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क्या अमेरिका इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा है? हमास का समर्थन, अल-कायदा का ‘बचाव’… कौन हैं DSA के चुनाव में ममदानी के समर्थन से जीतने वालीं ‘हिजाबन’ अबर कवास और दारियालिजा?

                          अबर कवास, जोहरान ममदानी और डारियालिजा अवीला शेवेलियर (बाएँ से दाएँ)

दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ मुस्लिम आतंकवाद का विरोध करने की बजाए victim card खेलने से पीछे नहीं। जबकि आतंकवाद कितने बेगुनाहों की जान ले रहा है वो नही दिखता। अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले से जो मीडिया यह बता रहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का उनके ही देश में विरोध हो रहा। जबकि हकीकत यह है कि जिस तरह Surgical Air Strike, Operation Sindoor आदि के समय भारतीय विपक्ष  पाकिस्तान की बोली बोल रहा था और मीडिया विपक्ष को प्रमुखता दे रहा था, ठीक उसी तरह अमेरिका में मुस्लिम कट्टरपंथी ट्रम्प के विरुद्ध बोल रहे थे। जिसे मीडिया ने नहीं बताया,  इस मसले पर ट्रम्प का "मीडिया को बिकाऊ" कहना बिलकुल सही है। वैसे भारतीय मीडिया की भी लगभग यही हालत है। "जहां दिखे तवा परात वहीं बिसाई सारी रात।" मीडिया को बस चिंता है अपनी TRP की। 

अमेरिका में इस साल नवंबर में होने वाले जनरल इलेक्शन में अपना उम्मीदवार खड़ा करने के लिए हर पार्टी अपने आंतरिक चुनाव कराती है, जिसे देश में प्राइमरी चुनाव (Primary Election) कहा जाता है। डेमोक्रेटिक पार्टी (DSA) के भीतर भी प्राइमरी चुनाव हुआ और 23 जून 2026 को नतीजे सामने आए। इन नतीजों में चर्चा न्यूयॉर्क से चुने मुस्लिम प्रतिनिधि अबर कवास (Aber Kawas) और दारियालिजा एविला शेवेलियर (Darializa Avila Chevalier) की हो रही है। इन ‘हिजाबन’ को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी का समर्थन मिला है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी जोहरान ममदानी के समर्थन से जीते नेताओं पर प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने इस पर मीडिया को घेरते हुए कहा, “मेयर ममदानी ने 3 पक्के वामपंथियों को चुनाव जितवा दिया और इसके लिए बिकाऊ मीडिया (Fake News Media) उनकी जमकर तारीफ कर रहा है। मेयर साहब को बधाई! कल रात मैंने 16-0 का रिकॉर्ड बनाया (यानी जिन 16 लोगों का मैंने समर्थन किया, वे सब जीत गए) और शानदार अमेरिकी देशभक्तों को चुनाव जिताने में मदद की, लेकिन मीडिया ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला।”

उन्होंने अपनी तारीफ में आगे लिखा, “पिछले दो सालों में, मेरे समर्थन से लोगों को प्राइमरी चुनाव में 259 जीत मिली हैं, और लगभग कोई हार नहीं हुई, फिर भी मीडिया इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता!!! बिकाऊ मीडिया।”

डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं, वह सच है। चर्चा तो हो रही है जोहरान ममदानी का समर्थन मिलने वाले जीते हुए नेताओं की। खासकर अबर कवास और दारियालिजा एविला शेवेलियर की। जहाँ पश्चिमी मीडिया इन नेताओं की जीत पर बड़े-बड़े लेख लिख रही है, वहीं सोशल मीडिया पर इनके पुराने बयान और इनकी पहचान काफी चर्चा में चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर अमेरिकी इन दोनों मुस्लिम नेताओं के मुस्लिम-प्रोपेगेंडा, हमास का समर्थन और अमेरिकियों के लिए घृणा वाली सोच को सामने ला रहे हैं।

कौन हैं अबर कवास?

अबर कवास खुद को फिलिस्तीन का निवासी बताती हैं। उनका दावा है कि उनके अम्मी-अब्बा फिलिस्तीन से माइग्रेट होकर अमेरिका आए थे। कवास के अनुसार, उनका जन्म भी न्यूयॉर्क के ब्रूकलिन में ही हुआ है। कवास ने सिटी कॉलेज ऑफ न्यूयॉर्क से ‘इंटरनेशनल स्टडीज’ की पढ़ाई की है। इससे अलग कवास ने अपनी पहचान अमेरिका में सख्त प्रवासन नीतियों और देश में मुस्लिम-विरोधी रवैये के पीड़ित के रूप में बनाई है।

वो दावा करती है कि जब वह किशोरावस्था में थीं, तब उनके पिता को अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) ने हिरासत में ले लिया और देश से डिपोर्ट कर दिया था। अपनी चुनावी अभियान की वेबसाइट में भी उन्होंने यह जानकारी लिखी है।

