दिल्ली वक्फ बोर्ड भर्ती मामले में 3 गिरफ्तार, तीनों AAP विधायक अमानतुल्ला के करीबी (साभार-बिजनेस स्टैण्डर्ड) ये कैसी विडंबना है कि जो अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार दूर करने आया, उसी की पार्टी इतने कम समय में गले से ऊपर घोटालों में लिप्त हो गयी। कितने ही विधायक घोटालों, घरेलु हिंसा और राशन कार्ड आदि आरोपों में लिप्त होने का मतलब है कि केजरीवाल पार्टी आरोपियों से भरी पड़ी है। वैसे गिरफ़्तारी की तलवार अरविन्द केजरीवाल पर भी लटक रही है। यानि जो चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जेल भेजने की बात करता था, उसी का मार्ग अब जेल की ओर जा रहा है। कहते हैं कि जितने भी घोटाले हैं, लगभग सभी के तार केजरीवाल से जुड़े बताए जा रहे हैं, क्योकि पार्टी में केजरीवाल की सलाह के बिना पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता।
दिल्ली वक्फ बोर्ड में भर्ती में अनियमितता को लेकर राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान समेत 10 अन्य आरोपितों पर फैसला सुना दिया है। मामले में जाँच एजेंसी ईडी ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। तीनों के नाम जिशान हैदर, जावेद इमाम, दाऊद नसीर हैं। अदालत ने तीनो को 14 दिनों की हिरासत में भेज दिया है, जहाँ जाँच एजेंसी इनसे पूछताछ करेगी। ये सभी आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान के करीबी बताए जा रहे हैं।
अमानतुल्ला खान दिल्ली वक्फ बोर्ड में चेयरमैन हैं। वहीं वफ्फ बोर्ड मामला से जुड़े भ्रष्ट्राचार मामले में जाँच एजेंसी ED अमानतुल्लाह खान के खिलाफ भी केस दर्ज कर चुकी है। इससे पहले ED ने 10 अक्टूबर, 2023 को दिल्ली के पाँच ठिकानों पर सर्च ऑपरेशन चलाया था। इस मामले में ED ने अमानतुल्ला खान के घर पर भी छापा मारा था। ED ने ये कार्रवाई दिल्ली एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) की तरफ से दाखिल दो FIR के तहत की थी। ये FIR दिल्ली वक्फ बोर्ड में नौकरियों में अनियमितताओं से जुड़ी है।
AAP नेता अमानतुल्लाह खान पर 32 लोगों की अवैध नियुक्ति का आरोप
आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान ने दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन के रूप में 32 लोगों को अवैध रूप से भर्ती किया था। इसके साथ ही आप विधायक ने अवैध रूप से दिल्ली वक्फ बोर्ड की कई संपत्तियों को किराए पर दिया है। साथ ही अमानतुल्लाह खान पर ये भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने दिल्ली वक्फ बोर्ड के धन का दुरुपयोग किया है। इस मामले में दिल्ली वक्फ बोर्ड के तत्कालीन सीईओ ने इस तरह की अवैध भर्ती के खिलाफ बयान जारी किया था।
अमानतुल्लाह के करीबियों के ठिकानों पर मिला था कैश
वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने सबसे पहले सितंबर, 2022 में अमानतुल्लाह से पूछताछ की थी। इसी के आधार पर ACB ने चार जगहों पर छापे मारे। करीब 24 लाख रुपए कैश बरामद किया था।
इसके अलावा इस छापेमारी में दो अवैध और बिना लाइसेंस की पिस्टल मिली थीं। कारतूस और गोला-बारूद भी बरामद किया था। बाद में अमानतुल्लाह को इस मामले में गिरफ्तार भी किया गया था। यह गिरफ्तारी आप विधायक के खिलाफ सुबूतों और आपत्तिजनक सामग्री के आधार पर की गई थी।
इसमें कहा गया था कि सीबीआई की एक प्राथमिकी और दिल्ली पुलिस की तीन शिकायतें आप विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ ईडी की कार्रवाई का आधार बनीं। खान ने उक्त आपराधिक गतिविधियों से अपराध की बड़ी रकम नकदी में अर्जित की थी और इस नकद राशि को अपने सहयोगियों के नाम पर दिल्ली में विभिन्न अचल संपत्तियों की खरीद में निवेश किया था। हालाँकि, बाद में उन्हें उन्हें 28 दिसंबर 2022 को जमानत पर रिहा कर दिया गया।
केंद्र की मोदी सरकार ने राजधानी स्थित नई दिल्ली जामा मस्जिद को नोटिस भेजा है। 18 अगस्त 2023 को जारी इस नोटिस में कहा गया है कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार मस्जिद का निरीक्षण किया जाएगा। इसके अलावा, दिल्ली वक्फ बोर्ड (Delhi Waqf Board) की 123 संपत्तियों को कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के आदेश के बाद नई दिल्ली जामा मस्जिद की दीवार पर एक नोटिस चिपकाया गया। नोटिस में कहा गया था कि इस संपत्ति पर अपना दावा करने वाले लोग निरीक्षण के दौरान अपने दावे को साबित करने के लिए तैयार रहें। उन्हें संपत्ति से जुड़े दस्तावेज और नक्शे जमा करने होंगे।
इस नोटिस को लेकर जामा मस्जिद के इमाम मुहिबुल्लाह नदवी ने कहा है कि मस्जिद को कोई खतरा नहीं है। उनके पास मस्जिद से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज हैं। नदवी ने कहा है कि जामा मस्जिद के निरीक्षण के दौरान मीडिया भी रहेगी तो अच्छा होगा।
जामा मस्जिद और फतेहपुरी मस्जिद का इतिहास जानने के लिए ब्रिटिश काल (1865 के आस-पास) का इतिहास निकालना होगा, कहते हैं कि जब इन दोनों मस्जिदों को नामस्जिद घोषित कर इन मस्जिदों में ब्रिटिश आर्मी और घोड़े रहते थे। तब हिन्दुओं ने इन मस्जिदों के लिए धरने और प्रदर्शन कर ब्रिटिश पुलिस की लाठियां खाई थीं। तब उस समय के चर्चित सेठों छुन्ना मल और सत्यनारायण(गुड़ वाले) ने नीलामी में क्रमशः इन मस्जिदों को ख़रीदा था। 1985/86 में कांग्रेस के उर्दू डेली कौमी आवाज़ में मक्की परिवार के सदस्य का समाचार प्रकाशित हुआ था कि जिस उस सज्जन ने जामा मस्जिद के इमाम द्वारा शाही शब्द इस्तेमाल करने पर आपत्ति करने के साथ-साथ यह प्रश्न भी किया था कि सेठ छुन्ना मल ने हमें मस्जिद का मुतावल्ली बनाया था, लेकिन मस्जिद के प्रबंधक कमेटी में हमें क्यों नहीं शामिल किया जाता?
