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पार्लियामेंट में Operation Sindoor पर हुई बहस में नरेंद्र मोदी से लेकर मोदी विरोधियों तक ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को क्यों नहीं जिम्मेदार ठहराया? कांग्रेस का रिमोट पाकिस्तान के हाथ; दोनों के एक जैसे आरोप--नरेंद्र मोदी

                                                                                                                                        साभार 
पहलगाम में आतंकियों द्वारा धर्म पूछकर हुए नरसंहार पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को क्यों clean chit को दी जा रही है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मोदी विरोधी तक किसी ने पूरी बहस में अब्दुल्ला का नाम तक नहीं लिया, क्यों? जबकि पहलगाम 
जम्मू-कश्मीर में आता है। अगर जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की सरकार होती मीडिया से लेकर सारा INDI allaince बीजेपी मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे होते। क्यों नहीं उमर अब्दुल्ला ने इस नरसंहार की जिम्मेदारी ली? जब कश्मीर में इतने पर्यटक जा रहे हैं उन्हें सुरक्षा प्रदान करना राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की जिम्मेदारी थी। अगर हिन्दुओं की बजाए मुसलमानों का नरसंहार हुआ होता तब अब्दुल्ला का क्या रवैया होता? इस नरसंहार के लिए जितना पाकिस्तान जिम्मेदार है जम्मू-कश्मीर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी काम दोषी नहीं। 
पाकिस्तान को तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाब दे दिया, लेकिन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को कब कटघरे में खड़ा किया जाएगा? कश्मीर में आतंकवादियों पर मोदी सरकार कार्यवाही कर रही है, राज्य का मुख्यमंत्री क्या कर रहा है? क्यों नहीं आतंकवादियों को घरों में रखने वालों पर कार्यवाही की जाती? देश में पल रहे पाकिस्तान और आतंकवादियों के sleeper cells पर आतंकवादियों की तरह कार्यवाही होनी चाहिए। अब्दुल्ला से पूछा जाए कि कितने आतंकवादी कश्मीर में छिपे हुए हैं? छिपे हुए आतंकवादियों और उनको पनाह देने वालों पर क्या कार्यवाही की? अगर पाकिस्तान से निपटने का काम केंद्र सरकार का है तो घरों में छिपे आतंकवादियों को पकड़ने का काम राज्य सरकार का है।             

जो भारत का पक्ष नहीं देख पा रहे हैं, उन्हें आईना दिखाने आया हूं- पीएम मोदी

2014 चुनावों से पहले तक कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियों ने देश को पाकिस्तान के नाम से डराकर रखा हुआ था। जगह-जगह लिखा और घोषणा की जाती थी कि "किसी लावारिस चीज को न छुए, बम हो सकता है।" जनता में पाकिस्तान का ऐसा डर बैठ चुका था कि जैसे किसी बच्चे को सुलाने यह खाना नहीं खाने पर माएं अपने बच्चे से कहती थी कि "सो जा, चुपचाप खाना खाले नहीं तो गब्बर आ जाएगा।" लेकिन चुनावों के कालचक्र ऐसा घूमना शुरू कि पाकिस्तान और भारत में उसकी समर्थक पार्टियां डरी हुई है। पाकिस्तान द्वारा इस्लामिक आतंकी हमले को बचाने "हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद" देकर देश को गुमराह किया जाता था। यह कुकर्म जनहित में नहीं सिर्फ मुस्लिमों को खुश कर उनके वोट लेकर अपनी कुर्सी और तिजोरियों के भंडार भरने के लिए किया जा रहा था। और अक्ल से पैदल मुसलमान इन पार्टियों को अपना शुभचिन्तक मानती है। इन अक्ल से पैदल मुसलमानों को नहीं मालूम कि तुम्हारी इन हरकतों से कोई भी मुस्लिम देश इन्हे सम्मान से नहीं देखता, यहाँ तक पाकिस्तान भी नहीं। अगर कोई देश आतंकी घटनाओं के लिए फंडिंग करने का मतलब नहीं कि उनको भारतीय मुसलमानों की फ़िक्र है।   

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 29 जुलाई को लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा के दौरान विपक्ष पर जमकर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि मैं इस सदन में भारत का पक्ष रखने के लिए खड़ा हुआ हूं।

 

मैं भारत का पक्ष रखने के लिए खड़ा हुआ हूँ… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अपना वक्तव्य इन लाइनों के साथ चालू किया। उन्होंने इस दौरान जहाँ भारतीय सेनाओं की सफलता पर बात की तो वहीं कॉन्ग्रेस को लगातार उलटे-सीधे प्रश्न उठाने पर आइना भी दिखाया। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है।

ऑपरेशन सिंदूर में कॉन्ग्रेस ने पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा फैलाया

 लोकसभा में प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा। पीएम ने कहा कि कॉन्ग्रेस अब पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं 22 अप्रैल को विदेश में था। मैं तुरंत लौट आया और वापस आने के तुरंत बाद मैंने एक बैठक बुलाई और हमने स्पष्ट निर्देश दिए कि आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देना है और यह हमारा राष्ट्रीय संकल्प है। सेना को कार्रवाई करने की पूरी छूट दी गई और यह भी कहा गया कि सेना को यह तय करना चाहिए कि कब, कहां, कैसे और किस तरीके से कार्रवाई करनी है। ये सारी बातें उस बैठक में स्पष्ट रूप से कही गईं।

उन्होंने कहा कि सेना को कार्रवाई करने की पूरी छूट दी गई और यह भी कहा गया कि सेना को यह तय करना चाहिए कि कब, कहां, कैसे और किस तरीके से कार्रवाई करनी है। हमें गर्व है कि आतंकवादियों को सजा दी गई, और यह ऐसी सजा थी कि आतंक के उन आकाओं की आज भी रातों की नींद उड़ी हुई है।

पीएम ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर को दुनिया का समर्थन तो मिला, लेकिन दुर्भाग्य है कि मेरे देश के वीरों के पराक्रम को कॉन्ग्रेस का समर्थन नहीं मिला। 22 अप्रैल 2025 के बाद 3-4 दिन में ही यह उछल रहे थे। ये लोग अपनी स्वार्थी राजनीति के लिए मुझ पर निशाना साध रहे थे, लेकिन इनकी बयानबाजी और इनका छिछोरापन देश के सैनिकों का मनोबल गिराती रही।”

ऑपरेशन सिंदूर पर कॉन्ग्रेस ने पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा फैलाने काम किया है। इस पर पीएम ने कहा, “10 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत हो रहे एक्शन को रोकने की घोषणा की। इसको लेकर यहाँ भांति-भांति की बातें कही गईं। यह वही प्रोपेगेंडा है जो सीमा पार से फैलाया गया है। कुछ लोग सेना द्वारा दिए तथ्यों की जगह पाकिस्तान के झूठ को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।”

पीएम ने आगे कहा, “देश देख रहा है कि कॉन्ग्रेस राजनीतिक मुद्दों के लिए पाकिस्तान पर निर्भर होता जा रहा है। कॉन्ग्रेस को पाकिस्तान के मुद्दे इम्पोर्ट करने पड़ रहे हैं। जब बालाकोट में एयरस्ट्राइक हुई तो कॉन्ग्रेस वाले पूछने लगे कि फोटो दिखाई, पाकिस्तान भी यही पूछता था, ये भी यही पूछते थे। आतंकवादी रो रहे हैं, उनके आका रो रहे हैं और उनको रोते देख यहाँ भी कुछ लोग रो रहे हैं।”

