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पश्चिम बंगाल : EVM-VVPAT की लूट, संदेशखाली और भाँगड़ में बमबाजी: महिलाओं को धमकाकर TMC के गुंडे डलवा रहे वोट

           कहीं हिंसा, कहीं बमबाजी, कहीं ईवीएम की लूट (साभार : X_ANI/PTI/SubhiVishwakarma)
लोकसभा चुनाव 2024 में सातवें और आखिरी चरण का मतदान जारी है। मतदान की शुरुआत से ही पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसाओं की खबरें सामने आने लगी हैं। हर बार की तरह इस बार भी टीएमसी कार्यकर्ताओं ने विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हमला किया। कहीं बमबाजी की है, तो कहीं लाठियों का सहारा लिया है। वहीं, दक्षिण 24 परगना जिले में टीएमसी के गुंडों द्वारा धमकाने पर बिफरी भीड़ ने ईवीएम और वीवीपैट मशीनों को तलाब के पानी में फेंक दिया। इस बीच, संदेशखाली और भाँगड़ में बम भी चलाए गए हैं।

चुनाव आयोग ने बताया है कि दक्षिण 24 परगना जिले के कुलताई में ईवीएम और वीवीपैट मशीनों को निशाना बनाया गया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जानकारी दी है कि ‘आज (1 जून 2024) की सुबह 6.40 बजे 19-जयनगर (एससी) पीसी के 129-कुलतली एसी में बेनीमाधवपुर एफपी स्कूल के पास सेक्टर अधिकारी के रिजर्व ईवीएम और कागजात स्थानीय भीड़ द्वारा लूट लिए गए और 1 सीयू, 1 बीयू, 2 वीवीपीएटी मशीनों को एक तालाब के अंदर फेंक दिया गया… सेक्टर अधिकारी द्वारा एफआईआर दर्ज की गई है और आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। सेक्टर के तहत सभी छह बूथों में मतदान प्रक्रिया निर्बाध रूप से चल रही है। सेक्टर अधिकारी को नए ईवीएम और कागजात उपलब्ध कराए गए हैं।’

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के कुलतई में बूथ संख्या 40, 41 पर भीड़ द्वारा कथित तौर पर ईवीएम और वीवीपैट मशीन को पानी में फेंक दिया गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि मतदाताओं को कथित तौर पर टीएमसी समर्थकों ने धमकी दी है। इससे गुस्साई भीड़ ने ईवीएम को निशाना बनाया और मशीनों को तालाब में फेंक दिया। हालाँकि यहाँ मशीनों को बदला गया और मतदान का काम जारी है।

पत्रकार सुभी विश्वकर्मा ने 2 जगहों पर बमबारी की घटना की जानकारी दी है। उन्होंने वीडियो भी पोस्ट किए हैं। पहली घटना जाधवपुर लोकसभा क्षेत्र के भाँगड़ इलाके की है, जहाँ बमबाजी की गई। वहीं, संदेशखाली में भी बमबाजी की वारदात सामने आई है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि अधिकारी महिलाओं और महिला बूथ कार्यकर्ताओं के साथ ही मतदाताओं को टीएमसी के पक्ष में वोटिंग के लिए धमका रहे हैं।

पश्चिम बंगाल बीजेपी ने ममता बनर्जी पर निशाना साधा है। बीजेपी ने पूछा है कि ये बम कहाँ से आ रहे हैं। पश्चिन बंगाल बीजेपी ने एक्स पर लिखा, “सातवें चरण के मतदान में भी टीएमसी का आतंक जारी है। सतुलिया, भांगड़ में बम धमाके हो रहे हैं। ममता बनर्जी, जो जानती हैं कि ये बम कौन बना रहा है, फिर भी ये धमाके होने दे रही हैं। ममता बनर्जी, ये सारे बम कहाँ से आ रहे हैं?”

लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम चरण में सुबह 9 बजे तक 11.31 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जारी आँकड़ों के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 14.35%, झारखंड में 12.15%, बिहार में 10.58%, चंडीगढ़ में 11.6%, यूपी में 12.94%, ओडिशा में 7.69%, पंजाब में 9.64% और पश्चिम बंगाल में 12.64% मतदान हुआ है।

लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में 57 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी सीट भी शामिल है। जिन सीटों पर आज वोटिंग हो रही है, उसमें पंजाब और यूपी की 13-13 सीटें, पश्चिम बंगाल की 9 सीटें, बिहार की 8 सीटें, ओडिशा की 6 सीटें, हिमाचल प्रदेश की 4 सीटें, झारखंड की 3 सीट और एक चंडीगढ़ सीट शामिल है।

तर्कहीन याचिकाएं लगाने वाले लोगों और संगठनों पर सुप्रीम कोर्ट लगाम लगाएं और खुद पर भी कंट्रोल करें; वरना इसे सुप्रीम कोर्ट, ऐसे तत्वों और वकीलों की बीच Criminal Nexus माना जाएगा

सुभाष चन्द्र

पिछले महीने 27 अप्रैल को Association for Democratic Reforms (ADR) की EVM और VVPAT के शत प्रतिशत मिलान के लिए दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था जिसे लड़ा था प्रशांत भूषण ने। ये सभी लोग किसी तरह भी चुनाव आयोग और मोदी को परेशान करने की कोशिश में लगे हैं

इस याचिका के ठुकराने के बाद ADR के दिमाग में एक और फितूर पैदा हुआ और उसने प्रशांत भूषण के जरिए ही एक नई याचिका मात्र 15 दिन बाद 10 मई को सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दी और ऐसी मांग की जिससे ADR को कुछ लेना देना नहीं है ADR ने याचिका में कहा कि “चुनाव आयोग को हिदायत दी जाए कि चुनाव के 48 घंटे के भीतर “authenticated data of votes polled” जारी करें

ADR also sought a direction to provide in the public domain a tabulation of the constituency and polling station-wise figures of voter turnout in absolute numbers and percentage form for the ongoing 2024 Lok Sabha elections.

