बाबा रामदेव के बयान पर दिल्ली हाई कोर्ट को सच्चाई जानने की कोशिश क्यों नहीं की? रूह अफ़ज़ा का निर्माता मुसलमान है तो फटकार दो सच्चाई बताने वाले को। क्या यही कानून है? क्या कोर्ट ने हमदर्द के खाते जांचने के आदेश दिए? यदि नहीं तो क्यों? आज से लगभग 40 पूर्व हिन्दी साप्ताहिक पाञ्चजन्य ने इसी खबर को प्रकाशित किया था और साप्ताहिक के मुख्य संपादक थे भानु प्रताप शुक्ल। अपनी विस्तृत रपट में उन सभी मुस्लिम संस्थानों के नाम प्रकाशित किये थे जिन्हे हमदर्द फंडिंग करता था। इस समाचार के प्रकाशित होने के बाद से हमदर्द ने पाञ्चजन्य और Organiser दोनों साप्ताहिकों को ब्लैकलिस्ट कर कई वर्षों तक कोई विज्ञापन देना बंद कर दिया था। हमदर्द से पूछिए कि हमदर्द ने पाञ्चजन्य और Organiser दोनों साप्ताहिकों को ब्लैकलिस्ट क्यों किया था?
दूसरे, कुछ साल पहले हमदर्द ने 10वी कक्षा में लड़कियों द्वारा इनके निर्धारित अंक प्रतिशत प्राप्त करने वाले लड़कियों को शायद 2000 रूपए देने की घोषणा की थी। मैंने खुद अपनी पुत्री और उसकी सहेली के फॉर्म हमदर्द में जमा करवाए थे। लेकिन सहेली का चैक आ गया लेकिन मेरी पुत्री का नहीं। क्योकि मेरी पुत्री हिन्दू और सहेली मुस्लिम। उस समय इस विभाग के अध्यक्ष सिद्दीकी थे। जब उनसे संपर्क किया तो बोले देर से जमा किया होगा। जब उनको कहा कि इन दोनों बच्चियों के फॉर्म जमा करने की तारीख देखिए। यानि ये राशि सिर्फ मुस्लिम लड़कियों के लिए है हिन्दू या अन्य के लिए नहीं। सिद्दीकी के पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन जज साहब तब से घर में रूहअफजा नहीं आयी और न ही मै कहीं भी पीता हूँ।
दिल्ली हाई कोर्ट बाबा रामदेव के हमदर्द शरबत पर वीडियो बनाने पर नाराज है। उसने बाबा रामदेव की निंदा की है और कहा कि यह वीडियो उसकी ‘आत्मा को झकझोरता’ है। हाई कोर्ट ने कहा है कि इसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। बाबा रामदेव ने रूह अफजा पर बनाई वीडियो को हटाने की बात कोर्ट को बताई है।
यह सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में मंगलवार (22 अप्रैल 2025) को हुई। बाबा रामदेव के खिलाफ यह मुकदमा ‘हमदर्द नेशनल फाउंडेशन’ की ओर से दायर किया गया था। हमदर्द के इस मामले में कोर्ट ने बाबा रामदेव से पाँच दिन के भीतर हलफनामा भी माँगा है।
हाई कोर्ट ने बाबा रामदेव से कहा है कि इस हलफनामे में वादा करें कि वह भविष्य में कोई ऐसा बयान, विज्ञापन या सोशल मीडिया पोस्ट नहीं करेंगे जिससे ‘हमदर्द’ को आपत्ति हो। हमदर्द ने कहा कि बाबा रामदेव अपना प्रोडक्ट बिना उनका नाम लिए बेच सकते हैं, क्योंकि उन्हें हर कोई जानता है।
बता दें कि बाबाा रामदेव ने कुछ दिन पहले पतंजलि के गुलाब शरबत प्रचार करते हुए दावा किया था कि हमदर्द कंपनी के रूह अफ़ज़ा से जो पैसा आता है। उससे मदरसे और मस्जिदें बनाई जाती हैं।
IMA प्रमुख डॉ RV अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट से माँगी माफी (फोटो साभार : भास्कर/हिंदुस्तान) बाबा रामदेव ने आयुर्वेद को नवजीवन देकर विश्व में चर्चित किया। जब से बाबा रामदेव ने आयुर्वेद को पुनर्जीवित करने अपने उत्पाद निर्मित करने शुरू किए, आयुर्वेद के दुश्मनों की रोटी-पानी हराम हो गया था। सदियों से प्रतिष्ठित आयुर्वेद को हमारे कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियों ने तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक वेदों में वर्णित दवाओं एवं उपचारों को धूमिल कर दिया था। आयुर्वेद के दुश्मनों को नहीं मालूम कि इसका जिक्र अरबों वर्षों पहले वेदों में उल्लेख है। भ्रमित विज्ञापनों से जनता को गुमराह कर अपनी तिजोरियां भरते रहे। लेकिन बाबा रामदेव भी चट्टान की तरह अडिग रहे, एक से बढ़कर एक तूफान झेल आयुर्वेद को जीवित रखने में संघर्षरत रहे। यह उन्हीं के संघर्ष का परिणाम है कि भारतीय संस्कृति विरोधियों के हाथो खेल रही IMA जैसी संस्थाओं को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अध्यक्ष डॉ. आर. वी. अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) के खिलाफ अपनी टिप्पणी को लेकर सार्वजनिक रूप से माफी माँगी है। मामला सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गई टिप्पणी के संबंध में एक इंटरव्यू के दौरान अपने द्वारा दिए गए बयान से जुड़ा है। उन्होंने इस संबंध में बृहस्पतिवार (04 जुलाई 2024) को सार्वजनिक रूप से माफी माँगी। उन्होंने कहा कि वह अपने वक्तव्य के लिए खेद व्यक्त करते हैं। इस बारे में आईएमए ने बाकायदा प्रेस नोट भी जारी किया है। नोट में कहा गया है कि उनका (डॉ RV अशोकन का) सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को कम करने का कभी कोई इरादा नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने जिस मामले में सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी, उसमें आईएमए भी एक पक्षकार था।
