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‘PM मोदी न चढ़ाएँ अजमेर शरीफ पर चादर, रोक लगे’ : अदालत में डली याचिका, दावा- पहले दरगाह की जगह था शिव मंदिर; चिश्ती का असली इतिहास भी सामने लाना चाहिए


अजमेर की एक अदालत में याचिका दाखिल की गई है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर उर्स के मौके पर चादर पेश करने पर अस्थायी रोक लगाने की माँग की गई है। यह याचिका हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दायर की है। उनका कहना है कि अजमेर शरीफ दरगाह का स्थल विवादित है और वहाँ चादर भेजने से अदालत की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है।

चर्चा यह भी है कि हिन्दू संगठनों का कहना कि चादर चढ़ाने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मोइनुद्दीन चिश्ती का असली चरित्र भी सामने लाना चाहिए ताकि लोगों को मालूम हो ये चिश्ती हकीकत में कौन था, मुग़ल समय में इसने हिन्दुओं को कितना अपमानित किया था?  

रिपोर्ट्स के मुताबिक, याचिका में कहा गया है कि यह दरगाह एक प्राचीन शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई है। गुप्ता ने अदालत से अपील की है कि केंद्र सरकार को दरगाह पर चादर भेजने से रोका जाए, क्योंकि इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। गुप्ता का कहना है कि अदालत में मामला लंबित रहने के दौरान चादर पेश करना अदालत की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा।

गुप्ता की याचिका में कहा गया है कि दरगाह की संरचना और वहाँ मौजूद कुछ विशेषताएँ यह साबित करती हैं कि यह स्थल मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था। याचिका में दावा किया गया है कि मुख्य प्रवेश द्वार की छत और छतरियों की डिजाइन हिंदू वास्तुकला का संकेत देती है। याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से स्थल की जाँच कराने और वहाँ भगवन श्री संकटमोचन महादेव मंदिर की पुनर्स्थापना की माँग की गई है।

गुप्ता का यह भी कहना है कि दरगाह के भूमिगत मार्ग में एक शिवलिंग मौजूद है, जिसकी पूजा करने का हिंदुओं का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अधिकार वर्तमान में बाधित हो रहा है। पिछले महीने इसी मामले में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी किया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (2 जनवरी 2025) को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू को चादर सौंपी थी, जो उर्स के मौके पर दरगाह पर पेश की जानी है। यह चादर हर साल प्रधानमंत्री की ओर से भेजी जाती है। रिजिजू ने इसे ट्वीट कर प्रधानमंत्री की भावना को ‘भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक’ बताया था। पीएम मोदी ने भी इसे री-ट्वीट किया था।

‘लाल किला हमारा, इसका मालिकाना हक हमें दो’: बहादुर शाह जफर-II की वंशज सुल्ताना बेगम डिमांड लेकर पहुँचीं दिल्ली हाई कोर्ट, अदालत ने याचिका खारिज की

                                  दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज की सुल्ताना बेगम की याचिका (फोटो साभार: X)
इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते भारत के वास्तविक इतिहास को ही बदल दिया, अगर इस तरह का दुस्साहस किसी अन्य देश में हुआ होता निश्चित रूप से ऐसे इतिहासकारों और इनके आकाओं को जेल में डाल दिया होता। देखिए संलग्न पृष्ठ जब मेरे इस स्तम्भ पर कट्टरपंथियों ने केवल मुझे ही नहीं मेरे मृतक पूजनीय माता-पिता तक को अपमानित शब्द बोले गए थे।   
दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार (13 दिसंबर 2024) को मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर-II की वंशज सुल्ताना बेगम द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी। सुल्ताना बेगम ने लाल किले पर मालिकाना हक और 1857 से अब तक मुआवजे की माँग की थी। वह बहादुर शाह जफर-II के परपोते की विधवा हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुल्ताना बेगम ने 2021 के हाईकोर्ट के एकल बेंच के फैसले के खिलाफ यह याचिका दायर की थी, जिसमें उनकी याचिका देरी के आधार पर खारिज कर दी गई थी। अब कार्यवाहक चीफ जस्टिस विभू बखरू और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच ने भी इसे खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि 2021 के फैसले के खिलाफ अपील में ढाई साल की देरी हुई है।

