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‘जानवर, लाश और बच्ची से सेक्स जायज, नहाना भी ज़रूरी नहीं’: दारुल उलूम में बच्चों को दी जा रही स्तरहीन शिक्षा

NCPCR के संज्ञान के बाद दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट से हटाए गए 'बहिश्ती जेवर' के फतवे (साभार- ABP न्यूज़ और हिंदुस्तान)
प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद एक बार फिर से चर्चा में है। दरअसल, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने शरई मसलों पर लिखी गई एक किताब ‘बहिश्ती जेवर’ के फतवों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए देवबंद के डीएम और एसपी को नोटिस भेजा था। इसमें दारुल उलूम देवबंद में बच्चों को दी जा रही तालीम पर सवाल उठाए गए थे। जिस पर कार्रवाई करते हुए शासन ने देवबंद की वेबसाइट से उन विवादित अंशो को हटवा दिया है। जिसकी जानकरी अधिकारियों ने आयोग को 19 अक्टूबर, 2023 को दी।

शासन द्वारा की गई कार्रवाई की जानकारी देते हुए NCPCR के चेयरपर्सन प्रियंक कानूनगो ने रविवार (22 अक्टूबर, 2023) को पोस्ट किया, “नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के तौर तरीक़े बताने वाली मौलाना अशरफ़ अली थानवी की किताब बाहिश्ती ज़ेवर,मदरसा दारुल उलूम देवबंद सहारनपुर द्वारा फ़तवे जारी करने व बच्चों को सिखाने के काम में ली जा रही थी। जिस पर NCPCR ने संज्ञान ले कर ज़िला प्रशासन को नोटिस जारी किया था। ज़िला प्रशासन सहारनपुर ने तत्परता पूर्वक कार्यवाही करते हुए अवगत करवाया है कि उक्त किताब का उपयोग बंद करवा दिया गया है व संबंधित फ़तवे भी दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट से हटवा दिए गए हैं। शेष जाँच जारी है।”

दरअसल, दारुल उलूम के मदरसों में ऐसा पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा था, जिसमें कई विवादित संदर्भ व फतवे शामिल थे। जैसे जानवरों से रेप, मृत महिलाओं और नाबालिग बच्चियों से यौन सम्बन्ध के तौर तरीके बताए गए थे एवं उन्हें जायज ठहराया गया था। यहाँ तक कि नहाना भी जरुरी नहीं था। जिस पर दिल्ली की सामाजिक संस्था मानुषी सदन ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में शिकायत की थी। इसके बाद ही NCPCR की नोटिस के बाद अब इसे वेबसाइट व पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है।

मानुषी सदन संस्था ने गत 7 जुलाई, 2023 को शिकायत की थी कि इस्लामिक विद्वान दिवंगत मौलाना अशरफ अली थानवी की 100 साल पुरानी किताब “बहिश्ती जेवर” के जरिए दारुल उलूम छात्रों को नाबालिगों पर आपराधिक हमले, अवैध संबंध, दुष्कर्म और नाबालिगों की शादी की पढ़ाई करा रहा है।

जिसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सहारनपुर के डीएम व एसएसपी को जाँच करने व दारुल उलूम की वेबसाइट पर उपलब्ध ऐसी विवादित सामग्री को हटाने के लिए कहा था। साथ ही अधिकारियों को आयोग में तलब भी किया था।

आयोग की तरफ से जारी नोटिस में कहा गया था कि बच्चों को दारुल उलूम की तरफ से जारी फतवों को पढ़ाया जा रहा है। बच्चों को वो फतवे पढ़ाए जा रहे हैं जो वेबसाइट पर मौजूद हैं। और यह बाल अधिकार के खिलाफ है। 

आयोग ने कहा कि उन्हें दारुल उलूम देवबंद की तरफ से जारी फतवों के खिलाफ एक शिकायत भी मिली है। फतवे में ‘बहिश्ती जेवर’ नामक पुस्तक का जिक्र है, जो बच्चों के लिए आपत्तिजनक, अनुचित और अवैध है। 

इसी मामले में 19 जुलाई, 2023 को बाल संरक्षण आयोग के निर्देश पर एसडीएम संजीव कुमार के नेतृत्व में सीओ रामकरण सिंह, डीआईओएस योगराज सिंह, डीएसओ डॉ. विनिता, बीईओ डॉ. संजय डबराल की टीम दारुल उलूम पहुँची थी। टीम ने संस्था के नायब मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी और सद्र-मुदर्रिस मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात की थी और पूरे मामले की जाँच की थी।

इस मामले में दारुल उलूम के जिम्मेदारों ने टीम को बताया था कि पुस्तक से संस्था का कोई वास्ता नहीं है। जिसके बाद उन्हें वेबसाइट से हटवा दिया गया। वहीं अब 19 अक्टूबर, 2023 को आयोग में प्रस्तुत होकर अधिकारियों ने बताया कि चार सदस्यीय टीम की जाँच के बाद विवादित सभी फतवों और पुस्तक को दारुल उलूम समेत अन्य सभी वेबसाइट से हटवा दिया गया है।

महबूबा मुफ्ती को जलाभिषेक करते देख भड़के कट्टरपंथी, देवबंद के मौलाना ने कहा- इस्लाम विरोधी

महबूबा मुफ्ती पहुँची मंदिर (तस्वीर साभार: ANI)
जब कभी किसी मुस्लिम प्रथा पर प्रहार होता है, सभी छद्दम धर्म-निरपेक्षों को 'गंगा-जमुनी तहजीब' संकट में दिखनी शुरू हो जाती है, लेकिन जब किसी मुस्लिम द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं में अपनी आस्था व्यक्त करता है, दोगलापन जगजाहिर हो जाता है। इसी तरह एक बात न्यूज़18 पर अमिश देवगन के शो आर-पार में मौलाना रशीदी ने अकबर द्वारा जोदाबाई से शादी करने के कारण उसको हिन्दुओं का जीजा बताने पर शो में मौजूद श्रीमती सुबुही खान ने तुरंत ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए कहा कि "मैंने हिन्दू लड़के मिश्रा से शादी की है, तो इस हिसाब से मेरे पति तुम सबके जीजा हुआ", तुरंत रशीदी और शुएब जमाई का दोगलापन बाहर आ गया। वही स्थिति जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने हाल में एक मंदिर में जाकर पूजा पाठ की। यह मंदिर पूंछ जिले का नवग्रह मंदिर है। इसे पूर्व पीडीपी एमएलसी यशपाल शर्मा द्वारा बनवाया गया था। यहीं पहुँचकर महबूबी ने पहले शिवलिंग का जलाभिषेक किया और फिर वहाँ फूल चढ़ाए जाने पर कट्टरपंथियों का सियापा शुरू हो गया। हवा में उड़ गयी 'गंगा-जमुना तहजीब'। 

मंदिर जाकर पूजा-पाठ करने की उनकी वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल है। इसे देख कट्टरपंथी उनसे नाराज हैं। कहा जा रहा है कि ये सब चुनावों को मद्देनजर रखकर हो रहा है। वहीं देवबंद के मौलाना असद कासमी ने कहा है, “महबूबा ने जो किया वो सही नहीं है, उनका मंदिर जाना, शिवलिंग पर जल चढ़ाना, इस्लाम के खिलाफ है।”

एक ट्विटर यूजर ने महबूबा की वीडियो देख लिखा- “ये सब इस्लाम में बिलकुल स्वीकार्य नहीं है। चाहे ये महबूबा करे या कोई और।”