डॉक्टरों के संगठन की ओर से जारी किए गए एक बयान में कहा गया कि आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर आर. वी. अशोकन ने आईएमए के एक पक्ष होने से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गई टिप्पणी के संबंध में प्रेस को दिए अपने बयान को लेकर सार्वजनिक रूप से माफी माँगी है। डॉ. अशोकन ने 23 अप्रैल के आदेश का जिक्र करते हुए एक बयान में कहा कि आईएमए भी कदाचार के मुद्दों के बारे में समान रूप से चिंतित है। सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से जुड़े भ्रामक विज्ञापन संबंधी मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि उसका मानना है कि आईएमए को भी अपना घर ठीक करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में भी डॉ. अशोकन ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपने बयान को लेकर बिना शर्त माफी माँगी थी।
डॉ. अशोकन ने कहा कि आईएमए ने आधुनिक मेडिकल पेशेवरों के खिलाफ कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे भ्रामक विज्ञापन और दुर्भावनापूर्ण अभियानों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका दायर की है। एक इंटरव्यू के दौरान मेरे द्वारा दिए गए कुछ बयानों के संदर्भ में, मैंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष खेद व्यक्त किया है। मैंने बिना शर्त माफी माँगने के लिए अदालत में अपना हलफनामा भी जमा कर दिया है। उन्होंने अपने माफीनामे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के महत्व या गरिमा को कम करने का मेरा कभी कोई इरादा नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसोसिएशन के सदस्यों के बारे में कथित अनैतिक कृत्यों से संबंधित कई शिकायतें हैं जो मरीजों द्वारा उन पर जताए जाने वाले भरोसे को तोड़ते हैं। वे न केवल बेहद महँगी दवाएँ लिख रहे हैं, बल्कि टालने योग्य/अनावश्यक जाँच की भी सिफारिश कर रहे हैं। डॉ. अशोकन ने कहा कि नैतिक प्रथाओं का निरंतर अपडेट और प्रसार आईएमए की मुख्य गतिविधियों में से एक है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आईएमए को भी फटकार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आईएमए को इस विषय पर सार्वजनिक माफी माँगनी चाहिए। इसके बाद ये सार्वजनिक माफी सामने आई है।
अवैध विज्ञापन के मामले में ‘पतंजलि आयुर्वेद’ और ‘दिव्य फार्मेसी’ की तरफ से मंगलवार (7 मई, 2024) को सुप्रीम कोर्ट में उन अख़बारों को पेश किया गया, जिनमें बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की कंपनियों की तरफ से माफ़ीनामा जारी किया गया था। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो राज्यों की लाइसेंसिंग ऑथोरिटीज और केंद्र सरकार द्वारा भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के संबंध में उठाए जा रहे क़दमों का विश्लेषण करेगी। सुप्रीम कोर्ट इस दौरान अख़बार के उन पन्नों को देख कर संतुष्ट हुआ, जिनके माध्यम से माफ़ीनामा जारी किया गया था।
इससे पहले कई बार बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को व्यक्तिगत पेशी के दौरान फटकार लगाया गया था। इस दौरान ‘पतंजलि’ की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उन्होंने IMA (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के अध्यक्ष के बयान को लेकर अप्लीकेशन (IA) दायर कर दिया है। उन्होंने इसे हानि पहुँचाने के उद्देश्य से की गई अपमानजनक टिप्पणी करार दिया। IMA अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा एलोपैथिक डॉक्टरों पर टिप्पणी पर सवाल उठाए थे।
मुकुल रोहतगी ने इसे गंभीर मामला बताया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के जज अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अगर IMA आरोपों पर जवाब नहीं देता है तो उसे नोटिस जारी किया जाएगा। वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने ध्यान दिलाया कि ये बयान सुनवाई से 1 दिन पहले दिया गया था, ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता कि अनजान/बेखबर होने के कारण ये टिप्पणी की गई। वहीं भारत सरकार की तरफ से ASG केएम नटराज ने बात रखी। उन्होंने बताया कि ‘ड्रग्स एन्ड कॉस्मेटिक्स रूल्स’ के नियम संख्या 170 को कई उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गई है।
उन्होंने बताया कि 2018 में नियम संख्या 170 की अधिसूचना जारी की गई थी। उन्होंने बताया कि इसके खिलाफ 8-9 याचिकाएँ दायर हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस नियम के तहत कोई कड़ी कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था, बाद में केरल हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इसे दोहराया। उन्होंने इस दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय का वो आदेश भी पढ़ कर सुनाया, जिसमें इस कानून के नियम-170 पर पुनर्विचार के लिए केंद्र सरकार को कहा गया था।
ASG Nataraj: At least 8 or 9 writ petitions were filed. Delhi High Court ordered not to take any coercive action, that was followed in Mumbai and in Kerala High Court also ... High Court asked to reconsider the rule. #Patanjalicase#SupremeCourt#Patanjali
इस पर जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि भारत सरकार को इस सलाह का फायदा मिला। वहीं जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने पूछा कि केंद्र सरकार को इस पर निर्णय लेने के लिए कहा गया था, फिर भी ये नियम यहाँ पर है। उन्होंने पूछा कि बिना कोई निर्णय लिए बिना आप कड़ी कार्रवाई न करने को कैसे कह सकते हैं? वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि ये एक अच्छा कानून है, जब तक इसे हटाया नहीं जाता, ये लागू है। केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र भेज इसके तहत एक्शन न लेने को कहा था। ASG ने इस कानून पर पुनर्विचार के लिए समय माँगा।