पीएम ने कॉन्गेस के लिए कहा, “पाकिस्तान के बयान और हमारा विरोध करने वालों के बयान फुल स्टॉप और कॉमा के साथ एक हैं। देश हैरान है कि कॉन्ग्रेस ने पाकिस्तान को क्लीन चिट दे दी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कॉन्ग्रेस को भारत के रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और गृह मंत्री पर भरोसा नहीं है, इनका भरोसा पाकिस्तान के रिमोट कंट्रोल से बनता और बदलता है।

इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कॉन्ग्रेस के उठाए गए सवालों को लेकर विपक्ष को जमकर घेरा। पीएम ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर पर इन्होंने (विपक्ष) कहा कि रोक क्यों दिया, पहले मानते ही नहीं थे और पूछते हैं कि रोक क्यों दिया। वाह रे बयानबहादुरों, पूरा देश आप पर हँस रहा है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने कारगिल की लड़ाई में भारत की जीत को भी अब तक नहीं अपनाया है।

कॉन्ग्रेस की गलती याद दिलाईं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कॉन्ग्रेस सरकार को उनकी गलती याद दिलाईं। इनमें सिंधु जल समझौता से लेकर बाटला हाउस एनकाउंटर का जिक्र किया।

प्रधानमंत्री ने कहा, “1962 और 1963 के बीच कॉन्ग्रेस के नेता जम्मू-कश्मीर के नेता पूँछ, नीलम वैली और उरी को छोड़ देने का प्रस्ताव रख रहे थे। यह सब लाइन ऑफ़ पीस के नाम पर किया जा रहा था, 1966 में इन्होंने ही कच्छ के रण पर मध्यस्थता स्वीकार की थी, यह इनका राष्ट्रीय सुरक्षा पर विजन है।

पीएम ने आगे कहा, “1971 में पाकिस्तान के 93 हजार फौजी हमारे पास बंदी थे, उसका हजारों किलोमीटर एरिया हमने कब्जा किया था। हम बहुत कुछ कर सकते थे। उस दौरान थोड़ी समझ होती तो POK वापस लिया जा सकता था। इतना सारा जब सामने टेबल पर था तो करतारपुर साहिब वापस ले सकते थे।”

सिंधु जल समझौते पर बोलते हुए पीएम ने कहा, “सिंधु नदी से भारत जाना जाता था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उस पर पंचायत करने का अधिकार वर्ल्ड बैंक को दिया। सिंधु जल समझौता भारत के स्वाभिमान के साथ बहुत बड़ा धोखा था। राज्यों के भीतर पानी को लेकर विवाद होता रहा और पाकिस्तान मौज मनाता रहा। अगर सिंधु जल समझौता ना होता तो कई बड़ी परियोजनाएँ बनतीं। सिंधु जल समझौते के बाद नेहरूजी ने करोड़ों रूपए भी दिए ताकि पाकिस्तान नहर बना सके।”

पीएम ने आगे कहा, “बाँध हमारा है, पानी हमारा है लेकिन पाकिस्तान का निर्णय है कि आप उसकी सफाई (डीसिल्टिंग) नहीं कर सकते। नेहरू ने कहा था कि सिंधु जल समझौता बाकी समस्याओं के लिए रास्ता खोलेगा। उन्होंने बाद में कहा लेकिन हम वहीं के वहीं हैं।”

कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान देश में असुरक्षा के माहौल पर बोलते हुए पीएम ने कहा, “2014 से पहले असुरक्षा का जो माहौल था, उसे याद करके लोग सिहर जाते हैं… हर जगह पर घोषणा होती थी कि कोई भी लावारिस चीज दिखे छूना मत, ये बम हो सकता है। देश के कोने-कोने में यही हाल था।”

बाटला हाउस एनकाउंटर के दौरान सोनिया गाँधी के आँसूओं का जिक्र करते हुए पीएम ने कहा, “दिल्ली में जब बाटला हाउस एनकाउंटर हुआ तो कॉन्ग्रेस की एक बड़ी नेता के आँख में आसू थे, वोट पाने के लिए इसे देश भर में प्रसारित किया गया।”

पीएम ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने हिंदुत्व का अपमान किया है। पीएम ने बताया, “कॉन्ग्रेस दुनिया को हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी बेचने में लगी हुई थी। कॉन्ग्रेस के एक बड़े नेता ने अमेरिका के राजनयिक को कह दिया था कि लश्कर से बड़ा खतरा हिंदुत्व हैं।”

लोकसभा से पाकिस्तान को लताड़ा

प्रधानमंत्री ने लोकसभा से पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फैलाई गई झूठी साजिशों का पर्दाफाश किया। पाकिस्तान को ‘आतंकियों का आका’ बताकर पीएम ने कहा कि उनकी रूह काँप रही है।

पीएम ने कहा, “सेना को कार्रवाई की खुली छूट दी गई कि कब, कहाँ और कैसे जवाब दिया जाए। आतंकियों के आकाओं को ऐसी सजा मिली कि उनकी अब तक रूह काँप रही है। ऑपरेशन सिंदूर में 22 मिनट में 22 अप्रैल 2025 का बदला सेना ने निर्धारित लक्ष्य के साथ ले लिया।”

उन्होंने आगे कहा, “पाकिस्तान की न्यूक्लियर धमकी को हमने झूठा साबित कर दिया, भारत ने सिद्ध कर दिया कि न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग अब नहीं चलेगी और ना ही अब इसके सामने भारत झुकेगा। आज तक पाकिस्तान के कई एयरबेस ICU में पड़े हैं… ऑपरेशन सिंदूर तकनीक की महारत में सफल सिद्ध हुआ है, पिछले 10 साल में हमने जो तैयारियाँ की हैं, वह ना की होती तो तकनीक के युग में हमारा कितना नुकसान हो सकता था, इसका अंदाजा लगा सकते है।”

पाकिस्तान को धमकी देते हुए पीएम ने कहा, “पहले दिन से क्लियर था कि हमारा लक्ष्य आतंकी और उनके आका हैं, उनके अड्डे हैं… उनको हम ध्वस्त करना चाहते हैं, हमने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि हमने अपना काम कर दिया है। पाकिस्तान में समझदारी होती तो आतंकियों के साथ खुलेआम खड़े रहने की गलती ना करता, उसने निर्लज्ज होकर आतंकियों के साथ खड़े होने का फैसला किया… हम पूरी तरह तैयार थे और मौके की तलाश में थे।”

प्रधानमंत्री ने सीजफायर पर बोलते हुए कहा, “पकिस्तान ने इतने कड़े प्रहार के बाद DGMO को पाकिस्तान ने फोन करके गुहार लगाई कि बहुत मारा, अब और मार झेलने की ताकत नहीं है, हमला रोक दो। उसी दौरान 9 मई, 2025 को रात को अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने मुझसे बात का प्रयास किया।”

पीएम ने आगे कहा, “वह घंटे भर प्रयास कर रहे थे, लेकिन सेना के साथ मीटिंग के चलते मैं फोन उठा नहीं पाया। मैंने उन्हें कॉल बैक किया… तब उन्होंने फोन पर बताया कि पाकिस्तान बहुत बड़ा हमला करने वाला है। मेरा जवाब था- अगर पाकिस्तान का यह इरादा है तो उसे बहुत महँगा पड़ेगा। मैंने कहा था- हम गोली का जवाब गोले से देंगे।”

अंत में पीएम मोदी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर अब भी जारी है।”