काशिफ शेख ने लिखा- “एक पत्थर पर ही तो पानी डाला है। पत्थर समझ कर ही पानी डाला होगा।”

मुस्तफिज आलम ने कहा, “मैं किसी धर्म के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन जो भी किया वो इस्लाम के खिलाफ है। शर्म आनी चाहिए ये सब करने पर।”

वहीं भाजपा ने भी उनके मंदिर जाकर पूजा-पाठ करने को नौटंकी बताया। प्रदेश प्रवक्ता रणवीर सिंह ने कहा कि ये नौटंकी करके महबूबा मुफ्ती को कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे “2008 में महबूबा मुफ्ती और उनकी पार्टी ने अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड को भूमि आवंटन का विरोध किया था। महबूबा मुफ्ती की पार्टी ने तीर्थयात्रियों के लिए हट के निर्माण के लिए श्राइन बोर्ड को भूमि के अस्थायी हस्तांतरण की अनुमति नहीं दी थी।”

‘मुस्लिम महिलाओं के हस्तमैथुन’ से लेकर ‘सेक्स के बाद नहाने’ तक: दारुल उलूम देवबंद के फतवे

इस्लाम में ‘क्या सही है और क्या नहीं’ इसकी जानकारी के लिए दारुल उलूम देवबंद के पास सैंकड़ों मुस्लिम आते हैं। वे अपनी निजी जीवन से संबंधी कुछ सवाल करते हैं और देवबंद से उन्हें जवाब ‘क्या हलाल है क्या हराम’ इसके आधार पर फतवा जारी करके दिया जाता है। इन्हीं सवालों में कई सवाल महिलाओं से जुड़े होते हैं। कुछ प्रश्न हस्तमैथुन पर होते हैं, कुछ सेक्स से जुड़े और कुछ गैर मजहबी औरतों से जुड़े।

ऑपइंडिया दोबारा कुछ चुनिंदा सवालों की सूची आपके लिए देवबंद की साइट दारुलइफ्ता से लेकर आया है। ये सारे सवाल महिलाओं से संबंधी हैं।

गैर-किताबी महिला से निकाह 

दारुलइफ्ता साइट पर जॉर्डन के एक शख्स ने मजहबी सलाह पाने के लिए दारुल उलूम से सवाल किया कि उसने एक जर्मन लड़की से शादी की थी। मगर लड़की न तो इस्लाम और न ईसाइयत और न ही कोई धर्म मानती है। वह मौत के बाद की जिंदगी और हूरों में भी विश्वास नहीं करती। मगर निकाह से पहले उसने ‘ला इला इल्लाह’ बोला है। शौहर ने पूछा कि आखिर उनकी शरिया के अनुसार क्या स्थिति है। वो अपनी बीवी को छोड़ना नहीं चाहता।

एक मजहबी शौहर के सवाल पर दारुल उलूम ने कहा कि अगर उस व्यक्ति की बीवी कोई मजहब नहीं मानती है तो मतलब है कि वो नास्तिक है/काफिर है। उससे साफ पूछा जाना चाहिए कि वो अल्लाह को मानेगी या नहीं और अगर वो मानने से मना करती है तो उससे फौरन दूरी बना ली जानी चाहिए।

वलीमा के कार्ड में दुल्हन का नाम

गैर-मजहबी महिला से जुड़े सवाल के अलावा इस साइट पर कई सवाल मजहबी लड़कियों/महिलाओं को लेकर भी हैं। यहाँ एक व्यक्ति ने सवाल किया हुआ है कि क्या वो अपने वलीमा के कार्ड में अपनी होने वाली बीवी का नाम छपवा सकता है या नहीं। इस सवाल के जवाब में दारुल उलूम देवबंद ने उसे बताया कि होने वाली बीवी का नाम दावत पत्र में नहीं लिखवाना चाहिए।

बैंक में काम करने वाले आदमी के घर निकाह

अगला सवाल है कि क्या उस परिवार से निकाह के ऑफर को स्वीकारा जाना चाहिए जहाँ लड़की के पिता बैंक क्षेत्र में हों। इस प्रश्न के जवाब में दारुल उलूम की ओर से कहा गया कि जो लोग हराम के पैसे कमाते हैं उनमें  नैतिकता की कमी होती है इसलिए ऐसे रिश्तों से बचा जाना चाहिए।

मुस्लिम महिला हस्तमैथुन कर सकती है क्या?

मजहबी शिक्षा से संबंधी साइट पर हस्तमैथुन को लेकर भी सवाल किए गए हैं। पूछा गया है कि क्या शरिया लॉ के अनुसार मुस्लिम लड़की हस्तमैथुन कर सकती है या नहीं। देवबंद ने इस सवाल पर जवाब दिया कि किसी भी मुस्लिम लड़की को ऐसे गुनाह करने से बचना चाहिए।

यौन संबंध के बाद नहाना जरूरी या नहीं?

ये सवाल एक महिला ने किया है। वह पूछती हैं कि अगर कोई शादीशुदा महिला सिर्फ संतुष्टि के लिए उंगली से स्पर्श करवाती है और कोई तरल पदार्थ बाहर नहीं निकलता तो क्या नहाना या खुद को साफ करना जरूरी है या नहीं। इसके जवाब में उसे बताया गया कि अगर खातून बिना किसी वासना के अपनी योनि में उंगली डालती है और उसे कुछ महसूस नहीं होता तो नहाना आवश्यक नहीं है। मगर ये काम अगर शौहर ने किया हो तो नहाना जरूरी है।

बहन की आधुनिक शिक्षा पर सवाल

इस साइट पर एक व्यक्ति ने अपनी 14 साल की बहन के लिए सवाल किया कि उसकी बहन मॉर्डन शिक्षा ले रही है और इस्लाम के निर्देश नहीं मानती। उसे इस्लामी संस्थान भी भेजा गया। दारुल उलूम ने इस सवाल को सुनकर कहा कि उन लोगों की कोशिशें फायदा देंगी और बहन जल्दी इस्लामी मानदंडों को अपनाना शुरू कर देगी।
अवलोकन करें:-
कंडोम से लेकर पेपर में नकल, स्मार्टफोन के कैमरे और फर्जी अटेंडेस तक… दारुल उलूम देवबंद के 6 अजीब
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कंडोम से लेकर पेपर में नकल, स्मार्टफोन के कैमरे और फर्जी अटेंडेस तक… दारुल उलूम देवबंद के 6 अजीब
अपने विवादित फतवों के कारण आए दिन चर्चा में रहने वा

विवादित फतवों के लिए नामी है दारुल उलूम देवबंद

इस्लामी शिक्षा देने के लिहाज से स्थापित किया गया दारुल उलूम देवंबंद मुस्लिमों में बेहद जाना-माना शिक्षण संस्थान है। ये उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित है और विवादित फतवों के लिए जाना जाता है। साल 2018 में इनकी ओर से सीसीटीवी लगाने का विरोध किया गया था। इसी प्रकार महिलाओं के फुटबॉल देखने पर भी इन लोगों ने विरोध किया हुआ है। इतना ही नहीं, एक बार इस जगह से फतवा जारी किया गया था कि चूड़ियाँ पहनाते वक्त भी दुकानदार को महिला को छूना नहीं चाहिए। अभी हाल में ‘गोद लिए बच्चे के वारिस बनने या न बनने’ पर फतवा जारी करके ये विवादो में आया था।

कंडोम से लेकर पेपर में नकल, स्मार्टफोन के कैमरे और फर्जी अटेंडेस तक… दारुल उलूम देवबंद के 6 अजीब फतवे

