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फिर हुआ उजागर कांग्रेस का हिन्दू विरोधी चेहरा

साकेत गोखले-राहुल गाँधी
हिन्दू विरोधयों की जोड़ी : राहुल गाँधी और साकेत गोखले 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अयोध्या राम मंदिर निर्माण हेतु ‘भूमि पूजन‘ के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अयोध्या दौरे पर जारी बहस और राजनीति के बीच, दिल्ली के वकील और कांग्रेस पार्टी समर्थक साकेत गोखले ने बुधवार (जुलाई 22, 2020) को कोरोना वायरस के दौरान ‘अनलॉक 2.0’ दिशानिर्देशों के मद्देनजर राम मंदिर भूमि पूजन के इस आयोजन पर रोक लगाने की याचिका (PIL) दायर की है।
कांग्रेस समर्थक साकेत गोखले द्वारा दायर इस PIL में कहा गया है कि अनुमान के अनुसार दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए 300 लोग घटना में शामिल होंगे। यदि याचिका स्वीकार की जाती है, तो मुख्य न्यायाधीश द्वारा तय की गई एक पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी।
यदि मंदिर अवरोध की गहराई में जाया जाये तो मुस्लिम से कहीं अधिक कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा ही अड़चने उत्पन्न की गयी हैं। खुदाई में मिले अवशेषों को छुपाया गया। राम को काल्पनिक बताया गया, राम के जन्मस्थान पर संदेह किया गया। और पार्टी में शामिल बेशर्म हिन्दू अपने आराध्य श्रीराम का उपहास बर्दाश्त करते रहे। जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने अपनी पुस्तक में सोनिया गाँधी के हिन्दू विरोधी होने की बात कही है। 
साकेत गोखले सोशल मीडिया पर मोदी सरकार और इसके कामकाज को लेकर फेक और भ्रामक खबरें फैलाने के लिए जाने जाते हैं।
इलाहबाद हाई कोर्ट में PIL फाइल



याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार केंद्र के दिशानिर्देशों के अनुसार आयोजन की अनुमति नहीं दे सकती है। ट्विटर पर साकेत गोखले ने लिखा है कि राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट और केंद्र सरकार, दोनों ही इस मुद्दे पर साथ हैं। इसके अलावा, गोखले ने गृह मंत्रालय पर एक आरटीआई भी दायर की है, जिसमें पूछा गया है कि क्या इसके लिए किसी अन्य आधार पर छूट दी गई थी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर की आधारशिला रखेंगे। राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र में 150 मेहमानों को आमंत्रित किया गया है – जिनमें शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और गृह मंत्री अमित शाह शामिल हैं।
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मजहब देख सियासत करने वाले केजरीवाल समय का पहिया बहुत तेजी से बदलता है। आज एक बार फिर यही कुछ होता दिख रहा है। कभी रथ ....
इस दौरान सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) के मानदंडों का पालन किया जाएगा। ट्रस्ट ने अनुमान लगाया है कि मंदिर का निर्माण 3-3.5 वर्षों में पूरा किया जाएगा, यानी वर्ष 2023 तक यह सम्पन्न हो जाएगा।

रामजन्मभूमि शिलान्यास : मजहब भूल धर्म याद आया अरविन्द केजरीवाल को

अरविंद केजरीवाल
मजहब देख सियासत करने वाले केजरीवाल 
समय का पहिया बहुत तेजी से बदलता है। आज एक बार फिर यही कुछ होता दिख रहा है। कभी रथ यात्रा रोक कर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को जेल भेजने वाले लालू प्रसाद यादव आज खुद जेल मे बंद हैं, वहीं आडवाणी भूमि-पूजन में शामिल होने जा रहे हैं। 
दूसरी तरफ, मजहब देख सियासत करने वाले, दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी अब धर्म याद आ रहा है। उन्होंने जुलाई 23, 2020 को यह बताया कि उन्हें अभी तक 5 अगस्त को होने वाले राम मंदिर भूमि पूजन के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है। मीडिया से बात करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भगवान राम को सभी नागरिकों और दिल्ली के लोगों को कोरोना महामारी से लड़ने के लिए आशीर्वाद देना चाहिए।
केजरीवाल अपने पूर्व विधायक कपिल मिश्रा के इस पुराने वीडियो को भी देख लें:-
ऐसे में यह भी प्रश्न होता है कि रामजन्मभूमि मंदिर के विरुद्ध गुप्त प्रचार से चुनाव जीते विधायक क्या अपने केजरीवाल का यह अयोध्या जाना हजम हो पाएगा? दूसरे, CAA की आड़ में हिन्दुत्व के विरुद्ध नारेबाजी करने वालों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रहे नेताओं को बर्दाश्त हो पाएगा? या फिर राहुल गाँधी की तरह चुनावों में मंदिरों में माथा टेकने पर अपने गंगा-जमुना तहजीब की आड़ में अपना घिनौना खेल खेलने वालों से माफ़ी मांगनी पड़ी थी, उसी तरह क्या माफ़ी मांगोगे?
खैर, उन्होंने कहा, “मुझे अभी तक आमंत्रित नहीं किया गया है। भगवान राम को हमें और दिल्लीवासियों को आशीर्वाद देना चाहिए। हम भगवान राम से हमें इस महामारी से बचाने के लिए प्रार्थना करेंगे।”



