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कांग्रेस का ‘देश विरोधियों’ से प्यार क्यों नही होता खत्म? जिस बैश्लेट ने CAA, मुस्लिमों पर हमले से लेकर J&K तक पर भारत का किया ‘अपमान’, उसी को दिया इंदिरा गाँधी सम्मान

               सोनिया गाँधी ने मिशेल बैश्लेट दिया 'इंदिरा गाँधी पुरस्कार' (फोटो: X/@NasirHussainINC)
एक कहावत है, ‘चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से न जाए’ यानी बुरी आदतों को कितना ही दबा-छिपा लिया जाए लेकिन वो बार-बार सामने आ ही जाती हैं। कांग्रेस से जुड़े इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा चिली की पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बैश्लेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार’ देने का फैसला इसी कहावत को चरितार्थ करता दिखता है।

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बुधवार(19 नवंबर 2025) को उन्हें खुद यह पुरस्कार दिया। इस दौरान सोनिया गाँधी ने मिशेल बैश्लेट के ‘विश्व शांति’ के लिए किए गए कामों को भी याद किया है। सोनिया ने उनकी तारीफ में खूब कशीदे पढ़े और देश को नया रूप देने के लिए उनकी जमकर तारीफ भी की। हालाँकि, असल कहानी इससे आगे है।

बैश्लेट को सोनिया बेशक दुनिया की शांति का मसीहा बना रही हो लेकिन भारत के लिए उनकी सोच हमेशा से विरोधियों वाली ही रही है। चिली के लिए बेशक उन्होंने कुछ भी किया हो लेकिन भारत की छवि को वैश्विक पटल पर खराब करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब पश्चिमी जगत और चीन की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले राहुल गाँधी को हो सकता है कि भारत विरोधी मानसिकता वाली बैश्लेट में ही क्रांति का मसीहा नजर आ रहा हो।

जम्मू-कश्मीर पर विवादित टिप्पणियाँ

बैश्लेट ने जम्मू-कश्मीर के बहाने भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा, उन्होंने खूब कोशिश की कि किसी भी तरह भारत को दुनिया के सामने एक तानाशाह देश के रुप में पेश किया जा सके।

सितंबर 2020 में मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए उन्होंने भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा था, “भारत के कब्जे वाले कश्मीर में आम लोगों के खिलाफ मिलिट्री और पुलिस की हिंसा की घटनाएँ जारी हैं, जिसमें पेलेट गन का इस्तेमाल और मिलिटेंसी से जुड़ी घटनाएँ शामिल हैं। पॉलिटिकल बहस और पब्लिक पार्टिसिपेशन की जगह बहुत कम हो गई है।”

जिस भारत ने अनुच्छेद 370 जैसा बड़ा फैसला लेने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में हिंसा नहीं होने दी, उसे लेकर इस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी करना जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा था।

सितंबर 2021 में एक बार फिर बैश्लेट ने भारत विरोधी मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा, “जम्मू और कश्मीर में आम सभाओं पर अधिकारियों की रोक और समय-समय पर कम्युनिकेशन ब्लैकआउट जारी हैं जबकि सैकड़ों लोग अपनी बात कहने की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में हैं। पत्रकारों पर दबाव है और UAPA का गलत इस्तेमाल हो रहा है।” भारत ने तब भी बैश्लेट के इस प्रोपेगेंडा की जमकर आलोचना की थी।

बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार के चैंपियन असल में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने से तड़प रहे थे और चाहते थे कि किसी भी तरह यह साबित किया जा सके कि भारत अपने राज्यों को नहीं संभाल पा रहा है। हालाँकि, उनकी यह मेहनत रंग नहीं लाई और भारत ने पूरी मजबूती के साथ जम्मू-कश्मीर को मुख्यधारा के साथ पूरी तरह से जोड़ने का काम कर दिखाया।

FCRA पर अलापा अपना राग

भारत ने जब देश में एमनेस्टी इंटरनैशनल पर विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की तो बैश्लेट को इसमें भी दिक्कतें नजर आई थीं। उन्होंने FCRA को ही गड़बड़ बता दिया। यानी उन्होंने भारत को ये नसीहत देने की कोशिश की कि उन्हें किस तरह अपने नियम बनाने चाहिए। भारत के आंतरिक मामलों में मानवाधिकार प्रमुख का दखल देना क्या खुद में एक बड़ा सवाल नहीं है?

