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बिहार : कांग्रेस की मान्यता समाप्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका; SIR पर राहुल गाँधी का एक और प्रोपेगेंडा हुआ ध्वस्त: जिस अमन ने की थी ‘गरीबों’ के नाम हटाने की शिकायत, मांग ली माफ़ी

अमन ने वीडियो जारी कर माँगी माफी और वोट अधिकार यात्रा में राहुल गाँधी (साभार- X-@politics pecharcha/The Hindu)
जब से राहुल गाँधी राजनीति तो नहीं सियासत में सक्रिय हुए है तभी से अटकलों का बाजार बहुत गर्म था कि राहुल कांग्रेस के बहादुरशाह ज़फर साबित होंगे। और अब शायद इसका समय आ गया है। जिस तरह से राहुल संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कर रहे हैं उसके मद्देनज़र कल समाचार था कि कांग्रेस की मान्यता समाप्त करने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज हो गयी है। जो कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का दम भरती हो उसकी मान्यता पर प्रश्नचिन्ह लगना कोई छोटी बात नहीं। और इस प्रश्नचिन्ह का जिम्मेदार सिर्फ गाँधी परिवार है। 

इस गाँधी परिवार ने देश को अपनी जागीर समझ जो मन में आया दूसरे को अपमानित कर अपनी शान समझता है। इस परिवार की निगाह में किसी नेता तो क्या किसी संवैधानिक संस्था का कोई महत्व नहीं। जो सोनिया गाँधी से लेकर राहुल गाँधी तक साफ देखा जा सकता है। और SIR पर राहुल द्वारा परोसा जाने वाला झूठ, जो सूरज ढलने से पहले ही बेनकाब हो रहा है। चुनाव आयोग को धमकियां, जैसे चुनाव आयोग परिवार का गुलाम हो। क्या ये सब? 

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और राजद नेता तेजस्वी यादव ने जोर शोर से बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली, SIR पर जमकर लोगों को भड़काया। अनर्गल बातें फैलाईं। अब उनके एक-एक झूठ की कलई खुल करल सामने आती जा रही है।

ताजा मामला एक वायरल वीडियो का है। वीडियो में रफीगंज निवासी अमन कुमार से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव ने पूछा कि वह SIR के बारे में क्या जानते हैं। इस पर अमन ने कहा कि इसका मतलब है कि गरीबों का नाम वोटर्स लिस्ट से हटा दिया जाएगा।

असल में उसकी शिकायत थी कि उसके पिता रजाक का नाम लिस्ट से हटा दिया गया। अमन ने तो राहुल गाँधी के सामने ये तक कह दिया कि आगे चलकर गरीबों से मतदान करने का अधिकार छीन लिया जाएगा।

अमन के बयान के बाद राहुल गाँधी ये कहा, “बिल्कुल, यही हो रहा है।”

खुल गई पोल

वीडियो वायरल हुआ तो स्थानीय प्रशासन और चुनाव आयोग ने अमन की शिकायत की जाँच की। इसमें पता चला कि रजाक के साथ अमन का भी का नाम वास्तव में वोटर लिस्ट में मौजूद था। प्रशासन ने अमन से इस पर सवाल पूछे तो उसने कहा कि लिस्ट उसने चेक ही नहीं की थी।

इसके बाद अमन कुमार ने वीडियो बनाकर ही सार्वजनिक रूप से माफी माँगी और कहा कि उसे गलत जानकारी मिली थी।

अमन ही नहीं, राहुल ने अलग अलग क्षेत्रों से कई लोगों से ये कहलवाया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से गायब है। नहाटा के चकला गाँव की एक महिला को भी ये कहकर वोट अधिकार यात्रा में शामिल किया गया कि उसके घरवालों के नाम सूची में नहीं हैं। उसे वह राहुल गाँधी से मिल कर जुड़वा सकती हैं। बाद में पता चला कि उसके घरल के सभी लोगों का नाम लिस्ट में शामिल है।

