Showing posts with label anti-hindu propaganda. Show all posts
Showing posts with label anti-hindu propaganda. Show all posts

गुजरात : बेकार है सत्यनारायण व भागवत कथा, विज्ञान के खिलाफ है’ : गोपाल इटालिया, AAP के प्रदेश अध्यक्ष

मुस्लिम वोट के लिए अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी कितना नीचे गिर सकती है, यह दिल्ली में हिन्दू-विरोधी दंगे के बाद अब गुजरात में देखने को मिला। जिसे देख ऐसा आभास होता है कि केजरीवाल पार्टी जयचंद की वंशश है। भारत से हिन्दू सम्राट राजाओं का राज जयचंदों के ही कारण ख़त्म हो कर मुग़ल राज स्थापित हुआ था। विश्व में 56 मुस्लिम देश हैं लेकिन कोई रोहिंग्या मुसलमानों को किसी भी कीमत पर अपनाने को तैयार नहीं, जबकि आप दिल्ली में उनके आधार कार्ड, वोटर पहचान-पत्र, राशन कार्ड आदि बनवाकर अपना वोट बैंक बना रही है।  
गुजरात में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। उन पर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप लग रहे हैं। ‘हिन्दू आईटी सेल’ के अनुज मिश्रा ने ये मामला दर्ज कराया है। ‘हिन्दू आईटी सेल’ ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी कि गोपाल इटालिया के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसे FIR में तब्दील किया गया है। साथ ही गुजरात पुलिस से कड़ी कार्रवाई की माँग की।

शिकायत में कहा गया है कि गोपाल इटालिया के राज्य में सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में प्रशंसक हैं, ऐसे में उन्होंने एक वीडियो के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं और रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाया है, जिसे कई लोगों ने देखा। आरोप है कि गोपाल इटालिया ने कहा था, “अगर आपको मेरी बातें पसंद नहीं हैं तो आप मुझे ब्लॉक कर के निकल लीजिए, क्योंकि मुझे आपकी ज़रूरत नहीं है।” इसके बाद उन्होंने हिन्दू पर्व-त्योहारों का नाम लिया।

गोपाल इटालिया ने कहा, “लोग सत्यनारायण कथा और भागवत कथा जैसी बहुत सारी गैर-जरूरी चीजों पर रुपए खर्च कर रहे हैं। इन चीजों का कोई उपयोग ही नहीं है और ये अवैज्ञानिक हैं। अब भी लोगों को ये नहीं पता है कि ये सब कर के उन्हें क्या लाभ मिलेगा। ये सब कर के लोग दूसरों का समय भी जाया करते हैं। अगर हम इन चीजों पर 5 पैसा भी खर्च करते हैं, तो हमें मनुष्य की तरह जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं है।”

गोपाल इटालिया ने आगे कहा था, “मैं ऐसे लोगों से शर्मिंदा हूँ (सत्यनारायण कथा और भागवत कथा कराने वाले)। मुझे इनसे काफी गुस्सा आता है। रीति-रिवाजों और संस्कृति के नाम पर हिजड़ों की तरह तालियाँ बजाने वालों की हमें कोई ज़रूरत नहीं है। कोई साधु मंच से कुछ बोल देगा और हमें हिजड़ों की तरह तालियाँ बजानी हैं?” शिकायत में कहा गया है कि AAP गुजरात के अध्यक्ष का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अब भी उपलब्ध है।FIR के अनुसार, ये वीडियो जंगल में आग की तरह देश-विदेश में फ़ैल रहा है और गोपाल इटालिया के फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब हैंडलों से चारों तरफ फ़ैल रहा है। शिकायत के अनुसार, इस वीडियो को जानबूझ कर सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए बनाया गया है। इसीलिए, निवेदन किया गया है कि हिन्दुओं के हितों का ध्यान रखते हुए उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाए।

उनके बयान से कई पुजारियों और कथावाचकों ने नाराजगी जताई। हाल ही में वो सोमनाथ मंदिर का दर्शन करने पहुँचे थे, लेकिन लोगों के विरोध के कारण उन्हें वहाँ से भागना पड़ा। वहीं उन्होंने अब हिन्दू समाज से माफ़ी भी माँगी है। इटालिया ने बयान दिया था कि आम आदमी मेहनत करके खाता है लेकिन पुजारी, कथावाचक, लोगों को भविष्य बताने वाले लोग बैठे-बैठे लोगों को ठगते हैं।उन्होंने इसे ‘धर्म का धंधा’ बताया था।

गोपाल इटालिया के ये बयान पुराने हैं। तब वो गुजरात में AAP के प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बने थे। उन्होंने अपने बयान में तब कहा था कि कथावाचक व पुजारी आम आदमी को धर्म का डर दिखाते हैं तथा उन से रुपए ऐंठते हैं। भाजपा के मीडिया प्रभारी यग्नेश दवे ने उनके वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड करके उन्हें हिंदू विरोधी बताया था। ये सब तब हो रहा है, जब दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया हाल ही में गुजरात दौरे से लौटे हैं।

इटालिया का एक और वीडियो वायरल हुआ है जहाँ उसके द्वारा हिन्दू परंपराओं के बारे में अनाप-शनाप बातें कही जा रही हैं। इटालिया ने दावा किया कि अमीर व्यापारी कथा और सत्संग के नाम पर लोगों से पैसे लूटते हैं। इटालिया ने कहा, “ये कथाकार सिर्फ सूरत में ही कथाएं क्यों करते हैं? अगर तुम इतने ही बड़े हो तो जाकर सीमा पर कथा करो। पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर जाकर कथा करो लेकिन यहाँ के लोगों को छोड़ दो।”(साभार :दिव्या प्रभात)

दिल्ली : आप विधायक अमानतुल्लाह खान का साम्प्रदायिक ट्वीट

                       अमानतुल्लाह के ट्वीट का उसी भाषा में जवाब देते ट्विटर 
आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने 22 मई 2021 को मतलब जुमे की नमाज के ठीक 24 घंटे बाद एक ट्वीट किया है। पहले ट्वीट पढ़ा जाए। फिर इस पर चर्चा करते हैं।