सुल्ताना बेगम ने दावा किया था कि 1857 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने जबरन लाल किले का कब्जा छीन लिया था। उनका कहना था कि यह किला उनके पूर्वज बहादुर शाह जफर-II से उन्हें विरासत में मिला है। बेगम ने वकील विवेक मोरे के माध्यम से दायर याचिका में यह भी तर्क दिया कि भारत सरकार लाल किले पर अवैध कब्जा किए हुए है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की थी कि या तो लाल किला उन्हें लौटाया जाए या 1857 से अब तक का मुआवजा दिया जाए।

लाल कोट यानी लाल किला का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहाँ ने किया था। शाहजहाँ ने आगरा से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित करने के बाद इसे बनवाया। पहले यह लाल और सफेद संगमरमर का भव्य महल था। 1747 में नादिर शाह के आक्रमण के दौरान लाल किले की कला और बहुमूल्य गहने लूट लिए गए, जिनमें प्रसिद्ध मयूर सिंहासन भी शामिल था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिशों ने किले का लगभग 80% हिस्सा नष्ट कर दिया, संगमरमर की संरचनाएँ हटा दीं और सेना के लिए पत्थर की बैरकें बना लीं।

आजादी के बाद लाल किले का इस्तेमाल भी सैन्य बेस के रूप में किया गया। 2003 में वाजपेयी सरकार ने इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंप दिया, जो अब इसके संरक्षण और देखरेख का कार्य करता है। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब सुल्ताना बेगम की याचिका पर कोई कानूनी राहत मिलने की संभावना नहीं है। 

100 करोड़ रूपए की घूस, 45 करोड़ रूपए का डायरेक्ट फायदा AAP ने उठाया: दिल्ली शराब घोटाले में ED की चार्जशीट का कोर्ट ने लिया संज्ञान; क्या केजरीवाल के मोबाइल का पासवर्ड लेने के लिए कंपनी से संपर्क किया जा रहा है?

आखिर क्या कारण है कि अरविन्द केजरीवाल जमानत के लिए तड़पने का मुख्य कारण अपने मोबाइल का पासवर्ड नहीं देकर बाहर आकर मोबाइल को ही अकाल्पनिक रूप देकर अपने आपको ईमानदार साबित कर ED और CBI के साथ मोदी सरकार को आरोपों की मूसलाधार बारिश कर सके। जबकि ED द्वारा दर्ज चार्जशीट ने सारे पासे पलट दिए। 

अब सुनने में भी आ रहा है कि ED या CBI मोबाइल बनाने वाली कंपनी से सम्पर्क कर पासवर्ड मालूम करने का प्रयास करने का विचार कर रही है। अगर ED या CBI अपने इस प्रयास में सफल हो जाती है तो केजरीवाल के साथ और कितने जेल जाएंगे।    

दिल्ली शराब घोटाला मामले में उच्च न्यायालय ने बुधवार (10 जुलाई 2024) को अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका पर तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध अस्वीकार कर दिया। इससे पहले हाई कोर्ट ने केजरीवाल की ट्रॉयल कोर्ट से मिली बेल को रद्द कर दिया था। वहीं इसी मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय ने चार्जशीट दायर की थी, जिस पर कोर्ट ने संज्ञान लिया है।

इस आरोप पत्र में क्या है, इसे लेकर इंडिया टुडे की रिपोर्ट में कई खुलासे हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार ईडी ने चार्जशीट में बताया है कि दिल्ली शराब घोटाला मामले में 100 करोड़ रूपए की रिश्वत ली गई थी, जिसमें से सीधे-सीधे 45 करोड़ रूपए का फायदा आम आदमी पार्टी को पहुँचा था। ये पैसे हवाला के जरिए गोवा ट्रांसफर किए गए थे और फिर इन्हें ही चुनाव प्रचार में इस्तेमाल किया गया था।

इस तरह से चार्जशीट के अनुसार, केजरीवाल के नेतृत्व वाली AAP ने अपराध की आय के 45 करोड़ रुपए अपने लिए उपयोग किए और इस तथ्य को छुपाने की गतिविधियों में शामिल रहे हैं। चार्जशीट में ईडी ने मु्ख्य साजिशकर्ता अरविंद केजरीवाल को बताया है और उन्हें 37वें नंबर का आरोपित बनाया है।