प्रशासन के पूछे जाने पर महिला ने बताया कि उसे जबरन बुलाया गया था। उसे सही जानकारी नहीं थी।

जबरन मुद्दा बनाने की कोशिश

असल में राहुल गाँधी इस यात्रा के जरिए मतदाता सूची में गड़बड़ी होने की बात उठाना चाह रहे थे, जो असल में हुई नहीं। राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को ‘वोट चोरी’ की साजिश बताया था और दावा किया था कि देशभर में गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं।

चुनाव आयोग ने भी इस पूरे मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और स्पष्ट रूप से कहा कि SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया का उद्देश्य मृत या फर्जी नामों को हटाना है, न कि गरीबों या अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग की प्रक्रिया को सही ठहराया और कहा कि आधार कार्ड को वोटर सत्यापन के लिए अनिवार्य नहीं माना गया है।

चुनाव आयोग ने कहा ता कि वोटर लिस्ट से 65 लाख लोगों के नाम हटाए गए हैं। इन्हीं 65 लाख कटे नामों के सहारे राहुल गाँधी राजनीतिक संजीवनी खोजने की कोशिश कर रहे थे। हालाँकि उनका असर लोगों पर नहीं दिख पा रहा है क्योंकि लगभग सभी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।

इसके बाद कांग्रेस नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलीभगत करके, लाखों फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए हैं। इस पर भी चुनाव आय़ोग ने उनके एक एक आरोपों का तथ्य सहित जवाब पेश कर दिया।

नाम हटाने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पटना से दिल्ली तक एसआईआर के खिलाफ बवाल खड़ा करने की कोशिश की। गले फाड़-फाड़ कर लिस्ट में गड़बड़ी का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन आयोग के बार बार पूछे जाने के बावजूद ये नहीं बता पा रहे कि उन्हें आखिर आपत्ति किस बात पर है?

सासाराम में भी यात्रा के दौरान उन्होंने वोट चोरी और मतदाता के हक की बात दोहराते रहे लेकिन यहाँ पर भी लोगों ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया। ऐसे में झूठी शिकायतों के सहारे वे लोगों का बरगलाने का प्रयास तो कर सकते हैं पर सफल नहीं हो सकते।

‘तमिलनाडु की चुनावी प्रक्रिया में दखल दे रहे बिहारी’: P चिदंबरम ने बिहारियों के लिए घृणा से दिखाई कश्मीर के 370 वाली सोच; आरजेडी की चुप्पी यानी राहुल गाँधी की गुलामी?

                      पी चिदंबरम और नफरत की राजनीति की प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: ChatGPT)
कांग्रेस वो जहरीला सांप है जो कभी जहर उगलने से बाज नहीं आता। जनता को किसी न किसी बहाने उलझा कर रख देश की एकता का स्वांग रच अपनी कुर्सी को बचाए रखो। लेकिन कांग्रेस प्रारम्भ से लेकर अब तक जनता की नब्ज को पढ़ने में जीरो साबित हो रही है। 2014 में मोदी सरकार बनने से पहले जनता के पास कमजोर विपक्ष होने के कारण कोई विकल्प नहीं होने की वजह से कांग्रेस के चुंगल से बाहर नहीं निकल सकी। अब मजबूत विकल्प होने पर भी कांग्रेस वही अपनी पुरानी नफरत वाली खूंसट सियासत से बाहर नहीं आ रही। यही खूंसट सोंच कांग्रेस को नीचे धकेल रही है। बाकि कांग्रेस को धरती में धाँसने में राहुल और गाँधी परिवार कमर तोड़ मेहनत कर ही रहा है।  

कांग्रेस के बड़े नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने एक ट्वीट करके तमिलनाडु में रहने वाले ‘बाहरियों’ खासकर बिहार के लोगों को नीचा दिखाने का काम किया है। उन्होंने तमिलनाडु में रहने वाले बिहारी प्रवासी मजदूरों को ‘बाहरी’ बताकर उनके वोटर बनने के हक पर सवाल उठाए। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘गैरकानूनी और खतरनाक’ है।

