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यहूदियों का खोया हुआ समुदाय या भारत के पहाड़ी जनजातीय? इजरायल लौटने के लिए क्यों बेचैन थे कुकी? सदियों पुराने पलायन का अनसुलझा रहस्य

                   उत्तर-पूर्वी भारत में एक एक सिनेगॉग में प्रार्थना करते 'Bnei Menashe' समाज के लोग
जातीयता से लेकर मजहब, इतिहास और भौगोलिकता कुकी समाज दशकों से अपनी पहचान को अलग-अलग रूप देता रहा है। बताया जाता है कि ये लोग म्यांमार के चीन क्षेत्र से भारत में आए थे। ये इलाका सीमा पर ही स्थित है। बताया जाता है कि चीन-कुकी-मिजो (CHIKUMI) समुदाय अधिकतर ईसाई मजहब का अनुसरण करते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि उनके पूर्वजों को लेकर एक थ्योरी ये भी है कि ये लोग इजरायल से आकर भारत में बसे थे।

मणिपुर में जब कुकी-मैतेई हिंसा के दौरान कुकी समाज के घरों में आग लगाई गई थी, तब इजरायली मीडिया ने भी इसे खूब कवर किया था। कुकी समाज ने यहूदी राष्ट्र से भी मदद की माँग की है, जिसके बाद एक बार फिर से कुकी-इजरायल संबंधों को लेकर चर्चा शुरू हो गई। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि मणिपुर में जो आज कुकी समाज रह रहा है, वो क्या है। आइए, इस पर चर्चा करते हैं कि कुकी समाज और इजरायल का क्या संबंध है।

आज का कुकी समाज कौन है

जहाँ तक चीन-कुकी-मिजो जनजातीय समाज की बात है, वो उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर, मिजोरम, असम, मेघालय और त्रिपुरा में बसे हुए हैं। ये सामान्यतः म्यांमार और बांग्लादेश से लगी सीमावर्ती इलाकों में ये रहते हैं। उन्हें तिब्बत-बर्मा भाषाई समूह का हिस्सा माना जाता है। इनका ताल्लुक मिजोरम के मिजो और म्यांमार के चीन से भी है। कुकी समाज के भीतर भी 20 समुदाय आते हैं, अधिकतर ईसाई ही हैं। वो माइग्रेशन ही कारण है कि इन्हें ‘नए कुकी’ और ‘पुराने कुकी’ के रूप में जाना जाता है।
‘ओल्ड कुकीज़’ उन्हें कहा जाता है, जो सन् 1600 या उससे पहले नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में माइग्रेट हुए थे। वहीं ‘न्यू कुकीज’ उन्हें कहा जाता है, जो 18वीं या 19वीं सदी में आए। CHIKUMI से जुड़े जितने भी साहित्य हैं, वो बताते हैं कि कई चरणों में इनका पलायन संपन्न हुआ। निश्चित रूप से ये नहीं कहा जा सकता कि वो उत्तर-पूर्वी राज्यों के मूलनिवासी हैं या नहीं। हालाँकि, म्यांमार के चीन स्टेट से आए हुए कुकी समाज के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है।

फिर कुकी समाज का इजरायल से क्या संबंध है?

यहूदी मानते हैं कि 3000 साल पहले इजरायल के उत्तरी साम्राज्य के 10 समुदायों को अश्शूर से आए असीरियन लोगों के हमले के कारण पलायन करना पड़ा था। उसके बाद से उनके बारे में बहुत कुछ पता नहीं चल पाया। इजरायली लोगों का मानना है कि उस समय पलायन करने वाले ये लोग वापस आएँगे और तब एक नए युग का प्रारंभ होगा। उस समय इन्हीं में से एक राजा डेविड का वंशज मसीहा भी होगा।
माना जाता है कि जो समुदाय खो गए हैं, वो जहाँ जाकर बसे वहीं की संस्कृति में घुल-मिल गए हैं। कुकी समाज को भी ऐसे ही एक ट्राइब के रूप में जाना जाता है, जिसे वो ‘Bnei Menashe’ कहा जाता है। इन्हें पैगंबर जोसेफ के बेटे बिबिलिकल मनस्सेह के वंशजों के रूप में जाना जाता है। बताया जाता है कि 1950 के दशक में मिजोरम-मणिपुर के 10,000 कुकी लोगों ने ईसाई मजहब छोड़ कर यहूदी मजहब अपना लिया था, जब उन्हें अपनी तथाकथित वास्तविक मातृभूमि का पता चला था।
कैसे ये समुदाय अपने कथित मूलस्थान से परिचित हुआ, इसकी भी एक अलग कहानी है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। मिजोरम के बुआल्लॉन में मेई चलाह नाम के एक मजहबी मंत्री ने बताया था कि उसने सपने में आया है कि कुकी लोग ज़िओन समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। साथ ही उन्होंने बताया था कि सपने में ये भी आया कि कुकी लोगों को अब अपने मूलस्थान की तरफ लौट चलना चाहिए।
इतिहास की बात करें तो कुकी समाज जीववाद (Animism), अर्थात पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के अलाव प्रकृति की पूजा करता रहा है। साथ ही वो ‘मनमासी’ (मानसिया) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इसके बाद वहाँ मिशनरियों का प्रभाव बढ़ने लगा और कई जनजातीय समुदायों, खासकर कुकी लोगों ने ईसाई मजहब अपना लिया। ये मिशनरी ब्रिटेन और अमेरिका से आए थे। बनेई मेनाशे कम्युनिटी का दावा है कि धर्मांतरण के दौरान उन्होंने ईसाई मजहब और अपने परंपराओं के बीच समानता पाई।
मिशनरियों ने उन्हें खूब बाइबिल की कहानियाँ सुनाईं और खुद की परंपराओं से समानता पाते हुए उन्होंने थोक में धर्मांतरण किया। ब्रिटिश मिशनरियों को भी खुद के और इनकी परंपराओं में समानता मिली। दावा किया जाता है कि कुकी लोगों के कुछ प्राचीन गानों में बाइबिल के शब्द मिलते हैं। ‘सिकपुई हला’ उनमें से ही एक गाना है, एक कुकी सब-ट्राइब हमार द्वारा सदियों से गाया जाता रहा है।
                       मिजोरम का ‘Bnei Menashe’ समाज (फोटो साभार: Timeline YouTube)
ये लोग फसल की कटाई के मौसम ‘सिकपुइरोइ’ के दौरान इसे गाते हैं। ये गाना इजिप्ट से इजरायली लोगों के पलायन की बात करता है। फिर इसमें बताया जाता है कि कैसे लाल सागर ने उन्हें बचाया। ‘लिटेन्टेन ज़िओन’ नाम का एक गीत भी है, जिसका अर्थ है – ‘चलो, जिओन की ओर चलें।’ इजरायल की लोककथाएँ भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में गीत के रूप में कैसे आ गईं, ये एक रहस्य है। ‘सेलाह’, ‘अबोरीज़ा’ और ‘एलो’ जैसे शब्द बाइबिल में कई बार मिलते हैं।
वहीं Pslam की किताब में जहाँ ‘Selah’ शब्द मिलता है, ‘अबोरीज़ा’ एक हिब्रू शब्द है जिसका इस्तेमाल ईश्वर की प्रशंसा के लिए किया जाता है। ‘बुलपिजेम’ नाम की कुकी स्क्रिप्ट में 32 अक्षर हैं और इनका कनेक्शन भी Jews से सामने आता है। बताया जाता है कि ये चीन में राजा शीह हुंगताई के समय खो गया था। ये 214 ईसापूर्व की बात है। बिबिलिकल इजरायलियों से भी कुछ समानताएँ कुकी समाज से हैं।
                                     कुकी ये शॉल ओढ़ते हैं, जो इजरायली शॉल से मिलता-जुलता है
समुदाय ‘Bnei Menashe’ द्वारा ओढ़ी जाने वाली एक प्रकार की शॉल यहूदियों द्वारा प्रार्थना के समय पहनी जाने वाली ‘तल्लीत’ से काफी मिलती-जुलती है। बाइबिल में लिखा है कि ऐसे शॉल के किनारों पर एक नाले रंग की डिजाइन वाला घेरा होना चाहिए, जो ‘Puan’ के लिए भी सटीक बैठता है। ‘Zelengam’ के तथाकथित झंडे में भी एक प्रकार का स्टार है, जिसे ‘स्टार ऑफ डेविड’ भी कहा गया है।
                                 बताया जाता है कि ‘Zelengam’ के झंडे में ‘स्टार ऑफ डेविड’ है
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के आधार पर रिसर्च करने पर पता चलता है कि माना जाता है कि 30 लाख कुकी ‘Bnei Menashe’ हैं, जिन्हें उत्तरी इजरायल से निकाला गया था और वो सदियों तक चले पलायन में मध्य एशिया तक आए। फिर वो चीन और बर्मा से होते हुए उत्तर-पूर्वी भारत में पहुँचे। बताया जाता है कि उन्हें यहाँ पर ‘Shinlung’ कहा गया, क्योंकि वो चीन में यालुंग नदी के किनारे स्थित छीनलूंगसान से आए थे।

सबूत कहाँ है?