विधायक अमानतुल्लाह खान ने जो ट्वीट किया, उसमें साफ नहीं है कि वो किसे फंगस कह रहे हैं। लेकिन नीचे देश की जनता (जिसके एक वोट की कीमत राष्ट्रपति के एक वोट के बराबर होती है, मतलब अमानतुल्लाह जैसे विधायक जनता के सामने नौकर/सेवक के बराबर हैं) ने उन्हें साफ कर दिया कि फंगस है कौन।

अब आपदा में जब विधायक साम्प्रदायिकता फ़ैलाने से नहीं चूक रहा, यानि स्पष्ट है इस आपदा में भी अमानतुल्लाह साम्प्रदायिकता से बाज नहीं आ रहा। और जब जनता द्वारा जहर का जवाब जहर से देने पर कोई विक्टिम कार्ड न खेले। हालाँकि अभी तक ऑरेंज फंगस का जवाब बहुत ही शालीनता से दिया गया है। 

दूसरे, कुम्भ नहान पर ऊँगली उठाने वालों को अच्छी तरह इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि नहान के दौरान जैसे ही कोरोना उजागर हुआ, उसे तुरन्त रोक दिया गया था, जबकि निजामुद्दीन मरकज को खाली करने NSA प्रमुख अजित डोवाल को जाना पड़ा था। जमातियों की तरह किसी साधु, संत या उनके किसी अनुयायी ने कोरोना टेस्ट करवाने से न मना किया और न ही किसी चिकित्सक से बदतमीजी की।


              नेताओं पर भरोसा नहीं, ट्वीट डिलीट करके भाग जाते हैं… इसलिए स्क्रीनशॉट

अमानतुल्ला विधायक हैं। उनकी पार्टी के नेता केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं। मतलब ये मुख्यमंत्री से छोटे कद के नेता हैं। यह उदाहरण देकर भी जनता ने इन्हें समझाया कि फंगस कौन है।

महामारी के समय तरह-तरह के फंगस आ गए हैं। विधायक अमानतुल्लाह खान को यह विज्ञान भी समझाया गया कि ब्लैक फंगस क्या होता है।

ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरनाक होता है वॉइट फंगस। यह तो डायरेक्ट लिंग पर ही अटैक करता है। यह देखते हुए विधायक अमानतुल्लाह खान को वॉइट फंगस के बारे में भी बताया गया।

विधायक अमानतुल्लाह खान चूँकि गर्दन और जुबान काटने की बात करना खुलेआम पसंद करते हैं, इसलिए जिस जुबान के सहारे थूका जाता है, उसके विज्ञान को भी समझाया गया।

हिन्दू धर्म और RSS का मजाक बनाने वाले मीडिया गिरोह की वीडियो ने खोल दी पोल

                                        हिन्दू धर्म और RSS का उड़ाया मजाक, सीमा चिस्ती (बाएँ)
पत्रकारिता, देश और समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए आवश्यक है। इसलिए पत्रकारिता को संविधान में एक विशेष स्थान दिया गया है। लेकिन आज के दौर के पत्रकार निहित राजनीतिक स्वार्थों के जाल में उलझ कर नकारात्मक पत्रकारिता को अपना मकसद बना लिया है।

भाजपा (तत्कालीन भारतीय जनसंघ), आरएसएस और हिन्दू धर्म का विरोध करना तो लगता है कि यह इनका जन्मसिद्ध अधिकार है, इन विरोधियों का जन्म भी शायद इसीलिए हुआ है, अन्यथा मृत्युलोक पहुंचकर भी इनकी आत्मा भटकती रहेगी। बल्कि हिन्दू धर्म पर शताब्दियों से एक से बढ़कर एक प्रहार होते आ रहे हैं, जिनका नाम केवल इन विरोधियों के कारण जीवित है, वरना विश्व में कोई उनके खानदान तक को नहीं जानता। 

नकारात्मक पत्रकारिता से पत्रकार या मीडिया संस्थानों को वाहवाही तो मिल जाती है, लेकिन देश के आत्मविश्वास और कुछ करने की क्षमता पर जबरदस्त कुठाराघात होता है। देश के कुछ पत्रकारों का गिरोह, हमें शर्मसार करने के लिए ऐसी ही पत्रकारिता करता है। सीमा चिश्ती उनमें से ही एक ऐसी पत्रकार हैं, जो अपनी नकारात्मक पत्रकारिता से हमें शर्मसार करती रहती हैं।

सीमा चिश्ती, इंडियन एक्सप्रेस और बीबीसी से जुड़ी हुई थीं, फिलहाल किसी और मीडिया ग्रुप के साथ हैं लेकिन हैं गिरोह वाली ही। अब इनका कारनामा देखिए। सीमा चिश्ती ने रविवार (मई 16, 2021) को जनसत्ता की एक खबर का स्क्रीनशॉट शेयर किया। बता दें कि जनसत्ता की जिस खबर को सीमा चिश्ती ने शेयर किया, उसकी हेडलाइन में लिखा था, “जो लोग चले गए, वे मुक्त हो गए, बोले RSS प्रमुख।” इसके साथ ही हेडलाइन के नीचे लिखा था, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आज एक कार्यक्रम में कहा कि जिन लोगों की कोरोना से मौत हुई है, वह एक तरीके से मुक्त हो गए हैं।”

हालाँकि जनसत्ता ने अपनी खबर की हेडलाइन को बाद में एडिट कर दिया, लेकिन खबर का सबहेड वही रहा। जनसत्ता ने हेडलाइन एडिट करके लिखा, “जो लोग चले गए, वे मुक्त हो गए, ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ कार्यक्रम में बोले RSS प्रमुख- परिस्थिति कठिन है।” इसके साथ ही उन्होंने इसमें ‘मुक्त भारत’ का हैशटैग लगाया है। इस स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए सीमा चिश्ती ने आश्चर्य जताया कि क्या कॉन्ग्रेस-मुक्त-भारत में ‘मुक्त’ वास्तव में ‘मौत’ के लिए इस्तेमाल किया गया है।