इसी पहचान के साथ कवास न्यूयॉर्क के डिस्ट्रिक्ट 12 क्विन्य सीट से डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में 58.3 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत दर्ज की। कवास ने असेंबली मेंबर स्टीवन रागा को 20 प्रतिशत वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ अब वे नवंबर में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बन सकती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस जीत के साथ अबर कवास ने इतिहास रचा है क्योंकि वे न्यूयॉर्क सीनेट के लिए चुनी जाने वाली पहली फिलिस्तीनी मुस्लिम महिला बन गई हैं।

फिलिस्तीन और मुस्लिम-पीड़ित का रोना रोने वाली अबर कवास का बैकग्राउंड निकला ‘आपराधिक’

कवास ने बेशक फिलिस्तीन और अमेरिका में मुस्लिम पीड़ित की रोना रोकर चुनाव लड़ा हो, लेकिन असलियत कुछ और है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर चल रही खबरों में सामने आया कि उनके द्वारा गढ़ी गई इमिग्रेशन के कारण परिवार को डिपोर्ट करने वाली कहानी झूठी है। कवास के परिवार को इसीलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उनके अब्बा ‘अब्दुलकरीम कवास’ एक दोषी अपराधी थे।
अमेरिकी की एक कोर्ट में इसके सबूत भी हैं, जिसे न्यूयॉर्क पोस्ट ने कवर भी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अबर कवास के अब्बा अब्दुलकरीम कवास जॉर्डन के नागरिक थे, जो 1989 में टूरिस्ट वीजा पर अमेरिका आए थे और कभी वापस नहीं गए। यहाँ अब्दुलकरीम का जघन्य अपराधों में नाम सामने आया। 1995 में उन्हें वर्जीनिया की रिचमंड सिटी सर्किट कोर्ट में झूठी गवाही का दोषी पाया गया और इसके 10 साल बाद न्यू जर्सी में प्रॉपर्टी चोरी के आरोप में दोषी पाने के बाद अगस्त 2006 में तीन साल की जेल तक हुई थी।
इसी बीच उनका इमिग्रेशन का मामला भी अदालतों में चलता रहा। एक फेडरल इमिग्रेशन जज ने शुरू में उन्हें 2004 की सुनवाई में उपस्थित न होने पर देश से निकालने का आदेश दिया था। इसके बाद देश में जॉर्ज बुश (George W. Bush) की सरकार के दौरान उन्हें जॉर्डन डिपोर्ट कर दिया गया था। लेकिन अबर कवास अपने चुनावी अभियान के दौरान लगातार ट्रंप प्रशासन की सख्त इमेग्रेशन नीतियों पर इसका ठीकरा फोड़ती रही हैं।

9/11 आतंकी हमलों पर अबर कवास का अमेरिकी-विरोधी बयान

यही नहीं, अबर कवास की सोच भी अमेरिकी-विरोधी है। यह तब और ज्यादा मुखर होकर सामने आया जब अबर कवास ने अमेरिकी के काले पन्नों में दर्ज 9/11 आतंकी हमले पर अपना पक्ष रखा। कवास ने इस आतंकी हमले का जिम्मेदार अमेरिकियों को ही ठहरा दिया और अलकायदा का बचाव किया। कवास के बयान की वीडियो क्लिप भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।
इस क्लिप में अबर कवास कहती हैं, “पूँजीवाद, नस्लवाद, गोरों को दूसरों से श्रेष्ठ समझना और इस्लामोफोबिया- इन सब चीजों का इस्तेमाल हमेशा से दूसरों की जमीनों पर कब्जा करने और उनके संसाधनों को छीनने के लिए किया गया है। यह बहुत लंबे समय से चला आ रहा है और 9/11 का हमला भी इसी पुरानी सोच और सिलसिले का ही एक हिस्सा था।
कवास आगे कहती हैं, “यह सोचना कि हमें (मुस्लिमों को) एक ऐसे आतंकवादी हमले के लिए माफी माँगनी चाहिए जो सिर्फ चंद लोगों ने किया था जबकि इतिहास में हुए बड़े-बड़े नरसंहारों और गुलामी की प्रथा के लिए कभी किसी ने माफी नहीं माँगी और न ही कोई मुआवजा दिया, यह बात मुझे बहुत गलत और घिनौनी लगती है।”
जिस 9/11 आतंकी हमले की अबर कवास यहाँ बात कर रही हैं, वह आतंकी संगठन अलकायदा ने अंजाम दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन था। उसके नेतृत्व में 11 सितंबर 2001 को अलकायदा के 19 आतंकियों ने अमेरिका के 4 विमानों को हाइजैक किया और उन्हें आत्मघाती बम की तरह इस्तेमाल किया था। इस पूरे हमले में 2,977 मासूम लोगों ने जानें गवाई थीं, जिनमें 90 प्रतिशत अमेरिकन थे।

कौन हैं डारियालिजा अवीला शेवेलियर?