चिदंबरम ने बिहार में 65 लाख वोटरों के नाम कटने का खतरा होने की बात कही। उनके ट्वीट का लहजा ऐसा है, जैसे बिहारी मजदूर तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही न हो।

चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर और उनके ‘स्थाई घर’ को बिहार बताकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाई। ये बातें सुनने में तो चुनावी नियमों की चिंता जैसी लगती हैं, लेकिन असल में ये बिहारियों को बाहरी और खतरे के रूप में दिखाने की कोशिश थी। वैसे भी, यह कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काकर वोट की राजनीति करता रहा है। चिदंबरम का ये बयान उसी पुरानी चाल का हिस्सा है, जिसे कांग्रेस और उसके सहयोगी चुपचाप बढ़ावा देते रहे हैं।

चिदंबरम ने की बिहारियों को नीचा दिखाने की कोशिश

चिदंबरम ने 3 अगस्त 2025 को X पर ट्वीट किया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘खतरनाक और गैरकानूनी’ है। उन्होंने सवाल उठाया कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों बन रहे हैं, जब उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है। उन्होंने छठ पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि ये मजदूर बिहार लौटते हैं, तो फिर तमिलनाडु में वोटर बनने का क्या हक? चिदंबरम ने इसे चुनाव आयोग की साजिश बताकर तमिलनाडु के ‘चुनावी चरित्र’ को बदलने का आरोप लगाया।

ये बातें सुनने में तो तकनीकी लगती हैं, लेकिन इनका असली मकसद बिहारियों को तमिलनाडु में बाहरी और अनचाहा दिखाना था। चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर उनकी पहचान को सिर्फ मजदूरी तक सीमित कर दिया, जैसे वे तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही नहीं हैं। यह न सिर्फ बिहारियों का अपमान है, बल्कि भारत के संविधान का भी उल्लंघन है, जो हर नागरिक को देश में कहीं भी रहने, काम करने और वोट देने का हक देता है। चिदंबरम का ये बयान बिहारियों को दोयम दर्जे का नागरिक बताने की कोशिश है।

बिहारी क्यों नहीं, जब राहुल को हक है?

चिदंबरम का बयान और कांग्रेस की नीति तब और हास्यास्पद हो जाती है, जब हम राहुल गाँधी की बात करते हैं। राहुल गाँधी दिल्ली के स्थाई निवासी हैं, लेकिन वे केरल के वायनाड और उत्तर प्रदेश के अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ चुके हैं। अगर राहुल गाँधी दिल्ली में रहकर दूसरे राज्यों में वोटर बन सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं, तो बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों नहीं बन सकते? क्या नियम सिर्फ बिहारियों के लिए अलग हैं?

भारत का कानून साफ कहता है कि कोई भी नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। इसके लिए फॉर्म 6 भरना होता है, जिसमें निवास स्थान बदलने की अर्जी दी जाती है। और ये जरूरी नहीं कि आपके पास अपना मकान हो। किराए के घर में रहने वाला भी वोटर बन सकता है।

चिदंबरम और कांग्रेस ये बात अच्छे से जानते हैं, लेकिन फिर भी बिहारियों को ‘स्थायी रूप से बसे हुए’ कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। ये लोग भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दों से बिहारियों को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहारी इतने भोले नहीं हैं।

