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कर्नाटक : हर दिन 14 घंटे करो काम, कांग्रेस सरकार ला रही बिल: भड़का कर्मचारी संघ, पहले थोपा था 75% आरक्षण

                                          IT कंपनियों को झटके पर झटका दे रही सिद्दारमैया सरकार
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु को भारत की सिलिकन वैली के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन, जब से वहाँ कांग्रेस पार्टी सत्ता में लौटी है तभी से वहाँ के IT सेक्टर को झटके पर झटके दिए जा रहे हैं। अब कर्नाटक सरकार नया कानून लेकर आ रही है, जिसके तहत IT कर्मचारियों को प्रतिदिन 14 घंटे काम करना होगा। यानी, मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की सरकार इसे कानून का रूप देती है तो इंजीनियरों को दफ्तर में अधिक समय गुजारना पड़ेगा, इससे उनका वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ेगा।

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक सरकार एक ऐसा बिल लेकर आई थी, जो अगर कानून बन जाता तो मैनेजमेंट की नौकरियों में राज्य के नागरिकों को 50% और नॉन-मैनेजमेंट की नौकरियों में 75% आरक्षण मिलता। इसके बाद IT कंपनियों के संघ NASSCOM ने कहा था कि किसी भी महानगर को आईटी हब बनने के लिए अलग-अलग क्षेत्र की प्रतिभाओं को आकर्षित करना पड़ेगा। इसके बाद आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेशन ने इन कंपनियों को हैदराबाद और विशाखापत्तनम आने का न्योता तक दे दिया था।

जहाँ पहले वाले फैसले से कंपनियों को दिक्कत होती, नए फैसले से कर्मचारियों का जीवन तबाह होगा। कर्नाटक के ‘IT/ITeS Employees Union (KITU)’ ने कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। KITU ने कहा कि लेबर डिपार्टमेंट ने इंडस्ट्री के विभिन्न हितधारकों की एक बैठक में प्रस्ताव दिया कि कर्नाटक शॉप्स एन्ड कमर्शियल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट में संशोधन किया जाए। इसके लिए विधानसभा में बिल लाने की भी तैयारी है। हालाँकि, कर्नाटक सरकार ने फ़िलहाल इस पर चुप्पी साध रखी है।

मौजूदा नियमों की बात करें तो ओवरटाइम मिला कर एक दिन में किसी कर्मचारी से अधिकतम 10 घंटे काम लिया जा सकता है। यूनियन का कहना है कि नए आदेश के बाद वर्क ऑवर्स अनिश्चित समय के लिए भी बढ़ाया जा सकता है। KITU ने इसे इस काल में वर्किंग क्लास पर सबसे बड़ा हमला करार दिया। संघ ने कहा कि इसके बाद कंपनियाँ 3-शिफ्ट व्यवस्था की जगह 2-शिफ्टव्यवस्था पर व्यवस्था पर आ जाएगी और बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नौकरी से बाहर फेंक दिया जाएगा।

उक्त बैठक में लेबर डिपार्टमेंट के मंत्री संतोष S लाड के अलावा IT व बायोटेक्नोलॉजी विभाग के कई अधिकारी भी मौजूद थे। KITU ने कहा कि ये फैसला लागू होता है तो IT सेक्टर में काम करने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। आँकड़े कहते हैं कि पहले से ही 45% IT कर्मचारी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, 55% शारीरिक रूप से दुष्प्रभाव का सामना कर रहे हैं। WHO-ILO का अध्ययन कहता है कि वर्क ऑवर्स बढ़ाने से स्ट्रोक से मौत का खतरा 35% और दिमाग-हृदय रोगों से मौत का खतरा 17% बढ़ जाएगा।

यूनियन ने कहा कि ये बिल ऐसे समय में लाया जा रहा है जब दुनिया मान रही है कि वर्क ऑवर्स बढ़ाने से उत्पादन क्षमता पर गलत असर पड़ता है। कई देशों में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ का कानून लाया जा रहा है, जिसके तहत नॉन-वर्क ऑवर्स में कर्मचारी खुद को काम से एकदम दूर रख सकेंगे और ईमेल वगैरह की रिप्लाई देने की भी बाध्यता नहीं होगी। पिछले साल इनफ़ोसिस के अध्यक्ष NR नारायणमूर्ति ने 70 घंटे प्रति सप्ताह काम करने की सलाह देकर विवाद पैदा कर दिया था।