डारियालिजा अवीला शेवेलियर ने भी अपनी पहचान प्रवासी नागरिक के तौर पर मजबूत की है। उनकी चुनावी अभियान की वेबसाइट के अनुसार, वह खुद को अप्रवासन की सख्त नीतियों का पीड़ित होने का दावा करती हैं। उनका डोमिनिकन परिवार है जो फ्लोरिडा से अमेरिका माइग्रेट हुआ था। शेवेलियर बताती हैं कि वह गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहाँ उनके अब्बा ट्रक ड्राइवर और अम्मी एक केस वर्कर हैं, जिसने अपने बचपन का ज्यादा समय वेनेजुएला में अपनी दादा के साथ बिताया है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन और अफ्रीकन स्टडीज में ग्रेजुएशन पूरी की है और फिलहाल सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क (CUNY Graduate Center) से सोशियोलॉजी में पीएचडी की डिग्री पूरी कर रही हैं। कॉलेज के समय से ही शेवेलियर कट्टर वामपंथी आंदोलनों का हिस्सा रही हैं, इस दौरान वह हिजाब भी पहना करती थीं लेकिन प्राइमरी चुनाव में अभियान के दौरान उनका हिजाब गायब दिखा।
शेवेलियर ने फिलिस्तीन समर्थित, ब्लैक लाइव्स मैटर और खासकर अप्रवासन नीतियों के खिलाफ अभियानों का हिस्सा रहकर अपनी पहचान बनाई। इसी पहचान के साथ शेवेलियर ने प्राइमरी चुनाव में 13वें डिस्ट्रिक्ट सीट से जीत हासिल की है। उन्होंने 5 बार के मौजूदा और बेहद शक्तिशाली सांसद एड्रियानो एस्पेलियाट (Adriano Espaillat) को 2,326 वोटो के अंतर से चुनाव में मात दी है।

शेवेलियर के अमेरिकी-विरोधी और प्रो-हमास होने पर सोशल मीडिया पर आलोचना

शेवेलियर को चुनाव में जोहरान ममदानी का समर्थन मिला। इसके बावजूद भी सोशल मीडिया पर अमेरिकन शेवेलियर के खिलाफ बोल रहे हैं, लोग उनके इस्लामी हित और अमेरिकी-विरोधी बयानों और विवादित बैकग्राउंड पर बात कर रहे हैं। यह भी सामने आया है कि शेवेलियर ने अपना इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर लिया है। इसके अलावा लोग उनके डोमिनिकन मूल से होने पर भी सवाल उठा रहे हैं, लोगों का कहना हैं कि वह हैतीयन (Haitian) मूल की हैं।
शेवेलियर की सोशल मीडिया हिस्ट्री खंगालकर अमेरिकी बता रहे हैं कि वह अमेरिकन झंडे का इस्तेमाल नैपकिन की तरह करती हैं। इसके अलावा 07 अक्टूबर 2025 को ठीक एक दिन बाद, उन्होंने इजरायली नागरिकों की हत्या का जश्न मनाने वाली एक रैली में भी हिस्सा लिया था। उनके अमेरिकी-विरोधी होने का भी राज खोलते हुए कहा कि वह गोरी महिलाओं को ‘बदसूरत उपनिवेशवादी’ बताती हैं।
इतना ही नहीं अमेरिकन ने बताया कि शेवेलियर कह चुकी हैं कि अपराधियों सहित किसी भी व्यक्ति का निर्वासन (देश से निकालना) उचित नहीं है। वह पुलिस से नफरत करती हैं और उन्हें ‘सूअर’ कहती हैं, अमेरिकी सैनिकों को युद्ध अपराधी बताती हैं और कहती हैं कि अमेरिका एक शर्मनाक देश है। वह सिर्फ़ न्यूयॉर्क से चुनाव लड़ रही हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फ्लोरिडा में उनके जीतने की कोई संभावना नहीं है।”
ऐसा ही उनका एक पुराना वीडियो भी सामने आया, जिसमें शेवेलियर कहती दिख रही हैं कि अगर वह कॉन्ग्रेस में पहुँचती हैं तो ‘इंशाल्लाह’ यह पक्का करना चाहेंगी कि ‘सत्ता के गलियारों’ में उनके मुस्लिम मजहब की झलक दिखे।