राहुल गाँधी नेता प्रतिपक्ष के तौर पर एक साल का ब्यौरा: इंडियन स्टेट से लड़ाई, आरक्षण खत्म और 6 हफ्ते विदेश में… चुनाव आयोग-भारत के लोकतंत्र को भी किया बदनाम; पद को कलंकित करने की कोई कसर नहीं छोड़ी

जब नेता प्रतिपक्ष इंडियन स्टेट से लड़ाई की बात कहे सीधा सा मतलब ये नेता प्रतिपक्ष हो ही नहीं सकता। नेता प्रतिपक्ष की गरिमा किसी प्रधानमंत्री से कम नहीं होती, जैसा राहुल से पूर्व रहे विभिन्न पार्टियों के नेता। लेकिन परिवार की साख पर मौज करने वाले राहुल ने इस पद को कलंकित करने की कोई कसर नहीं छोड़ी। अगर किसी विदेश में किसी नेता प्रतिपक्ष की ऐसी हरकतें होती पार्टी से पहले जनता ही ऐसे नेता पर कार्यवाही की मांग कर देती, लेकिन साहब ये भारत है जहां पार्टी के लिए ही बोझा बन चुके को भी इतना सम्मान दिया जा रहा है। 

देश-विरोधी ताकतों से मिलना, चीन से गुप्त MoU करना, आतंकियों पर हमलों पर सवाल खड़ा करना क्या ये होते हैं नेता प्रतिपक्ष के लक्षण? क्या ऐसे नेता से किसी भी स्तर पर देशहित की कल्पना की जा सकती है? जो खुद ही एक विवाद बना हुआ है। अगर कांग्रेस अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा बनाये रखना चाहती है जितनी जल्दी हो राहुल को नेता प्रतिपक्ष और खड़के को अध्यक्ष पद से हटाए, वरना वही दिन ज्यादा दूर नहीं जब कांग्रेस एक इतिहास बन जाएगी।         

राहुल गाँधी ने विदेश यात्राओं में बिताए 40+ दिन

पिछले एक साल में राहुल गाँधी ने 40+ दिन विदेश में बिताए। ये वो नेता हैं, जिन्हें कांग्रेस ने विपक्ष का चेहरा बनाया, लेकिन वो बार-बार देश छोड़कर विदेशी हवाओं में सैर-सपाटा करने निकल पड़ते हैं। बीजेपी और सोशल मीडिया पर लोग उन्हें ‘पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन’ कहकर तंज कसते हैं। आइए, उनकी कुछ प्रमुख विदेश यात्राओं पर नजर डालते हैं-
लंदन यात्रा (जून 2025): राहुल जून 2025 में लंदन गए। कांग्रेस ने दावा किया कि वो अपनी भतीजी मिराया वाड्रा के ग्रेजुएशन समारोह में शामिल होने गए। बीजेपी ने इसे गैर-जिम्मेदाराना रवैया करार दिया। अमित मालवीय ने X पर लिखा कि राहुल बार-बार ‘गायब’ हो जाते हैं और जनता को जवाब देना चाहिए। सोशल मीडिया पर अफवाहें उड़ीं कि राहुल बहरीन गए, लेकिन कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि उनकी फ्लाइट का रूट दिल्ली-बहरीन-लंदन था। समझ में नहीं आता राहुल के आगे-पीछे घूमने वाली मीडिया क्या कर रही है? गुलाम मीडिया यह भी नहीं बताती की उनका लाडला कहाँ गया है? ये यात्रा तब हुई जब कांग्रेस गोवा में दलबदल की घटनाओं से जूझ रही थी। क्या ये वक्त था विदेश जाने का? इस यात्रा ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया।
वियतनाम यात्रा (मार्च 2025): होली के मौके पर राहुल वियतनाम में थे। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तंज कसा कि राहुल की ‘गुप्त’ यात्राएँ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। कांग्रेस ने बचाव में कहा कि राहुल वियतनाम के आर्थिक मॉडल का अध्ययन करने गए। लेकिन सवाल ये है कि क्या नेता प्रतिपक्ष को हर बार विदेशी मॉडल सीखने की जरूरत पड़ती है? क्या भारत में बैठकर कुछ नहीं सीखा जा सकता? अमित मालवीय ने X पर दावा किया कि राहुल ने वियतनाम में 22 दिन बिताए, जबकि अपने रायबरेली क्षेत्र में इतना वक्त नहीं दिया। इस यात्रा ने उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए।
अमेरिका यात्रा (सितंबर 2024): ये यात्रा सबसे ज्यादा विवादों में रही। टेक्सास, वर्जीनिया और वाशिंगटन में राहुल ने बीजेपी, आरएसएस और पीएम मोदी पर तीखे हमले किए। लेकिन उनके बयानों ने कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया। उन्होंने भारत के लोकतंत्र को सीरिया और इराक जैसे युद्धग्रस्त देशों से जोड़ा, जिस पर बीजेपी ने उन्हें ‘देशद्रोही’ तक करार दिया। वो अमेरिकी सांसद इल्हान उमर से भी मिले, जिन्हें भारत विरोधी माना जाता है। इस मुलाकात ने सियासी हंगामा मचा दिया। राहुल ने सिख समुदाय और आरक्षण पर भी बयान दिए, जिन्हें सिख संगठनों और मायावती ने अपमानजनक बताया। इस यात्रा ने कांग्रेस की छवि को भारी नुकसान पहुँचाया।
इन 40+ दिनों में राहुल ने क्या हासिल किया? क्या कोई नीति बनाई? क्या कांग्रेस को नया रास्ता दिखाया? जवाब है – कुछ भी नहीं। उनकी यात्राएँ निजी कारणों, पारिवारिक समारोहों और विवादित बयानों तक सीमित रहीं। देश की जनता को जवाब देने की बजाय वो विदेशी मंचों पर भारत की छवि खराब करने में व्यस्त रहे। क्या ऐसा नेता प्रतिपक्ष देश की आवाज बन सकता है?

झूठ और जहरीले बयान बने कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी के सबब