चिश्ती ने न केवल भागवत के उद्धरण को विकृत किया, बल्कि उन्होंने हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने के लिए आरएसएस को ढाल के रूप में भी इस्तेमाल किया। बता दें कि नश्वर दुनिया से मुक्ति को परिभाषित करने के लिए हिंदू धर्म में ‘मुक्त’ या ‘मुक्ति’ का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि श्मशान घाट को अक्सर ‘मुक्तिधाम’ के रूप में जाना जाता है। मुक्ति का मतलब जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति है और हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म भी इसी दर्शन को मानते हैं।

            24 मिनट 16 सेकंड का पूरा वीडियो, आरएसएस प्रमुख ने क्या बोला-क्या नहीं बोला – 

                   सब स्पष्ट है लेकिन गिरोह को प्रपंच फैलाना है

जब भाजपा और उसके समर्थकों ने ‘कॉन्ग्रेस-मुक्त भारत’ शब्द का इस्तेमाल किया, तो उसमें ‘मुक्त’ का मतलब ‘मुक्त’ था, न कि मौत, जैसा कि चिश्ती चाहती है कि हर कोई मुक्त का मतलब वही समझे, जो उनका गिरोह समझाना चाहता है।

राष्ट्रीय जनता दल ने भी जनसत्ता की इस खबर को शेयर करते हुए लिखा, “RSS के मानने वालों, आपके आराध्य मोहन भागवत के अनुसार इस महामारी से आप में से कौन-कौन मुक्त होना चाहता है?”

हम आपको बताते हैं कि आरएसएस प्रमुख ने यह बातें किस संदर्भ में कहाँ और क्या बोला था। मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ शीर्षक से 11 मई से 15 मई तक आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान की एक श्रृंखला में पॉजिटिविटी का मंत्र दे रहे थे। संघ के इस व्याख्यान का उद्देश्य महामारी संकट के बीच लोगों में आत्मविश्वास और सकारात्मकता फैलाना था। इस व्याख्यान का आयोजन आरएसएस की कोविड रिस्पॉन्स टीम द्वारा किया गया, जिसमें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, विप्रो समूह के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी, आध्यात्मिक गुरू जग्गी वासुदेव प्रमुख वक्ता के तौर पर शामिल हुए।

शनिवार को अपने व्याख्यान में भागवत ने कहा, “सकारात्मकता के बारे में बात करने के लिए मुझे कहा है। कठिन है, क्योंकि समय बहुत कठिन चल रहा है। अनेक जगह, अनेक परिवारों में कोई अपने कोई आत्मीय बिछड़ गए हैं। अनेक परिवारों में तो भरण-पोषण करने वाला परिवार का सदस्य, अचानक चला गया। दस दिन में जो था, वो नहीं था ऐसे हो गया। और इसलिए अपने वाले के जाने का दुःख और भविष्य में खड़े होने वाली समस्याओं की चिंता ऐसी दुविधा में तो परामर्श देना, सलाह देना, इसके बजाय पहले तो सांत्वना देना। लेकिन ये सांत्वना के परे दुःख है। इसमें तो अपने को अपने आप को ही सँभालना पड़ता है। हम अपनी सह संवेदना बता सकते हैं, बता रहे हैं और यहाँ पर्दे पर केवल कोई संभावना नहीं बता रहे। संघ के स्वयंसेवक सर्व दूर, इस परिस्थिति में समाज की जो भी आवश्यकता है, उसकी पूर्ति करने के लिए अपने-अपने क्षमता के अनुसार सक्रिय हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “परन्तु ये कठिन समय है। अपने लोग चले गए। उनको ऐसे असमय चले जाना नहीं था। परन्तु अब तो गए, कुछ नहीं कर सकते। अब जो परिस्थिति है, उसमें हम हैं। और जो चले गए, वो तो एक तरह से मुक्त हो गए। उनको इस परिस्थिति का सामना अब नहीं करना है। हमको करना है। पीछे हम लोग हैं, हमको अपने आप को और अपने सब को सुरक्षित रखना है। कुछ नहीं हुआ, सब कुछ ठीक है। ऐसा हम नहीं कह रहे। परिस्थिति कठिन है। दुःखमय है। मनुष्य को व्याकुल करने वाली है। निराश करने वाली है। लेकिन यह परिस्थिति है, इसको स्वीकार करते हुए हम अपने मन को निगेटिव नहीं होने देंगे। हमको अपने मन को पॉजिटिव रखना है। शरीर को कोरोना निगेटिव रखना है और मन को पॉजिटिव रखना है।”

संघ ने ऐसे समय इस कार्यक्रम का आयोजन किया, जब देश में कोरोना की दूसरी लहर में लोगों की बड़ी संख्या में मौत हो रही है। हाल में सरकार ने पॉजिटिव खबरों और उपलब्धियों के प्रभावी प्रचार के जरिए लोगों की धारणा बदलकर अपनी पॉजिटिव छवि बनाने के उद्देश्य से सरकारी अधिकारियों के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया था।

                                                                                           (साभार) 

स्ट्रिंग ब्रा : ब्राह्मणों को d*cks कहने वाली ‘एक्टिविस्ट’ ने सचिन तेंदुलकर के जनेऊ पर उगला जहर

                                       ब्राह्मण विरोधी 'एक्टिविस्ट' मीना कंदस्वामीकी जनेऊ पर अभद्र टिप्पणी

2014 चुनावों से पूर्व हिन्दू, हिन्दुत्व, तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी, हिन्दू महासभा, विश्व हिन्दू परिषद् और आरएसएस को साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और मुस्लिम विरोधी कहने वाले खुद ही सिद्ध करने में लगे हैं कि वास्तव में साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और मुस्लिम विरोधी कौन है? बस जनता को ही ऐसे दोगले लोगों को पहचानना होगा। ये ही लोग देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंककर बेगुनाह हिन्दू-मुसलमानों की लाशों पर माल-पुए खाकर अपनी तिजोरियां भर "संविधान खतरे में" और "गंगा-जमुनी तहजीब" आदि भ्रमिक नारों से मासूम जनता को गुमराह करते रहे। 