निष्कर्ष: न्यूयॉर्क में जोहरान ममदानी ने अपने जैसे दो को बनाया अगला प्रतिनिधि

शेवेलियर और कवास के बैकग्राउंड को देखते हुए लगता है कि यह भी जोहरान ममदानी की राह पर ही हैं। इन्होंने भी न्यूयॉर्क में मुस्लिम-पीड़ित पहचान, हमास को समर्थन और अमेरिकी नीतियों की आलोचना करके ही चुनाव जीता है। लगता है कि न्यूयॉर्क को कई जोहरान मिल गए हैं और इनका प्राइमरी चुनाव जीतने यही अंदेशा है कि ऐसे अमेरिकी विरोधी नेता आम चुनाव भी आसानी से जीत जाएँगे, क्योंकि न्यूयॉर्क पहले से ही सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ रहा है।
हालाँकि इससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या न्यूयॉर्क में सचमुच लोग ट्रंप प्रशासन की नीतियों से परेशान हैं या फिर शहर में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है। वैसे भी आए दिन सोशल मीडिया पर वीडियोज सामने आते रहते हैं कि जिसमें न्यूयॉर्क की सड़कों पर मुहर्रम के शोक हो रहे हैं, टाइम्स स्क्वायर से अजान की आवाजें आती हैं और इसी न्यूयॉर्क में बैठकर जोहरान ममदानी और उसके जैसे नेता अमेरिका के विरोध में बयान देते हैं और आतंकियों के मरने पर शोक मनाते हैं। क्या ऐसे नेताओं को सत्ता में लाकर अमेरिका इस्लामीकरण की ओर है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के बाद Gen-Z ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी में लहराया भगवा; राहुल परेशान; पटना और पंजाब में भी GenZ दे रहा राहुल गाँधी को जवाब


भारत में राहुल गाँधी समेत पूरे विपक्ष को Gen-Z ने जवाब दे दिया है। पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में भगवा लहराया। अब हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने सभी 7 सीटों पर जीत हासिल कर Gen-Z पीएम मोदी के साथ है, ये साबित कर दिया है।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी की जीत

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में बीजेपी के छात्र विंग यानी एबीवीपी (ABVP) ने शानदार प्रदर्शन किया है। संगठन ने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव, महासचिव, कल्चरल सचिव और खेल सचिव समेत सभी 7 अहम पदों पर कब्जा कर लिया है। छात्र नेताओं ने इस जीत को राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति संगठन की प्रतिबद्धता और मेहनत को दिया है। संगठन लगातार राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ- साथ नैतिकता की बात भी की जा रही है। यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को एबीवीपी की प्रतिबद्धता पसंद आ रही है। एबीवीपी को ये मार्गदर्शन पीएम मोदी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से मिल रही है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी का प्रदर्शन

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2025 में एबीवीपी ने केंद्रीय पैनल की 4 में से 3 सीटों पर कब्जा कर लिया, जबकि एनएसयूआई को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा है। एबीवीपी के आर्यन मान अध्यक्ष बने। दीपिका झा संयुक्त सचिव बनीं और कुणाल चौधरी को सचिव पद मिला। इस चुनाव में एनएसयूआई को एकमात्र उपाध्यक्ष पद मिला। सबसे गौर करने वाली बात ये हैं कि इस चुनाव में अध्यक्ष आर्यन मान ने एनएसयूआई के उम्मीदवार को 16000 से अधिक वोटों से हराया। इससे साबित होता है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में एक दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के दिलों में पीएम मोदी बसते हैं।

जेएनयू में शानदार प्रदर्शन

वामपंथियों का गढ़ कहलाने वाले जेएनयू में भी अप्रैल 2025 में हुए छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने शानदार उपलब्धि हासिल की। एबीवीपी ने संयुक्त सचिव का पद जीतने के साथ- साथ काउंसिल की 42 में से 23 सीटों पर विजय हासिल की। ये कैंपस में आ रहे बदलाव को दर्शाता है। यहाँ तक कि स्कूल ऑफ सोशल साइंस जिसमें पहले एबीवीपी का कोई अस्तिव नहीं था, वहाँ भी 2 सीटें हासिल की। इसे खास तौर पर जेएनयू का वामपंथी सेंटर माना जाता है।

पंजाब यूनिवर्सिटी में झंड़ा बुलंद किया

पंजाब विश्वविद्यालय परिसर छात्र परिषद (PUCSC) चुनाव में इस बार बड़ा उलटफेर देखने को मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP ने पाँच दशकों में पहली बार अध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया। 1977 में प्रत्यक्ष मतदान व्यवस्था लागू होने के बाद पहली बार ABVP का अध्यक्ष बना है। साल 2024 में ABVP के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे थे, जबकि 2023 में जसविंदर राणा ने संयुक्त सचिव पद पर जीत दर्ज की थी।

पटना यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन

पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी की मैथिली मृणालिनी ने अध्यक्ष पद जीता। यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहली बार एक छात्रा अध्यक्ष बनीं। मार्च 2025 में हुए चुनाव में यहाँ भी एबीवीपी का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। काउंसिल सदस्यों में सबसे ज्यादा सीट एबीवीपी के पास है।

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन

पूर्वोत्तर का सबसे पहला और बड़े यूनिवर्सिटी गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भी पहली बार अध्यक्ष पद पर एबीवीपी ने जीत दर्ज की। सितंबर 2024 में हुए गुवाहाटी विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने दबदबा बनाते हुए अध्यक्ष समेत 3 महत्वपूर्ण पदों पर जीत दर्ज की। ये पूर्वोत्तर में मोदी सरकार के कामकाज पर जेन जी के समर्थन का प्रमाण है।