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए 5 अगस्त को अयोध्या जाएँगे। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद होंगे और सीएम योगी आदित्यनाथ समेत कई नेता शामिल होंगे।
मुमकिन है कि राम मंदिर के लिए इस पूरे मामले को आंदोलन में तब्दील करने वाले पूर्व उप-मुख्यमंत्री लाल कृष्ण आडवाड़ी भी इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हों।

ऐसे में सीएम केजरीवाल के इस आरोप पर कि उन्हें भूमि पूजन के लिए आमंत्रण नहीं मिला, पर भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी ने करार जवाब दिया। उन्होंने अरविंद केजरीवाल से सवाल पूछा कि जब वह मस्जिद के मौलवियों को 18000 रुपए देने लगे तब उन्होंने मंदिर के पुजारियों के बारे में क्यों नहीं सोचा।
वे अरविंद केजरीवाल के आरोप के जवाब में ट्वीट करते हुए लिखती हैं, “जब आप मस्जिद के मौलवियों को 18000 रुपए देने लगे तब आपने क्या मंदिर के उन गरीब पुजारियों के बारे में नहीं सोचा। राज धर्म और राम राज्य सभी से समान तरीके से पेश आने के लिए कहता है, वो भी बिना भेदभाव।”
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रोहिंग्यों को संरक्षण देते अमानतुल्ला खान आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार देश में एनआरसी का विरोध किया जाता है। लेकि...

अयोध्या : मृणाल पाण्डे ने फैलाया भ्रम, लोगों ने कहा – ‘राक्षसी सेना वाली औसत वामपंथी’

मृणाल पाण्डे अयोध्या
मृणाल पांडेय ने फैलाया झूठ 
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण शुरू होने के साथ ही वामपंथियों का गिरोह भी सक्रिय हो गया है। तमाम तरह के दुष्प्रचार फैलाए जा रहे हैं। वामपंथी नेता सुभाषिनी अली ने एक पुरानी ख़बर शेयर कर के बौद्धों को राम मंदिर को लेकर भड़काया। इसके बाद उसी ख़बर को आधार बनाते हुए मृणाल पांडेय ने प्रपंच फैलाया। मृणाल पाण्डे ने शेयर किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में बौद्धों का दावा स्वीकार कर लिया है।
दरअसल, ये एक पुरानी खबर है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के ही विनीत कुमार मौर्य की याचिका स्वीकार की थी, जिसमें उन्होंने राम मंदिर की जगह बौद्ध विहार होने की बात कही थी। इस याचिका में दावा किया गया था कि पुरातात्विक अवशेष भी इस ओर इशारा करते हैं कि वहाँ बौद्ध सम्बन्धी स्ट्रक्चर था। हालाँकि, कोर्ट में ये दावा ठीक उसी तरह ख़ारिज हो गया था, जिस तरह बाबरी मस्जिद वालों का हुआ।
मृणाल पाण्डे ने पुरानी खबर
शेयर कर फैलाया झूठ
बावजूद इसके दशकों तक लेखन और पत्रकारिता में सक्रिय रहीं मृणाल पाण्डे द्वारा इस तरह से लोगों को बरगलाना वामपंथी प्रपंच के सिवा कुछ भी नहीं है। इन दोनों के अलावा कई अन्य लोगों ने भी इस पुरानी खबर को जम कर शेयर किया। राम मंदिर मामले में फैसला आ चुका है, सैकड़ों साल पुराने विवाद का निपटारा हो चुका है- तो सोचने वाली बात है कि अब इस पर कोई याचिका यूँ ही कैसे स्वीकार कर ली जाएगी।
सोशल मीडिया में कई लोगों ने इस तरफ ध्यान भी दिलाया कि ये पुरानी खबर है। दिलीप मंडल ने भी 21 मई को एक खबर शेयर की थी, जिसमें अयोध्या में बौद्ध विहार होने के दावों के साथ सुप्रीम कोर्ट में गए व्यक्ति के बारे में जानकारी दी गई थी। मौर्य राम मंदिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट में 14वें याचिकाकर्ता थे। इस याचिका में इलाहबाद हाईकोर्ट को चुनौती देते हुए एएसआई की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया था कि उक्त स्थल पर बौद्ध स्तूप होने के प्रमाण मिले हैं।
फ़िलहाल वहाँ राम मंदिर का निर्माण चालू है और नींव की पहली ईंट रखने के साथ ही लोगों ने कारसेवकों और मंदिर के लिए संघर्षशील रहे हस्तियों को याद किया। सोशल मीडिया पर कई लोग शिवलिंग और चक्र जैसी चीजों को नकारते हुए उनके बौद्ध धर्म से जुड़े होने की बात करते रहे, जो वहाँ समतलीकरण के दौरान मिला था। उदित राज जैसे दलितों के ठेकेदारों ने भी इस दावे पर अपनी मुहर लगाई और लोगों को बरगलाया।
सुभाषिनी अली तो ख़ुद को नास्तिक बताती हैं और कहती हैं कि किसी भी धर्म में उनका कोई इंटरेस्ट नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि कुछ धर्मों में काफी कड़े नियम बना दिए गए हैं। अगर उनकी किसी भी धर्म में रूचि नहीं है तो फिर अचानक से बौद्ध धर्म से उनका प्रेम कैसे सामने आ गया? असल में यहाँ जितने भी नास्तिक वामपंथी हैं, ऐसा नहीं है कि वो सभी धर्मों में विश्वास नहीं रखते, बल्कि वो हिंदुत्व से घृणा करते हैं और इसे नीचा दिखाना चाहते हैं।