दूसरा प्रमाण, देश में नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में जगह-जगह हुए शाहीन बाग़ों में "हिन्दू तेरी कब्र खुदेगी", "योगी तेरी कब्र खुदेगी" और "मोदी तेरी कब्र खुदेगी" आदि नारे साबित कर रहे थे कि इनका विरोध CAA के विरुद्ध नहीं बल्कि हिन्दुत्व के विरुद्ध था, जिसे जनता ने न समझने की सबसे भयंकर भूल की थी। और अभी किसान आंदोलन में भी "मोदी तू मरेगा" आदि उत्तेजक नारों की गूंज सुनी गयी।  

पिछले कुछ समय से काफी विवादों में रहने वाली ब्राह्मण विरोधी तथाकथित एक्टिविस्ट मीना कंदस्वामी (Meena Kandasamy) हाल में क्रिकेट लीजेंड सचिन तेंदुलकर की एक तस्वीर में उन्हें जनेऊ धारण किए देख भड़क गईं।

परन्तु यही मीना राहुल गाँधी द्वारा कोट पर जनेऊ पहनने पर चुप्पी लगा जाती है। जिस मीना को महिला होते हुए ब्रा और जनेऊ में ही अंतर नहीं पता हो उसकी संकुचित सोंच और हिन्दू विरोधी होना का और क्या प्रमाण दे सकती है।   

मीना ने अपने ट्वीट में जनेऊ के लिए पहले लिखा, “ओह माय गॉड…क्या ये असली तस्वीर है। क्या ये जनेऊ हल्के (एक विशेष समूह के लिए आरक्षित) अंतर्वस्त्र जैसा कुछ नहीं है, जिसे कपड़ों के अंदर पहना जाता है।” इस ट्वीट के अगले थ्रेड में मीना ने जनेऊ पर अभद्र टिप्पणी करते हुए इसकी तुलना ‘स्ट्रिंग ब्रा’ से भी की।

मीना ने जनेऊ के प्रति अपनी घृणा जिस तस्वीर पर निकाली है, उसे सचिन तेंदुलकर ने गणेश चतुर्थी के मौके पर इंस्टाग्राम पर साझा किया था। यह तस्वीर उनके अकाउंट पर 22 अगस्त 2020 को शेयर की गई थी। 

                                                                                        (साभार: इन्स्टाग्राम)
ब्राह्मणों को कहा था ‘Brahmin d*cks’

ब्राह्मण विरोधी मीणा कंदस्वामी हाल में फर्जी दलित पहचान और अपने डायवोर्स केस में वसूली करने को लेकर चर्चा में आई थी। इसके पहले तथाकथित एक्टिविस्ट ने ब्राह्मणों को ‘Brahmin d*cks’ कहा था। मीना के पूर्व पति डॉक्टर गुनशेखरन धर्मराज ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी ने उन पर प्रताड़ित करने का फ़र्ज़ी मामला दर्ज कराया था। इसके बाद ही उन्होंने मीना के पिता पर हमला करने का मामला दर्ज कराया। धर्मराज ने यहाँ तक कहा था कि उनके पास इस बात के पूरे सबूत (ईमेल पर) मौजूद हैं कि तलाक की असली वजह क्या थी। 

बचाव में आया था मीडिया समूह

इन आरोपों के चर्चा में आने के बाद एक मीडिया समूह तथाकथित एक्टिविट के बचाव में कूद कर आया था। वहीं मीना ने दावा किया था कि ‘ट्रॉल्स’ उसे प्रताड़ित कर रहे हैं। इस बीच यह दावा भी किया गया था कि मीना के पति ने जितने भी आरोप लगाए हैं वह असल में ट्रॉल्स के आरोप हैं। इसके बाद धर्मराज को ही ट्रोल घोषित कर दिया गया था।

बुर्का पहनी महिलाएं किस प्रकार हिन्दुओं को भड़का रही हैं

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है, जिसमें बुर्का पहनी एक मुस्लिम महिला अपने हाथों में एक पोस्टर ले रखी है, जिसमें “Brahminical Patriarchy Down Down” लिखा हुआ है। यह तस्वीर भी ब्राह्मणों के विरुद्ध चलाये जा रहे प्रोपेगेंडा का हिस्सा है। मुस्लिम महिला इस पोस्टर के माध्यम से ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ आवाज उठाकर हिन्दुओं को भड़काने और बांटने की कोशिश करती नजर आ रही है।

अब कोई इसी मोहतरमा से पूछे हिन्दुओं में फूट डालने से पहले यह बताओं कि मुस्लिम समाज में कितनी जातियां हैं? उन सबमें कितने मतभेद हैं? क्या एक वर्ग दूसरे वर्ग की मस्जिद में नमाज पढ़ सकता है? और भी अनेकों विवाद है, उन पर कोई कुछ नहीं बोलता, मानों उनका अल्लाह और दूसरों का अल्लाह अलग है। ब्राह्मणों से शिकायत होनी चाहिए हिन्दुओं को, तुम्हे क्या परेशानी है? दूसरे, जिस दिन हिन्दुओं ने मुस्लिम समाज के मतभेदों को उजागर करना शुरू कर दिया, उसका अंजाम क्या होगा इस मोहतरमा और इसके समर्थकों को जान लेना चाहिए। ये मजलूम, गरीब, नासमझ और बेअक्ल होने का ड्रामा बंद करना मुस्लिम समाज के ही हित में होगा। टके-टके लेकर ये ड्रामा करना बंद करो।  

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस पोस्टर की परफॉर्म इंडिया पुष्टि नहीं करता है, लेकिन लोगों ने इस तस्वीर को लेकर काफी तीखी टिप्पणी की है। लोगों ने इस पोस्टर के पीछे वामपंथियों का हाथ बताया है, जो हिन्दुओं को बांटने की कोशिश में लगे हैं। कई ट्विटर यूजर्स ने मुस्लिम समाज के महिलाओं को आईना दिखाने की कोशिश की है।


