Showing posts with label #NEET. Show all posts
Showing posts with label #NEET. Show all posts

NEET-UG पेपर लीक और कोचिंग माफिया, CBI ने सॉल्वर गैंग से जुड़े 45 के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट

                      नीट पेपर लीक और प्रशासनिक सुधारों का विश्लेषण। (फोटो साभार - AI)
साल 2024 का NEET-UG पेपर लीक किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रश्नपत्र से भरा ट्रंक खोल देने से शुरू नहीं हुआ था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) के अनुसार, यह एक ऐसे संगठित नेटवर्क का नतीजा था, जिसने एडमिशन कंसल्टेंट्स, करियर काउंसलिंग ऑपरेटरों, परीक्षा केंद्र के अधिकारियों, अभ्यर्थियों तक पहुँच बनाने वाले एजेंटों, सॉल्वर के रूप में नियुक्त MBBS छात्रों, गेस्ट हाउस संचालकों, ड्राइवरों, प्रिंटरों और वित्तीय बिचौलियों को एक-दूसरे से जोड़ रखा था।

दो साल बाद तरीका भले ही बदल गया, लेकिन जाँच एजेंसी के अनुसार इस पूरे कारोबारी तंत्र का अस्तित्व बना रहा। NEET-UG 2026 मामले में CBI ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा विषय विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त लोगों ने गोपनीय प्रश्नों को निजी कोचिंग क्लासों और कोचिंग से जुड़े बिचौलियों के माध्यम से आगे पहुँचाया।

केमिस्ट्री के व्याख्याता पीवी कुलकर्णी को इस पूरे मामले में एक प्रमुख स्रोत बताया गया। जाँच के अनुसार, उनके घर पर आयोजित विशेष कक्षाओं के दौरान बताए गए प्रश्न 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों से मेल खाते थे।

ये दोनों मामले दिखाते हैं कि पेपर लीक को केवल सीलबंद प्रश्नपत्रों की आवाजाही में हुई चूक के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोचिंग माफिया एक संगठित बाजार की तरह काम करता है।

यह ऐसे परिवारों की तलाश करता है जो पैसे देने को तैयार हों, गोपनीय जानकारी तक पहुँच रखने वाले अंदरूनी लोगों को खोजता है, प्रश्न हल करने या पढ़ाने में सक्षम लोगों की भर्ती करता है, उम्मीदवारों के रहने और आने-जाने की व्यवस्था करता है, पैसे और जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करता है और परीक्षा शुरू होने से पहले ही उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाने का काम करता है।

यहाँ कोचिंग माफिया शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी कोचिंग संस्थान, शिक्षक या करियर काउंसलर परीक्षा से जुड़े अपराधों में शामिल हैं।

इस शब्द का उपयोग केवल उन संगठनों और व्यक्तियों के लिए किया गया है, जिन्होंने CBI के बयानों और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार शिक्षा, काउंसलिंग या एडमिशन से जुड़े अपने नेटवर्क का इस्तेमाल अभ्यर्थियों की भर्ती करने और नकल या परीक्षा में धांधली कराने के लिए किया। ऑपइंडिया देशभर के पूरे कोचिंग नेटवर्क पर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप नहीं लगा रहा है।

पटना-हजारीबाग से जुड़े मुख्य मामले की शुरुआत शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR से हुई थी। इसके बाद 23 जून 2024 को यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया, जहाँ एजेंसी ने एक नई FIR दर्ज की।

जाँच के दौरान CBI ने कुल 45 लोगों के खिलाफ कई चार्जशीट दाखिल कीं। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए ऑपइंडिया ने मुख्य रूप से अदालत के आदेशों और FIR पर भरोसा किया है। इन सभी दस्तावेजों को लेख के अंत में उपलब्ध कराई गई एक ZIP फाइल में एक साथ जोड़ा गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह नेटवर्क 2024 की परीक्षा से पहले से था मौजूद

2024 के नीट पेपर लीक के घटनाक्रम उन दो लोगों द्वारा बनाई गई योजना से शुरू हुई जो 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे। CBI के अनुसार, मुख्य आरोपितों में से एक, अमित कुमार सिंह, राज कुमार सिंह उर्फ राजू सिंह को 2015-16 से जानता था।

दोनों कंसल्टेंसी या एजेंसी सेवाओं में काम करते थे जो प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला दिलाने का काम करती थीं। पंकज कुमार उर्फ आदित्य उर्फ साहिल भी इसी क्षेत्र में काम करता था और 2021-22 के दौरान अमित के संपर्क में आया था।

जाँच एजेंसी ने अमित और रंजीत कुमार बेउरा उर्फ पिंटू के बीच एक पुराने जुड़ाव का भी जिक्र किया। बेउरा की जमानत कार्यवाही के दौरान, अभियोजन पक्ष ने कहा कि वे दोनों 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और उसी साल ओडिशा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी परीक्षा में गड़बड़ी के एक मामले में गिरफ्तार हुए थे।

हालाँकि यह पुराना मामला नीट पेपर लीक से जुड़ा नहीं था, लेकिन यह इसलिए प्रासंगिक था क्योंकि CBI ने 2024 के इस ऑपरेशन को दाखिले और प्रतियोगी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द पहले से बने संबंधों के विस्तार के रूप में पेश किया।

‘करियर एकेडमी एजुकेशन ट्रस्ट’ उम्मीदवारों की भर्ती करने वाले मुख्य चैनलों में से एक बन गया। यह 3 अगस्त 2023 को ओडिशा में रजिस्टर्ड हुआ था। बेउरा ने अदालत को बताया कि यह गरीब छात्रों को शैक्षिक सुविधाएँ और परामर्श प्रदान करने के लिए बनाया गया एक NGO था।

वहीं CBI का कहना था कि इसका इस्तेमाल नीट उम्मीदवारों की पहचान करने, उनके परिवारों से कमिटमेंट लेने और गारंटी के तौर पर असली शैक्षणिक सर्टिफिकेट और चेक इकट्ठा करने के लिए किया जाता था।

बेउरा को इस संगठन का मैनेजिंग डायरेक्टर बताया गया था। अमित प्रसाद महाराणा और धीरेन कुमार पांडा की पहचान इसके पदाधिकारियों के रूप में की गई थी। एजेंसी ने कहा कि अमित कुमार सिंह ने ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश से उम्मीदवारों का इंतजाम करने के लिए उनके और संजय कुमार के साथ मिलकर काम किया।

सत्रह उम्मीदवारों को हजारीबाग भेजा गया और उन्हें ‘राज गेस्ट हाउस’ या ‘सिंदूर’ स्थित एक घर में ठहराया गया। बाकी उम्मीदवार भुवनेश्वर या पटना में ही रहे। CBI ने उम्मीदवारों, कर्मचारियों और ड्राइवरों के बयानों का हवाला दिया।

