए की मुख्य गतिविधियों में से एक है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आईएमए को भी फटकार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आईएमए को इस विषय पर सार्वजनिक माफी माँगनी चाहिए। इसके बाद ये सार्वजनिक माफी सामने आई है।

जिस कानून के नियम को लेकर घिरे बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण, सुप्रीम कोर्ट में उसी पर उठा सवाल; ‘पतंजलि’ केस में अब IMA ही फँस गया

अवैध विज्ञापन के मामले में ‘पतंजलि आयुर्वेद’ और ‘दिव्य फार्मेसी’ की तरफ से मंगलवार (7 मई, 2024) को सुप्रीम कोर्ट में उन अख़बारों को पेश किया गया, जिनमें बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की कंपनियों की तरफ से माफ़ीनामा जारी किया गया था। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो राज्यों की लाइसेंसिंग ऑथोरिटीज और केंद्र सरकार द्वारा भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के संबंध में उठाए जा रहे क़दमों का विश्लेषण करेगी। सुप्रीम कोर्ट इस दौरान अख़बार के उन पन्नों को देख कर संतुष्ट हुआ, जिनके माध्यम से माफ़ीनामा जारी किया गया था।

 इससे पहले कई बार बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को व्यक्तिगत पेशी के दौरान फटकार लगाया गया था। इस दौरान ‘पतंजलि’ की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उन्होंने IMA (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के अध्यक्ष के बयान को लेकर अप्लीकेशन (IA) दायर कर दिया है। उन्होंने इसे हानि पहुँचाने के उद्देश्य से की गई अपमानजनक टिप्पणी करार दिया। IMA अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा एलोपैथिक डॉक्टरों पर टिप्पणी पर सवाल उठाए थे।

मुकुल रोहतगी ने इसे गंभीर मामला बताया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के जज अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अगर IMA आरोपों पर जवाब नहीं देता है तो उसे नोटिस जारी किया जाएगा। वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने ध्यान दिलाया कि ये बयान सुनवाई से 1 दिन पहले दिया गया था, ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता कि अनजान/बेखबर होने के कारण ये टिप्पणी की गई। वहीं भारत सरकार की तरफ से ASG केएम नटराज ने बात रखी। उन्होंने बताया कि ‘ड्रग्स एन्ड कॉस्मेटिक्स रूल्स’ के नियम संख्या 170 को कई उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गई है।

उन्होंने बताया कि 2018 में नियम संख्या 170 की अधिसूचना जारी की गई थी। उन्होंने बताया कि इसके खिलाफ 8-9 याचिकाएँ दायर हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस नियम के तहत कोई कड़ी कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था, बाद में केरल हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इसे दोहराया। उन्होंने इस दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय का वो आदेश भी पढ़ कर सुनाया, जिसमें इस कानून के नियम-170 पर पुनर्विचार के लिए केंद्र सरकार को कहा गया था।

इस पर जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि भारत सरकार को इस सलाह का फायदा मिला। वहीं जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने पूछा कि केंद्र सरकार को इस पर निर्णय लेने के लिए कहा गया था, फिर भी ये नियम यहाँ पर है। उन्होंने पूछा कि बिना कोई निर्णय लिए बिना आप कड़ी कार्रवाई न करने को कैसे कह सकते हैं? वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि ये एक अच्छा कानून है, जब तक इसे हटाया नहीं जाता, ये लागू है। केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र भेज इसके तहत एक्शन न लेने को कहा था। ASG ने इस कानून पर पुनर्विचार के लिए समय माँगा।


माफ़ीनामा छापने के लिए भी कोई कानून है क्या ? मीलॉर्ड, सफाई न दीजिए, निशाने पर तो पतंजलि और रामदेव ही थे

सुभाष चन्द्र

कल एक बार फिर मीलॉर्ड स्वामी रामदेव पर बरस पड़े। सत्ता के उच्च शिखर पर बैठ कर सामने वाले व्यक्ति से कोई कैसा भी अनुचित व्यवहार करने का अधिकार रखता है और जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह यही कर रहे हैं। मीडिया चैनल स्वामी रामदेव के प्रति आपके आचरण को देख कर चटकारे लेकर खबरे चलाते हैं और यह शायद आपके लिए आनंद का विषय होता है

