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उस पंजाब केसरी को धमका रही AAP सरकार, जिसके 51+ पत्रकारों को मार डाला था खालिस्तानी आतंकियों ने, फिर भी लिखता रहा उनके खिलाफ

         खालिस्तानी आतंकियों के निशाने पर रहा है पंजाब केसरी ग्रुप, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT)
पंजाब केसरी ग्रुप को पंजाब सरकार द्वारा निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। पंजाब केसरी समूह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक संतुलित खबर (जिसमें विपक्ष ने AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाए थे) के बाद से बदले की 
भावना से कार्रवाई हो रही है। इसमें नवंबर 2025 से सरकारी विज्ञापन बंद करना, जनवरी 2026 में FSSAI, GST, Excise, Pollution Control Board और Factories Department की एक साथ छापेमारी शामिल है।

यह घटना पंजाब केसरी के उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद दिलाती है, जब 1980 के दशक में खालिस्तानी आतंकियों ने इस समूह को बार-बार निशाना बनाया था। आज भी यह समूह अपनी मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी लाला जगत नारायण ने की थी पंजाब केसरी ग्रुप की शुरुआत

पंजाब केसरी की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी और प्रमुख पत्रकार लाला जगत नारायण ने की थी। उन्होंने 1940-50 के दशक में हिंदी भाषा में समाचार पत्र शुरू किए, जो पंजाब में लोकप्रिय हुए। लाला जगत नारायण ने ‘हिंद समाचार’ और ‘पंजाब केसरी’ जैसे अखबारों के जरिए समाज में जागरूकता फैलाई। वे आर्य समाज से जुड़े थे और पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहे, यहाँ तक कि विधायक और सांसद भी बने। लेकिन 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन के उभार के साथ उनकी मुश्किलें शुरू हुईं।

खालिस्तान आंदोलन के विरोध में खड़ा रहा पंजाब केसरी ग्रुप

खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब केसरी को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि लाला जगत नारायण और उनके अखबार खालिस्तान आंदोलन के कड़े आलोचक थे। सिख युवाओं में अलगाववाद फैला रहे खालिस्तानी आतंकी जर्नैल सिंह भिंडराँवाले के उभार के समय पंजाब केसरी ने उसकी हरकतों की खुलकर आलोचना की। अखबार ने निरंकारी संप्रदाय पर हमलों के लिए खालिस्तानी तत्वों को दोषी ठहराया और खालिस्तान को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया।

लाला जगत नारायण ने पंजाबी हिंदुओं से अपील की कि वे जनगणना में हिंदी को अपनी मातृभाषा बताएँ, जिससे सिखों में नाराजगी बढ़ी। अखबार ने सिख आतंकियों और भिंडराँवाले की हिंसा को बिना किसी भेदभाव के उजागर किया। इससे खालिस्तानी उन्हें सिख-विरोधी मानने लगे। उनका मकसद था कि ऐसे मुखर आलोचकों को चुप कराकर डर फैलाया जाए, ताकि कोई भी खालिस्तान के खिलाफ बोले नहीं।

खालिस्तानी आतंकी ने की लाला जगत नारायण की हत्या

लुधियाना के पास 9 सितंबर 1981 को लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई। वे कार में जा रहे थे जब अज्ञात हमलावरों ने गोलीबारी की। यह हत्या भिंडराँवाले के चेले नछत्तर सिंह ने की, जिसने बाद में कबूल किया कि भिंडराँवाले के प्रभाव में यह किया। इस हत्या के बाद भिंडराँवाले को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया। उनकी हत्या ने पंजाब में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया और हिंदुओं में डर पैदा किया।
सितंबर 1981 में उनकी हत्या ने पंजाब में बढ़ते उग्रवाद को ‘नई धार’ दे दी। HRW की रिपोर्ट में घटना का संदर्भ आते हुए बताया गया है कि 9 सितंबर 1981 को उनकी हत्या के बाद भिंडराँवाले के अनुयायियों पर संदेह गया, गिरफ्तारी हुई और उसके बाद हिंसा और तनाव का दौर बढ़ा।
बता दें कि भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लाल जगत नारायण की स्मृति में सन् 2013 में डाक टिकट जारी करके सम्मानित किया था। यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि इमरजेंसी के समय लाला जगत नारायण ने इंदिरा सरकार का भी जमकर विरोध किया था। यहाँ तक कि इस बार जो काम भगवंत मान की आम आदमी पार्टी की सरकार कर रही है, वही काम कॉन्ग्रेसी सरकार ने भी किया था।
कॉन्ग्रेसी सरकार ने पंजाब केसरी ग्रुप के अखबारों का प्रकाशन रोकने के लिए बिजली सप्लाई काट दी थी, तब पंजाब केसरी ग्रुप ने ट्रैक्टरों की सहायता से प्रिंटिंग का काम किया था और 10 दिनों तक ये व्यवस्था कायम रखी थी, जबकि हाई कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब केसरी ग्रुप के प्रिंटिंग प्रेस की बिजली बहाल नहीं हो गई।