वक्फ बोर्ड की 123 संपत्तियों को कब्जे में लेगी मोदी सरकार
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने दिल्ली वक्फ बोर्ड से जुड़ी 123 संपत्तियों को अपने कब्जे में लेने का फैसला किया है। इन संपत्तियों में मस्जिद, कब्रिस्तान और दरगाह शामिल हैं। इसको लेकर मंत्रालय ने दिल्ली वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष अमानतुल्लाह खान को नोटिस भी जारी किया था। यही नहीं मंत्रालय ने सभी 123 संपत्तियों के बाहर नोटिस भी चस्पा कराए थे।
इस पर मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय ने कहा था कि रिटायर्ड जस्टिस एसपी गर्ग की अध्यक्षता में दो सदस्यीय समिति बनाई। समिति ने अपनी रिपोर्ट में गैर-अधिसूचित वक्फ संपत्तियों के मुद्दे पर कहा था कि उसे दिल्ली वक्फ बोर्ड से कोई प्रतिनिधित्व या आपत्ति प्राप्त नहीं हुई है। समिति की सिफारिश पर केंद्र ने इन संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने का फैसला किया।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ दिल्ली वक्फ बोर्ड ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में वक्फ बोर्ड की 123 संपत्तियों के निरीक्षण और तोड़फोड़ पर रोक लगाने की माँग की गई थी, लेकिन मई 2023 में हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज दी थी।
ये सभी संपत्तियाँ कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान दिल्ली वक्फ बोर्ड को दे दी गई थीं। इन संपत्तियों को दिल्ली वक्फ बोर्ड को देने को लेकर ‘विश्व हिंदू परिषद’ ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अगस्त 2014 में हाईकोर्ट ने आदेश का पालन करते हुए मंत्रालय ने हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस एसपी गर्ग की अध्यक्षता में दो सदस्यीय समिति का गठन किया था।
इस समिति ने दिल्ली वक्फ बोर्ड के सभी हितधारकों और प्रभावितों का पक्ष को सुनने के बाद केंद्र सरकार से इन संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने की सिफारिश की थी। इस सिफारिश पर अमल करते हुए केंद्र सरकार ने इन संपत्तियों को अपने अधिकार में लेने का निर्णय किया है।
अहमदिया पर आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के फतवे पर मोदी सरकार सख्त (फोटो साभार: ET/इंडिया टुडे) आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के एक फतवे पर केंद्र की मोदी सरकार ने सख्त नाराजगी जताई है। इस फतवे के जरिए अहमदिया समाज को ‘गैर मुस्लिम’ और ‘काफिर’ घोषित किया गया है। केंद्र ने इसे घृणा फैलाने वाली हरकत बताते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि किस ‘आधार’ और ‘अधिकार’ से यह फतवा जारी किया गया है। अहमदिया मुस्लिमों ने इसके खिलाफ केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय से शिकायत की थी।
आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के अहमदिया मुस्लिम के विरुद्ध फतवे के बहुत दूरगामी परिणाम होने वाले है। लेकिन यह उन सभी नेताओं और पार्टियों के लिए आंखें खोलने वाला है, जो छद्दम धर्म-निरपेक्षता का चोला ओढे हिन्दुओं को जातियों में विभाजित कर, मुस्लिम समाज के सिरमौर बनाए घूम रहे हैं। मुस्लिम समाज में ही कितना मनमुटाव है, उस पर उसी तरह पर्दा डाल जनता को पागल बनाते रहे, जिस तरह तुष्टिकरण के चलते भारत के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों को महान पढ़ाते रहे। चर्चा है, पुष्टि नहीं हुई है, कि बहुत जल्दी 4 और जातियों के विरुद्ध फतवा आने वाला है। इतना ही नहीं, उन मुसलमानों के विरुद्ध भी फतवा आने को है, जो सनातन धर्म का समर्थन करते हैं। अभी तो यह शुरुआत है, देखना है कि फतवों का दौर कहाँ तक जाने वाला है।
जिस तरह नूपुर शर्मा के बयान पर एक्स-मुस्लिम और कुछ मौलानाओं ने कट्टरपंथियों को आड़े हाथ लेते बेनकाब किया था, क्या यह 'फतवा' उसी का परिणाम है? अगर यह सम्भावना सच है, निस्संदेह यह आग जरूर फैलेगी, जिसे रोकना शायद असंभव हो। Jaipur Dialogue, Sach, News Nation पर 'इस्लाम क्या कहता है' और दूसरे अन्य चैनल पर नूपुर शर्मा के समर्थन में हुई इन चर्चाओं की गूंज बहुत दूर तक जाती दिख रही है। 'सर तन से जुदा' से हिन्दुओं को डराने की जो चिंगारी कट्टरपंथियों ने छोड़ी थी, उस आग में कट्टरपंथी अपने ही समाज को झुलसाने को आमादा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश सरकार को लिखे पत्र में कहा है, “अहमदिया मुस्लिम समुदाय की ओर से 20 जुलाई 2023 को एक शिकायत प्राप्त हुई है। इसमें कहा गया है कि कुछ वक्फ बोर्ड अहमदिया समुदाय का विरोध कर रहे हैं और उन्हें इस्लाम से बाहर करने के लिए अवैध प्रस्ताव पारित कर रहे हैं। यह अहमदिया समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने वाली हरकत है। वक्फ बोर्ड के पास अहमदिया सहित किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।”
अल्पसंख्यक मंत्रालय ने यह भी कहा है कि वक्फ अधिनियम 1995 के तहत वक्फ बोर्ड को भारत में वक्फ संपत्तियों की देखरेख और उनका मैनेजमेंट का अधिकार है। राज्य वक्फ बोर्ड को इस तरह का आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। मंत्रालय ने आगे कहा है, “वक्फ अधिनियम 1955 के के तहत वक्फ बोर्ड राज्य सरकार के एक निकाय के रूप में काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि वक्फ बोर्ड राज्य सरकार द्वारा जारी आदेशों पर काम कर सकता है। उसे किसी भी गैर-सरकारी संगठनों द्वारा जारी फतवों पर संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है।”