एक उम्मीदवार ने करियर एकेडमी को अपने शैक्षणिक सर्टिफिकेट सौंपे थे। एक अन्य ने कहा कि महाराणा ने हल किया हुआ नीट पेपर शेयर किया था। भुवनेश्वर की एक उम्मीदवार ने बताया कि उसे एक होटल में प्रिंटेड कॉपी मिली थी और उसने पांडा की पहचान की थी।

एजेंसी ने कहा कि महाराणा ने स्कोर्पियो से उम्मीदवारों को लाने-ले जाने का काम किया, ‘होटल ट्रीफो पैलेस’ में एक प्रिंटर की व्यवस्था की और हल किए गए पेपर बांटे। CBI ने उसके खाते में 2 लाख रुपए और ‘चिरंजीवी मल्टीवेंचर प्राइवेट लिमिटेड’ (जिसमें वह डायरेक्टर था) द्वारा प्राप्त 12 लाख रुपए का हवाला दिया।

पांडा को करियर एकेडमी का ट्रेजरर बताया गया था और वह भी ट्रांसपोर्ट, होटल ट्रीफो पैलेस में पेपर बांटने और 12 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा हुआ था। CBI ने कहा कि गारंटी के तौर पर असली सर्टिफिकेट और चेक लिए गए थे। इससे आयोजकों को उम्मीदवारों और उनके परिवारों पर काफी दबाव बनाने का मौका मिल गया होगा।

अगली कड़ी परीक्षा प्रणाली के भीतर थी। जमालुद्दीन उर्फ जमाल हजारीबाग का एक पत्रकार था जो ‘प्रभात खबर’ से जुड़ा हुआ था और ओएसिस स्कूल द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को नियमित रूप से कवर करता था।

ओएसिस स्कूल वही परीक्षा केंद्र था जहाँ से प्रश्नपत्र चोरी हुआ था। CBI ने कहा कि इस वजह से वह प्रिंसिपल डॉ अहसानुल हक और वाइस-प्रिंसिपल मो इम्तियाज आलम के करीब आ गया।

एजेंसी ने 3 जून 2023 से 18 जून 2024 तक हक और जमालुद्दीन के बीच 814 कॉल्स का हवाला दिया। हालाँकि केवल कॉल की संख्या ही साजिश साबित करने के लिए काफी नहीं थी, लेकिन CBI ने इसका इस्तेमाल उनके निरंतर जुड़ाव को स्थापित करने के लिए किया।

एजेंसी के अनुसार, जमालुद्दीन ने अमित कुमार सिंह की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी। अमित ने बाद में पंकज कुमार को उनसे मिलवाया। CBI ने अमित, हक, इम्तियाज, जमालुद्दीन, पंकज, राजू सिंह और अमन कुमार सिंह की बैठकों का भी जिक्र किया।

अभियोजन पक्ष की व्यापक थ्योरी साफ थी, जमालुद्दीन ने बाहर के दाखिला नेटवर्क को उस सुरक्षित केंद्र को नियंत्रित करने वाले अधिकारियों से जोड़ा, जबकि अमित ने पंकज को उस दायरे में शामिल किया।

पेपर चोरी होने से पहले सॉल्वर और कैंडिडेट हुए इकट्ठा

एक कोरे प्रश्नपत्र का तब तक कोई खास व्यावसायिक मूल्य  नहीं था जब तक कि उसे जल्दी से हल करके पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक न पहुँचाया जाए। CBI ने कहा कि कम से कम तीन सॉल्वर ग्रुप्स  को हजारीबाग लाया गया था। इसके कई सदस्य MBBS छात्र थे।

संजय कुमार को उस व्यक्ति के रूप में बताया गया जिसने सॉल्वर, लाभार्थियों, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था की थी। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने AIIMS पटना के छात्र चंदन सिंह से पढ़ाई में अच्छे मेडिकल छात्रों को भर्ती करने के लिए कहा था।

पटना ग्रुप में चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, करण जैन, सुरभि कुमारी, रौनक राज और अमित कुमार शामिल थे। अमित अपने कॉलेज के साथी सनोज कुमार यादव को लाया था, हालाँकि CBI ने कहा कि सनोज पेपर हल करने के लिए ‘राज गेस्ट हाउस’ के अंदर नहीं गया था।

इन छात्रों से पहले ‘इम्पर्सनेशन’ (दूसरों के स्थान पर परीक्षा देने यानी डमी कैंडिडेट बनने) के लिए संपर्क किया गया था। CBI ने कहा कि संजय चंदन, कुमार शानू, राहुल आनंद और करण जैन को एम्स पटना के पास एक फोटो स्टूडियो में ले गया।

नीट आवेदनों के लिए उनकी तस्वीरें ली गईं। रौनक राज और अमित कुमार ने व्हाट्सएप के जरिए तस्वीरें और सिग्नेचर भेजे। डमी-कैंडिडेट की योजना को बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हीं नए लोगों को सॉल्वर के रूप में फिर से काम सौंप दिया गया।

राजस्थान ग्रुप का संबंध अमित कुमार सिंह से था। CBI ने कहा कि उसने फरवरी 2024 में भरतपुर की यात्रा की और कुमार मंगलम विश्नोई, दीपेंद्र शर्मा और अन्य मेडिकल छात्रों से मुलाकात की।

श्री जगन्नाथ पहाड़िया सरकारी मेडिकल कॉलेज के MBBS छात्र कुमार मंगलम ने एक ग्रुप का इंतजाम किया, जिसमें दीपेंद्र शर्मा, संदीप कुमार, सुरेश कुमार और इशिता शामिल थे। इनसे भी शुरुआत में संभावित डमी उम्मीदवारों के रूप में संपर्क किया गया था। कुमार मंगलम ने बाद में ट्रेन टिकटों की व्यवस्था की और ग्रुप के सदस्यों को हजारीबाग लेकर आया।

यह ऑपरेशन परीक्षा से एक सप्ताह से भी अधिक समय पहले लोगों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने लगा था। 26 अप्रैल की रात को संजय कुमार, चंदन सिंह, कुमार शानू और राहुल आनंद गंगा दामोदर एक्सप्रेस से पटना से रवाना हुए और कोडरमा पहुँचे।

सुरभि कुमारी रांची से अलग आई थी। यह ग्रुप पहले ‘रैमसन होटल’ और फिर ‘होटल तारा टॉवर’ में रुका। बुकिंग संजय और कुमार अभिषेक द्वारा की गई थी।

अमित कुमार 2 मई को चेन्नई से रांची गया और अगले दिन कोडरमा पहुँचा। रौनक राज मुंबई से आया था। करण जैन ने कुमार अभिषेक द्वारा बुक किए गए टिकट पर पटना से यात्रा की। 3 मई को पटना ग्रुप हजारीबाग के ‘होटल श्री विनायक’ में शिफ्ट हो गया।

उनका इतनी जल्दी आना CBI के इस दावे का समर्थन करता है कि उन्हें गोपनीय सामग्री की उम्मीद में पहले से ही वहाँ तैनात किया गया था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि तैयारियाँ ओएसिस स्कूल के भीतर भी चल रही थीं।