रमेश चंदर ने भी पंजाब केसरी के तेवरों को नहीं होने दिया कम

इसके बाद भी पंजाब केसरी चुप नहीं हुआ। लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर ने अखबार की कमान संभाली और आलोचना जारी रखी। वे भी खालिस्तान आंदोलन के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे। 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंदर की हत्या कर दी गई। वे चंडीगढ़ से लौट रहे थे जब आतंकियों ने उनकी कार पर हमला किया और गोलीबारी की। दशमेश रेजिमेंट ने जिम्मेदारी ली। यह हत्या खालिस्तानी कमांडो फोर्स के सदस्यों से जुड़ी बताई जाती है। रमेश चंदर की हत्या के समय वे भारी सुरक्षा में थे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें घेर लिया।
पमेश चंदर के शरीर को 64 गोलियाँ मारकर छलनी कर दिया और वह भी अपने पिता की भांति देश की एकता के लिए बलिदान हो गए। दुनिया में पत्रकारिता के इतिहास में शायद ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ पिता और पुत्र दोनों को देश और जनता की आवाज उठाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी हो। वास्तव में पिता-पुत्र का बलिदान पत्रकारिता के इतिहास के साथ-साथ भारत के आधुनिक इतिहास का भी गौरवशाली अध्याय है।

पंजाब केसरी ग्रुप के 50+ लोगों की हत्या

पंजाब केसरी ग्रुप के पिता-पुत्र मालिकों की हत्याओं के बाद पंजाब केसरी ग्रुप पर लगातार हमले होते रहे। अखबार के कई कर्मचारी, हॉकर और वेंडर मारे गए। रिपोर्ट्स के अनुसार, लाला जगत नारायण की हत्या के बाद हिंद समाचार ग्रुप से जुड़े 51 से ज्यादा लोग मारे गए। अखबार को बंद करने की कोशिशें हुईं, लेकिन पंजाब केसरी परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।
भारत सरकार और पंजाब सरकार ने सुरक्षा देने की कोशिश की, लेकिन 1980 के दशक में स्थिति बहुत खराब थी। इंदिरा गांधी सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) किया, जिसमें भिंडराँवाले को खत्म किया गया, लेकिन इससे हिंसा और बढ़ गई।
पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा और पुलिस-सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। पंजाब केसरी के संपादकों को CRPF और पुलिस की सुरक्षा दी गई। बाद में संपादक बने अशविनी कुमार चोपड़ाको भी भारी सुरक्षा मिली। लेकिन शुरुआती दौर में सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी, जिससे हमले जारी रहे। 1990 के दशक में कच्छ-ऑपरेशन के बाद आतंकवाद कम हुआ और सुरक्षा बेहतर हुई।

आज भी खालिस्तानी आंदोलन को आड़े हाथों लेता है पंजाब केसरी ग्रुप

आज भी पंजाब केसरी खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ वैसे ही तेवर रखता है। यह समूह राष्ट्रवादी और मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। आज का पंजाब 1980-90 के पंजाब जैसा नहीं है, लेकिन खालिस्तान-समर्थक उग्र नैरेटिव, विदेशों से चलने वाला प्रचार, और कुछ प्रतिबंधित संगठनों की गतिविधियाँ समय-समय पर चर्चा में रहती हैं।
जहाँ तक आज के समय में पंजाब केसरी की बात है, उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खालिस्तान आंदोलन की आलोचना/विरोध वाले लेख और रिपोर्टिंग दिखती रही है। वो खालिस्तानी गतिविधियों को उजागर करता रहा है। ऐसे में देखा जाए तो यह अखबार आज भी पंजाब अलगाववाद के विरोध और ‘राष्ट्रीय एकता’ के पक्ष में पूरी तरह से डटा हुआ है।

महबूबा मुफ्ती से आरफा तक चाहती हैं कि हम न जानें इस्लामी लुटेरों-आक्रांताओं का सच, क्योंकि नफरत फैलेगी: अजीत डोभाल से यूँ ही नहीं चिढ़ा लेफ्ट-लिबरल गैंग

                                          अजीत डोभाल के बयान के बाद पीछे पड़े लिबरल और कट्टरपंथी
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने 10 जनवरी 2026 को ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं से प्रेरित करने के लिए शब्द कहे, उससे इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों का धड़ा आहत होकर बैठा है।

नतीजतन NSA को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक, नफरत फैलाने वाला, देश को बाँटने वाला व इनसिक्योर बताकर सेकुलर भारत के लिए खतरा बताया जा रहा है। उन्हें घेरने वालों में इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम, अलगाववादियों का समर्थन करने वाली जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती जैसों के नाम हैं।

नीचे देख सकते हैं महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट किया, “यह बहुत दुखद है कि डोभाल जैसे उच्च पद के अधिकारी, जिनका काम देश को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाना है, उन्होंने नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक विचारधारा को अपनाया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की। 21वीं सदी में सदियों पुराने घटनाओं के लिए Revenge लेने की बात करना केवल एक इशारा है, जो गरीब और अशिक्षित युवाओं को एक पहले से ही परेशान और लक्ष्य बन रही अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला करने के लिए उकसाता है।”

इसी तरह, आरफा खानम शेरवानी ने डोभाल को ऐसा इनसिक्योर अधिकारी बताया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