जेडीयू के प्रवक्ता और विधान परिषद के सदस्य नीरज कुमार ने चिदंबरम के ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया दी। नीरज कुमार ने कहा, “कांग्रेस पार्टी का आज जो हश्र है, वो क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान न करने की वजह से है। क्षेत्रीय भावनाओं के उभार के साथ कांग्रेस का समर्थन कम होता गया। कांग्रेस ने अपने राज्य में असमान विकास किया। बिहार के साथ भेदभाव किया। अब इनकी स्थिति ये है कि ये देश में संविधान को खतरा बनाते हैं। ये चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जो लोग तमिलनाडु या किसी भी अन्य राज्य में रहते हैं, वो वहाँ के वोटर बनते हैं। ये सामान्य है। बिहार में रहने वाली तमिलनाडु की नर्सें भी वोटर रही हैं, लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया। ये तो इंडी गठबंधन सुविधा की बात हुई। राहुल गाँधी कहीं से भी चुनाव लड़ लें… आरजेडी किसी को हरियाणा से लाकर राज्यसभा भेज देती है। लेकिन बिहार का नाम आते ही ये लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।”

नीरज कुमार ने आगे कहा, “बिहार SIR में तेजस्वी यादव के नाम 2 EPIC नंबर मिले हैं। अब उन्होंने चुप्पी साध ली है। क्या राहुल गाँधी का यही परमाणु बम था, तेजस्वी यादव ने अपने सर पर फोड़ा?” उन्होंने कहा कि कांग्रेस का मूल चरित्र सुविधा के हिसाब से बदलने का है। बिहार बोझ किसी का नहीं है, वो बोझ उठाने वाले लोग हैं। चंपारण के सत्याग्रह से लेकर आजादी की लड़ाई में बिहार का योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि चिदंबरम जैसे लोग जो कह रहे हैं, वो बैकवर्ड राज्यों के लिए उनकी घृणा दिख रही है।

इंडी गठबंधन का बिहार विरोधी रवैया

चिदंबरम का बयान कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों को निशाना बनाकर राजनीति करता रहा है। 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) ने बिहारी प्रवासियों को बीजेपी का समर्थक बताकर बंगाली अस्मिता के खिलाफ खड़ा किया। ममता बनर्जी ने हिंदी भाषी प्रवासियों खासकर बिहारियों को ‘बाहरी’ कहकर बंगाल की जनता को भड़काया। इस दौरान बिहारियों के योगदान को नजरअंदाज किया गया, जो कोलकाता से लेकर छोटे शहरों तक मेहनत करके बंगाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र में इंडी गठबंधन का हिस्सा शिवसेना ‘मराठी माणूस’ के नाम पर बिहारियों को निशाना बनाती रही है। 2000 के दशक में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई और अन्य शहरों में बिहारी मजदूरों पर हमले किए, उन्हें नौकरियाँ छीनने वाला बताया। मारवाड़ी और गुजरातियों को भी निशाना बनाया गया, लेकिन बिहारी सबसे आसान शिकार थे। कांग्रेस ने इन हमलों पर चुप्पी साधे रखी। यह दिखाता है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी बिहारियों के खिलाफ नफरत को चुपचाप बढ़ावा देते हैं।

आरजेडी की चुप्पी यानी राहुल गाँधी की गुलामी?

बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) चिदंबरम के बयान पर चुप्पी साधे हुए है। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी RJD जो सामाजिक न्याय की बात करती है, वो इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं।
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ने पी चिदंबरम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “चिदंबरम का बयान बिहारियों के लिए अपमानजनक है। वे हमें दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं। कांग्रेस को माफी माँगनी चाहिए और आरजेडी की चुप्पी बिहार के गौरव के साथ धोखा है।” उन्होंने कहा कि बिहारी मजदूर देश भर में मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें बार-बार अपमान सहना पड़ता है।
जदयू के मुख्य प्रवक्ता राजीव रंजन ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “बिहार के लोगों ने देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने खून पसीने से सींचा है। अगर वो तमिलनाडु में लंबे समय से हैं, और वहाँ की वोटिंग प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो इससे चिदंबरम या किसी को तकलीफ क्यों हो?”
उन्होंने कहा कि चिदंबरम और कांग्रेस का मकसद चुनाव को बिहारी वर्सेज बाहरी बनाने की है। जो कि पूरी तरह से गलत है। ऐसा कांग्रेस पार्टी लगातार कर रही है। उन्होंने कहा कि SIR पर कांग्रेस और सहयोगी दल ऊल-जलूल बयानबाजी करके सिर्फ राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं, जबकि ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक में है और सुप्रीम कोर्ट ने खुद SIR को हरी झंडी दी है।
राजीव रंजन ने कहा, “चिदंबरम का बयान कांग्रेस की दोहरी नीति को दिखाता है। ये लोग गरीबों की बात करते हैं, लेकिन बिहारी मजदूरों को राजनीतिक बोझ मानते हैं। आरजेडी की चुप्पी बताती है कि वे बिहार के लोगों से ज्यादा राहुल गाँधी के वफादार हैं।”
आरजेडी की चुप्पी इसलिए और दुखद है, क्योंकि ये वही पार्टी है जो बिहार में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के हक की बात करती है। लेकिन जब उनके अपने लोग, बिहारी मजदूर, अपमानित हो रहे हैं, तो आरजेडी राहुल गाँधी के सामने सिर झुकाए खड़ी है। ये बिहार के लोगों के साथ गद्दारी है।
हालाँकि बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ ने चिदंबरम के बयान का ये कहकर बचाव किया कि चुनाव आयोग आरएसएस के इशारे पर ऐसे काम कर रहा है, जिसमें गैर-कानूनी तरीके से बाहरी लोगों को वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाता है। कुछ खास वर्ग के लोगों के नाम हटाए जाते हैं, जबकि कुछ खास लोग हर चुनाव में राज्य बदलते हैं।
असित नाथ ने कहा कि बिहार के मजदूर धान की रोपाई-कटाई या खेती के कामों से बाहर जाते हैं, लेकिन बाद में लौट आते हैं। किसके पास इतनी फुरसत है कि वो वहाँ का वोटर बने? असित नाथ ने SIR की गड़बड़ियाँ भी गिनाई। उन्होंने ये भी कहा कि खुद उनकी पत्नी का नाम SIR की लिस्ट में नहीं है, जबकि लोकसभा चुनाव में उन्होंने वोट डाला था। अगर आखिरी लिस्ट में पत्नी का नाम नहीं आता, तो वो कोर्ट का रुख करेंगे। हालाँकि उन्होंने चिदंबरम के बिहार के मजदूरों को लेकर दिए बयान पर सीधे-सीधे कोई विरोध नहीं किया, भले ही वो बिहार कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता हैं।

बिहारी मजदूर है देश की रीढ़, फिर भी निशाना

बिहारी प्रवासी मजदूर देश के हर कोने में मेहनत करते हैं। 2018 में गुजरात में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म की अफवाह के बाद बिहारी मजदूरों पर हमले हुए। करीब 50,000 मजदूरों को गुजरात छोड़कर भागना पड़ा। 2023 में तमिलनाडु में भी ऐसी अफवाहें फैलीं कि बिहारी मजदूरों पर हमले हो रहे हैं। हालाँकि डीएमके सरकार ने इन अफवाहों को खारिज किया और मजदूरों को सुरक्षा का भरोसा दिया, लेकिन चिदंबरम का ताजा बयान फिर से बिहारियों को निशाना बनाने का काम कर रहा है।
तमिलनाडु में करीब 10 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं, जिनमें ज्यादातर बिहारी हैं। ये लोग टेक्सटाइल उद्योग, निर्माण कार्य और छोटे-मोटे व्यवसायों में योगदान देते हैं। बिहारी मजदूर सिर्फ मजदूर नहीं हैं; कई उद्यमी, शिक्षक और कुशल पेशेवर भी हैं। फिर भी चिदंबरम जैसे नेता उन्हें सिर्फ ‘मजदूर’ कहकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। यह न सिर्फ अपमानजनक है, बल्कि देश की एकता के लिए भी खतरनाक है।