अपने विवादित फतवों के कारण आए दिन चर्चा में रहने वाला दारुल उलूम देवबंद हाल में ‘गोद लिए बच्चे के वारिस बनने या न बनने’ पर अपने फतवा के कारण चर्चा में है। ये पहली बार नहीं है कि देश के मुसलमानों को इस्लामी शिक्षा देने के लिहाज से स्थापित हुआ ये संस्थान विवाद में आया हो, कई बार अपने अजीबोगरीब फतवों की वजह से ये मीडिया सुर्खियों में रहा है और दिलचस्प बात ये है कि संस्थान एक दारुलइफ्ता नाम से साइट चलाता है जहाँ मुसलमानों के सवालों के जवाब दिए जाते हैं और आए दिन नए-नए फतवे जारी होते हैं।

 darulifta-deoband.com साइट पर मुस्लिम आते हैं। अपने अजीबोगरीब सवाल रखते हैं। फिर दारुल उलूम देवबंद की ओर से उन्हें ज्ञान दिया जाता है और फतवा जारी कर बताया जाता है कि जो वो कर रहे हैं वो इस्लाम के लिहाज से हलाल है या हराम। हमने इस साइट से चंद सवाल छाँटे हैं जिनपर जारी फतवे यदि आप पढ़ेंगे तो हो सकता है कि कुछ आपको बेहद हास्यास्पद लगें और कुछ ऐसे लगें जो बताते हैं कि आखिर कैसे पिछड़ी सोच के पीछे मजहबी ठेकेदारों को हाथ होता है।

सवाल-जवाब और फतवे

पहला सवाल देखिए- एक व्यक्ति ने पूछा कि वो Paytm में काम करता है और उसका सवाल है कि उसे जो सैलरी मिलती है अगर वो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से कंपनी को मिले इंटरेस्ट पर मिलती है। तो क्या उसकी सैलरी हराम है या हलाल?

आप सोचेंगे कि ये कैसा सवाल है। लेकिन, दारुल उलूम ने इस पर गंभीर विचार करके जवाब दिया हुआ है। फतवा संख्या 866/864/B=9/1438 के अनुसार कहा गया अगर कंपनी अपने कर्मचारी को आरबीआई से मिले ब्याज में से सैलरी दे रही है तो ये हलाल बिलकुल नहीं है। दारुल उलूम ने सवाल पूछने वाले को कोई अच्छी नौकरी ढूँढकर इस नौकरी को छोड़ने की सलाह दी हुई है।

                                     साभार सभी चित्र दारुलइफ्ता साइट से लिया गया स्क्रीनशॉट

दूसरा सवाल है कि क्या कोई व्यक्ति कैमरे वाला मोबाइल इस्तेमाल करते हुए उसमें तस्वीरें ले सकता है? उसमें वीडियो बना सकता है? देवबंद की ओर से फतवा नंबर 1157/B=1335/B के तहत इस सवाल के जवाब में कहा गया कि मोबाइल फोन का काम संपर्क करने के लिए है। इसलिए सिर्फ इतना ही इस्तेमाल उसका किया जा सकता है। लेकिन किसी जीवित की तस्वीर लेना, फोटोग्राफी करना इस्लाम में नहीं है, इसलिए इससे तस्वीरें लेना और वीडियो फिल्म बनाना दारुल उलूम के हिसाब से बिलकुल ठीक नहीं है।

तीसरा सवाल: क्या अनचाही प्रेगनेंसी से बचने के लिए इस्लाम में कंडोम के इस्तेमाल को अनुमति दी गई है? देवबंद द्वारा जारी जवाब में फतवा 517/440/B=1431 जारी कर बताया गया कि बिन किसी कारण के कंडोम का इस्तेमाल जायज नहीं है। ये इस्लामी कानून के विरुद्ध है। हाँ! अगर बीवी कमजोर है और गर्भ नहीं धारण कर सकती है या बीमार रहती है तो फिर कंडोम का इस्तेमाल हो सकता है।

चौथा सवाल: क्या नकल करके पास होना जायज है या नाजायज और किसी भी काम से पैसा कमाना हराम है या हलाल? इस सवाल के जवाब में देवबंद की ओर से जारी फतवा नंबर 490/490=M/1429 के मुताबिक बताया गया कि अगर कोई पास हो जाए नकल करके तो वो नाजायज है मगर इससे उसे जॉब मिले, डिग्री मिले और वो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर पाए तो ये जायज हो जाएगा। बस उसे नकल के लिए गुनाह लगेगा। इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए।

पाँचवा सवाल एक लड़के ने किया कि क्या वो एक ऐसी शेरवानी पहन सकता है जिसपर ब्रोकेड के फेब्रिक का काम हो। इस सवाल पर देवबंद ने फतवा 244/226/SD=3/1439 जारी करते हुए कहा कि अगर शेरवानी सिल्क की है और उसपे कोई चांदी या सोने के धागे का इस्तेमाल नहीं है तो उसे पहना जा सकता है। उसे निकाह समारोह में पहना जा सकता है। लेकिन इस पर फिजूल खर्जी और इसे घमंड के साथ पहनना जायज नहीं है। शरीया के अनुसार इतने कीमती कपड़े पहनना ठीक नहीं है।  अगर शेरवानी में सोने-चांदी के धागे से कारीगरी है तो सवाल दोबारा पूछा जाए।

छठा सवाल फर्जी अटेंडेंस साइन को लेकर है। किसी ने पूछा कि वो रोज कॉलेज में मौजूद नहीं हो पाता है तो क्या अपने दोस्तों से प्रॉक्सी लगवाना सही है या नहीं। इस पर देवबंद ने फतवा नं 793/671/N=7/1439 के जरिए बताया कि इस तरह फर्जी अटेंडेंस लगाना या लगवाना गलत है। ये बहुत गलत है। जो भी ऐसा करता है वो गुनहगार है।

ये वो चंद सवाल-जवाब हैं जो हमें दारुलइफ्ता-देवबंद की साइट पर पढ़ने को मिलते हैं। इनके अलावा इस साइट पर तमाम ऐसे सवाल किए जाते हैं जो किसी सामान्य जन को बेहद बचकाना लगें। लेकिन, यहाँ पूछने वाले के लिए ये गंभीर विषय होता है और दारुल उलूम भी इसका जवाब बेहद संजीदा ढंग से फतवा जारी करके देता है।

सऊदी अरब द्वारा तबलीगी जमात पर प्रतिबंध लगाने से नाराज़ हुआ दारुल उलूम देवबंद, कहा – किया जा रहा बदनाम

दारुल उलूम देवबंद ने इस्लामिक मिशनरी आंदोलन तबलीगी जमात (tablighi Jamat) को ‘आतंकवाद का प्रवेश द्वार’ बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने के सऊदी अरब सरकार के फैसले का विरोध किया है। देवबंद के मुख्य मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने सऊदी अरब से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील करते हुए कहा कि इससे मुस्लिमों के लिए गलत संदेश जाएगा। 

भारत में इस्लामिक आतंकवाद के पैर पसारने के बाद से ही तब्लीग और मदरसों पर आतंकवाद को प्रोत्साहित करने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन छद्दम सेक्युलरिस्ट्स इसे इस्लाम पर हमला करने का आरोप लगाकर तुष्टिकरण की सियासत करते रहे। लेकिन अब उसी काम को सऊदी अरब द्वारा अंजाम देने से राष्ट्रप्रेमियों के आरोप को सत्य सिद्ध कर दिया है। अब भारत में पल रहे छद्दम सेक्युलरिस्ट्स क्यों चुप हैं? देवबंद के सिवाए किसी ओर से कोई विरोध नहीं हो रहा, क्यों?  कहाँ गए समस्त कट्टरपंथी? क्या सऊदी अरब द्वारा तब्लीग पर प्रतिबन्ध लगाने से इन छद्दमों के इस्लाम पर खतरा नज़र नहीं आ रहा?  