फिर क्या था सुप्रीम कोर्ट को भी मौका मिल गया चुनाव आयोग का बाजा बजाने का और 17 मई को CJI चंद्रचूड़, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने आयोग को नोटिस जारी करके कहा कि एक हफ्ते में यानी 24 मई तक ADR द्वारा मांगी गई जानकारीके बारे में जानकारी दे  (authenticated records of voter turnout by uploading on its website scanned legible copies of Form 17C Part-I (Account of Votes Recorded) of all polling stations after each phase of polling in the on-going 2024 Lok Sabha elections)

लेखक 
चर्चित youtuber 
चुनावों की मारा मारी में चुनाव आयोग को ऐसे ही फालतू मुकदमों में उलझा कर रखने का क्या मकसद हो सकता है आप समझ सकते हैं चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कल हलफनामा दाखिल करके बता दिया कि फॉर्म 17 C में वोटों की जानकारी मांगने का कोई अधिकार नहीं है इस फॉर्म के आधार पर मतदान का डाटा सार्वजनिक किया गया तो मतदाताओं में भ्रम फ़ैल सकता है (और वही ADR का जैसे लक्ष्य है) क्योंकि इसमें डाकपत्रों की गिनती भी शामिल होगी आयोग ने यहां तक बताया कि 17 सी में प्रत्येक मतदान केंद्र का रिकार्ड़ होता है और मतदान समाप्त होने के बाद हर प्रत्याशी के एजेंट को उनके हस्ताक्षर लेकर उसकी एक कॉपी दी जाती है  

इसका मतलब 48 घंटे क्या, वोटिंग ख़त्म होते ही जब सूचना हर प्रत्याशी को दे दी जाती है तो फिर 48 घंटे में डाटा वेबसाइट पर डालने का क्या मतलब है ये चाहते हैं कि करीब 70 करोड़ वोटरों का डाटा 48 घंटे में वेबसाइट पर डाल दिया जाए और चुनाव आयोग में अफरा तफरी मची रहे

ऐसी संस्थाएं देश में किसी न किसी तरह अराजकता का माहौल पैदा करना चाहती है और बिना दिमाग लगाए सुप्रीम कोर्ट ऐसी याचिकाओं पर संज्ञान लेकर उनका साथ दे रहा है जो सर्वथा अनुचित है एक बार मीलॉर्ड को सोचना चाहिए था और ADR से पूछना तो था कि आप को इस तरह की जानकारी से क्या मतलब है और आपकी क्या दिलचस्पी है इसमें, आप क्यों मामा बनने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मीलॉर्ड को तो बस पंचायत बिठानी है

ADR के लिए कहा गया है कि यह एक गैर राजनीतिक, non-partisan और  non-profit organisation है हम कैसे यह मान सकते हैं इस संस्था के funds की जांच जरूरी है और जानना जरूरी है कि पैसा कहां से आता है प्रशांत भूषण जैसे वकील यदि इसके साथ जुड़े हैं तो इसे किसी तरह गैर राजनीतिक और non-partisan नहीं माना जा सकता क्या ये संगठन कभी किसी मामले में मोदी सरकार के पक्ष में खड़ा हुआ है, शायद नहीं, इसका लक्ष्य मोदी सरकार से टकराव का रहता है और प्रशांत भूषण की उपस्थिति यह साबित करने के लिए काफी है 

पश्चिम बंगाल : कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपने ही अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के चेहरे पर पोती स्याही, लिख दिया ‘TMC का एजेंट’

                                    राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पोस्टर पर पोती स्याही
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कार्यकर्ता अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के पोस्टर में उनके चेहरे पर स्याही पोत रहे हैं। बता दें कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्य में कांग्रेस को गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाया। इसके बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी उन पर हमलावर हैं। इसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने पार्टी को क्षत्रप को चेताया भी। अब कोलकाता स्थित कांग्रेस भवन में इसका परिणाम देखने को मिला है।

आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन के मुंह पर स्याही पोतनी पड़ी? कारण साफ है, जो भी नेता परिवार के विरुद्ध अगर पार्टी हित में भी काम करता है, वो परिवार को पसंद नहीं।  

पार्टी के पोस्टर में मल्लिकार्जुन खड़गे के चेहरे पर काले रंग की स्याही कांग्रेस के ही कार्यकर्ताओं ने पोत दी। उसी होर्डिंग पर पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की फोटो भी लगी हुई है। हालाँकि, उनकी तस्वीरों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। कोलकाता में विधान भवन के सामने कांग्रेस पार्टी के पोस्टरों में इन दिग्गजों की तस्वीरें लगी हैं। जैसे ही कांग्रेस के अन्य स्थानीय नेताओं को मामले का पता चला, आनन-फानन में स्याही लगे होर्डिंग्स और बैनरों को हटाया।

TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कुछ दिनों पहले एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि वो सरकार बनने की स्थिति में I.N.D.I. गठबंधन को बाहर से समर्थन देंगी। इस पर मल्लिकार्जुन खड़गे ने दावा किया था कि ममता बनर्जी गठबंधन के साथ हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का गठबंधन ममता बनर्जी के धुर विरोधी वामदलों से है। केरल में कांग्रेस पार्टी इन्हीं वामदलों के साथ लड़ रही है। केरल के CM पिनाराई विजयन और राहुल गाँधी ने एक-दूसरे पर खूब जुबानी हमले बोले हैं।

शनिवार(19 मई, 2024) रात को हुई ताज़ा घटना के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे की तस्वीर के नीचे अज्ञात लोगों ने ‘TMC का एजेंट’ भी लिख दिया। बताया जा रहा है कि ये नाराज़ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही किया है। अधीर रंजन चौधरी फ़िलहाल अपने गृह-क्षेत्र बहरामपुर में हैं और उन्होंने कार्यकर्ताओं से इस मामले को लेकर शिकायत देकर FIR दर्ज कराने को कहा। मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि अधीर रंजन चौधरी ये निर्णय लेने वाले कोई नहीं हैं कि गठबंधन का स्वरूप कैसा होगा।

हैदराबाद : क्या ‘सालार के बेटे’ के खिलाफ चुनाव भी नहीं लड़ सकती एक हिंदू बेटी? AIMIM समर्थक भीड़ ने माधवी लता को दी 'चल निकल, माँ की $# तेरी’, देखती रही पुलिस

माधवी लता को गंदी गालियाँ देता शख्स

लोकसभा चुनाव 2024 के चौथे चरण में सोमवार (13 मई, 2024) को 96 सीटों पर मतदान हुआ, जिनमें से एक हैदराबाद भी था। तेलंगाना की राजधानी को AIMIM का गढ़ माना जाता है, जहा पिछले 40 वर्षों से ओवैसी परिवार का कब्ज़ा है। इस बार असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ भाजपा ने कोम्पेल्ला माधवी लता को उतारा है। उनका आरोप है कि बड़ी मात्रा में फर्जी मतदान हुआ है और पुलिस ने बुर्कानशीं महिलाओं की फोटो उनके पहचान-पत्र से मिलान नहीं किया।

अब एक वीडियो सामने आया है, जिसमें AIMIM समर्थक भीड़ जुटा कर माधवी लता को गाली देते हुए दिख रहे हैं। एक शख्स ‘चल निकल, माँ की $# तेरी’ चीख रहा है। उक्त शख्स ने नीले रंग की शर्ट पहन रखी है और ब्लैक गॉगल्स लगा रखा है। इस दौरान माधवी लता वहाँ शांत खड़ी रहीं और उन्होंने पलट कर जवाब भी नहीं दिया। बड़ी बात ये है कि ये सब हैदराबाद पुलिस के सामने हुआ। पुलिसकर्मियों ने गंदी-गंदी गालियाँ देने वाले उस व्यक्ति को गिरफ्तार भी नहीं किया।

वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस उसे समझा रही है और पीछे जाने को कह रही है, लेकिन वो लगातार माँ की गालियाँ देते हुए चीख रहा है। माधवी लता उस दौरान फोन पर किसी से बात कर रही थीं, उन्हें उनके सुरक्षाकर्मियों ने अपने घेरे में ले लिया। वहाँ इकट्ठी भीड़ उन्हें वहाँ से निकलने को कह रही थी। पुलिस के हस्तक्षेप के बावजूद भीड़ वहाँ से तितर-बितर नहीं हुई। बता दें कि पोलिंग बूथ पर बुर्कानशीं महिलाओं का चेहरा उनके पहचान-पत्र से मिलाने को लेकर उनके खिलाफ FIR दर्ज की जा चुकी

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माधवी लता ने इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि क्या ऐसी गालियाँ दिए जाने से वो डर जाएँगी? उन्होंने कहा कि वो भी इस पाता बस्ती की गलियों में खेलते हुए बड़ी हुई हैं। भाजपा उम्मीदवार ने कहा कि एक महिला वहाँ लड़ने आ गई और जनता को भी पसंद आ गई, इससे विरोधी डरे हुए हैं। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि विपक्ष का हर चमचा रो रहा है। माधवी लता अपने हिन्दुवत्ववादी चेहरे के लिए जानी जाती हैं और राष्ट्रीय मीडिया में भी उन्हें अच्छी कवरेज मिली है।

बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी ने अपने भाई अकबरुद्दीन को ‘सालार का बेटा’ बताया था। वो अकबरुद्दीन ही है, जिसने 15 मिनट के लिए पुलिस हटा देने के बाद अंजाम देखने की धमकी हिन्दुओं को दी थी। बता दें कि ओवैसी भाइयों के अब्बा सुल्तान सलाहुद्दीन को ‘सालार-ए-मिल्लत’ कहा जाता था, इसका अर्थ है – जननेता। सलाहुद्दीन के अब्बा अब्दुल वहीद ने AIMIM की स्थापना की थी। सलाहुद्दीन ने 4 दशक के अपने राजनीतिक करियर में अखंड आंध्र प्रदेश के मुस्लिम वोटरों को अपने साथ रखा, अपने मनमुताबिक पाले में उन्हें झुकाया।


‘हैदराबाद में 90% बूथों पर गड़बड़ी, मरे हुए लोगों के भी डले वोट’: माधवी लता ने बताया क्यों बुर्का वालियों की उन्हें खुद करनी पड़ी पहचान

भाजपा प्रत्याशी कोम्पेल्ला माधवी लता का मतदान में गड़बड़ी का आरोप
लोक सभा चुनाव 2024 के चौथे चरण के लिए सोमवार (13 मई, 2024) को जिन 96 सीटों पर मतदान हो रहा है, उनमें एक हाईप्रोफाइल सीट हैदराबाद भी है। तेलंगाना के हैदराबाद में मुख्य मुकाबला AIMIM के बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी और भाजपा की कोम्पेल्ला माधवी लता के बीच है। माधवी लता उस क्षेत्र में लंबे समय से समाजसेवा का कार्य करती आ रही हैं, वहीं ये सीट पिछले 40 वर्षों से ओवैसी परिवार के कब्जे में है। अब मतदान के दिन ही माधवी लता के खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई है।

असल में माधवी लता को कई मतदान केंद्रों पर बुर्कानशीं महिलाओं के चेहरे और उनके वोटर आईडी कार्ड में दर्ज तस्वीर का मिलान करते हुए देखा गया। माधवी लता पहले से ही आरोप लगाती रही हैं कि हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी लाखों फर्जी मतों के दम पर जीतते हैं और बुर्के में महिलाओं को फर्जी मतदान के लिए लाया जाता है। इस दौरान माधवी लता ने इन महिलाओं को बुर्का हटाने के लिए कहा। ‘ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन’ के कमिश्नर के आदेश पर ये FIR दर्ज की गई है।

कमिश्नर रोनाल्ड रोज को ही चुनाव आयोग ने हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के लिए रिटर्निंग ऑफिसर भी बनाया है। मालकपट पुलिस थाने में माधवी लता के विरुद्ध IPC की धारा-171C (मताधिकार के प्रयोग की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना), 186 (सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी में बाधा डालना) और 505(1)(c) (किसी वर्ग को भड़काने के लिए बयान देना) के तहत FIR दर्ज हुई है। साथ ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा-132 भी लगाई गई है।

माधवी लता ने आरोप लगाया है कि कई मतदाताओं के नाम वोटर्स लिस्ट में से डिलीट भी कर दिए गए हैं। सफाई में माधवी लता ने कहा है कि वो एक उम्मीदवार हैं और उन्हें मतदाताओं की पहचान की पुष्टि करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि वो खुद एक महिला हैं, ऐसे में वो दूसरी महिलाओं का सम्मान करती हैं। बकौल माधवी लता, उन्होंने सिर्फ बुर्कानशीं महिलाओं से निवेदन किया था कि वो अपनी पहचान बताएँ। भाजपा उम्मीदवार ने कहा कि जिनकी गड़बड़ियाँ उजागर हो रही हैं वो हो-हल्ला कर रहे हैं।

उन्होंने कई मतदान केंद्रों पर बड़े स्तर पर बोगस वोटिंग का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में जिनलोगों की मौत हो गई है उनके नाम पर भी वोट डाले गए हैं। आज़मपुरा और गोशमहल में गड़बड़ियों को लेकर उन्होंने चुनाव आयोग में शिकायत देने की बात भी कही है। माधवी लता ने कहा कि 90% बूथों पर गड़बड़ियाँ हो रही हैं, महिला कॉन्स्टेबलों को बुर्कानशीं महिलाओं के चेहरे का उनके पहचान-पत्र से मिलान करने को नहीं कहा जा रहा है। उन्होंने कहा कि पुलिस को शिकायत करने पर वो कह रहे हैं कि ये उनकी जिम्मेदारी नहीं है।