लेखक 
कल मीलॉर्ड स्वामी रामदेव के पतंजलि द्वारा सोमवार 22 अप्रैल को 73 अख़बारों में प्रकाशित किए गए माफीनामे पर 2 बातों को लेकर “नाराज़” हुए। पहली बात कि आपने एक सप्ताह का समय क्यों लिया माफीनामा छपवाने के लिए और दूसरी बात कि क्या माफीनामा उसी आकर है जैसा विज्ञापन जारी करते हैं

ये दोनों Objections बेमानी हैं,  अलबत्ता स्वामी रामदेव/बालकृष्ण और पतंजलि को जलील करना मकसद लगता है। वह इसलिए कि 16 अप्रैल को जब आपने माफीनामा स्वीकार नहीं किया था तो अगली डेट तक का दूसरा माफीनामा प्रकाशित करने के लिए कहा था। ऐसा मतलब कतई नहीं था कि माफीनामा अगले ही दिन छपवा दिया जाना चाहिए। दूसरा, ऐसा कहीं किसी कानून में Prescribed नहीं है कि माफीनामा कैसा होना चाहिए; किस size का होना चाहिए और विज्ञापन के बराबर या उससे बड़ा होना चाहिए 

कई अख़बारों ने Press Council में केस चलने पर गलत रिपोर्ट के लिए माफीनामे प्रकाशित किए हैं जो भ्रामक खबर छापने की महीनों बाद छोटे से आकर में अख़बार के 8वें या 10वें पृष्ठ तक पर छापे जाते रहे हैं

माफ़ी पर तकरार कर रहे हैं मीलॉर्ड स्वामी रामदेव की जबकि जस्टिस अहसानुद्दीन को पहले स्वयं अपने शब्दों के लिए माफीनामा देना चाहिए। सोशल मीडिया पर जबरदस्त आक्रोश के बाद पिछली तारीख पर दोनों जज कुछ नरम थे और आयुर्वेद की वैल्यू का बखान कर रहे थे और कल भी कुछ सफाई देनी की कोशिश की है कि “कोर्ट के निशाने पर कोई विशेष कंपनी या व्यक्ति नहीं है। यह लोगो के स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है, अधिकारी इसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं”

कल तक के पहले की सुनवाई में यही नज़र आ रहा था कि स्वामी रामदेव/आचार्य बालकृष्ण/पतंजलि ही निशाने पर थे। अगर ऐसा न होता तो कोर्ट पतंजलि के विरुद्ध IMA की याचिका की सुनवाई में पतंजलि के साथ साथ ही IMA और FMGC कंपनियों को शुरू से शामिल रखते लेकिन कोर्ट ने उन्हें कल सुनवाई के दायरे में लिया है। 

मीलॉर्ड ने कल IMA के वकील को कहा  कि किसी की ओर एक उंगली उठाते हुए ध्यान रखें कि 4 उंगली आपकी तरफ हैं। आपने जिन सदस्यों के खिलाफ शिकायतें आईं, आपने उन पर क्या किया। यह बातें मीलॉर्ड को स्वामी रामदेव पर सुनवाई के दौरान IMA को कहनी चाहिए थी लेकिन अब केवल यह साबित करने के लिए किया गया है कि आपके ऊपर पक्षपात का आरोप न लगे जो अदालत की कार्रवाई में साबित हो रहा था और जिसके लिए आपने कल सफाई दी है

मीलॉर्ड को IMA से यह भी पूछना चाहिए कि आपने अपने मुखिया के खिलाफ क्या कार्रवाई की जो “धर्म परिवर्तन” को बढ़ावा दे रहा था कोरोना संकट काल में

कृपया मीलॉर्ड माफीनामे को Prestige Issue न बनाएं। एक संत जो जनहित में आयुर्वेद और योग के लिए आंदोलन चला रहा है, उसकी माफ़ी ही उसके लिए बहुत बड़ा दंड है। आगे और उसे जलील करना है तो आपको भी माफ़ी मांगनी चाहिए उन घृणित जेहादी शब्दों के लिए “we will rip you apart - हम आपको चीर के रख देंगे” 

सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी बेंच योग पर सर्विस टैक्स लगा कर पहले ही अलग हथौड़ा चला चुकी है। ऐसी सेवाएं जो भी अन्य लोग दे रहे हैं, उन पर भी कार्रवाई की जाए, उनमे तो वो संस्थाएं भी शामिल है जो ऐसे कैंप लगा कर धर्म परिवर्तन भी करा देती हैं। 

स्वामी रामदेव की माफ़ी चाहिए बस, इसे “अहम” की लड़ाई बना दिया कोर्ट ने, लेकिन कोर्ट ने कोर्ट की अवमानना की, उसके लिए माफ़ी क्यों नहीं मांगते

सुभाष चन्द्र

पिछली तारीख पर जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ में जस्टिस अमानुल्लाह ने उत्तराखंड सरकार के अधिकारियों, स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के लिए मर्यादाहीन शब्दों का प्रयोग किया “हम तुम्हें चीर के रख देंगे” जैसे कोई आतंकी बोल रहा हो लेकिन आज उस भाषा के लिए रत्ती भर भी मीलॉर्ड एक शब्द क्षमा मांगने के लिए नहीं बोले  बल्कि सारी सुनवाई आज भी केवल स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की माफ़ी पर होती रही। 

आज जस्टिस हिमा कोहली ने शायद पिछले शब्दों पर लीपापोती करने के लिए स्वामी रामदेव से कहा “हमारे देश में आयुर्वेद बहुत प्राचीन है, महर्षि चरक के समय से है, दादी नानी भी घरेलू उपचार करती थी आप दूसरी पद्धतियों को बुरा क्यों बताते हैं, क्या एक ही पद्धति रहनी चाहिए, इस पर स्वामी जी ने कहा हमने बहुत रिसर्च किया है इस पर जस्टिस कोहली ने कहा ये ठीक है, आप अपने रिसर्च पर कानूनी आधार पर आगे बढ़ सकते हैं लेकिन हम जानना चाहते हैं आपने इस कोर्ट की अवहेलना क्यों की” लेकिन जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह द्वारा आतंकी शब्दों पर क्यों खामोश हैं? क्यों सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को तार-तार किया गया? महर्षि चरक पिछली बार क्यों याद नहीं आए?  

यकीन मानिए अगर बाबा रामदेव भगवा की जगह पैंट, शर्ट और टाई में होते, इंग्लिश बोलते और सत्ता के नीच,असुर और पामरों का समर्थन करते तो इसी काम के लिए और इन्हीं दवाओं के लिए उन्हें नोबेल प्राइज से लेकर न जाने अब तक कितने पुरस्कार मिल चुके होते। हॉवर्ड से लेकर आईआईएम तक उनके प्रबंधन स्किल पर लेक्चर आयोजित कराते।
बाबा से घृणा केवल उन "अहिंदु हिंदुओं" को है, जिनके मन में भारतीय परंपरागत ज्ञान, परंपरा, हिंदू धर्म और हिंदू ज्ञान-विज्ञान और चिकित्सा पद्धति के लिए घृणा है। बाकी वो जो भी तर्क दे रहा है, सिर्फ आपको भरमाने के लिए है।

देश की 140 करोड़ जनता बाबा की ऋणी है, उनके साथ खड़ी है, उनके द्वारा योग व आयुर्वेद को घर-घर पहुंचाने के लिए।

जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि आपको एलोपैथी को बुरा कहने की जरूरत नहीं थी, आप अच्छा काम कर रहे हैं, उसे करिए, दूसरों को बुरा क्यों कुछ कहना स्वामी जी ने कहा कि एलोपैथी और आयुर्वेद का संघर्ष लंबा है, हम भविष्य में ऐसी गलती नहीं करेंगे, हमें कानून की जानकारी नहीं है लेकिन फिर भी जज अपनी बात पर अड़े रहे। जस्टिस अमानुल्लाह को IMA से यह भी पूछना चाहिए था कि आखिर क्यों एलोपैथी को बढ़ावा देने आयुर्वेद को नीचा किया गया।  