राम मंदिर पर BBC की भड़काऊ कवरेज पर ब्रिटिश संसद में ही इसके खिलाफ उठी माँग : बाबरी का रोना रो छिपाया 1527 वाला इतिहास

BBC की नकारात्मक कवरेज का ब्रिटेन में ही विरोध
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा पर UK (यूनाइटेड किंगडम) के सरकारी मीडिया संस्थान BBC (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन) की नकारात्मक कवरेज को लेकर उसका उसके ही देश में विरोध शुरू हो गया है। ब्रिटेन के सांसद ने 22 जनवरी, 2024 को हुए इस कार्यक्रम को लेकर BBC की कवरेज को पक्षपाती, भेदभावपूर्ण और भड़काऊ करार दिया है। सांसद बॉब ब्लैकमैन ने गुरुवार (1 फरवरी, 2024) को ‘हॉउस ऑफ कॉमन्स में ‘BBC की निष्पक्षता पर बहस की माँग उठाई है। BBC द्वारा भड़काऊ रिपोर्टिंग करने का कारण जान कार्यवाही पर भी चर्चा चल रही है। आज जब भारत अपनी खोई अस्मिता को प्राप्त कर रहा है,BBC वास्तविकता को नकार भड़काऊ लोगों को ऊर्जा दे रहा है।   

कंजर्वेटिव पार्टी के सांसद ने कहा कि उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दुनिया भर के हिन्दू खुश हैं। उन्होंने इस पर दुःख जताया कि BBC ने इसे एक मस्जिद को तबाह कर के उस स्थल पर बनी हुई संरचना बता दिया, और मीडिया संस्थान ये भूल गया है कि 2000 वर्षों से भी अधिक समय पहले तक वहाँ भव्य मंदिर हुआ करता था। उन्होंने ये भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए शहर में ही 5 एकड़ जमीन आवंटित की गई है।

सांसद बॉब ब्लैकमैन ने कहा कि दुनिया भर में क्या चल रहा है, इस पर बीबीसी की कवरेज कितनी निष्पक्ष है इसका रिकॉर्ड लाया जाना चाहिए और इस पर बहस होनी चाहिए। ‘हॉउस ऑफ कॉमन्स’ की नेता पोनी पैनी मॉर्डौंट ने कहा कि BBC की समीक्षा को लेकर महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं। BBC को अपनी इस रिपोर्ट को लेकर सफाई भी प्रकाशित करनी पड़ी थी। इसमें उसने कहा था कि कुछ पाठकों को ने महसूस किया कि ये लेख पक्षपाती है और इसमें भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल किया गया है।

BBC ने सफाई में आगे कहा कि जो कुछ हुआ उसका सटीक और निष्पक्ष विवरण बताया जाना चाहिए। मीडिया संस्थान ने इससे असहमति जताई कि ये लेख हिन्दुओं का अपमान कर रहा है। उसने बड़ी चालाकी से दिसंबर 1992 के बाबरी विध्वंस का तो जिक्र किया, लेकिन मीर बाक़ी द्वारा राम मंदिर को सन् 1527 में ध्वस्त किए जाने की घटना का जिक्र नहीं किया। बीबीसी लेस्टर और बर्मिंघम में हुई हिन्दू विरोधी हिंसा में भी इस्लामी भीड़ का पक्ष लेकर हिन्दुओं को बदनाम करने वाली रिपोर्टिंग कर चुका है।

ब्रिटिश हिन्दुओं के अभियान ‘इनसाइट यूके’ ने भी बीबीसी को एक खुला पत्र लिखते हुए उसके कवरेज पर आपत्ति जताई। साथ ही लिखा कि मीडिया संस्थान ने ये छिपा लिया कि एक मुस्लिम आर्कियोलॉजिस्ट (KK मुहम्मद) ने बाबरी ढाँचे के नीचे राम मंदिर होने का पता लगाया, और सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनाने वाले जजों में भी एक मुस्लिम जज (जस्टिस अब्दुल नज़ीर) थे। तमाम आलोचनाओं के बावजूद BBC अपनी सफाई में अपनी बात पर अड़ा रहा।

