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अब 370 पेज के सबूत का क्या करोगे केजरीवाल ?

ट्वीट करते हुए यूजर्स के निशान पर आए केजरीवाल
आर.बी.एल.निगम 
दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का जुलाई 20 की दोपहर निधन हो गया। 81 साल की दीक्षित कुछ समय से बीमार चल रही थीं। जुलाई 19 की सुबह सीने में दर्द की शिकायत के बाद उनको एस्कार्ट्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन पर सभी दलों के नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। वहीं, दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने भी शीला दीक्षित के निधन पर शोक जताते हुए ट्वीट किया, लेकिन इस ट्वीट के बाद वे कई यूजर्स के निशाने पर आ गए।
2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में केजरीवाल और प्रशांत भूषण इसी शीला दीक्षित के विरुद्ध 370 पृष्ठों के आरोप दिखाकर उन्हें जेल भेजने की बात बोलकर भ्रमित करते रहे, लेकिन इतने वर्ष हो गए मुख्यमंत्री बने, परन्तु आज तक एक भी घोटाले की जाँच तक नहीं करवाई, क्यों?ट्वीट करते हुए यूजर्स के निशान पर आए केजरीवाल 

'आपने उनको अपमानित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा'
'आप उनको गाली देकर जीते'अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की तीन बार सीएम रहीं शीला दीक्षित के निधन पर शोक जताया। उन्होंने ट्वीट किया, 'अभी-अभी शीला दीक्षित के निधन की दुखद खबर सुनी, जो दिल्ली के लिए बहुत बड़ी क्षति है। उनके द्वारा किए गए कार्यो को हमेशा याद किया जाएगा, उनके परिजनों के प्रति मेरी संवेदनाएं, भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।'आपने उनको अपमानित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा' 
अरविंद केजरीवाल के ट्वीट पर एक यूजर ने लिखा, 'आपने उनको अपमानित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा, दिल्ली ये याद रखेगी।' एक अन्य यूजर ने केजरीवाल के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, 'शीला दीक्षित अरविंद केजरीवाल से कहीं बेहतर मुख्यमंत्री थीं। आप दिल्ली के सीएम हो, इसलिए आपको मीडिया कवरेज अधिक मिलती है, देवेंद्र फडणवीस आपसे काफी बेहतर सीएम हैं।'
'आप उनको गाली देकर जीते' जबकि एक अन्य यूजर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, 'आप उनको गाली देकर, करप्शन के आरोप लगातार जीते, आप दिल्ली के लिए त्रासदी साबित हुए हो, आज उनके निधन से दिल्ली शोक में है क्योंकि दिल्ली ने शीला दीक्षित को वापस लाने का मौका गंवा दिया है।' 

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आर.बी.एल.निगम शीला दीक्षित कांग्रेस का बड़ा नाम था। उनको गांधी परिवार का काफी करीबी माना जाता रहा था। शीला दीक्षित ....

दरअसल, दिल्ली के ये दोनों नेता कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे। ये वही अरविंद केजरीवाल हैं जिन्होंने 2013 के विधानसभा चुनावों में शीला दीक्षित को हराया था। केजरीवाल ने शीला दीक्षित के 15 सालों तक सीएम रहने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला था। अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित पर करप्शन के कई आरोप लगाए थे।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता शीला दीक्षित का निधन

Sheila Dikshit passes away latest news
आर.बी.एल.निगम 
शीला दीक्षित कांग्रेस का बड़ा नाम था। उनको गांधी परिवार का काफी करीबी माना जाता रहा था। शीला दीक्षित कांग्रेस के उन कद्दावर नेताओं में शुमार थी जिनका संबंध राजीव गांधी से लेकर आज की कांग्रेस पीढ़ी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ भी बहुत मधुर था।
जीवन परिचय
शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में एक खत्री परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा नई दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से की थी। इसके बाद उन्होंने परास्नातक (एमए) इतिहास में दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाऊस से की थी। शीला दीक्षित का विवाह विनोद दीक्षित से हुआ था। विनोद दीक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। शीला दीक्षित के दो बच्चे हैं- संदीप दीक्षित और लतिका सैयद। शीला दीक्षित भी शादी के बाद अपने ससुर के साथ राजनीति में सक्रिय हो गई। 