भारत ने बैश्लेट की बयानबाजी को खारिज कर दिया और बताया कि भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारत ने जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए कहा, “कानून बनाने का अधिकार हमारा अपना है और मानवाधिकारों के नाम पर कानून के उल्लंघन को माफ नहीं किया जा सकता।”

CAA के खिलाफ कोर्ट में दी थी याचिका

भारत ने पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) लाई लेकिन इसके खिलाफ देशभर में खूब प्रदर्शन हुए। लोगों को झूठ फैलाकर खूब बरगलाया गया कि भारत में मुस्लिमों की नागिरकता इससे छिन जाएगी। लोगों को बरगाने वालों में बैश्लेट जैसे लोग शामिल थे।

मार्च 2020 में बैश्लेट ने अपने अधिकारियों के जरिए CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक डलवा दी थी। यह बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की देश के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश ही थी। भारत ने तब भी बैश्लेट पर कड़ा पलटवार किया था। भारत ने कहा था, “CAA भारत का आंतरिक मामला है और भारतीय संसद के कानून बनाने के संप्रभु अधिकार से संबंधित है। हमारा विश्वास है कि भारत की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी विदेशी पक्ष का कोई अधिकार नहीं है।”

किसान आंदोलन के दौरान भी आग में डाला घी

बैश्लेट ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान भी आग में घी डालने का काम किया था। आंदोलन को भड़काने की कोशिश के दौरान जब कथित एक्टिविस्ट के खिलाफ कार्रवाई हुई तो बैश्लेट ने भी अपने प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया था। बैश्लेट ने भारत की कार्रवाई को मानवाधिकार के सिद्धांतों के खिलाफ बताया था।

किसान आंदोलन की आड़ में जब 26 जनवरी पर हिंसा की कोशिश की जा रही थी, किसान आंदोलन की आड़ में कुछ दंगाई देश को हिंसा की आग में झोंकना चाहते थे और भारत ने उस पर कार्रवाई की तो बैश्लेट जैसे लोगों को दर्द शुरू हो गया। भारत ने तब भी उनकी कड़ी आलोचना की थी।

मुस्लिमों पर हमले को लेकर फैलाया अंतर्राष्ट्रीय प्रोपेगेंडा

दुनिया का एक वर्ग में मुस्लिमों का हितेषी बनने और उन्हें भारत में पीड़ित दिखाने की चाह में मुस्लिमों पर कथित आक्रमण का एक झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है। ना केवल मुस्लिमों बल्कि बैश्लेट ने तो एक कदम आगे जाकर दलित और आदिवासियों पर हमलों का भी आरोप भारत में लगाया था।

बैश्लेट के ऐसे इन सबके अलावा भी कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे। साफ है कि बैश्लेट का विरोध सराकर या संस्था से आगे बढ़कर भारत को निशाने पर लेने के लिए था। चूँकि यही सब मुद्दे या इनसे जुड़े मुद्दे ही कांग्रेस को भी भाते हैं तो उन्होंने बैश्लेट में अपना नया दोस्त नजर आया होगा।

कांग्रेस का ‘देश विरोधियों’ से प्यार क्यों नही होता खत्म?

भारत विरोधी मानसिकता रखने वाली मिशेल बैश्लेट के साथ कांग्रेस का इस तरह खुलकर खड़ा होना केवल एक संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग जैसा लगता है। कांग्रेस के लिए बैश्लेट कोई मानवाधिकारों की मसीहा नहीं हैं बल्कि वह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय चेहरा हैं जिनकी भारत-विरोधी टिप्पणियाँ मोदी सरकार को घेरने के लिए बार-बार इस्तेमाल की जाती रही हैं।

बैश्लेट को मंच देने का अर्थ यह भी है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक लड़ाई के लिए उन अंतरराष्ट्रीय आवाजों पर भरोसा करती है जिन्हें भारत विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। कांग्रेस जिस बैश्लेट को शांति और निरस्त्रीकरण का सम्मान दे रही है, वही बैश्लेट भारत के आंतरिक और संवेदनशील मुद्दों को लेकर हमेशा एकतरफा टिप्पणियाँ करती रही हैं।

दिलचस्प यह है कि उनकी हर टिप्पणी ठीक उसी वक्त आई जब कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मोदी सरकार पर हमला कर रहे थे। चाहे अनुच्छेद 370 हटाने की बात हो, CAA का विरोध हो या किसान आंदोलन की आग को भड़काने का दौर, मौके पर बैश्लेट ने वही कहा जो भारत के विपक्षी दल अंतरराष्ट्रीय मंचों से सुनना चाहते थे। जब कांग्रेस उन्हें सम्मानित करती है, तो उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि मोदी सरकार की नीतियों और भारत पर हमला करने वालों को पुरस्कार देने जैसा लगता है।

यह वही राजनीति है जिसमें देश की छवि से बढ़कर अपना ‘नैरेटिव’ दिखाई देता है। असल बात यह है कि कांग्रेस को बैश्लेट में वह ‘आवाज’ दिखती है जो उनकी विचारधारा के अनुरूप भारत को कमजोर, विभाजित और हमेशा लड़ता हुआ दिखाने की कोशिश करती है।