कही-सुनी गई बातों के अलावा इजरायल के ‘Manasseh’ और कुकी समाज के बीच संबंध को लेकर कोई और सबूत नहीं है। 2003 में कुकी समाज के सब ट्राइब्स हमार, कोम, लेंथंग, चांगसां, लुन्किम और हूआलंगो समाज के लोगों का DNA टेस्ट कराया गया, जो नेगेटिव निकला। 2005 में एक अन्य डीएनए टेस्ट में कुछ कनेक्शन निकला। कलकत्ता के सेन्ट्रल फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट ने इस टेस्ट सैम्पल्स की जाँच की थी।
इसमें पाया गया कि जहाँ उनके पुरुष वाले हिस्से का कोई विदेशी लिंक सामने नहीं आया, उनके महिला वाले हिस्से का कनेक्शन मध्य-पूर्व से सामने आया। इस रिसर्च में शामिल एक स्कॉलर ने कहा था कि दुनिया के दो अलग-अलग इलाकों में रह रहे समुदायों के डीएनए में समानता मुश्किल है, जब तक वो एक ही जगह से न आएँ रहे हों। एक अन्य रिसर्च में पता चला कि रोग ‘Tay-Sachs’ और हड्डी रोग ‘Saitika-Zenghit’ रोग CHIKIMZO ट्राइब्स के अलावा सेमिटिक यहूदियों में भी पाया जाता है।
हालाँकि, 2005 में कराए गए ये टेस्ट इतने विश्वसनीय नहीं हैं। इजरायल के प्रोफेसर स्कोरकी जेनेटिसिस्ट्स ने पार्शियल सिक्वेंसिंग का सहारा लिया और पूरी तरह से सेक्वेंशिंग नहीं की। उन्होंने कहा था कि हजारों वर्षों बाद कॉमन जेनेटिक ओरिजिन का पता लगा पाना मुश्किल है।

अपनी ‘मूल भूमि’ की तरफ लौटने वाली थ्योरी

1970 के दशक में ‘Bnei Menashe’ का एक समूह इजरायल की यात्रा पर निकला, जहाँ उसने रब्बी एलियाहु अविचाईल से मुलाकात की, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही इस समुदाय का नामकरण किया। साथ ही ‘Amishav’ नाम का एक NGO (जिसका अर्थ है – मेरे लोग वापस आएँगे) भी है, जो इजरायल से पलायन करने वाले ट्राइब्स को ढूँढने में लगा हुआ है। साथ ही ये संगठन उन्हें वापस यहूदी मजहब में धर्मांतरित करने करने के प्रयास में भी ये लगा रहता है।
उसी साल अविचाईल ने भारत का दौरा कर ‘बनई मेनाशे’ समुदाय के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने ही इस समुदाय को इजरायल के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई और आइजोल के साथ-साथ इम्फाल में भी धर्मांतरण की शुरुआत की। उन्होंने इस दावे पर भी रिसर्च किया कि उनके इजरायल से पलायन करने की बातों में कितनी सच्चाई है। इम्फाल में येरुसलम के रब्बी ने ‘अमिषाव हाउस’ भी खोला। उसमें एक सिनेगॉग भी है।
उसमें 2 गेस्ट रूम, एक मिक्वाह (परंपरागत नहाने का स्थान), एक क्लासरूम और कर्मचारियों के रहने के लिए क्वार्टर भी हैं। हालाँकि, इजरायल सरकार ने इस समुदाय के इजरायल माइग्रेशन ‘अलियाह’ का समर्थन नहीं किया। 90 के दशक में इस समाज के कुछ लोग इजरायल पर्यटक बन कर पहुँचे और वहाँ बस गए। उन्हें वहाँ की नागरिकता भी मिली और वो यहूदी कहलाए। 1997 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के डिप्टी कम्युनिकेशंस डायरेक्टर माइकल फ्रूंड को इस समाज का एक पत्र मिला और उन्होंने इनसे मिलने का मन बनाया।
उन्होंने इसके बाद कहा कि उक्त समाज और बिबिलिकल इजरायलियों में काफी समानताएँ हैं। उनकी परंपराओं और विश्वासों में भी उन्हें समानता मिली। उन्होंने इस समाज के माइग्रेशन को सपोर्ट करने के लिए फंड भी इकट्ठा किया। उनका मानना है कि इजरायल का खोया हुआ समुदाय यही है। उनके प्रयासों के कारण हर साल 100 ‘बनई मेनाशे’ को इजरायल में जाकर बसने और यहूदी बनने की अनुमति मिली।
उन्होंने एक ‘Shavei’ नामक एक NGO की भी स्थापना की, जिसने इजरायल की खोई हुई ट्राइब्स को वापस लेकर बसाने को अपना लक्ष्य बताया। 2003 तक इस समाज के 1000 लोगों को इजरायल में बसाया जा चुका था। उसी साल इजरायल के तत्कालीन इंटीरियर मिनिस्टर अवराहम पोराज ने कुछ राजनीतिक और मजहबी कारणों से फिर इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी। लेकिन, फ्रूंड इसके लिए प्रयास करते रहे और 2005 में एक फैसला कराया कि इस समाज को यहूदियों का ही हिस्सा माना जाए।
इस फैसले के बाद उनके NGO का खासा उत्साहवर्धन हुआ और उन्होंने मिजोरम और मणिपुर में धर्मांतरण के लिए सेंटरों की स्थापना की। अगर ‘Bnei Menashe’ को यहूदी का दजा मिल गया तो वो बिना रोकटोक इजरायल में जाकर बस सकेंगे। 2006 में इस प्रक्रिया के तहत 218 ऐसे लोगों को ‘Bnei Menashe’धर्मांतरित कर इजरायल ले जाया जाना था, लेकिन भारत सरकार ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। बताया जाता है कि 10,000 लोग इजरायल जा चुके हैं।

क्या कुकी और ‘Bnei Menashe’ को उनकी असली भूमि मिल गई?

यहूदियों ने भी कुकी समाज के ‘Bnei Menashe’ होने के दावों पर आपत्ति जताई है। भारत और इजरायल की सरकारों ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है। इजरायल के कई नेता भी इन्हें यहूदी नहीं मानते। इजरायली आलोचकों का कहना है कि उन्हें वेस्ट बैंक और गाजा से लगे इलाकों में जानबूझकर एक साजिश के तहत बसाया गया। बेंजामिन नेतन्याहू इन्हें वहाँ बसाने के पक्ष में थे, ऐसे में वो अपने देश में विवादों के केंद्र में भी आ गए।
इस समाज को पूरी तरह यहूदी कहलाने के लिए भी काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा। स्टैण्डर्ड ऑफ लिविंग से लेकर आर्थिक स्थिति तक, शुरुआत में बिल्कुल भी इस समाज को समर्थन नहीं मिला। कइयों ने नागरिकता ली और इजरायल की सेना में भी शामिल हुए। भारत में इस धर्मांतरण के खिलाफ भी आवाज उठी। इसमें कोई शक नहीं है कि कुकी समाज में अधिकतर प्रवासी ही रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ ‘कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (KNO)’ का नेता पीएस हाओकीप अभियान चला रहा है कि पूरे कुकी समाज को एक ‘Zelengam’ के अंतर्गत लाया जाए। इसे ‘लैंड ऑफ फ्रीडम’ भी कहा जाता है और यहूदी थ्योरी ही मानी जाती है। कुकी समाज की कई पहचान है, जिससे वो कहाँ से ताल्लुक रखते हैं इस पर संशय बना रहता है। अब इस पर और रिसर्च हो या कोई सबूतों वाला इतिहास निकले तो इस बारे में और पता चलेगा। इतिहास के गर्त में छिपा पलायन के इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा हटना अभी बाक़ी है।(साभारPragya Bakshi Sharma
I have been a journalist for 7+ years with experience in Print and Broadcast News. I love writing, reading, temple-hopping, listening to traditional Indian music and more. I am a Type 1 Diabetic = Type Oneder Woman :))