हिन्दू सन 1886 में ही मंदिर बनाना चाहते थे :मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट में

Ayodhya Case : मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- हिन्दू सन 1886 में ही मंदिर बनाना चाहते थेअयोध्या केस (Ayodhya Case) में सितम्बर 24 को 30 वें दिन की सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर निरंतर सुनवाई हो रही है. मुस्लिम पक्ष की ओर से उसके वकील जफरयाब जिलानी ने कहा कि हिन्दू 1886 केफैसले में पूजा का अधिकार मिलने के बाद विवादित स्थल पर बने चबूतरे पर ही मंदिर बनाना चाहते थे. पर तब के जिला कोर्ट ने इसकी इजाज़त नहीं दी थी. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में स्वीकार किया कि राम चबूतरे पर भगवान राम का जन्म हुआ था. उन्होंने कहा कि बाद में गुंबद वाले स्थान पर भी हिंदू दावा करने लगे. मुस्लिम पक्ष की ओर से राजीव धवन ने आज अपनी दलीलें पूरी कर लीं.     
मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि मुस्लिम वहां पर नमाज पढ़ते थे, इस पर सवाल उठाया जा रहा है. स्थल पर 22-23 दिसंबर की रात को जिस तरह से मूर्ति को रखा गया, वह हिन्दू नियम के अनुसार सही नहीं है. धवन ने कहा कि 40 गवाहों की गवाही को क्रास इक्जामिनेशन नहीं किया गया. गोपाल सिंह विशारद की याचिका में भी भगवान राम के जन्मस्थान के बारे में नहीं बताया गया. मस्जिद के बीच के गुम्बद के नीचे जन्मस्थान होने का दावा किया गया और पूजा के अधिकार की मांग की गई.
धवन ने कहा कि जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने माना था कि राम चबूतरे पर पूजा की जाती थी. धवन ने हाईकोर्ट के एक जज के ऑब्जर्वेशन का विरोध किया जिन्होंने कहा था कि मुस्लिम वहां पर अपना कब्जा साबित नहीं कर पाए थे. धवन ने कहा कि हम इसका  विरोध करते हैं, हमारा वहां पर कब्ज़ा था. उन्होंने शीतल दुबे की रिपोर्ट का ज़िक्र किया जिसमें कहा गया था कि मस्जिद के परिसर में हवन और पूजा होती थी और नमाज नहीं होती थी. इस पर धवन ने कहा कि वह हवन और पूजा भी हो सकती है. इस रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया कि पूजा और हवन मस्जिद के अंदरूनी आंगन में होती थी.
धवन अयोध्या विवाद से जुड़ी कई पुरानी याचिकाओं का जिक्र करते हुए साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि मस्जिद पर मुस्लिम पक्ष का कब्ज़ा था. धवन ने कहा कि मुतावल्ली ने अर्ज़ी दाखिल की थी जिस पर सरकार ने आदेश दिया था. गर मस्जिद पर मुस्लिमों का कब्ज़ा नहीं होता तो वह मुतावल्ली अर्ज़ी क्यों लगाता और सरकार फैसला क्यों देती. इससे साबित होता है कि मस्जिद पर मुस्लिमों का कब्ज़ा था. उन्होंने कहा कि मोहम्मद अजगर ने कब्रिस्तान पर कब्ज़े के लिए अर्ज़ी लगाई थी.
राजीव धवन ने हिन्दू पक्ष के एक गवाह का बयान पढ़ते हुए कहा कि भगवान राम की मूर्ति गर्भ गृह में नहीं थी. गर्भ गृह के अंदर कोई भी भगवान की तस्वीर नहीं थी, लेकिन तब भी जो लोग पूजा करने आते वे रेलिंग की तरफ जाकर गर्भगृह  की तरफ जाते थे. राजीव धवन ने कहा कि गर्भ गृह के भीतर कभी पूजा नहीं हुई. गलत तरीके से रखी गई मूर्ति से दावे का अधिकार नहीं हो सकता. अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्ष की तरफ से राजीव धवन ने बहस पूरी कर ली.
मुस्लिम पक्ष की तरफ से जफरयाब जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि जन्मस्थल पर राम जन्म का विश्वास तो है, पर सबूत नहीं. उन्होंने कहा कि रामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण, यह तो याचिकाकर्ताओं को साबित करना है कि और कौन-कौन सी किताबों में ज़िक्र है! मानस और रामायण में कहीं विशिष्ट तौर पर राम जन्म स्थान का कोई जिक्र नहीं. सन 1949 से पहले मध्य गुंबद के नीचे राम जन्म, पूजा का कोई अस्तित्व या सबूत नहीं मिलता.
जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि आप यह सबूत भी देंगे कि 1949 से पहले वहां नियमित नमाज़ होती थी? जिलानी ने कहा इसके लिखित नहीं ज़बानी सबूत हैं. जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि हिन्दू पक्ष भी, रामायण और मानस में अयोध्या में दशरथ महल में राम जन्म का ज़िक्र है लेकिन स्थान का नहीं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि दोनों ग्रंथों में अयोध्या में रामजन्म का ज़िक्र है. इसका मतलब क्या यह है कि अयोध्या में कहीं भी राम जन्मभूमि का दावा कर दें?