क्या सुप्रीम कोर्ट केजरीवाल के मकड़जाल में फंस गया है? घोटाले के सबूतों से हो सकती है छेड़छाड़; चुनाव बड़ा या घोटाले?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोकसभा चुनाव 2024 को देखते हुए अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका पर सुनवाई कर सकते हैं। जमानत दे दी जाए, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। इसके लिए हम कुछ नहीं कह रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को भी सूचना दे दी है कि 7 मई को इस मामले में वो सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर ये मामला लंबा चलता है, तो अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव के लिए अंतरिम जमानत देने पर विचार किया जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की अंतरिम जमानत पर दोनों पक्षों को बहस के लिए तैयार हो कर आने के लिए कहा है। मंगलवार (7 अप्रैल 2024) को सुप्रीम कोर्ट ने बहस के लिए समय दिया है। कोर्ट ने कहा कि ये मामला लंबा चलेगा, लिहाजा आम चुनाव के मद्देनजर हम केजरीवाल को अंतरिम जमानत पर चुनाव प्रचार के लिए छोड़े जाने पर विचार करेंगे। उनको अंतरिम जमानत दी जाए या नहीं, इस पर बात करेंगे। साथ ही कहा कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू अपने मुवक्किल ईडी से जमानत की शर्तों पर निर्देश लेकर आएँ। सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से पूछा कि क्या केजरीवाल अभी भी फाइल पर हस्ताक्षर कर सकते है? इस पर सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को जवाब देने के लिए कहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कहा कि गिरफ्तारी के खिलाफ केजरीवाल की याचिका पर सुनवाई में समय लगने की संभावना है और इसलिए अदालत उन्हें अंतरिम जमानत देने पर ईडी की दलीलें सुनने पर विचार कर रही है। इस पर एसवी राजू ने कहा कि वह केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने का विरोध करेंगे। बता दें कि बेंच केजरीवाल की याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें ईडी द्वारा उनकी गिरफ्तारी को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान ईडी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलीलें रखी, लेकिन कोर्ट ने राजू को टोका और कई सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि आपके पास मेटेरियल क्या हैं जिनसे ये बताया जा सके कि गिरफ्तारी अनिवार्य है। जस्टिस संजीव खन्ना ने केजरीवाल के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा कि दिल्ली में चुनाव कब होने हैं? इस पर एडवोकेट सिंघवी ने कहा कि 25 मई को दिल्ली में चुनाव होने हैं। चुनाव के 48 घंटे पहले प्रचार बंद हो जाएगा।

मुस्लिमों के तुष्टिकरण को दूर करने का और विकसित भारत के लिए एक रामबाण उपाय; संविधान से भी छेड़छाड़ नहीं होगी; कोई कौम कितने प्रतिशत पर Minority है तय कर दो

सुभाष चन्द्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कहना कि ‘अब कांग्रेस अर्बन नक्सलों के कब्जे में चली गई है। कांग्रेस अब वामपंथियों के चंगुल में फंसी हुई है। कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टों में जो कहा है वो चिंताजनक और गंभीर है। कांग्रेस में तूफान आ गया। और कांग्रेस की सच्चाई सामने आने पर तूफान आना लाजमी है। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार बनेगी तो हरेक की प्रॉपर्टी का सर्वे किया जाएगा। हमारी बहनों के पास सोना कितना है, उसकी जांच की जाएगी। हमारे आदिवासी परिवारों में चांदी होती है, सिल्वर कितना है, उसका हिसाब लगाया जाएगा। इतना ही नहीं ये जो गोल्ड है, बहनों का और जो संपत्ति है वो सबको समान रूप से वितरित कर दी जाएगी। क्या ये आपको मंजूर है? क्या आपकी मेहनत करके कमाई हुई संपत्ति को सरकार को ऐंठने का अधिकार है क्या? हमारी माताओं-बहनों की जिंदगी में सोना सिर्फ शो करने के लिए नहीं होता है। उसके स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है, उसका मंगलसूत्र, वो सोने का मु्ददा नहीं है। उसके जीवन के सपनों से जुड़ा हुआ है। तुम उसे छीनने की बात कर रहे हो, अपने मेनिफेस्टो में। गोल्ड ले लेंगे, सबको वितरित कर देंगे। 

और पहले जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने कहा कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब ये संपत्ति इकट्ठी करके किसको बांटेंगे, जिसको ज्यादा बच्चे हैं, उसको बांटेंगे। घुसपैठियों को बांटेंगे। क्या आपकी मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा। आपको मंजूर है ये? ये कांग्रेस के मेनिफेस्टो कह रहा है। वो माताओं-बहनों के सोने का हिसाब करेंगे, जानकारी लेंगे फिर और उसको बांटेंगे। जिनको मनमोहन सिंह जी की सरकार ने कहा था कि संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। ये अर्बन नक्सल की सोच मेरी माताओं-बहनों आपका मंगलसूत्र भी बचने नहीं देंगे।’

इतना ही नहीं, मनमोहन सिंह सरकार पद्मनाभन मंदिर के कमरे में बंद स्वर्ण(सोना) को हथियाने कोर्ट तक पहुँच गयी थी, लेकिन मस्जिद और दरगाहों पर हो रही धन-वर्षा पर चुप्पी, क्यों? जब सरकार मंदिरों को आने वाले चढ़ावे पर गिद्ध नज़र रखती है, फिर मस्जिदों और दरगाहों की कमाई पर क्यों नहीं? 

लेखक 
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भाषण पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण के आधार पर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश का संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है। क्या तुष्टिकरण करना ही कांग्रेस के शब्दकोष में सेकुलरिज्म कहलाता है? क्या यह तुष्टिकरण नहीं? इसको लेकर कांग्रेस के ट्वीट का जवाब देते हुए बीजेपी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहते सुनाई देते हैं कि ‘हमें यह सुनिश्चित करने के लिए इनोवेटिव योजनाएं बनानी होंगी जिससे अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विकास का समान लाभ मिले। संसाधनों पर पहला हक उनके पास होना चाहिए।’
मुस्लिम तुष्टिकरण पर दिया गया यह बयान मौजूदा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन गया है। लोगों का कहना है कि कांग्रेस इससे पहले से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने में लगी थी। सीनियर जर्नलिस्ट दिलीप मंडल ने कहा है कि ‘मुसलमानों का देश के संसाधनों पर पहला हक वाला मनमोहन सिंह का बयान अचानक नहीं आया था। ठीक इसी दौरान कोशिश हो रही थी कि शिड्यूल्ड कास्ट की लिस्ट में मुसलमानों को भी घुसाया जाए। मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में अलग से 15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। ओबीसी आरक्षण को धर्म के आधार पर बांट कर मुसलमानों को 6 प्रतिशत अलग दिया जाए। धर्म परिवर्तन करने पर भी एससी का दर्जा सुरक्षित रहे।’ उन्होंने एक्स पर लिखा है कि कांग्रेस सरकार रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट के हवाले से दलितों का हक छीन कर मुस्लिमों को देना चाहती थी। उन्होंने यह भी लिखा है कि रंगनाथ मिश्रा धर्मांतरण का रास्ता साफ करने की कोशिश कर रहे थे और सरकार की शह उनको हासिल थी।