इनके अलावा कंचना यादव जैसे लोग भी अजीत डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़कर अपना एंगल देने में लगे हैं। वो अपने फॉलोवर्स को ये बता रहे हैं कि डोभाल अपने बच्चों को तो विदेशों में पढ़ा रहे हैं और आपके बच्चों को भड़का रहे हैं। कंचना का ट्वीट देखिए-

ऐसे ही लिबरल धड़े का जाना-माना नाम स्वाति चतुर्वेदी- लिखती हैं- आपके बच्चे मंदिर तोड़ने वालों से बदला लेंगे और डोभाल के बच्चे बाहर विदेश में बिजनेस करके लक्जरी जीवन जीएँगे।

ऊपर दिए सारे ट्वीट को देख ऐसा लग रहा है मानो डोभाल ने देश के युवाओं से बदला लेने की बात कही है, उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ युवाओं को भड़काया है। जबकि हकीकत इससे पूरी अलग है। अजीत डोभाल ने कार्यक्रम में युवाओं से जो कहा, उसका कहीं से कहीं तक अर्थ हिंसा से जुड़ा नहीं था।

क्या कहा था अजीत डोभाल ने?

कार्यक्रम में अजीत डोभाल ने देश के युवाओं को देश के इतिहास के प्रति जागरूक किया था। उन्होंने युवाओं से ये कहा था स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके लिए पीढ़ियों ने अपार बलिदान दिए। इतिहास की सच्चाइयों को समझ कर युवाओं को देश के पुनर्निर्माण में जुटना चाहिए।

उनके जिस शब्द पर वामपंथी और कट्टरपंथी ने बवाल मचाया हुआ है उसे भी उन्होंने किस संदर्भ में कहा था इसे उनके पूरे बयान से समझिए। डोभाल ने कहा था-

भारत के अतीत को सिर्फ दुख के साथ याद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई लोगों को फाँसी दी गई, गाँव जला दिए गए, हमारी सभ्यता को नुकसान पहुँचाया गया। मंदिर लूटे गए और लोग बेबस होकर यह सब होते देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है कि हर युवा के भीतर आग होनी चाहिए। ‘बदला’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला एक शक्तिशाली ताकत है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा और भारत को उसके अधिकारों, विचारों और विश्वासों के आधार पर फिर महान बनाना होगा।

डोभाल के बयान से साफ है कि वो कहीं भी ‘बदले’ शब्द को हिंसा से जोड़कर नहीं बोल रहे थे बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण की बात कर रहे हैं। उन्होंने इतिहास से सीख लेकर राष्ट्र को पुनर्निर्मित करने की बात कही, न कि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की। उनका मकसद अपने श्रोता युवाओं में देशभक्ति जगाने का था, द्वेष फैलाने का नहीं।

हालाँकि, उनके बयान को वामपंथी और कट्टरपंथी अपने एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। उन्हें शायद डर है कि कहीं सच में लोग उस इतिहास को लेकर सजग न हो जाएँ जहाँ देश को तोड़ने वालों और संपत्तियों को लूटने वालों का जिक्र है। इनकी दिक्कतें इसलिए हैं क्योंकि जिन्होंने भारत को समय-समय पर नष्ट करने का प्रयास किया वो ही इनके पसंदीदा ‘नायक’ हैं।

इस्लामी आक्रांताओं को क्यों कर रहे हो बदनाम- लिबरल और कट्टरपंथियों का तर्क

दिलचस्प बात ये है कि डोभाल के बयान को विकृत ढंग से पेश करने के चक्कर में ये लोग खुद ही इसको स्वीकार कर बैठे कि देश के मंदिर को लूटने वाली घटनाएँ बिलकुल सच हैं। महबूबा मुफ्ती के ट्वीट से स्पष्ट है कि वह मान रही हैं कि 21वीं सदी से पहले ये घटनाएँ हुईं थीं। लेकिन फिर भी वो इससे मुँह इसलिए मोड़ रही हैं क्योंकि वो नहीं चाहती इतिहास को बार-बार उकेरा जाए जिससे पता चले सच क्या था।

वहीं आरफा खानम हैं, जिनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा ये बताने-समझाने पर रहता है कि मुगलों ने देश के लिए क्या किया… उनके लिए अगर कोई ये बता दे कि उन्होंने देश में और देश के लोगों के साथ क्या किया तो उन्हें इससे आपत्ति होने लगती है।

कंचना यादव और स्वाति चतुर्वेदी का भी यही पैटर्न है। वह अच्छे से जान-समझ रही हैं कि डोभाल ने क्या बोला है, लेकिन उनकी बात चूँकि वामपंथी एजेंडे पर सही नहीं बैठ रही इसलिए उन्होंने उस बयान के खुद ही मायने गढ़ लिए।

असली गलती किसकी?

ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग लोगों को समझने की जरूरत है कि इतिहास को इनके हिसाब से पेश करने का एक दौर बीत चुका है। अब वो समय नहीं है कि इस्लामी आक्रांताओं के कुकृत्यों को महिमामंडन करने का काम हो। इतिहास का अर्थ वही होता है जो बीता समय का सच हो। अगर उसे बताने से एक समुदाय पर सवाल उठ रहे हैं, तो समस्या उस रिलिजन या मजहब में है न कि इतिहास में।

आज अगर देश को लूटे जाने के इतिहास को गहराई से पढ़ने पर ‘लुटेरे’ इस्लामी आक्रांता ही निकलकर आ रहे हैं तो इसमें इतिहास बताने वाले की क्या गलती है? गलती उसकी है जिसने ये किया, गलती उसकी है जिसने हमेशा ये समझा कि दुनिया वही इतिहास पढ़ेगा जो वो वर्ग पढ़ाना चाहेगा। गलती उस वर्ग की है जिसे लगा कि उन्होंने कह दिया तो अकबर हमेशा ‘महान’ बना रहेगा और औरंगजेब को लोग हमेशा ‘मंदिर का निर्माण’ कराने वाले के तौर पर जानेंगे।

इजरायल ने अब ईरान के सैन्य ठिकानों पर किया हमला, ड्रोन और मिसाइल बनाने वाले सेंटर बर्बाद: चेतावनी में कहा- दोबारा हमें नुकसान पहुँचाया तो छोड़ेंगे नहीं

                         हमले के समय वार रूम में मौजूद रहे पीएम नेतान्याहू (फोटो साभार: X_IDF)
इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, और इस तनाव का जवाब देते हुए इजरायल ने शनिवार, 26 अक्टूबर 2024 को ईरान के विभिन्न शहरों में सटीक हमले किए। पिछले महीने 1 अक्टूबर को ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमले के बाद से ही इस पलटवार की संभावना जताई जा रही थी। इस पलटवार में इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों को प्रमुखता से निशाना बनाया।

इजरायल ने इस मिशन को ‘Days of Repentance’ नाम दिया था। इस अभियान के दौरान इजरायल ने ईरान के अलावा इराक और सीरिया में भी हमले किए। हमलों के बाद इजरायल, ईरान और इराक ने अपनी हवाई सेवा अस्थायी रूप से बंद कर दी है। इजरायल के इस हमले में दर्जनों फाइटर जेट शामिल हुए, जिसमें एफ-15 और एफ-35 भी थे। इन फाइटर जेट्स का जवाब ईरान जैसे देशों के पास नहीं है।

तीन स्टेज में इजरायल ने बरसाई ईरान पर आफत

अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों के मुताबिक, ईरान पर ये हमले तीन चरणों में किए गए। पहले चरण में इजरायल ने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट किया, जिससे ईरान की रक्षा क्षमता कमजोर हो गई। इसके बाद, दूसरे और तीसरे चरण में इजरायली सेना ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन प्रोडक्शन सेंटर पर निशाना साधा। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना था ताकि भविष्य में इजरायल पर होने वाले हमलों की संभावना को कम किया जा सके।
इजरायली सेना ने इस हमले के कई वीडियो भी जारी किए हैं। एक वीडियो में दिखाया गया कि इजरायल एयरफोर्स के कमांड सेंटर में कैसे अधिकारियों ने ईरान पर हमले का निर्देश दिया। इस वीडियो में इजरायली चीफ ऑफ जनरल स्टाफ हर्ज़ी हलेवी को कैंप राबिन स्थित अंडरग्राउंड सेंटर से इस अभियान की निगरानी करते हुए दिखाया गया है। इस कमांड सेंटर में बैठकर उन्होंने पूरे हमले की प्लानिंग और रणनीति तय की।

IDF का बयान, ईरान ने फिर से हिमाकत की, तो हम तैयार

हमले के बाद इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) के प्रवक्ता रियर एडमिरल डैनियल हैगरी ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा, “हमने ईरान के खिलाफ हमले पूरे कर लिए हैं। इजरायल की सुरक्षा के लिए तत्काल खतरों को खत्म कर दिया गया है। अगर ईरान आगे बढ़ने की गलती करता है, तो हम एक बार फिर जवाब देने के लिए तैयार हैं।”
उन्होंने कहा, “आज हमने ईरान और पूरी दुनिया को बता दिया कि इजरायल में कितनी ताकत है। हमारा संदेश साफ है कि जो भी हमारे देश को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा, उसे उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।” हैगरी ने आगे कहा कि इजरायल ने यह दिखा दिया है कि वह अपने देश और अपने लोगों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, चाहे वह आक्रामक हो या रक्षात्मक रणनीति हो।

अमेरिका को पहले से पता थी हमले की योजना

हमले से पहले इजरायल ने अमेरिका को इसकी जानकारी दी थी। अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रवक्ता सीन सावेट ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इजरायल का यह कदम आत्म-रक्षा के अधिकार का प्रयोग है। हालांकि अमेरिका ने पहले इजरायल से यह अनुरोध किया था कि वह ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला न करे। इजरायल ने इसका सम्मान करते हुए केवल सैन्य ठिकानों पर हमले किए और आम नागरिकों को नुकसान से बचाने का पूरा प्रयास किया।
हमलों के बाद ईरान और इराक दोनों देशों ने अपनी हवाई सेवाएँ अस्थायी रूप से रोक दी हैं। ईरान के नागरिक उड्डयन संगठन के प्रवक्ता ने बताया कि फिलहाल सभी उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। वहीं, इराक ने भी सभी उड़ानों को निलंबित करने की घोषणा की है। इस कदम के पीछे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने को मुख्य कारण बताया जा रहा है। इजरायल के इस कदम से क्षेत्र में खलबली मच गई है और कई देशों के बीच तनाव बढ़ गया है।
इजरायल ने अपने इस हमले से एक बार फिर दिखा दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी खतरे को बर्दाश्त नहीं करेगा। ईरान पर तीन चरणों में हमले करके इजरायल ने न केवल अपनी सुरक्षा को मजबूत किया है बल्कि यह भी संकेत दिया है कि वह अपने दुश्मनों को करारा जवाब देने के लिए हमेशा तैयार है। अब देखना यह है कि इस हमले के बाद ईरान और अन्य संबंधित देश क्या रुख अपनाते हैं।