उत्तराखंड के कई विश्वविद्यालयों में जीत

उत्तराखंड के कई विश्वविद्यालयों में एबीवीपी का प्रदर्शन शानदार रहा। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय में एबीवीपी ने अध्यक्ष समेत सभी 6 अहम पद जीत लिए हैं। वहीं एचएनबी गढ़वाल केन्द्रीय विश्विविद्यालय में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर एबीवीपी के उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए।

राहुल गाँधी को Gen Z का जवाब

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने हाल ही में जेन-जी से संविधान बचाने और कथित ‘वोट चोरी’ रोकने की अपील की थी। ऐसे में देश के अलग अलग राज्यों में एबीवीपी की शानदार जीत ने उन्हें करारा तमाचा मारा है। Gen-Z को देश के लोकतंत्र और संविधान पर पूरा भरोसा है। इन लोगों ने वोट देकर एबीवीपी को जिताया है और वोट चोरी के आरोपों की धज्जियाँ उड़ा दी है।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी का जीतना कई मायनों में अहम है। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में राहुल गाँधी चारो खाने चित्त नजर आ रहे हैं। ये वही तेलंगाना है, जहाँ कांग्रेस की सरकार है। 2024 के छात्रसंघ चुनाव में यूनिवर्सिटी में वामपंथी और कांग्रेस के छात्र संगठनों ने जबरदस्त जीत दर्ज की थी। एक साल बाद उनकी ये हालत राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ की हवा निकाल दी है। साथ ही छात्रों के मन में मोदी सरकार के प्रति समर्थन और सम्मान को भी ये रिजल्ट दर्शाता है।

भारत में नेपाल और बांग्लादेश की तरह Gen-Z के तख्तापलट का मंसूबा पाले विपक्ष को गहरा धक्का लगा है। हैदराबाद यूनिवर्सिटी में 81 फीसदी वोटिंग हुई है। ये भी साबित करता है कि छात्र-छात्राओं ने बढ़चढ़ कर वोटिंग में हिस्सा लिया और पीएम मोदी के नेतृत्व को समर्थन दिया।

भारत का GenZ 2014 में ही राष्ट्रवादी राजनीति की नींव रख चुका है। GenZ ने अब राहुल गाँधी की अराजक टूलकिट को भी फेल साबित कर दिया है।

कांग्रेस का जश्न ऐसा जैसे AAP को उसने ही हराया: एक होकर भी दिल्ली जीत नहीं पाता INDI गठबंधन; योगी का 'बटोगे तो कटोगे एक रहोगे तो सुरक्षित' नारा कामगर रहा

दिल्ली चुनाव भी में योगी का 'बटोगे तो कटोगे एक रहोगे तो सुरक्षित' नारा कामगर रहा। पीछे हुए नगर निगम चुनावों में बीजेपी उम्मीदवार हिन्दू बहुल क्षेत्रों से जीतता हुआ आता है लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों की EVM खुलने पर जमानत बचाने के लाले पड़ जाते थे क्योकि मुसलमानों की तरह हिन्दू वोट एकजुट नहीं पड़ता था। लेकिन इस बार हिन्दू ने एकजुटता का परिचय दिया, हालांकि योगी महाकुम्भ में हादसा होने के कारण ज्यादा रैलियां नहीं हो सकी।    
दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार जीत हासिल की है। पार्टी 27 वर्षों के सूखे के बाद दिल्ली की सत्ता में लौटी है। उसने 10 साल से दिल्ली की गद्दी पर काबिज आम आदमी पार्टी (AAP) को बुरी तरह हराया है।

चुनावों में घुसपैठियों का गरमाया मुद्दा शांत नहीं होना चाहिए बल्कि अब सख्ती से एक-एक घुसपैठी को ढूंढ निकालना होगा। मुख्यमंत्री बनने वाले को ढुलमुल नीति अपनाने की बजाए योगी की तरह काम करना होगा। ताकि अब कोई दंगाई किसी शोभा यात्रा पर कोई पत्थरबाज़ी न कर पाए।  

इस चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 45.85 रहा, आम आदमी पार्टी 43.55 तो कांग्रेस 6.35 सीपीआई 0.02 और जेडीयू 0.78 आदि यानि INDI गठबंधन दिल्ली में नहीं के बराबर।  

भाजपा को दिल्ली में 48 सीट मिली हैं जबकि AAP इस चुनाव में 22 सीटों पर सिमट गई है। उसके मुखिया केजरीवाल तक अपनी सीट नहीं बचा पाए। इस चुनाव में कांग्रेस ने अपना पुराना प्रदर्शन दोहराया है, वह लगातार तीसरी बार एक भी सीट पाने में विफल रही है।