राहुल गाँधी के बयानों ने पिछले एक साल में कांग्रेस को बार-बार बैकफुट पर ला खड़ा किया। उनके बयान ना सिर्फ तथ्यहीन थे, बल्कि देश के खिलाफ जहर उगलने वाले भी साबित हुए। कुछ प्रमुख बयानों पर गौर करते हैं-
मैन्युफैक्चरिंग पर झूठ: सितंबर 2024 में अमेरिका में राहुल ने कहा कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर कमजोर है और ‘मेक इन इंडिया’ बुरी तरह से हो चुका है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसका जवाब देते हुए कहा कि राहुल विदेश में जाकर भारत को बदनाम कर रहे हैं। तथ्य ये है कि भारत का रक्षा निर्यात 19 लाख करोड़ से बढ़कर 75 लाख करोड़ रुपये हो गया है। 2024 में भारत ने 4.5 मिलियन गाड़ियों की बिक्री की, जो वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। राहुल का ये बयान ना सिर्फ झूठा था, बल्कि भारत की प्रगति को कमतर दिखाने की साजिश भी था।
गाड़ी बिक्री पर गलत दावा: राहुल ने दावा किया कि भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर ठप्प है। लेकिन हकीकत ये है कि 2024 में भारत में कारों की बिक्री 4.5 मिलियन यूनिट्स यानी 45 लाख से अधिक गाड़ियों की बिक्री की संख्या को पार कर गई। क्या राहुल को इतने बुनियादी तथ्य भी नहीं पता? उनके इस बयान ने उनकी आर्थिक समझ की पोल खोल दी। बीजेपी ने इसे ‘झूठ का कारखाना’ करार दिया।
आरक्षण पर विवाद: अमेरिका में राहुल ने कहा कि भारत में आरक्षण खत्म हो सकता है। इस बयान पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती भड़क गईं और कांग्रेस पर आरक्षण विरोधी होने का आरोप लगाया। राहुल ने बाद में सफाई दी कि वो जातिगत जनगणना की बात कर रहे थे, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। बीजेपी ने इसे दलित-विरोधी बयान करार दिया।
लोकतंत्र की सीरिया-इराक से तुलना: सितंबर 2024 में अमेरिका में राहुल ने भारत के लोकतंत्र को सीरिया और इराक जैसे युद्धग्रस्त देशों से जोड़ा। बीजेपी ने इसे देशद्रोह करार दिया और कहा कि राहुल विदेशी मंचों पर भारत को बदनाम कर रहे हैं। क्या कोई जिम्मेदार नेता अपने देश की तुलना ऐसे देशों से करेगा? ये बयान राहुल की अपरिपक्वता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का जीता-जागता सबूत है।
सिख समुदाय पर टिप्पणी: अमेरिका में राहुल ने सिखों के अधिकारों पर बयान दिया, जिसे सिख संगठनों ने अपमानजनक माना। बीजेपी ने इसे सिख-विरोधी बयान करार दिया, जिसके बाद कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी। इस बयान ने पंजाब में कांग्रेस की स्थिति को और कमजोर किया।
विदेश नीति पर बेतुके सवाल: मई 2025 में राहुल ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति ‘ध्वस्त’ हो चुकी है। उन्होंने पूछा कि भारत को पाकिस्तान के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है। जयशंकर ने जवाब में राहुल के बयानों को ‘झूठ’ करार दिया और उनकी समझ पर सवाल उठाए। ये बयान राहुल की अंतरराष्ट्रीय मामलों में अज्ञानता को उजागर करता है।
चुनाव आयोग पर हमला: बोस्टन में राहुल ने महाराष्ट्र चुनावों में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। राहुल गाँधी ने बोस्टन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ‘कंप्रोमाइज्ड‘ है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके सिस्टम में कुछ तो ‘बहुत गलत’ है। राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि दो घंटे में 65 लाख वोट जुड़ गए। उन्होंने कहा कि यह ‘फिजिकली इंपॉसिबल’ है। चुनाव आयोग ने उनके दावों को खारिज किया। ये बयान उनकी हार को जायज ठहराने की कोशिश थी।
यही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गाँधी ने अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब में कहा कि ‘भारत में लोकतंत्र पिछले 10 सालों से टूटा (ब्रोकेन) हुआ था, अब यह लड़ रहा है।’ दरअसल, इन चुनावों में 10 साल बाद कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में विपक्ष के नेता का पद हासिल हो पाया था, क्योंकि वह 99 सीटों पर पहुँची थी। ऐसे में राहुल पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 2014 और 2019 में देश में जो चुनाव हुए, उसमें देश की जनता ने वोट नहीं डाला था?
इन बयानों से साफ है कि राहुल गाँधी ना तो तथ्यों की परवाह करते हैं, ना ही देश की छवि की। उनके बयान कांग्रेस को बार-बार मुश्किल में डालते हैं और विपक्ष की एकता को कमजोर करते हैं। विदेशी मंचों पर भारत को बदनाम करने की उनकी आदत ने कांग्रेस की बची खुची साख को तार-तार कर दिया।

राहुल की नाकामियाँ रही कांग्रेस की हार के लिए जिम्मेदार

राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने पिछले एक साल में कई महत्वपूर्ण चुनावों में करारी हार झेली। दिल्ली, हरियाणा, और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन इतना खराब रहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया।
हरियाणा विधानसभा चुनाव (2024): हरियाणा में कांग्रेस को बीजेपी के सामने मुँह की खानी पड़ी। राहुल गाँधी ने कई रैलियाँ कीं, लेकिन उनकी सिखों और आरक्षण पर टिप्पणियों ने कांग्रेस को नुकसान पहुँचाया। बीजेपी ने 48 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 37 पर सिमट गई। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल ने हरियाणा की 12 विधानसभाओं को कवर किया था, लेकिन इनमें से सिर्फ 4 पर जीत मिली। क्या ये राहुल की लीडरशिप की हकीकत नहीं दिखाता?
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (2024): महाराष्ट्र में कांग्रेस इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी, लेकिन राहुल की अगुवाई में गठबंधन बुरी तरह हारा। बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ने 230+ सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 40 से भी कम सीटें मिलीं। राहुल की रणनीति और बयानबाजी ने गठबंधन को कमजोर किया। उनकी अनुपस्थिति और विवादित बयानों ने कार्यकर्ताओं का जोश ठंडा कर दिया।
दिल्ली (MCD और अन्य चुनाव): दिल्ली में कांग्रेस का प्रदर्शन MCD चुनावों में भी निराशाजनक रहा। 2022 में ही पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन दर्ज हुआ था और 2024 में भी स्थिति नहीं सुधरी। राहुल की अनुपस्थिति और कमजोर नेतृत्व ने कांग्रेस को AAP और बीजेपी के सामने बौना बना दिया। दिल्ली में कांग्रेस का संगठन पूरी तरह बिखर चुका है।
अन्य राज्यों में हार: राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2023 के चुनावों में कांग्रेस की हार ने भी राहुल की रणनीति पर सवाल उठाए। हालांकि ये हार 2024 से पहले की हैं, लेकिन राहुल की लीडरशिप की कमजोरी उस वक्त भी साफ दिखी।
इन हार के लिए राहुल गाँधी की रणनीति और उनकी अनुपस्थिति को जिम्मेदार ठहराया गया। उनकी विदेश यात्राएँ और विवादित बयान कॉन्ग्रेस के लिए भारी पड़े। पार्टी कार्यकर्ता अब खुलकर सवाल उठाने लगे हैं कि क्या राहुल गाँधी वाकई नेतृत्व के काबिल हैं?