कल एक बार फिर मीलॉर्ड स्वामी रामदेव पर बरस पड़े। सत्ता के उच्च शिखर पर बैठ कर सामने वाले व्यक्ति से कोई कैसा भी अनुचित व्यवहार करने का अधिकार रखता है और जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह यही कर रहे हैं। मीडिया चैनल स्वामी रामदेव के प्रति आपके आचरण को देख कर चटकारे लेकर खबरे चलाते हैं और यह शायद आपके लिए आनंद का विषय होता है।
लेखक
कल मीलॉर्ड स्वामी रामदेव के पतंजलि द्वारा सोमवार 22 अप्रैल को 73 अख़बारों में प्रकाशित किए गए माफीनामे पर 2 बातों को लेकर “नाराज़” हुए। पहली बात कि आपने एक सप्ताह का समय क्यों लिया माफीनामा छपवाने के लिए और दूसरी बात कि क्या माफीनामा उसी आकर है जैसा विज्ञापन जारी करते हैं।
ये दोनों Objections बेमानी हैं, अलबत्ता स्वामी रामदेव/बालकृष्ण और पतंजलि को जलील करना मकसद लगता है। वह इसलिए कि 16 अप्रैल को जब आपने माफीनामा स्वीकार नहीं किया था तो अगली डेट तक का दूसरा माफीनामा प्रकाशित करने के लिए कहा था। ऐसा मतलब कतई नहीं था कि माफीनामा अगले ही दिन छपवा दिया जाना चाहिए। दूसरा, ऐसा कहीं किसी कानून में Prescribed नहीं है कि माफीनामा कैसा होना चाहिए; किस size का होना चाहिए और विज्ञापन के बराबर या उससे बड़ा होना चाहिए
कई अख़बारों ने Press Council में केस चलने पर गलत रिपोर्ट के लिए माफीनामे प्रकाशित किए हैं जो भ्रामक खबर छापने की महीनों बाद छोटे से आकर में अख़बार के 8वें या 10वें पृष्ठ तक पर छापे जाते रहे हैं।
माफ़ी पर तकरार कर रहे हैं मीलॉर्ड स्वामी रामदेव की जबकि जस्टिस अहसानुद्दीन को पहले स्वयं अपने शब्दों के लिए माफीनामा देना चाहिए। सोशल मीडिया पर जबरदस्त आक्रोश के बाद पिछली तारीख पर दोनों जज कुछ नरम थे और आयुर्वेद की वैल्यू का बखान कर रहे थे और कल भी कुछ सफाई देनी की कोशिश की है कि “कोर्ट के निशाने पर कोई विशेष कंपनी या व्यक्ति नहीं है। यह लोगो के स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है, अधिकारी इसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं”।
कल तक के पहले की सुनवाई में यही नज़र आ रहा था कि स्वामी रामदेव/आचार्य बालकृष्ण/पतंजलि ही निशाने पर थे। अगर ऐसा न होता तो कोर्ट पतंजलि के विरुद्ध IMA की याचिका की सुनवाई में पतंजलि के साथ साथ ही IMA और FMGC कंपनियों को शुरू से शामिल रखते लेकिन कोर्ट ने उन्हें कल सुनवाई के दायरे में लिया है।
मीलॉर्ड ने कल IMA के वकील को कहा कि किसी की ओर एक उंगली उठाते हुए ध्यान रखें कि 4 उंगली आपकी तरफ हैं। आपने जिन सदस्यों के खिलाफ शिकायतें आईं, आपने उन पर क्या किया। यह बातें मीलॉर्ड को स्वामी रामदेव पर सुनवाई के दौरान IMA को कहनी चाहिए थी लेकिन अब केवल यह साबित करने के लिए किया गया है कि आपके ऊपर पक्षपात का आरोप न लगे जो अदालत की कार्रवाई में साबित हो रहा था और जिसके लिए आपने कल सफाई दी है।
मीलॉर्ड को IMA से यह भी पूछना चाहिए कि आपने अपने मुखिया के खिलाफ क्या कार्रवाई की जो “धर्म परिवर्तन” को बढ़ावा दे रहा था कोरोना संकट काल में।
कृपया मीलॉर्ड माफीनामे को Prestige Issue न बनाएं। एक संत जो जनहित में आयुर्वेद और योग के लिए आंदोलन चला रहा है, उसकी माफ़ी ही उसके लिए बहुत बड़ा दंड है। आगे और उसे जलील करना है तो आपको भी माफ़ी मांगनी चाहिए उन घृणित जेहादी शब्दों के लिए “we will rip you apart - हम आपको चीर के रख देंगे”।
सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी बेंच योग पर सर्विस टैक्स लगा कर पहले ही अलग हथौड़ा चला चुकी है। ऐसी सेवाएं जो भी अन्य लोग दे रहे हैं, उन पर भी कार्रवाई की जाए, उनमे तो वो संस्थाएं भी शामिल है जो ऐसे कैंप लगा कर धर्म परिवर्तन भी करा देती हैं।
पतंजलि के खिलाफ दिखाई जा रही ज्यादा सख्ती, ईसाई पादरियों पर कार्रवाई क्यों नहीं? (फोटो साभार: Hindupost)
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट बाबा रामदेव और पतंजलि के खिलाफ सुनवाई कर रहा है। IMA ने साल 2022 में याचिका दायर करते हुए पतंजलि पर भ्रामक विज्ञापन देने का आरोप लगाया था। 10 अप्रैल 2024 को भी इस मामले में सुनवाई हुई और इस दौरान केस में काफी सख्त टिप्पणी की गई।
जब बाबा रामदेव ने प्रेस कांफ्रेंस कर 'नहीं झुकेंगे' बोलने पर माफ़ी मांग ली, तो क्या रामदेव की जान लोगे? जस्टिस होकर सड़कछाप भाषा बोलोगे? कम से कम अपने पद की गरिमा का मान रखा होता? जस्टिस अमानुल्लाह आयुर्वेद को संजीवनी देने का काम रामदेव ने ही किया है, वरना तुम्हारी जैसी गिरी हुई मानसिकता वालों ने तो सनातन को अपमानित करने के साथ-साथ आयुर्वेद को भी इतिहास ही बना दिया था।
IMA ने हमदर्द के रूहअफजा पर बांग्लादेश लेबोरेटरी द्वारा दी गयी रिपोर्ट का संज्ञान क्यों नहीं लिया? उत्तर प्रदेश सरकार को हमदर्द उत्पादकों की जाँच करनी चाहिए, क्योकि बांग्लादेश ने जिस रूहअफजा को जनता के स्वास्थ्य के विरुद्ध बताया वह 'halala certified' था। IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने जिस वीणा के तारों को छेड़ा है, इसकी गूंज बहुत दूर जाने वाली है। किसी जस्टिस द्वारा रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने पर मीडिया क्यों खामोश है?
IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को यह भी मालूम होना चाहिए कि जिस टूटी हड्डी को जोड़ने में हॉस्पिटल 2/3 महीने का समय लेते हैं, कटनी में बजरंगबली मंदिर में जड़ीबूटियों को खिला कर केवल 15 मिनट में जोड़ दी जाती है। जिस महिला के किसी कारणवश संतान न होने पर आधुनिक चिकित्सा पर हज़ारों रूपए लूट लेती है, एक माता का मंदिर ऐसा भी है जहाँ महिला के लेटते ही गर्भवती हो जाती है और लिंग भी पता लग जाता है। लगा दो पाबन्दी इन मंदिरों पर। तुष्टिकरण छोड़ वास्तविकता को पहचानो।
रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह इतने नाराज हो गए कि उन्होंने ‘बखिया उधेड़ देने’ जैसी बात कही। इसके अलावा पतंजलि द्वारा जो हलफनामा दिया गया कि वो बिन शर्त मामले में माफी माँगने को तैयार हैं, उसे भी कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया। कोर्ट का कहना है कि वो इस मामले में कोई उदारता नहीं दिखाने वाले।
जस्टिस की ऐसी टिप्पणी सुनने के बाद पतंजलि के मामले में दिखाई जा रही सख्ती पर सवाल उठने लगे हैं। पूछा जा रहा है कि IMA की शिकायत के बाद पतंजलि के साथ जो हो रहा है, उसके पीछे कारण भ्रामक प्रचार ही है या मंशा अलग है?
यूजर्स उन उत्पादों के नाम बता रहे हैं जिन्हें फर्जी दावों के साथ बेचा जाता है, जो शरीर के लिए नुकसान दायक हैं लेकिन फिर भी कभी IMA ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की नहीं सोची। इन उत्पादों में लाइफब्वॉय जैसे प्रोडक्ट के उदाहरण हैं, जो कीटाणु मारने का दावा करता है; ऐसी खतरनाक ड्रिंक जिन्हें एनर्जी ड्रिंक कहकर बेचा जा रहा है।
Sting is like poison and is marketed as "Energy Drink"
Adults should not drink more than 2 bottles per day. But they do.
Children should not drink a drop of it. But they do.
IMA didn't file a plea against Pepsi who owns Sting.
इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी उठाया है। 10 अप्रैल 2024 को उनके एक्स अकॉउंट पर साझा वीडियो में वो कहते हैं कि इस मामले में कुछ लोगों को लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट पतंजलि को बोलकर गलत कर रहा है, तो कुछ को लगता है कि बाबा रामदेव ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उन्हें फटकार लग रही है।
इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम में साल 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाए गए कानून का जिक्र किया। उन्होंने बताया इस कानून में कहा गया था कि कुछ बीमारी ( जैसे अंधापन, बहरापन, हकलाना, तुतलाना, कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, पागलपन, लकवा, नपुंसकता, बाझपन, टीबी, टयूमर ) के लिए प्रचार नहीं हो सकता।
अश्विनी उपाध्याय दावा करते हैं कि ये कानून नेहरू उस लॉबी के दबाव में लेकर आए थे जिनके पास इन बीमारियों का इलाज नहीं था। लॉबी ने उनसे कहा कि ऐसा कानून बनाओ और इनका प्रचार करने को अपराध बनाओ… आज चूँकि पतंजलि ऐसी बीमारियों का इलाज बता रहा है और अपना प्रचार कर रहा है तो उनके विरुद्ध सख्ती दिखाई जा रही है।
उन्होंने ये बात भी गौर करवाई कि जिन बीमारियों को ठीक करने के दावे करने पर IMA ने बाबा रामदेव और पतंजलि की शिकायत कर दी, उन्हीं बीमारियों को ठीक करने के दावे पंजाब में हो रहे हैं, और धर्मांतरण करवाया जा रहा है।
अश्विनी उपाध्याय का ऐसा आरोप पतंजलि मामले में सामने आया है लेकिन IMA का ईसाई धर्म के प्रति झुकाव की खबरें बहुत पहले से आती रही हैं। इसके अध्यक्ष ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में कह दिया था– “मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हूँ, और यह मेरे लिए एक अच्छा मौका है कि मैं ईसाई धर्म की उपचार पद्धतियों का प्रसार कर सकूँ।” जबकि जब बात आयुर्वेद को बढ़ावा देने की आई थी तो उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत में हिन्दू पद्धति पर सरकार ज़ोर दे रही है।
IMA को निष्पक्ष होकर जनहित में बताना होगा कि आयुर्वेद यूनानी से उच्चतम क्यों है? पिछली सरकारों और पूर्व में रहे IMA अधिकारियों से पूछना होगा कि आयुर्वेद को क्यों गड्डे में डाल यूनानी को प्रोत्साहित किया गया? लेकिन हिम्मत नहीं, क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा का हिन्दू ग्रंथों में उल्लेख है।
ऐसे समय में जब IMA की शिकायत पर पतंजलि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अपनी सुनवाई कर रहा है और ऐसी ईसाई संस्थाओं पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, तब सोशल मीडिया के यूजर्स लोगों का ध्यान इस ओर खिंचवा रहे हैं।
‘नो कन्वर्जन’ नाम के एक्स हैंडल ने पादरी अंकुर नरूला की वो वीडियो को शेयर की जिसमें वो दावा कर रहे थे कि उन्होंने उन महिलाओं को ठीक कर दिया है जिनका यूटरेस बाहर आ रहा था। इस वीडियो में वो साफ कह रहे हैं कि उन्होंने प्रार्थना करके महिलाओं को वाशरूम में भेजा कि वो चेक करें कि वो ठीक हुईं या नहीं। उन महिलाओं ने बाहर आकर बताया है कि वो ठीक हो गई हैं। इसमें पादरी कहता है ये भी कहता है कि परमेश्वर आज ठीक करने के लिए आया है आपको।
Pastor Ankur Narula has fixed problem of Uterus coming out of body ? LISTEN to this idiot ... so this FRAUD is allowed in Punjab ... MiLord? pic.twitter.com/7nqFCJxFZ8
विजय गौतम लिखते हैं, “IMA का अध्यक्ष ईसाई है और उसने पतंजलि के खिलाफ केस किया है। बाबा रामदेव के पीछे बड़ी लॉबी पड़ी है। ये कोर्ट आखिर क्यों पादरियों के खिलाफ एक्शन नहीं लेती तो खुलेआम कहते हैं कि वो एड्स और कैंसर चर्च में प्रार्थना से ठीक कर सकते हैं।” उन्होंने इस मामले को पतंजलि बनान आयुर्वेद विरोधी गैंग कहा है।
IMA chairman is a Christian and he has filled this case against Patanjali . Huge lobby against Baba Ramdev
This same court will not take action against Pastors who are openly advertising that they can cure AIDS, CANCER etc through prayers in a Church.