मोदी को बदनाम करने के लिए अवनी डायस ने डॉक्यूमेंट्री में भारत के संविधान को लेकर बोला झूठ, अपनी ‘पत्रकार’ की करतूत ABC News ने कबूली; बीजेपी क्यों नहीं ABC News और इसकी पत्रकार पर कार्यवाही करती?

कहते हैं आदमी के मरने के बाद लकीर पीटने से कुछ नहीं होता, यह बात भारत की जनता पर शत-प्रतिशत लागू होती है। जो शिक्षित होते हुए भी अनपढ़ों की तरह व्यवहार करती है। 2024 लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को हराने संविधान को लेकर कितनी भ्रांतियों फैलाई गयी। लेकिन शिक्षित भी अनपढ़ बन उन दुष्प्रचार का शिकार हो गया। क्या मेरी आयु(+) वालों को नहीं मालूम कि कांग्रेस ने संविधान में इतने अधिक संशोधन किये कि प्रस्तावना तक बदल दी। क्या संविधान निर्माताओं ने ऐसी प्रस्तावना लिखी थी? यूपीए काल में सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री से अधिक अधिकार क्यों दिए? सोनिया की इजाजत के बिना मनमोहन सिंह में किसी फाइल पर साइन करने की हिम्मत नहीं थी? सोनिया एक सांसद थी किस अधिकार से किसी भी कार्यक्रम में प्रथम पंक्ति में मंत्रिमंडल के साथ बैठती थी? मोदी सरकार ने संविधान से इन असंवैधानिक बातों को निकालकर क्या गलत किया था? और जो नेता ऐसी तर्कहीन बातों को संविधान से निकाले जाने पर देश में आग लगने की बात कहे, क्या ऐसा कोई नेता एक भी वोट का हक़दार है? 

I.N.D.I.गठबंधन को समर्थन करने वालों, अपनी भावी पीढ़ी की चिंता करो और इस I.N.D.I.गठबंधन से जितनी अधिक दूरी बना सकते हो बनाओ, जरा सोंचों: देश का संविधान तब खतरे में नहीं था, जब बहुमत के नशे में कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियों ने Muslim Waqf Board बनाया था, जब बहुमत के नशे में Minority Commission बना था, तब खतरे में नहीं था जब Muslim Personal Law Board बना दिया था, तब खतरे में नहीं था जब Places of Worship Act बनाया था, तब संविधान खतरे में नहीं था जब Anti-Communal Violence Act बनाया था, ये तो बीजेपी की मेहरबानी से पास नहीं हुआ और 2014 चुनाव हो गया। इस Act के अनुसार दंगा चाहे मुसलमान ने किया हो कसूरवार हिन्दू ही, सजा हिन्दू को, हिन्दू की संपत्ति कुर्क कर मुसलमान को दे दी जाएगी, यानि कांग्रेस और इसके समर्थक पार्टियां जिसे I.N.D.I.गठबंधन कहते हैं भारत को इस्लामिक देश नहीं मुल्क बनाने की तैयारी कर दी थी।   

इमरजेंसी में जनता ने क्या-क्या अत्याचार नहीं हुए, आज की युवा पीढ़ी को नहीं मालूम। अपनी वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति या transfer करवाने या रुकवाने के लिए कर्मचारी को नसबंदी के 2 केस देने होते थे, जो कर्मचारी को झूठे फर्जी केस का प्रमाण लेने के लिए 50-50 रूपए यानि दो केस के 100 रूपए देकर प्राप्त करने होते थे। 

फिल्म "आंधी" को बैन कर दिया था, अभिनेता-निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार की बहुचर्चित फिल्म "रोटी कपडा और मकान" का बहुचर्चित गीत " हाय महंगाई तू कहाँ से आयी..." को बैन कर दिया था। इतना ही नहीं, किसी कार्यक्रम में गायक किशोर कुमार ने गाने से मना करने पर रेडियो पर किशोर के गानों को बैन कर दिया था। फिल्म "किस्सा कुर्सी का" सेंसर से पास नहीं होने दिया। मारधार दिखाई जाने वाली फिल्मों को सेंसर पास नहीं करता था, लेकिन गाँधी परिवार के करीबी अमिताभ बच्चन अभिनीत मारधार वाली फिल्म "शोले" पास हो गयी।      


बाप(राजीव गाँधी) कह रहा है कि अगर संविधान बदलने की जरूरत होगी तो हम बार बार संविधान बदलेंगे, हमारे पूर्वजों ने भी कई बार संविधान बदला है और  बेटा(राहुल गाँधी) कह रहा है कि अगर संविधान बदला तो देश में आग लगा देंगे समझ नहीं आता कहां लोचा हो गया है। 