यह पहली बार है जब देवबंद के इस्लामिक मदरसा ने सऊदी सरकार की खुलेआम निंदा की है। नोमानी ने तबलीगी जमात पर लगाए गए आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताया है। साथ ही दावा किया कि जमात दीन (विश्वास) फैलाने का काम करने का काम करता है। इसके साथ ही देवबंद ने सऊदी सरकार के फैसले को पश्चिमी देशों की साजिश करार दिया है। उसका आरोप है कि जमात को बदनाम किया जा रहा है।

वहीं इस मामले में दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात के मुख्यालय ने इस मामले में कहा है कि सऊदी का निर्णय प्रभावशाली पश्चिमी ताकतों के द्वारा लिया गया है, जो कि रियाद की मुस्लिम उम्मा से सदियों पुराने जुड़ाव को खत्म करना चाहता है। तब्लीगी जमात के प्रवक्ता समीरुद्दीन कासमी ने अपने सदस्यों का बचाव किया और कहा कि हमारा आतंकवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है।

100 पहले आया अस्तित्व में

देवबंद के मोहतमिम अब्दुल कासिम नोमानी का कहना है कि दारुल उलूम के उस्ताद रहे हजरत मौलाना हसन के शिष्य मौलाना मोहम्मद इलयास ने 100 साल पहले तबलीगी जमात की स्थापना की थी।
सऊदी सरकार का फैसला 
11 दिसंबर 2021 को सऊदी अरब ने तबलीगी जमात और दाबा को ‘आतंकवाद का द्वार’ करार देते हुए अपने यहाँ की मस्जिदों के मौलानाओं को शुक्रवार को दिए जाने वाले उपदेश के दौरान इन दोनों संगठनों के बारे में जनता को चेताने को कहा था। सऊदी के इस्लामिक मंत्रालय ने तबलीगी जमात को समाज के लिए खतरा माना है।

इस्लामिक चक्रव्यूह में भारत …. सामने खड़ी है एक और चुनौती

विनोद कुमार सर्वोदय, उगता भारत 
पूर्वाग्रहों के कारण इस्लामिक चक्रव्यूह में घेरने के लिये भारत को एक और चुनौती दे रहा है? 

यह कोई चौकाने वाला समाचार नहीं, बल्कि पूर्व में पिछली सरकारों की कार्यशैली पर नज़र डालनी होगी या फिर यूँ कहा जाए 'eye no eye', यानि देश को सेकुलरिज्म के नाम पर देश को अँधेरे में रख अल्पसंख्यक के नाम पर गजवा-ए-हिन्द बनाने का गुप्त षड्यंत्र चल रहा था, और हिन्दू सेकुलरिज्म के नाम पर अपने-आपको लुटवाता रहा। 

समाचारों से ज्ञात हुआ है कि इस्लामिक संस्था : दारुल-उलूम, देवबंद में पिछले दिनों (24 जुलाई 2018) को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना सैय्यद महमूद मदनी सहित अनेक उलेमाओं और मौलानाओं के समक्ष एक सौ मुस्लिम युवकों द्वारा शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन किया गया है। लेकिन उसकी तुलना देश की किसी सैनिक अकादमी में हुई “पास आउट परेड” के प्रशिक्षित सैन्य अधिकारियों से की जाय तो संभवतः कुछ अतिशयोक्ति हो सकती है ?

वैसे पूर्व राज्यसभा सांसद मौलाना मदनी ने 100 मुस्लिम युवाओं का विश्व के एक प्रमुख इस्लामी केंद्र देवबंद (भारत) में तथाकथित कला का प्रदर्शन कराकर अपनी अराष्ट्रीय मानसिकता का परिचय कराया है। देश के पांच राज्यों के ‘मेवात’ सहित 16 जनपदों से आये हुए इन प्रशिक्षित युवकों के कला प्रदर्शन के माध्यम से ‘जमीयत उलेमा-ए-हिन्द’ ने “जमीयत यूथ क्लब” के गठन व उसकी भावी योजनाओं को संभवतः पहली बार उजागर किया है।

जमीयत की इस योजनानुसार प्रति वर्ष साढ़े बारह (12.5) लाख मुसलमान नवयुवकों को “विशेष प्रशिक्षण” देकर तैयार किया जा रहा है। मौलाना मदनी का मानना है कि ऐसा प्रशिक्षण पाने से कोई भी बाहरी शक्तियां इन मुस्लिम युवकों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगी। इस प्रकार आगामी दस वर्षों में अर्थात सन 2028 तक देश के एक सौ जनपदों के सवा करोड़ (1.25 करोड़) मुस्लिम नवयुवकों को विशेष प्रशिक्षित किया जायेगा।समाचारों के अनुसार जमीयत की इस योजना में मान्यता प्राप्त ‘भारत स्काउट व गाइड’ का भी सहयोग लिया जा रहा है। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द, जमीयत युथ क्लब व भारत स्काउट व गाइड मिलकर देश की सेवा करेंगे। इन योजनाओं पर होने वाला सारा व्यय केवल जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ही वहन करेगी।

ऊपरोक्त परिप्रेक्ष्य में ऐसा प्रतीत होता है कि जमीयत देश की वर्तमान शासकीय व प्रशासकीय व्यवस्थाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में बाधक मानकर मुस्लिम समुदाय को भ्रमित करके देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बिगाड़ना चाहती है। धर्म या सम्प्रदाय विशेष को ऐसा सशक्त बल या समूह या क्लब बनाने को क्या हमारा संविधान अनुमति देगा ? क्या इस प्रकार ‘भारत स्काउट व गाइड’ के नाम का सहारा लेकर व सुरक्षा के बहाने देश को भ्रमित किया जा सकता है ? जबकि वर्षों से यह स्पष्ट है कि भारतीय मुसलमानों को आम नागरिकों से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। उनको लाभान्वित करने के लिये अल्पसंख्यक आयोग व मंत्रालय सहित अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं, फिर भी उनको अपनी सुरक्षा के प्रति “भय” क्यों ? क्या यह “भय” मुस्लिम समाज को भयभीत करके देश में साम्प्रदायिक वातावरण बिगाड़ने के लिये तो नहीं ?

यदि मुस्लिम समाज अपनी इस्लामिक विचारधारा को ही सत्य मानेगा और विश्व के अन्य समाजों की विचारधाराओं और संस्कृति को अपने अनुरूप बनाने की अंतहीन जिहादी सोच में परिवर्तन नहीं करेगा तो उनमें अन्यों के साथ जियो और जीने दो की सुखद भावना का विकास कैसे होगा? मानवीय सिद्धान्तों और नैतिक मूल्यों को इस्लामी जगत को स्वीकार्य होना ही चाहिये। आज सभ्य समाज को यह स्वीकार नहीं है कि कोई आतंकियों की तरह उन्हें भयभीत करें और उनको क्षति पहुंचाता रहे। यह सर्वथा अनुचित है कि सहिष्णुता के नाम पर विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों के प्रति भारतीय समाज सहनशील बना रहे ?