राजनीतिक इंट्री
शीला दीक्षित ने राजनीति में कदम अपने ससुर की वजह से रखा था। शीला के पति विनोद दीक्षित के पिता उमा शंकर दीक्षित एक स्वतंत्रा सेनानी थे। उमा शंकर उत्तर प्रदेश के उन्नाव के रहने वाले थे। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ आजादी के आंदोलन में बढ़- चढ़कर हिस्सा लिया था। उमा शंकर दीक्षित कानपुर जिला कांग्रेस के सचिव थे। शीला दीक्षित भी शादी के बाद अपने ससुर के साथ राजनीति में सक्रिय हो गई।शीला दीक्षित की राजनीति में सक्रियता उस वक्त और ज्यादा बढ़ गई जब संजय गांधी कांग्रेस में युवाओं की फौज खड़ा चाहते थे।
Sheila Dikshit Diesशीला दीक्षित के कुशल प्रबंधन और दूरदर्शी सोच का ही नतीजा है कि राजधानी में आज मेट्रो, सीएनजी वाहन, सिग्नेचर ब्रिज, बारापूला एलीवेटेड रोड समेत फ्लाईओवर व अंडरपास का जाल का बिछा है। बिजली का निजीकरण करने के साथ ही अनधिकृत कॉलोनियों में विकास की शुरुआत का पूरा श्रेय शीला दीक्षित को जाता है। 
शीला अपने पीछे दिल्ली के विकास की अनगिनत निशानियां छोड़ गई हैं। कहा जा सकता है कि मौजूदा दिल्ली की कल्पना शीला दीक्षित के बिना नहीं हो सकती।
शीला दीक्षित ने दिल्ली के मुख्यमंत्री(तत्कालीन मुख्य महानगर पार्षद) प्रो विजय कुमार मल्होत्रा और मदन लाल खुराना द्वारा दिल्ली के विकास के श्रीगणेश को रोका नहीं, बल्कि उसे और तेजी देकर, दिल्ली का नक्शा ही बदल दिया।  
Deeply saddened by the demise of Sheila Dikshit Ji. Blessed with a warm and affable personality, she made a noteworthy contribution to Delhi’s development. Condolences to her family and supporters. Om Shanti.
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Former PM Manmohan Singh: I'm shocked to hear the sudden passing away of Smt . In her death the country has lost a dedicated Congress leader of the masses. People of Delhi will always remember her contribution to Delhi's development during her tenure as CM for 3 terms
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एलिवेटेड रोड तैयार करवाने में दिखाया प्रशासनिक कौशल