राहुल गाँधी नया लड़का : गुलाम नबी आज़ाद, कांग्रेस वरिष्ठ नेता

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस ने अपने पतन की पटकथा उसी दिन लिख दी थी जब 2004 में प्रधानमंत्री प्रणब मुख़र्जी की बजाए मनमोहन सिंह को बनाने का निर्णय लिया था। दूसरे, 2014 में मोदी लहर को रोकने के अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का गठन करवाना। लेकिन मोदी लहर प्रभावहीन नहीं हुई, पहली बार भारतीय जनता पार्टी बहुमत में आयी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए, और कांग्रेस का ग्राफ नीचे गिर गया। जो आज तक उठ नहीं पाया। 
कहते है, बुढ़ापे में ही सारी बीमारियां उभर कर आती हैं। ठीक वही स्थिति आज कांग्रेस की है। कल तक परिवार के इशारे पर नाचने वाले आज विरोधी स्वर बोल रहे हैं। कल राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा की वकालत करने वाले इन्ही के विरुद्ध आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। उसका कारण है, जो पार्टी में बैठकर कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बताते हैं, लेकिन चुनावों में जनेऊ पहनते हैं, मंदिरों में माथा टेकते हैं, तो चुनावों उपरांत हिन्दुत्व विरोधी बयानबाज़ी करते हैं। मुसलमानों को "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से डराने के साथ-साथ हिन्दुत्व को बदनाम किया जा रहा था। इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु,संत और साध्वियों को धमाकों के आरोप में जेलों में बंद कर यातनायें देना, लगता है कांग्रेस को उन बेकसूर साधु, संत और साध्वियों की हाय खा रही हैं। वही हिन्दू विरोध कांग्रेस को धरातल में धकेल रहा है। 
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने तो अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि 'सोनिया गाँधी हिन्दू विरोधी है...' उन्होंने इतनी बड़ी बात ऐसे ही नहीं लिख दी। उसका कारण भी दिया है।
दूसरे जब राहुल गाँधी को अध्यक्ष को बनाने की चर्चा चल रही थी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूँही नहीं कहा था, अपने अनुभव के आधार पर कहा था कि "बनाइए जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाई।" राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद से आज विरोधी स्वर बोलने वाले खुश जरूर हो रहे थे, परन्तु पार्टी उतनी ही नीचे जानी शुरू हो गयी थी। राहुल ने आलू से सोने बनाने की बात तो बोल दी, लेकिन उसे चरितार्थ नहीं किया। अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में आलू चिप्पस की अगर फैक्ट्री ही लगवा दी होती, बेरोजगारों को रोजगार मिलता और आलू से सोना भी बन रहा होता। उनकी आवाज़ में भारीपन आ गया होता, लेकिन जिसे अँधेरे में तीर छोड़, जनता का मनोरंजन करना ही उद्देश्य हो, पार्टी धरातल में ही जाएगी।      
सबसे बड़ी समस्या पार्टी में गुलामी मानसिकता की है। आज किस आधार पर विरोध किया जा रहा है? उस समय इनकी बुद्धि कहाँ चली गयी थी, जब सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंक दिया था, उस समय इनकी बुद्धि कहां गयी हुई थी जब अपने ही वरिष्ठ नेता एवं भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शव को पार्टी ऑफिस के दरवाजे नहीं खोले गए थे। यदि समय रहते इन्हीं लोगों ने गुलामी मानसिकता को त्याग पार्टी और देशहित में काम किया होता, शायद कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती। खैर, विधि के विधान को कौन बदल सकता है 

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। 

को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ 

अस कहि लगे जपन हरिनामा। 

गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥   

फिर कई राष्ट्रीय मुद्दे भी तुष्टिकरण के चलते नहीं सुलझाए, विपरीत इसके उन्हें विवादित बना दिया। जैसे : जीएसटी, अयोध्या, काशी, मथुरा, नागरिकता संशोधक कानून, अनुच्छेद 370, पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधियों को संरक्षण देना, चीन से गुप्त समझौता करना, वर्तमान मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तानी आतंकवादी ठिकानों पर सर्जिकल एवं एयर स्ट्राइक करने पर सबूत मांगकर पाकिस्तान की बोली बोलना, पाकिस्तान जाकर मोदी के विरुद्ध माहौल बनवाना आदि अनेको ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाने की बजाए विवादित करने में ही कांग्रेस ने अपना हित उचित समझा, जो आज पार्टी को खा रहे हैं।   
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्रमोह और पार्टी में परिवारवाद के कारण कई वरिष्ठ नेता बगावती रुख अपना रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के बाद अब गुलाम नबी आजाद ने भी अपनी भड़ास निकाली है। उन्होंने सोनिया गांधी के बेटे और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को इशारों में ‘नया लड़का’ कहा है। एबीपी न्यूज के अनुसार आजाद ने कहा है कि कांग्रेस सबसे निचले स्तर पर खड़ी है। पार्टी के बड़े नेताओं का कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क टूट गया है। फाइव स्टार होटलों में बैठकर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नेता को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का ज्ञान होना चाहिए। केवल दिल्ली से जाना और पांच सितारा होटलों में रहना और दो-तीन दिन बाद दिल्ली लौटना पैसे की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है।

इससे पहले कांग्रेस के 23 नेताओं ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को लेकर सोनिया गांधी को चिट्‌ठी भी लिखी थी। इनमें गुलाम नबी आजाद के साथ कपिल सिब्बल भी शामिल थे। चिट्ठी में पार्टी में ऊपर से नीचे तक बदलाव करने की मांग की गई थी, जिससे काफी विवाद हो गया था। पिछले 72 साल में कांग्रेस सबसे निचले पायदान पर है। कांग्रेस के पास पिछले दो कार्यकाल के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद भी नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी पार्टी नेतृत्व में सवाल उठाने वाले नेताओं को विरोध का सामना करना पड़ता है। गांधी परिवार के नेतृत्व के तौर-तरीकों पर सवाल करने वालों को पार्टी में किनारे कर दिया जाता है।