कुछ षड्यंत्रकारी जमीयत यूथ क्लब की तुलना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से करके इसे उचित ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि संघ दशकों से भारतीय मूल्यों की रक्षा के साथ- साथ सम्पूर्ण भारतीय समाज, उसमें हिन्दू-मुस्लिम- सिख-ईसाई आदि सभी की अनेक प्रकल्पों द्वारा सेवा करता आ रहा है।

इसके अतिरिक्त ‘मॉब लिंचिंग’ का भी भय दिखा कर इस प्रकार के संगठन के गठन को उचित बताने वाले भी हिन्दू विरोध की अवधारणाओं से ग्रस्त है। जबकि ‘मॉब लिंचिंग’ या ‘भीड़ हत्या’ या “सामूहिक अत्याचारों” से भरे मुगलकालीन इतिहास व वर्तमान को भुला कर चालबाज बुद्धिजीवियों ने “लव जिहाद व गौहत्या” आदि के विवादों में हिंदुओं को ही दोषी मानकर भ्रमित प्रचार करने का माध्यम बना दिया है।

क्या यह सर्वविदित नहीं है कि हिन्दू समाज उदार व अहिंसक होने के कारण मुस्लिम कट्टरपंथियों व आतंकवादियों की हिंसात्मक गतिविधियों का वर्षो से शिकार होता आ रहा है ? ऐसे में हैदराबाद के अकबरुद्दीन ओवैसी की विषैली फुफकार को भी भुलाया नहीं जा सकता जब उसने आदिलाबाद में 24 दिसम्बर 2012 को एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि पंद्रह मिनट को पुलिस हटा लो हम मुसलमान करोडों हिंदुओं पर भारी पड़ेंगे।फिर भी मुस्लिम समाज अपनी तथाकथित सुरक्षा के नाम पर सशक्त सेना के समान एक विशाल संगठन खड़ा कर रहा है, क्यों ? क्या यह भारत के इस्लामीकरण करने की जिहादी सोच के मिशन का भाग तो नहीं ?

आपको स्मरण रखना होगा कि काग्रेसी नेता और भारत सरकार के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सोच थी कि “भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रह चुका है, कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि उस खोयी हुई मुस्लिम सत्ता को फिर प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करे”। जमायते इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी ने पाकिस्तान बनने का विरोध तो नहीं किया परंतु थोड़ा दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि “हम तो पूरे भारत को ही इस्लामी देश बनाना चाहते थे”। विभिन्न मुस्लिम नेताओं के अनेक ऐसे ऐतिहासिक कथन अभी तक मुसलमानों के अन्तःस्थल में छलकते रहते हैं। क्योंकि इस्लाम का संकल्प है जिहाद और अंतिम लक्ष्य भी परंतु यह अन्तहीन संघर्ष मानवता विरोधी है।

अतः जब संसार को दारुल-हरब और दारुल-इस्लाम में विभाजित करके देखने वालों की देशभक्ति स्वाभाविक रूप से संदेहात्मक हो तो उसका दोषी कौन होगा ?

निःसंदेह कट्टरपंथी मौलानाओं ने जमीयत यूथ क्लब के नाम से सवा करोड़ की एक प्रशिक्षित इस्लामिक फौज की तैयारी का अपना गुप्त एजेंडा उजागर करने से पहले विचार-विमर्श अवश्य किया होगा।

क्या ऐसे में यह सोचना अनुचित होगा कि इस क्लब को देशव्यापी विभिन्न आतंकवादी संगठनों व उनके स्लीपिंग सेलों तथा ओवर ग्राउंड वर्करों का जो पहले से ही प्रशिक्षित हैं, सहयोग मिलेगा ? इसके अतिरिक्त यह भी संभावना हो सकती है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान व इस्लामिक स्टेट आदि के आतंकी और पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. आदि जिहाद के लिये इस यूथ क्लब से जुड़ कर देश के अनेक भागों में आतंकवादी घटनाओं द्वारा राष्ट्रीय वातावरण को दूषित करने में सफल हो सकेंगे ?

यह कितना विचित्र व दुखदायी है कि इस्लाम में धर्मांतरित होने वाले भारतीय नागरिक अपने पूर्वजों व अपनी मूल संस्कृति एवं इतिहास में कोई आस्था नहीं रखते बल्कि अपने ही गैर मुस्लिम देशवासियों के प्रति घृणा करने के साथ साथ लूटमार व मारकाट आदि अत्याचारों से उनको भयभीत करने से भी नहीं चूकते। ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार के अत्याचारों के लिये आक्रामक बने रहने वालों को ही सच्चा मुसलमान माना जाता है।

अतः कोई इस धोखे में न रहे कि इस्लाम शांति व प्रेम का संदेश देने वाला धर्म/मज़हब है। ये तथाकथित शांतिदूत अपनी अपरिवर्तनीय कट्टरपंथी विद्याओं से यही सीखते और सिखाते है कि दुनिया में गैर ईमानवालों और अविश्वासियों को जीने का अधिकार ही नहीं। देवबंद में स्थित इस्लाम जगत की प्रमुख संस्था दारुल-उलूम व अन्य इस्लामिक संस्थाओं से प्रेरित होकर देश-विदेश के विभिन्न भागों में लाखों मकतब, मदरसे व मस्जिदें स्थापित हो चुकी हैं जिनका मुख्य उद्देश्य जिहाद के लिये जीना और जिहाद के लिये ही मरना माना जाता है।

क्या ऐसे में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द द्वारा पोषित यूथ क्लब से सैकड़ों-हज़ारों मौलानाओं को यह आशा बंधी होगी कि ऐसे प्रशिक्षित युवक इस्लामिक चक्रव्यूह में भारत को घेरने में उनका सहयोग करेंगे और भारत को दारुल-इस्लाम बनाने का उनका सदियों पुराना सपना सच हो सकेगा ? क्या भारत सरकार देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बिगाड़ने वाले ऐसे षड्यंत्रकारियों के प्रति कोई वैधानिक कार्यवाही कर सकती है ?

जब सामान्यतः विवादित मठों और मंदिरों का सरकार अधिग्रहण कर लेती है तो फिर देश की मुख्य धारा से दूर करके देशवासियों में अलगाववादी भावना भरने वाले मदरसों व मस्जिदों का अधिग्रहण राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से और भी आवश्यक हो जाता है। आज सम्पूर्ण राष्ट्रवादी समाज देश के इस्लामीकरण या दारुल-इस्लाम बनाये जाने के विरुद्ध है परंतु ऐसे सशक्त इस्लामिक चक्रव्यूह की बढ़ती एक और चुनौती का सामना कैसे किया जायेगा, इसका चिंतन आवश्यक व अनिवार्य है ?

अतः आज यह सोचना अति महत्वपूर्ण है कि क्या भारतीय मुस्लिम समाज अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति व नैतिक मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा देकर उनमें गैर मुस्लिमों के प्रति घृणा की भावना को समाप्त करने के आवश्यक उपाय करेगा ? क्या जमीयत उलेमा हिन्द व अन्य मुस्लिम संस्थायें कभी ऐसे प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना करेंगी जिसमें ऐसा मुस्लिम युवा तैयार हो जो “अरब व पाकिस्तान” के स्थान पर “भारत” को अपना आदर्श मान कर अपने पूर्वजों की संस्कृति को अपनाये। क्यों नहीं कोई मुस्लिम सुधारवादी व बुद्धिजीवी नेता मदरसों को केवल राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति के अनुरूप बना कर इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश लगाने का साहस करता ?