देश की आज़ादी के पहले से ही मुस्लिमों के अल्पसंख्यक होने का लाभ उठा कर गैर भाजपा दल उनके ही तुष्टिकरण में लगे रहे हैं। कांग्रेस ने मुस्लिमों के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे ऐसे कानून बना दिए जिनकी वजह से आज मुस्लिम समुदाय हिंदू बहुल समुदाय को रौंदने से परहेज़ नहीं करता और सभी सेकुलर दल 80% हिंदुओं को गाजर मूली की तरह काटने को तैयार रहते हैं। 

तीसरी बार वापसी आने पर मोदी सरकार को उर्दू आदि शब्दों का असली अर्थ बताना होगा। सुश्री नाज़िया खान का निम्न वीडियो इस पर रौशनी डाल रहा है। ऐसे अनेकों वीडियो है जो मुस्लिम समाज में चलन में कई शब्द हैं, लेकिन तुष्टिकरण करते कई उर्दू नही बल्कि अरबी और फ़ारसी के लब्जों को हिन्दी भाषा में चलन ला दिया। श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा के दिनों में एक बुजुर्ग मौलाना अंसारी ने न्यूज़ 18 पर लखनऊ से लाइव प्रोग्राम 'भइया जी कहिन' में कहा था की नमाज़ संस्कृत का शब्द है किसी अरबी या फ़ारसी का नहीं। वही बात इस पुराने वीडियो में सुश्री नाज़िया खान कह रही हैं।   

 

कांग्रेस ने समय समय पर जो कानून बनाए मुस्लिमों के लिए, वे ये हैं -

Article 25, 28, 30 (1950)

HRCE (1951)

HCB MPL (1956)

Secularism (1975)

Minority Act (1992)

Places of worship Act (1991)

Wolf Act (1992)

Ram Setu affidavit (2007)

Saffron terrorism (2009)

ऐसा इसलिए किया जाता रहा है क्योंकि देश में आज तक यह तय नहीं किया गया है कि कौन सी कौम कितनी प्रतिशत आबादी होने पर Minority मानी जाएगी। आज मुस्लिम समुदाय 100 के करीब लोकसभा सीटों के चुनाव को प्रभावित कर सकता है, भला फिर ऐसा समुदाय Minority कैसे माना जा सकता है?

2011 की जनगणना के अनुसार देश में हिंदू और अन्य समुदायों की आबादी यह थी -

-हिंदू - (80%)

-मुस्लिम - (14.2%)

-ईसाई -(2.3%)

-सिख -(1.72%)

-बौद्ध - (0.7%)

-सरना (0.41%)

-जैन -(0.37%)

-गोंड धर्म - (0.08%)

-पारसी - (0.006%)

-अन्य धर्म - (0.16%)

-किसी को न मानने वाले -(0.24%)

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिमों की आबादी 17.22 करोड़ थी जो सरकार के अनुसार 2023 में 19.7 करोड़ हो गई

वर्ष 2020-21 की MoSPI (Ministry of Statistics and Program Implementation, Government Of India.) की रिपोर्ट में बताया गया था कि 94.9% मुस्लिमों के अनुसार उन्हें बेहतर पीने के पानी की सुविधा मिली और 97.2% मुस्लिमों के अनुसार उन्हें बेहतर Toilet Facilities मिली। इसके अलावा 50.2% मुस्लिमों ने 31 मार्च, 2014 के बाद नए घर खरीदे या बनाए। यह तथ्य 2021 तक के हैं और उसके बाद उनके लिए और भी बेहतर हुआ होगा

लेकिन फिर भी हर समय एक ही रोना कि हमारा अल्पसंख्यक होने की वजह से शोषण हो रहा है जबकि उपरोक्त सूचना से साबित होता है कि मोदी राज में मुस्लिमों का जीवन स्तर हर तरह से बेहतर हुआ है

हर देश को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार देश और समाज हित में कानून बनाने का अधिकार होता है। कांग्रेस 2005 से संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक़ बताती आई है जो बहुसंख्यक और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ अनाचार है

इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध है कि वे अपने अगले कार्यकाल में यानी Modi 03 में संसद से कानून पास करा कर तय करें कि किसी समुदाय को तब ही अल्पसंख्यक (Minority)  का दर्जा मिलेगा जब उसकी आबादी 5% से कम होगी - 5% से ज्यादा आबादी होने पर Minorities को मिलने वाली सुविधाएं नहीं मिलेंगी

इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में जरूर चुनौती दी जाएगी और अगर अदालत इसके खिलाफ फैसला देती है तो संसद से उस फैसले को भी निरस्त कराया जाए। 

यह कानून Minority-ism से जुड़ी सभी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर देगा बिना संविधान में कोई छेड़छाड़ किए हुए। इस पर नई सरकार बनने के तुरंत बाद कार्य शुरू होना चाहिए, जिससे देश के करोड़ों रुपए बचेंगे जो देश के विकास में काम आएंगे

मोदी की काम की गारंटी पर वोटरों की “Counter Guarantee” भी होती है जो मोदी के काम की परवाह न करने की “गारंटी” होती है ; कट्टरपंथियों को बेनकाब करती वीडियोस

सुभाष चन्द्र

महाकवि तुलसीदास के इस दोहे के हिसाब से देश के मुखिया यानी प्रधानमंत्री की खूबियों की परिभाषा कुछ ऐसी ही होगी…देश के हर नागरिक का सेहतमंद शरीर हो पर बीमारी होने पर ठीक करने के लिए अच्छे अस्पताल हो। कोविड जैसी महामारी से निपटने के उपाय हों, पर साथ ही महामारी रोकने के लिए हर हिंदुस्तानी के पास वैक्सीन का पर्याप्त इंतजाम हो सबके पास खाना हो पर जो जरूरतमंद हों उन्हें अनाज देने की फिक्र मुखिया को हो अगर देश के लोगों को परेशानी हो तो मुखिया के पास उससे बाहर निकलने की उम्मीदों की रोशनी भी हो, और सबसे जरूरी कि देश अंदर खुशहाल हो पर बाहर बैठे दुश्मनों से निपटने के लिए देश की सेना के पास भरपूर साजो-सामान हो कुल मिलाकर मतलब ये है कि देश के मुखिया का हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या से निपटने की तरफ ध्यान हो