लोकसभा में अटेंडेंस औसत से भी कम

नेता प्रतिपक्ष के तौर पर राहुल गाँधी की संसद में उपस्थिति इतनी कम रही कि ये किसी मजाक से कम नहीं। न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी अटेंडेंस सामान्य सांसदों के औसत से भी कम थी। जब देश के गंभीर मुद्दों पर चर्चा हो रही थी, राहुल गाँधी या तो विदेश में थे या संसद से गायब। यही नहीं, संसद में राहुल गाँधी ने सिर्फ 8 बहसों में हिस्सा लिया, जबकि राष्ट्रीय औसत 15 बहसों का है। वहीं, एक भी प्राइवेट मेंबर बिल तक नहीं ला सके। इसके अलावा सवाल पूछने के मामले में भी राहुल गाँधी औसत से बहुत पीछे रहे।
संसद सत्रों में अनुपस्थिति: मॉनसून सत्र और शीतकालीन सत्र में राहुल की उपस्थिति 50% से भी कम रही। बीजेपी ने इसे गैर-जिम्मेदाराना रवैया करार दिया। ऐसे में जब राहुल संसद में ही नहीं आते, तो जनता के मुद्दे कैसे उठाएँगे?
महत्वपूर्ण बहसों से दूरी: रक्षा, विदेश नीति, और आर्थिक मुद्दों पर बहस के दौरान राहुल अक्सर गायब रहे। जब वो आए, तो उनके बयान तथ्यहीन और विवादित ही रहे। X पर एक यूजर ने लिखा कि राहुल संसद में ‘सोते’ हैं और ‘पाकिस्तान की भाषा’ बोलते हैं।
संसद का अपमान: राहुल ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा अध्यक्ष की नकल उतारकर वीडियो बनवाए, जिसे बीजेपी ने अपमानजनक बताया। ये हरकत उनकी गैर-गंभीरता को दर्शाती है।
क्या ऐसा नेता प्रतिपक्ष देश की आवाज बन सकता है, जो संसद में ही ना दिखे? जो इंडियन स्टेट से ही लड़ाई की बात करता हो। यही नहीं, राहुल गाँधी ने बीजेपी के सांसद को ऐसा धक्का दिया कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। राहुल गाँधी की ये हरकतें कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी का सबब बनी हुई हैं।
  • चुनावी नतीजों पर असर नहीं: हरियाणा में भारत जोड़ो यात्रा के बावजूद कांग्रेस हारी। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी कोई फायदा नहीं हुआ।
  • महँगा प्रचार: यात्रा पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन इसका असर सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित रहा। कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ा, लेकिन वोटर तक बात नहीं पहुँची।
  • विवादों का हिस्सा: यात्रा के दौरान राहुल के सावरकर पर बयान ने महाराष्ट्र में कांग्रेस को नुकसान पहुँचाया।
यात्रा ने राहुल को प्रचार तो दिलाया, लेकिन कांग्रेस की हार ने साबित किया कि ये सिर्फ दिखावा था। अगर इतने बड़े अभियान का कोई चुनावी असर नहीं हुआ, तो सवाल उठता है कि ये यात्रा किस काम की थी?

पतन की राह पर कांग्रेस 

कार्यकर्ताओं का टूटता मनोबल: हरियाणा और महाराष्ट्र में हार के बाद कांग्रेस कार्यकर्ता हताश हैं। राहुल की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
विपक्षी एकता में दरार: राहुल के बयानों ने विपक्षी गठबंधन को भी कमजोर किया। मायावती और अन्य नेताओं ने कांग्रेस से दूरी बना ली।
संगठनात्मक कमजोरी: कांग्रेस का संगठन कई राज्यों में बिखर चुका है। दिल्ली, हरियाणा, और महाराष्ट्र में पार्टी का आधार लगातार कमजोर हो रहा है।
आंतरिक कलह: कांग्रेस में राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। कई नेता खुलकर कहने लगे हैं कि पार्टी को नया चेहरा चाहिए।
राहुल की लीडरशिप ने कांग्रेस को एक डूबती नाव बना दिया है। अगर पार्टी को बचाना है, तो उसे कठोर फैसले लेने होंगे।
राहुल गाँधी के बयानों ने ना सिर्फ कांग्रेस को कमजोर किया, बल्कि देश की कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए। उनके भारत के लोकतंत्र को सीरिया-इराक से जोड़ने और चुनाव आयोग पर अनियमितताओं के आरोप लगाने जैसे बयानों ने सियासी अस्थिरता को बढ़ावा दिया। बीजेपी ने इसे ‘अराजकता फैलाने की साजिश’ करार दिया। राहुल की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी ने विपक्ष की विश्वसनीयता को भी ठेस पहुँचाई। जब नेता प्रतिपक्ष ही विदेश में जाकर देश की व्यवस्था पर सवाल उठाएगा, तो जनता का भरोसा कैसे बनेगा? उनकी अनुपस्थिति और विवादित बयानों ने कानून-व्यवस्था को कमजोर करने का काम किया।

कांग्रेस के लिए बोझ बन चुके हैं राहुल गाँधी

राहुल गाँधी का एक साल का कार्यकाल बतौर नेता प्रतिपक्ष एक फ्लॉप शो रहा। 43 दिन विदेश में बिताने वाले राहुल ने ना तो संसद में कोई प्रभाव छोड़ा, ना ही कांग्रेस को जीत दिलाई। उनके झूठे और जहरीले बयानों ने भारत की छवि को नुकसान पहुँचाया और कांग्रेस को बार-बार बैकफुट पर ला खड़ा किया। दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र में हार ने साबित किया कि राहुल का चेहरा अब कांग्रेस के लिए बोझ बन चुका है। उनकी संसद में अनुपस्थिति और गैर-जिम्मेदाराना रवैये ने जनता का भरोसा तोड़ा।
ऐसे में अब सवाल ये है कि क्या कॉन्ग्रेस इस ‘शहजादे’ के भरोसे अपनी साख बचा पाएगी? राहुल गाँधी की हरकतों ने साबित किया कि वो ना तो नेतृत्व के काबिल हैं, ना ही देश की जनता के भरोसे के। कांग्रेस को अगर बचना है तो उसे राहुल से छुटकारा पाना होगा, वरना ये डूबती नाव और गहरे समंदर में समा जाएगी। राहुल गाँधी की नाकामियाँ कांग्रेस के लिए एक सबक हैं – या तो नेतृत्व में बदलाव या फिर रहो खत्म होने को तैयार।
नेतृत्व में बदलाव से मतलब है कि मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे रिमोट कंट्रोल से चलने वाले नेता की जगह सचिन पायलट, डीके शिवकुमार या शशि थरूर जैसे नेताओं को पार्टी की कमान सौंपी जाए, जो इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी को फिर से चुनावी राजनीति में कम से कम प्रासंगिक तो बना सकें।

वक़्फ़ कोई इस्लामिक नहीं बल्कि जमीन लूट बोर्ड ; सरकारी प्रॉपर्टी पर नहीं कर सकेंगे दावा, बोर्ड में होंने गैर मुस्लिम भी, खैरात देने के लिए इस्लाम का 5 साल पालन जरूरी

                                                                                                                वक्फ की प्रतीकात्मक तस्वीर 
दुनियां में किसी भी मुस्लिम देश में कोई वक़्फ़ बोर्ड नहीं फिर भारत में क्यों? यह बात मुसलमान को समझना होगी। वक़्फ़ मुस्लिम हक़ में नहीं बल्कि मुस्लिम वोटबैंक है। इस बोर्ड से जितने मुस्लिम पीड़ित हैं कोई और नहीं। सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दू और मुसलमानों को पागल बनाया जा रहा है। सेकुलरिज्म का ढोल पीटने वालों को शायद सेकुलरिज्म का अर्थ भी नहीं मालूम। यह कटु सत्य है। वरना इन पाखंडियों से पूछो क्या सेकुलरिज्म का मतलब तुष्टिकरण करना है? वक़्फ़ बोर्ड की स्थापना और 1995 में संशोधन करने से कांग्रेस और यूपीए से मुसलमान दूरी बनाता रहा है, क्यों? वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में 9000+ लंबित केस 90% मुस्लिमों के ही है क्यों? दरअसल इस्लाम की आड़ में मुसलमानों को उसी तरह भड़काया जा रहा जैसा CAA मुद्दे को लेकर भड़काया गया था। 

बात 1993 की है जब सिविल लाइन्स में एक कब्रिस्तान पर फ्लैट बनने पर दरिया गंज में बच्चा घर में स्थित दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड जाने पर दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारियों ने अपने कटु अनुभव साझा किए थे। जिसे सुन रोंगटे खड़े हो गए थे। 2 दिन तक सारा स्टाफ ऑफिस में कैद रहा। तत्कालीन थानाध्यक्ष ने अपनी जेब अथवा सरकारी खर्चे से सुबह नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक का प्रबंध किया था। उन्होंने वक़्फ़ जमीनों के असली लुटेरों के नाम भी बताए जो इनकी जान के दुश्मन बन गए थे। जिन्हे मुसलमान अपना बहुत बड़ा मजहबी मानते हैं। धन्य हो दरिया गंज पुलिस स्टेशन का जिसने हस्तक्षेप कर उन्हें जिंदगी बक्शी। 