कांग्रेस में सच बोलने वालों को किया जाता है परेशान
कांग्रेस में आलाकमान के प्रति निष्ठा रखने वाले नेताओं को अहम जिम्मेदारियां मिलती हैं, जबकि युवा और जमीन से जुड़े नेताओं को दरकिनार किया जाता है। जो भी नेता पार्टी की नकारात्मक राजनीति के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत करता है, उसकी आवाज दबा दी जाती है। कांग्रेस से एक के बाद एक कई युवा नेताओं के पार्टी छोड़ने या आलाकमान से नाराजगी से यह सवाल उठना जायज है कि क्या वाकई बिना जनाधार वाले नेता तानाशाही कर रहे हैं। आइए डालते हैं एक नजर-

खुशबू सुंदर
अभिनेत्री से राजनेता बनीं खुशबू सुंदर ने हाल ही में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे पत्र में खुशबू ने आरोप लगाया कि पार्टी में ऊपर बैठे जिन लोगों का जमीनी स्तर पर कोई जुड़ाव नहीं है और वे तानाशाही कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरी तरह जो लोग काम करना चाहते हैं उन्हें दबाया जा रहा है। अपने पत्र में खुशबू सुंदर ने लिखा कि कांग्रेस के 2014 लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद उन्होंने पार्टी ज्वाइन की थी, लेकिन यहां काम करने वाले लोगों की अनदेखी की जाती है।

संजय झा
इसके पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा ने एक न्यूज वेबसाइट को दिए इंटरव्यू और लेख के जरिए कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया था। पार्टी की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से कांग्रेस प्रवक्ता पद से हटा दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने लेख और द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। संजय झा ने दावा किया कि पार्टी के पास एक आंतरिक मजबूत तंत्र नहीं है। उन्होंने लिखा है कि पार्टी के अंदर सदस्यों की बात नहीं सुनी जाती है। अपने लेख में झा ने यह भी कहा कि पार्टी सरकार के विफल होने पर लोगों को शासन का कोई वैकल्पिक विवरण प्रस्तुत नहीं कर सकती।

सचिन पायलट
राजस्थान के युवा नेता सचिन पायलट ने पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई, लेकिन जब सरकार बनाने की बात आई तो सीएम की कुर्सी अशोक गहलोत को दे दी गई। नाराज सचिन को मनाने के लिए डिप्टी सीएम बना दिया गया। इस बीच गहलोत ने सचिन पायलट को किनारे करना शुरू कर दिया। इससे नाराज होकर सचिन पायलट को बागी रुख अपनाना पड़ा।

ज्योतिरादित्य सिंधिया
मध्य प्रदेश में जनाधार वाले लोकप्रिय युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस की अनदेखी के कारण हाल ही में बीजेपी में शामिल हो गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ राज्य के कई अन्य विधायक और युवा नेता भी बीजेपी का दामन थाम चुके हैं। इससे राज्य में कांग्रेस काफी कमजोर हो गई है।

हेमंत बिस्वा शर्मा
असम के लोकप्रिय नेता हेमंत बिस्वा शर्मा को भी मजबूर होकर पार्टी से निकलना पड़ा। यहां के बुजुर्ग कांग्रेसी नेता तरुण गोगोई के साथ मतभेदों के कारण उन्हों हाशिए पर डाल दिया गया था। 2001 से 2015 तक कांग्रेस के विधायक हेमंत बिस्वा शर्मा 2016 में बीजेपी में आ गए। राज्य में कांग्रेस को हराने में इनका अहम योगदान रहा है। हेमंत बिस्वा शर्मा अभी असम सरकार में मंत्री हैं।

प्रियंका चतुर्वेदी
कांग्रेस की एक तेजतर्रार युवा प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को भी पार्टी नेतृत्व की अनदेखी के कारण बाहर होना पड़ा। उन्हें पार्टी में दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ा। आखिर में वे शिवसेना में शामिल हो गईं।

ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी एक समय पार्टी नेतृत्व की अनदेखी के कारण कांग्रेस छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था। पार्टी में किनारे किए जाने पर ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बना ली थी। ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी का राज्य से एक तरह से सफाया हो गया है।

वाईएस जगन मोहन रेड्डी
वाईएस जगन मोहन रेड्डी वर्तमान में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इनके पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी दो बार राज्य के सीएम रह चुके हैं। 2009 में वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद लोगों ने जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की लेकिन पार्टी आलाकमान ने इसे ठुकरा दिया। आखिर में पार्टी से नाराज होकर इन्होंने 2010 में अलग पार्टी बना ली और आज राज्य में इनकी सरकार है।

मिलिंद देवड़ा
महाराष्ट्र के युवा नेता मिलिंद देवड़ा ने हाल में ही मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, लेकिन पार्टी आलाकमान के रवैये से नाराज चल रहे हैं।

बॉलीवुड में हिन्दुओं के खिलाफ नफरत और इस्लाम के प्रति आस्था पैदा करने वाली साजिश

हिन्दी सिनेमा, जिसे बॉलीवुड के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दी भाषा में फ़िल्म बनाने का उद्योग है। बॉलीवुड नाम अंग्रेज़ी सिनेमा उद्योग हॉलिवुड के तर्ज़ पर रखा गया है। हिन्दी फ़िल्म उद्योग मुख्यतः मुम्बई शहर में बसा है। ये फ़िल्में हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और दुनिया के कई देशों के लोगों के दिलों की धड़कन हैं। हर फ़िल्म में कई संगीतमय गाने होते हैं। इन फ़िल्मों में हिन्दी की "हिन्दुस्तानी" शैली का चलन है। हिन्दी और उर्दू (खड़ीबोली) के साथ साथ अवधी, बम्बईया हिन्दी, भोजपुरी, राजस्थानी जैसी बोलियाँ भी संवाद और गानों में उपयुक्त होते हैं। प्यार, देशभक्ति, परिवार, अपराध, भय, इत्यादि मुख्य विषय होते हैं। ज़्यादातर गाने उर्दू शायरी पर आधारित होते हैं।