बैश्लेट की टिप्पणी, चाहे वे कितनी भी झूठी या आधी-अधूरी क्यों न हों, वो कांग्रेस के नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान करती हैं। इसलिए उनका प्यार बैश्लेट जैसे भारत विरोधियों से कभी कम नहीं होता है।

क्या भारत का विपक्ष इंटरनेशनल भिखारी है? CAA विरोधी प्रदर्शन में हिंसा भड़काने के लिए NewsClick ने चीन के पैसे का किया इस्तेमाल, अमेरिका के रास्ते तीस्ता सीतलवाड़ को मिला पैसा: रिपोर्ट

न्यूजक्लिक के तीस्ता सीतलवाड़ और नेविल रॉय सिंघम के संबंधों पर चार्जशीट में बड़ा खुलासा
70 के दशक में निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर की बहु-चर्चित फिल्म "आंखें" में महमूद पर फिल्माया बहु-चर्चित गीत "दे दे अल्लाह के नाम पर, इंटरनेशनल भिखारी आये हैं..." हमारे दिशाहीन विपक्ष की क्या ऐसी स्थिति हो गयी है? भारत में जब कभी सरकार के विरोध में शाहीन बाग बनते हैं, जनता भी केंद्र सरकार के विरुद्ध चर्चा करने लगते हैं, लेकिन जब उनकी जाँच में विदेशी धन का खेल सामने आता है, उसे देख सोंचने को विवश होना पड़ता है कि क्या जिन्हे जनहितैषी नेता मानकर वोट देते हैं, मालूम पड़ता है कि वह नेता नहीं, सफेदपोशी भिखारी है। CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक विदेशी धन का खुलासा हुआ। जिस तरह भिखारी का काम सिर्फ भीख मांगना और उससे आगे भिखारी कुछ सोंचता ही नहीं, वही हालत हमारे नेताओं की हो गयी है। विदेशों में बैठे मोदी विरोधी तो इन नेताओं को फंडिंग कर रहे हैं, ऊपर से George Soros भी आ गया जो 1000 करोड़ रूपए खर्च कर रहा है। 

अगर जनहित में काम करने की बजाए विदेशी भीख पर काम करने वाले नेता और उनकी पार्टियां क्या इन हरकतों से देश का नाम रोशन कर रहे हैं? जिस खालिस्तान के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की जान गई, वही खालिस्तान किसान आंदोलन में नज़र आया, और कांग्रेस समेत सारा विपक्ष उस आंदोलन अपना-अपना समर्थन देता नज़र आया, क्यों? लाल किला पर चढाई कर दी, इस विपक्ष को तब भी शर्म नहीं आयी। अगर इन नेताओं और पार्टियों में देशप्रेम भावना होती, तुरंत इस आंदोलन का बहिष्कार कर केंद्र के साथ खडा होना चाहिए था, लग गया मालपुए खाने। क्या ऐसे नेता और पार्टियां एक भी वोट की हक़दार हैं? 

न्यूज़क्लिक केस में बड़ा खुलासा हुआ है। न्यूजक्लिक के साथ काम करने वाले लोगों ने जाँच के दौरान चौंकाने वाले बयान दर्ज कराए हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट में इन गवाहों के बयान को रखा गया है, जिसमें बताया गया है कि न्यूजक्लिक ने CAA विरोधी हिंसा के दौरान मुस्लिमों को हिंसा और दंगों में शामिल होने के लिए उकसाने के लिए उन्हें ‘आदेश’ दिया था। इसके लिए उन्हें सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों तक पैसे पहुँचाने के लिए भारी मात्रा में नकदी दी गई थी।

इन गवाहों ने बताया है कि दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों में इस्तेमाल किए गए हथियारों को खरीदने के लिए न्यूजक्लिक के माध्यम से चीनी पैसों का इस्तेमाल किया गया। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में आतंकवादियों को भी पैसे पहुँचाए गए थे।

इन गवाहों की पहचान छिपाई गई है। ये गवाह न्यूजक्लिक में काम करते थे। यूएपीए की धारा 41 के तहत इनकी पहचान को छिपाते हुए दिल्ली पुलिस ने इनके बयानों को चार्जशीट के माध्यम से कोर्ट में पेश किया है। इन गवाहों ने बताया है कि उन्हें धर्म विशेष (हिंदुओं) के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए सीएए विरोधी और शाहीन बाग के प्रदर्शनों में भेजा गया था। इसके लिए न्यूजक्लिक ने अपने कर्मचारियों को पैसे देकर बाँटने के लिए कहा, ताकि अराजकता और हिंसा को भड़काया जा सके।