आज चर्चा यह भी है कि जब मुसलमान को गरीब कहा जाता है फिर मुसलमानों ने इतनी जमीन कहाँ से वक़्फ़ कर दी? जब मुस्लिम कट्टरपंथी फंसे होते है तब संविधान की बात करते है वरना शरीयत स्थापित करने की कवायत में लगे रहते हैं।       

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 लगातार चर्चा में है। संसद में इसके पास होने से पहले यह जान लीजिए कि ये पुराने कानून से किस तरह अलग है और इसमें क्या क्या बड़े बदलाव किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम, 1995 और वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, प्रशासन और संरचना में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रस्तावित किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम 1995 और वक्फ संशोधन विधेयक 2024 के बीच अंतर

वक्फ अधिनियम, 1995 का नाम मूल रूप से ‘वक्फ अधिनियम-1995’ था, जो उस समय के कानून की संरचना और सीमित दायरे को प्रतिबिंबित करता था। यह मुख्य रूप से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और विनियमन पर केंद्रित था। दूसरी ओर वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में इस अधिनियम का नाम बदलकर ‘एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम, 1995’ कर दिया गया है।

वक्फ की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम में वक्फ का गठन तीन तरीकों से संभव था: घोषणा, उपयोगकर्ता (लंबे समय तक उपयोग के आधार पर) और बंदोबस्ती (वसीयत या दस्तावेज के जरिए)। यह प्रावधान लचीलापन प्रदान करता था, लेकिन अस्पष्टता और दुरुपयोग की संभावना को भी बढ़ाता था, जैसे कि बिना औपचारिक दस्तावेज के संपत्तियों को वक्फ घोषित करना। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ के प्रावधान को पूरी तरह हटा दिया गया है।
अब वक्फ केवल औपचारिक घोषणा या बंदोबस्ती के जरिए ही बनाया जा सकता है और इसके लिए दानकर्ता को कम से कम पाँच साल से प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होना अनिवार्य है। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि पारिवारिक वक्फ में महिला उत्तराधिकारियों को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह बदलाव दुरुपयोग को रोकने और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक कदम है।

सरकारी संपत्ति पर नहीं हो सकेगा दावा

वक्फ अधिनियम-1995 में सरकारी संपत्तियों को वक्फ के रूप में घोषित करने या उन पर दावे को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इस अस्पष्टता के कारण कई सरकारी और निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्डों ने अपने अधिकार क्षेत्र में लेने की कोशिश की, जिससे विवाद बढ़े। उदाहरण के लिए दिल्ली और कर्नाटक में सरकारी भूमि पर दावे देखे गए। वहीं साल 2024 के संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी सरकारी संपत्ति वक्फ के रूप में मान्य नहीं होगी। यदि ऐसी संपत्ति पर वक्फ का दावा किया जाता है, तो जिला कलेक्टर इसकी जाँच करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा। यह प्रावधान सरकारी संपत्तियों पर अनुचित दावों को रोकने और विवादों को कम करने के लिए लाया गया है।

संपत्तियों के सर्वे की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम के तहत वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण सर्वेक्षण आयुक्तों और अपर आयुक्तों की जिम्मेदारी थी। हालाँकि इस प्रक्रिया में देरी, विशेषज्ञता की कमी और समन्वय का अभाव आम समस्याएँ थीं, जिसके कारण कई राज्यों में सर्वे अधूरा रहा। इसके उलट साल 2024 के विधेयक में सर्वेक्षण का दायित्व जिला कलेक्टरों को सौंपा गया है, जो राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार काम करेंगे। यह बदलाव सर्वेक्षण को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए किया गया है, क्योंकि कलेक्टरों के पास पहले से ही भूमि रिकॉर्ड और प्रशासनिक संसाधनों तक पहुँच होती है। इससे सर्वेक्षण की गुणवत्ता और समयबद्धता में सुधार की उम्मीद है।

केंद्रीय वक्फ परिषद (CWC) की संरचना

1995 के अधिनियम में केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्यों का मुस्लिम होना अनिवार्य था, जिसमें कम से कम दो महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान था। यह संरचना समुदाय-केंद्रित थी, लेकिन इसमें विविधता और बाहरी दृष्टिकोण की कमी थी। 2024 के संशोधन विधेयक में CWC की संरचना में बदलाव करते हुए दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव है। अब सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए मुस्लिम होना जरूरी नहीं होगा, हालाँकि मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि, इस्लामी कानून के विद्वान और वक्फ बोर्डों के अध्यक्ष जैसे सदस्यों के लिए यह शर्त बरकरार रहेगी। इसके अलावा मुस्लिम सदस्यों में से दो महिलाएँ होना अनिवार्य रहेगा। यह बदलाव समावेशिता और प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के लिए किया गया है।

राज्य वक्फ बोर्ड (SWB) की संरचना

साल 1995 के अधिनियम में राज्य वक्फ बोर्ड में दो निर्वाचित मुस्लिम सांसद, विधायक या बार काउंसिल सदस्य शामिल होते थे और कम से कम दो महिलाओं की नियुक्ति अनिवार्य थी। यह संरचना सीमित थी और इसमें विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं था। 2024 के विधेयक में SWB को अधिक विविध बनाया गया है। अब राज्य सरकार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों, शिया, सुन्नी, बोहरा, आगाखानी, और पिछड़े वर्ग के मुस्लिम समुदायों से एक-एक प्रतिनिधि को नामित करेगी। साथ ही कम से कम दो मुस्लिम महिलाओं की नियुक्ति की शर्त बरकरार रहेगी। यह बदलाव बोर्ड को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने का प्रयास है, ताकि विभिन्न हितधारकों की आवाज सुनी जा सके।

वक्फ न्यायाधिकरण की संरचना और अपील

1995 के अधिनियम में वक्फ न्यायाधिकरण में एक जज, अपर जिला मजिस्ट्रेट और मुस्लिम कानून का विशेषज्ञ शामिल होता था। इसके फैसलों को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की सीमित संभावना थी, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होती थी। 2024 के संशोधन विधेयक में न्यायाधिकरण की संरचना में बदलाव किया गया है। अब इसमें मुस्लिम कानून के विशेषज्ञ को हटाकर जिला न्यायालय के जज (अध्यक्ष) और एक संयुक्त सचिव स्तर के राज्य सरकार के अधिकारी को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा न्यायाधिकरण के फैसलों के खिलाफ 90 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में अपील की अनुमति दी गई है। यह बदलाव विवाद समाधान को अधिक निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने के लिए है।

केंद्र सरकार की शक्तियाँ

साल 1995 के अधिनियम में केंद्र सरकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत सीमित थीं। राज्य सरकारें वक्फ खातों का ऑडिट कर सकती थीं, लेकिन केंद्र का कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। अब केंद्र को वक्फ पंजीकरण, खातों, और लेखा परीक्षा (CAG या नामित अधिकारी के जरिए) से संबंधित नियम बनाने का अधिकार होगा। यह प्रावधान केंद्रीकृत निगरानी और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है, ताकि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन अधिक व्यवस्थित हो सके।