ईसाई मिशनरी ने धर्मांतरण का बदला तरीका, अब नाम हिंदू ही रहता है और घरों से भगवान की मूर्ति हटाकर जीसस की प्रेयर कर बना रहे ईसाई

भारत में बढ़ती अशांति के लिए धर्मांतरण सबसे अधिक जिम्मेदार है। सनातन विरोधी हिन्दुओं को जातियों में विभाजित कर जो विष फैला रहे हैं, लेकिन इन धर्मों में कितनी अधिक कट्टरता है कि एक जाति दूसरी जाति के चर्च, मस्जिद मे नहीं जा सकता, एक-दूसरे के कब्रिस्तान में अपना मुर्दे को दफ़न नहीं कर सकते, जिसको उजागर करने हिन्दू संगठनों को सक्रिय होना पड़ेगा। जब तक हिन्दू संगठन ईसाई और मुस्लिम में जातिवाद पर शोर नहीं मचाएंगे, धर्म परिवर्तन और हिन्दू विभाजन करने का खेल नहीं रुकेगा। गंगा-जमुनी तहजीब, संविधान और राष्ट्रीय एकता आदि जैसे नारों की बजाए इन धर्मों में सदियों से चल रहे जातिवाद को उजागर करना होगा। इन मजहबों के जातिवाद से वर्तमान पीढ़ी अज्ञान है। 
देश के सिर्फ पांच राज्यों में ही धर्म परिवर्तन कराना कानूनन अपराध होने के कारण इसकी विष-बेल लगातार फल-फूल रही ही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कई राज्यों में जबरन या डरा-धमकाकर, प्रलोभन या लालच देकर धर्मांतरण का खेल मिशनियां और मुस्लिम बेखौफ चला रहे है। ईसाई मिशनरियों की बदमाशी दरअसल गैर भाजपाई राज्यों में ज्यादा चल रही है। इन राज्यों में सरकार द्वारा धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के बजाए इस ओर के आंखे मूंदकर इन्हें समर्थन ही दिया जा रहा है। दूसरी ओर नेपाल बॉर्डर पर धर्मांतरण कराने का नया तरीका ही सामने आया है। ईसाई मिशनरियां पोल खुलने के डर से यहां दलित और गरीब हिंदुओं का धर्मांतरण तो कर रही हैं, लेकिन उनके नाम नहीं बदल रही हैं। ताकि पुलिस को कार्रवाई करने में मुश्किल आए। यहां लोगों के घरों के उनके इष्टदेव भगवान की मूर्तियों को हटा दी गईं हैं। इसके स्थान पर जन्म से हिंदुओं से भी जीसस की प्रेयर कराई जा रही है। मिशनरियों ने धर्मांतरण का ये नया तरीका निकाला है।

सनातन धर्म के प्रति नफरत के एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुटी मिशनरी
सनातन धर्म से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी किस कदर नफरत करती है यह कोई अनजानी बात नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने देश पर 70 सालों तक शासन के दौरान सनातन धर्म को हर स्तर से नुकसान पहुंचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। वहीं आम आदमी के पार्टी के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने तो 10 हजार लोगों को एक साथ हिंदू धर्म के खिलाफ शपथ दिलवाकर रिकार्ड ही बना डाला। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार हो या राजस्थान की गहलोत सरकार, पंजाब में भगवंत मान सरकार हो या दूसरे कुछ राज्यों की सरकारों द्वारा पूरी तरह आंखें पूरी तरह से बंद कर लिए जाने के कारण धर्मांतरण का खेल ईसाई मिशनरियां खुलेआम खेल रही हैं। मिशनरियों की मंडलियां भोले-भाले आदिवासियों को कई तरह के प्रलोभन देकर, तो कभी बीमारी ठीक करने और शराब छुड़ाने के नाम पर धर्म परिवर्तन करा रही हैं। धर्मांतरण की करतूतों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने का ही दुष्परिणाम है कि मिशनरियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में तो ईसाई मिशनरी और आदिवासियों के बीच नौबत टकराव तक जा पहुंची है। सनातन धर्म के प्रति नफरत के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में मिशनरी जुटी हुई हैं और कांग्रेस व आप सरकार इनकी मदद कर रही हैं। यही वजह है कि कांग्रेस शासित राजस्थान में धर्मांतरण की कई घटनाएं हो चुकी हैं।

देवी-देवताओं की पूजा के बजाए अब यहां लोग यीशू की प्रेयर करने लगे
अब ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्मांतरण के मिशन का तरीका बदल लिया है। इनकी मंडलियों गरीब हिंदुओं को प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन कराती हैं। पहले धर्म परिवर्तन के समय हिंदू व्यक्ति का नाम परिवर्तित कर क्रिश्चियन नाम दिया जाता था, लेकिन इससे धर्मांतरण की पोल खुलने और पकड़े जाने के डर से मिशनरियों ने पैटर्न बदल लिया है। वे धर्मांतरण तो उसी तरह कराती हैं। हिंदुओं के दिलों में उनके देवी-देवताओं के प्रति अनादर का भाव उत्पन्न करती हैं। यीशू की प्रार्थनाओं पर जोर देती हैं, लेकिन कुछ जगह धर्मांतरण के बाद उनके नाम नहीं बदलती हैं। नेपाल बॉर्डर पर धर्मांतरण के कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें जन्म से हिंदुओं के घरों से भगवान की मूर्तियां हटा दी गईं। देवी-देवताओं की पूजा के बजाए अब यहां लोग यीशू की प्रेयर करने लगे हैं। इनका ऐसा ब्रेनवाश किया है कि ये लोग दावा करते हैं कि यीशू की प्रेयर करने से ही इनकी शराब-सिगरेट की लत छूट गई है और रोजगार मिल रहा है।

हिंदू के घर में ही बनाया चर्च, इसमें 300 लोगों के प्रेयर करने की जगह
नेपाल बॉर्डर से सटे लखीमपुर जिले के निघासन कस्बे में धर्मांतरण के इस नए पैटर्न का खुलासा दैनिक भास्कर की पड़ताल में हुआ है। नेपाल से सटे यूपी के कई जिलों में धर्मांतरण और क्रिश्चियन-मुस्लिम आबादी बढ़ने की खबरें अक्सर सामने आती हैं। इस दौरान पता चला था कि लखीमपुर के 30 गांवों में ईसाई मिशनरी एक्टिव हैं। ये गांव थारू जनजाति के हैं और चंदन चौकी से गौरीफंटा बॉर्डर के करीब बसे हैं। ये एरिया पलिया तहसील में आता है। यहां की 15 ग्राम पंचायतों में 50 हजार से ज्यादा थारू आबादी रहती है। यहां पास के नझौटा गांव में एक चर्च है, जो दूर से दिखता है। यह चर्च घर में ही है और रमाकांत कश्यप इसका पादरी भी हैं। यहां आसपास के 300 से 400 लोग प्रेयर के लिए आते हैं। पिछले साल ही लखीमपुर के तिकुनिया बॉर्डर से 25 किमी दूर निघासन में धर्मांतरण का मामला सामने आया था। इसमें कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी।

धर्म तो दंगे और अपराध करवाता है, हम तो यीशू को फॉलो करते हैं
यहां के अंबेडकरनगर में बने चर्च में रमाकांत कश्यप प्रेयर कर रहे हैं। उम्र 35 से 37 साल के बीच होगी। जन्म से हिंदू हैं, पर अब यीशू को मानने लगे हैं। रमाकांत की पत्नी भी यीशू को मानती हैं। वे कहते हैं कुछ साल पहले एक मलयाली पास्टर गिरीश सही रास्ते पर लेकर आए। मेरी हर गलत आदत खत्म हो गई। इसके बाद से ही यीशू को फॉलो करने लगा हूं। रमाकांत से कहा कि उसका नाम तो हिंदुओं की तरह है। जाहिर है आपने धर्म बदला है, लेकिन कैसे और क्यों? जवाब में रमाकांत ने अजब तर्क गढ़ा, ‘मैंने धर्म नहीं बदला। यीशू धर्म बदलने को नहीं कहते हैं। धर्म तो दंगा करवाता है, अपराध करवाता है। हम यीशू को फॉलो करता हूं।’ रमाकांत की शादी 2016 में हुई थी। रमाकांत की पत्नी लीना रायबरेली की हैं और यीशू को फॉलो करती हैं। वो बताती है पिता की तबीयत खराब रहती थी। तभी एक पास्टर के संपर्क में आई। उनकी चंगाई सभा में जाने लगी, इसके बाद पिता की तबीयत सुधरने लगी। उनके ठीक होते ही यीशू को फॉलो करने लगी।’