इस दौरान कई वॉट्सऐप ग्रुपों का इस्लेमात किया गया, खासतौर पर 2 ग्रुपों के बारे में बताया गया है, जिसमें एक ग्रुप का इस्तेमाल CAA विरोधी प्रदर्शनों, किसानों के प्रदर्शनों और शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया गया। दूसरा ग्रुप कश्मीर में हिंसा और तनाव भड़काने में लगा था। ये लोग न्यूजक्लिक में पत्रकार के रूप में काम कर रहे थे और न्यूजक्लिक का एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे। इन्हीं लोगं ने संवेदनशाली कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नक्शों में छेड़छाड़ भी की थी।

जिन लोगों तक पैसे पहुँचाए गए, उसमें से एक नाम शरजील इमाम का है। वो सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा का मुख्य आरोपित है। उसने प्रबीर पुरकायस्थ से पैसे लिए और अपने नापाक एजेंडे को आगे बढ़ाता रहा। इस चार्जशीट में सभी गवाहों के बायन दर्ज हैं और उन्हें दिल्ली पुलिस कोर्ट में पेश कर चुकी है।

नेविल रॉय सिंघम से मिला पैसा तीस्ता सीतलवाड तक पहुँचाया

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, न्यूजक्लिक को विदेश से आए पैसों को तीस्ता सीतलवाड़ तक पहुँचाए गए। चार्जशीट में पुलिस ने बताया है कि अमेरिका से मिले पैसों को तीस्ता सीतलवाड़ के पोर्टल ‘सबरंग इंडिया’ को नया जीवन देने में किया गया। चार्जशीट के मुताबिक, ‘न्यूज सिंडिकेशन स्कैम’ के माध्यम से आर्टिकल लेखकों और स्तंभकारों को न्यूजक्लिक से मिले पैसे दिए गए और इन लेखों का इस्तेमाल सबरंग इंडिया पर प्रकाशित करने के लिए किया गया।
खास बात ये है इन आर्टिकल्स को सबरंग इंडिया पर प्रकाशित करते समय इन्हें ‘सबरंग इंडिया’ द्वारा लिखा दिखाया गया, और असली लेखकों के नाम छिपा लिए गए। चार्जशीट के मुताबिक, इससे तीस्ता सीतलवाड़ को करीब 3 लाख, 1 करोड़ से ज्यादा रुपए उनके कर्मचारियों के लिए और 39 लाख रुपए उनके परिवार के निजी खर्च के लिए मिले।
दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में बताया है कि जाँच एजेंसियों के रडार पर होने के बावजूद तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा दागी विदेशी धन पाने का यह “सबसे सुविधाजनक तरीका” था। पुलिस ने कहा कि ई-मेल, गवाहों की जाँच, वित्तीय उकसावे और संरक्षित गवाहों की गवाही के विश्लेषण से यह स्थापित हुआ कि तीस्ता सीतलवाड, प्रबीर पुरकायस्थ और नेविल रॉय सिंघम एक “खास तिकड़ी” का हिस्सा थे। बता दें कि नेविल रॉय सिंघम न्यूजक्लिक के संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ का लंबा समय से साथी है और एक अमेरिकी करोड़पति है। उसका जुड़ाव चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से है और वो चीनी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए प्रबीर पुरकायस्थ और न्यूजक्लिक के माध्यम से भारत के अंदर काम कर रहा था।
चार्जशीट के मुताबिक, तीनों लोग (प्रबीर पुरकायस्थ, तीस्ता सीतलवाड़ और नेविल रॉय सिंघम) एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुए साथ में काम कर रहे थे। इसमें नेविल रॉय सिंघम की ओर से पैसा आता और सभी लोग मिलकर लेफ्ट विंग अतिवाद (LWE) एजेंडे को आगे बढ़ा रहे थे। पुलिस के मुताबिक, तीस्ता सीतलवाड़ और नेविल रॉय सिंघम के बीच ई-मेल्स का जो आदान प्रदान हुआ, उसमें इस बात का खुलासा हुआ है कि नेविल रॉय सिंघम ने तीस्वा सीतलवाड़ के पोर्टल सबरंग इंडिया और तीस्ता के एनजीओ सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) को प्रबीर पुरकायस्थ के माध्यम से फंडिंग दी।
चार्जशीट के मुताबिक, इस मामले की जाँच के लिए 13 दिसंबर 2023 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की टीम ने मुंबई जाकर जाँच की और तीस्ता सीतलवाड़ और उसके शौहर जावेद आनंद को नोटिस भी थमाया था। जावेद आनंद सबरंग इंडिया का सह-संपादक भी है। स्पेशल सेल ने इन लेन-देन की जानकारी भी माँगी। स्पेशल सेल ने सबरंग इंडिया और न्यूजक्लिक के फाउंडर-एडिटर के बीच मैनपॉवर शेयरिंग, सैलरी डिटेल्स और आर्टिकल/वीडियो के प्रोडक्शन को लेकर साइन हुए एग्रीमेंट की भी जाँच की।
न्यूजक्लिक पर चीनी माध्यम से 80 करोड़ प्राप्त करने के आरोप हैं। एफआईआर में इस बात का जिक्र है कि न्यूजक्लिक ने भारत की संप्रभुता पर चोट करने और देश में नफरत का माहौल तैयार करने के लिए चीनी संगठनों से पैसे लिए। कुछ दिन पहले ही दिल्ली की कोर्ट ने प्रबीर पुरकायस्थ की 10 दिनों की कस्टडी बढ़ा दी थी। बता दें कि इस मामले में अमित चक्रवर्ती, जिसे प्रबीर के साथ ही गिरफ्तार किया गया था, वो अब सरकारी गवाह बन चुका है।
दिल्ली पुलिस ने पिछले साल 3 अक्टूबर को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत न्यूज़क्लिक के संस्थापक और संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया था। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने न्यूजक्लिक के दफ्तर को छापेमारी के बाद सील कर दिया गया था। पुलिस ने बताया कि अक्टूबर 2023 में दिल्ली और सात अन्य राज्यों में 88 स्थानों पर छापे मारे गए, जिसमें एफआईआर में शामिल व्यक्तियों के साथ-साथ डेटा विश्लेषण के दौरान सामने आए लोगों को भी निशाना बनाया गया। इसके अलावा, प्रबीर पुरकायस्थ पर 2019 के लोकसभा चुनावों में तोड़फोड़ करने की साजिश रचने और पीपुल्स अलायंस फॉर डेमोक्रेसी एंड सेक्युलरिज्म (पीएडीएस) के साथ सहयोग करने का आरोप है।