जिस खबर को लेकर आपत्ति जताई जा रही है, उसे गीता पांडेय और योगिता लिमये ने लिखा था। इस खबर का भड़काऊ शीर्षक था – “अयोध्या राम मंदिर: भारत के पीएम मोदी ने ढहाई गई बाबरी मस्जिद वाले स्थल पर हिंदू मंदिर का उद्घाटन किया”। इस खबर में लिखा गया था कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से मुस्लिम डरे हुए हैं, इस कार्यक्रम ने उनकी ‘दर्दनाक यादें’ ताज़ा कर दी हैं। वहीं बाबरी ढाँचे के निर्माण को लेकर लिखा गया कि ‘हिन्दू ऐसा यकीन करते हैं’ कि राम मंदिर ढाह कर इसे बनाया गया था। जबकि, इसके साक्ष्य हर रूप में मौजूद हैं।


I.N.D.I. गठबंधन की कमिटी से CPI(M) ने खुद को अलग किया, कहा – ये कोई पार्टी थोड़े है

                                    सीपीआई(एम) के महासचिव सीताराम येचुरी (फोटो साभार : हिंदुस्तान टाइम्स)
NDA के मुकाबले खड़ा किया गया I.N.D.I. गठबंधन का दम अभी से फूलता सा दिख रहा है। पंजाब-दिल्ली में कॉन्ग्रेस-आप की सिर-फुटौव्वल शुरू होने के बीच ही सबसे बड़े वामपंथी दल ने भी अपने तेवर दिखा दिए हैं। CPI(M) ने कहा है कि इंडी गठबंधन कोई पार्टी थोड़े ही है, ये सिर्फ प्लेटफॉर्म है। हालाँकि, उसने इस गठबंधन से अलग होने से अभी तो मना कर दिया है, लेकिन उसने खुद को इस गठबंधन के सबसे अहम समूह कोऑर्डिनेशन कमेटी से खुद को अलग कर लिया है। ये कमेटी ही गठबंधन के कामों को आगे बढ़ाने का काम करती है।

लोकसभा चुनाव में साथ, पश्चिम बंगाल में खिलाफ!

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीपीआई(एम) के पोलित ब्यूरो ने साफ कर दिया है कि वो इंडी गठबंधन के कोर्डिनेशन कमेटी से दूर रहेगी। हालाँकि, बाकी कमिटियों में वो शामिल रहेगी। वहीं, पार्टी के सूत्रों के हवाले कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस का विरोध किया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में पार्टी के नेता चाहते हैं कि वो सिर्फ कॉन्ग्रेस और इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ ही गठबंधन करे और टीएमसी का विरोध करे।
पोलित ब्यूरो की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में बताया गया है कि CPI(M) की शीर्ष कमेटी ने फैसला किया है कि भारत गणराज्य के सेक्युलर और लोकतांत्रिक पहचान को बचाने की लड़ाई में I.N.D.I.A. ब्लॉक के साथ हैं। ये संविधान, लोकतंत्र, लोगों के मौलिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता को बचाने की लड़ाई है। कहा गया है कि इसमें जरूरी है कि भाजपा को केंद्र और राज्य सरकारों की सत्ता से दूर रखा जाए। पोलित ब्यूरो ने इन कोशिशों का साथ देने का फैसला किया है।

कई पार्टियाँ आपस में लड़ेंगी

प्रेस रिलीज में आगे लिखा गया, “जो पार्टियाँ नैतिक और राजनीतिक रूप से एक जैसी नहीं हैं, वो भी मंच साझा कर रही हैं, क्योंकि उनके पास भाजपा को हराने का एक साझा एजेंडा है। लेकिन, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आपको यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि सभी दल सभी मुद्दों पर एकजुट होंगे। पंजाब में आम आदमी पार्टी कॉन्ग्रेस के खिलाफ लड़ेगी। दिल्ली में भी ऐसा ही होगा। पश्चिम बंगाल में हम टीएमसी के खिलाफ लड़ेंगे। केरल में सीपीआई (एम) कॉन्ग्रेस के खिलाफ लड़ेगी।”

छोटी समितियों में सीपीआई(एम) के सदस्य शामिल

सीपीआई (एम) ने गठबंधन की अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण समितियों जैसे अभियान समिति और सोशल मीडिया समिति में सदस्यों को नामित किया था, लेकिन अटकलें तब शुरू हुईं जब उसने समन्वय समिति में किसी को नहीं भेजा, जिसने 13 सितंबर को दिल्ली में अपनी पहली बैठक की और निर्णय लिया।