इस्लामिक चक्रव्यूह में भारत को घेरने की बार-बार चुनौती देने वाले कट्टरपंथी मुस्लिम समाज को अपने धर्म ग्रंथ कुरान की उन आपत्तिजनक आयतों में संशोधन करना होगा जो अविश्वासियों के प्रति जिहाद करने को उकसाती हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द को राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ने के लिये मुस्लिम समाज को ऐसा प्रशिक्षण देना चाहिये जिससे वे देश के संविधान का सम्मान करे और भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की संस्कृति को अपनाते हुए “सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय” में विश्वास करना सीखे। अतः वर्तमान आधुनिक युग में परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को ढालना ही जीवन को भयमुक्त करके सुरक्षित रखने व सेवा करने का सर्वोत्तम उपाय है।

वैक्सीन में कुछ ऐसा तो नहीं है जो इस्लाम में हराम है: दारूल उलूम देवबंद

जहाँ दुनिया एक तरफ कोरोना महामारी का सामना करने के लिए वैक्सीन का इंतज़ार कर रही है वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के लोग इस बात से चिंतित हैं कि वैक्सीन ‘हलाल’ के मानदंडों पर खरी उतरती है या नहीं। यानी उनके अनुसार वैक्सीन में सूअर का माँस (pork) और जिलेटिन (gelatin) नहीं होना चाहिए। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के दारूल उलूम देवबंद के मौलवी ने एक बयान दिया है। 

मौलवी का कहना है कि मुस्लिमों को कोरोना वैक्सीन लेने से पहले फ़तवा का इंतज़ार करना चाहिए। मौलवी के मुताबिक़ मुस्लिमों को वैक्सीन लेने से पहले इस बात की जाँच करनी चाहिए कि उसमें ऐसी कोई चीज़ तो नहीं मिली है जो इस्लाम में ‘हराम’ मानी जाती है। मौलवी का कहना था कि फतवा विभाग के मुखिया यह तय करेंगे कि वैक्सीन लेना मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए सही है या नहीं।

वैक्सीन का संग्रह करते समय और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के दौरान पोर्क से तैयार किए गए जिलेटिन का उपयोग किया जाता है। इस बयान के ठीक एक दिन पहले मुंबई स्थित रज़ा एकेडमी के सुन्नी स्कॉलर ने कहा था कि चीन की वैक्सीन मुस्लिमों के लिए ‘हराम’ है क्योंकि उसमें पार्क का जिलेटिन होता है। 

जारी किए गए वीडियो में रज़ा एकेडमी के सेक्रेटरी जनरल सईद नूरी ने कहा था, “केंद्र की मोदी सरकार चीन से वैक्सीन का आयात नहीं करे। ऐसी कोई भी वैक्सीन जो बाहर से मँगाई गई है या भारत में तैयार की गई है उसके लिए सरकार को पूरी सूची दिखानी होगी कि वह किन चीज़ों से तैयार की गई है। जिससे हम वैक्सीन के उपयोग को लेकर ऐलान भी कर सकें।”

इसके पहले UAE के फतवा काउंसिल ने कहा था कि मुस्लिमों के लिए कोरोना वैक्सीन लेना हराम नहीं है, भले ही उसमें सूअर का माँस (Pork) ही क्यों न हो। ये संयुक्त अरब अमीरात की सर्वोच्च इस्लामी संगठन है। संस्था ने कहा था कि अगर कोरोना वैक्सीन में पोर्क जेलेटिन हो, फिर भी मुस्लिम इसका प्रयोग कर सकते हैं। अब तक ये बहस चल रही थी कि कोरोना वैक्सीन में पोर्क होने की स्थिति में मुस्लिमों को इसे लेने की अनुमति है या नहीं। 

UAE की फतवा काउंसिल के अध्यक्ष शेख अब्दुल्लाह बिन बयाह ने कहा था कि आज की तारीख में मनुष्य के शरीर को बचाने की जिम्मेदारी सर्वोपरि है, इसीलिए कोरोना वैक्सीन में सूअर का माँस या उससे जुड़ा कोई कंटेंट होने की स्थिति में भी इसे लिया जा सकता है। उनके मुताबिक़ ये इस्लाम के अंतर्गत आने वाले प्रतिबंधों के तहत नहीं आएगा। इस पर इस्लामी नियम-कायदे लागू नहीं होंगे। अभी मनुष्यता को बचाने की जरूरत है।  

दिल्ली से गिरफ्तार आतंकियों का खुलासा – देवबंद में ‘छोटी ट्रेनिंग’, फिर Pak में ‘बड़ी’: दुनिया भर में फैलाना चाहते थे इस्लाम

                                                                                                                             प्रतीकात्मक 
किसी देश का इतिहास उसका गौरव होता है, उसके सिर का मुकुट होता है, लेकिन विश्व में भारत एक मात्र ऐसा अनूठा देश है, जहाँ नेता और पार्टियां अपनी कुर्सी की खातिर अपने गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर,मुग़ल आतताइयों को महान बता देती हैं। इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने एवं संरक्षण देने कितनी बेशर्मी से "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से हिन्दू धर्म को बदनाम किया जाने लगा था। आज विश्व इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट हो रहा है, लेकिन भारत में तुष्टिकरण पुजारी अपनी सियासत की खातिर समर्थन देने में जुटे हुए हैं।   
दिल्ली से गिरफ्तार जैश-ए-मोहम्मद के दो आतंकियों का देवबंद कनेक्शन सामने आया है। दोनों आतंकियों से पूछताछ के दौरान कई राज खुले। अब उन दोनों आतंकियों को लेकर दिल्ली पुलिस उत्तर प्रदेश के देवबंद रवाना हो गई है, जहाँ उनसे फिर पूछताछ होगी। सोमवार (नवंबर 16, 2020) को बड़ी आतंकी साजिश को नाकाम करते हुए दिल्ली पुलिस ने JeM के दो आतंकियों को गिरफ्तार किया था। उनके मोबाइल फोन्स से कई सबूत भी मिले हैं।
हैरानी की बात यह है कि जो गुप्तचर संस्थाएं सीमा पार आतंकी ठिकानों और वहां चल रही गतिविधियों का पता लगा सकती हैं, भारत में ही चल रहे आतंकी ट्रेनिंग ठिकानों को पकड़ने में क्यों नाकाम हैं?

इन आतंकियों ने एक व्हाट्सप्प ग्रुप बना रखा था। इस ग्रुप का नाम ‘जिहाद’ था, जिसमें एक पाकिस्तानी सरगना भी जुड़ा हुआ था। उसके ही निर्देश पर ये यहाँ आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे थे। देवबंद, दिल्ली और तेलंगाना के कई लोग इस ग्रुप में जुड़े थे। चूँकि ये आतंकी कई दिनों तक देवबंद में रुके हुए थे, इसीलिए उन्हें वहाँ ले जाया गया है। आतंकी आतंकी अब्दुल लतीफ मीर व मोहम्मद अशरफ खटाना दिल्ली होकर देवबंद जा रहे थे।

उन्हें वहीं पर खतरनाक हथियार चलाने और बम विस्फोट का प्रशिक्षण दिया जाना था। ‘अमर उजाला’ की खबर के अनुसार, आतंकियों को देवबंद में तो ट्रेनिंग दी ही जाती थी, साथ ही इसके बाद उन्हें ‘बड़ी ट्रेनिंग’ के लिए पाकिस्तान भेजा जाता था। उत्तर प्रदेश से लगती नेपाल सीमा का इस्तेमाल कर ये लोग वहीं से पाकिस्तान के लिए रवाना होते थे। स्पेशल सेल को कई ऐसे सबूत मिले हैं, जिससे इनके आतंकी होने का पता चलता है।