जिलानी ने कहा कि राम चबूतरा मंदिर से पुराना नहीं है. उन्होंने रामानंदाचार्य और रामभद्राचार्य के हवाले से कहा कि उनकी मानस टीका में भी अवधपुरी का ज़िक्र है, किसी खास स्थान का नहीं. दोहा शतक के सबूत को जिलानी ने खारिज करते हुए कहा कि इसके तुलसीकृत होने का सबूत नहीं दिया गया. स्कन्दपुराण में अयोध्या खण्ड में राम जन्मस्थान को लेकर चौहद्दी और दूरी का जिक्र है, लेकिन अब वह जगह नहीं मिल रही जिसका जिक्र पुराण में है.
जस्टिस बोबड़े ने कहा कि अयोध्या में राम जन्म को लेकर आपका विवाद नहीं? सिर्फ जन्मस्थान को लेकर है? इस पर जिलानी ने कहा जी बिल्कुल. जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि आप राम चबूतरे को राम जन्मस्थान मानते हैं? तो जिलानी ने कहा जी हां, पहले सभी यही मानते रहे हैं. स्कन्दपुराण कहता है कि जन्मस्थान अमुक-अमुक स्थान से अमुक दूरी पर है. लेकिन अब वो स्थान अस्तित्व में नहीं है.
जिलानी ने कहा  कि सन 1886 में जिला जज ने भी अपने फैसले में राम चबूतरा को जन्मस्थान मानते हुए वहां पूजा करने की इजाज़त दी थी. 1886 के फैसले में ये भी कहा गया कि चबूतरा ही जन्मस्थान है. पर बाद में हिन्दू जन्मस्थान मंदिर बताते हुए आंतरिक अहाते और गुंबद वाली इमारत पर दावा करने लगे. बोबड़े ने पूछा - आप मानते हैं कि इस फैसले को किसी ने चुनौती नहीं दी? जिलानी ने कहा कि हमने तो चुनौती नहीं दी. पर बाद में बहुत सी रिट दाखिल हुईं. पर वे इसे चुनौती देते हुए नहीं बल्कि अधिकार को लेकर थीं.
जिलानी ने कहा कि हिन्दू 1886 के फैसले में पूजा का अधिकार मिलने के बाद वहां चबूतरे पर ही मंदिर बनाना चाहते थे. पर तब के जिला कोर्ट ने इसकी इजाज़त नहीं दी थी. गवाह सत्यनारायण त्रिपाठी के बयान का हवाले देते हुए जिलानी ने कहा कि मानस में भी सिर्फ अयोध्या का ज़िक्र है राम जन्मस्थान का नहीं. एक गवाह ने दशरथ के महल में रामजन्म होने का ज़िक्र किया है, पर महल की स्थिति का पता नहीं.
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि गवाहों ने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा है कि सीताकूप के अग्निकोण में 200 कदम दूर श्री राम का जन्मस्थान है. जिलानी ने नक्शा बताते हुए कहा कि जन्मस्थान और सीता कूप के उत्तर-दक्षिण का भी जिक्र है, लेकिन जन्मस्थान मंदिर, और चबूतरे को मान रहे थे. फिर हिंदुओं ने अपना विश्वास बदल दिया और दोनों जगहों पर दावा करने लगे.
जिलानी ने कहा कि एक गवाह ने भी बताया कि कवितावली और अन्य ग्रंथों में भी राम जन्म अयोध्या या अवधपुरी या साकेत में होने का जिक्र है, पर विशिष्ट जन्मस्थान का नहीं. गवाह भी वशिष्ठ कुंड, लोमश कुंड, विध्नेश्वर गणेश और पिण्डारक से विवादित स्थल की दूरी और दिशा के बारे में कुछ नहीं बता पाए. वाल्मीकि रामायण में भी कोई विशिष्ट स्थान नहीं बताया गया. रामचरित मानस की रचना मस्जिद बनने के करीब 70 साल बाद हुई, लेकिन कहीं यह जिक्र नहीं है कि राम जन्म स्थान वहां है जहां मस्जिद है. यानी जन्म स्थान को लेकर हिंदुओं की आस्था भी बाद में बदल गई.
जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई, पहले कभी मंदिर था उस जगह मस्जिद बनाई या खाली जगह पर मस्जिद बनी? इस सवाल पर जिलानी बोले बाबर ने खाली प्लाट पर मस्जिद बनाई थी. अगर पहले मंदिर रहा होगा, तो बाबर को इसकी जानकारी न हो.
जिलानी ने कहा कि आईन-ए-अकबरी में भी राम जन्मभूमि का नहीं लेकिन पवित्र शहर अवध का जिक्र है, जहां हिन्दू राम की पूजा करते हैं. जस्टिस भूषण ने जिलानी को टोका कि स्कन्दपुराण का हवाला तो आपके गवाह ने भी दिया है जिसमें उसने राम जन्मस्थान की बात कही है. जिलानी ने कहा कि स्कन्दपुराण तो 18 वीं सदी में पब्लिश हुआ था. जस्टिस भूषण ने कहा कि बात पब्लिश की नहीं, पुराण के लेखन की बात करें. आपके गवाह ने ही छठी सदी में लिखे जाने की बात कहते हुए कहा था कि शायद ये उससे भी पहले अस्तित्व में आया होगा.
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आपकी दलील जन्मस्थान का ज़िक्र नहीं होने से है? जिलानी ने कहा कि हां वहां मस्जिद को बाबरी कहा जाए या नहीं. यह ज़्यादा ज़रूरी है कि उस ढांचे में हिन्दू पूजा नहीं करते थे. जिलानी ने कहा कि मस्जिद जहां बनी वहां मंदिर नहीं था, मंदिर सरयू के किनारे था. उनका भी कहना है कि जन्मस्थान मंदिर रामकोट, यानी किले में था.
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....