इम्तियाज आलम की जमानत कार्यवाही में इसके जवाबी हलफनामे में कहा गया कि 3 मई को कंट्रोल रूम में एक टूलकिट बैग रखा गया था। बाद में इन टूल्स का इस्तेमाल NTA ट्रंक के पीछे के कब्जों से छेड़छाड़ करने, उसकी पैकेजिंग खोलने और पेपर की फोटो खींचने के बाद उसे वापस वैसे ही ठीक करने के लिए किया गया था।

इम्तियाज आलम के जमानत आदेश में शामिल CBI के जवाबी हलफनामे के अनुसार, आलम ने 3 मई को कंट्रोल रूम में टूलकिट बैग रखा था। एजेंसी ने कहा कि पंकज ने बाद में ट्रंक को खोलने और उसे वापस ठीक करने के लिए उन टूल्स का इस्तेमाल किया।

उम्मीदवारों का 3 और 4 मई को हजारीबाग में जुटना शुरू हो गया था। बेउरा करियर एकेडमी के कर्मचारी देबाशीष पाणिग्रही और ड्राइवर रंजन सेठी उर्फ मानस के साथ एक एमजी हेक्टर गाड़ी से पहुँचा था।

इस गाड़ी का इस्तेमाल उम्मीदवारों को लाने-ले जाने के लिए किया गया था। बेउरा ‘एके इंटरनेशनल होटल’ में रुका। ओडिशा के उम्मीदवारों को राज गेस्ट हाउस और सिंदूर भेजा गया।

राजू सिंह राज गेस्ट हाउस का प्रबंधन करता था। CBI ने कहा कि इस परिसर को जानबूझकर खाली और उपलब्ध रखा गया था। खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी और उम्मीदवारों व सॉल्वरों को लाने-ले जाने के लिए गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया था।

राजू ने अपना पक्ष रखा कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे और उसे इसके पीछे का मकसद नहीं पता था। पटना हाई कोर्ट ने शुरुआत में अभियोजन पक्ष के इस मामले का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि उम्मीदवारों को तैयार करने के लिए जानबूझकर गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया गया था।

पटना में सिकंदर यादवेन्दु ने अखिलेश कुमार, अवधेश कुमार, शिवनंदन कुमार और उम्मीदवार अनुराग यादव के साथ तालमेल बिठाया। CBI ने कहा कि उनसे 4 मई को रात करीब 10:30 बजे सेंट करेन्स हाई स्कूल के पास उम्मीदवारों को लाने के लिए कहा गया था।

उस रात तक इस नेटवर्क की अलग-अलग शाखाएँ अपनी-अपनी जगह पर तैनात थीं, स्कूल के भीतर के अंदरूनी लोग, पास के होटलों में सॉल्वर, गेस्ट हाउसों और निजी परिसरों में उम्मीदवार, और गाड़ियाँ, प्रिंटर व ठहरने की जगह पूरी तरह तैयार थीं।

5 मई को पेपर कैसे निकाला और बांटा गया

सुबह लगभग 5:30 बजे, चंदन सिंह, राहुल आनंद, सुरभि कुमारी और करण जैन एक काले रंग की हुंडई क्रेटा कार में ‘होटल श्री विनायक’ से निकले और ‘राज गेस्ट हाउस’ पहुँचे। उनके पीछे-पीछे कुमार शानू, अमित कुमार और रौनक राज भी वहाँ पहुँचे।

CBI ने कहा कि सनोज कुमार यादव को छोड़कर पटना सॉल्वर ग्रुप का हर सदस्य चोरी का पेपर आने से पहले ही गेस्ट हाउस के अंदर मौजूद था। मोबाइल लोकेशन, ट्रैवल रिकॉर्ड और गवाहों की पहचान के जरिए राजस्थान ग्रुप के दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार की मौजूदगी भी वहीं पाई गई।

                                              2024 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ

सुबह लगभग 7:40 बजे, ओएसिस स्कूल के प्रिंसिपल अहसानुल हक ने हजारीबाग में SBI के एक वॉल्ट से नीट के प्रश्नपत्रों से भरे दो ट्रंक लिए। हक NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर भी थे। ये ट्रंक सेंटर सुपरिटेंडेंट और वाइस-प्रिंसिपल इम्तियाज आलम को सौंप दिए गए, जो सुबह लगभग 7:53 बजे स्कूल पहुँचे और उन्हें कंट्रोल रूम में रख दिया।

CBI ने पैकेजिंग चेन के जरिए चोरी हुई बुकलेट का पता लगाया। ट्रंक संख्या 13093 में 13560 से 13563 तक के बंच थे। बंच 13560 में पैकेट नंबर 38988, 38989 और 38990 शामिल थे।

पैकेट 38990 में 6136465 से 6136488 तक नंबर वाली 24 बुकलेट थीं। बुकलेट संख्या 6136488 की पहचान उस मूल कॉपी के रूप में की गई जिसकी स्कूल के अंदर नकल की गई थी।

CBI ने कहा कि आलम ने इशारा किया कि पंकज को अंदर आने दिया जाए। इसके बाद पंकज स्टाफ रूम में बैठ गया। गौर करने वाली बात यह है कि ‘इनोवेटिव व्यू’ परीक्षा केंद्रों पर तैनात की गई आधिकारिक सुरक्षा और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन एजेंसी थी।

शाकिब ने इसकी जानकारी आलम को और बाद में हक को दी। सादुल ने भी यह मुद्दा उठाया। CBI द्वारा उद्धृत बयानों के अनुसार, आलम इस पर चिढ़ गए और उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि वे इस मामले को उन पर छोड़ दें। शाकिब और सादुल ने बाद में मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए। शाकिब ने एक टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड में पंकज की पहचान भी की।

जाँच एजेंसी ने कहा कि पंकज ने एक आईफोन 13  से पहले और आखिरी पन्ने को छोड़कर हर पेज की फोटो खींची, जिसके बारे में CBI का कहना है कि इसका इस्तेमाल इस पूरे ऑपरेशन में किया गया था। उसने किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके एक सिम कार्ड भी हासिल किया था।

CBI ने कहा कि अस्त-व्यस्त हो चुकी टेबल क्लॉथ को स्कूल के CCTV फुटेज में देखा जा सकता था। बाद में इन औजारों को जब्त कर लिया गया और पंकज ने CBI की कस्टडी में इस पूरी प्रक्रिया को दोबारा करके दिखाया।

खींची गई तस्वीरों को राज गेस्ट हाउस भेजा गया। सॉल्वरों को विषयों के हिसाब से बांट दिया गया। कुमार शानू, दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार को बायोलॉजी का जिम्मा सौंपा गया था। सुरभि कुमारी और रौनक राज ने केमिस्ट्री को संभाला।