इसी प्रकार दक्षिणपंथी रतन शारदा इस मुद्दे को उठाते हैं और कहते हैं- “आईएमए पतंजलि के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। हां, पतंजलि पर जुर्माना लगना चाहिए, लेकिन आईएमए ने एक असोसिएशन के तौर पर ज्यादा बड़े उल्लंघनकर्ताओं पर चुप्पी साध रखी है। इसका अध्यक्ष डॉ. जयलाल भी रहा था। उसने एक इंटरव्यू में क्या कहा था, देख लीजिए।”
#IMA went hammer & tongs after #Patanjali. Yes Patanjali oversold & should face panelty. But IMA an association kept quiet on worse offenders. It was headed by Dr Jiyalal. This is what Dr Jiyalal, Chairman of #IMA said in an interview. Quoting from @firstpost. Do read - pic.twitter.com/wItw5NOiDo
— Ratan Sharda 🇮🇳 रतन शारदा (@RatanSharda55) April 10, 2024
My point when I talked of Remsidivir was that everything medicine can't make mistakes or do trial & error
— Ratan Sharda 🇮🇳 रतन शारदा (@RatanSharda55) April 11, 2024
केवल एक छोटी सी बात के लिए जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की माफ़ी स्वीकार करने से मना कर दिया और कहा कि हम उनके पूर्व आचरण को ध्यान में रखते हुए यह हलफनामा स्वीकार नहीं कर सकते, बेंच ने कहा कि 30 मार्च को दाखिल हलफनामे में पेशी की छूट मांग करते हुए विदेश जाने की अनुमति मांगी लेकिन एयर टिकट 31 मार्च को अनुलग्नक में दाखिल किया गया। इसका मतलब है 30 मार्च को हलफनामा दाखिल करते हुए एयर टिकट नहीं था - बस यही गलती पकड़ कर बेंच के जज बिखर गए।
लेखक
अब कोई इतनी सी बात नहीं समझ सकता तो क्या करें। हो सकता है जब 30 मार्च को हलफनामा दाखिल किया उस समय तक टिकट न बना हो और जब बन गया तो अगले दिन कोर्ट में दे दिया। इसमें कौन सा आसमान सुप्रीम कोर्ट की छत पर गिर गया।
दूसरे, अगर IMA को जनता की सेहत की इतनी ही फ़िक्र है तो जब बांग्लादेश की लेबोरेटरी ने हमदर्द की रूहअफजा को सेहत के लिए नुकसान बताकर फेल कर दिया, फिर उसको आधार बनाकर कोर्ट क्यों नहीं गयी? क्यों नहीं भारत में रूहअफजा को बैन किया? इसका मतलब साफ है कि IMA तुष्टिकरण की गन्दी मानसिकता से ग्रस्त है। बांग्लादेश लेबोरेटरी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि रूहअफजा में जिन contents का उल्लेख है उनमे से एक भी content इसमें नहीं है।
जस्टिस अमानुल्लाह ने तो भाषा की सभी मर्यादाएं लांघते हुए उत्तराखंड सरकार के अधिकारियों को ही नहीं कहा बल्कि वे शब्द उत्तराखंड सरकार और स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को भी कहे माने जाएंगे कि “हम आपको चीर कर रख देंगे”।
माफ़ी मांगना कोई छोटी बात नहीं है लेकिन माफ़ न करने वाला बहुत बड़ा कायर होता है जो अहसानुद्दीन दिखाई देते हैं। अरे रामदेव के पूर्व आचरण की बात तो ऐसे कर रहे हो निर्लज्जता से जैसे स्वामी जी कोई बहुत बड़े अपराधी हों, Habitual Offender हों, जबकि पूर्व आचरण के अनुसार केजरीवाल जैसे व्यक्ति को जो बार बार अपराध करके माफ़ी मांगता है, उसे भी सुप्रीम कोर्ट माफ़ी देने को तैयार हो जाता है।
हिमा कोहली तो अहसानुद्दीन से वरिष्ठ हैं और बेंच को Head कर रही हैं, वो तो उन्हें कह सकती थी कि आपकी टिप्पणी शोभनीय नहीं है और यह भी कह सकती थी कि वह अहसानुद्दीन की टिप्पणी से खुद को अलग करती हैं मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। वो तो खुद काले कॉलेजियम के बड़े पिछले दरवाजे से हाई कोर्ट से रिटायर होने के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में घुसी थी।
पिछले 10 साल में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों ने अपने लिए नए कानून बना लिए हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के और हर तरह की उजड्ड भाषा बोलने की होड़ करते हैं। जनता के लिए भी मोदी, भाजपा और भाजपा के नेताओं, RSS और देश को गाली देने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए छूट की भरमार कर दी है। लगता है मोदी 10 साल से बर्दाश्त ही नहीं हो रहा।
कोरोना काल में सुप्रीम कोर्ट ने हर हाई कोर्ट को व्यवस्था के खिलाफ सुनवाई करने का अधिकार दे दिया और खुद अलग सुनवाई करता रहा। नतीजा क्या हुआ, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बेकाबू हुए संकट काल में भी मोदी सरकार के खिलाफ अनाप शनाप बोलते रहे।