कई प्रधानमंत्री देखे हैं पर उनके काम करने के तरीकों पर इतनी बहस कभी नहीं हुई जितनी मोदी की होती है उसकी बड़ी वजह है कि पीएम मोदी के काम करने का तरीका बहुत ही व्यवहारिक है वो फैसलों में टालू रवैये के सख्त विरोधी हैं और पूरी टीम को इसके लिए प्रेरित करते हैं दशकों से सरकारों के काम करने का तरीका एक ढर्रे पर चल रहा था पूरा सरकारी तंत्र मामले अटकाने के लिए किस कदर बदनाम था इसका अंदाज इस बात से लगाइए कि ये देश में आर्थिक सुधारों की नींव रखने वाले पूर्व पीएम नरसिंह राव की सरकार के बारे में तो चुटकुला मशहूर था कि इसमें सिर्फ डेढ़ लोग ही आर्थिक सुधारों के लिए गंभीर हैं बाकी पूरी सरकार और नौकरशाही आर्थिक सुधारों को अटकाने, लटकाने और भटकाने में पूरी ताकत लगाते रहते हैं

लेखक 
इसमें तो कोई दो राय नहीं हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा वह किया और जो देशहित में था वह भी हर हाल में किया चाहे वह संकल्प पत्र में था या नहीं मोदी ने जो किया 10 साल में वह गिनना कठिन है उसकी सूची बहुत बड़ी है सबसे बड़ी चीज तो यह हुई है कि भारत आज काफी हद तक आज एक आत्मनिर्भर देश बन चुका है हर व्यक्ति को हर सुविधा मिल रही है और इन सब कामों को पूरा करने की वजह से ही मोदी अपने हर काम की गारंटी देते हैं 

कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ‘आजादी के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बन रही है कांग्रेस का परिवार इस चुनाव में खुद कांग्रेस को वोट नहीं देगा। क्योंकि जहां वो रहते हैं, वहां कांग्रेस का उम्मीदवार ही नहीं है। जिस परिवार के भरोसे कांग्रेस चलती है, वो परिवार खुद कांग्रेस को वोट नहीं दे पाएगा। 4 जून के बाद इंडी गठबंधन अपने आप बिखर जाएगा।’

 ‘ये लोग दावें जो भी करें, लेकिन सच्चाई यही है कि चुनाव की घोषणा से पहले से ही कांग्रेस के नेता अपनी हार मान चुके हैं। इसीलिए कुछ नेता, जो लगातार लोकसभा में जीतकर आते थे, इसबार वो राज्य सभा के रास्ते से अंदर जाकर बैठ गए हैं। हालात ये हैं कि INDI अलायंस वालों को इस चुनाव में लड़ने के लिए उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे हैं। ज्यादातर सीटों पर इनके नेता प्रचार करने ही नहीं जा रहे।’

बहुत से लोग खासकर विपक्ष के यह कहते नहीं थकते कि राम मंदिर तो कोर्ट के फैसले की वजह से बना है, उसमें मोदी का क्या योगदान है लेकिन सत्य यह है कि वह फैसला आने के समय यदि कांग्रेस की सरकार होती तो वह उस फैसले को संसद में प्रस्ताव लेकर पलट देती और राम मंदिर बनने ही नहीं देती

पहले चरण में जिस तरह कई राज्यों में कम मतदान हुआ है वह कुछ चिंता का भी विषय है उत्तरप्रदेश में मात्र 60%, पूर्वोत्तर के नागालैंड में केवल 57% और मिजोरम में मात्र 54% ताज्जुब की बात है क्योंकि पूर्वोत्तर के राज्यों में तो अधिकतम विकास हुआ है बिहार तो सबसे महान रहा जहां केवल 48% जागे थे, लगता है बिहार के लोगों को फिर जंगल राज चाहिए और तो और लक्षदीप में 59% वोट पड़े जहां 97% मुस्लिम आबादी है, उत्तराखंड ने 54% से गज़ब कर बाबा केदार नाथ को प्रणाम किया और राजस्थान 57% से अव्वल रहा

दरअसल हिंदू वोटर तो मोदी से हर सुविधा चाहता है, बढ़िया सड़कें चाहिए, बढ़िया ट्रेन में सफर करेगा, साफ़ सुथरे रेलवे स्टेशन देख कर खुश होगा, राम मंदिर भी देख कर खुश होगा, मोबाइल का डाटा फ्री चाहिए, महंगाई कम चाहिए और हर काम उसकी मर्जी से लेकिन वोट न देने की गारंटी भी बहुत बड़ा तबका देता है मोदी को कि हमें जो मर्जी दे दो, चाहे दंगामुक्त राज्य बना दो या आतंकी हमलों से मुक्त रहे हम लेकिन फिर भी हम वोट देने जाने की “गारंटी” नहीं देंगे

इन हिंदू वोटरों की “गारंटी” के जवाब में मुस्लिम वोटरों की भी “गारंटी” होती है और उसी “गारंटी” की वजह से कांग्रेस और तमाम विपक्षी दल 85 करोड़ से ज्यादा हिंदू वोटरों को छोड़ कर 10 से 12 करोड़ मुस्लिम वोटरों के लिए पागल रहते हैं मुस्लिम वोटर का आचरण साफ़ कहता है कि मोदी जी, आपसे हमें “सबका विश्वास” के नाम पर सब कुछ मिल रहा है लेकिन हम उस “विश्वास” को तोड़ने के लिए मजबूर हैं और हम आपको “वोट न देने की ही गारंटी” दे सकते हैं

सबसे घटिया रोल मुस्लिम महिला वोटर का है जिन्हे आज रात के अंधेरे में ट्रिपल तलाक की वजह से घर से बेघर होने के भय से मुक्त कर दिया मोदी ने, उन्हें मोदी ने फ्री गैस चूल्हा दिया, नल से जल दिया, फ्री राशन दिया, बच्चे की डिलीवरी के लिए 6000 रुपए दिए, फ्री में पक्के घर दिए और गरीब को (जो 90% हैं) 5 लाख का फ्री इलाज दिया लेकिन ये सब फिर भी लाइन लगा कर वोट देने वालों की लाइन में लगते हैं और मोदी को वोट न देने की और मोदी को हराने की “गारंटी” देते हैं 

सबसे घृणित कार्य मुस्लिम महिलाएं करती हैं, जिन्हे ट्रिपल तलाक से मुक्ति दिलाने का भी कुछ सुख का अहसास नहीं होता इतनी अहसानफरामोशी तो खुदा भी माफ़ नहीं करेगा एक 7 बच्चों की माँ किसी पत्रकार को कह रही थी कि राहुल गांधी को आना चाहिए, वो कुछ करना चाहता है (जबकि कांग्रेस 3 तलाक फिर शुरू करने का वादा कर रही है) पत्रकार ने पूछा आपके कितने बच्चे हैं तो उसने कहा 7 हैं तो गरीबी नहीं महसूस होती इसका जवाब देती है कि बच्चे तो अल्लाह की देन हैं फिर गरीबी कैसे आती है तो कहती है, गरीबी मोदी ने दी है, अगर यह हालत है को मोदी की “गारंटी” के क्या मायने रह गए