वाह Times of India इमराना का घाव दिखा, उसकी देश में आग लगाने की मानसिकता नहीं; अगर मुज़फ्फरनगर दंगे की सही रिपोर्टिंग की होती, तब घाव नहीं, दोषी दिखाई देती

                 जावेद को इमराना बेगम ने दिया था टाइम बम का ऑर्डर, हिन्दुओं से लेना चाहती थी बदला
मुजफ्फरनगर में बैठकर टाइम बोतल बम बनाने वाले जावेद की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को जिस इमराना की तलाश थी, वो इमराना उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा पकड़ ली गई है। शनिवार (17 फरवरी 2024) की शाम को पुलिस ने उसे उसके घर से गिरफ्तार किया और अब उससे पूछताछ जारी है। एसटीएफ के बाद दिल्ली की आईबी की टीम भी इमराना से पूछताछ करेगी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक की पड़ताल में सामने आया है कि इमराना 15 साल पहले तक भट्टी पर मजदूरी का काम करती थी आज उसके पास कई मकान और प्लाट हैं। साथ ही वो महंगी गाड़ियों में भी घूमती है।

पुलिस एक ओर पता लगा रही है कि उसके पास इतना पैसा कहाँ से आया। वहीं दूसरी ओर ये ज्ञात हुआ है कि उसने बम इसलिए बनवाए थे कि ताकि जब लोकसभा चुनाव से पहले सीएए लागू करने की घोषणा हो, तब वह उन बमों का इस्तेमाल कर सके। बताया जा रहा है कि इमराना ने ऐसा ऑर्डर दिल्ली के किसी शख्स के कहने पर दिया था। ये शख्स कौन है इसके बारे में आगे जानकारी आएगी।

उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ इमराना की गिरफ्तारी के बाद अब उसके नेटवर्क के बारे में सूचना जुटा रही है। पता लगाया जा रहा है कि इमराना के पीछे किन संगठनों का हाथ है, उनकी मंशा क्या है। इसके अलावा ये भी मालूम हुआ है कि इमराना और जावेद एक दूसरे के संपर्क में कैसे आए।

लोग उसे इमराना बाबा के नाम से भी जानते थे क्योंकि वो काला जादू वगैरह का काम भी करती थी। जावेद की गिरफ्तारी के बाद से ही एसटीएफ और पुलिस इमराना की तलाश कर रही थी। उसके बारे में पता चला है कि शामली जिले की रहने वाली है, लेकिन मुजफ्फरनगर के मुस्लिम बहुल खालापार इलाके में रहती थी। जावेद की गिरफ्तारी के बाद जब जाँच एजेंसी ने उसके घर रेड मारी थी, तो वो पहले ही फरार हो गई थी।

अब इमराना की बेटी रूकसार ने बताया कि उन्होंने अपनी अम्मी को पुलिस को सौंप दिया है। वहीं पुलिस ने कहा कि बताया कि इमराना से गहनता के साथ पूछताछ की जाएगी। इसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। जावेद ने इसी इमराना के कहने पर टाइम बोतल बम तैयार किए थे। इन बमों को बनाने के लिए उसने गन पाउडर-999, लोहे की छोटी गोलियाँ, रुई, पीओपी आदि का इस्तेमाल किया। उसने डॉक्टरों से ग्लूकोज की बोतलें और साइकिल की दुकानों से आयरन की गोलियाँ और घड़ी की दुकानों से घड़ी की मशीनें खरीदी थीं।