पुरानी मस्जिदों, दरगाहों, मजहबी स्थलों से छेड़छाड़ नहीं

सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने साफ कर दिया है कि पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या किसी भी मुस्लिम मजहबी स्थल से छेड़छाड़ नहीं होगी। यह सुझाव सहयोगी दल जेडीयू ने दिया था, जिसे बीजेपी ने मान लिया। इसका मतलब है कि यह कानून पुरानी तारीख से लागू नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाने का फैसला कई लोगों को नागवार गुजर रहा है। धारा 11 के तहत अब दो गैर-मुस्लिम सदस्य (हिंदू या अन्य धर्मों के लोग) बोर्ड में शामिल हो सकते हैं। साथ ही, राज्य सरकार का एक अधिकारी भी इसमें होगा।

कम से कम 5 साल इस्लाम का पालन

विवाद की एक और बड़ी वजह है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या का प्रस्ताव, जिसे बिल में शामिल कर लिया गया। इसके मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति वक्फ में तभी खैरात (दान) कर सकेगा, जब वह कम से कम 5 साल से इस्लाम का पालन कर रहा हो। साथ ही दी गई संपत्ति में धोखाधड़ी न हो, इसका सबूत भी देना होगा।

ट्रिब्यूनल में बदलाव

वक्फ ट्रिब्यूनल में भी बदलाव हुआ है। पहले इसमें दो सदस्य होते थे, लेकिन अब तीसरा सदस्य एक इस्लामिक स्कॉलर होगा। पहले कलेक्टर वक्फ संपत्तियों की जाँच करता था, लेकिन अब यह जिम्मा किसी वरिष्ठ अधिकारी को दिया जाएगा, जिसे राज्य सरकार चुनेगी। वक्फ संपत्तियों की सूची को गजट में छपने के 90 दिनों के अंदर ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट करना होगा, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

जेपीसी की सिफारिशों को किया गया शामिल

इस बिल को तैयार करने में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों का बड़ा हाथ है। जेपीसी ने 36 बैठकें कीं, 10 शहरों में दौरे किए और 97 लाख से ज्यादा ज्ञापन हासिल किए। मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद से लेकर पटना और लखनऊ तक, समिति ने हर कोने से लोगों की राय ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलमा-ए-हिंद और दारुल उलूम देवबंद जैसे संगठनों से भी बात हुई। सरकार का कहना है कि यह बिल वक्फ संपत्तियों को डिजिटल बनाने, सर्वे को तेज करने और गरीबों के कल्याण के लिए है।
इन सबके बीच सवाल यह है कि क्या यह बिल वाकई वक्फ संपत्तियों का भला करेगा? देश में करीब 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित करने के मामले सामने आए हैं। आँकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2024 तक, 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों के आँकड़ों से पता चलता है कि 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित किया गया है। इनमें से कुछ के उदाहरण देख सकते हैं…
सितंबर 2024 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, 108 संपत्तियाँ भूमि और विकास कार्यालय के नियंत्रण में हैं, 130 संपत्तियाँ दिल्ली विकास प्राधिकरण के नियंत्रण में हैं और सार्वजनिक डोमेन में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है और मुकदमेबाजी में लाया गया है।

वक्फ घोषित की गई अन्य गैर-मुस्लिम संपत्तियों के उदाहरण

तमिलनाडु: थिरुचेंथुरई गाँव का एक किसान वक्फ बोर्ड के पूरे गाँव पर दावे के कारण अपनी जमीन नहीं बेच पाया। इस अप्रत्याशित आवश्यकता ने उसे अपनी बेटी की शादी के लिए लोन चुकाने के लिए अपनी जमीन बेचने से रोक दिया।
गोविंदपुर गाँव, बिहार: अगस्त 2024 में, बिहार सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूरे एक गाँव पर दावे ने सात परिवारों को प्रभावित किया, जिसके कारण पटना उच्च न्यायालय में मामला चला। मामला विचाराधीन है।
केरल: सितंबर 2024 में, एर्नाकुलम जिले के लगभग 600 ईसाई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति में अपील की है।
कर्नाटक: वक्फ बोर्ड द्वारा विजयपुरा में 15,000 एकड़ जमीन को वक्फ भूमि के रूप में नामित किए जाने के बाद किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। बल्लारी, चित्रदुर्ग, यादगीर और धारवाड़ में भी विवाद हुए। हालाँकि सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई बेदखली नहीं होगी। इसके साथ ही कर्नाटक में 40 वक्फ संपत्तियों को अधिसूचित किया गया, जिनमें कृषि भूमि, सार्वजनिक स्थान, सरकारी भूमि, कब्रिस्तान, झीलें और मंदिर शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश और पंजाब: यूपी वक्फ बोर्ड द्वारा कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के खिलाफ शिकायतें की गई हैं। तो पंजाब वक्फ बोर्ड ने पटियाला में शिक्षा विभाग की भूमि पर दावा किया है।
नए बिल में कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी को संपत्तियों की जाँच का अधिकार दिया गया है, ताकि गलत दावों पर लगाम लगे। बहरहाल, गरीबों के लिए भी इस बिल से उम्मीदें हैं। डिजिटल पोर्टल से वक्फ संपत्तियों की निगरानी होगी, जिससे कुप्रबंधन और अतिक्रमण रुकेगा। इससे होने वाली आय को शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे कल्याणकारी कामों में लगाया जाएगा। लेकिन गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी और इस्लाम पालन की शर्त जैसे मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है।

‘पेपर लीक पर न करें राजनीति, दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध’: इमरजेंसी संविधान पर सबसे बड़ा हमला :राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 18वीं लोकसभा के पहले संसद सत्र में सदन के दोनों सदनों को संबोधित किया। राष्ट्रपति लोकसभा और राज्यसभा की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए अगले 5 सालों के लिए नई सरकार के रोडमैप की रूपरेखा सामने रखा। राष्ट्रपति का संसद भवन के अंदर सांसदों ने खड़े होकर स्वागत किया। इसके बाद राष्ट्रगान हुआ जिसके बाद राष्ट्रपति ने अपना अभिभाषण शुरू किया। अपने संबोधन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आपातकाल संविधान पर सीधे हमले का सबसे बड़ा और काला अध्याय था।

अपने अभिभाषण की शुरुआत राष्ट्रपति ने 18वीं लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों को बधाई देकर की। राष्ट्रपति ने नवनिर्वाचित स्पीकर ओम बिरला को भी बधाई दी और सकुशल चुनाव संपन्न कराने के लिए चुनाव आयोग का भी धन्यवाद किया। उन्होंने जम्मू कश्मीर से चुनाव की आई तस्वीरों को सुखद बताते हुए कहा कि इस बार घाटी में दशकों का रिकॉर्ड टूटा है। हमने जम्मू कश्मीर में हड़ताल का दौर देखा है। कम मतदान को दुश्मन कश्मीर की राय के रूप में वैश्विक मंचों पर उठाते थे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा, “ये दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव था, करीब 64 करोड़ मतदाताओं ने उत्साह और उमंग के साथ अपना कर्तव्य निभाया है। इस बार भी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर मतदान में हिस्सा लिया है। इस चुनाव की बहुत सुखद तस्वीर जम्मू-कश्मीर से भी सामने आई है। कश्मीर घाटी में वोटिंग के अनेक दशकों के रिकॉर्ड टूटे हैं।” राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की विकास गति को तेज किया जाएगा। ग्रोथ की निरंतरता हमारी गारंटी है और आने वाले बजट में ऐतिहासिक कदम दिखेंगे। किसानों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, “किसानों को 20 हजार करोड़ ट्रांसफर किए गए। हम किसानों को ज्यादा से ज्यादा आत्मनिर्भर करेंगे।”