एबीसी की ‘पत्रकार’ अवनी दास के फैलाए फेक न्यूज पर ऑपइंडिया की रिपोर्ट के 2 सप्ताह बाद आखिरकार एबीसी न्यूज ने मान लिया कि उसकी कथित ‘पत्रकार’ अवनी डायस ने भारत के संविधान के बारे में दर्शकों को गुमराह किया है। अब एबीसी न्यूज ने अपनी सफाई दी है।

27 जून 2024 को एबीसी न्यूज ने स्वीकार किया कि अवनी डायस ने ‘भारत की आजादी के साथ ही ‘सेकुलर’ शब्द संविधान का हिस्सा है’ का जो दावा किया है, वो झूठा है। एबीसी न्यूज ने अवनी दास के फेक न्यूज पर सफाई देते हुए कहा कि ‘नरेंद्र मोदी पर बने डॉक्यूमेंट्री, जिसे 5 जून को पब्लिश किया गया था, उसमें ‘भारत के मूल संविधान में सेकुलर’ होने का दावा गलत था।’

अपनी इज्जत बचाने के क्रम में एबीसी न्यूज ने लिखा, ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1960 के दशक के दौरान पुष्टि की थी कि धर्मनिरपेक्षता भारत के 1950 के संविधान की एक बुनियादी विशेषता है, इस शब्द को 1976 में एक संवैधानिक संशोधन में जोड़ा गया, जिससे भारत का वर्णन “संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य” से बदलकर “संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” हो गया।’

मामला कैसे शुरू हुआ?

इस विवाद की शुरुआत 5 जून को हुई थी, जब एक तरफ पीएम मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ भारत विरोधी शक्तियाँ भारत सरकार और खासकर मोदी सरकार को बदनाम करने के प्रयास में लगातार जुटे हुए थे। इन्हीं प्रयासों में एक है ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (एबीसी) की कथित ‘पत्रकार’ अवनी डायस द्वारा झूठ फैलाने का प्रयास, जिसमें अवनि ने 5 जून 2024 को भारत के संविधान के बारे में फर्जी बातें प्रसारित की।
अवनी डायस ने कुछ समय पहले ही ये फर्जी खबर फैलाई थी कि ‘निगेटिव रिपोर्टिंग’ की वजह से भारत सरकार ने उनका वीजा रद्द कर दिया है, जबकि वो दावा फर्जी निकला था। इस बार अवनि ने दावा किया है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ भारतीय संविधान का अहम हिस्सा है, वो भी अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद यानी 1947 से। अवनी ने ‘नरेंद्र मोदी से पहले के भारत की कहानी’ हेडलाइन के साथ एक वीडियो बनाकर ये बताने की कोशिश की कि भारत में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की धर्मनिरपेक्षता किस तरह के खतरे में है।
अपने वीडियो के 9.19 मिनट पर अवनी डायस ने कहा, “आपको बता दें कि जब 1947 में अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भारत की स्थापना हुई थी, तो इसके संविधान में लिखा गया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसका मतलब है कि धर्म के आधार पर देश में सभी को आजादी होनी चाहिए।” अवनी ने दावा किया कि भारत के संविधान में सेक्युलर शब्द पेज नंबर 33 पर बड़े अक्षरों में लिखा है।
हालाँकि अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही ‘पत्रकार’ अवनी ये भूल गई कि भारत का संविधान 1947 में लागू नहीं हुआ और जब भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तब सेक्युलर शब्द उस संविधान का हिस्सा ही नहीं था। बता दें कि भारत का संविधान 1947 में नहीं, बल्कि तीन साल बाद 1950 में लागू हुआ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा 1976 में (आपातकाल के काले दिनों के दौरान) बनाया गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संसद को दरकिनार कर संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल करने के लिए 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया था। अवनी डायस के दावों के विपरीत, संविधान यह बताने के लिए नहीं लिखा गया था कि भारत एक ‘धर्मनिरपेक्ष देश’ है। पूरे वीडियो में एबीसी न्यूज के ‘पत्रकार’ ने वैश्विक स्तर पर देश की छवि को धूमिल करने के लिए अटकलों, अनुमानों और मान्यताओं पर भरोसा किया।

पहले भी विवादों में रही हैं अवनी डायस

इसी साल अप्रैल में अवनी डायस ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर दावा किया था कि मोदी सरकार ने उनका वीजा नहीं बढ़ाया, जिसकी वजह से उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अवनी ने दावा किया कि ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग सरकार को पसंद नहीं आ रही थी। हालाँकि ये पूरी तरह से झूठ था, क्योंकि उन्होंने जैसे ही वीजा के लिए अप्लाई किया, उनका वीजा 2 माह के लिए बढ़ा दिया गया। इसके बावजूद एबीसी न्यूज ने एक आर्टिकल प्रकाशित किया और दावा किया कि भारत के विदेश मंत्रालय ने फोन करके अवनी को सूचित किया था कि उनका वीजा नहीं बढ़ाया जा रहा।
खैर, इस प्रोपेगेंडा से इतर अवनी डायस से जुड़ा एक और मामला भी है। उसने कनाडा में हरदीप निज्जर की हत्या को भारत से जोड़ने की कोशिश करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिस पर भारत सरकार रोक लगा चुकी है और यू-ट्यूब पर पर भी उसके मामले में नोटिस दिख रहा है। दरअसल, यो डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से गलत थी, बल्कि भारत के संवेदनशील सीमाई इलाकों में गलत तरीके से फिल्माई गई थी। उन लोकेशन पर शूट करने के लिए गलत तरीके से अनुमति हासिल की गई थी, जिसका बीएसएफ ने भी विरोध किया था।