यीशू को फॉलो करने वालों में दलित ज्यादा, चंगाई सभा सक्रिय
चर्च में फास्ट प्रेयर करने आए जयराम निघासन के ही रहने वाले हैं। वे दलित समुदाय से हैं। मजदूरी करते हैं। 2017 में उनकी तबीयत खराब हुई, फिर बिस्तर नहीं छोड़ पाए। जयराम बताते हैं, ‘मुझे कुष्ठ रोग भी हो गया। मेरी बुआ को किसी ने निघासन में चल रहे इस चर्च के बारे में बताया था। वे मुझे यहां लाईं। इसके बाद मैं भी चर्च में आकर प्रार्थना करने लगा।’ यहीं हमारी मुलाकात शांति से हुई। शांति भी दलित हैं। वे बताती हैं कि परिवार में बहुत कलह होती थी। आए दिन पति से झगड़ा होता था। मेरी आंख में कोई दिक्कत थी। कई डॉक्टरों को दिखाया। सभी ने आंख निकालने की बात कही थी। इसी बीच मेरे पति की तबीयत भी खराब हो गई। वे भी ठीक नहीं हो रहे थे।’ ‘किसी के बताने पर मैं 2018 में यहां आई। चंगाई सभा में आने पर फायदा होने लगा। इसके बाद मैंने दवाइयां वगैरह छोड़ दीं। यहीं प्रार्थना करती रही। हमारी तबीयत में सुधार होता रहा।’

दो मंजिला मकान में चल रहा बगैर रजिस्ट्रेशन का चर्च, पुलिस को पता नहीं
रमाकांत ने दावा किया कि ‘यहां आने वाले अनुयायी जो दान-दक्षिणा चढ़ाते हैं, उसी से घर चल रहा है।’ लेकिन उनका घर देखकर ऐसा नहीं लगता। उसका दो मंजिला मकान बना हुआ है। ग्राउंड फ्लोर पर परिवार रहता है। अंदर बरामदा है, जिसमें सीढ़ियां बनी हैं। बरामदे से अंदर जाने के लिए गैलरी थी। गैलरी के दोनों तरफ कमरे थे। अंदर एक लॉबी है, जिसमें एक तरफ CCTV फुटेज देखने के लिए मॉनिटर लगा है। बीच में कालीन के ऊपर सोफा रखा है। कालीन के नीचे बेसमेंट है, रमाकांत ने उसे दिखाने से इनकार कर दिया। रमाकांत भले घर को चर्च बताएं, लेकिन चर्च का रजिस्ट्रेशन उनके पास नहीं है। यूपी सरकार ने नवंबर, 2020 को अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाया था। रमाकांत से पूछा कि धर्मांतरण कानून आने के बाद क्या आप लोगों को रोका नहीं गया। उन्होंने तर्क दिया कि हम धर्मांतरण नहीं कराते। देखिए सारे नाम हिंदू ही हैं। जो लोग यीशू में विश्वास करते हैं, हम बस उन्हें यीशू को याद करने का तरीका बताते हैं। इसलिए पुलिस हमें परेशान नहीं करती।

संदिग्ध गांवों में कमेटियां बनाईं, ऑपरेशन कवच से क्राइम रोक रहे
बॉर्डर किनारे बसे थारू जनजाति के लोगों का धर्मांतरण कराया जा रहा है। रमाकांत ने बताया, ‘हम निघासन में हैं। ये नेपाल बॉर्डर से थोड़ा दूर है। हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।’ निघासन थाना क्षेत्र के बम्हनपुर में 18 सितंबर 2022 को 2 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। उन पर पैसे और नौकरी का लालच देकर 18 दलितों का धर्म परिवर्तन कराने का आरोप था। विश्व हिंदू परिषद के सह संयोजक सुमित जायसवाल और संयोजक आशीष की शिकायत पर पुलिस पहुंची थी। मौके से सुशील कुमार और राजकुमार को गिरफ्तार किया गया। दोनों अभी जमानत पर हैं। सीओ राजेश कुमार के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद नेपाल बॉर्डर पर ऑपरेशन कवच के तहत निगरानी की जा रही है। निघासन से सटे बॉर्डर पर हम लोग ऑपरेशन कवच चला रहे हैं। इसके तहत जिस गांव को हम संदिग्ध मानते हैं, वहां 10 लोगों की कमेटी बनाई हुई है। ये लोग हमें गांव में होने वाली संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी देते हैं।

जयपुर में नाबालिग को किडनैप करके जबरन धर्म परिवर्तन कराया
एक ओर नेपाल बॉर्डर पर खुलेआम धर्मांतरण का खेल चल रहा है, दूसरी ओर राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है। दलित हिंदुओं को ईसाई बनाने का मामला यहां सुर्खियों में रहा है। ताजा मामला राजधानी जयपुर का ही है, जहां एक नाबालिग हिंदू लड़की को किडनैप करके धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की गई। किसी तरह अपहर्ताओं के चंगुल से छूटकर घर वापस आई नाबालिग पागलों जैसी हरकत करने लगी। अपना बदला हुआ नाम बताकर खुद को मुस्लिम बताने लगी। मानसरोवर थाने में पीड़िता के पिता ने रिपोर्ट दर्ज करवाई है। पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के मुताबिक मानसरोवर निवासी एक व्यक्ति ने बताया कि उसकी 15 साल की बेटी पिंकी (बदला हुआ नाम) को किडनैप कर धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की जा रही है।

जबरन या लालच देकर धर्मांतरण को रोकने के लिए किस राज्य में क्या है कानून?
1.ओडिशाः पहला राज्य है जहां जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए कानून आया था। यहां 1967 से इसे लेकर कानून है. जबरन धर्मांतरण पर एक साल की कैद और 5 हजार रुपये की सजा हो सकती है। वहीं, एससी-एसटी के मामले में 2 साल तक की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है।
2.मध्य प्रदेशः यहां 1968 में कानून लाया गया था. 2021 में इसमें संशोधन किया गया। इसके बाद लालच देकर, धमकाकर, धोखे से या जबरन धर्मांतरण कराया जाता है तो 1 से 10 साल तक की कैद और 1 लाख तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
3.अरुणाचल प्रदेशः ओडिशा और एमपी की तर्ज पर यहां 1978 में कानून लाया गया था कानून के तहत जबरन धर्मांतरण कराने पर 2 साल तक की कैद और 10 हजार रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है।
4.छत्तीसगढ़ः 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद यहां 1968 वाला कानून लागू हुआ. बाद में इसमें संशोधन किया गया। जबरन धर्मांतरण कराने पर 3 साल की कैद और 20 हजार रुपये जुर्माना, जबकि नाबालिग या एससी-एसटी के मामले में 4 साल की कैद और 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
5.गुजरातः यहां 2003 से कानून है। 2021 में इसमें संशोधन किया गया था. बहला-फुसलाकर या धमकाकर जबरन धर्मांतरण कराने पर 5 साल की कैद और 2 लाख रुपये जुर्माना, जबकि एससी-एसटी और नाबालिग के मामले में 7 साल की कैद और 3 लाख रुपये के जुर्माने की सजा है।

याचिकाकर्ता की कोर्ट से अपील, धर्म परिवर्तन रोकने के लिए अलग से बने कानून
अब बात करते हैं सुप्रीम कोर्ट में धर्मांतरण को रोकने के लिए दायर याचिका की। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने 23 सितंबर को याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह और हिमा कोहली की बेंच ने जबरन धर्मांतरण के खिलाफ याचिका की सुनवाई करते हुए मौखिक टिप्पणी में इसे गंभीर मामला बताया। कोर्ट ने कहा कि जबरन धर्मांतरण न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा हो सकता है। याचिका में धर्म परिवर्तनों के ऐसे मामलों को रोकने के लिए अलग से कानून बनाए जाने की मांग की गई है। या फिर इस अपराध को भारतीय दंड संहिता (IPC) में शामिल करने की अपील की गई है। 