मंत्रालय की ओर से यह भी कहा गया है कि वक्फ बोर्ड ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उसे इस तरह के आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। खासकर तब, जब इस तरह के आदेश से किसी समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा और असहिष्णुता पैदा हो सकती है।
क्या है मामला
इस पूरे मामले की शुरुआत साल 2012 में हुई। आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने अहमदिया को गैर-मुस्लिम घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। बावजूद आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने इसी साल फरवरी में एक और प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि 26 मई, 2009 को जमीयत उलेमा द्वारा जारी किए फतवे को देखते हुए ‘कादियानी समुदाय’ को ‘काफिर’ घोषित किया जाता है। ये मुस्लिम नहीं हैं। बता दें कि अहमदिया मुस्लिमों को कादियानी भी कहा जाता है।
कौन हैं अहमदिया मुस्लिम
पंजाब के लुधियाना जिले के कादियान गाँव में मिर्जा गुलाम अहमद ने साल 1889 में अहमदिया समुदाय की शुरुआत की। मिर्जा गुलाम अहमद खुद को पैगंबर मोहम्मद का अनुयायी और अल्लाह की ओर से चुना गया मसीहा बताते थे। मिर्जा गुलाम अहमद ने इस्लाम के अंदर पुनरुत्थान की शुरूआत की थी। इसे अहमदी आंदोलन और इससे जुड़े मुस्लिमों को अहमदिया बोला गया। अहमदिया मुस्लिम गुलाम अहमद को पैगंबर मोहम्मद के बाद का एक और पैगंबर या आखिरी पैगंबर मानते हैं। इसी कारण अन्य मुस्लिम उनका विरोध करते हैं। चूँकि गुलाम अहमद कादियान गाँव से थे। इसलिए अहमदिया मुस्लिमों को कादियानी भी कहा जाता है।
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद वक्फ बोर्ड की बयानबाजी तेज हो गई है। राज्य में वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शफी सादी ने जहाँ इस जीत के बाद कहा कि अब नई सरकार में मुस्लिम समुदाय का उप-मुख्यमंत्री बनना चाहिए और 5 मुस्लिम विधायकों को खास विभाग दिया जाना चाहिए। वहीं गुलबर्गा के वक्फ जिला अध्यक्ष सैयद हबीब सरमस्त का एक बयान वायरल हुआ कि मुसलमानों को किसी रिजर्वेशन की जरूरत नहीं है। उनके पास गुलबर्गा में ही 27000 एकड़ से ज्यादा वक्फ की जमीन है। अगर मुसलमान वक्फ को सही से संभालते हैं तो उनके पास इतना है कि वो हुकूमत को कर्जा दे सकते हैं।
अब ये वक्फ बोर्ड है क्या चीज? जिसके बूते इतने बड़े दावे हो रहे हैं। इसका काम क्या है? जो इसके सदस्य राज्य में जीतने वाली कांग्रेस को कह रहे हैं कि सरकार में उनके समुदाय के डिप्टी सीएम चुने जाएँ। इनके पास कितनी संपत्ति है? जो हुकूमत को कर्जा देने की बात खुलेआम कर रहे हैं। आइए इस वक्फ बोर्ड के बारे में सारी जानकारी लेते हैं और बताते हैं कि कैसे लोकतांत्रिक देश में मजहब के नाम पर शुरू संस्था का प्रभाव इतना बढ़ चुका है कि वो धीरे-धीरे देश के तीसरे सबसे बड़े जमींदार बन गए हैं।
वक्फ बोर्ड होता क्या है?
वक्फ बोर्ड वो संस्था है जो अल्लाह के नाम पर दान में दी गई संपत्ति का रख-रखाव करता है। जैसे इस्लाम मजहब मानने वाले जब अपनी किसी चल या अचल संपत्ति को जकात में देते हैं तो वो संपत्ति तभी से ‘वक्फ’ कहलाती है। जकात दिए जाने के बाद इस संपत्ति पर किसी का मालिकाना अधिकार नहीं होता। उसे अल्लाह की संपत्ति माना जाता है और उसकी देख-रेख ‘वक्फ-बोर्ड’ को दी जाती है। ये संस्थान उस संपत्ति से जुड़े सारे कानूनी काम को संभालती है जैसे उसे बेचने-खरीदना-किराए पर देना आदि। एक बार यदि कोई व्यक्ति ये वक्फ दे देता है तो फिर उसके बाद उसका उस संपत्ति को कभी वापस नहीं ले सकता। वक्फ बोर्ड उसे जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल करता है।
आजाद भारत में कैसे हुई ‘वक्फ’ की शुरूआत?
आजादी के बाद भारत में वक्फ एक्ट 1954 नेहरू सरकार लेकर आई थी। साल 1995 में एक्ट कुछ संशोधन हुए। इन संशोधनों के बाद प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में वक्फ बोर्डों के गठन की अनुमति दी गई और कुछ ऐसे बदलाव हुए जिन पर अक्सर विवाद होता रहता है।
सेंट्रल वक्फ काउंसिल करता है वक्फ बोर्डों की देखरेख
सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया एक वैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना 1964 में भारत सरकार द्वारा 1954 के इस वक्फ अधिनियम के तहत की गई थी। यह केंद्रीय निकाय वक्फ अधिनियम, 1954 की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित विभिन्न राज्य वक्फ बोर्डों के तहत काम की देखरेख करता है।
देश भर में कितने वक्फ बोर्ड?
देश में एक सेंट्रल वक्फ काउंसिल और 32 स्टेट बोर्ड है। हर राज्य के अलग-अलग वक्फ बोर्ड होते हैं। जबकि केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री सेंट्रल वक्फ काउंसिल का पदेन अध्यक्ष होता है।
वक्फ बोर्ड में कौन होता है शामिल?
वक्फ बोर्ड के सदस्यों की तो इसमें शीर्ष पर सारे मुस्लिम अधिकारी होते हैं। जैसे एक अध्यक्ष, राज्य सरकार की ओर से एक या दो नामित व्यक्ति, मुस्लिम विधायक, मुस्लिम एमपी, मुस्लिम वकील, मुस्लिम आईएएस, इस्लामी स्कॉलर, टाउन प्लॉनर और इनके अलावा एक लोकल लेवल पर मुतवल्ली भी होता है।
वक्फ के पास कितनी संपत्तियाँ हैं?