दिल्ली : क्या कांग्रेस और आप में गठबन्धन सम्भव होगा ?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन की अटकलों के बीच राष्ट्रीय राजधानी की सात लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों के नाम छांटने के लिए मार्च 30 की देर रात बैठक की। आप के साथ गठबंधन पर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष शीला दीक्षित ने बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि इस संबंध में अंतिम फैसला रविवार(मार्च 31) शाम तक या सोमवार(अप्रैल 1) को कर दिया जाएगा और ये आधिकारिक घोषणा होगी। 
पार्टी सूत्रों ने बताया कि बैठक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित के आवास पर हुई जो काफी देर तक चली। कमेटी को पिछले महीने सात लोकसभा सीटों के लिए मिले 80 आवेदनों में से नाम छांटने का काम सौंपा गया है।पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि औसतन हर सीट के लिए दो-तीन नाम छांटे जाएंगे और उम्मीदवारों के अंतिम चयन के लिए आला कमान को नई सूची भेजी जाएगी।आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन के बारे में फैसला पार्टी प्रमुख राहुल गांधी को करना है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की खबरें लगातार आती रही हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता और दिल्ली प्रभारी पी सी चाको ने कुछ दिन पहले कहा था कि जहां तक उन्हें जानकारी है दिल्ली में वरिष्ठ नेताओं का मत है कि बीजेपी को हराना ही सबकी पहली जिम्मेदारी है और इसके लिए हमें आप के साथ गठबंधन में जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज समय की मांग है कि बीजेपी को हराने के लिए आपसी मतभेदों को भुला दिया जाए।
Delhi Congress chief Sheila Dikshit on possible alliance between Congress and Aam Aadmi Party (AAP) in Delhi: You will get to know about it in a matter of few hours, by this evening or by tomorrow. There will be an official announcement.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कुछ दिनों पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की अपनी इच्छा जताई थी लेकिन कांग्रेस ने उनकी मांग को कोई तवज्जो नहीं दी। कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को कोई खास तवज्जों नहीं थी जिसके बाद आप ने दिल्ली की सभी सातों सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया गया था।
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दिल्ली में आप-कांग्रेस गठबंधन की बातें कई महीनों से चल रही हैं। इस मामले में जहां कांग्रेस ने हमेशा अपना पक्ष स्पष.....

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार पिछले कई माह में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता मुक्त करने के लिए मोदी विरोधी .....
अब समस्या यह होने वाली है कि यदि इन दोनों पार्टियों में समझौता हो जाता है, उस स्थिति में आप द्वारा घोषित उन सीटों के उम्मीदवारों का क्या होगा, जिन पर कांग्रेस अपना उम्मीदवार चाहती है। क्या वह आसानी से अपना हक़ छोड़ देंगे? जो इस समझौते में दरार डाल सकती है या आम आदमी पार्टी में दरार, देखते हैं, ऊंट किस करवट बैठता है। कांग्रेस को दिल्ली में अपनी खोई ज़मीन को प्राप्त करना है तो दूसरी ओर पैरों के नीचे खिसकती ज़मीन को बनाए रखने की मंझधार में दोनों ही पार्टियाँ हैं। वैसे भी आप में भी सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा।   

क्यों शीला दीक्षित ने केजरीवाल के गठबन्धन का पलीता निकाला?