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अयोध्या मामले के पक्षकार इकबाल अंसारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। दरअसल अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज वर्तिका स....

जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि आईन-ए-अकबरी में मस्जिद का ज़िक्र नहीं है? जिलानी ने कहा कि हिंदुओं का यह दावा गलत है कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई. जस्टिस बोबड़े ने पूछा रामकोट, कहां है वो किला? जिलानी ने कहा कि वह तो पूरे शहर के चारों ओर बनी दीवार थी. लेकिन अब तो वह एक मोहल्ला का नाम है. किला तो नक्शे में ही है. नक्शे में दुर्ग भी लिखा है. इस पर कोर्ट ने नक्शा दिखाते हुए कहा कि नक्शे में तो एक छोटे से हिस्से को दुर्ग बताया गया है. जिलानी ने कहा कि नदी के किनारे एक बंगला था. उसे ही फोर्ट्रेस कहा गया होगा. ट्रेफेन थेलर जैसे कुछ यात्रियों ने भी फोर्टेस का जिक्र किया है लेकिन वो और है. जस्टिस बोबड़े ने कहा कि क्या राम जन्मस्थान की एक्ज़ेक्ट कोई लोकेशन है? जिलानी ने कहा नहीं. बोबड़े ने फिर पूछा कि तो राम चबूतरे को जन्मस्थान मानते हैं? जिलानी ने कहा कि हां, हिन्दू भी यही मानते हैं.