कुछ दिनों तक AAP को 50 से अधिक सीटें दे रहे लिबरल और वामपंथी पत्रकार इस जीत को नहीं पचा पा रहे हैं। कई कथित विशेषज्ञ इस जीत को कम करके आंकने का प्रयास कर रहे हैं। स्पष्ट जनादेश को लेकर अलग-अलग तरह के प्रपंच बताए जा रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषण की दुकान खोलने वालों का दावा है कि AAP की यह हार इसलिए हुई है, क्योंकि इस बार उसे पीछे के दरवाजे से भाजपा को कांग्रेस का साथ मिल गया। जम्मू कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्ला ने एक मीम तक पोस्ट किया है, जिसका इशारा है कि AAP-कांग्रेस की लड़ाई से भाजपा जीती है।

AAP की हार के पीछे भाजपा के कार्यकर्ताओं की मेहनत, उसका मजबूत संगठन और रणनीति को श्रेय ना देकर यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि यदि कॉन्ग्रेस और AAP मिलकर लड़ते तो भाजपा सत्ता में नहीं आती।

कुल मिलाकर भाजपा की जीत का सेहरा कांग्रेस के माथे बाँधने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस भी इसी आत्ममुग्धता में खुश है कि वह भले नहीं जीती लेकिन अरविन्द केजरीवाल को नीचे लाने में उसका योगदान रहा। उसके दफ्तर से नाचने-भंगड़ा करने के वीडियो आ रहे हैं।

भाजपा की इस जीत की सच्चाई पूरी तरह अलग है। भाजपा की इस जीत का सबसे बड़ा कारण दिल्ली में 10 वर्षों से काबिज AAP के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी है। इस एंटी इनकम्बेंसी का सीधा फायदा भाजपा को मिला है। उसका वोट प्रतिशत लगभग 8% बढ़ा है।

जबकि इसी दौरान AAP का वोट प्रतिशत राज्य में 10% घटा है। केजरीवाल से त्रस्त दिल्ली की जनता उन्हें वोट नहीं देना चाहती थी। ऐसे में उसके पास भाजपा का ही विकल्प था। कांग्रेस को AAP की हार और भाजपा की जीत में मदद करने वाला बताने वालों को देखना चाहिए कि कांग्रेस का खुदका वोट प्रतिशत इस बार भी कुछ ख़ास नहीं बढ़ा।

2020 चुनावों में 4.26% वोट लाने वाली कांग्रेस खूब प्रयास करके भी 2025 में दहाई आँकड़ा तक नहीं छू पाई। उसे इस बार 6.3% वोट से संतोष करना पड़ा है। स्पष्ट है कि दिल्ली में कांग्रेस के जो मतदाता AAP की तरफ गए थे, वह अब भी कांग्रेस को एक विकल्प के तौर पर नहीं देखते।

उन्हें AAP के जवाब में भाजपा ही बेहतर लगती है। कांग्रेस इसी के चलते लगातार तीसरी बार एक भी सीट नहीं जीत पाई। कांग्रेस के वोट में जो हलकी सी बढ़ोतरी हुई भी है, वह एंटी इनकम्बेंसी वाले वोट का ही एक हिस्सा है।

जो लोग यह चर्चा कर रहे हैं कि अगर AAP और कांग्रेस मिल जाते तो दिल्ली में भाजपा नहीं आती, जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। दरअसल, AAP इसलिए नहीं हारी है क्योंकि कांग्रेस उसके खिलाफ थी, बल्कि इसलिए हारी है क्योंकि दिल्ली की जनता उससे नाराज थी।

अगर कांग्रेस उसके साथ मिलकर भी लड़ती तो भी नतीजा लगभग यही रहता। क्योंकि इस गठबंधन से एंटी इनकम्बेंसी का फैक्टर नहीं खत्म होने वाला था। जिन चुनावों में सरकार के खिलाफ प्रबल एंटी इनकम्बेंसी का फैक्टर होता है, वहाँ उस पार्टी की भी दुर्गति होती है, जो सत्ताधारी पार्टी के साथ गठबंधन करती है।

2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। कांग्रेस ने 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा से गठबंधन किया था। लेकिन दोनों ही पार्टियाँ बुरी तरह हारीं और भाजपा रिकॉर्ड 300+ सीटों के साथ सत्ता में आई। और इस चुनाव में भी AAP को अखिलेश यादव तथा ममता बनर्जी ने समर्थन दिया था, उनका कोई भी असर चुनाव पर नहीं दिखा। 

दूसरी तरफ भाजपा की जीत में एंटी इनकम्बेंसी के अलावा उसके दिल्ली के अपने वोटबैंक का भी बड़ा हाथ है। दिल्ली में भाजपा का लगातार 35%-40% वोट प्रतिशत हर चुनाव में बना रहा है। यह उसे निश्चित तौर पर मिलता है। इस जीत में उसका यह निश्चित वोटबैंक और साथ ही एंटी इनकम्बेंसी के चलते उसकी तरफ आए दिल्ली वालों का वोट शामिल है।