चिदंबरम का तर्क कानूनी और नैतिक रूप से भी गलत

चिदंबरम का ये कहना कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर नहीं बन सकते क्योंकि उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है, कानूनी रूप से गलत है। भारत का संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 कहता है कि कोई भी भारतीय नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। अगर कोई बिहारी मजदूर सालों से तमिलनाडु में रह रहा है, तो वह वहाँ वोटर बनने का हकदार है। चिदंबरम का इसे ‘गैरकानूनी’ कहना कानून की गलत व्याख्या है।
छठ पूजा का जिक्र करके चिदंबरम ने बिहारियों को अस्थाई निवासी दिखाने की कोशिश की। लेकिन छठ पूजा के लिए बिहार लौटना कोई सबूत नहीं कि वे तमिलनाडु में स्थायी रूप से नहीं रहते। क्या तमिलनाडु कोई अलग देश है, जहाँ बाहरी लोग बस नहीं सकते? यह तर्क जम्मू-कश्मीर के पुराने आर्टिकल 370 जैसा लगता है, जो बाहरी लोगों को वहाँ बसने से रोकता था।

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे पी चिदंबरम

चिदंबरम का बयान ऐसे समय में आया है, जब बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ चल रही हैं। वोटर लिस्ट की सफाई को लेकर विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। लेकिन चिदंबरम ने इसे तमिलनाडु बनाम बिहार का मुद्दा बनाकर 2026 के तमिलनाडु चुनावों के लिए क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काने की कोशिश की। यह रणनीति न सिर्फ बिहारियों को तमिलनाडु में अलग-थलग कर सकती है, बल्कि राज्यों के बीच तनाव भी बढ़ा सकती है।
कांग्रेस और राहुल गाँधी की अगुवाई वाला इंडी गठबंधन बार-बार ऐसी राजनीति करता है, जो देश को बाँटने का काम करती है। एक तरफ वे ‘एकता में विविधता’ की बात करते हैं, दूसरी तरफ चिदंबरम जैसे नेता बिहारियों को बाहरी बताकर नफरत फैलाते हैं। आरजेडी की चुप्पी इस बात का सबूत है कि वह बिहार के हितों से ज्यादा गठबंधन की राजनीति को तरजीह दे रही है।

जहर फैलाने वालों को जवाबदेह बनाने की जरूरत

पी. चिदंबरम का बयान सिर्फ चुनाव आयोग की आलोचना नहीं, बल्कि बिहारी मजदूरों को अपमानित करने की कोशिश है। उन्हें तमिलनाडु में बाहरी और खतरे के रूप में दिखाकर वह क्षेत्रीय नफरत को हवा दे रहे हैं। कांग्रेस का ये दोहरा चरित्र, जहाँ राहुल गाँधी खुद दूसरे राज्यों से चुनाव लड़ते हैं, लेकिन बिहारियों को वोट देने का हक नहीं दिया जाता.. बेहद शर्मनाक है। इंडी गठबंधन का बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काने का इतिहास और आरजेडी की चुप्पी इस बात को और गंभीर बनाती है।
बिहारी मजदूर देश की रीढ़ हैं। वे करदाता हैं, वोटर हैं और भारत के विकास में हिस्सेदार हैं। उन्हें सम्मान मिलना चाहिए, न कि अपमान। चिदंबरम और कांग्रेस को अपने बयान के लिए माफी माँगनी चाहिए। आरजेडी को भी फैसला करना होगा कि वह बिहार के लोगों के साथ है या राहुल गाँधी की गुलामी करेगी। भारत की एकता को बनाए रखने के लिए ऐसे नेताओं को जवाबदेह बनाना जरूरी है।

एफेडेविट देना होगा या माफ़ी मांगे : ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर चुनाव आयोग ने कांग्रेस को दिया करारा जवाब : पूछा, जब राजनैतिक दलों को पहले ही मिल जाती है वोटर लिस्ट, तब गलती क्यों नहीं बताई


चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट पर उठे सवालों का खुलकर बड़ी बेबाकी से जवाब दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने जिस तरह वोटर लिस्ट पर फैलाए जा रहे जहर का जवाब देने से कांग्रेस और INDI गठबंधन के पेटों में जरूर मरोड़ होनी शुरू हो गयी है। आयोग ने कहा कि कुछ विपक्षी दल (कांग्रेस) अब गलतियों का आरोप लगा रहे हैं। ये गलतियाँ पहले क्यों नहीं बताई गईं? राजनीतिक दलों को वोटर लिस्ट की जाँच के लिए काफी समय दिया गया था। उन्हें लिस्ट की कॉपी भी मिलती थी। अगर कोई गलती थी तो उन्हें समय रहते शिकायत करनी चाहिए थी।

चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया पारदर्शी होती है। इसमें सभी दल शामिल होते हैं। चुनाव आयोग रविवार (17 अगस्त 2025) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करेगा, जिसमें वह इस मुद्दे पर और जानकारी देगा।

सही समय पर उठानी थी आपत्तियाँ

ECI का कहना है कि वोटर लिस्ट से जुड़ी आपत्तियाँ ड्राफ्ट प्रकाशन के समय उठानी चाहिए थी। उस समय दावों और आपत्तियों के लिए एक महीना दिया गया था। वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद, इसकी डिजिटल और फिजिकल कॉपी सभी राजनीतिक दलों को दी जाती है।

साथ ही, इसे आयोग की वेबसाइट पर भी डाला जाता है ताकि कोई भी इसे देख सके। ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद, मतदाताओं और राजनीतिक दलों को आपत्ति और सुधार के लिए एक महीने का पूरा समय मिलता है। इस दौरान, वे किसी भी गलती को सुधारने के लिए आवेदन कर सकते थे।

वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया

भारत में चुनाव के लिए वोटर लिस्ट बनाना एक तय प्रक्रिया है। यह काम कई स्तरों पर किया जाता है। वोटर लिस्ट बनाने की जिम्मेदारी SDM स्तर के अधिकारियों की होती है। इन्हें ERO यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर कहा जाता है। ये अधिकारी बूथ-लेवल ऑफिसर (BLO) की मदद लेते हैं।

इनका काम होता है कि वोटर लिस्ट सही और पूरी हो। हर योग्य वोटर का नाम उसमें हो। चुनाव आयोग इन अधिकारियों को साफ निर्देश देता है। इन्हीं निर्देशों के आधार पर लिस्ट तैयार की जाती है।

गलती होने पर की जाती है अपील

अगर किसी को अंतिम वोटर लिस्ट में भी कोई गलती लगती है, तो वह शिकायत कर सकता है। पहली अपील जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास की जा सकती है। अगर बात नहीं बनती, तो दूसरी अपील राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) के पास की जा सकती है।

चुनाव आयोग ने कहा कि आपत्ति दर्ज करने का सही समय ड्राफ्ट लिस्ट के बाद था। उस समय सभी को एक महीना दिया गया था। अब कुछ पार्टियाँ और लोग पुरानी लिस्ट की गलतियों पर सवाल उठा रहे हैं। अगर ये बातें सही समय पर कही जातीं, तो SDM या ERO उन्हें ठीक कर सकते थे।

साफ-सुथरी वोटर लिस्ट जरूरी- चुनाव आयोग

चुनाव आयोग ने कहा है कि वह वोटर लिस्ट की जाँच का स्वागत करता है। आयोग ने कहा कि हर पार्टी और हर मतदाता को वोटर लिस्ट देखनी चाहिए। अगर कोई गलती दिखे तो समय पर बतानी चाहिए। इससे SDM और ERO को गलती ठीक करने में मदद मिलेगी।

इस कार्य से वोटर लिस्ट और सही और साफ बन सकेगी। आयोग का मानना है कि साफ-सुथरी वोटर लिस्ट बहुत जरूरी है। सही लिस्ट ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।