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस विपिन सांघी ने तो किसी फिल्म के विलेन की तरह केंद्र सरकार को कहा - “चोरी करो, उधार मांगो या भीख मांगो मगर दिल्ली को oxygen दीजिए।
मद्रास हाई कोर्ट ने भी सरकार के लिए अभद्र भाषा बोली थी जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी कि संयम से काम लीजिए।
नूपुर शर्मा के मामले में तो जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत ने सारी मर्यादाएं लांघते हुए सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे घटिया स्तर की भाषा उपयोग करते हुए भयंकर “Hate Speech” दी थी। वो बोलते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे कोई जल्लाद नूपुर की गर्दन ही उड़ा देंगे।
CJI चंद्रचूड़ को जस्टिस अहसानुद्दीन से त्यागपत्र मांगना चाहिए, इससे कम कुछ नहीं चलेगा।
आखिर मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले पतंजलि के खिलाफ ही क्यों है? इसका कारण है। जिस आयुर्वेद को मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों ने गड्डे में धकेल दिया था, बाबा रामदेव वह व्यक्तित्व है जिसने भारत में आयुर्वेद को संजीवनी देकर जीवित कर यूनानी को ही बहुत पीछे धकेल दिया। याद है कि कुछ वर्ष पहले तक टूथ पेस्ट बेचने वाली कंपनियां अपने विज्ञापनों में नमक, कोयला, हल्दी और तेल आदि को दातों के लिए हानिकारक बताती थी, इतना ही नहीं जिस सरसों के तेल को सेहत के हानिकारक बताकर रिफाइंड तेल इस्तेमाल करने को कहा जाने लगा था, लेकिन रामदेव के बाजार में आने के बाद सबने ऐसी पलटी मारी कि अपना ही थूका चाटने को विवश हो गए। जबकि रिफाइंड तेल ही सेहत के लिए नुकसानदेह है। कहते हैं रिफाइंड जितना आग पर तपेगा, उतना ही सेहत के लिए नुकसानदेह है। डॉक्टर तक सरसों के तेल को मनाकर रिफाइंड खाने के लिए कहते थे आज वही डॉक्टर हैं जो कहते हैं कि रिफाइंड नहीं सरसो कच्ची धानी का तेल खाओ।
हमारी रसोई खुद एक दवाखाना है, यह भी रामदेव ने बताया, किसी WHO ने नहीं। कुछ का तो व्यक्तिगत अनुभव किया हुआ है जैसे शुगर और यूरिक एसिड।
मुस्लिमों की एक संस्था है हमदर्द वक्फ लैबोरेट्रीज। जो हमदर्द के नाम से कई प्रोडक्ट बनाती है, उसने अपने कुछ दवाओं के बारे में इतने बढ़ा चढ़ा के दावे किए हैं लेकिन आज तक किसी भी व्यक्ति ने उन दावों पर सवाल नहीं उठाया है।
भारत में गर्मी के मौसम में हमदर्द का रूह अफ़ज़ा खूब पिया जाता है और उसी हलाल मार्क रूह अफजा को बांग्लादेश की लैबोरेटरी ने सेहत के लिए हानिकारक बता कर फेल कर दिया। पढ़िए नीचे दिए लिंक पर। क्या किसी ने बांग्लादेश की लैबोरेटरी पर प्रश्नचिन्ह लगाने की हिम्मत की? क्या किसी ने रूह अफ़ज़ा पर प्रश्नचिन्ह लगाने की हिम्मत की? नहीं, क्यों? क्योकि इनको जनता की सेहत नहीं अपना मुस्लिम वोटबैंक प्यारा है।
उसकी एक टानिक है, जिसे वह सिंकारा के नाम से बेचती है।
वह कहती है कि आप इसे पीते ही एकदम जोश और स्फूर्ति से भर जाएंगे।
वृंदा करात जो पतंजलि की हर दवाओं को तमाम लेबोरेटरीज में भेज कर उसका रिपोर्ट लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है।
उन्होंने कभी भी सिंकारा पीकर, प्रेस कॉन्फ्रेंस करके, यह नहीं कहा कि, यही दवा पीकर मैं हाथ उठा उठा कर भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह इंशाल्लाह के नारे लगाती हूं।
क्योंकि यह दवा यह टॉनिक मेरे अंदर जोश भर देती है ऐसा सिंकारा के बारे मे कभी नहीं कहा।
एक शरबत है रूह अफजा। जिसे बांग्लादेश में सेहत के हानिकारक बताकर फेल कर दिया है।
वक्फ लेब्रोटरी दावा करता है कि, इसमें ताजे गुलाब डाले गए है लेकिन क्या आज तक किसी ने लैब में परीक्षण करके यह पता लगाया कि इसमें सच में ताजे गुलाब डाले गए हैं या विदेशों से गुलाब का केमिकल एसेंस डाला गया है?
एक सिरप है साफी, दावा करता है कि ये खून को पूरी तरह से साफ कर देता है। मैंने आज तक मीडिया या सोशल मीडिया में कभी नहीं देखा, किसी ने उस पर सवाल उठाया हो।
आखिर इस साफी में ऐसी कौनसी चीज है जो ये खून को फिल्टर कर देती है ? और अपने बड़े बड़े दावों के समर्थन में, वक्फ लैबोरेटरी, यानी मुसलमानों की यह संस्था, कौन सी जांच रिपोर्ट का हवाला दे रही है ?