भारत की मीडिया की एक विशेषता है, जब भी किसी आतंकी के बारे में कुछ खबर आती है तो उसके ‘मानवीय पक्ष’ को ज़रूर खँगाला जाता है। बड़े से बड़े आतंकवादी को व्हाइटवॉश करने की कला भारत की मीडिया के पास है। ‘The Quint’ के लिए अलकायदा का संस्थापक ओसामा बिन लादेन ‘एक अच्छा पिता और पति’ बन जाता है, तो वहीं बरखा दत्त के लिए कश्मीर के आतंकी बुरहान वानी ‘प्रधानाध्यापक का बेटा’ हो जाता है। हर आतंकी के इस पक्ष को बेचने की कला भारत की मीडिया के पास है।

जिस मुज़फ्फरनगर दंगे ने इमराना को घाव दिया, Times of India ने अगर उस दंगे की निष्पक्ष रिपोर्टिंग की होती, तब शायद ToI को पता लगता कि दंगा भी करो और निर्दोष बनते फिरो, खाला जी का बाड़ा नहीं। ये victim card का धंधा पुराना हो गया है, भारत ही नहीं अब विश्व भी, विशेषकर मुस्लिम देश, इन दंगाइयों की मानसिकता समझ चुका है। उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते देखिए(पृष्ठ) क्या प्रकाशित किया था। 

उत्तर प्रदेश में होते दंगों की होती जाँच पर मुख्यमंत्री योगी से मुज़फ्फरनगर दंगे की फाइल खोलने पर लेखों में लिखा। किसके इशारे पर हुआ था मुज़फ्फरनगर दंगा? कहाँ से आयी थी AK47, पिस्तौल, छुरे-चाकू, गरारियाँ? किसने धार्मिक स्थलों में असला जमा किया था और किसके कहने पर? तब किसी बीजेपी की नहीं बल्कि अखिलेश यादव की सरकार थी। लेकिन सरकार आज़म खान के इशारे पर चलती थी। मौका है इमराना केस के चलते योगी सरकार उस फाइल को खोल दे। आज़म खान की मुश्किलों तो बढ़ेंगी ही, लेकिन अखिलेश यादव भी बच नहीं पाएंगे। मुलायम सिंह परिवार अपनी सुरक्षित सीटों से जीत पायेगा, कहना मुश्किल है। 

उस दंगे में मुलायम सिंह ने किस मुस्लिम पुलिस अधिकारी की पीठ थप-थपाई थी और क्यों? इस बात का उल्लेख "मुज़फ्फरनगर दंगा-एक सच" चर्चा में मुस्लिम नेता शाहबुद्दीन गौरी ने अपने भाषण में किया था। जो शब्द उस मुस्लिम अधिकारी ने बोले थे, अगर किसी हिन्दू पुलिस कर्मी ने ही बोल दिए होते, Times of India जैसे कितने मीडिया उस हिन्दू पुलिस कर्मी को निलंबित करवा दिए होते। आज जितने भी मीडिया आज हिन्दुत्व के पक्ष में बोल रहे है, किसी ने उस दंगे की सच्चाई सामने लाने का साहस नहीं किया? आज तो बड़े आराम और मजे कह दिया जाता है गोदी-मीडिया, उस समय किसी ने नहीं कहा मुलायम/कांग्रेस मीडिया।    

वैसे ये ट्रेंड नया नहीं है। जैसा हमने फिल्मों में देखा है कि कैसे कोई पुलिस अधिकारी किसी बड़े आतंकी के पीछे लगा रहता है, आतंकी एक के बाद एक वारदातों को अंजाम देता चला जाता है, फिर उसके इतिहास को सामने लाया जाता है कि आखिर वो आतंकी कैसे बना, इसके लिए सरकार या हिन्दू समाज को दोषी ठहरा दिया जाता है और उन्हें पश्चाताप से भरने की कोशिश की जाती है, फिर वो पुलिस अधिकारी भी ये कहानी सुन कर रोता है – इस तरह आतंकी के व्हाइटवॉश की प्रक्रिया पूरी होती है।

ताज़ा मामला उत्तर प्रदेश का है और इस बार किसी आतंकी के ‘दर्द’ को दिखाने का बीड़ा देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में से एक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने उठाया है। हुआ यूँ कि मुजफ्फरनगर पुलिस ने इमराना बेगम नाम की एक 60 वर्षीय महिला को गिरफ्तार किया। गिरफ़्तारी का कारण – वो पूरे शहर को दहलाना चाहती थी और इसके लिए उसने जावेद नामक एक शख्स के पास कई टाइम बम भी रखे हुए थे। उसने बड़ी मात्रा में टाइम बम का ऑर्डर दिया था। आइए, बताते हैं कि मामला क्या है।