चंदन सिंह, राहुल आनंद और अमित कुमार ने फिजिक्स का पेपर हल किया। करण जैन को कठिन या अधिक समय लेने वाले प्रश्न दिए गए थे। चंदन को पटना ग्रुप के लीडर और कुमार मंगलम को राजस्थान ग्रुप के लीडर के रूप में बताया गया।

पंकज ने हल की गई सामग्री की PDF बनाई और उन्हें सिंदूर, एके इंटरनेशनल होटल, बोकारो, भुवनेश्वर और पटना में मौजूद हैंडलर्स को भेज दिया। शशिकांत पासवान ने सिंदूर ब्रांच को संभाला। एक कॉपी अमित कुमार सिंह के भाई अमन कुमार सिंह द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्हाट्सएप नंबर पर भेजी गई थी।

भुवनेश्वर में पंकज के भाई घनश्याम से जुड़े हैंडलर्स ने दो इलेक्ट्रीशियन, गौतम और विकास के साथ मिलकर काम किया। 2024 के इस लीक मामले में CBI की जाँच के दौरान ‘करियर एकेडमी’ सबसे व्यापक रूप से दर्ज किए गए उम्मीदवार-भर्ती और लॉजिस्टिक्स चैनलों में से एक बनकर उभरी।

केमिस्ट्री का पेपर सुबह 11:05 बजे और फिजिक्स का पेपर सुबह 11:40 बजे आया। यह क्रम दर्शाता है कि जैसे ही संबंधित सॉल्वर ग्रुप ने अपना हिस्सा पूरा किया, वैसे ही प्रत्येक सेक्शन को आगे भेज दिया गया।

चार्जशीट के विवरण के अनुसार प्रिंटिंग और वितरण के दौरान बलदेव, पिंटू कुमार, नीतीश कुमार, अभिमन्यु पटेल, आशुतोष कुमार और मनीष प्रकाश उसी परिसर में मौजूद थे। लर्न प्ले स्कूल लीक हुए पेपर नेटवर्क की पटना ब्रांच के लिए वितरण और जवाब याद कराने का एक प्रमुख केंद्र था।

पुलिस इंटरसेप्शन जिसने रैकेट का किया पर्दाफाश

लगभग 2:05 बजे, शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन के तत्कालीन SHO इंस्पेक्टर अमर कुमार को सूचना मिली कि एक संगठित गिरोह ने NEET प्रश्नपत्र की सुरक्षा शृंखला को तोड़ दिया है। उन्हें यह भी बताया गया कि इस नेटवर्क के सदस्य रजिस्ट्रेशन नंबर JH01BW0019 वाली एक सफेद रेनॉल्ट डस्टर कार में घूम रहे हैं।

पुलिस ने राजवंशी नगर मोड़ के पास डस्टर गाड़ी को रोका और सिकंदर यादवेन्दु, अखिलेश कुमार व बिट्टू कुमार को हिरासत में ले लिया। गाड़ी की आगे की सीट के पास से चार फोटोकॉपी किए गए एडमिट कार्ड मिले। ये एडमिट कार्ड अभिषेक कुमार, शिवनंदन कुमार, आयुष राज और अनुराग यादव के थे। सिकंदर के पास से दो फोन भी बरामद किए गए।

आयुष राज BSEB कॉलोनी के डीएवी पब्लिक स्कूल में परीक्षा दे रहा था। FIR के मुताबिक, उसने बताया कि उसे और लगभग 20 से 25 छात्रों को ‘लर्न बॉयज हॉस्टल’ और ‘लर्न प्ले स्कूल’ ले जाया गया था, जहाँ उन्हें हल किए गए प्रश्न दिए गए और उन्हें याद करने के लिए कहा गया। उसने यह भी कहा कि परीक्षा में आए प्रश्न उपलब्ध कराई गई सामग्री से मेल खाते थे। पुलिस ने उसका एडमिट कार्ड, टेस्ट बुकलेट और पहचान दस्तावेज जब्त कर लिए।

इसके बाद जाँचकर्ताओं ने लर्न प्ले स्कूल की तलाशी ली और छत से नीट पेपर के आधे जले और गीले टुकड़े बरामद किए। CBI ने बाद में कहा कि इन टुकड़ों की मदद से वे लीक के तार ओएसिस स्कूल को आवंटित की गई बुकलेट से जोड़ने में कामयाब रहे। इस बरामदगी  ने पटना के वितरण केंद्र को हजारीबाग के पेपर से जोड़ दिया।

इस तरह मात्र एक दिन के भीतर, सॉल्वर सूर्योदय से पहले राज गेस्ट हाउस में दाखिल हुए, सुबह 8 बजे के बाद पेपर की कॉपी की गई, सुबह 11:40 बजे तक विषय-वार उत्तर पटना पहुँच गए और दोपहर 12:30 बजे तक उम्मीदवार अपने केंद्रों के लिए रवाना हो चुके थे।

मुख्य ऑर्गनाइजर और उनकी बताई गई भूमिकाएँ

CBI ने किसी एक व्यक्ति को इस पूरे नेटवर्क की हर शाखा के नियंत्रक के रूप में चिन्हित नहीं किया। जाँच एजेंसी का मामला एक बहुस्तरीय ऑपरेशन को दर्शाता है, जिसमें अलग-अलग लोगों ने परीक्षा केंद्र तक पहुँच, उम्मीदवारों की भर्ती, पेपर हल करने, वितरण और पैसों के लेनदेन को संभाला।

कुमार मंगलम और दीपेंद्र शर्मा को रांची में अमित से जुड़े एक फ्लैट में ठहराया गया था। एजेंसी ने यह भी कहा कि कुमार मंगलम को रत्ना खान के एक खाते से 2.4 लाख रुपए मिले थे, जिसे अमित ऑपरेट करता था। अमित ने इस फ्लैट, भुगतान और मुलाकातों के दावों का खंडन किया। उसके घर की तलाशी में कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।

पंकज कुमार को सुरक्षित परीक्षा केंद्र और बाहरी नेटवर्क के बीच की ऑपरेशनल कड़ी बताया गया था। CBI ने उस पर टूल्स और आईफोन खरीदने, झूठी पहचान बताकर ओएसिस स्कूल में प्रवेश करने, ट्रंक खोलने, पेपर की फोटो खींचने और हल किए गए PDF भेजने का आरोप लगाया।

हाई कोर्ट ने उसकी हिरासत की अवधि और अन्य आरोपितों के साथ समानता पर विचार करने के बाद मई 2025 में उसे जमानत दे दी। हालाँकि इस आदेश ने उसे आरोपों से बरी नहीं किया।

बलदेव को विषय-वार फाइलें मिली थीं। नीतीश ने उपकरणों की व्यवस्था की और पेपर्स को अपने आवास पर ले गया। रॉकी ने इस मामले में अपनी संलिप्तता से इनकार किया और बाद में उसे जमानत मिल गई।

हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की है। जमालुद्दीन को उस मध्यस्थ के रूप में बताया गया जिसने दाखिला नेटवर्क की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी।

हक और इम्तियाज ही उस सुरक्षित केंद्र के लिए जिम्मेदार अधिकारी थे। CBI ने कहा कि पंकज के प्रवेश को आसान बनाया गया, स्टाफ के विरोध के बावजूद उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया और कंट्रोल रूम तक उसकी पहुँच सुनिश्चित की गई। दोनों ने इस मामले में शामिल होने से इनकार किया और अभियोजन पक्ष के घटनाक्रम पर सवाल उठाए।

अलग गोधरा नेटवर्क ने OMR शीट को बनाया निशाना

गोधरा मामले में एक अलग तरीका अपनाया गया था। यह पेपर चुराने और उम्मीदवारों को जवाब याद कराने पर निर्भर नहीं था। CBI ने कहा कि कोचिंग से जुड़े एक नेटवर्क ने एक परीक्षा केंद्र को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया था ताकि उम्मीदवारों के जाने के बाद चुनिंदा OMR शीटों पर सही उत्तर भरे जा सकें।

इस मामले में तुषार रजनीकांत भट्ट, परशुराम बिंदनाथ रॉय, आरिफ नूर मोहम्मद वोरा, विभोर उमेश्वर प्रसाद सिंह आनंद, पुरुषोत्तम शर्मा और दीक्षित कांतिभाई पटेल को नामजद किया गया था।

तुषार भट्ट ‘ज्ञान मंदिर करियर इंस्टीट्यूट’ में काम करता था, जो एक निजी कोचिंग संस्थान था। CBI ने कहा कि उसे ‘जय जलाराम स्कूल’ में एक शिक्षक और पर्यवेक्षक के रूप में पेश किया गया था ताकि उसे डिप्टी सेंटर सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया जा सके। स्कूल के प्रिंसिपल और NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर पुरुषोत्तम शर्मा ने इस नियुक्ति को आसान बनाया।

दीक्षित पटेल ‘जय जलाराम एजुकेशन ट्रस्ट’ का चेयरमैन था, जो परीक्षा केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्कूलों को चलता था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने केंद्रों और अधिकारियों की व्यवस्था करने में भाग लिया था। उसके वकीलों ने कहा कि वे नियुक्तियाँ NTA द्वारा की गई थीं और उसकी संलिप्तता से इनकार किया।

इसका उद्देश्य यह संभावना बढ़ाना था कि उन्हें इस नेटवर्क के प्रभाव वाले केंद्रों में आवंटित किया जाए। उम्मीदवारों से कहा गया था कि वे केवल उन्हीं प्रश्नों के उत्तर दें जो वे जानते हैं और बाकी को खाली छोड़ दें। इसके बाद उनकी OMR शीट पर सही विकल्प भर दिए जाते हैं। परिवारों से 20 लाख रुपए से 25 लाख रुपए के बीच भुगतान करने को कहा गया था।

सरकारें और अदालतें पेशेवर प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव और इसकी पैरवी करने वाले वकीलों पर कब सख्ती से पेश आएंगे? योगेंद्र यादव की भीड़-तंत्र को सामान्यीकृत करने की खतरनाक जहरीली मानसिकता

                                                       (फोटो साभार: इंडिया टूडे, बिजनेस स्टैंडर्ड)
कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।

यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।

NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।

उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।

                                                            (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।

लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।

BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।

लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।

पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।

फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।

सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।

हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।

यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।

और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।

NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।

‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना

अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।

यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।

‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।

योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।

इसका राजनीतिक संदेश साफ है।

अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।

यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।

भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।

असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।

बंगाल और हताशा की राजनीति

पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।

कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।

लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।

बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।

इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।

ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।

इसका यह मतलब नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।

योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।

जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है

विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।

विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।

कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।

इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।

संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।

भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।

अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।

यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।

हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज

यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।

मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।

हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।

हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।

अंबेडकरवादी विरोधाभास

योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।

इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।

नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।

लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।

संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।

लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता

भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।

पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।

संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।

योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।

ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।

यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।

असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।

भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।

लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।

सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।


वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल? विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

CAA प्रोटेस्ट से लेकर अब NEET पेपर लीक तक विपक्ष ने जितने भी धरने/प्रदर्शन हुए हैं सभी अपने असली मुद्दे से भटके हैं। दूसरे विपक्ष का किसी न किसी बहाने संसद को बाधित करना रहा है। तीसरे, अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मुग़ल आक्रांताओं के गुणगान की बजाए उनकी असलियत पुस्तकों में लाई गयी होती कोई प्रधान का इस्तीफा नहीं मांगता। सभी धरनों में भोजन मिलना पहली बार देखा गया है। जो इस बात को साबित करता है कि हमारा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथों बिका हुआ है। जनता समझती है ये नेता जनता के हित में काम कर रहे हैं जबकि संसद से लेकर सड़क तक जो भी उपद्रव हो रहा है सब विदेशी फंडिंग से हो रहा है। जिसका तक़रीबन हर चैनल पर जिक्र किया जा रहा है। चुनावों में जनता से मदद मांगी जाती है लेकिन धरनों में भारत विरोधियों की शरण में, ये क्या तमाशा है?     
राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है। https://www.facebook.com/share/r/1F4fka4oWh/

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।
कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।
स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।
वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर को NSA के तहत मिली हिरासत में लेने की शक्ति, छात्रों के नाम पर हिंसा के बीच केंद्र का बड़ा फैसला : पुलिस ने बताया- रूटीन प्रक्रिया

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत लोगों को हिरासत में लेने की शक्तियाँ दे दी हैं। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब छात्रों के नाम पर शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ (CJP) का प्रदर्शन हिंसक और उग्र हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संबंध में बुधवार (22 जुलाई 2026) को दिल्ली गजट (असाधारण) में आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। हालाँकि, इस अधिसूचना पर 15 जुलाई की तारीख दर्ज है। अनुराग कुमार की हाल ही में दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्ति हुई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना औपचारिक आरोप तय किए 12 दिन से लेकर 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। नई अधिसूचना के अनुसार, 19 जुलाई से 18 अक्टूबर तक तीन महीने की अवधि के लिए यह निवारक हिरासत (Preventive Detention) की शक्ति लागू रहेगी। अधिसूचना में कहा गया है कि दिल्ली के उपराज्यपाल को यह यकीन है कि सार्वजनिक सुरक्षा के हित में हिरासत की यह शक्ति सौंपना आवश्यक है।

अधिसूचना में कहा गया है, “राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 2(ई) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 3(3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, दिल्ली के उपराज्यपाल ने निर्देश दिया है कि निर्धारित अवधि के दौरान दिल्ली पुलिस आयुक्त भी कानून की धारा 3(2) के तहत निरोधक प्राधिकारी (Detaining Authority) की शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे।”