पिछले दिनों खबरें आई थीं कि वक्फ बोर्ड रेल और सेना के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बनता जा रहा है। अल्पसंख्यक मंत्रालय के अनुसार वक्फ बोर्ड के पास पूरे देश भर में 8,65,646 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं। इनमें से 80 हजार से ज्यादा संपत्ति वक्फ के पास केवल बंगाल में हैं। इसके बाद पंजाब में वक्फ बोर्ड के पास 70,994, तमिलनाडु में 65,945 और कर्नाटक में 61,195 संपत्तियाँ हैं। देश के अन्य राज्यों में भी इस संस्थान के पास बड़ी संख्या में संपत्तियाँ हैं।
कानूनी वैधता पर सवाल, याचिका खारिच
वक्फ के नाम पर वक्फ बोर्ड में जोड़ी गई इतनी संपत्तियाँ पर पिछले दिनों बहुत सवाल उठे। यूपी जैसे राज्यों में तो वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर जाँच के लिए राज्य सरकार जाँच के आदेश भी दे चुकी है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में पिछले साल वक्फ बोर्ड को अंसवैधानिक करार देने के लिए एक याचिका डाली गई थी। हालाँकि कोर्ट ने याचिका ये कहकर खारिज कर दी कि इस मामले में याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं हुए।
याचिका डालने वाले अश्विनी उपाध्याय इसकी संवैधानिक मान्यताओं पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं, “वक्फ के नाम से भारतीय संविधान में एक शब्द नहीं है। सरकार ने 1995 में वक्फ एक्ट बनाया और ये सिर्फ मुस्लिमों के लिए बना दिया।” उन्होंने पूछा कि जब संविधान में ही ऐसा शब्द नहीं था तो ये वक्फ एक्ट बना कैसे। इसमें मुस्लिम विधायक, एमपी, वकील, आईएएस, स्कॉलर और टाउन प्लॉनर और एक मुतवल्ली होता है। मगर जो इसका पूरा खर्चा होता है वो पूरा का पूरा जनता के टैक्स से दिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार मस्जिद, मजारों से पैसे ही नहीं लेते और वक्फ पर उसके सदस्यों के वेतन में पैसे खर्च करेंगे तो ये आर्टिकल 27 का उल्लंघन नहीं हुआ?
उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड 1995 के जरिए वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियाँ दे दी गईं। उन्हें ये अधिकार दे दिया गया है कि उनके सब धार्मिक संपत्तियों से जुड़े मामले ट्रिब्यूनल कोर्ट में जाएँगे। वो सवाल करते हैं कि देश में इतनी ट्रिब्यूनल कोर्ट नहीं है ऐसे में अगर वक्फ जाकर किसी की संपत्ति पर दावा ठोंकता है तो लोगों को दर-दर भटकना पड़ता है तब सुनवाई होती है जबकि बाकी धर्मों के मामले आराम से सिविल कोर्ट में सुन लिए जाते हैं।
लोकतांत्रिक देश में वक्फ के मायने
सुप्रीम में भले ही वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका खारिज कर दी गई। लेकिन उठाए सवाल गलत नहीं थे। भारत जैसे लोकतांत्रित देश में मजहबी आधार पर ऐसे बोर्ड और कानून बनाना कहाँ तक उचित है। पिछले ही दिनों ये खबर आई कि एक पूरे गाँव पर वक्फ बोर्ड ने अपना अधिकार बता दिया है जबकि लोग उस पर सालों से रह रहे हैं और जमीन पर मंदिर भी है।
ये भेदभाव नहीं तो क्या है कि किसी भी अन्य धर्म की संपत्ति से जुड़े मामलों पर सिविल कोर्ट सुनवाई कर लेता है जबकि अगर किसी वक्फ की संपत्ति का विवाद है हो तो वो केवल ट्रिब्यूनल कोर्ट में सुनी जाती है। यानी अगर वक्फ कभी कहता है कि किसी गैर इस्लामी शख्स की जमीन भी उसके हिस्से में आती है तो उस व्यक्ति को ट्रिब्यूनल कोर्ट जाकर शिकायत करनी पड़ती है और देश में इन कोर्टों की संख्या मात्र 14 है। वहीं अगर यही विवाद किसी अन्य धर्म के व्यक्ति से जुड़ा है तो बड़े आराम से मामला सिविल कोर्ट में सुना जाता है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि वक्फ का कॉन्सेप्ट इस्लामी देशों तक में नहीं है। फिर वो चाहे तुर्की, लिबिया, सीरिया या इराक हो। लेकिन भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते आज हालात ऐसे हैं कि इन्हें देश में तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बताया जा रहा है। इनके पास अकूत संपत्ति है।
कर्नाटक में कांग्रेस के चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही बहस के बीच राज्य के वक्फ बोर्ड ने एक नई माँग उठाई है। वहाँ सुन्नी उलमा बोर्ड के मुस्लिम नेताओं ने कहा कि कर्नाटक में उप मुख्यमंत्री किसी मुस्लिम समुदाय के नेता को बनाओ। इसके अलावा 5 मुस्लिम विधायकों को गृह राजस्व, स्वास्थ्य और अन्य खास विभागों की जिम्मेदारी सौंप दो।
बुजुर्गों ने कोई कहावत गली-कूचों में कंचे खेलते हुए नहीं बनाई थी, लेकिन हिन्दू एक के बाद एक ठोकर खाने के बाद भी छद्दम-निरपेक्ष नेताओं और पार्टियों की वास्तविकता को नहीं पहचानने की भूल कर अपनी आने वाली पीडियों को घोर संकट में डाल रहा है। कांग्रेस अभी तक बहुमत होने के बावजूद कर्नाटक मुख्यमंत्री का निर्णय लेने में असफल हो रही है तो सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने अपनी मांग रख दी है। हिन्दू चुनावी हिन्दुओं के मकड़जाल में फंस अपने ही हाथों अपना नरसंहार करने पर तुला है। संत कृपालु जी महाराज के प्रवचन अपने चैनल पर दिखाकर चर्चित होने वाले भी भूल रहे हैं कि जब 7 मार्च 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधुओं पर गोलियां चलवाकर पार्लियामेंट स्ट्रीट को उनके खून से लाल कर दिया था, तब कृपालु जी इंदिरा को श्राप देते हुए कहा था कि 'एक दिन हिमालय से आधुनिक वेशभूषा में तेजस्वी तेरी पार्टी को समाप्त कर देगा... ', विरोधी हिन्दुओं को जातियों में लड़वाकर अपना खेल खेलने में व्यस्त हैं। 2014 से निरन्तर परमपिता भी हिन्दुओं की आंखें खोलने का प्रयास कर रहे है, लेकिन हिन्दू अपनी आंखें बंद किये बैठा है। ठीक ही कहा है: सोए हुए जगाना सरल है, परन्तु जो जागे हुए सो रहा हो, उसे जगाना बहुत कठिन है, बिलकुल वही स्थिति आज हिन्दुओं की है।
Congress won purely because of the Muslims. We have given a lot to Congress. Now it's time we get something in return. We want a Muslim deputy chief minister & five ministers with good portfolios It's the responsibility of Congress to thank us for this.https://t.co/TojfbABqeU
कर्नाटक वक्फ बोर्ड के चेयरमैन शफी सादी ने कहा कि उन्होंने चुनाव से पहले ही कहा था कि किसी मुस्लिम को प्रदेश का उपमुख्यमंत्री होना चाहिए और उनको (मुस्लिमों को) 30 सीटें दी जानी चाहिए। हालाँकि, उन्हें 15 सीटें मिलीं, जिनमें से 9 मुस्लिम उम्मीदवार जीते।