 

जब तक मुसलमान कट्टरपंथियों की इस आधारहीन सोंच से बाहर नहीं आता, दुनिया की कोई ताकत इनको सुधार नहीं सकती। नूपुर शर्मा विवाद के दिनों कुछ चैनलों पर एक्स मुसलमानों ने इस तरह की अनेकों गंभीर समस्याओं पर मौलानाओं और इस्लामिक स्कॉलरों को जिम्मेदार बताया। जिन्होंने अपनी दुकान चलाने के लिए इन्हे डरा धमका कर रखा जाता है। वीडियो से देखा और समझा जा सकता है, जो कट्टरपंथियों के दुष्प्रचार को साबित भी कर रहा है। बहुत हैं ऐसे वीडियो, जो कट्टरपंथियों को बेनकाब कर रहे हैं। कई वीडियोस में तो इनकी पिटाई होते तक दिखाया गया है।  

300 उम्मीदवार भी नहीं मिल रहे ; क्या पार्टी के सफाए के बाद पूर्ण होगी राहुल गाँधी की यात्रा : इतिहास की सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस

जिस तरह परिवार भक्त राहुल और प्रियंका को सुरमा भोपाली बना रहे है, ये दोनों कांग्रेस के बहादुरशाह ज़फर बनने जा रहे हैं। हकीकत में कांग्रेस का पतन उसी दिन से शुरू हो गया था, जिस दिन सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए सीता राम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर कर दिया था। दूसरे, भूतपूर्व प्रधानमंत्री रहे नरसिम्हा राव के शव को कांग्रेस ऑफिस तक में ले जाने नहीं दिया। आज कांग्रेस की हालत देख शंका व्यक्त की जा रही है कि क्या यह कांग्रेस का आखिरी लोक सभा चुनाव है? 

मुस्लिम तुष्टिकरण करते अयोध्या राममंदिर का विरोध। हिन्दू धार्मिक स्थलों को विवादित बनाना आदि कांग्रेस पतन का मुख्य कारण बन रहे हैं, यही स्थिति अन्य विपक्षी दलों की होने जा रही है। 2024 चुनाव केवल एक चुनाव ही नहीं, बल्कि भारत को एक नए भारत की ओर बहुत तेजी से लेकर जाएगा। जिसकी आहट से समस्त सनातन विरोधी परेशान है, बहुत जल्द इन सबकी दुकानों पर ताला पड़ने को है। पाकिस्तान तोड़ बांग्लादेश बनाने पर मुस्लिम वोट खिसकते देख Muslim Personal Law Board बना दिया। इमरजेंसी में जब सारा विपक्ष जेल में बंद था, तब संविधान में Secular शब्द डाल हिन्दुओं की पीठ में छुरा घोंप दिया।  
लोकसभा चुनाव 2024 के लिए पहले चरण के मतदान में कुछ ही दिन का वक्त है। इस चुनाव में बीजेपी ने 370+ तो एनडीए ने 400+ का लक्ष्य रखा है। एनडीए अपने दो दर्जन से अधिक सहयोगियों के साथ मुकाबला कर रही है, तो इसके जवाब में बना इंडी गठबंधन लगातार पीछे होता दिख रहा है। अभी तक शीट शेयरिंग का मुद्दा उलझा रहा। कई सीटों पर इंडी गठबंधन के दल फ्रेंडली फाइट भी कर रहे हैं, यानी आपस में ही लड़ाई। वहीं, बात इंडी गठबंधन के मुख्य घटक दल बन चुके (गठबंधन बनाने वाले नीतीश कुमार ही बाहर) 
कांग्रेस की बात करे, तो पूरी तरह से न सिर्फ कन्फ्यूज बल्कि असहाय भी नजर आ रही है।

ऐसा लगता है, मानो वो लोकसभा चुनाव 2024 की लड़ाई में पहले ही हथियार डाल चुकी हो, क्योंकि इस बार कांग्रेस न सिर्फ अपने इतिहास में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है, बल्कि उसे ढंग के कैंडिडेट तक नहीं मिल रहे हैं। वो दूसरी पार्टियों के नेताओं के बच्चों को अपने टिकट पर चुनाव लड़ा रही है, उत्तर प्रदेश की प्रयागराज सीट ऐसी ही एक सीट है। खैर, बड़े कैनवस पर देखें तो लोकसभा चुनाव 2024 में कांग्रेस 300 सीटों पर भी चुनाव लड़ती नहीं दिख रही है। आज (15 अप्रैल 2024) तक कांग्रेस महज 278 सीटों पर ही उम्मीदवार खड़े कर सकी है।

कांग्रेस की हालत इतनी खराब क्यों?

एक तरफ तो कांग्रेस देश की सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव लड़ रही है, तो दूसरी तरफ वो ऐतिहासिक रूप से सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पंजाब में वो दिल्ली, गुजरात, हरियाणा की अपनी ही सहयोगी आम आदमी पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ रही है, तो केरल में वामदलों के खिलाफ। उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक रूप से सबसे कम 17 सीटों पर ही कांग्रेस चुनाव लड़ रही है, तो पश्चिम बंगाल में वो 20 सीटों तक सिमट रही है। बिहार में कांग्रेस को एक चौथाई सीटें भी नहीं मिली हैं, तो मध्य प्रदेश में भी एक सीट पर वो चुनाव नहीं लड़ रही है। गजब बात ये है कि मध्य प्रदेश की खजुराहो सीट पर इंडी गठबंधन ही चुनाव से बाहर है, क्योंकि जिस सपा को खजुराहो सीट दी गई थी, उसके कैंडिडेट का पर्चा ही खारिज हो चुका है।
कांग्रेस पार्टी राजस्थान और गुजरात में भी अपने दम पर सभी सीटों पर नहीं लड़ पा रही है, तो हरियाणा में भी उसे आम आदमी पार्टी की बैसाखी की जरूरत पड़ रही है। असम में भी कांग्रेस की यही हालत है। जम्मू कश्मीर में भी कांग्रेस की ऐसी ही हालत है, क्योंकि पीडीपी के साथ गठबंधन नहीं होने की वजह से कश्मीर घाटी की तीनों सीटों पर पीडीपी ने अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं।
एक तरफ बीजेपी देश के 16 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में अकेले चुनाव लड़ रही है, तो कांग्रेस 12 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में। इन 18 (राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 79 लोकसभा सीट) में कांग्रेस उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम में अपने दम पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन इसमें भी पंजाब, सिक्किम में उसे आम आदमी पार्टी और सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा जैसे सहयोगियों से ही लड़ाई लड़नी पड़ रही है, ऐसी ही हालत दो केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली और जम्मू-कश्मीर का भी है। यहाँ आम आदमी पार्टी के साथ साझेदारी दिल्ली में है, तो जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ, यहाँ पीडीपी अलग चुनाव लड़ रही है। वहीं, कांग्रेस 6 केंद्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार, लद्दाख, पुड्डुचेरी, चंडीगढ़, दमन दीव और दादरा नागर हवेली में अकेले ही चुनाव लड़ रही है।