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अनुसार, इस अधिकार के तहत दिल्ली पुलिस आयुक्त उन लोगों के खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी कर सकते हैं जिनकी गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा या आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति एवं रखरखाव के लिए हानिकारक मानी जाएँ। इस कानून के तहत सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित प्राधिकरण जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस प्रमुखों को भी निरोधक प्राधिकारी नियुक्त कर सकता है।

पिछले वर्ष 26 सितंबर को लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने एक आदेश जारी किया था जिसके बाद सोनम वांगचुक को NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। उनके आंदोलन के दौरान क्षेत्र में हुई घातक हिंसा के बाद यह कार्रवाई की गई थी। उन्हें 170 दिनों तक हिरासत में रखा गया था।

जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब हिंसक हो गया है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ मारपीट की गई है और पत्थर-बोतलें भी फेंकी गईं। इससे पहले मानसून सत्र के पहले दिन CJP के सदस्य संसद तक मार्च करने के लिए बैरिकेड तोड़ने की कोशिश कर चुके थे जिसके बाद दिल्ली में झड़पें और तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी।

सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधि पहले ही कह चुके हैं कि केंद्र सरकार ने न तो हुई गलती को कम करके दिखाया है और न ही जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार उनकी ‘राजनीतिक’ माँग मानने का कोई इरादा नहीं रखती। एक अधिकारी ने कहा, “समस्या हुई थी। हमने इसे रिकॉर्ड पर स्वीकार किया है और रिकॉर्ड पर ही इसकी जिम्मेदारी भी ली है। सरकार इससे भाग नहीं रही है।”

एक अन्य अधिकारी ने कहा, “हम यह नहीं कह रहे कि लोगों को विरोध नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को विरोध करने का पूरा अधिकार है। लेकिन मुद्दा कौन उठा रहा है, किस तरीके से उठा रहा है और उसके पीछे कौन लोग हैं, ये अलग सवाल हैं। क्या हमें राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाना चाहिए?”

उन्होंने आगे कहा, “जिस व्यवस्था पर हमने भरोसा किया था, उसी के लोगों ने उसे कमजोर कर दिया। हम पेपर माफिया नहीं हैं। व्यवस्था के भीतर के लोगों ने हमें निराश किया, हमने उन पर भरोसा किया था। हमने पेपर लीक की घटना नहीं छिपाई। हमने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की और इसे ठीक करने की कोशिश की।”

दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (23 जुलाई 2026) को आधिकारिक बयान जारी कर उन खबरों का खंडन किया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि राष्ट्रीय राजधानी में चल रहे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रदर्शनों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस आयुक्त को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत विशेष रूप से निवारक हिरासत (Preventive Detention) की शक्तियाँ दी गई हैं।

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि यह एक नियमित आदेश है जिसे हर तीन महीने में रीन्यू किया जाता है। पुलिस ने कहा कि इस आदेश का मौजूदा CJP प्रदर्शनों से कोई संबंध नहीं है। मौजूदा आदेश 7 जुलाई 2026 को जारी किया गया था, जो 19 जुलाई 2026 से 18 अक्टूबर 2026 तक की अवधि के लिए प्रभावी है।

(नोट इस खबर को दिल्ली पुलिस के बयान के बाद अपडेट किया गया है)

NEET पेपर लीक में बिहार के डिप्टी CM विजय सिन्‍हा का खुलासा : तेजस्वी यादव के PS ने सिकंदर यदुवंशी के लिए बुक करवाया कमरा:,अमित आनंद ने 30-32 लाख रूपए में डील कबूला

विजय सिन्हा ने तेजस्वी यादव पर लगाए गंभीर आरोप (फोटो साभार : न्यूज24)
नीट-यूजी पेपर लीक कांड से बिहार की राजनीति में भूचाल आ चुका है। इस पेपर लीक कांड का सरगना जिस सिकंदर यादवेंदु को बताया जा रहा है, वो बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्‍वी यादव के पीएस प्रीतम कुमार का करीबी है। बिहार के डिप्‍टी सीएम विजय सिन्‍हा ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करके खुद इस बात का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि तेजस्वी यादव के पीएस प्रीतम कुमार ने ही सिकंदर के नाम से कमरे की बुकिंग के लिए बार-बार कॉल किए थे। उसी ने मंत्री जी के नाम से बुकिंग कराई थी। तेजस्वी यादव पहले मंत्री रहे हैं, इसलिए अनुराग नाम के अभ्यर्थी के लिए जो कमरा बुक किया गया था, उसकी बुकिंग के आगे ब्रेकट में (मंत्री जी) लिखा है। इस बीच, नीट पेपर लीक घोटाले के अभियुक्तों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने प्रत्येक अभ्यर्थी से 30-40 लाख रुपए की डील की थी।

बिहार के डिप्टी सीएम ने सिलसिलेवार तरीके से बताई कमरे की बुकिंग की कहानी

उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने गेस्ट हाउस की बुकिंग के लिए तेजस्वी यादव के पीएस प्रीतम कुमार और पथ निर्माण विभाग के पदाधिकारी प्रदीप कुमार के बीच बातचीत का रिकॉर्ड भी सामने रखा। उन्होंने मीडिया कर्मियों से कहा, “1 मई को तेजस्वी यादव के निजी सचिव प्रीतम कुमार के मोबाइल नंबर 7488061813 से रात्रि 9 बजकर 7 मिनट में पथ निर्माण विभाग में कार्यरत प्रदीप कुमार के मोबाइल नंबर 9430469924 पर NHAI गेस्ट हाउस में सिकंदर कुमार यादवेंदु के लिए कमरे की बुकिंग कराने के लिए फोन आया था। उस दिन प्रदीप कुमार इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया।”
उन्होंने आगे कहा, “फिर 4 मई सुबह 8.49 मिनट में प्रीतम कुमार के मोबाइल नंबर 7488061813 से प्रदीप कुमार के मोबाइल पर कॉल कर सिकंदर कुमार यादवेंदु के लिए कमरे की बुकिंग के लिए स्मारित किया गया। इस बार पथ निर्माण विभाग में कार्यरत प्रदीप कुमार द्वारा NHAI के गेस्ट हाउस में सिकंदर कुमार के नाम से बुकिंग के लिए पदास्थापित कनीय अभियंता को वॉट्सऐप पर मैसेज भेज दिया। प्रीतम कुमार पहले यहीं पर पीएस थे, जब विभाग के मंत्री थे तेजस्वी यादव, इसीलिए मंत्री शब्द का उपयोग करवा लिए। दोनों अधिकारियों ने ये बात लिखकर दी है।” उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि कमरे के आबंटन के लिए कोई लेटर नहीं मिला है। ये बुकिंग फोन पर हुई, जिसकी जानकारी दी जा चुकी है।
नीट-यूजी पेपर लीक काँड में गिरफ्तार अनुराग यादव ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। उसके साथ कुछ और गिरफ्तार अभ्यर्थियों ने भी अपना गुनाह कबूला है। अनुराग यादव ने बताया है कि उसे उसके फूफा सिंकदर यादवेंदु ने कोटा से बुलाया था और कहा था कि ‘पूरी सेटिंग हो गई है।’