याचिकाकर्ता ने केंद्र के साथ-साथ तमाम राज्यों को भी प्रतिवादी बनाया
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने अर्जी दाखिल कर केंद्र और तमाम राज्यों को प्रतिवादी बनाया है। तामिलनाडु में 17 साल की लड़की की मौत के मामले में छानबीन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी अर्जी में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 21 एवं 25 के तहत धोखाधड़ी, धमकी या डराकर धर्म परिवर्तन कराया जाना अपराध घोषित किया जाए। याचिका में नैशनल इन्वेस्टिंग एजेंसी (NIA), सीबीआई (CBI) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को 17 साल की लड़की की मौत के मामले में कारण बताओ नोटिस जारी करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में कहा गया है कि दबाव बनाकर कराए जाने वाले अवैध धर्म परिवर्तन को संविधान के तहत अपराध घोषित किया जाए।

धर्म परिवर्तन गंभीर विषय है और इससे देश की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कहा कि जो मुद्दे उठाए गए हैं और जबरन धर्म परिवर्तन के जो आरोप लगाए गए हैं, अगर वो सही हैं और उनमें सच्चाई है तो फिर यह गंभीर विषय है और इससे आखिरकार देश की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे देश की जनता के ‘धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार’ प्रभावित होते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को इस मामले में स्टैंड क्लियर करना चाहिए। इसलिए केंद्र सरकार हलफनामा देकर बताए कि वह कथित जबरन धर्म परिवर्तन रोकने के लिए क्या कदम उठा रहा है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले की अगली सुनवाई 28 नवंबर को करेगा। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कई राज्य सरकारों ने इसे रोकने के लिए कानून बनाए हैं। उन्होने यह भी कहा कि कई उदाहरण हैं जहां चावल और गेंहू देकर धर्म परिवर्तन कराए जा रहे हैं। तब बेंच ने कहा कि आप बताएं कि आप क्या कदम उठा रहे है?

कोर्ट ने याचिका की दलीलों से जताई सहमति, सरकार जल्द उठाए कदम
सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका में दी गई दलीलों से सहमत होकर जबरन धर्मपरिवर्तन को गंभीर विषय माना और केंद्र सरकार से कहा है कि अगर यह सच है तो वह इसे रोकने के लिए गंभीरता से कदम उठाए। उच्चतम न्यायालय ने सरकार को चेतावनी भी दी कि यह एक कठिन स्थिति है जिस पर काबू नहीं पाया गया तो देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा होगा और नागरिकों के ‘धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार’ प्रभावित होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि इस पर एहतियाती कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जल्द कदम उठाना होगा, ताकि इसे रोका जा सके। अगर ऐसा नहीं किया गया तो कठिन समय आ जाएगा। 

आप की दिल्ली: मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरी के रास्ते पर चल रहे शिष्य केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईसाई संत मदर टेरेसा के शिष्य रहे हैं। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो किस विचारधारा से प्रेरित है। आम तौर पर माना जाता है कि शिष्य पर गुरु के उपदेशों का असर होता है। केजरीवाल पर भी उनके गुरु के उपदेश का असर दिखाई दे रहा हैे। वो उन्हीं के बताये रास्ते पर चल रहे हैं। जिस तरह मदर टेरेसा ने गरीबों की मुफ्त सेवा के बहाने दलितों और आदिवासियो के बीच पैठ बनाई। उसके बाद ईसाई मिशनरियों ने चमत्कारिक मुफ्त इलाज, मुफ्त शिक्षा और पैसे का लालच देकर और ऊंच-नीच, जात-पात का एहसास दिलाकर गरीब दलितों और आदिवासियों का धर्मांतरण कराया। उसी तरह केजरीवाल भी मुफ्त रेवड़ी कल्चर के जरिए गरीब दलितों, आदिवासियों, सिखों में पैठ बनाकर उनके बौद्ध और ईसाई धर्म में धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश: जिहाद की हिंसात्मक विचारधारा अलकायदा से प्रभावित और पोषित

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण गिरोह चलाने वालों के तार पाकिस्तानी आतंकी संगठन अलकायदा से जुड़ रहे हैं। ये गिरोह पैसे का लालच देकर मूक-बधिर और मामूली दिव्यांग लोगों को अपना पहला टारगेट बनाता था। इस गिरोह के सदस्य प्रतिबंधित संगठन सिमी (Student’s Islamic movement of India) से तो पहले से ही जुड़े हुए थे। अब यूपी एटीएस के हत्थे चढ़े अवैध धर्मांतरण में संलिप्त आरोपियों के पास के ऐसे साक्ष्य मिले हैं, जिससे इनका कनेक्शन अलकायदा से भी जुड़ रहा है।यूपी में एडीजी कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार ने दावा किया है कि इस मामले में पूर्व में महाराष्ट्र से गिरफ्तार एडम और कौसर आलम के पास से जो साक्ष्य मिले हैं, उससे पता चला है कि दोनों जिहाद की हिंसात्मक विचारधारा अलकायदा से प्रभावित और पोषित हैं।

राजस्थान:  जानकारी के बावजूद चुप्पी साधकर बैठे रहे अधिकारी
प्रदेश में धर्मांतरण को लेकर हिंदू जागरण मंच आक्रोशित है। मंच का आरोप है कि मिशनरी के संपर्क में आकर ईसाई धर्म के प्रचारक बने पास्टर धर्मपाल बैरवा व उनकी टीम ने क्षेत्र में धर्म के प्रचार के लिए वर्किंग कर रही है। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में जयपुर के सांगानेर में धर्मांतरण को लेकर एक बड़ा आयोजन था। धार्मिक सभा के आयोजन के नाम पर इसके पोस्टर पर भी लगाए गए थे। धर्म जागरण मंच के संजय सिंह शेखावत ने जांच स्थानीय नेता अमित शर्मा से कराई। मामला खुलता चला गया। फिर हिंदू संगठनों की आपत्ति के बाद यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। सांगानेर सदर के थानेदार बृजमोहन कविया खोखली दलील देते हैं कि आयोजकों ने कार्यक्रम की इजाजत ली थी। कार्यक्रम से दो-तीन दिन पहले आकर उन्होंने बताया कि अब कार्यक्रम नहीं कराना है। ईसाई धर्म के प्रचार के नाम पर ये लोग एससी या गरीब व्यक्ति को आर्थिक मदद या काम-धंधे का लालच देते हैं। 

अलवर: ईसाई धर्म अपनाने के लिए दवाब, हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर्स फाड़े
कांग्रेस सरकार जब राजधानी में ही धर्मांतरण को नहीं रोक पा रही है, तो जिलों में ऐसे मामलों में उससे कार्रवाई की क्या ही उम्मीद करें। जयपुर और बारां की तरह अलवर में भी धर्मांतरण का मामला पिछले माह ही आ चुका है। राजस्थान के अलवर जिले में माता-पिता पर अपने बेटे-बहू का धर्मांतरण कराने का आरोप लगा है। पीड़ित दंपति सोनू और उनकी पत्नी रजनी ने पिछले माह 19 अक्टूबर को इस मामले में शिकायत दर्ज कराई। इन दोनों ने शिकायत देते हुए पुलिस से कहा है कि सोनू के माता-पिता ने घर में रखी मूर्तियों को तोड़ दिया और हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर्स को फाड़ दिया है। वे लोग, इन पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए लगातार दवाब बना रहे हैं। 

बारां: बैथली नदी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और तस्वीरें प्रवाहित कर दीं
राजधानी से पहले राजस्थान के बारां जिले में धर्म परिवर्तन का एक बड़ा मामला सामने आया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गाँव में मां दुर्गा आरती का आयोजन कराने वाले दलित युवकों से मारपीट की गई। पूरे घटनाक्रम से गुस्साए दलितों ने सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन कर लिया। बताया जा रहा है कि 250 दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने से सनसनी फैल गई। वहीं, पुलिस अधिकारी पूजा नागर ने बताया कि बारां जिले के बापचा थाना क्षेत्र के भुलोन गांव बौद्ध धर्म ग्रहण किया गया है। हालाँकि पुलिस ने धर्म परिवर्तन करने वालों की संख्या काफी कम बताई है। गाँव में दलितों ने जुलूस निकालते हुए धर्मांतरण की शपथ ली और गांव की बैथली नदी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और तस्वीरें प्रवाहित कर दीं।

हिज्ब-उत-तहरीर के आतंकी के तार असदुद्दीन ओवैसी से जुड़ा, नरोत्तम मिश्रा ने दिए जाँच के आदेश

मध्य प्रदेश एटीएस ने आतंकी इस्लामी संगठन हिज्ब-उत-तहरीर (HUT) के जिन 16 सदस्यों को पकड़ा है, उनमें से एक मोहम्मद सलीम एआईएमआईएम चीफ व हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के कॉलेज में पढ़ाता था। जाँच में यह बात सामने आने के बाद बीजेपी लगातार औवेसी पर हमला कर रही है। उन पर हैदराबाद में आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप लगाया जा रहा है। इस क्रम में मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की प्रतिक्रिया भी सामने आई है।