The hearing of Ram Janmabhoomi Appeals has been adjourned – yet once again

Image result for रामजन्मभूमिOur apprehensions that the opposite party shall raise any frivolous issues to secure an adjournment have come true.

The objection that a judicial order should have been passed for the constitution of a five judge bench is apparently frivolous; for it is settled that the Hon’ble Chief Justice is the master of roster. He alone decides the strength of a bench and the judges to sit in it.

The other objection on Justice U U Lalit being on the bench is painful. Justice Lalit has never appeared in the Ram Janmabhoomi matters; neither at the trial stage nor in the appeal. His being Counsel of Shri Kalyan Singh in 1997 in the contempt matter casts no shadow on his hearing the present appeals. The objections were merely ploys to delay further.

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Under the circumstances, an adjournment from 10 January to 29 January is rather long. Hindus are known for their patience and forbearance. The judicial system still has the responsibility of deciding the matters without undue delays. The country hopes that the Hon’ble Chief Justice, heading the present Bench shall decisively act to prevent the delaying tactics of the opposite party.

We have seen the objections by two members of Muslim Personal Law Board about the absence of any Muslim Judge on the bench is disturbing. It would be a very sad day when the judges would be assigned to hear matters on the basis of their religion. In this case, the bench had been constituted with rational criteria i.e. the Judges who would become Chief Justice of Supreme Court during their tenure. The attempt of forum shopping is to be condemned.

Alok Kumar, Advocate
Working President, VHP 
विहिप कार्याध्यक्ष एडवोकेट श्री आलोक कुमार का हिंदी व् अंग्रेजी में प्रेस वक्तव्य :
नई दिल्ली जनवरी 10, 2019. श्रीराम जन्मभूमि की अपीलों की सुनवाई एक बार पुन: टाल दी गई.
हमारा यह संदेह कि विरोधी पक्ष अनावश्यक बहाने बाजी से, अपीलों की सुनवाई को टालने का प्रयास करेंगे, सत्य सिद्ध हुआ.

यह कहा जाना कि पाँच सदस्यीय बेंच के गठन हेतु कोई न्यायिक आदेश पारित किया जाए, यह विरोध बेतुका है. क्योंकि, यह स्थापित सत्य है कि मुख्य न्यायाधीश ही मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं और वे स्वयं ही यह निर्णय करते है कि पीठ में कितने और कौन जज रहेँगे.

दूसरा, न्यायमूर्ति श्री यूयू ललित के पीठ में रहने का विरोध कष्टकारक है. न्यायमूर्ति श्री यूयू ललित ने श्रीराम जन्मभूमि वाद में ना तो कभी निचली अदालत में और ना ही किसी अपील में भाग लिया. उनके द्वारा 1997 में अवमानना के सन्दर्भ में श्री कल्याण सिंह के वकील के रूप में सामिल होने का इन याचिकाओं से कोई सम्बन्ध नहीं है. यह विरोध मामले को षडयंत्र पूर्वक विलंबित करने के अलावा कुछ नहीं है. 

इन सब परिस्थितियों में सुनवाई की तिथि को 10 से सीधा 29 जनवरी तक ले जाना भी बहुत लंबा है. हिन्दू समाज अपने धैर्य व सहनशीलता के लिए जाना जाता है. न्यायिक व्यवस्था का फिर भी यह दायित्व है कि वह मामले पर बिना किसी और देरी के अबिलम्ब निर्णय दे. देश को उम्मीद है कि माननीय मुख्य न्यायाधीश, जो इस वर्तमान पीठ का नेतृत्व कर रहे है, सुनवाई में रोड़े अटकाने वाले विरोधी पक्षकारों के विरुद्ध कड़े निर्णय लेंगे.

मुस्लिम पर्शनल लॉ बोर्ड के दो सदस्यों का पीठ में मुस्लिम जजों के न होने सम्बन्धी विरोध भी बेहद कष्टप्रद है. न्यायाधीशों को भी साम्प्रदायिक आधार पर मामलों को सुनवाई करने के लिए कहा जाए, इससे बड़ी दुखद स्थिति और क्या हो सकती है?. इस मामले में पीठ में जजों की नियुक्ति बहुत ही तार्किक तरह से हुई है. इसमें उन न्यायाधीशों को सामिल किया गया है जो अपने कार्यकाल में ही मुख्य न्यायाधीश बनेंगे.  ‘फोरम शोपिंग’ का प्रयास निंदनीय है.
आलोक कुमार, एडवोकेट
कार्याध्यक्ष