रिपोर्ट के अनुसार प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आरोपित विनोद चौहान के व्‍हाट्सऐप चैट की पूरी जानकारी दी। आरोप है कि बीआरएस नेता के कविता के पीए विनोद के जरिए 25.5 करोड़ रुपए गोवा चुनाव के जरिए आम आदमी पार्टी तक पहुँचाए थे। चैट से यह साफ है कि विनोद चौहान के अरविंद केजरीवाल के साथ में अच्छे संबंध थे।

चार्जशीट में बताया गया कि आरोपित विनोद चौहान के मोबाइल से हवाला नोट नंबर के काफी स्क्रीनशॉट बरामद हुए हैं। ये स्क्रीनशॉट दिखाते हैं कि विनोद चौहान क्राइम यानी अपराध से अर्जी आय को दिल्ली से गोवा हवाला के जरिए ट्रांसफर कर रहा था। वहीं वहाँ उन पैसों को मैनेज चरणप्रीत सिंह मैनेज कर रहा था। ईडी ने चार्जशीट में उसका बयान भी लिया है। इसके साथ ही प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप पत्र में बताया है कि केस में विजय नायर की भी अहम भूमिका थी। इस मामले में वह केजरीवाल के इशारे पर ही काम कर रहा था। हालाँकि मामले में फँसने के बाद नायर ने बता दिया था कि इस पूरे खेल को अरविंद केजरीवाल द्वारा ही चलाया जा रहा है।

संदेशखाली के ‘शैतान’ शेख शाहजहाँ को CBI से बचाने SC पहुँची ममता बनर्जी सरकार की सुप्रीम कोर्ट नहीं सुनी एक भी दलील


संदेशखाली के ‘शैतान’ शेख शाहजहाँ को कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया है। इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ये भी कहा था कि सीबीआई और ईडी भी उसकी गिरफ्तारी कर सकती हैं, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार शेख शाहजहाँ का कुछ ऐसे बचाव कर रही है, जैसे वो ममता सरकार का ‘सबसे कीमती’ आदमी हो। कलकत्ता हाई कोर्ट ने सोमवार (05 मार्च 2024) को जब सीबीआई को शेख शाहजहाँ को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की अनुमति दी, तो ममता बनर्जी की सरकार तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई। ममता बनर्जी की सरकार शेख शाहजहाँ को सीबीआई को सौंपने का विरोध कर रही है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को झटका दे दिया।

ममता बनर्जी की सरकार ने संदेशखाली और शेख शाहजहाँ मामले में सीबीआई जाँच के तुरंत सुनवाई की माँग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई तुरंत करने की जगह इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को फैसला करना है कि मामले की सुनवाई कब हो।

मंगलवार (5 मार्च) को कलकत्ता हाईकोर्ट ने ईडी टीम पर हमले की जाँच को सीबीआई को सौंपने के आदेश दिए थे। दरअसल, ममता सरकार का कहना है कि एसआईटी इस मामले की गंभीरता से जाँच कर रही है। सीबीआई को मामला सौंपना बिल्कुल गलत है। ममता सरकार का दावा है कि पश्चिम बंगाल सरकार की एसआईटी की जाँच सही दिखा में जा रही है।

 दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जाँच के खिलाफ पहुँची ममता बनर्जी की सरकार ने तुरंत दूसरी अर्जी भी दाखिल की थी और इस मामले की तुरंत सुनवाई की माँग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट 2 सदस्यीय पीठ ने कहा कि ये काम आप सीजेआई को करने दें, वो लंच के बाद इस केस को सूचीबद्ध करने पर फैसला लेंगे। ये उन्हीं का विशेषाधिकार है।

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अदालत में ये अर्जी लगाई थी। अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सीबीआई जाँच सौंपे जाने के हाई कोर्ट के फैसले पर सीबीआई तुरंत शेख शाहजहाँ को अपने कब्जे में लेना चाहती है, जबकि हमारे राज्य की एसआईटी इस मामले की जाँच कर रही है। ऐसे में शेख शाहजहाँ को सीबीआई को तुरंत नहीं सौंपना चाहिए।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल पुलिस के खिलाफ ईडी को याचिका दायर करने की दी अनुमति