पाकिस्तान में बैठे बड़े हैंडलर ने ही इन आतकियों को यूपी जाने को कहा था। उसने बताया था कि देवबंद में उसका अपना आदमी है, जो इन आतंकियों को छोटी ट्रेनिंग देगा। यूपी में आतंकी ट्रेनिंग की बात से खलबली मच गई है और प्रशासन एक्टिव हो गया है। पहले गिरफ्तार किए गए आतंकियों ने हथियार भी यूपी से ही लिए थे। दिल्ली में भी पाकिस्तानी हैंडलर का आदमी होता था, जो इन्हें देवबंद लेकर जाता था।

ये दोनों पिछले 6-8 महीनों से जिहादी बने थे और आतंकी प्रशिक्षण के लिए बेचैन थे। ये जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के केंद्र सरकार के फैसले से नाराज़ थे और ‘आज़ादी’ के लिए लड़ना चाहते थे। सितम्बर-अक्टूबर में सीमा पर सख्ती होने के कारण ये पाकिस्तान नहीं जा पाए थे। अब पुलिस इनके व इनके साथियों से जुड़े सारे ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी कर पूरे नेटवर्क का पता लगा रही है।

आतंकियों ने बताया कि वो सोशल मीडिया के माध्यम से मौलाना मसूद अजहर को सुनते थे और पूरी दुनिया में इस्लाम को फैलाना चाहते थे। इसके लिए वो मसूद से जुड़ने की फ़िराक में थे। खबर में ये भी बताया गया है कि ये आतंकी देवबंद के अरशद मदनी व मौलाना मुफ्ती फैजुल वाहिद द्वारा दिए गए व्याख्यान और मुफ्ती मुजफ्फर हुसैन व नजीर अहमद साहा काशी को जम्मू कश्मीर में पढ़ते थे। फेसबुक मैसेंजर के जरिए लाहौर का आफताब मलिक इनसे संपर्क में आया।

उसने इन्हें फेसबुक पर मसूद अजहर की तस्वीर प्रोफाइल पिक लगाने को कहा। इसके बाद वो जैश के एक गुर्गे के सम्पर्क में आए और कुपवाड़ा में एक आतंकी के जरिए इनके पास हथियार पहुँचाए गए। उनके पास से ‘जम्मू एंड कश्मीर बैंक’ के कार्ड्स और मदरसा का पहचान-पत्र मिला है। अब्दुल लतीफ़ के अब्बू कोर्ट में मुंशी हैं। जम्मू कश्मीर में दोनों ने कई स्थानीय कट्टरपंथियों की मदद से जिहाद का पाठ पढ़ा।

केंद्रीय पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन मंत्री गिरिराज सिंह ने भी कहा था कि देवबंद आतंकवाद की गंगोत्री है, सारे बड़े-बड़े दुनियाँ में जो भी पैदा हुए आतंकवादी, चाहे हाफ़िज सईद हो, बगदादी हो, ये सारे के सारे लोग यहीं से शिक्षा लेते हैं। उन्होंने दावा किया था कि दुनिया में आतंकवाद की घटनाओं का जुड़ाव देवबंद से ही रहा है। साथ ही उदाहरण दिया था कि गुरुकुल से आजतक कोई बच्चा आतंकी नहीं निकला, लेकिन देवबंद से निकले हुए लोग देशभक्त का तो पता नहीं, लेकिन आतंकी जरूर बनते हैं।

हिन्दू -मुस्लिम एकता पर बने ‘5 Best विज्ञापनों में सिर्फ हिन्दू ही नेगेटिव और कट्टर क्यों?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अपने विज्ञापन में लव जिहाद को प्रमोट करने के कारण तनिष्क को सोशल मीडिया पर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। हालाँकि, तनिष्क ने भले ही व्यापक स्तर पर लोगों का विरोध देखने के बाद हिन्दू समुदाय से माफी माँग ली हो मगर यह पहली बार नहीं है जब किसी एड एजेंसी ने हकीकत से अलग चीजों को दिखाने का प्रयास किया है।

तनिष्क से पहले भी कई उत्पादों पर हिन्दू समुदाय की भावनाओं को आहत करने का इल्जाम लगा है। ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों में न केवल हिन्दुओं को कट्टरपंथी दिखाया गया बल्कि उन्हें असहिष्णु भी दर्शाया गया। वहीं दूसरे समुदाय को बेहद सौम्य व्यवहार वाला दिखाया गया।

इस तरह के विज्ञापन बनाने वालों को शायद यह नहीं मालूम कि देश में हिन्दू-मुसलमान के बीच नफरत फ़ैलाने वाले केवल दो वर्ग हैं: पहला छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता और दूसरा मुस्लिम कट्टरपंथी। और ये छद्दम धर्म-निरपेक्ष/सेक्युलरिस्ट अपनी कुर्सी की खातिर कट्टरपंथियों के इशारे पर नाचते रहते हैं। इन छद्दमों ने हिन्दुओं को जाति और पंथों में बाँट दिया, जबकि मुसलमानों में हिन्दुओं से अधिक पंथ हैं, कोई एक दूसरे की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकता, एक दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकते, परन्तु इस्लाम के नाम पर एक हैं। किसी आम हिन्दू अथवा मुसलमान को अपनी रोजी-रोटी से फुर्सत नहीं, इन दंगों में नहीं फंसता। मेरे ही कई मुस्लिम परिवारों से पारिवारिक सम्बंध हैं, एक-दूसरे के त्यौहारों में भागीदार बनते हैं, क्षेत्र ने अनगिनत दंगे देखे, लेकिन संबंधों पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा।

आपके सामने ऐसे ही विज्ञापनों के 5 उदाहरण पेश करने जा रहे हैं, जिसमें सेकुलरिज्म दिखाने की कोशिश में हिन्दुओं का अपमान हुआ।

यू्ट्यूब पर हिन्दू -मुस्लिम पर 5 सबसे बेहतरीन एड के संकलन (5 Best Creative Indian Ads About Hindu Muslim) में कम से कम दो हिन्दू विरोधी विज्ञापन हैं और तीसरे में गंगा जमुनी तहजीब को दर्शाने के लिए हिन्दू लड़की का इस्तेमाल हुआ है।

इसी तरह एक विज्ञापन में हिन्दू व्यक्ति को ऐसे दर्शाया गया है, जैसे उनके परिवार में ही दूसरे समुदाय के घर खाना पीने से मना किया जाता हो।

पहले प्रचार में हम देख सकते हैं कि एक हिन्दू व्यक्ति गणपति बप्पा की मूर्ति खरीदने आता है और जब उसे पता चलता है कि उसे बनाने वाला विशेष समुदाय का है तो वह असहज दिखने लगता है। आगे विज्ञापन में दिखाया जाता है कि इसके बाद मुस्लिम व्यक्ति सब समझ जाता है और अपनी बातों से उसका दिल जीत लेता है। फिर, हिन्दू युवक को गलती का एहसास होता है और वह मूर्ति खरीदने का फैसला करता है।

दूसरे विज्ञापन में हिन्दू दंपत्ति को पहले मुस्लिम महिला के घर जाने से मना करते हुए दिखाया जाता है, लेकिन जैसे ही उसके घर से चाय की खुशबू आती है, वह दोनों किसी बहाने वहाँ चले जाते हैं और रेड लेबल चाय के स्वाद में डूब कर एक और कप चाय माँग लेते हैं।