मुजफ्फरनगर: इमराना बेगम ने ऑर्डर किया टाइम बम

इमराना बेगम को रविवार (18 फरवरी, 2024) को गिरफ्तार किया गया था। इमराना बेगम शामली की रहने वाली है। उसने जावेद नामक शख्स को टाइम बम बनाने का टास्क दिया था। जावेद ने यूट्यूब पर वीडियो देख-देख कर टाइम बम बनाना सीखा और फिर उसने कई बम बना डाले। बम के साथ टाइमर भी उसने बनाया था। लेकिन, गुरुवार (15 फरवरी, 2024) को मजफ्फरनगर की काली नदी के पास से उत्तर प्रदेश STF (स्पेशल टास्क फ़ोर्स) को उसे दबोचने में कामयाबी मिली।
जावेद इमराना के किसी परिचित का बेटा था और इमराना को पता था कि वो विस्फोटक बना सकता है। जावेद पहले भी ये काम कर चुका था। इमराना का कहना है वो भविष्य में अगर कोई दंगा हो तो अपनी सुरक्षा के लिए ये सब कर रही थी। IED बनाने के लिए उसने जावेद को 10,000 रुपए एडवांस में दिए थे। डिलीवरी के समय 40,000 रुपए और भुगतान करने का वादा किया गया था। हालाँकि, डिलीवरी के दौरान ही वो पकड़ा गया।
इमराना बेगम को IPC की धारा 286 और विस्फोटक अधिनियम की धारा 4/5 के तहत जेल भेज दिया गया है। आगे की पूछताछ के लिए उसे पुलिस की हिरासत में लिया जाएगा। क्योंकि, टाइम बम बनाने के पीछे क्या मकसद था इस संबंध में उसने जो कुछ भी बताया है उसकी पुष्टि करनी आवश्यक है। जावेद और उसका बेटा जरीफ पटाखा बनाने का काम करते थे। उसने 10 बम का ऑर्डर दिया था, लेकिन 5 ही बन सके थे। एक दशक पहले भी इमराना ने बम बनाने का ऑर्डर दिया था।

TOI को दिखा इमराना का ‘घाव’
                                                      TOI को दिखा इमराना का ‘घाव’

अब इस घटना पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ की खबर का शीर्षक देखिए, ‘2013 के दंगों से आहत 60 वर्षीय महिला ने टाइम बम का ऑर्डर दिया, गिरफ्तार’। TOI ने अपने शीर्षक में ये बताना ज़रूरी समझा कि उक्त महिला ‘घाव से पीड़ित’ है और वो ‘घाव’ है 2013 के दंगों का। महिला का कहना है कि उन दंगों में उसका घर जला दिया गया था और इसीलिए वो अपनी सुरक्षा के लिए ये बम बनवा रही थी। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी बताया गया है कि वो हिन्दुओं से बदला लेना चाहती थी।
जावेद के कुछ रिश्तेदार नेपाल में भी रहते हैं, ऐसे में आतंकनिरोधी दस्ता (ATS) भी इस मामले की जाँच कर रहा है। इसके तार कहाँ से जुड़ेंगे, अभी जाँच में सामने आएगा। लेकिन, मीडिया एक बार फिर से अपने धंधे की विशेषता दिखाने में लग गया है। कहने का तात्पर्य ये है – ‘हिन्दुओं ने महिला का घर जलाया, इसीलिए पीड़ित महिला अपनी सुरक्षा के लिए टाइम बम बनवा रही थी।’ क्या टाइम बम आत्मरक्षा का हथियार है? IED जैसे खतरनाक विस्फोटक का आत्मरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाने का कोई उदाहरण है अपने पास?
खासकर के इस खतरनाक विस्फोटक का इस्तेमाल कर के 10 टाइम बम बनाने का ऑर्डर देना, ये तो कहीं से भी आत्मरक्षा के लिए किया गया काम नहीं लगता। जाँच में चीजें सामने आएँगी, लेकिन अभी तो ऐसा ही लगता है कि इमराना बेगम हिन्दुओं से बदला लेना चाहती थी, खुन्नस पाले बैठी थी। हल्द्वानी में हमने देखा कि कैसे मुस्लिमों के छतों से पत्थर चले, पत्थरबाजों में बच्चों से लेकर महिलाएँ तक शामिल थीं। जाँच तो इसकी भी होनी चाहिए कि मुजफ्फरनगर दंगों में इमराना बेगम की क्या भूमिका थी, कहीं उसका घर लॉन्चपैड तो नहीं था?