अब उनका कहना है कि इन चुनावों में करीब 72 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस केवल मुसलमानों की वजह से जीती। सादी बोले कि एक समुदाय के तौर पर मुस्लिमों ने कांग्रेस को बहुत कुछ दिया है। अब समय आ गया है कि बदले में उन्हें कुछ मिले।
शफी ने माँग की, “हम एक मुस्लिम उप-मुख्यमंत्री और पाँच मंत्री चाहते हैं जिनके पास गृह, राजस्व और शिक्षा जैसे अच्छे विभाग हों। इसके साथ हमें शुक्रिया देना कांग्रेस की जिम्मेदारी है। इन सभी को लागू करने के लिए हमने सुन्नी उलमा बोर्ड कार्यालय में इमरजेंसी मीटिंग की है।”
Following Congress' victory in Karnataka, the Waqf Board is calling for increased #Muslim representation in the state's administration. The demand for a Muslim #DeputyCM and 5 ministries is now on the table. It'll be interesting to see how Congress navigates this issue moving… pic.twitter.com/vfBqpwBuLM
वक्फ बोर्ड चेयरमैन ने कहा कि 9 मुस्लिम विधायकों में से किसे ये पद दिए जाएँ ये कांग्रेस निर्णय लेगी कि किसने अच्छा किया। कई मुस्लिम प्रत्याशियों ने अपनी विधानसभा छोड़ अन्य क्षेत्रों का भी दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। यही वजह है कि कांग्रेस जीत सकी। उनकी जिम्मेदारी है कि मुस्लिम समुदाय का एक डिप्टी सीएम होना चाहिए।
15 में से जीते 9 विधायक
इस बार चुनाव में कांग्रेस ने अपनी पार्टी से 15 मुस्लिम कैंडिडेट्स को मैदान में उतारा था। इनमें से 9 जीत पाने में सफल हुए।
इनके नाम बीदर से रहीम खान जीते, मंगलुरु से खादर फरीद, मैसूर से तनवीर सैत, बेलगावी से आसिफ सैत, शिवाजीनगर से रिजवान अरशद, चामराजपेट से जमीन अहमद खान, रामनगर से एच ए इकबाल हुसैन, शांति नगर से एन ए हैरीस, गुलबर्गा से कनीज फातिमा है।
कर्नाटक विधानसभा चुनावों के नतीजे 13 मई को ही आ गए थे। लेकिन कांग्रेस अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। इस पद के लिए डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच प्रतिस्पर्धा मानी जा रही है। विधायक दल का नेता चुनने के लिए 14 कई को हुई बैठक में दोनों पक्षों की नारेबाजी का बाद यह जिम्मेदारी आलाकमान को दे दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में बनी मस्जिद को 3 महीने के अंदर हटाने का आदेश दिया है। साथ ही कहा है कि मस्जिद बनाने के लिए वक्फ बोर्ड राज्य सरकार राज्य सरकार से दूसरी जगह जमीन माँग सकता है। इससे पहले साल 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोर्ट परिसर में बनी मस्जिद हटाने का आदेश दिया था।
सोमवार (13 मार्च 2023) को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी कुमार की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मस्जिद हटाने वाले फैसले के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने मस्जिद हटाने के लिए 3 महीने का समय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यदि मस्जिद को 3 महीने के अंदर नहीं हटाया गया तो इलाहाबाद हाई कोर्ट समेत अन्य अधिकारी मस्जिद को तोड़ कर सकते हैं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता चाहें तो मस्जिद बनाने के लिए राज्य सरकार से दूसरी जगह जमीन माँग सकते हैं।
मस्जिद हटाने का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि मस्जिद एक सरकारी पट्टे (लीज) वाली जमीन में बनी है। इस लीज को साल 2002 में ही रद्द किया जा चुका है। इसके बाद साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह जमीन सरकारी है। इसलिए कोई भी इस जमीन को लेकर किसी भी प्रकार का दावा नहीं कर सकता।
मस्जिद की ओर से पेश हुए पूर्व कॉन्ग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि मस्जिद 1950 के दशक से बनी हुई है। इसलिए ऐसे ही हटाने के लिए नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “साल 2017 में सरकार बदल गई और सब कुछ बदल गया। नई सरकार के गठन के 10 दिन बाद एक जनहित याचिका दायर की जाती है। दूसरी जमीन मिलने तक हमें मस्जिद कहीं शिफ्ट करने में समस्या होगा।”
वहीं इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह पूरी तरह धोखाधड़ी का मामला है। उन्होंने कहा, “नवीनीकरण के लिए दो बार आवेदन किए गए। लेकिन, इस बारे में नहीं बताया गया कि मस्जिद का निर्माण किया गया है और इसका इस्तेमाल जनता के लिए किया जा रहा है। बल्कि यह कहते हुए नवीनीकरण की माँग की गई थी कि आवासीय उद्देश्यों के लिए इसकी आवश्यकता है। सिर्फ यहाँ नमाज पढ़ने से यह जगह मस्जिद नहीं हो जाती। अगर सुप्रीम कोर्ट के बरामदे या हाई कोर्ट के बरामदे में, सुविधा के लिए नमाज की अनुमति दी जाती है, तो यह मस्जिद नहीं बन जाएगा।”
कुछ समय पूर्व किसी हिन्दू संस्थान द्वारा किसी मुस्लिम को नौकरी न देने पर समस्त छद्दम सेक्युलरिस्ट्स संविधान की दुहाई देकर खूब चिल्ला रहे थे। लेकिन हाईवे पर हिन्दू नामों से चल रहे होटलों में एक भी हिन्दू न होने पर इन छद्दमों के दही जमा पड़ा है। अब संविधान को कोई खतरा नहीं, और न ही किसी गंगा-जमुनी तहजीब को खतरा। आखिर कब तक संविधान और गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर हिन्दुओं के साथ छलावा होता रहेगा। क्या अब संविधान सबको बराबरी का अधिकार नहीं देता? इस भयंकर षड़यंत्र को समझना होगा, अन्यथा हिन्दू धर्म, जाति और महंगाई आदि पर रोता रहेगा और गजवा-ए-हिन्द बनाने वाले अपना खेल हिन्दुओं द्वारा अर्जित आय से औंधे मुंह दे मारेंगे और छद्दम सेक्युलरिस्ट्स अपनी तिजोरियां भरते रहेंगे। देखिये शिवा होटल में नमाज का विशेष कमरा। इस साज़िश को समझना होगा। हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा छल किया जा रहा है। संविधान और गंगा-जमुना तहजीब के नाम पर कब तक हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता रहेगा? किसी छद्दम धर्म-निरपेक्ष में यह पूछने का साहस नहीं कि हिन्दू नाम रखने पर भी इन होटलों में हिन्दुओं को नौकरी क्यों नहीं? आपको राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के हाइवे पर तमाम ऐसे होटल्स मिलेंगे, जिनका नाम 'आशिर्वाद', 'सहयोग' 'भाग्योदय', 'सर्वोदय', 'अलंकार', 'तुलसी', 'सर्वोत्तम' आदि हिन्दू नाम वाला होगा ..!! लेकिन, इन होटलोंं की चेन, जिसमे हजारो हॉटेल्स है, उन्हें गुजरात के बनासकांठा के रहने वाले 'चेलिया मुस्लिम' " चलाते है ..!!