उन्होंने सोमवार (15 मई, 2023) को कहा, “इन जिहादी कॉकरोचों के लिए हमारे मध्य प्रदेश की एटीएस पुलिस पेस्टिसाइड्स की तरह है। पुलिस लगातार ऐसे संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है। ब्रेनवॉश करने वाले सभी पढ़े लिखे लोग हैं। इनमें से एक हैदराबाद का प्रोफेसर है। एक इंजीनियर है। ये सभी लोग जो कार्य कर रहे हैं, वह निंदनीय है। मैं उन लोगों के बारे में कहना चाहता हूँ, जो केरल स्टोरी पर बोले, लेकिन HUT पर एक शब्द भी नहीं कहा। हमने पीएफआई को पकड़ा, सिमी का नेटवर्क ध्वस्त किया, लेकिन ये लोग एक शब्द भी नहीं बोले। ये तुष्टिकरण की राजनीति इन लोगों को बढ़ावा देती है। पहले लड़कों का धर्म परिवर्तन फिर उनके द्वारा लड़कियों का धर्मांतरण, ऐसे लोगों का कनेक्शन किससे जुड़ा है।”

उन्होंने इशारों-इशारों में इसका जिम्मेदार औवेसी को भी ठहराया। नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “इनमें से एक प्रोफेसर औवेसी के हैदराबाद वाले कॉलेज में ही पढ़ाता था। ये गंभीर विषय है। सार्वजनिक जीवन में जीने वाले लोग भी अगर इस तरह के काम को हतोत्साहित नहीं करेंगे तो दिक्कत होगी। इनको कहाँ से फंडिंग होती थी। इनके किस-किस से कनेक्शन हैं, इसके जाँच के आदेश दिए गए हैं। ये मामला ‘लव जिहाद’ से भी ऊपर जा रहा है इसलिए हमने कड़ी जाँच के आदेश दिए हैं।”

इससे पहले तेलंगाना बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने औवेसी को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि वह हैदराबाद में आतंकवादियों को पनाह दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि हैदराबाद हिज्ब-उत-तहरीर (HUT) जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए एक सुरक्षित जगह बन गया है। संजय ने मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव से माँग की थी कि वह इस मामले की जाँच करवाएँ। भाजपा नेता ने साथ ही यह भी आरोप लगाया था कि बीआरएस और कॉन्ग्रेस दोनों को हैदराबाद के लोगों की सुरक्षा की चिंता नहीं है। वे केवल अल्पसंख्यकों के वोट से सत्ता में आना चाहते हैं।

सलीम पहले सौरभ हुआ करता था। उसका पूरा नाम सौरभ राजवैद्य था। वह भोपाल के बैरसिया के पास का रहने वाला है। साल 2010 में उसने पहले खुद इस्लाम कबूला और 2012 में अपनी हिंदू बीवी को इस्लाम कबूल करवाया। इसके बाद दोनों हैदराबाद शिफ्ट हो गए। चूँकि सलीम मध्य प्रदेश से था, इसलिए उसे पूरे एमपी में हिज्ब-उत-तहरीर संगठन का एजेंडा फैलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई और ट्रेनिंग के लिए विदेश भेजा गया।

हैरानी की बात यह है कि सौरभ राजवैद्य से सलीम बनने के बाद उसे हैदराबाद में डेक्कन कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज के बायोटेक्निकल डिपार्टमेंट में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई और यहाँ वह कॉलेज में पढ़ाने के नाम पर मजहबी जहर फैलाने लगा।

ताबीज- झाड़-फूंक और चंगाई सभा ठीक तो धीरेंद्र शास्त्री गलत कैसे?

पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री को मोहरा बनाकर सनातन धर्म पर हमला करने वाले पाखंडी धर्म-निरपेक्ष मौलवी और पादरियों द्वारा धर्मांतरण करने पर क्यों चुप्पी साधे रहते हैं? जबकि धीरेन्द्र किसी मजहब के विरुद्ध नहीं बोल रहे, बल्कि अपने दरबार में अपने उस मुसलमान मित्र का वर्णन करना भी नहीं भूलते, जिसने अपनी बहन समझ उनकी बहन की शादी करवाई थी। 20,000 रूपए देने के अलावा बहन का सारा दहेज़। मै और मेरी बहन हिन्दू और मुसलमान। 

बापू आसाराम जिन्हें बलात्कार के आरोप में जेल में डाला गया, पाखंडी धर्म-निरपेक्ष जवाब दो कि पीड़िता और उसके माँ-बाप से घंटों पहले मीडिया कमला मार्केट थाने कैसे पहुंचा? क्या मीडिया इतनी अन्तरयामी है कि पीड़िता पुलिस में शिकायत करने आ रही है? सारे चैनल सुबह से लेकर शाम आसाराम को आरोपी सिद्ध करते रहे। रपट कमला मार्केट थाने में ही क्यों? क्या मीडिया ने कभी सच्चाई जानने की कोशिश की? यदि नहीं तो क्यों? देखिए संलग्न मेरी प्रकाशित रपट। जिसका आज तक किसी ने खंडन नहीं किया। 

बापू के विरुद्ध षड्यंत्र जून 2012 से चल रहा था, जब अपने एक समागम में उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी की छत्रसाया में ईसाई मिशनरी देश में धर्मान्तरण करने पर कहा था कि "सोनिया मैडम बहुत हो चूका तुम हिन्दुओं को ईसाई बनवाओगी आसाराम और उसके चेले उन्हें वापस हिन्दू बनाएंगे..." क्यों नहीं मीडिया ने सच्चाई सामने लेकर आयी? कहाँ थी खोजी पत्रकारिता? क्या खोजी पत्रकारिता हिन्दुओं के ही विरुद्ध जागती है?  

बागेश्वर धाम के पीठाधीश पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री आजकल चर्चा में हैं। हर चैनल पर बाबा बागेश्वर धाम छाए हुए हैं। सोशल मीडिया पर भी उनके बारे में ही चर्चा हो रही है। अंधश्रद्धा उन्मूलन समिति ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर जादू-टोने और अंधविश्वास फैलाने का आरोप लगाया है। अगर इस आरोप को सकारात्मक रूप में देखा जाये तो अब उंगलियां दूसरे मजहबों में हो रहे धर्मांतरण पर चर्चा करनी शुरू कर प्रश्नचिन्ह लगाने शुरू कर दिए हैं। यही कारण है कि इसके बाद धीरेंद्र शास्त्री के पक्ष में भी लोग सामने आ गए हैं। सोशल मीडिया पर यूजर्स बागेश्वर धाम सरकार के समर्थन में खड़े हो गए हैं।

पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का साफ कहना है कि जब से उन्होंने धर्मांतरण और घर वापसी का मुद्दा उठाया है, तब से इससे जुड़े कुछ लोग उनके पीछे पड़ गए हैं। विदेशी फंडिंग प्राप्त संस्थाओं की ओर से हो रहे धर्मांतरण के खिलाफ अभियान चलाने के कारण बागेश्वर धाम का विरोध हो रहा है। अंधविश्वास के सवाल पर लोगों का साफ कहना है कि क्या पादरियों के सामने पागल बन कर नाचना और दरगाहों पर चादर चढ़ाना सही है? 