इस बार कांग्रेस की सबसे कम सीटें

अभी तक कांग्रेस ने देश भर की कुल 278 लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की है। कांग्रेस ने कभी भी 400 से कम सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे। शुरुआत से लेकर अभी तक के आँकड़ों पर गौर करें, तो साल 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 479 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 364 सीटों पर जीत दर्ज की। (इसमें एक रामपुर की जीत तो लगभग बूथ कैप्चर से हासिल की थी। इस सीट पर हिन्दू महासभा के विशन सेठ ने कांग्रेस उम्मीदवार मौलाना आज़ाद को 6000 वोटों से हरा दिया था, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जी बी पंत को आदेश दिया कि साम, धाम दंड और भेद अपनाओ मौलाना आज़ाद मुझे पार्लियामेंट में चाहिए। पंत ने किया भी वही, विशन को उनके विजयी जलूस से अगवा कर उन्ही के सामने उनकी वोटों को आज़ाद की वोटों में मिलाकर लगभग 3000 वोटों से विजयी घोषित कर दिया। देखिए नीचे दिए लिंक) 1957 में ये आँकड़ा बढ़कर 490 तक पहुँचा और जीत का आँकड़ा भी 370 तक पहुँच गया। कांग्रेस ने 1962 में 487 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 361 सीटों पर जीत मिली। साल 1967 के चुनाव में 512 सीटों पर चुनाव लड़कर कांग्रेस को 284 सीटों पर जीत मिली। 1971 में कांग्रेस ने 441 सीटों पर ही चुनाव लड़ा, लेकिन 352 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली। पाकिस्तान से युद्ध में जीत का भी इसमें बड़ा हाथ रहा।
अवलोकन करें:-
साल 1977 में आपातकाल के बाद पहले चुनाव में कांग्रेस ने 492 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन 154 सीटों पर ही जीत मिली और उसे पहली बार पूर्ण रूप से विपक्ष में बैठना पड़ा लेकिन 1980 में कांग्रेस ने 491 सीटों पर उम्मीदवार उतारते हुए 352 सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ता में वापसी की। साल 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर में कांग्रेस ने 492 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 405 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की, जो अब तक का रिकॉर्ड भी है।
इसके बाद कांग्रेस गिरावट की ओर आई। साल 1989 में कांग्रेस ने 510 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन सिर्फ 197 सीटों पर ही जीत मिली, तो 1991 में 492 सीटों पर लड़कर 232 सीटों पर जीत मिली। 1996 में कांग्रेस ने सर्वाधिक 529 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 140 सीटें ही मिल पाई, जबकि 1998 में 477 सीटों पर चुनाव लड़कर उसे 141 सीटें मिली। 1999 में 453 सीटों पर लड़कर कांग्रेस 114 सीटें ही जीत पाई, तो 2004 में 417 सीटों पर लड़कर 145 सीटें जीत पाई। सबसे कम सीटों पर कांग्रेस ने इसी साल चुनाव लड़ा, लेकिन यूपीए गठबंधन के तहत कांग्रेस की अगुवाई में सरकार बनी।
साल 2009 में कांग्रेस ने यूपीए 2 के लिए 440 सीटों पर चुनाव लड़ा और 206 सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनाई, लेकिन 2014 में कांग्रेस पार्टी को 463 सीटों पर लड़ने के बावजूद सिर्फ 44 सीटें मिली, जो उसका अब तक का सबसे बुरा चुनावी प्रदर्शन रहा। साल 2019 में 421 सीटों पर लड़कर महज 52 सीटों पर जीत मिली। इसमें से भी बड़ी संख्या में इस्तीफे हो चुके हैं। और इस बार तो कांग्रेस पार्टी अभी तक महज 278 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर पाई है। ऐसा लगता है कि पार्टी बामुश्किल 20 सीटों पर और उम्मीदवार खड़े कर पाएगी और कुल आँकड़ा 300 के अंदर या आसपास ही सिमट कर रह जाएगा। ऐसे में कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन क्या होगा, ये सोचने वाली बात है, क्योंकि जितनी सीटों पर बीजेपी ने अकेले 2019 में जीत दर्ज की, उससे भी कम सीटों पर लड़ना ये दिखाता है कि कांग्रेस इस लोकसभा चुनाव में पहले ही हार मान चुकी है।

निर्विरोध जीत रही बीजेपी

देश के पूर्वोत्तर का सबसे अहम राज्य है अरुणाचल प्रदेश। पूर्वोत्तर में भारत-चीन की तनातनी का केंद्र। यहाँ पर भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत में है। विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। 19 अप्रैल को अरुणाचल में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होगी। हैरानी की बात है कि देश के सबसे पुराने दल कांग्रेस के पास यहाँ से हर सीट पर उम्मीदवार तक नहीं हैं। बीजेपी के कम से कम 5 प्रत्याशियों को विधानसभा चुनाव में निर्विरोध जीत मिली है, जिसमें मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी हैं। कांग्रेस की दुर्गति देखिए कि अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा की 60 सीटे हैं, लेकिन उसने सिर्फ 34 सीटों पर उम्मीदवार उतारे।
अरुणाचल में राहुल गाँधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के तहत गए थे। तब पार्टी के पास कुछ विधायक थे, लेकिन उनकी भारत जोड़ो न्याय यात्रा का असर ऐसा हुआ, कि एक विधायक छोड़कर बाकी सारे विधायक बीजेपी में शामिल हो गए, यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी के विधायक दल के नेता भी। ये कांग्रेस की खत्म होती ताकत का सबूत नहीं, तो और क्या है?
वैसे एक तरफ तो चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव की घोषणा कर रहा था, तो दूसरी तरफ राहुल गाँधी अपनी यात्रा में ही बिजी रहे। सहयोगी सीट बँटवारे की गुहार लगाते-लगाते अलग होते गए, लेकिन राहुल गाँधी की यात्रा नहीं रुकी। इस बीच, कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए 44 पन्नों का जो घोषणा पत्र जारी किया है, उसमें 300 से ज्यादा वादे कर दिए हैं और उम्मीदवार पार्टी को 300 भी नहीं मिल पाए हैं।