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा “देश में छह दशक के बाद पूर्ण बहुमत वाली स्थिर सरकार बनी है। लोगों ने इस सरकार पर तीसरी बार भरोसा जताया है। लोग जानते हैं कि सिर्फ यही सरकार उनकी आकाँक्षाओं को पूरा कर सकती है। 18वीं लोकसभा कई मायनों में ऐतिहासिक लोकसभा है। इस लोकसभा का गठन अमृतकाल के शुरुआती वर्षों में हुआ था। यह लोकसभा देश के संविधान को अपनाने के 75वें ​​वर्ष की भी साक्षी बनेगी। आगामी सत्रों में यह सरकार अपने कार्यकाल का पहला बजट पेश करने जा रही है। यह बजट सरकार की दूरगामी नीतियों और भविष्य के विजन का प्रभावी दस्तावेज होगा। बड़े आर्थिक और सामाजिक फैसलों के साथ-साथ इस बजट में कई ऐतिहासिक कदम भी देखने को मिलेंगे।”

राष्ट्रपति के अभिभाषण में पेपर लीक का जिक्र भी किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, “पेपर लीक की घटनाओं की निष्पक्ष जाँच और दोषियों कड़ी सजा दिलाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। पहले भी कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाएँ हुई हैं। इस मामले पर दलीय राजनीति से ऊपर उठकर देश व्यापी ठोस उपाय करने की जरूरत है।”

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा, “सरकार ने पीएम किसान सम्मान निधि के तहत देश के किसानों को 3 लाख 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि प्रदान की है। मेरी सरकार के नए कार्यकाल की शुरुआत से अब तक 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि किसानों को हस्तांतरित की जा चुकी है। सरकार ने खरीफ फसलों के लिए MSP में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है। आज का भारत अपनी वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अपनी कृषि व्यवस्था में बदलाव कर रहा है। आजकल दुनिया में जैविक उत्पादों की माँग तेजी से बढ़ रही है। भारतीय किसानों के पास इस माँग को पूरा करने की पूरी क्षमता है, इसलिए सरकार प्राकृतिक खेती और इससे जुड़े उत्पादों की सप्लाई चेन को सशक्त कर रही है।”

राष्ट्रपति मुर्मू ने संसद में कहा कि विभाजनकारी ताकतें लोकतंत्र को कमजोर करने, देश के भीतर और बाहर से समाज में खाई पैदा करने की साजिश रच रही हैं। हमारे लोकतंत्र को नुकसान पहुँचाने के हर प्रयास की सभी को निंदा करनी चाहिए।

धुआँ उड़ाते लोकसभा में कूद गए 2 लोग, सांसदों ने पकड़ कर पुलिस को सौंपा: संसद पर हमले की 22वीं बरसी पर हुई घटना

संसद में सुरक्षा चूक, लोकसभा में घुसे 2 प्रदर्शनकारी (फोटो साभार: Youtube_SansadTV)
संसद पर साल 2001 में हुए हमले की 22वीं बरसी पर सुरक्षा चूक का मामला सामने आया है। लोकसभा में कार्यवाही के दौरान दो प्रदर्शनकारी गैलरी से सदन में कूद गए, जिन्हें सांसदों ने ही पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। ये सुरक्षा चूक का बड़ा मामला है, जिसमें सांसद से जारी पास के आधार पर लोकसभा के दर्शक दीर्घा तक पहुँचे दो लोगों ने लोकसभा की कार्यवाही के दौरान ही सदन में छलांग लगा दिया। उन्होंने सुरक्षा घेरे को धता बताकर नारेबाजी की।

हालाँकि, उन्हें सांसदों ने ही पकड़ लिया। इन दो लोगों के अलावा संसद के बाहर भी स्मोक केन से धुआँ निकाल कर प्रदर्शन कर रहे दो लोगों को हिरासत में लिया गया है।

अब सांसद ही मांग कर रहे हैं कि जिस सांसद की मार्फ़त ये उपद्रवी संसद पहुंचे हैं,उस सांसद को भी तुरंत हिरासत में लेकर पूछताछ करनी चाहिए। यह भी सम्भावनायें व्यक्त की जा रही हैं, धुंए का सामान सांसद की कार में ले जाया गया हो? इस सांसद को सदस्यता ही समाप्त नहीं हो. बल्कि इसके बैंक खातों को भी तुरंत सील किया जाये। 

ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा में ये घुसपैठ ठीक 1 बजकर 1 मिनट पर हुई। उस समय सदन में पश्चिम बंगाल के मालदा उत्तर सीट से भाजपा के लोकसभा सांसद खरगेन मुर्मू अपनी बात रख रहे थे। इसी दौरान एक युवक ने लोकसभा में छलांग लगा दी। अगले ही क्षण पीठाधीन राजेंद्र अग्रवाल ने सदन को 2 बजे तक के लिए स्थगित कर लिया। इस बीच लोकसभा में मौजूद सांसदों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने वाले दोनों युवकों को पकड़ लिया।

बताया जा रहा है कि लोकसभा में सुरक्षा घेरे को तोड़ने वाले युवकों ने जूते में स्मोक कनस्तर छिपा रखे थे, उन्होंने सदन के भीतर नारेबाजी भी की।

2 अन्य प्रदर्शनकारी संसद के बाहर से गिरफ्तार

इस बीच दिल्ली पुलिस ने ट्रांसपोर्ट भवन के सामने दो प्रदर्शनकारियों, एक पुरुष और एक महिला को हिरासत में लिया है, जो रंग-बिरंगा धुआँ छोड़ने वाली सामग्री के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। घटना संसद के बाहर हुई। उन्हें दिल्ली पुलिस के जवानों ने तुरंत हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए गए व्यक्तियों में एक महिला भी है, जो नारेबाजी करती दिख रही है।
हिरासत में लिए गए आरोपितों को संसद मार्ग पुलिस स्टेशन ले जाया गया है। दिल्ली पुलिस की एंटी टेरर यूनिट स्पेशल सेल पार्लियामेंट के अंदर हंगामा करने वाले लोगों से पूछताछ करने पहुँच गई है।
शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत ने इस बारे में बताया कि इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ। जब वे नीचे कूदे तो पीछे की बेंचें खाली थीं, वे पकड़े गए। सदन में दो मंत्री भी मौजूद थे
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने बताया कि अचानक करीब 20 साल के दो युवक दर्शक दीर्घा से सदन में कूद पड़े और उनके हाथ में कनस्तर थे। इन कनस्तरों से पीला धुआँ निकल रहा था। उनमें से एक अध्यक्ष की कुर्सी की ओर भागने की कोशिश कर रहा था। वो लोग नारेबाजी भी कर रहे थे। कार्ति चिदंबरम ने इसे सुरक्षा चूक का गंभीर उल्लंघन बताया है।
अवलोकन करें:-
बताया जा रहा है कि ये लोग मैसूर के सांसद द्वारा जारी पास के आधार पर लोकसभा की गैलरी तक पहुँचे थे। उन्होंने जूते में रंग-बिरंगा धुआँ फेंकने वाले कनस्तर छिपाए थे। उनके पास किसी तरह का विस्फोटक या घातक हथियार नहीं मिला। सूत्रों के मुताबिक, एक युवक का नाम सागर है और उनका मकसद लोकसभा में हंगामा मचाकर लोकप्रियता हासिल करना था।