विश्व हिन्दू परिषद् , नई दिल्ली
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अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच सुनवाई करेगी. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में शुरुआती सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी और उस दिन ही नियमित सुनवाई की तारीख तय होगी. चीफ जस्टिर रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी. 
इससे पहले तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एम खानविलकर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की बेंच ने 2:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि 1994 के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है जिसमें कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पढना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है.
इसके साथ ही बेंच ने कहा था कि 1994 का इस्माइल फारुखी फैसला सिर्फ जमीन अधिग्रहण को लेकर था. संविधान पीठ ने कहा था कि जमीनी विवाद से इसका लेना देना नहीं इसलिए सिविल मामले की सुनवाई होगी. हालांकि जस्टिस नजीर ने इससे असहमति जताते हुए कहा था कि संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार हो. जस्टिस मिश्रा तीन अक्तूबर को रिटायर हो चुके हैं. अब ये नई पीठ बनाई गई है. 
विवाद की ये है पुरानी कहानी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ अयोध्या विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 13 अपीलों पर सुनवाई कर रहा है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ के इस विवादित स्थल को इस विवाद के तीनों पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और भगवान राम लला के बीच बांटने का आदेश दिया था.बता दें कि राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था. इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या टाइटल विवाद में फैसला दिया था. फैसले में कहा गया था कि विवादित लैंड को 3 बराबर हिस्सों में बांटा जाए, जिस जगह रामलला की मूर्ति है उसे रामलला विराजमान को दिया जाए. सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए जबकि बाकी का एक तिहाई जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए. सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान और हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. वहीं, दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी. इसके बाद इस मामले में कई और पक्षकारों ने याचिकाएं लगाई. 
राम जन्मभूमि विवाद 
एक पक्ष ने कहा मामला संवैधानिक पीठ में जाए, अन्य ने कहा जल्द निपटाएं.सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई करने की बात कही थी. सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट में इसके बाद से यह मामला लंबित है.