ऐसे ही एक और दवा है, रोगन बादाम। इसके बारे में कम्पनी दावा करती है कि यह बादाम का अर्क, यानी जूस है। और 100 ग्राम की सीसी यह 750 रूपये में बेचती है।
मेरा फिर वही सवाल है की, क्या किसी ने सवाल उठाया कि इसमे असली बादाम है या बादाम के एसेंस हैं...?
मैंने अपने एक मित्र से पूछा, तब उन्होंने बताया कि अगर आपको 100 ml बादाम का कंसंट्रेटेड एसेंस निकालना होगा, तो उसके लिए कम से कम आपको 5 किलो बादाम चाहिए।
अब आप 5 किलो बादाम की कीमत करीब ढाई से 3000 रूपये होगी और यह कंपनी आपको मात्र 700 रूपये में 100 ml बादाम का एसेंस कैसे दे रही है...?
इसी तरह आप हमदर्द के सारे प्रोडक्ट देख लीजिए सिर्फ बड़े बड़े दावे किए गए हैं कहीं कोई सच्चाई नहीं है।
आज तक किसी भी नेता ने, हमदर्द के दवाओं के बड़े बड़े दावों पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया है।
लेकिन अगर पतंजलि कोई उत्पाद लांच करती है तो पूरा सोशल मीडिया, सारे नेता, सारे सेक्युलर, चीफ फार्मासिस्ट बनकर, ऐसे ज्ञान देते हैं जैसे उनसे बड़ा ज्ञानी इस धरती पर कोई नहीं है।
दरअसल बाबा रामदेव का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उन्होंने भगवा वस्त्र धारण किया है।
सोचिए रामदेव बाबा खुद एक ऐसे समुदाय से आते हैं जो ब्राम्हण नहीं है फिर भी यह दिलीप मंडल से लेकर बृंदा करात, सीताराम येचुरी, असदुद्दीन ओवैसी सब के सब उन पर इसलिए टूट पड़ते हैं क्योंकि उन्होंने भगवा धारण किया है।
भ्रामक प्रचार करने के आरोप में पतंजलि और बाबा रामदेव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई चर्चा में है। कारण है जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की सख्त टिप्पणी। 10 अप्रैल को बाबा राम देव और पतंजलि के एमडी बाल कृष्ण द्वारा जब बिन शर्त के लिए माफी माँगने के लिए हलफनामा दायर किया गया तो कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने उत्तराखंड के राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण के प्रति गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था- “हम आपकी बखिया उधेड़ देंगे।”
जस्टिस अनानुल्लाह की टिप्पणी से अब पूर्व जज नाराज हैं। उनका कहना है कि अदालती कार्यवाही ने संयम के मानदंड स्थापित किए हैं, लेकिन जो भाषा जस्टिस ने सुनवाई के समय प्रयोग की वो सड़क पर मिलने वाली धमकी जैसी है। पूर्व जजों और पूर्व मुख्याधीशों ने सलाह दी है कि जस्टिस अमानुल्लाह को खुद को आवश्यक न्यायिक आचरण से परिचित कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दो निर्णयों को देखना अच्छा होगा। ये कृष्णा स्वामी बनाम भारत संघ (1992) और सी रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए एम भट्टाचार्जी (1995) ) केस हैं।
कृष्णा स्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संवैधानिक अदालत के जजों का आचरण समाज में सामान्य लोगों से कहीं बेहतर होना चाहिए। न्यायिक व्यवहार के मानक, बेंच के अंदर और बाहर दोनों जगह, सामान्य रूप से ऊँचे होते हैं… ऐसा आचरण जो चरित्र, अखंडता में जनता के विश्वास को कमजोर करता है या जज की निष्पक्षता को कम बनाता है, उसे त्याग दिया जाना चाहिए। जज से यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वेच्छा से उच्च जिम्मेदारियों के लिए उपयुक्तता की पुष्टि करते हुए आचरण के संपूर्ण मानक स्थापित करेगा।
दूसरा मामला, रविचंद्रन केस का है जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “न्यायिक कार्यालय मूलतः एक सार्वजनिक ट्रस्ट है। इसलिए, समाज यह उम्मीद करने का हकदार है कि एक न्यायाधीश उच्च निष्ठावान, ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए और उसके पास नैतिक शक्ति, नैतिक दृढ़ता और भ्रष्ट या द्वेषपूर्ण प्रभावों के प्रति अभेद्य होना आवश्यक है। उससे न्यायिक आचरण में औचित्य के सबसे सटीक मानक रखने की अपेक्षा की जाती है। कोई भी आचरण जो अदालत की अखंडता और निष्पक्षता में जनता के विश्वास को कमजोर करता है, न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावकारिता के लिए हानिकारक होगा…”
जस्टिस अमानुल्लाह की तरह 2005 में जस्टिस बीएन अग्रवाल की पीठ ने भी ऐसी टिप्पणी की थी। उस समय बिहार के तत्कालीन राज्यपाल, वरिष्ठ राजनेता बूटा सिंह, बार-बार बेदखली के आदेशों की अनदेखी करते हुए, दिल्ली में एक सरकारी बंगले पर अनधिकृत रूप से कब्जा कर रहे थे। तब जज ने कहा था, “बिहार के राज्यपाल दिल्ली में बंगला लेकर क्या कर रहे हैं? उन्हें यहां बंगला आवंटित नहीं किया जा सकता। उन्हें बाहर फेंक दीजिए।” इसके अलावा नुपूर शर्मा वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत और पारदीवाला ने कहा था कि नूपुर शर्मा की ‘फिसली जुबान’ ने पूरे देश में आग लगा दी है और उन्हें पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।