लेखक 
जस्टिस कोहली ने कहा हम देखेंगे कि हम आपके माफीनामे को स्वीकार करें या नहीं आचार्य बालकृष्ण ने कहा स्वामी जी का पतंजलि के काम से संबंध नहीं है लेकिन इस पर अमानुल्ल्हा फिर बरस पड़े कि आप बहस मत कीजिए बाबा ने फिर कहा कि हम अपनी गलती के लिए क्षमा चाहते हैं

यह और कुछ नहीं अपने “अहम” को ठंडा करने के लिए न्यायाधीश सन्यासियों पर दबाव बना रहे हैं कि उन्हें कोर्ट की अवमानना के लिए जलील करना ही जैसे लक्ष्य रह गया हो 

मीलॉर्ड उबल रहे हैं कि स्वामी रामदेव ने एलोपैथी के बुरा क्यों कहा लेकिन क्या एलोपैथी संस्थाएं और IMA स्वामी रामदेव को आयुर्वेद का सम्मान करने के लिए फूल माला पहनाते हैं एलोपैथी की संस्थाएं तो तबियत से आयुर्वेद का मज़ाक उड़ाती हैं लेकिन मीलॉर्ड उनसे माफ़ी मांगने के लिए नहीं कहते 

अस्पतालों में डॉक्टर पतंजलि के दंत कांति टूथपेस्ट को उपयोग करने से मना करते हैं कि इससे कैंसर हो जाएगा IMA का मुखिया ही जब अस्पतालों को धर्म परिवर्तन के लिए उपयोग कर रहा था तो मीलॉर्ड आंखे बंद किए बैठे थे लेकिन आज आयुर्वेद को निशाना बना कर हिंदुत्व पर हमला कर रहे हैं और माध्यम बने हैं स्वामी रामदेव

आपको यदि स्वामी रामदेव की तरफ से कोर्ट की अवमानना नज़र आती है तो इसका मतलब आप अपने आप को कोर्ट मानते हैं और अगर आप कोर्ट हैं तो आपने मर्यादा लांघ कर जो शब्द बोले वह भी पूरे “सुप्रीम कोर्ट” की अवमानना थी

चीफ जस्टिस को 21 जजों और 600 वकीलों ने पत्र लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाया जा रहा है और षड़यंत्र बताएं हैं इसके पीछे हिमा कोहली और अहसानुद्दीन की पीठ पर भी कुछ “अज्ञात” शक्तियों का दबाव माना जा सकता है कि किसी तरह भी रामदेव की खाट खड़ी की जाए और चंद्रचूड़ पर भी दबाव हो सकता है कि दोनों जजों को छेड़ा न जाए

मी लॉर्ड की टिप्पणी ही नहीं, IMA की मंशा पर भी उठ रहे सवाल: पतंजलि पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ईसाई बनाने वाले पादरियों के ‘इलाज’ पर चुप्पी क्यों? जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने से पहले प्राचीनतम हिन्दू ग्रंथों को पढ़ना था ; मीडिया खामोश क्यों?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट बाबा रामदेव और पतंजलि के खिलाफ सुनवाई कर रहा है। IMA ने साल 2022 में याचिका दायर करते हुए पतंजलि पर भ्रामक विज्ञापन देने का आरोप लगाया था। 10 अप्रैल 2024 को भी इस मामले में सुनवाई हुई और इस दौरान केस में काफी सख्त टिप्पणी की गई। 
जब बाबा रामदेव ने प्रेस कांफ्रेंस कर 'नहीं झुकेंगे' बोलने पर माफ़ी मांग ली, तो क्या रामदेव की जान लोगे? जस्टिस होकर सड़कछाप भाषा बोलोगे? कम से कम अपने पद की गरिमा का मान रखा होता? जस्टिस अमानुल्लाह आयुर्वेद को संजीवनी देने का काम रामदेव ने ही किया है, वरना तुम्हारी जैसी गिरी हुई मानसिकता वालों ने तो सनातन को अपमानित करने के साथ-साथ आयुर्वेद को भी इतिहास ही बना दिया था। 
IMA ने हमदर्द के रूहअफजा पर बांग्लादेश लेबोरेटरी द्वारा दी गयी रिपोर्ट का संज्ञान क्यों नहीं लिया? उत्तर प्रदेश सरकार को हमदर्द उत्पादकों की जाँच करनी चाहिए, क्योकि बांग्लादेश ने जिस रूहअफजा को जनता के स्वास्थ्य के विरुद्ध बताया वह 'halala certified' था। IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने जिस वीणा के तारों को छेड़ा है, इसकी गूंज बहुत दूर जाने वाली है। किसी जस्टिस द्वारा रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने पर मीडिया क्यों खामोश है?   
IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को यह भी मालूम होना चाहिए कि जिस टूटी हड्डी को जोड़ने में हॉस्पिटल 2/3 महीने का समय लेते हैं, कटनी में बजरंगबली मंदिर में जड़ीबूटियों को खिला कर केवल 15 मिनट में जोड़ दी जाती है। जिस महिला के किसी कारणवश संतान न होने पर आधुनिक चिकित्सा पर हज़ारों रूपए लूट लेती है, एक माता का मंदिर ऐसा भी है जहाँ महिला के लेटते ही गर्भवती हो जाती है और लिंग भी पता लग जाता है। लगा दो पाबन्दी इन मंदिरों पर। तुष्टिकरण छोड़ वास्तविकता को पहचानो 

रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह इतने नाराज हो गए कि उन्होंने ‘बखिया उधेड़ देने’ जैसी बात कही। इसके अलावा पतंजलि द्वारा जो हलफनामा दिया गया कि वो बिन शर्त मामले में माफी माँगने को तैयार हैं, उसे भी कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया। कोर्ट का कहना है कि वो इस मामले में कोई उदारता नहीं दिखाने वाले।

जस्टिस की ऐसी टिप्पणी सुनने के बाद पतंजलि के मामले में दिखाई जा रही सख्ती पर सवाल उठने लगे हैं। पूछा जा रहा है कि IMA की शिकायत के बाद पतंजलि के साथ जो हो रहा है, उसके पीछे कारण भ्रामक प्रचार ही है या मंशा अलग है? 

यूजर्स उन उत्पादों के नाम बता रहे हैं जिन्हें फर्जी दावों के साथ बेचा जाता है, जो शरीर के लिए नुकसान दायक हैं लेकिन फिर भी कभी IMA ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की नहीं सोची। इन उत्पादों में लाइफब्वॉय जैसे प्रोडक्ट के उदाहरण हैं, जो कीटाणु मारने का दावा करता है; ऐसी खतरनाक ड्रिंक जिन्हें एनर्जी ड्रिंक कहकर बेचा जा रहा है।

गलती किसकी?

इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी उठाया है। 10 अप्रैल 2024 को उनके एक्स अकॉउंट पर साझा वीडियो में वो कहते हैं कि इस मामले में कुछ लोगों को लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट पतंजलि को बोलकर गलत कर रहा है, तो कुछ को लगता है कि बाबा रामदेव ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उन्हें फटकार लग रही है।
इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम में साल 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाए गए कानून का जिक्र किया। उन्होंने बताया इस कानून में कहा गया था कि कुछ बीमारी ( जैसे अंधापन, बहरापन, हकलाना, तुतलाना, कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, पागलपन, लकवा, नपुंसकता, बाझपन, टीबी, टयूमर ) के लिए प्रचार नहीं हो सकता।
अश्विनी उपाध्याय दावा करते हैं कि ये कानून नेहरू उस लॉबी के दबाव में लेकर आए थे जिनके पास इन बीमारियों का इलाज नहीं था। लॉबी ने उनसे कहा कि ऐसा कानून बनाओ और इनका प्रचार करने को अपराध बनाओ… आज चूँकि पतंजलि ऐसी बीमारियों का इलाज बता रहा है और अपना प्रचार कर रहा है तो उनके विरुद्ध सख्ती दिखाई जा रही है।
उन्होंने ये बात भी गौर करवाई कि जिन बीमारियों को ठीक करने के दावे करने पर IMA ने बाबा रामदेव और पतंजलि की शिकायत कर दी, उन्हीं बीमारियों को ठीक करने के दावे पंजाब में हो रहे हैं, और धर्मांतरण करवाया जा रहा है।
अश्विनी उपाध्याय का ऐसा आरोप पतंजलि मामले में सामने आया है लेकिन IMA का ईसाई धर्म के प्रति झुकाव की खबरें बहुत पहले से आती रही हैं। इसके अध्यक्ष ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में कह दिया था– “मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हूँ, और यह मेरे लिए एक अच्छा मौका है कि मैं ईसाई धर्म की उपचार पद्धतियों का प्रसार कर सकूँ।” जबकि जब बात आयुर्वेद को बढ़ावा देने की आई थी तो उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत में हिन्दू पद्धति पर सरकार ज़ोर दे रही है। 
IMA को निष्पक्ष होकर जनहित में बताना होगा कि आयुर्वेद यूनानी से उच्चतम क्यों है? पिछली सरकारों और पूर्व में रहे IMA अधिकारियों से पूछना होगा कि आयुर्वेद को क्यों गड्डे में डाल यूनानी को प्रोत्साहित किया गया? लेकिन हिम्मत नहीं, क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा का हिन्दू ग्रंथों में उल्लेख है। 
ऐसे समय में जब IMA की शिकायत पर पतंजलि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अपनी सुनवाई कर रहा है और ऐसी ईसाई संस्थाओं पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, तब सोशल मीडिया के यूजर्स लोगों का ध्यान इस ओर खिंचवा रहे हैं।
‘नो कन्वर्जन’ नाम के एक्स हैंडल ने पादरी अंकुर नरूला की वो वीडियो को शेयर की जिसमें वो दावा कर रहे थे कि उन्होंने उन महिलाओं को ठीक कर दिया है जिनका यूटरेस बाहर आ रहा था। इस वीडियो में वो साफ कह रहे हैं कि उन्होंने प्रार्थना करके महिलाओं को वाशरूम में भेजा कि वो चेक करें कि वो ठीक हुईं या नहीं। उन महिलाओं ने बाहर आकर बताया है कि वो ठीक हो गई हैं। इसमें पादरी कहता है ये भी कहता है कि परमेश्वर आज ठीक करने के लिए आया है आपको।
विजय गौतम लिखते हैं, “IMA का अध्यक्ष ईसाई है और उसने पतंजलि के खिलाफ केस किया है। बाबा रामदेव के पीछे बड़ी लॉबी पड़ी है। ये कोर्ट आखिर क्यों पादरियों के खिलाफ एक्शन नहीं लेती तो खुलेआम कहते हैं कि वो एड्स और कैंसर चर्च में प्रार्थना से ठीक कर सकते हैं।” उन्होंने इस मामले को पतंजलि बनान आयुर्वेद विरोधी गैंग कहा है।
अवलोकन करें:-
इसी प्रकार दक्षिणपंथी रतन शारदा इस मुद्दे को उठाते हैं और कहते हैं- “आईएमए पतंजलि के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। हां, पतंजलि पर जुर्माना लगना चाहिए, लेकिन आईएमए ने एक असोसिएशन के तौर पर ज्यादा बड़े उल्लंघनकर्ताओं पर चुप्पी साध रखी है। इसका अध्यक्ष डॉ. जयलाल भी रहा था। उसने एक इंटरव्यू में क्या कहा था, देख लीजिए।”

स्वामी रामदेव ने माफ़ी मांगी लेकिन मीलॉर्ड को वह स्वीकार नहीं, मगर अपनी सड़कछाप भाषा के लिए खुद माफ़ी भी नहीं मांगेंगे; अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को त्यागपत्र देना चाहिए

 सुभाष चन्द्र

केवल एक छोटी सी बात के लिए जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की माफ़ी स्वीकार करने से मना कर दिया और कहा कि हम उनके पूर्व आचरण को ध्यान में रखते हुए यह हलफनामा स्वीकार नहीं कर सकते, बेंच ने कहा कि 30 मार्च को दाखिल हलफनामे में पेशी की छूट मांग करते हुए विदेश जाने की अनुमति मांगी लेकिन एयर टिकट 31 मार्च को अनुलग्नक में दाखिल किया गया। इसका मतलब है 30 मार्च को हलफनामा दाखिल करते हुए एयर टिकट नहीं था - बस यही गलती पकड़ कर बेंच के जज बिखर गए