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आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
काफी समय से आम आदमी पार्टी संयोजक अरविन्द केजरीवाल हर पार्टी के साथ गठबंधन करो, गठबंधन करो। प्लीज गठबंधन कर लो। सूत्रों के अनुसार केजरीवाल और राहुल गाँधी के साथ बात बन गयी थी, परन्तु अनुभवी वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित ने केजरीवाल की हसरतों पर रायता फेंकने की जुगाड़ में थी। अरविन्द केजरीवाल गुहार लगाते रह गए। शीला दीक्षित भाव देने के लिए तैयार ही नहीं हुईं। केजरीवाल का प्लान बिकने से रह गया, तो अपने चिर-परिचित अंदाज में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को कोसने लगे। दिल्ली कांग्रेस का बड़ा हिस्सा शुरू से इसी सोच के साथ चली है कि केजरीवाल से दूरी ही अच्छी। लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की पहले से दसवें नंबर तक की चिंता बीजेपी है। केजरीवाल या किसी और से निपटने या निपटाने का टास्क बाद में आता है। ऐसे में ये जानना जरुरी है कि दिल्ली कांग्रेस और केंद्रीय कांग्रेस के इस खेल में आखिर शीला दीक्षित यानी दिल्ली कांग्रेस की ही क्यों चली? 
दरअसल, 2014 में मोदी लहर को रोकने के लिए जब अरविन्द केजरीवाल को चुनावी मैदान में उतारे जाने पर मन्थन चल रहा था, उस समय कुछ बुद्धिजीवियों ने इस विचार का विरोध भी किया था, परन्तु उस समय तत्कालीन अध्यक्षा के मष्तिक में कुछ और ही खेल चल रहा था। जिसमे वह पूर्णरूप से असफल होने के बावजूद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी को निरन्तर गुप्त समर्थन जारी रखी, परिणाम जगजाहिर है कि कांग्रेस को सबसे नुकसान मोदी ने नहीं, बल्कि कांग्रेस द्वारा पोषित आम आदमी पार्टी से हुआ है। 
जहाँ तक, वर्तमान दिल्ली कांग्रेस अध्यक्षा एवं भूतपूर्व मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित के विरुद्ध 370 सबूत लेकर, उन्हें जेल भेजने के प्रचार ने कांग्रेस को गठ्ठे में फेंक दिया, उस गठ्ठे से बाहर निकलने में कांग्रेस को जितनी कवायत करनी पड़ रही है, सबके सम्मुख है। यानि बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होंगे? 
कांग्रेस विरोध से ही खड़े हुए थे केजरीवाल
राजनीति में वक्त कड़वाहट के बड़े-से-बड़े घाव को भर देता है। लेकिन 2012-14 से 2019 के बीच यमुना में इतना पानी भी नहीं बह गया है कि एक-दूसरे को दी गई सारी गालियां बहकर दूर कहीं चली जाएं और जनता-जनार्दन पुरानी बातों पर पर्दा डालकर बनाए गए रिश्ते को पाक-पवित्र मान ले। 
वैसे कुर्सी के लिए मौजूदा राजनीति में ये संभव भी है। लेकिन कांग्रेस के लिए परेशानी की बात ये है कि जनता के जेहन में अन्ना को आगे कर दिल्ली की सड़कों पर दिखी नौटंकी (क्योंकि जिस नई राजनीति की बात कही गई थी वह दिखी नहीं) की यादें 'कल की ही बात' की तरह दर्ज है।