महंत धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री पर विवाद होना स्वाभाविक है। जो हिन्दू अयोध्या में रामजन्मभूमि पर कुर्सी के भूखे तुष्टिकरण का पालन करने वाले के दुष्प्रचार के आगे नतमस्तक होता हो, श्रीराम को काल्पनिक कहने वाले छद्दम धर्म-निरपेक्षों को शांतिदूत मानते हों, उनकी बुद्धि को क्या कहा जा सकता है? ऐसे बेशर्म और बुद्धिविहीन हिन्दुओं को मुसलमानों से धर्म सीखना चाहिए, जो फरेब को सच साबित करने को आमादा है। जबकि पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक के के मोहम्मद, जिनकी निगरानी में कोर्ट के आदेश पर मंदिर के सबूत जुटाने खुदाई हुई थी, ने सेवानिर्वित होने उपरांत लिखी अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि "अयोध्या में राम मंदिर कभी का बन गया होता, अगर कांग्रेस और वामपंथियों ने खुदाई में मिले मंदिर के इतने अधिक मिले सबूतों को छिपाकर केवल एक खम्बा ही नहीं दिखाया होता।"
इतने चैनल महंत की सच्चाई जानने गए, लेकिन सभी उनका गुणगान करते नज़र आए। ABP News जो दुष्प्रचार करने में पीछे नहीं था, "जब महंत जी भरे दरबार में पूछा कि क्या कोई मेरे चाचा जानता है तो बताए, सन्नाटा छाते देख बोले, यहाँ जिस रिपोर्टर के चाचा का ये नाम है, सामने आए।" रिपोर्टर बिन बोले उसके प्रश्नों का उत्तर देने के बाद उसको दुष्प्रचार बंद करने के लिए कहा।
इतना ही नहीं, महंत शास्त्री का विरोध करने वालों को शायद रामभक्त हनुमान के चमत्कारों का ज्ञान नहीं। रामभक्त हनुमान के एक चमत्कार, पत्थरवाले, चांदनी चौक स्थित हनुमान मंदिर के महंत गौरव शर्मा का पिछले लेख में उल्लेख किया था। अब कटनी, मध्य प्रदेश में हनुमान मंदिर है, जहाँ टूटी हड्डियों को जड़ीबूटियों के खिलाने से तुरंत जोड़ा जाता है। जबकि किसी भी उपचार में संभव नहीं कि दवाई खाते ही टूटी हड्डी जुड़ जाए, लेकिन रामभक्त हनुमान इसे संभव कर रहे हैं। जड़ीबूटी खाने के बाद पंडित जी कहते हैं कि जिनके प्लास्टर चढ़ा है, एक्सरे करवा लो हड्डी जुड़ गयी है। यह मंदिर हड्डी वाले मंदिर के नाम से मशहूर है। दोनों में व्यक्तिगत अनुभव है।
बाबा रामदेव ने बागेश्वर धाम के महंत धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि कुछ पाखंडी लोग टूट के उनके पीछे पड़ गए हैं। ऐसे लोग पूछ रहे हैं कि ये भगवान की कृपा क्या होती है? बालाजी की कृपा क्या होती है? पूछते हैं हनुमान जी की कृपा क्या है? स्वामी रामदेव ने कहा, जिन्हें बाहर की आंखों से देखना हो वो धीरेन्द्र शास्त्री से पूछें. जिन्हें तर्क-वितर्क करना हो वो रामभद्राचार्य जी के पास आ जाओ और जिन्हें चमत्कार देखना हो तो इनके शिष्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के पास चले जाओ.
दरअसल बाबा रामदेव धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के गुरु रामभद्राचार्य जी के पास पहुँचे थे और वहीं मंच से उन्होंने धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “ये सब अगर बिना आँखों की देखनी हो तो आप पूज्य भद्राचार्य जी में देख लो। अगर आपको बाहर की आँखों से देखना हो तो यह आप धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री में देख लो। भगवान के अनुग्रह से व्यक्ति को सूक्ष्म जगत की अनुभूति होती है। लेकिन यह गुरु की कृपा और भगवत की कृपा से होता है। गुरु की कृपा, भगवत कृपा से बालाजी महाराज की कृपा होती है।”
उन्होंने आगे कहा, ”जब गुरु और भगवान की शरण में रहने वाला और दैवीय कृपा संपन्न जब कोई महापुरुष आशीर्वाद दे देता है तो व्यक्ति संकटों से मुक्त हो जाता है। यही काम धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी कर रहे हैं।” बाबा रामदेव ने कहा कि जहाँ तक बात रही तर्क-वितर्क की जिनको तर्क करना है तो वह महाराज जी (रामभद्राचार्य जी) के पास आ जाएँ। जिनको चमत्कार देखना हे वह महाराज जी के चेले (महंत धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री) के पास चले जाएँ।
बाबा ने आगे कहा, “मैं तो ज्यादा मीडिया के लोगों को फोन नहीं करता हूँ। लेकिन, मैंने कुछ को बोला है कि सब जगह पाखंड मत देखो। कुछ यह भी देख लो कि जो सच है, जो दिख रहा है आँखों से – वह केवल एक प्रतिशत है। अदृष्ट 99 प्रतिशत है।” उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले जब महंत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री महाराष्ट्र गए थे तो वहाँ कथा के समापन के बाद ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के राष्ट्रीय संयोजक श्याम मानव ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अंधविश्वास फैलाने का आरोप लगाया था।
अवलोकन करें:-
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
घर वापसी कराता हूँ, इसीलिए हो रही साजिश : महंत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, बागेश्वर धाम
साथ ही, उन्होंने कहा था कि उन्होंने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को चुनौती थी। इसलिए वे दो दिन पहले ही नागपुर से भाग गए। वहीं पूरे विवाद पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा था। उन्होंने कहा था कि उनकी प्रेरणा से लोग सनातन धर्म में वापसी कर रहे हैं। इसलिए मिशनरी के लोग करोड़ों खर्च कर उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। वे इन साजिशों से नहीं डरते हैं। उन्होंने कहा था कि अब जनजातीय इलाकों में दरबार लगाए जा रहे हैं। इसकी वजह से उनके खिलाफ हमले बढ़ गए हैं और वामपंथी पीछे पड़ गए हैं।