अमित आनंद ने लीक कराया पेपर, सिकंदर लाया अभ्यर्थी

वहीं, नीट घोटाले में शामिल सिकंदर के सहयोगी ने अमित आनंद ने भी अपना गुनाह कबूल कर दिया है। उसने कबूलनामे में कहा कि नीट परीक्षा से एक दिन पहले पेपर लीक हो गया था। परीक्षा से एक दिन पहले अभ्यर्थियों को प्रश्न पत्र रटाए गए थे और प्रश्न पत्र के बदले अभ्यर्थियों से 30-32 लाख रुपये लिए गए थे। उसने यह बात भी कबूली है कि वह पहले भी पेपर लीक कराता रहा है। पेपर लीक का मास्टरमाइंड अमित मुंगेर जिले का रहने वाला है। हालाँकि, वह वर्तमान में पटना के एजी कॉलोनी के एक किराए के फ्लैट में रह रहा था। इस कबूलनामे में उसने बताया है कि किस तरह से उसकी मुलाकात उन छात्रों से हुई, जिन्हें आंसर रटवाए गए थे।

ऐसे कराई गई अभ्यर्थियों को तैयारी

अमित ने अपने बयान में कहा, “मेरी दोस्ती सिकंदर से हुई थी, जो दानापुर नगर निगम कार्यालय में जूनियर इंजीनियर है। मैं अपने एक निजी काम से उससे मिलने गया था। मेरे साथ नीतीश कुमार भी था। बातचीत के सिलसिले में मैंने सिकंदर से कहा था कि मैं किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक कराकर अभ्यर्थियों को पास कराता हूँ। सिकंदर ने इसपर मुझसे कहा कि मेरे पास 4-5 अभ्यर्थी हैं, जो नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें पास करवा दीजिए। बच्चों को पास करने के बदले में मैंने बताया कि 30-32 लाख रुपए लगेंगे। इस पर सिकंदर तैयार हो गया और कहा कि वह 4 अभ्यार्थी की हमें देगा। इसी बीच नीट परीक्षा की तारीख आ गई। सिकंदर ने पूछा लड़कों को कब लाना है। मैंने कहा कि पाँच मई को परीक्षा है। चार मई की रात को अभ्यर्थियों को लेकर आना। चार मई की रात में नीट परीक्षा का क्वेश्चन पेपर लीक करवाकर सभी अभ्यर्थियों को उत्तर के साथ पढ़ाया-रटवाया जा रहा था।”
पुलिस को दिए कबूलनामे में मास्टरमाइंड अमित आनंद ने बताया, “सिकंदर को पुलिस ने पकड़ लिया और फिर उसकी निशानदेही पर हम लोग भी पकड़ गए। हमारे किराए वाले फ्लैट से पुलिस को नीट समेत अलग-अलग एग्जाम का एडमिट कार्ड, नीट का प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका का जला हुआ अवशेष बरामद हुआ है। पुलिस ने इसे जब्त कर लिया है। मैंने पहले भी पेपर लीक करवाए हैं। मैं अपने अपराध को कबूल करता हूँ।”
अब तक इस मामले में 13 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, जिसमें 4 अभ्यर्थी भी हैं। इस मामले में सिकंदर की संलिप्तता के बाद बिहार में राजनीतिक भूचाल भी आ गया है। बिहार के उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने आरोप लगाया है कि सिकंदर तेजस्वी यादव का करीबी है। इस मामले में तेजस्वी यादव के पीएस की भी अहम भूमिका है।


NEET पर जिस आयुषी पटेल के दावों को प्रियंका गाँधी ने दी हवा, उसके दस्तावेज फर्जी: कहा था- NTA ने रिजल्ट नहीं दिया, हाई कोर्ट में झूठी साबित हुई

आयुषी पटेल (बाएँ) का वीडियो प्रियंका गाँधी ने भी साझा किया था (साभार : Sunday Gurdian & @Horizonnews07)
लखनऊ की रहने वाली एक छात्रा आयुषी पटेल ने हाल ही में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पर आरोप लगाया गया था कि एजेंसी ने उनका NEET परीक्षा का परिणाम जारी नहीं किया। आयुषी का आरोप था कि उनकी OMR शीट को NTA द्वारा फटा बताया गया। इसको लेकर आयुषी पटेल ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका भी दाखिल की थी। अब आयुषी पटेल के सभी आरोप कोर्ट में झूठे साबित हुए हैं। आयुषी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर NTA पर यह आरोप लगाए थे।

मंगलवार (18 जून, 2024) को इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस मामले पर हुई सुनवाई में आयुषी पटेल झूठी साबित हुई हैं। NTA ने आयुषी पटेल की असली OMR शीट भी कोर्ट के सामने रख दी जिसे आयुषी ने भी स्वीकार किया। इस OMR शीट के अनुसार, आयुषी के 720 में से 355 नम्बर हैं।

 इलाहाबाद हाई कोर्ट में झूठी साबित होने के बाद आयुषी पटेल ने अपनी याचिका भी वापस लेने का अनुरोध किया। कोर्ट ने NTA को छूट दी है कि वह आयुषी पटेल के खिलाफ नियमानुसार एक्शन ले। कोर्ट ने यह याचिका भी खारिज कर दी। आयुषी पटेल के खिलाफ धोखाधड़ी का भी मामला बन रहा है।

दरअसल, NEET परिणाम जारी होने के बाद आयुषी पटेल ने दावा किया था कि उसका परिणाम नहीं जारी किया। आयुषी ने दावा किया था कि जब उन्होंने इस संबंध में NTA को इमेल भेज कर शिकायत की तो उन्हें एक फटी OMR शीट की फोटो भेजी गई और इसी आधार पर उनका परिणाम रोक लिया गया। आयुषी ने इसके बाद एक वीडियो बनाया था जो कि सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। आयुषी पटेल के लिए न्याय की माँग की जा रही थी।

NTA ने इसको लेकर स्पष्ट किया था कि उसने आयुषी पटेल को कोई OMR शीट नहीं भेजी है। दूसरी तरफ आयुषी ने जिस फटी OMR शीट के आधार पर NTA पर आरोप लगाए थे उसका नम्बर और आयुषी पटेल की असली OMR शीट का नम्बर भी अलग निकला।

कोर्ट में भी यह बात कही गई कि आयुषी ने NTA की तरफ से सामने रखी गई OMR शीट को अपनी माना है लेकिन वह फिर भी दूसरे नम्बर वाली OMR शीट के आधार पर अपना परिणाम ना दिए जाने का दावा कर रही थीं। आयुषी पटेल ने कोर्ट के समक्ष यही फर्जी दस्तावेज रख कर याचिका लगाई थी।