2015 से 2017 के बीच ही बदल गया था दिल्ली का ‘वोट चरित्र’ 
Related image2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटें जीत ले गई। बीजेपी को मिली सिर्फ 3 सीटें। लेकिन ये नतीजे असल कहानी नहीं कहते। असल कहानी समझने के लिए आप, बीजेपी और कांग्रेस को मिले वोट प्रतिशत को समझना जरूरी है। तब बीजेपी का 32,3 प्रतिशत वोट के साथ कोई इतना बुरा प्रदर्शन भी नहीं था। लेकिन 54.3 प्रतिशत वोट बटोर लेने की वजह से केजरीवाल की पार्टी 67 सीटें ले गई। आम आदमी पार्टी का ये ऐतिहासिक प्रदर्शन इसलिए संभव हो सका, क्योंकि कांग्रेस सिर्फ 9.7 प्रतिशत दिल्ली वालों के वोट जुटा सकी। 
इसमें कांग्रेस द्वारा गुप्त प्रचार किया गया कि "अगर हमें वोट नहीं देना चाहते हो, कोई बात नहीं, भाजपा को देने की बजाए झाड़ू को वोट देना।" और इसी तरह का दुष्प्रचार भाजपा और संघ के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ द्वारा विशेषकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी होता रहता है। भाजपा और संघ समर्पित अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ हर चुनाव में करते रहते हैं, जिससे स्थानीय मंडलों से लेकर भाजपा का केन्द्रीय स्तर भी इस कटु सच्चाई को नकार नहीं सकता। भाजपा और संघ द्वारा पोषित ये प्रकोष्ठ पाकिस्तान समर्थक स्लीपर सेलों से कहीं अधिक खतरनाक हैं। पाकिस्तान समर्थक कम से कम किसी न किसी रूप में जनता के सामने तो आ ही जाते हैं, लेकिन भाजपा और संघ पोषित अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ भाजपा के धन पर भाजपा के विरुद्ध प्रचार करते हैं, जिसका कई बार प्रमाणों सहित अपने लेखों में उल्लेख करता रहा हूँ।
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लेकिन दो ही साल बाद ही (2017 में) एमसीडी के चुनावों में क्या हुआ? कांग्रेस 21 प्रतिशत वोट के साथ विधानसभा चुनाव के मुकाबले सबसे ज्यादा लाभ हासिल करने वाली पार्टी रही। वो भी अच्छा-खासा लाभ। बेशक बीजेपी ने भी 2015 विधानसभा चुनाव के मुकाबले लाभ कमाया। बीजेपी का वोट प्रतिशत 32.3 प्रतिशत से बढ़कर 37 प्रतिशत हो गया। लेकिन ये लाभ उतना नहीं था, जितना कांग्रेस का। वहीं 2015 के विधानसभा चुनाव में 54.3 प्रतिशत वोट खींच ले जाने वाली केजरीवाल की पार्टी एमसीडी चुनाव में आधी से भी कम सिर्फ 26 प्रतिशत वोट ही जुटा पाई।
हवा के इस रुख को दिल्ली की राजनीति को गहराई से समझने वाली शीला दीक्षित बखूबी भांपती हैं. अगर 2015 के मुकाबले 2017 तक आए बदलाव को आधार बनाकर आकलन किया जाए, तो कांग्रेस-आप गठबंधन का मतलब यही होता कि दिल्ली के वोटर्स में सबसे तेजी से लोकप्रियता खो रही पार्टी (आप) का दिल्ली की राजनीति में सबसे तेजी से लोकप्रियता में इजाफा करने वाली पार्टी (कांग्रेस) का गठबंधन। ये अपने-आप में कांग्रेस के लिए डराने वाली स्थिति है। ऊपर से गठबंधन की सूरत में कांग्रेस के लिए खतरा इस वजह से और बढ़ जाता क्योंकि 2015 से 2017 तक बीजेपी भी न सिर्फ दिल्ली में जनमत का लाभ कमाने वाली पार्टी रही, बल्कि एमसीडी में स्वीप कर गई थी। ऐसे में कांग्रेस के केजरीवाल के पास जाने का सीधा मतलब होता केजरीवाल के खिलाफ जो भी सत्ता विरोधी लहर है उसका साझीदार बन जाना।
काम को लेकर नाराजगी
दिल्ली की आप सरकार ने दिल्ली वालों के लिए क्या किया, सवाल सिर्फ इसका नहीं है। केंद्र की बीजेपी सरकार ने दिल्ली में अपने हिस्से का काम कितना किया, सवाल सिर्फ ये भी नहीं है। कोई पार्टी कितना भी अच्छा काम करें, हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में वोटर्स का एक हिस्सा धीरे-धीरे नाराज होता ही चला जाता है। जाहिर है दिल्ली भी अपवाद नहीं है। दिल्ली वालों को ये भी पता है कि उनकी जो भी मुश्किलें हैं, उसकी जिम्मेदारी कहीं राज्य सरकार की है, तो कहीं केंद्र सरकार की। ऊपर से दोनों ने ही पिछले 4 वर्षों में आपसी टकराव का जिस