कॉन्ग्रेस ने पिछले चुनावों में कोई असर डाल पाई थी और ना इस बार कुछ कर पाई है। अगर AAP+कांग्रेस गठबंधन हो भी जाता तो भी नतीजा कोई ख़ास अलग नहीं होता, दोनों पार्टियों के गठबंधन का हश्र कुछ ही महीने पहले देश भर ने दिल्ली में देखा है।

यदि तर्क यह दिया जाए कि AAP और कांग्रेस मिलकर भाजपा से ज्यादा वोट ले आते और सरकार बन जाती तो उन्हें लोकसभा चुनाव याद करना चाहिए। लोकसभा में दोनों पार्टियों के गलबहियाँ करने के बावजूद भाजपा ने लगातार तीसरी बार 7 की 7 सीट जीत ली थीं।

और यहाँ याद रखना होगा कि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एकदम अलग होता है। ऐसे में गठबंधन के समय जो व्यक्ति AAP से गुस्सा होकर वोट देता तो भाजपा की तरफ जाता ना कि कांग्रेस के साथ होने के चलते रुकता।

अवलोकन करें:-

केजरीवाल की फ्री रेवड़ियों पर बीजेपी की रेवड़ियां जिससे ‘AAP-दा’ मुक्त हुई दिल्ली; नेशनल मीडिया की

ऐसे में बेहतर होगा कि कांग्रेस को इस जीत का श्रेय देने के बजाय विश्लेषक भाजपा की एक संगठन के रूप में प्रशंसा करें। उसके चुनावी मैनेजमेंट को समझें। साथ ही वह कांग्रेस को उसकी खामियाँ बताएँ, जिसके चलते उसे लोग सत्ता देना तो दूर, एक सीट भी देने को राजी नहीं थे।

बधाई मेरे दोस्त… अमेरिका ने 132 साल बाद दोहराया इतिहास, राष्ट्रपति चुनाव जीतते ही एलन मस्क से लेकर आतंकवाद तक पर डोनाल्ड ट्रंप ने की मन की बात

       डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका में फिर राष्ट्रपति बनकर वापसी फोटो साभार: NYT/ @narendramodi का X हैंडल
अमेरिका का 47वाँ राष्ट्रपति चुने जाने के बाद डोनाल्ड ट्रंप को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र ने बधाई संदेश दिया। ट्रंप के साथ अपनी पुरानी 4 तस्वीरें साझा करते हुए पीएम मोदी ने ट्रंप को अपना दोस्त बताया और कामना की कि वे लोग मिलकर भविष्य में भी काम करेंगे।

उन्होंने अपने संदेश में कहा, “मेरे मित्र डोनाल्ड ट्रंप को ऐतिहासिक चुनावी जीत पर हार्दिक बधाई। जैसा कि आप अपने पिछले कार्यकाल की सफलताओं को आगे बढ़ा रहे हैं, मैं भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए हमारे सहयोग को नवीनीकृत करने के लिए तत्पर हूँ। आइए हम सब मिलकर अपने लोगों की बेहतरी के लिए और वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए काम करें।”

डोनाल्ड ट्रंप की इस जीत के साथ ही सोशल मीडिया पर काफी मीम भी बनाकर शेयर किए जा रहे हैं। ऐसा ही एक मीम कंगना रनौत ने अपने साझा किया है। मीम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह ट्रंप का चेहरा लगा है और सीएम योगी की जगह एलन मस्क का चेहरा लगा है। इस मीम को साझा करते हुए कंगना ने कहा कि ये मीम इंटरनेट पर सबसे बेस्ट है। वहीं अन्य यूजर्स भी इसी तरह के मीम शेयर करके लिबरलों की चुटकी ले रहे हैं।

ट्रंप की जीत से डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक जहाँ दुख में है वहीं ट्रंप ने जीत के बाद अपने समर्थकों में जोश भरा है। चुनाव जीतने के बाद ट्रंप की पहली स्पीच में उन्होंने कई मुद्दों पर बात की। उन्होंने अमेरिका की जनता को धन्यवाद दिया और कहा कि वो अपनी बहर सांस तक अमेरिका के लोगों और उनके परिवार के लिए लड़ेंगे।

 समर्थकों से अपने ऊपर हुए हमले को याद दिलाते हुए कहा- “भगवान ने मेरी जिंदगी किसी वजह से बचाई। और यह वजह है कि अपने देश को बचाना और अमेरिका को फिर से महान बनाना।” उन्होंने आश्वासन दिया कि वो अब सब ठीक कर देंगे और कहीं कोई युद्ध नहीं होगा। उन्होंने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर भी बात की और आतंकवाद को खत्म करने के वादे को भी याद रखा।

ट्रंप ने अपने भाषण के दौरान एलन मस्क का भी जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि एलन मस्क को बहुत प्रेम करते हैं और उनके समर्थन के लिए आभार जताते हैं। उन्होंने कहा कि अब राष्ट्रपति बनकर वो अपने देश की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए काम करेंगे। उन्होंने अवैध माइग्रेशन को बंद करने और अमेरिकियों को अच्छी नौकरी देने के अपने वादे पर प्रतिबद्धता दिखाई।