हिन्दू लड़कियों से लव जेहादियों से सतर्क रहने की बात करते उन्हें 'बहन' कहकर सम्बोधित करते हैं। इतना ही नहीं, जिस मुस्लिम महिला ने हिन्दू धर्म स्वीकार किया, उसे भी 'बहन' कहकर सम्बोधित किया।  

सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे है कि अगर ताबीज- झाड़-फूंक और ईसाई मिशनरियों की ओर से आयोजित चंगाई सभा ठीक है तो फिर धीरेंद्र शास्त्री गलत कैसे हैं? लोगों का कहना है कि सनातन धर्म पर सवाल उठाने वाले ईसाई मिशनरियों और पीर-बाबाओं के चमत्कार पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं? इसको लेकर सोशल मीडिया पर लोग ईसाई मिशनरियों और पीर-बाबाओं के चमत्कार वाले कई वीडियो शेयर पर तंज कस रहे हैं।

केरल : मदरसा में इस्लाम सिखाने के बहाने महिलाओं का मौलवी ने किया यौन शोषण

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: DNA India)
केरल के कोझीकोड मुखदार तरबियाथुल इस्लामी सेंटर में इस्लाम कबूल करने वाली एक युवती ने मदरसा को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। महिला ने सेंटर के प्रमुख पर महिलाओं और लड़कियों को इस्लाम ‘सिखाने’ के बहाने प्रताड़ित करने और उनका यौन शोषण करने का आरोप लगाया है।

जनम टीवी के साथ अपने इंटरव्यू में, महिला ने कहा कि इस्लामी मदरसा का प्रमुख बड़ी संख्या में लड़कियों का यौन शोषण कर चुका है। महिला ने केंद्र की तुलना जेल से की और कहा कि महिलाओं और लड़कियों को मजहबी मदरसा छोड़ने पर प्रतिबंध है।

महिला के मुताबिक केंद्र के मुखिया मुस्लिम मौलवी ने एक दिन 18-19 साल की बच्ची के साथ रेप किया। इसके बाद लड़की को बताया गया कि स्नान करने के बाद उसके सभी पाप माफ हो जाएँगे। घटना के बारे में उसे कैसे पता चला, इस बारे में जानकारी देते हुए, महिला ने जनम टीवी को बताया कि पीड़िता ने ही उसके साथ आपबीती शेयर की थी।

महिला ने कहा कि पीड़िता को उसके परिवार वाले उसी दिन वहाँ से ले गए। महिला ने बताया कि कैसे मुस्लिम मौलवियों ने मजहबी केंद्र में शामिल होने के लिए असुरक्षित और कमजोर महिलाओं एवं लड़कियों को टारगेट किया और फिर इसके बाद उन्होंने उनके खिलाफ असहनीय अत्याचार किया। महिलाओं और लड़कियों को रहने के लिए घर और उनके खर्च के लिए पैसे देने के बहाने मदरसा में शामिल होने के लिए बहकाया गया।

महिला ने कहा कि लड़कियों को 40 दिनों के लिए केंद्र में रहने के लिए कहा गया था। इस दौरान मदरसा के प्रमुख ने उनमें से प्रत्येक के साथ व्यक्तिगत रूप से समय बिताया। महिला ने खुलासा किया कि उसने लड़कियों के कमरे में जाकर प्रताड़ित किया और उनका यौन शोषण किया। 19 वर्षीय लड़की द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न के बारे में बात करते हुए, महिला ने कहा कि घटना 8 जून को हुई थी, लेकिन पुलिस में कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई थी क्योंकि लड़की को कथित तौर पर पुलिस में घटना की रिपोर्ट करने के खिलाफ अपराधी द्वारा धमकी दी गई थी।

‘जीसस के कारण खत्म हो रहा कोरोना’: क्या IMA अध्यक्ष जयलाल अस्पतालों को बना रहे ईसाई धर्मांतरण का हथियार?

भारत के स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स के सबसे बड़े परिषद ‘इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ के अध्यक्ष के रूप में दिसंबर 2020 में डॉक्टर जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल को नामित किया गया था। संगठन के 95वें वार्षिक अधिवेशन में इसकी घोषणा हुई थी। डॉक्टर JA जयलाल ज्ञात हो कि वे मोदी सरकार और हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति खासी खुन्नस रखते हैं। साथ ही ‘सेक्युलर संस्थाओं’ के ईसाई धर्मांतरण की इच्छा भी रखते हैं। वे चाहते हैं कि अस्पतालों का इस्तेमाल भी ईसाई धर्मांतरण के लिए हो।

हाल ही में ‘Haggai इंटरनेशनल’ पर उनका एक इंटरव्यू आया। इसमें उन्होंने दावा किया कि ‘राष्ट्रवादी’ सरकार आधुनिक दवाओं को पश्चिमी बता कर उन्हें नष्ट करना चाहती है। उन्होंने लोगों से ‘अंतरराष्ट्रीय प्रार्थना’ की अपील करते हुए दावा किया कि अगर भारत सरकार सफल होती है तो 2030 तक भारत में कोई आधुनिक मेडिकल कोर्स ही नहीं रह जाएगा। डॉक्टर जयलाल अपने पद का इस्तेमाल ईसाई मिशनरी गतिविधियों के लिए भी करना चाहते हैं।

एक तरह से देखा जाए तो कोरोना वायरस संक्रमण महामारी भी उनके लिए मेडिकल छात्रों, डॉक्टरों और रोगियों को ईसाई में धर्मांतरित करने का एक अवसर बन कर आया है। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।

उन्होंने ईसाई संस्थाओं में भी गॉस्पेल (ईसाई सन्देश) को साझा करने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने IMA में अपने अध्यक्षीय भाषण में भी कहा था कि आज जो भी हैं वह ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर जीसस क्राइस्ट’ का गिफ्ट है और कल जो होंगे, वे भी उनका ही गिफ्ट होगा। उन्होंने इस दौरान मदर टेरेसा के उदाहरण का जिक्र किया, जिन पर पहले से ही ईसाई धर्मांतरण के आरोप लगते रहे हैं। ‘क्रिस्चियन टुडे’ के इंटरव्यू में भी उन्होंने बताया कि कैसे महामारी के बावजूद ईसाई मजहब आगे बढ़ रहा है।

वे कोरोना के प्रकोप के कम होने के लिए भी जीसस को ही क्रेडिट देते हैं। उन्होंने कहा था कि जीसस की कृपा से ही लोग सुरक्षित हैं और इस महामारी में उन्होंने ही सभी की रक्षा की है। उन्होंने कहा कि फैमिली प्रेयर्स और नाइट प्रेयर्स की मदद से ईसाई अब स्वर्ग की अनुभूति कर रहे हैं, न कि भौतिकतावादी दुनिया की। इस तरह से भारत के सबसे बड़े मेडिकल संगठन के मुखिया के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन या टीकाकरण का कोरोना से लड़ने में कोई रोल नहीं है।

आयुर्वेद की आलोचना में भी डॉक्टर JA जयलाल पीछे नहीं रहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि मोदी सरकार इसलिए आयुर्वेद में विश्वास करती है, क्योंकि उसके सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक आस्था हिंदुत्व में है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 3-4 वर्षों से आधुनिक मेडिसिन की जगह आयुर्वेद को लाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी और योग इत्यादि की जड़ें संस्कृत में हैं, जो हिंदुत्व की भाषा है।

                                                                 नारद पुराण में कोरोना 
डॉ जयलाल को एक डॉक्टर होने के नाते इतना तो ज्ञान होना ही चाहिए कि जो इलाज आयुर्वेद में है, उस मूल को असत्य नहीं किया जा सकता। आज आधुनिक चिकित्सा में कितने डॉक्टर हैं, जो  बिना कोई टेस्ट करवाए रोगी की नब्ज देख बीमारी की जड़ तक पहुँच सके। नब्ज वो टेस्टिंग मशीन है जो यह बता सकती है कि मरीज ने क्या खाया है। बशर्ते डॉक्टर ठीक से नब्ज पढ़ना जानता हो। यह कोई हवा की बात नहीं, कटु सत्य है। दूसरे, संस्कृत ही समस्त भाषाओं की जननी है। संस्कृत ही विश्व की सबसे प्राचीनतम भाषा है। 

बात लगभग 40 वर्ष पुरानी है, जब किसी परिचित को देखने लोकनायक जयप्रकाश हॉस्पिटल गया था, इमरजेंसी में एक बुजुर्ग हकीम अपनी रीढ़ की हड्डी से पानी निकलवाने के लिए आये, डॉक्टर ने उन्हें कई टेस्टिंग बता दी। अपनी हाकिमीयत दिखाते उन्होंने वहां आये एक मरीज की नब्ज देख, क्या खाया है, क्या बीमारी है, कब से है, जो खाया है वह इस बीमारी में नहीं खाना चाहिए, आदि आदि बता दवाइयां लिख दी। डॉक्टर हैरान, हकीम जी ने साफ लब्जों में कहा कि न डॉक्टरी पढ़ी, और न ही कोई पढ़ाने वाला। आज डॉक्टरी चलती है, टेस्टिंग पर, हमारे समय में चलती थी नब्ज पर। नब्ज कुछ नहीं छिपाती। आखिरकार उस डॉक्टर को टेस्टिंग की जिद छोड़ हकीम जी के आगे नतमस्तक हो उनकी बात माननी पड़ी।  