लेकिन, इन होटलोंं की चेन, जिसमे हजारो हॉटेल्स है, उन्हें गुजरात के बनासकांठा के रहने वाले 'चेलिया मुस्लिम' " चलाते है ..!! . इन होटलों में एक भी हिन्दू को नौकरी नही दी जाती .. चेलिया ग्रुप ऑफ़ हॉटेल्स का हेड ऑफिस अहमदाबाद में है । इनकी पूरी खरीद 'सेंट्रलाइज्ड' होती है ।
इन होटलों में एक भी हिन्दू को नौकरी नही दी जाती .. चेलिया ग्रुप ऑफ़ हॉटेल्स का हेड ऑफिस अहमदाबाद में है । इनकी पूरी खरीद 'सेंट्रलाइज्ड' होती है । ये डायरेक्ट कोल्डड्रिंक, नमकीन आदि बनाने वाली कम्पनीज के साथ 'बल्क' में डील करते हैं .. फिर उसे हर एक होटल में सप्लाई करते है । जहाँ तक सम्भव हो, ये खरीदारी सिर्फ मुस्लिम से ही करते है । इनके होटल्स में इन्वर्टर बैटरी, आर. ओ. पानी आदि सप्लाई करने वाला भी मुस्लिम ही होता है ..।
चूँकि ये अपने होटल्स का नाम भी हिन्दू नाम जैसा ही रखते है और "ओनली व्हेज" लिखते है । और इनके होटल्स भी साफ सुथरे दिखते है .. इसलिए, हिन्दू इनकी होटल्स की तरफ आकर्षित होते है ..। इनका ये मानना है की, हिन्दुओ से पैसा निकालो और उसे मुस्लिमो के बीच लाओ ..!!
इनका पूरा बिजनस फ्रेंचाइजी मॉडेल पर आधारित होता है ..। इनकी एक सहकारी कमिटी है, जो अल्पसंख्यक आयोग में, अल्पसंख्यक कमेटी के रूप में रजिस्टर्ड है .. इस कमिटी में, देश विदेश के लाखो चेलिया मुस्लिम्स मेम्बर है और सब अपना अपना योगदान देते है । फिर ये हाइवे पर कोई अच्छा सा जगह देखकर उसे काफी ऊँची कीमत देकर खरीद लेते है । फिर उस हॉटेल का एक खरीदी बिक्री का अकाउंट बनाते है .. और उस हॉटेल को किसी चेलिया मुस्लिम को चलाने के लिए सौंप देते है ..!!
पुरे विश्व के 'चेलिया मुस्लिम' सिर्फ मुहर्रम में, अपने गाँव में इकठ्ठे होते है । फिर हर एक हॉटेल के लाभ-हानि का हिसाब करते है । इसलिए, मुहर्रम के दौरान, करीब २० दिनों तक, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के हाइवे पर के 90% हॉटेल्स बंद रहते है ..।
ये बसों के ड्राइवर को बेहद महंगे गिफ्ट देते है ताकि, ड्राइवर इनके ही हॉटेल पर ही बस रोके ..!!*
अहमदाबाद के सरखेज में इनका बहुत बड़ा सेंट्रलाइज्ड परचेज डिपो है । खुद का आलू प्याज आदि रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज है ..। ये सीजन पर सीधे किसानो से, बेहद सस्ते दाम पर आलू प्याज अदरक, आदि खरीद लेते है ..!!
"इकोनॉमिक्स टाइम्स - अहमदाबाद" में छपे एक रिपोर्ट में, इस चेलिया हॉटेल्स की कुल पूंजी इस समय, करीब 3000 करोड़ रूपये पहुंच चुकी है ..!! और इनकी कुल परिसम्पत्तियों की कीमत, इस समय 10,000 करोड़ रूपये होगी ..।
हिन्दुओ के जेब से पैसा निकालकर उसे मुसलमानों में बांटने का ये "चेलिया ग्रुप्स ऑफ़ हॉटेल्स" बेहद खतरनाक मॉडल है ..।
दुःख इस बात का है की अभी तक, हिन्दू लोग चेलिया मुस्लिमो के इस गंदे खेल को नही समझ सके और इनके होटलों में खाना खाकर इन्हें आर्थिक रूप से और मज़बूत करते है ... और फिर येही पैसा आतंकियों को जाता है ..।
इससे बड़ा खतरनाक ये है की ये लोग किसी हिन्दू के हॉटेल को चलने ही नही देते ..
( मुंबई-नासिक हाईवे पर सभी- होटल्स इन मुस्लिम लोगों के हैं हिन्दू नामों से)
कई हिन्दू ऐसे भी हैं जो इस मैसेज को फॉरवर्ड भी नहीं करेंगे यही लोग जिम्मेदार हैं मानसिक गुलामी की परंपरा को जिन्दा रखने में.... और इस जानकारी को आगे सभी से साझा करने में अपना सहयोग दें
सभी दिल्ली वालों सावधान !