इस बीच, कलकत्ता हाई कोर्ट ने बुधवार (06 मार्च 2024) को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को इस बात की अनुमति दे दी कि वो पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ अवमानना ​​याचिका दायर कर सके। हाई कोर्ट ने शेख शाहजहाँ को ईडी और सीबीआई को सौंपने के निर्देश पश्चिम बंगाल सरकार को दिए थे, लेकिन पश्चिम बंगाल पुलिस और सरकार ने शेख शाहजहाँ को सीबीआई को नहीं सौंपा था। इस मामले में ईडी के वकील कलकत्ता हाई कोर्ट से अवमानना की कार्रवाई के तहत केस दर्ज कराने की अनुमति माँगी थी, जिसे कलकत्ता हाई कोर्ट ने मान लिया।
पिछले महीने राशन घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय शाहजहाँ शेख के घर छापा मारने आई थी। हालाँकि उसके समर्थकों ने ईडी पर ही उलटा हमला कर दिया और शाहजहाँ शेख फरार हो गया। उसके बाद से टीएमसी नेता कहाँ था ये किसी को नहीं पता था। बाद में संदेशखाली में महिलाओं का मुद्दा उठा और गिरफ्तारी की माँग तेज हो गई। कई टीएमसी नेता पकड़े गए और आखिर में 27 फरवरी शाहजहाँ शेख भी गिरफ्तार हुआ।

महिला खतना : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'सदियों पुरानी प्रथा होने से ये धार्मिक प्रथा नहीं बन जाती'