लेखक 
ब कोई इतनी सी बात नहीं समझ सकता तो क्या करें हो सकता है जब 30 मार्च को हलफनामा दाखिल किया उस समय तक टिकट न बना हो और जब बन गया तो अगले दिन कोर्ट में दे दिया। इसमें कौन सा आसमान सुप्रीम कोर्ट की छत पर गिर गया
दूसरे, अगर IMA को जनता की सेहत की इतनी ही फ़िक्र है तो जब बांग्लादेश की लेबोरेटरी ने हमदर्द की रूहअफजा को सेहत के लिए नुकसान बताकर फेल कर दिया, फिर उसको आधार बनाकर कोर्ट क्यों नहीं गयी? क्यों नहीं भारत में रूहअफजा को बैन किया? इसका मतलब साफ है कि IMA तुष्टिकरण की गन्दी मानसिकता से ग्रस्त है। बांग्लादेश लेबोरेटरी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि रूहअफजा में जिन contents का उल्लेख है उनमे से एक भी content इसमें नहीं है। 

जस्टिस अमानुल्लाह ने तो भाषा की सभी मर्यादाएं लांघते हुए उत्तराखंड सरकार के अधिकारियों को ही नहीं कहा बल्कि वे शब्द उत्तराखंड सरकार और स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को भी कहे माने जाएंगे कि “हम आपको चीर कर रख देंगे”

माफ़ी मांगना कोई छोटी बात नहीं है लेकिन माफ़ न करने वाला बहुत बड़ा कायर होता है जो अहसानुद्दीन दिखाई देते हैं अरे रामदेव के पूर्व आचरण की बात तो ऐसे कर रहे हो निर्लज्जता से जैसे स्वामी जी कोई बहुत बड़े अपराधी हों, Habitual Offender हों, जबकि पूर्व आचरण के अनुसार केजरीवाल जैसे व्यक्ति को जो बार बार अपराध करके माफ़ी मांगता है, उसे भी सुप्रीम कोर्ट माफ़ी देने को तैयार हो जाता है। 

  

हिमा कोहली तो अहसानुद्दीन से वरिष्ठ हैं और बेंच को Head कर रही हैं, वो तो उन्हें कह सकती थी कि आपकी टिप्पणी शोभनीय नहीं है और यह भी कह सकती थी कि वह अहसानुद्दीन की टिप्पणी से खुद को अलग करती हैं मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया वो तो खुद काले कॉलेजियम के बड़े पिछले दरवाजे से हाई कोर्ट से रिटायर होने के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में घुसी थी

पिछले 10 साल में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों ने अपने लिए नए कानून बना लिए हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के और हर तरह की उजड्ड भाषा बोलने की होड़ करते हैं जनता के लिए भी मोदी, भाजपा और भाजपा के नेताओं, RSS और देश को गाली देने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए छूट की भरमार कर दी है लगता है मोदी 10 साल से बर्दाश्त ही नहीं हो रहा

कोरोना काल में सुप्रीम कोर्ट ने हर हाई कोर्ट को व्यवस्था के खिलाफ सुनवाई करने का अधिकार दे दिया और खुद अलग सुनवाई करता रहा नतीजा क्या हुआ, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बेकाबू हुए संकट काल में भी मोदी सरकार के खिलाफ अनाप शनाप बोलते रहे

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस विपिन सांघी ने तो किसी फिल्म के विलेन की तरह केंद्र सरकार को कहा - “चोरी करो, उधार मांगो या भीख मांगो मगर दिल्ली को oxygen दीजिए

मद्रास हाई कोर्ट ने भी सरकार के लिए अभद्र भाषा बोली थी जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी कि संयम से काम लीजिए

नूपुर शर्मा के मामले में तो जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत ने सारी मर्यादाएं लांघते हुए सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे घटिया स्तर की भाषा उपयोग करते हुए भयंकर “Hate Speech” दी थी वो बोलते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे कोई जल्लाद नूपुर की गर्दन ही उड़ा देंगे

CJI चंद्रचूड़ को जस्टिस अहसानुद्दीन से त्यागपत्र मांगना चाहिए, इससे कम कुछ नहीं चलेगा

अवलोकन करें:-

आखिर मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले पतंजलि के ही खिलाफ क्यों है ? मी लॉर्ड क्या बांग्लादेश द्वारा