उन्होंने आरोप लगाया कि इन सबके जरिए सरकार लोगों के दिलो-दिमाग में संस्कृत भाषा को घुसाना चाहती है। डॉक्टर जयलाल ने बताया कि उन्होंने डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के जरिए देश भर में सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करवाए थे। उन्होंने हिन्दुओं में काफी देवताओं के होने की बात करते हुए एक बार कहा था कि उन्हें अब जीसस और मुहम्मद को ईश्वर मान लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये हर ईसाई का कर्तव्य है कि वे बाइबिल का संदेश सभी तक पहुँचाए।

फेवरिट सेक्स पोजिशन, मर्दानगी वाला व्यायाम… गे-लेस्बियन पोर्न: ईसाई ‘कन्वर्जन सेंटर में इलाज के नाम पर गोरखधंधा

वास्तव में समय बहुत बलवान होता है, एक समय था, जब मीडिया किसी हिन्दू संत अथवा संगठन द्वारा असामाजिक काम के करने पर समस्त हिन्दू समाज को लज्जित करने से पीछे नहीं रहते थे, परन्तु वही दुष्कर्म किसी दूसरे धर्मों में होने पर चुप्पी साधे रहते थे। मीडिया की इस नीति में अब कुछ अंतर दिखने लगा है। जबकि मुख्यधारा का मीडिया अभी भी अपनी TRP के मकड़जाल में फंसा हुआ है। 
केरल में ईसाई मिशनरियों द्वारा LGBTQI कन्वर्जन थेरेपी संस्थान (कन्वर्जन सेंटर्स) चलाए जा रहे हैं। इसके तहत एलेक्स (बदला हुआ नाम) नामक एक व्यक्ति को आईना दिया गया और ये कहने को कहा गया, “मैं पापी हूँ। मैं समलैंगिक हूँ। मैं कभी स्वर्ग नहीं जा सकता। जीसस क्राइस्ट मुझसे घृणा करते हैं। मुझे खुद को बदलना होगा।” अदिचिरा स्थित विन्सेंटियन कॉन्ग्रिगेशन द्वारा संचालित परित्राणा रीट्रीट सेंटर में अलेक्स सहित 30 लोग भर्ती थे। ये जगह केरल में कोट्टायम-एट्टुमन्नूर हाइवे पर स्थित है।

इस सेंटर की स्थापना 1990 में हुई थी। ‘द न्यूज़ मिनट’ में प्रकाशित खबर के अनुसार, अलेक्स को जब पता चला कि वो समलैंगिक है तो उसने खुद को ‘ठीक करने के लिए’ इस रिट्रीट सेंटर से संपर्क किया, जहाँ उसे 21 दिन के कोर्स में पंजीकृत किया गया। उसे एक बाइबिल, सफ़ेद कपड़े और एक नोटबुक दिया गया। रिट्रीट सेंटर से काफी दूर एकांत में ‘गे कन्वर्जन सेंटर’ स्थित है। 25000 रुपए जमा कराने और एक कंसेंट फॉर्म भरने के बाद वहाँ भेजा जाता है।

वहाँ 18 से 27 वर्ष की उम्र के कई पुरुष एवं महिलाएँ थीं। उन्हें एक-दूसरे से बातचीत की अनुमति नहीं थी और खाली समय में होली मेरी (Holy Mary) की तस्वीर के सामने प्रार्थना करने को कहा जाता था।

वहाँ सेशन लेने वाले पादरी खुद को साइकेट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट बताते थे। उन सबका दावा था कि वो पहले ‘Gay’ थे, लेकिन अब जीसस की राह पर चल कर ‘ठीक हो गए’ हैं। सभी को सुबह में ‘मर्दानगी बढ़ाने’ वाला व्यायाम कराया जाता था।

फिर प्राइवेट काउंसलिंग सेशंस होते थे, जहाँ उनसे उनकी यौन इच्छाओं और पसंदीदा सेक्स पॉजिशंस के बारे में सवाल पूछे जाते थे। साथ ही उन्हें लेस्बियन पोर्न देखने को कहा जाता था। जबकि लेस्बियनों को गे पोर्न देखने का निर्देश दिया जाता था। अलेक्स का कहना है कि इन सबके बावजूद वो और उसके साथ भर्ती अन्य लोग ‘ठीक नहीं’ हो पाए और सभी गहरी मानसिक प्रताड़ना और दबाव से गुजरे।

उनमें से कोई अपने माता-पिता की हत्या में जेल चला गया, कुछ घर से भाग निकले, कुछ ने आत्महत्या की तो कुछ ने इसी तरह जीवन बिताने की सोची। इसी तरह एक अन्य ट्रांस ईसाई महिला भी इस ‘थेरेपी’ से गुजरीं। उक्त महिला को तिरुवनंतपुरम के एक ऐसे ही सेंटर में भर्ती कराया गया था। उक्त संस्था की वेबसाइट दावा करती है कि उन्हें केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय से फंड्स मिलते हैं।

महिला ने बताया कि सेंटर में भर्ती लोगों को प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें चारों तरफ से 4 मीटर ऊँची दीवारों के बीच रखा जाता है। 4 पुरुष कर्मचारियों ने उक्त महिला के हाथ-पाँव बाँध कर जबरन बेहोश कर दिया। अर्ध-बेहोशी की अवस्था में उसे कई इंजेक्शंस दिए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की ‘कन्वर्जन थेरेपी’ अवैध है। लेकिन, लोगों को इन सेंटरों में अजीबोगरीब पलों से गुजरना पड़ता है। 

उत्तर प्रदेश : नाबालिग लडकी का कराया धर्म परिवर्तन, निकाह से पहले धरा गया धर्मांध प्रेमी

थाना रेलवे रोड में युवती से पूछताछ करती पुलिस
मेरठ में एक नाबालिग लडकी का पहले धर्म परिवर्तन कराया और अब शादी की तैयारी थी ! एक कार में दो धर्मांध युवक और एक लड़की होने की सूचना पर रेलवे रोड पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया। लडकी युवक के साथ जाने पर अड़ी रही। पुलिस गुरुग्राम (हरियाणा) से उसके परिजनों के आने का इंतजार कर रही है।
पुलिस के अनुसार जून 12 दोपहर दो धर्मांध युवक कार से एक लड़की के साथ शारदा रोड स्थित एक फोटोस्टेट की दुकान पर पहुंचे थे। कागजातों की फोटोकॉपी कराने के दौरान देखा गया कि, आधार कार्ड पर दी गई जन्मतिथि के अनुसार लड़की नाबालिग थी और धर्मांध युवक से उसका कोई संबंध नहीं था ! शक होने पर इसकी सूचना संकल्प संस्था के अध्यक्ष अतुल शर्मा को दी गई। अतुल शर्मा की सूचना पर पुलिस ने रेलवे रोड क्षेत्र में गाड़ी पकड़ ली। दोनों युवकों और लड़की को पूछताछ के लिए थाने ले आए।

युवती साथ जाने पर अड़ी

थाने में पूछताछ के दौरान धर्मांध युवक ने अपने आपको सिवालखास जानी का निवासी बताया। जो फिलहाल गुरुग्राम में रह रहा है। लड़की मूल निवासी आसाम की है, जिसका परिवार वर्तमान में गुरुग्राम में रह रहा है। लड़की ने बताया कि, वह उस युवक से प्रेम करती है। पिछले साल अक्तूबर में वह युवक के साथ घर छोड़कर चली गई थी। उसके परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने दोनों को बरामद किया। उसे उसके परिजनों की सुपुर्दगी में दे दिया गया, जबकि युवक को जेल भेज दिया था। युवक के जेल से बाहर आते ही उसने संपर्क साधा और दोनों ने शादी करने की योजना बना ली ! तीन माह बाद वह बालिग हो जाएगी। इसके बाद दोनों शादी कर लेंगे।

धर्म बदलने की बात कुबूली

पुलिस हिरासत में मौजूद युवक ने बताया कि, लड़की के परिजन मारपीट करते थे। इसलिए वह उसे लेकर घर से निकल गया। उसने शादी के लिए लड़की से धर्म परिवर्तन की बात कही। जिस पर वह राजी हो गई। लड़की के परिजन अब उससे अपना कोई संबंध होने से भी इंकार करते हैं। ऐसे में वह उसे नहीं छोड़ सकता। लड़की के बालिग होने में तीन माह ही बचे थे इसलिए वह कागज तैयार कराने में जुटे थे !

परिजन आने पर कार्रवाई

लड़की के परिजनों से संपर्क कर उन्हें बुलाने का प्रयास किया जा रहा है। उनके आने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। – इंद्रपाल, एसओ रेलवे रोड(साभार: अमर उजाला)