1895 में लूमियर ब्रदर्स ने पेरिस सैलून सभाभवन में इंजन ट्रेन की पहली फिल्म प्रदर्शित की थी। इन्हीं लूमियर ब्रदर्श ने 7 जुलाई 1896 को बंबई के वाटसन होटल में फिल्म का पहला शो भी दिखाया था। एक रुपया प्रति व्यक्ति प्रवेश शुल्क देकर बंबई के संभ्रात वर्ग ने वाह-वाह और करतल ध्वनि के साथ इसका स्वागत किया। उसी दिन भारतीय सिनेमा का जन्म हुआ था। जनसमूह की जोशीली प्रतिक्रियाओं से प्रोत्साहित होकर नावेल्टी थियेटर में इसे फिर प्रदर्शित किया गया और निम्न वर्ग तथा अभिजात्य दोनों वर्गों को लुभाने के लिए टिकट की कई दरें रखी गईं। रूढ़िवादी महिलाओं के लिए जनाना शो भी चलाया गया। सबसे सस्ती सीट चार आने की थी और एक शताब्दी बाद भी यही चवन्नी वाले ही सिनेमा की शोभा बढ़ाते थे। 
बॉलीवुड मनोरंजन के साथ ही सामाजिक संदेश देने का एक बड़ा माध्यम है। एक समय था जब हिन्दी फिल्म जगत में एक से बढ़कर एक पारिवारिक और धार्मिक फिल्मों से भारतीय संस्कृति को जीवित रख, आने वाली युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कारों से अवगत करवाया जाता था। परन्तु जैसे-जैसे फिल्म जगत में पश्चिमी सभ्यता और तस्करों का शिकंजा फिल्म जगत पर हावी होता गया, भारतीय संस्कृति लगभग गायब ही हो गयी। तस्करों का बोलबाला होने से नायिका केवल शो-पीस एवं आकर्षण वस्तु बन कर रह गयी है और भारतीय नारी की गरिमा लुप्त हो गयी।  
जिस कारण बॉलीवुड पर छद्म धर्मनिरपेक्ष माफिया का कब्जा है। यहां पर धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बड़ी साजिशों को अंजाम दिया जाता है। इस साजिश में बड़े-बड़े फिल्म निर्माता, निर्देशक,अभिनेता, अभिनेत्री, पटकथा और संवाद लेखक शामिल है,जो एक खास धर्म इस्लाम के प्रचार-प्रसार कर उसमें आस्था पैदा करने की कोशिश करते हैं, जबकि हिन्दू धर्म के प्रति नफरत पैदा करते हैं। अब ट्वीटर एकाउंट @SecularBolly (Secularism Of Bollywood) इन साजिशों का पोल खोल रहा है।

ट्वीटर एकाउंट @SecularBolly फिल्म के छोटे से क्लीप के माध्यम से बॉलीवुड में रची गई साजिशों को लोगों के समाने पेश करता है और बताता है कि किस तरह संवाद, गीत, संगीत और दृश्य के माध्यम से हिन्दू धर्म पर हमला किया जाता है और इसके विपरीत इस्लाम की छवि को चमकाने की कोशिश की जाती है।

काफी दिनों से बॉलीवुड में जड़ जमा चुकी एक विचारधार, जो अपने को प्रगतिशील, उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बताती है, हिन्दू धर्म के खिलाफ काम करती है। यह विचारधारा प्रगतिशीलता और अंधविश्वास दूर करने के नाम पर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था पर हमला करती हैं, वहीं दूसरी तरफ इस्लाम के प्रति उदासीन बने रहती है। यहां तक कि उनके अंधविश्वास को धार्मिक आस्था का रूप देकर फिल्म में पेश करती हैं और उचित ठहराने की कोशिश करती है।

 

बॉलिवुड में हिन्दुओं को बदनाम करने के खास मकसद से फिल्में बनाई जाती हैं और उसमें विदेशी पैसे लगाए जाते हैं। पटकथा से लेकर संवाद तक ऐसे तैयार किए जाते हैं, जो हिन्दुओं की धार्मिक आस्था के खिलाफ होते हैं। वहीं इस्लाम को बढ़ावा देते नजर आते हैं, वहीं हिन्दू धर्म के प्रतीकों का मजाक उड़ाया जाता है। हिन्दू देवी-देवताओं, पुजारी और मंदिरों को उपहास के रूप में पेश किया जाता है और उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश की जाती है। हिन्दुओं की आस्था को खुलेपन और धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ा दी जाती है।

आज समय बदल रहा है। @SecularBolly जैसे ट्विटर एकाउंट के अलावा बॉलीवुड में ऐसे फिल्म निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और अभिनेत्री सामने आ रहे हैं, जो वर्षों से पैर जमा चुके सेक्युलरों को खुली चुनौती दे रहे हैं और उनका पर्दाफाश कर रहे हैं। यही वजह है कि आज बॉलीवुड में भी स्वच्छ भारत अभियान शुरू हो चुका है। हिन्दू विरोधी फिल्म बनाने पर खुलकर विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया में उनके बहिष्कार के लिए ट्रेंड चलाया जा रहा है, जिसका नतीजा है कि आज फिल्में फ्लॉप हो रही हैं। फिल्म ‘लक्ष्मी’ इसका ताजा उदाहरण है। 

‘सुबह के साढ़े 4 बजे कौन पटाखे फोड़ता है?’: दीपावली से भड़के शाहिद, लोगों ने दिलाई अजान की याद

पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी ने रविवार (नवंबर 15, 2020) की सुबह तड़के 4:53 बजे ट्वीट कर के हिन्दुओं द्वारा दीपावली मनाने को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा कि सुबह के साढ़े 4 बजे किस किस्म के लोग पटाखे उड़ाते हैं? उन्होंने दावा किया कि उन्हें तब भी तेज़ आवाज़ में पटाखे छोड़ने की गूँज सुनाई दे रही थी। साथ ही उन्होंने पूछा कि जब कोई फैसला लागू ही नहीं किया जा सकता है तो पटाखों को प्रतिबंधित करने का क्या फायदा?
सिद्दीकी साहब अब बात निकली है तो बहुत दूर तक जाएगी। वीणा के तारों को छेड़ने से पूर्व वीणा से निकलने वाले स्वरों को सुनने का साहस करना होगा। 
वर्ष में एक बार आने वाली दीपावली पर आतिशबाज़ी पर अंकुश लगाए जाने के पीछे हिन्दुत्व के विरुद्ध किसी गहरी षड़यंत्र की बू आ रही। उसका कारण भी है। अभी कुछ दिन पूर्व अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्मित हेतु हुए शिलान्यास की ख़ुशी में कहीं हिन्दू अधिक आतिशबाज़ी न छोड़े। सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से पराली की आड़ में कुठाराघात का आभास है। ये मुफ्तखोर दिल्लीवासियों की मेहरबानी से जब से अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से पराली का इतना सियापा मचा हुआ है। केजरीवाल से पूर्व 15 वर्ष शीला दीक्षित(स्व), 5 वर्ष मदन लाल खुराना, 5 वर्ष राधारमण आदि ने राज किया, केंद्र में विरोधी पार्टी होते हुए भी इनमें से किसी के भी कार्यकाल में प्रदुषण की इतनी समस्या नहीं हुई, जितनी दिल्ली वालों को मुफ्तखोर बनाने वाले केजरीवाल के कार्यकाल में हो रही है, इस कटु सच्चाई को तुष्टिकरण की चादर को फेंक बिना किसी निस्संकोच से गंभीरता से सोंचना होगा। जितनी भी हिन्दू हितैषी पार्टियां हैं, सभी को एकजुट होकर इन तुष्टिकरण करने वालों के विरुद्ध  स्वर मुखरित कर इन्हे बेनकाब करना होगा। 
देश में तुष्टिकरण इस सीमा तक बढ़ गया है, मीडिया भी तुष्टिकरण करता है, यह आरोप नहीं कटु सत्य है। लॉक डाउन में कभी मीडिया ने नहीं दिखाया कि मुस्लिम क्षेत्र में किस तरह कंधे से कंधे रगड़ रहा होता था, लोग बिना मास्क के बाजार में खरीदारी कर रहे हैं। इतना ही नहीं, शाम के समय 7 बजे के बाद जामा मस्जिद आकर यहाँ की भीड़ दिखाने का किसी में साहस नहीं, क्यों? 
भारत सरकार द्वारा खुले में मांस बेचना दंडनीय है, क्यों मुस्लिम क्षेत्रों में सुबह के समय खुले में किसी सब्ज़ी की भांति मांस बिकता है? कौन है इसका जिम्मेदार? 

शाहिद सिद्दीकी ने दावा किया कि जो दिल्ली पहले से ही एक ‘जहरीला नरक’ बनी हुई थी, वो अब दीपावली की अगली सुबह अपने अधिकतर निवासियों के लिए मौत का एक जाल बन जाएगी। शाहिद सिद्दीकी द्वारा दीपावली और पटाखों को लेकर इस तरह ज्ञान दिए जाने के बाद कई लोगों ने उनकी आलोचना भी की और पूछा कि सुबह-सुबह अजान की जो आवाज़ आती है, क्या उससे किसी की तन्द्रा नहीं भंग होती है?

‘बेचैन बैंकर’ नामक ट्विटर यूजर ने लिखा कि वो शाहिद सिद्दीकी की चिंताओं से सहमत हैं और सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिदों में साउंड सिस्टम को लेकर भी कई नियम-कायदे लगाए हुए हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। साथ ही पूछा कि जब फैसला लागू ही नहीं हो सकता तो सुनाने का क्या फायदा? आदित्य भारद्वाज ने पूछा कि वो कौन से लोग हैं, जो ‘सेक्युलर राष्ट्र भारत’ में अजान के नाम पर दिन में कई बार लोगों को परेशान करते हैं।

एक व्यक्ति ने अपने निजी अनुभव से समय गिनाते हुए कहा कि सबसे पहले तो तड़के 4 बजे और फिर 8 बजे, फिर दोपहर 1 बजे और फिर 4 बजे, इसके बाद शाम के 6 बजे करोड़ों लोगों को साल के 365 दिन नमाज सुनने के लिए बाध्य किया जाता है, इससे हमारा दिमाग बीमार हो रहा है। एक अन्य यूजर ने लिखा कि जो शहरों को नहीं जलाते, वो सुबह में पटाखे छोड़ना पसंद करते हैं। वो सार्वजनिक संपत्ति को नहीं जलाते। शाहिद सिद्दीकी ने पीएम मोदी के ‘9 बजे 9 मिनट’ को लेकर भी आपत्ति जताई थी।

जब लोगों ने मस्जिद में नमाज की बात की तो शाहिद सिद्दीकी भड़क गए और एक यूजर से कहा कि तुम अपने भाइयों से कहो कि वो रोज सुबह पटाखे छोड़ें और तुम इसका बचाव करो। उन्होंने सलाह दी कि वो इसे नियमित क्रियाकलाप बना लें। लोगों ने उन्हें कहा कि वो एक दिन के पटाखे से इतने परेशान हैं, लेकिन साल भर 5 वक़्त के नमाज को लेकर उन्हें कोई दिक्कत नहीं है? दीपावली पर पटाखे उड़ाने वालों को भला-बुरा कहने वाले शाहिद सिद्दीकी ने इन तर्कों पर चुप्पी साध ली।

ऐसे ही पत्रकार रूपा सुब्रमण्या ने ऑपइंडिया की ‘मिशन ब्राइट एंड लाउड दीवाली 2021’ का विरोध करते हुए कुछ ऐसा कह दिया, जिससे कॉन्ग्रेस के एक नेता ही उनसे नाराज़ हो गए और जम कर फटकार लगा दी। रूपा ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई अभियान नहीं देखा, जिसमें इससे ज्यादा प्रदूषण को प्रमोट किया गया हो, या फिर ऐसे इंडस्ट्री का समर्थन किया गया हो, जो ‘बाल मजदूरी’ पर आश्रित है। उन्होंने ऑपइंडिया के लिए ‘पूप इंडिया’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा कि ये रोज नई गहराई की ओर जा रहा है।