1992 में अधूरा रह गया काम, ढांचा गिरा पर मंदिर नहीं बना : भैयाजी जोशी

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर विश्व हिंदू परिषद अयोध्या दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली (धर्म संसद) आयोजित कर रही है। वीएचपी की धर्मसभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह सुरेश जोशी उर्फ भैयाजी जोशी ने कहा कि 1992 में काम अधूरा रह गया। ढांचा गिरा पर मंदिर नहीं बना। उन्होंने कहा कि सत्ता जनभावना का सम्मान करे। सरकार कानून बनाने की पहल करे। मंदिर पर सुनवाई को लेकर हो रही देरी पर उन्होंने कहा कि अदालत को देश की भावनाएं समझनी चाहिए।· 
उन्होंने कहा कि न्यायालय का सम्मान करते हुए इंतजार किया। न्यायालय की प्रतिष्ठा बनी रहनी चाहिए। राम मंदिर का निर्माण ही भविष्य के राम राज्य का आधार बनेगा। राम राज्य में ही शांति है। भक्त भव्य राम मंदिर का दर्शन करना चाहता है। बीजेपी राम मंदिर बनाने का संकल्प पूरा करे।
रामलीला मैदान में विश्व हिंदू परिषद की रैली में हजारों लोग जुटे हैं। इस रैली के माध्यम से विहिप मांग कर रही है कि अगर जरूरत पड़े तो सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाना चाहिए। इस रैली को सफल बनाने के लिए विहिप ने लोगों के घर-घर जाकर प्रचार अभियान चलाया। 
विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा, 'राम मंदिर के निर्माण के लिए जो लोग विधेयक लाने के पक्ष में नहीं हैं, यह रैली उन लोगों का हृदय परिवर्तन करेगी।' वीएचपी के प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि रामलीला में होने वाली धर्मसभा को आरएसएस के कार्यकारी प्रमुख सुरेश भैय्या जोशी संबोधित करेंगे. यह विशाल रैली होगी जो अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए विधेयक लाने का समर्थन नहीं करने वाले सारे लोगों का हृदय परिवर्तन कर देगी. वीएचपी ने इस धर्मसभा के प्रचार प्रसार के लिए ट्विटर हैंडल, फेसबुक पेज और सभा के सीधा प्रासरण के लिए यू ट्यूब चैनल भी बनाया है.  
बीएचपी के महासचिव सुरेंद्र जैन ने कहा कि अगर किसी स्थिति में संसद के शीतकालीन सत्र में बिल नहीं लाया गया तो अगली धर्म संसद में आगे के कदम पर फैसला होगा। इसका आयोजन अगले साल 31 जनवरी और एक फरवरी को महाकुंभ के इतर इलाहाबाद में होगा।
वीएचपी का दावा है कि संसद के आगामी सत्र में विधेयक पेश किया जाएगा, जिससे राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा.
इस धर्मसभा को लेकर दावा किया जा रहा है कि इसमें देश भर से 5 से 10 लाख रामभक्त शामिल होंगे. कई राज्यों से रामभक्त दिल्ली पहुंच भी चुके हैं, जिन्हें अलग-अलग मठों, मंदिरों में ठहराया जा रहा है. दिल्ली में होने वाली धर्मसभा अयोध्या, नागपुर और मुंबई में हुई धर्मसभाओं की महत्वपूर्ण कड़ी है.
शीतकालीन सत्र में विधेयक लाने का दबाव
वीएचपी के महासचिव सुरेंद्र जैन का दावा है कि इस धर्मसभा से उन लोगों का हृदय परिवर्तन होगा जो मानते हैं कि संसद के शीतकालीन सत्र में राम मंदिर पर विधेयक लाना संभव नहीं है. बता दें कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने आजतक के खास कार्यक्रम सीधी बात में कहा था कि अयोध्या पर कोई भी निर्णय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही होगा. सुरेंद्र जैन का कहना है कि यदि किसी वजह से शीतकालीन सत्र में राम मंदिर को लेकर विधेयक नहीं आता है, तो प्रयाग में होने वाले महाकुंभ में होने वाली आगामी धर्म संसद में भविष्य की रणनीति तय होगी. बता दें कि महाकुंभ में 31 जनवरी से 1 फरवरी तक दो दिवसीय धर्म संसद होनी हैं जिसमें राम मंदिर समेत कई अन्य मुद्दों पर धर्मादेश जारी होगा.  
निर्मोही, निर्वाणी अखाड़ा ने किया किनारा
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में होने वाली इस धर्मसभा से निर्मोही अखाड़ा और निर्वाणी अखाड़ा ने किनारा कर लिया है. बता दें कि 25 नवंबर को अयोध्या में हुई धर्मसभा में भी निर्मोही अखाड़ा शामिल नहीं हुआ था. इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में राम जन्मभूमि को तीन हिस्सों में बांटा गया है जिसमें एक हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया गया है. वहीं निर्वाणी अखाड़ा परिषद भी इस धर्मसभा में शामिल नहीं हो रही है. बता दें कि निर्वाणी अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत धर्मदास ने कुछ दिन पहले राम मंदिर को लेकर आत्मदाह की चेतावनी दी थी. जिसे लेकर अयोध्या प्रशासन ने उन्हें हिरासत में ले लिया था.
वीएचपी का हाईटेक प्रचार
जहां वीएचपी इस धर्मसभा को सफल बनाने के लिए दिल्ली और आस पास के क्षेत्रओं में घर-घर जाकर प्रचार कर रही है, वहीं दिल्ली पुलिस ने भी सुरक्षा के तगड़े बंदोबस्त किए हैं. बता दें कि रामलीला मैदान की बाउंडरी आसफ अली रोड पर स्थित फैज इलाही मस्जिद को छूती है और यह स्टेज से 50 मीटर की दूरी पर है. वीएचपी का कहना है कि यह धर्मसभा अनुशासित तरीके से होगी.
सुरक्षा के तगड़े बंदोबस्त
सुरक्षा को देखते हुए 5000 पुलिसकर्मी, अर्धसैनिक बल की 10 कंपनियां तैनात की गई है. दिल्ली के कुछ स्थानों पर धर्मसभा के विरोध में पोस्टर भी लगे हैं, जिसे देखते हुए सोशल मीडिया पर भी नजर रखी जा रही है और साइबर सेल की एक विशेष टीम अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए लगातार मॉनिटरिंग कर रही है. शनिवार को पुलिस मुख्यलय में हुई बैठक में उन अधिकारियों को खास तौर पर इस काम के लिए नियुक्त किया गया है जिनका कानून व्यवस्था बनाए रखने में अच्छा रिकॉर्ड रहा है. बैठक के बाद सभी एडिशनल डीसीपी को रामलीला मैदान तैनात किया गया है.  
कई जगह ट्रैफिक रोकी गई
प्रशासन ने एहतियातन रविवार को रामलीला मैदान के इर्दगिर्द की सभी दुकाने शाम तक बंद रखने के आदेश दिए हैं. वहीं सेंट्रल दिल्ली आने वाली कई सड़को को यातायात के लिए बंद या डाइवर्ट किया गया है. जिसमें रंजीत सिंह फ्लाइओवर से गुरुनानक चौक से बाराखंबा रोड तक, राजघाट से दिल्ली गेट और चमनलाल मार्ग पर आमजन के लिए ट्रैफिक रोक दिया गया है.
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