आयुषी पटेल ने इन्हीं फर्जी दस्तावेजों के आधार NTA NEET परीक्षा में घोटाले का आरोप लगाया था और खूब सिम्पथी बटोरी थी। आयुषी पटेल का वीडियो कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने भी बिना तथ्यों का मिलान किए एक्स पर डाला था। प्रियंका गाँधी ने इसके जरिए सरकार पर हमला बोला था। हालाँकि, अब जब आयुषी पटेल का दावा झूठा निकला है, तब उन्होंने कोई भी ट्वीट नहीं किया।

गौरलतब है कि हाल ही में NEET परीक्षा का परिणाम NTA ने जारी किया था। इसको लेकर देश भर के कई छात्रों ने प्रश्न उठाए थे। कुछ जगहों पर परीक्षा के दौरान गड़बड़ी की शिकायतें आई थीं। इस मामले को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

केरल : ‘3 घंटे बिना ब्रा के दी NEET की परीक्षा, अंत में कहा – हाथ में लेकर निकल जाओ’

                                       केंद्र और महिला आयोग हरकत में (तस्वीर- न्यूज़ मिनट)
मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के दौरान केरल के कोल्लम में एग्जास हॉल में जाने से पहले चेकिंग के नाम पर कुछ छात्राओं के ब्रा उतरवाने की घटना को लेकर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। जहाँ शिक्षा मंत्रालय ने एग्जाम बाद से उभरे इस मामले में NTA से रिपोर्ट माँगी है। वहीं NTA ने पुलिस में दी गई शिकायत को ‘मनगढ़ंत’ और ‘गलत इरादे’ से की गई बताया है। फ़िलहाल NTA ने इलाके का दौरा करने से एक कमिटी का गठन किया है, जो तथ्यों का पता लगाएगी। वहीं इस मामले में महिला आयोग भी कार्रवाई के लिए पत्र लिख चुका है।

केरल के कोल्लम में NEET एग्जाम सेंटर पर सख्ती के नाम पर करीब 100 से अधिक छात्राओं को अपने ब्रा उतारने के लिए मजबूर किया गया। इसको लेकर अब छात्राओं के परिजनों ने पुलिस में मामला दर्ज कराया है। जबकि कोल्लम के मोर्थम इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलेजी ने छात्राओं के आरोपों से इनकार किया है।

इस मामले में केरल पुलिस को अब तक तीन शिकायतें मिलीं हैं। जिसमें से एक केरल के कोल्लम जिले में 17 वर्षीय लड़की के पिता गोपकुमार सूरनाद ने दर्ज कराई है। उन्होंने TNM से बात करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी शिकायत में कहा है कि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा जारी आधिकारिक सूचना बुलेटिन में धातु के हुक वाली ब्रा पर किसी प्रतिबंध का उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि जब उनकी बेटी ने अपने इनरवियर को हटाने से इनकार कर दिया, तो उन्हें परीक्षा न देने के लिए कहा गया। मेरी बेटी लंबे समय से इस परीक्षा की तैयारी कर रही थी। लेकिन वह ठीक से परीक्षा भी नहीं लिख पा रही थी। वह दुखी होकर रोती हुई हमारे पास लौट आई। उन्होंने आगे बताया कि सेंटर पर अनिवार्य रूप से छात्राओं से अपने इनरवियर को हटाने के लिए कहा गया था। बच्चे बहुत असहज थे। उनमें से कई रो रहे थे। अगर ऐसा है तो वे फ्रिस्किंग के दौरान इनरवियर चेक कर सकते हैं। लेकिन उन्हें क्यों हटाएँ? NEET बुलेटिन में ऐसे कोई नियम नहीं हैं।

वहीं NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित छात्रा ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, “उन्होंने मुझसे पूछा, क्या आपने मेटल हुक इनरवियर पहना है? मेरे हाँ कहने पर उन्होंने मुझे अलग लाइन में खड़ा कर दिया।”

लड़की ने कहा कि उसे समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। इसके बाद बाद उन्होंने मुझे इनरवियर उतारकर मेज पर रखने को कहा। सारी इनरवियर एक साथ रखी गई थीं। हमें ये तक नहीं पता था कि हमें ये वापस मिलेंगी भी या नहीं। हम जब एग्जाम देकर लौटे तो बहुत भीड़ थी। धक्का-मुक्की हुई लेकिन मुझे अपनी इनरवियर वापस मिल गई।”

पीड़िता ने आरोप लगाया, “उन्होंने हमसे अपनी इनरवियर हाथ में लेकर वहाँ से जाने को कहा, उन्होंने कहा कि इसे यहाँ पहनने की जरूरत नहीं है। हम यह सुनकर हम बहुत शर्मिंदा हुए। यह बहुत भयानक अनुभव था। जब हम एग्जाम हॉल में लिख रहे थे तब हमने अपने बालों से सीना ढका। वहाँ लड़के-लड़कियाँ दोनों थे। यह बहुत ही कठिन और असहज स्थिति थी।”

राष्ट्रीय महिला आयोग ने लिया संज्ञान

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस संगीन प्रकरण को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग शर्मनाक करार दे चुका है। एनसीडब्ल्यू की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने एनटीए को पत्र लिखकर आरोपों की स्वतंत्र जाँच की माँग की है। इस घटना के सामने आने के बाद केरल के उच्च शिक्षा मंत्री आर बिंदू ने भी इस घटना को ‘अमानवीय और चौंकाने वाला’ करार दिया और केंद्र से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।
वहीं NBT की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में एनटीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमें कोई शिकायत अथवा प्रतिवेदन नहीं मिला है। मीडिया रिपोर्ट में किए गए दावों के आधार पर केन्द्र के अधीक्षक तथा पर्यवेक्षक से तत्काल रिपोर्ट माँगी गई है।” उन्होंने आगे यह भी कहा कि हमें बताया गया है कि इस प्रकार की कोई घटना नहीं हुई है और दर्ज कराई गई शिकायत ‘मनगढ़ंत’ और ‘गलत इरादे’ से की गई है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, छात्राओं ने दावा किया है कि रविवार को जब वे परीक्षा देकर बाहर निकलीं तो उन्हें सारे अंडरगारमेंट्स डिब्बों में एक साथ फेंके हुए मिले। जबकि केरल के मार्थोमा इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में स्थित अयूर चदायमंगलम केंद्र ने यह कहते हुए जिम्मेदारी लेने से इनकार किया है कि छात्राओं की तलाशी और बायोमेट्रिक जाँच बाहरी एजेंसियों द्वारा की गई थी।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के अधिकारियों के अनुसार, मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में रविवार को करीब 95 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की गई थी, जिसके लिए इस साल सबसे ज्यादा आवेदन आए थे। कुल 18,72,329 उम्मीदवारों ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के लिए पंजीकरण कराया था, जिनमें से 10.64 लाख छात्राएँ थीं।