15,16 मुस्लिम आदमी दिल्ली की हिंदू कॉलोनियों में जा रहे है और वह अपने आप को वक्फ बोर्ड (मुस्लिम संस्था) का बता रहे है और लोगों को अपनी बातों में उलझा कर व वक्फ बोर्ड कि किराएदारी का नोटिस रिसीव करा रहे है। यह दिल्ली में गुपचुप तरीके से जमीन जिहाद चल रहा है जिसको ओखला के विधायक अमानतुल्लाह खान चला रहे हैं जिसे अरविंद केजरीवाल ने वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष बना रखा है। यह दिल्ली सरकार द्वारा सोची समझी साजिश के तहत जमीन जिहाद चल रहा है। जिसे ज्यादा से ज्यादा इन जमीनों पर मुस्लिमों को बसाया जा सके।
ज्ञात हो, 1993 में दिल्ली के सिविल लाइन्स पर कब्रिस्तान के ऊपर बन रहे बंगले और फ्लैटों के विषय में दरिया गंज स्थित वक़्फ़ बोर्ड कार्यालय से संपर्क करने पर तत्कालीन अध्यक्ष और सचिव ने जो अपनी आपबीती सुनाते खुलासे वाकई बहुत छौकाने वाले थे। संक्षेप में इतना ही कहा कि "जनाब हम तो पुलिस द्वारा हस्तक्षेप करने की वजह से बच गए और आपके सामने बैठे हैं, आपको कौन बचाएगा? अगर किसी तरह आप इस घोटाले को उजागर करने में कामयाब हो गए, आपकी तस्वीर पर माला चढ़ जाएगी। वक़्फ़ को हकीकत में नहीं मालूम की उसकी कितनी जमीन है, और कहाँ है? और जो है उस पर रसूकदार सरमायेदारों ने कब्ज़ा कर बेच दिया।
...."
इतना जरूर है कि जिस दिन मोदी सरकार नेवक़्फ़ घोटाले की जाँच शुरू की, बहुत मोटा घोटाला सामने आएगा। अल्पसंख्यक के नाम पर किस तरह घोटाले हो रहे हैं। मंदिरों की सम्पत्तियों और चढ़ावे पर सबकी निगाह रहती है, लेकिन मस्जिदों, दरगाहों और वक़्फ़ बोर्ड पर किसी की नज़र नहीं जाती। क्यों" कोई मीडिया नहीं बोलता, क्यों? क्या कोई मीडिया मस्जिदों और दरगाहों को होने वाली लाखों-करोड़ों की होने वाली आय को उजागर करेगा? यदि मंदिरों की भांति दरगाहों पर हो रही कमाई भी सरकार के अधीन हो, सरकार को किसी मौलवी अथवा इमाम को अपनी तरफ से एक पैसा देने की जरुरत नहीं पड़ेगी। वक़्फ़ बोर्ड के पास ही इतना धन होगा किसी सरकार का मुंह ताकने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
सभी दिल्ली वालों से अनुरोध है ऐसे कोई भी लोग आपकी कॉलोनी में आते हैं तो कोई भी नोटिस रिसीव ना करें और उन्हें वहां से भगा दे और पुलिस कंप्लेंट कर दें!
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार योगी सरकार ने शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के संपत्तियों की खरीद-फरोख्त में अनियमितता की जाँच सीबीआई (CBI) से कराने की सिफारिश कर बहुत ही साहसिक काम किया है। जिसे करने में पूर्व की समस्त सरकारें पूर्णरूप से असफल रही, उसे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने करने का बीड़ा उठाया है। प्रयागराज और लखनऊ में दर्ज मुकदमों को इसका आधार बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य गृह सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने अक्टूबर 12, 2019 रात को इसकी सिफारिश की। अवनीश कुमार अवस्थी ने बताया कि उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा अनियमित रूप से क्रय-विक्रय और स्थानांतरित की गई वक्फ संपत्तियों की जाँच और विवेचना सीबीआई से कराए जाने का फैसला किया गया है। इस संबंध में प्रदेश सरकार द्वारा कोतवाली प्रयागराज और थाना हजरतगंज लखनऊ में मुकदमा दर्ज है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में सचिव कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, कार्मिक लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय भारत सरकार और निदेशक सीबीआई को पत्र भेज दिया गया है। पत्र में प्रयागराज के कोतवाली में 26 अगस्त 2016 को दर्ज शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड और 27 मार्च 2017 को हजरतगंज कोतवाली में दर्ज मुकदमों की जाँच सीबीआई से कराए जाने का अनुरोध किया गया है। बता दें कि 27 मार्च को दर्ज शिकायत में शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी और वक्फ बोर्ड के अधिकारियों पर 27 लाख रुपए लेकर कानपुर में वक्फ की बेशकीमती संपत्ति का पंजीकरण निरस्त करने और पत्रावली से महत्वपूर्ण कागजात गायब करने का आरोप है। इस मामले में पहली एफआईआर प्रयागराज के कोतवाली थाने में दर्ज की गई थी। इस एफआईआर में इमामबाड़ा गुलाम हैदर त्रिपोलिया (पुरानी जीटी रोड) पर अवैध रूप से दुकानों का निर्माण शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी के द्वारा शुरू कराया गया था। इसे क्षेत्रीय अवर अभियंता द्वारा निरीक्षण के बाद पुराने भवन को तोड़कर किए जा रहे अवैध निर्माण को बंद करा दिया था। बाद में फिर से निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया। बता दें कि यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा गलत तरीके से तमाम जमीनों की खरीद और ट्रांसफर कराने की शिकायतें मिल रही थीं, जिसके बाद सीबीआई जाँच कराने की सिफारिश की गई है। समस्त वक़्फ़ बोर्डों की भी जाँच हो यदि उत्तर प्रदेश के बाहर भी वक़्फ़ सम्पत्तियों की गंभीरता से जाँच करवाई जाने पर बहुत अनिमिताएं पायी जाएँगी। चर्चा है कि बहुत बड़े घोटाले सामने आएंगे, जिनसे आम नागरिक ही नहीं, मुस्लिम समाज भी बेखबर है। बात 1993/94 