हद तक जाकर नमूना पेश किया है, वो सबने देखा है। इसके मुकाबले इन्हीं दिल्ली वालों ने 2013 के आखिर तक बगैर किसी टकराव के चलती शीला दीक्षित की उस सरकार को देखा है, जिसे उसके विकास कार्यों के लिए तमाम विरोधी भी लोहा मानते हैं। ये अलग बात है कि केंद्र-राज्य टकराव न होने की असल वजह 2004 से सत्ता में आ गई कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार थी। ऐसे में शीला दीक्षित जब कांग्रेस नेतृत्व के सामने गठबंधन न करने पर अड़ गईं, तो उनके दिमाग में  पिछले 4-5 वर्षों में आप और बीजेपी से असंतुष्ट हुई नई जमात के खुद से जुड़ने के सपने भी जरूर पल रहे होंगे।
दूसरे राज्यों में कांग्रेस को नुकसान
पंजाब में हर पांच साल में सत्ता बदलने का इतिहास रहा है। हालांकि पिछली दफा (2012 में) बादल दूसरा टर्म हासिल कर गए थे। ऐसे में भारी बहुमत से चुनाव जीतकर 10 साल बाद पंजाब की सत्ता में आई कांग्रेस की सेहत के लिए भी ये गठबंधन मुफीद नहीं होता। क्योंकि तब तक पैदा सत्ता विरोधी वोट की काट कांग्रेस त्रिकोणीय मुकाबले (कांग्रेस-आप-एनडीए) में ही तलाशना चाहेगी। ऐसे में अगर दिल्ली में दोनों के बीच गठजोड़ हो गया होता, तो फिर पंजाब में बीजेपी और अकाली इन्हें एक ही सिक्के का दो पहलू बताकर लाभ उठाने की स्थिति में जरूर होते। यही नहीं, अगर दिल्ली में कांग्रेस-आप का याराना हुआ होता, तो कांग्रेस के लिए पंजाब में पेच इस लोकसभा चुनाव के दौरान भी फंस सकता था। फिर वहां कांग्रेस किस मुंह से आप के खिलाफ बातें कर पाती? ये स्थिति कांग्रेस को इस वजह से भी परेशानी में डालने वाली होती, क्योंकि पंजाब में  इस बार कांग्रेस की सबसे अच्छी संभावना मानी जा रही है। कांग्रेस कैसे भूल सकती है कि दिल्ली की 7 सीटों के मुकाबले पंजाब में 13 लोकसभा सीटें हैं।
भविष्य के लिहाज से भी केजरीवाल हैं कांग्रेस के लिए खतरा
बीजेपी ने अपनी पहचान सख्त राष्ट्रवाद से जोड़ रखी है। साथ में उनकी राजनीति में हिन्दुत्व का छौंक भी बड़ी करारी है। जबकि राहुल के मंदिर-मंदिर दर्शन के बाद भी कांग्रेस न हिन्दुत्व में संस्कारित पार्टी नजर आती है और न ही कट्टर राष्ट्रवाद का मुल्लमा उन्होंने लगा रखा है। अगर केजरीवाल को इन दो कटेगरी में से किसी एक खांचे में डालने की बाध्यता हो, तो निश्चित तौर पर आम आदमी पार्टी के मुखिया कांग्रेस के ज्यादा करीब नजर आते हैं। लेकिन एक जैसा दिखने की यही कहानी कांग्रेस को इस बात के लिए आगाह करती है कि वह ऐसा कोई काम करने से बचे, जिससे कि एक मोड़ पर जाकर अपना वोट केजरीवाल के हाथों  में लुटाने की नौबत आ जाए। 
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लोकसभा चुनाव में अब चंद महीने ही बचे हैं। दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने की संभावनाओं प.....

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दिल्‍ली सरकार के पूर्व मंत्री संदीप कुमार के स्‍कैंडल के बाद से लगातार आम आदमी
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आम आदमी पार्टी (आप) का इंटरनल सर्वे इन दिनों चर्चा
आम आदमी पार्टी में चल रहे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। सांसद भगवंत मान के विरोधी…


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मिर्ज़ापुर जिलाधिकारी को ज्ञापन देती कार्यकर्ता अन्ना आन्दोलन से उपजी केजरीवा
इतिहास गवाह है कि कांग्रेस के नादान फैसलों और मुसीबतों से आंखें मूंद लेने की आदत ने कई राज्यों में खुद को लुटाकर कितनी ही क्षेत्रीय पार्टियों को आबाद कर दिया है।
मुमकिन है कि कांग्रेस को दिल्ली में आमचुनाव में कोई बड़ी कामयाबी न मिले। लेकिन इस फैसले के बाद पार्टी अगर वोट प्रतिशत में नंबर-2 पर भी टिक गई, तो एक साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में मौजूदा शून्य के मुकाबले ठीक-ठाक सीटों को जीत से गुलजार करने की सोच सकती है।