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिला सिर्फ पति
की पसंदीदा बनने के लिए ऐसा क्यों करे?
क्या वो पालतू भेड़ बकरियां है? उसकी भी अपनी पहचान है. 
दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका पर अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सुनवाई करेगी. सितम्बर 24 को सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने का आदेश दिया. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भी मामले को संविधान पीठ भेजने की मांग की. 
खतना को पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध कहना गलत-सिंघवी
दरअसल, पिछली सुनवाई में मुस्लिम समूह की ओर से पेश हुए वकील एएम सिंघवी ने कहा था कि बच्चियों के खतना को पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध कहना गलत है और अपराध गलत नीयत से होता है. उन्होंने कहा था कि खतना धार्मिक रस्म है ऐसे में पुरुषों के खतना की तरह महिलाओं के खतना का भी विरोध नहीं होना चाहिए. इससे पहले कोर्ट ने कहा था कि यह दलील साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों का खतना 10वीं सदी से होता आ रहा है इसलिए यह आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है जिस पर अदालत द्वारा पड़ताल नहीं की जा सकती. 
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खतना धार्मिक प्रथा का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने यह बात एक मुस्लिम समूह की ओर से पेश हुए वकील एएम सिंघवी की दलीलों का जवाब देते हुए कही थी. सिंघवी ने अपनी दलील में कहा था कि यह एक पुरानी प्रथा है जो कि जरूरी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है और इसलिए इसकी न्यायिक पड़ताल नहीं हो सकती. सिंघवी ने कोर्ट में कहा था कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित है जो कि धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है. कोर्ट ने इससे असहमति जताई और कहा था कि यह तथ्य पर्याप्त नहीं कि यह प्रथा 10वीं सदी से प्रचलित है. इसलिए यह धार्मिक प्रथा का आवश्यक हिस्सा है. कोर्ट ने कहा था कि इस प्रथा को संवैधानिक नैतिकता की कसौटी से गुजरना होगा. 
संविधान के अनुच्छेद-21 और 15 का उल्लंघन
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग लड़कियों का खतना परंपरा संविधान के अनुच्छेद-21 और अनुच्छेद-15 का उल्लंघन है. कोर्ट ने कहा था कि यह प्रक्रिया जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म, नस्ल, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव करता है. कोर्ट ने कहा था कि यह संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है क्योंकि इसमें बच्ची का खतना कर उसको आघात पहुंचाया जाता है.केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि सरकार याचिकाकर्ता की दलील का समर्थन करती है कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) और बाल यौन अपराध सुरक्षा कानून (पोक्सो एक्ट) के तहत दंडनीय अपराध है. 
क्या दाऊदी बोहरा मुस्लिम लड़कियां पालतू भेड़ बकरियां है? 
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिला सिर्फ पति की पसंदीदा बनने के लिए ऐसा क्यों करे? क्या वो पालतू भेड़ बकरियां है? उसकी भी अपनी पहचान है. कोर्ट ने कहा था कि ये व्यवस्था भले ही धार्मिक हो, लेकिन पहली नज़र में महिलाओं की गरिमा के खिलाफ नज़र आती है. कोर्ट ने ये भी कहा था कि सवाल ये है कि कोई भी महिला के जननांग को क्यों छुए? वैसे भी धार्मिक नियमों के पालन का अधिकार इस सीमा से बंधा है कि नियम 'सामाजिक नैतिकता' और 'व्यक्तिगत स्वास्थ्य' को नुकसान पहुंचाने वाला न हो. याचिकाकर्ता सुनीता तिवारी ने कहा था कि बोहरा मुस्लिम समुदाय इस व्यवस्था को धार्मिक नियम कहता है. समुदाय का मानना है कि 7 साल की लड़की का खतना कर दिया जाना चाहिए. इससे वो शुद्ध हो जाती है. ऐसी औरतें पति की भी पसंदीदा होती हैं.याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि खतना की प्रक्रिया को अप्रशिक्षित लोग अंजाम देते हैं. कई मामलों में बच्ची का इतना ज्यादा खून बह जाता है कि वो गंभीर स्थिति में पहुंच जाती है. 
केंद्र ने याचिका का किया था सर्मथन
केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका का समर्थन करते हुए कहा था कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करता है. इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि इसके लिए दंड विधान में सात साल तक कैद की सजा का प्रावधान भी है. आपको बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समाज में आम रिवाज के रूप में प्रचलित इस इस्लामी प्रक्रिया पर रोक लगाने वाली याचिका पर केरल और तेलंगाना सरकारों को भी नोटिस जारी किया था. याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट में वकील सुनीता तिवारी ने याचिका दायर कर इस प्रथा पर रोक लगाने की मांग की है. 
सुप्रीम कोर्ट ने गत अगस्त 20 को सुनवाई के कहा था कि यह दलील यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं कि दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों का खतना 10वीं सदी से होता आ रहा है इसलिए यह आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है जिस पर अदालत द्वारा पड़ताल नहीं की जा सकती.
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पीठ ने यह बात एक मुस्लिम समूह की ओर से पेश हुए अधिवक्ता एएम सिंघवी की दलीलों का जवाब देते हुए कही. सिंघवी ने अपनी दलील में कहा कि यह एक पुरानी प्रथा है जो कि जरूरी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है और इसलिए इसकी न्यायिक पड़ताल नहीं हो सकती.
इस पीठ में न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे. सिंघवी ने पीठ से कहा कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित है जो कि धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है.
यद्यपि पीठ ने इससे असहमति जतायी और कहा कि यह तथ्य पर्याप्त नहीं कि यह प्रथा 10वीं सदी से प्रचलित है इसलिए यह धार्मिक प्रथा का आवश्यक हिस्सा है. पीठ ने कहा कि इस प्रथा को संवैधानिक नैतिकता की कसौटी से गुजरना होगा. इस मामले में सुनवाई अधूरी रही और इस पर 27 अगस्त से फिर से सुनवाई होगी.
क्या लड़कियां पालतू भेड़-बकरियां हैं?
इससे पहले 30 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था कि महिला सिर्फ पति की पसंदीदा बनने के लिए ऐसा क्यों करे? क्या वे पालतू भेड़ बकरियां है? उसकी भी अपनी पहचान है. कोर्ट ने कहा कि ये व्यवस्था भले ही धार्मिक हो, लेकिन पहली नज़र में महिलाओं की गरिमा के खिलाफ नज़र आती है. कोर्ट ने ये भी कहा कि सवाल ये है कि कोई भी महिला के जननांग को क्यों छुए? वैसे भी धार्मिक नियमों के पालन का अधिकार इस सीमा से बंधा है कि नियम सामाजिक नैतिकता और व्यक्तिगत स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला न हो.(इनपुट भाषा से)