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अमेरिकी के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने 270 का आँकड़ा पार करते हुए कमला हैरिस को मात दी और एक बार फिर से अमेरिका के राष्ट्रपति पद को संभाला। ये अमेरिका के 132 साल के इतिहास में दूसरी बार हुआ है। उनसे पहले ग्रोवर क्लीवलैंड दो लगातार कार्यकाल वाले अमेरिकी राष्ट्रपति थे। वे पहली बार 1884 और फिर 1892 में राष्ट्रपति बने थे। मालूम हो कि ट्रंप की पार्टी के लिए इस जीत के साथ अमेरिका के उच्च सदन से भी खुशखबरी सामने आई है जहाँ पार्टी ने चार साल बाद सीनेट में अपनी संख्या बहुमत के पार कर ली है। इसी के साथ अब सदन में रिपब्लिकन पार्टी के 51 और डेमोक्रेट पार्टी के 49 सांसद हो गए हैं।

14 साल बाद ब्रिटेन की सत्ता में लौट रही लेबर पार्टी, ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी को मिली हार

ऋषि सुनक (बाएँ) की अगुवाई वाली कंजर्वेटिव पार्टी की हार, कीर स्टार्मर (दाएँ) होंगे नए प्रधानमंत्री (साभार : गार्जियन)
यूके में पिछले 14 साल से विपक्ष में बैठी लेबर पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बना रही है। कीर स्टार्मर की अगुवाई में लेबर पार्टी करीब 2 तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाने को अग्रसर है। वहीं, मौजूदा प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की अगुवाई वाली कंजर्वेटिव पार्टी की बेहद करारी हार हुई है। इसी के साथ तय हो गया है कि ऋषि सुनक अब प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे, क्योंकि भारी बहुमत से जीतने वाली लेबर पार्टी के कीर स्टार्मर अब यूके के नए प्रधानमंत्री होंगे। लेबर पार्टी अभी तक 650 सीटों में 500 सीटों पर नतीजों की घोषणा में 348 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर चुकी है।

लेबर पार्टी प्रचंड जीत की ओर

यूके में 650 सांसदों वाले सदन (हाउस ऑफ कॉमन्स) में बहुमत की सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी को 326 सीटों की आवश्यकता होती है, जिसमें लेबर पार्टी 400 से भी अधिक सीटों पर जीत दर्ज करने की ओर बढ़ रही है। अधिकतर एग्जिट पोल्स में लेबर पार्टी को 410 से 460 सीटों तक का अनुमान लगाया जा रहा है। वहीं, लेटेस्ट आँकड़ों के मुताबिक, 650 सीटों में से 500 सीटों के नतीजे आ चुके हैं, जिसमें से 348 सीटें जीतकर लेबर पार्टी ने पूर्ण बहुमत का आँकड़ा पार कर लिया है। वहीं कंजर्वेटिव पार्टी महज 76 सीटें ही जीत सकीहै।

ऋषि सुनक ने दी बधाई, इस्तीफे का किया ऐलान

यूके के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने अपनी पार्टी की करारी हार के बाद इस्तीफा देने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि वो 6 जुलाई को अपना इस्तीफा सौंप देंगे। इसकी के साथ उन्होंने कीर स्टार्मर को जीत की बधाई दी है। अपनी संसदीय सीट रिचमंड एंड नॉर्थलर्टन में काउंटिंग की जगह पर पहुँचे ऋषि सुनक ने कहा कि उनकी पार्टी के लिए आज की रात बेहद कठिन रही। उन्होंने कहा कि लेबर पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की है, मैं इसके लिए बधाई देता हूँ। बता दें कि चुनावी नतीजे एग्जिट पोल्स की तरह ही एकतरफा आ रहे हैं।

कौन हैं कीर स्टार्मर?

कीर स्टार्मर का जन्म साल 1963 में की मजदूर परिवार में हुआ था। उनके पिता टूलमेकर थे, तो माँ एक नर्स थी। उनके माता पिता ने लेबर पार्टी के संस्थापक कीर हार्डी के नाम पर उनका नाम कीर स्टार्मर रखा था। वो साल 2015 में पहली बार सांसद चुने गए थे और साल 2020 में उन्होंने बहुत ही कम समय में लेबर पार्टी की कमान संभाल ली थी। कीर स्टार्मर ने अपने कई बयानों में भारत को लेकर सकारात्मक बातें कही हैं। इस बार के चुनाव में उनकी लेबर पार्टी को भारत वंशियों का जोरदार समर्थन मिला है।
स्टार्मर ने हार्डकोर वामपंथी माने जाने वाले जेरेमी कॉर्बिन से अप्रैल 2020 में पार्टी की कमान संभाली थी। उन्होंने पार्टी में सभी वर्गों के उत्थान की बात कही है, साथ ही यूके को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उनके वादे पर आम जनता ने भरोसा किया है।