पहले भी भारत को लेकर प्रोपेगेंडा फैलाती रही हैं अवनि डायस

अवनी डायस भारत विरोधी, सनातन विरोधी लेखों के लिए जानी जाती है। उसने कई बार प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की, लेकिन हर बार एक्सपोज होती रही। इसी साल मार्च में अवनी डायस ने ब्रिसबेस में स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर पर खालिस्तानी कट्टरपंथियों के हमले को नकारते हुए कट्टरपंथियों को क्लीनचिट देने की कोशिश की थी। उन्हें इसे हिंदू समूहों का ही हमला करार दे दिया था। उनके दावों को खुद ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने एक्सपोज कर दिया था। एक फेसबुक पोस्ट में ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने अवनी डायस और उनकी साथी नाओमी सेल्वारत्नम को ‘ब्राउन सिपाही’ की संज्ञा दी थी।

मी लॉर्ड की टिप्पणी ही नहीं, IMA की मंशा पर भी उठ रहे सवाल: पतंजलि पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ईसाई बनाने वाले पादरियों के ‘इलाज’ पर चुप्पी क्यों? जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने से पहले प्राचीनतम हिन्दू ग्रंथों को पढ़ना था ; मीडिया खामोश क्यों?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट बाबा रामदेव और पतंजलि के खिलाफ सुनवाई कर रहा है। IMA ने साल 2022 में याचिका दायर करते हुए पतंजलि पर भ्रामक विज्ञापन देने का आरोप लगाया था। 10 अप्रैल 2024 को भी इस मामले में सुनवाई हुई और इस दौरान केस में काफी सख्त टिप्पणी की गई। 
जब बाबा रामदेव ने प्रेस कांफ्रेंस कर 'नहीं झुकेंगे' बोलने पर माफ़ी मांग ली, तो क्या रामदेव की जान लोगे? जस्टिस होकर सड़कछाप भाषा बोलोगे? कम से कम अपने पद की गरिमा का मान रखा होता? जस्टिस अमानुल्लाह आयुर्वेद को संजीवनी देने का काम रामदेव ने ही किया है, वरना तुम्हारी जैसी गिरी हुई मानसिकता वालों ने तो सनातन को अपमानित करने के साथ-साथ आयुर्वेद को भी इतिहास ही बना दिया था। 
IMA ने हमदर्द के रूहअफजा पर बांग्लादेश लेबोरेटरी द्वारा दी गयी रिपोर्ट का संज्ञान क्यों नहीं लिया? उत्तर प्रदेश सरकार को हमदर्द उत्पादकों की जाँच करनी चाहिए, क्योकि बांग्लादेश ने जिस रूहअफजा को जनता के स्वास्थ्य के विरुद्ध बताया वह 'halala certified' था। IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने जिस वीणा के तारों को छेड़ा है, इसकी गूंज बहुत दूर जाने वाली है। किसी जस्टिस द्वारा रामदेव के विरुद्ध सड़कछाप भाषा इस्तेमाल करने पर मीडिया क्यों खामोश है?   
IMA और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह को यह भी मालूम होना चाहिए कि जिस टूटी हड्डी को जोड़ने में हॉस्पिटल 2/3 महीने का समय लेते हैं, कटनी में बजरंगबली मंदिर में जड़ीबूटियों को खिला कर केवल 15 मिनट में जोड़ दी जाती है। जिस महिला के किसी कारणवश संतान न होने पर आधुनिक चिकित्सा पर हज़ारों रूपए लूट लेती है, एक माता का मंदिर ऐसा भी है जहाँ महिला के लेटते ही गर्भवती हो जाती है और लिंग भी पता लग जाता है। लगा दो पाबन्दी इन मंदिरों पर। तुष्टिकरण छोड़ वास्तविकता को पहचानो 

रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह इतने नाराज हो गए कि उन्होंने ‘बखिया उधेड़ देने’ जैसी बात कही। इसके अलावा पतंजलि द्वारा जो हलफनामा दिया गया कि वो बिन शर्त मामले में माफी माँगने को तैयार हैं, उसे भी कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया। कोर्ट का कहना है कि वो इस मामले में कोई उदारता नहीं दिखाने वाले।

जस्टिस की ऐसी टिप्पणी सुनने के बाद पतंजलि के मामले में दिखाई जा रही सख्ती पर सवाल उठने लगे हैं। पूछा जा रहा है कि IMA की शिकायत के बाद पतंजलि के साथ जो हो रहा है, उसके पीछे कारण भ्रामक प्रचार ही है या मंशा अलग है? 