की है, दिल्ली के मुसलमानों में उन घटनाओं की बड़ी चर्चा थी, लेकिन सत्ता में तुष्टिकरण पुजारियों की वजह से आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। जब तुष्टिकरण के चलते इमाम के विरुद्ध कोर्ट नोटिस तामील नहीं हुए, तो उन घटनाओं पर पर्दा पड़ना ही था। इन बातों की मेरे मुस्लिम पत्रकार मित्र ने भी पुष्टि की। जबकि पुलिस ने उन घटनाओं को नकार दिया। खैर, इस चर्चा के दौरान मेरे उस मुस्लिम पत्रकार मित्र एक और जानकारी दी कि सिविल लाइन्स पर कब्रिस्तान की जमीन पर फ्लैट्स बन रहे हैं, जो जगह बताई वहां जाकर देखने पर बात सत्यापित भी हो गयी। इसकी विस्तार से जानकारी लेने दरिया गंज स्थित वक़्फ़ बोर्ड ऑफिस गया। लेकिन वहां जाने पर मालूम हुआ कि वक़्फ़ बोर्ड को आज तक यही नहीं मालूम की दिल्ली में उसकी कितनी जमीन है और कितने कब्रिस्तान हैं? उस सम्माननीय पदाधिकारी से कोई कार्यवाही न किये जाने का कारण पूछने पर जामा मस्जिद और निजामुद्दीन इमामों के विरुद्ध बहुत ही चौकाने वाली बातों का खुलासा किया। संक्षेप में केवल इतना ही कहूंगा कि "आज हम जो आपको जीवित दिख रहे हैं, केवल दिल्ली पुलिस की मेहरबानी से", कोई सरकारी मदद नहीं मिली। बातें प्रकाशित न करने के वायदे पर, एक से बढ़कर एक घोटालों पर रौशनी डालते बोले कि इन स्थानों में होती आमदनी और अधिक्रमण से हुई कमाई का हिसाब वक़्फ़ बोर्ड ने अपने निजी प्रयोग के लिए नहीं बल्कि बोर्ड के लिए माँगा था। यदि वही पैसा बोर्ड के पास आये, बोर्ड को किसी सरकारी मदद की जरुरत नहीं। दिल्ली में जितने भी दरगाह, मस्जिदें और कब्रिस्तान हैं उनको दर्शनीय बनाया जा सकता था। बोर्ड कर्मचारियों और इमामों को बिना किसी सरकारी मदद के अच्छा वेतन मिलता। लेकिन इन लोगों के सिरों पर नेताओं का हाथ होने के कारण बोर्ड कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। सरकार बस मन्दिरों की कमाई पर दाँत रखना जानती है। "निगम साहब अपने परिवार को सम्भालो, अगर आपके संपादक ने रपट छाप भी दी, दोनों ही मुसीबत में पड़ जाओगे।" अवलोकन करें:-
जैसे-जैसे राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की घड़ी नजदीक आती जा रही है, हर पक्ष की ओर से बयानों का सिलसिला भ....
उन पुरानी वार्तालाप को स्मरण करते यही कहा जा सकता है कि वास्तव में उत्तर प्रदेश की तर्ज पर दिल्ली समेत अन्य राज्यों के वक़्फ़ बोर्डों की भी जाँच होनी चाहिए। संभव है, अनुच्छेद 370 समाप्त करने पर शोर मचाने वाले इस पर भी शोर मचा सकते हैं। यह भी संभव है की वक़्फ़ कर्मचारी और अधिकारी गुप्त रूप से सरकार की मदद कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में तो बिल्ली के गले में घंटी बंध गयी, अन्य राज्यों में भी बंधती है या नहीं, यह तो सरकार या फिर नेता ही बता सकते हैं।
दिल्ली में अब मस्जिदों के इमामों को प्रति माह 18 हजार रुपए सैलरी दी जाएगी। दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अमानतुल्लाह खान ने सीएम अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी में इसका ऐलान किया। उन्होंने बताया कि मस्जिदों के मौलाना की सैलरी दस हजार से बढ़ाकर 18 हजार और मुअज्जिन की सैलरी 9 हजार से बढ़ाकर 16 हजार कर दी गई है।
फरवरी से मिलेगी बढ़ी सैलरी
अमानतुल्लाह ने बताया कि मस्जिद के सभी कर्मचारियों को फरवरी से बढ़ी हुई सैलरी मिलने लगेगी। दिल्ली में 300 ऐसी मस्जिद हैं, जहां वक्फ बोर्ड की तरफ से इमामों को सैलरी दी जाती है। इसके अलावा दिल्ली में 1500 मस्जिद ऐसी भी हैं, जहां वक्फ बोर्ड का नियंत्रण नही है। लेकिन बोर्ड ने फैसला लिया है कि इन मस्जिदों के इमामों को अब 14 हजार रुपए सैलरी दी जाएगी और मोअज्जिन को 12 हजार रुपए मिलेंगे।
अब प्रश्न यह भी होता है कि जिन मस्जिदों पर वक़्फ़ बोर्ड का नियंत्रण नहीं, फिर किस आधार पर उन मस्जिदों के इमामों को वेतन दिया जाएगा? दूसरे, दिल्ली में कई मस्जिदें और दरगाहें ऐसी भी हैं, जिन पर वक़्फ़ बोर्ड का कोई नियंत्रण नहीं, लेकिन उनकी रोज इतनी आमदनी होती है, सुनकर हैरानी होती है। उस कमाई पर वक़्फ़ बोर्ड का कोई अधिकार नहीं, क्यों? इतना ही नहीं, उस कमाई से वक़्फ़ बोर्ड पता नहीं कितना संपन्न हो जाए।
न्यूनतम सैलरी हुई 14 हजार रुपए
दिल्ली के सीएम ने कहा कि वो बोर्ड के फैसले के साथ हैं और उनकी सरकार वक्फ बोर्ड की बेहतरी के लिए हर संभव मदद के लिए तैयार है। वक्फ बोर्ड चेयरमैन के मुताबिक, वो खुद सैलरी बढ़ाने के पक्ष में थे। लेकिन दो साल तक बोर्ड भंग था। इसलिए ऐसा संभव नहीं हो सका। उनके मुताबिक दिल्ली में अब न्यूनतम सैलरी भी बढ़कर 14 हजार रुपए हो गई है।
क्या दिल्ली सरकार ने अपने चार से अधिक वर्षों में उन कारणों को ढूंढा कि आखिर किस कारण वक़्फ़ बोर्ड भंग रहा और चुनाव आते ही सबकुछ सुचारु रूप से चलने लगा? हकीकत यह है कि वक़्फ़ बोर्ड को यह भी नहीं मालूम की दिल्ली में उनकी कितनी जमीन है और कितनी पर लोगों ने अवैध रूप से कब्ज़ा कर रखा है। इस बात की जानकारी लगभग 30 वर्ष पूर्व कुछ मसलों पर दरिया गंज स्थित दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड सचिव ने दी थी। यदि लगभग 30 वर्ष ऐसी भयानक स्थिति थी, आज क्या हालत होगी, ऊपर वाला ही बेहतर जानता होगा?