तीसरा एड सर्फ एक्सेल का है। एक बच्ची इसमें सभी हिन्दू बच्चों से अपने ऊपर रंग फेंकने को कहती है फिर जब सबके पास रंग खत्म हो जाते हैं तो वह एक मुस्लिम लड़के को अपने साइकल के पीछे बिठाती है और मस्जिद तक छोड़कर आती है और बाकी बच्चे भी यह देखने के बाद रंग फेंकने से गुरेज करने लगते हैं।

फिर एक और वीडियो! राहुल नाम के एक बच्चे को इसमें उसकी माँ पंडित को खाना खिलाने भेजती है, लेकिन वह पहुँच मस्जिद जाता है और फिर मौलवी को खाना खिलाकर जब घर लौटता है तो माँ पूछती है कि पंडितजी ने क्या कहा। जिस पर बच्चा जवाब देता है- बिस्मिल्लाह रहमान ए रहीम। इसे सुन माँ हैरानी से पूछती है कि राहुल, तुम कहाँ गए थे। पूरा वीडियो देखकर बस यही लगता है कि जैसे सेकुलरिज्म का दारोमदार हिन्दुओं के कंधे पर ही है।

इसी प्रकार एक शॉर्ट फिल्म में बाइक चोरी होती है। हिन्दू युवक एक मुस्लिम व्यक्ति को उसकी बाइक पर गणपति बप्पा की फोटो देखकर पकड़ लेते है। वीडियो के शुरू से ही इस्लामी टोपी पहने लड़के को सिर्फ़ डरा हुआ दर्शाया जाता है। हालाँकि, बाद में वो बताता है कि उसने अपनी बाइक पर गणेश जी की फोटो इसलिए लगाई है क्योंकि उसे एक हिन्दू आदमी ने दिल दिया था और वह गणेश जी का भक्त था। इसलिए उसने अपनी गाड़ी पर इसे लगाया।

कुल 5 विज्ञापनों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदुओं को लेकर एड एजेंसी किस तरह की तस्वीर समाज में परोस रही है। गंगा जमुनी तहजीब दिखाने के लिए हिंदुओं को नकारात्मक दर्शाया जाता है और दूसरा समुदाय अचानक से बहुत शांत, सरल, सहिष्णु हो जाता है जबकि हकीकत इससे कोसों दूर है। अजेंडा चलाने के लिए न केवल तनिष्क बल्कि तमाम कंपनियाँ सेकुलरिज्म का सारा भार सिर्फ़ हिंदुओं के ऊपर मढ़ रही हैं।

छद्दम सेकुलरिज्म बेनकाब 

हिन्दू-मुस्लिम एकता पर विज्ञापन बनाने वालों को वास्तविकता से भी रूबरू होना चाहिए था। उन्हें नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में हुए धरने एवं प्रदर्शनों में लगे हिन्दुत्व विरोधी नारों को नज़रअंदाज़ करना, इतना ही नहीं, हिन्दुओं की गैर-मौजूदगी में भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की योजना की रुपरेखा तैयार की जा रही थी कि हिन्दुओं को गुमराह करने के लिए तिरंगा हाथ में लो, भारत माता की जय बोलो आदि आदि, फिर पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों पर, जगह-जगह हो रहे हिन्दू मन्दिरों पर हमलों को नज़रअंदाज़ करना प्रमाणित करता है कि कट्टरपंथियों के साथ-साथ विज्ञापन बनाने वाले हिन्दुओं को ही कलंकित कर रहे हैं। लगता है यह विज्ञापन बनाने वाले भी कट्टरपंथियों के इशारे पर नाच हिन्दुओं को ही अपमानित करने में लगे हैं।  सच्चाई जानने के लिए नीचे दिए लिंक का अवलोकन करें। 

क्या इस तरह के भ्रमित विज्ञापन बनाने वालों ने निम्न समाचार को नहीं पढ़ा। ये स्वार्थी एवं कपटी भूल रहे हैं कि जब तक देश में हिन्दू बहुसंख्यक है, सेकुलरिज्म जीवित है और जिस दिन हिन्दू अल्पसंख्यक हो गया, सेकुलरिज्म का अपने आप जनाजा निकल जाएगा। गंगा-जमुनी तहजीब का नारा भी दफ़न हो जाएगा। जिसकी जिन्दा मिसाल पाकिस्तान है। ऐसे भ्रमित विज्ञापन बनाने वालों सच्चाई को पहचानो, उस पर पर्दा डाल जनता को गुमराह मत करो। 

हिन्दू समुदाय के लोगों द्वारा पूर्व मंत्री रसीद मसूद के रस्म तेरहवीं कार्यक्रम पर भड़के देवबंद उलेमा, कहा- यह ‘हराम’ है

हिंदू समाज द्वारा मनाई गई पूर्व केंद्रीय मंत्री काजी रशीद मसूद की रस्म तेरहवीं में पूर्व विधायक इमरान मसूद व शाजाद मसूद सहित परिवार के अन्य सदस्यों के शामिल होने पर उलमा ने कड़ा एतराज जताया है। उलमा का कहना है कि ऐसी रस्में मुस्लिमों के लिए ‘हराम’ है। 

बता दें कि इस समारोह का आयोजन बिलासपुर में मास्टर रतन लाल द्वारा किया गया था। रतन लाल, रशीद मसूद को अपना भाई मानते थे और उनका मसूद परिवार से अच्छे संबंध थे। नौ बार सांसद रहे काजी रशीद मसूद का हाल ही में कोरोना से निधन हो गया था। 

बिलासपुर गाँव में हिदू समाज ने उनकी रस्म पगड़ी का आयोजन किया। हिंदू रीति रिवाज के अनुसार मंत्रोच्चार के बीच उनके पुत्र शाजान मसूद को पगड़ी पहनाई गई। इस दौरान काजी रशीद मसूद के भतीजे और पूर्व विधायक इमरान मसूद व कई कॉन्ग्रेस नेता भी मौजूद रहे। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है।

मदरसा जामिया शेख-उल-हिंद के मौलाना मुफ्ती असद कासमी ने कहा कि इस्लाम में किसी दूसरे धर्म की परंपराओं को अपनाए जाने की सख्त मनाही है। असद कासमी ने कहा कि किसी दूसरे मजहब की रस्म तेरहवीं में मंत्रोच्चारण के बीच पगड़ी पहनाए जाना इस्लाम मजहब के खिलाफ है। इसके साथ ही उन्होंने मसूद के बेटे को हिंदू समारोह में भाग लेने के लिए अल्लाह से तौबा करने के लिए कहा। 

उन्होंने कहा कि हिंदू समाज के रस्म तेरहवीं के कार्यक्रम में मंत्रोच्चारण के बीच काजी रशीद मसूद के बेटे को पगड़ी पहनाया जाना इस्लाम के खिलाफ है। इसके लिए उन्हें अल्लाह से तौबा कर सच्चे दिल से माफी माँगनी चाहिए। मुफ्ती असद कासमी का कहना है कि घर के किसी बड़े को चुनना या पगड़ी बाँधना बुरी बात नहीं है, लेकिन यह इस्लामिक रीति-रिवाजों से होना चाहिए।

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उलेमा की टिप्पणी पर पूर्व केंद्रीय मंत्री काजी रशीद के भतीजे इमरान मसूद ने कहा कि हम कलमे के मानने वाले हैं। उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। क्योंकि वो और हमारा अल्लाह ही बेहतर जानने वाले हैं। समारोह का हिस्सा रहे शाज़ान मसूद ने कहा कि ‘पगड़ी’ की रस्म पीढ़ियों से उनके परिवार का हिस्सा रही है।