यूजर्स उन उत्पादों के नाम बता रहे हैं जिन्हें फर्जी दावों के साथ बेचा जाता है, जो शरीर के लिए नुकसान दायक हैं लेकिन फिर भी कभी IMA ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की नहीं सोची। इन उत्पादों में लाइफब्वॉय जैसे प्रोडक्ट के उदाहरण हैं, जो कीटाणु मारने का दावा करता है; ऐसी खतरनाक ड्रिंक जिन्हें एनर्जी ड्रिंक कहकर बेचा जा रहा है।

गलती किसकी?

इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी उठाया है। 10 अप्रैल 2024 को उनके एक्स अकॉउंट पर साझा वीडियो में वो कहते हैं कि इस मामले में कुछ लोगों को लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट पतंजलि को बोलकर गलत कर रहा है, तो कुछ को लगता है कि बाबा रामदेव ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे उन्हें फटकार लग रही है।
इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम में साल 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाए गए कानून का जिक्र किया। उन्होंने बताया इस कानून में कहा गया था कि कुछ बीमारी ( जैसे अंधापन, बहरापन, हकलाना, तुतलाना, कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, पागलपन, लकवा, नपुंसकता, बाझपन, टीबी, टयूमर ) के लिए प्रचार नहीं हो सकता।
अश्विनी उपाध्याय दावा करते हैं कि ये कानून नेहरू उस लॉबी के दबाव में लेकर आए थे जिनके पास इन बीमारियों का इलाज नहीं था। लॉबी ने उनसे कहा कि ऐसा कानून बनाओ और इनका प्रचार करने को अपराध बनाओ… आज चूँकि पतंजलि ऐसी बीमारियों का इलाज बता रहा है और अपना प्रचार कर रहा है तो उनके विरुद्ध सख्ती दिखाई जा रही है।
उन्होंने ये बात भी गौर करवाई कि जिन बीमारियों को ठीक करने के दावे करने पर IMA ने बाबा रामदेव और पतंजलि की शिकायत कर दी, उन्हीं बीमारियों को ठीक करने के दावे पंजाब में हो रहे हैं, और धर्मांतरण करवाया जा रहा है।
अश्विनी उपाध्याय का ऐसा आरोप पतंजलि मामले में सामने आया है लेकिन IMA का ईसाई धर्म के प्रति झुकाव की खबरें बहुत पहले से आती रही हैं। इसके अध्यक्ष ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में कह दिया था– “मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हूँ, और यह मेरे लिए एक अच्छा मौका है कि मैं ईसाई धर्म की उपचार पद्धतियों का प्रसार कर सकूँ।” जबकि जब बात आयुर्वेद को बढ़ावा देने की आई थी तो उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत में हिन्दू पद्धति पर सरकार ज़ोर दे रही है। 
IMA को निष्पक्ष होकर जनहित में बताना होगा कि आयुर्वेद यूनानी से उच्चतम क्यों है? पिछली सरकारों और पूर्व में रहे IMA अधिकारियों से पूछना होगा कि आयुर्वेद को क्यों गड्डे में डाल यूनानी को प्रोत्साहित किया गया? लेकिन हिम्मत नहीं, क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा का हिन्दू ग्रंथों में उल्लेख है। 
ऐसे समय में जब IMA की शिकायत पर पतंजलि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अपनी सुनवाई कर रहा है और ऐसी ईसाई संस्थाओं पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, तब सोशल मीडिया के यूजर्स लोगों का ध्यान इस ओर खिंचवा रहे हैं।
‘नो कन्वर्जन’ नाम के एक्स हैंडल ने पादरी अंकुर नरूला की वो वीडियो को शेयर की जिसमें वो दावा कर रहे थे कि उन्होंने उन महिलाओं को ठीक कर दिया है जिनका यूटरेस बाहर आ रहा था। इस वीडियो में वो साफ कह रहे हैं कि उन्होंने प्रार्थना करके महिलाओं को वाशरूम में भेजा कि वो चेक करें कि वो ठीक हुईं या नहीं। उन महिलाओं ने बाहर आकर बताया है कि वो ठीक हो गई हैं। इसमें पादरी कहता है ये भी कहता है कि परमेश्वर आज ठीक करने के लिए आया है आपको।
विजय गौतम लिखते हैं, “IMA का अध्यक्ष ईसाई है और उसने पतंजलि के खिलाफ केस किया है। बाबा रामदेव के पीछे बड़ी लॉबी पड़ी है। ये कोर्ट आखिर क्यों पादरियों के खिलाफ एक्शन नहीं लेती तो खुलेआम कहते हैं कि वो एड्स और कैंसर चर्च में प्रार्थना से ठीक कर सकते हैं।” उन्होंने इस मामले को पतंजलि बनान आयुर्वेद विरोधी गैंग कहा है।
अवलोकन करें:-
इसी प्रकार दक्षिणपंथी रतन शारदा इस मुद्दे को उठाते हैं और कहते हैं- “आईएमए पतंजलि के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। हां, पतंजलि पर जुर्माना लगना चाहिए, लेकिन आईएमए ने एक असोसिएशन के तौर पर ज्यादा बड़े उल्लंघनकर्ताओं पर चुप्पी साध रखी है। इसका अध्यक्ष डॉ. जयलाल भी रहा था। उसने एक इंटरव्यू में क्या कहा था, देख लीजिए।”