मुजफ्फरनगर दंगों में क्या हुआ था

अगस्त-सितंबर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगों से उत्तर प्रदेश में हालात ऐसे बिगड़े थे कि भारतीय सेना को तैनात करना पड़ा था। तब राज्य में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, समाजवादी पार्टी की सरकार थी। इस घटना में अधिकतर जाट हिन्दू समाज के लोग ही पीड़ित थे। कवाल गाँव में मुस्लिमों द्वारा जाट लड़कियों से छेड़खानी के बाद ही ये मामला शुरू हुआ था। ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या के साथ दंगे भड़के थे, इसमें हिन्दू समाज का क्या दोष था?
क्या आपको पता है कि जहाँ सचिन के शरीर पर पोस्टमॉर्टम के दौरान 17 और गौरव के शरीर पर 15 गहरे घाव मिले थे? उनकी हत्या निर्मम तरीके से की गई थी। गोली या धारदार हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया था, बल्कि लाठी-डंडों से पीटा गया था, सिर और मुँह को पत्थरों से कुचला गया था और सरिये से मार-मार कर मौत के घाट उतार दिया गया था। जाहिर है, फिर दो पक्ष दंगों में भिड़ते हैं तो क्षति हर तरफ से होती है। मुजफ्फरनगर हो, मेवात हो, या हल्द्वानी हो – हर जगह हमने इस्लामी भीड़ को समान पैटर्न पर काम करते देखा है।
90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ, उसके बाद उनमें से एक भी आतंकी क्यों नहीं बना? उनकी महिलाओं से बलात्कार हुआ, निर्मम हत्याएँ हुईं और पलायन के बाद वो अपने ही देश में शरणार्थी बन गए, लेकिन उनके पास से टाइम बम क्यों नहीं मिलते? मीडिया आखिर हर आतंकी, पत्थरबाज, बमबाज या अपराधी को व्हाइटवॉश करने के लिए कहानियाँ लेकर क्यों आता है? क्या इसका मकसद होता है कि लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा की जाए।

जैसे आज मणिपुर के Video से विचलित है देश, वैसे ही कभी तस्वीरों से सन्न रह गया था अजमेर: चौगुने पैसे में बिकते थे स्कूल-कॉलेज की लड़कियों के न्यूड फोटो वाले रील

अजमेर में फार्महाउस में जाकर स्कूल-कॉलेज की लड़कियों का करते थे बलात्कार (फोटो: 'अजमेर 92' ट्रेलर)
आज सोशल मीडिया का जमाना है। ढाई महीने बाद ही सही, मणिपुर में 3 महिलाओं के साथ हैवानियत का वीडियो सामने आया और मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने इस पर अपने-अपने स्तर पर टिप्पणी की, कार्रवाई के लिए कहा और आरोपितों की धर-पकड़ हुई। हमें CAA के विरोध में हो रहे धरने और प्रदर्शनों में लग रहे उन नारों को याद करना होगा। जो इस बात को सिद्ध करेंगे कि मणिपुर घटना किसी गहरे षड़यंत्र का हिस्सा है। कितने समय से इसकी पृष्ठभूमि लिखी जा रही होगी। सनातन पर होते हमले और अब मणिपुर। क्या CAA विरोध में बने शाहीन बागों में fuck Hindutva, जब तक हिन्दुस्तान गजवा-ए-हिन्द नहीं बन जाता, तिरंगा थामो और वंदे मातरम बोलो और chicken neck को अलग करेंगे, याद है नारे। नार्थईस्ट का यही मणिपुर ही उसी chicken neck का हिस्सा है। क्या जनता महिलाओं का शोषण करने वाले को अपने वोट की चोट से इन षड्यंत्रकारियों को धूल चटवाएगी? विशेषकर चुनावी हिन्दुओं को, यदि जनता ऐसा नहीं करती है, यह उनकी भयंकर भूल होगी। 
मणिपुर में महिलाओं को नग्न घुमाए जाने और उनके साथ गैंगरेप की घटना में देर से ही सही, न्याय हो तो रहा है। लेकिन, अजमेर में अस्सी-नब्बे के दशक में जो हुआ था, उसकी नाबालिग पीड़िताएँ आज दादी-नानी बन गईं लेकिन न्याय नहीं मिला।
चिश्ती की दरगाह पर हुए महिलाओं के यौन-शोषण की जिम्मेवार कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां है, जिन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते भारत के हिन्दू सम्राटों के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों के खुनी और बलात्कारी इतिहास पर पर्दा डाल उन्हें महान बताकर पढ़ा दिया। ताज महल को मोहब्बत की निशानी बताया जाता रहा, लेकिन कभी ये नहीं पढ़ाया कि 14वे बच्चे को जन्म देते समय मुमताज़ की मौत हुई थी, और अगले ही दिन अपनी साली से निकाह कर लिया। हमें यह नहीं पढ़ाया कि अकबर मीना बाजार क्यों लगाता था और किस शेरनी-किरण देवी- के साहसिक कदम ने मीना बाजार बंद करवाया? (देखिए पेंटिंग)अकबर जिसे महान पढ़ाया जाता रहा, उसी महान अकबर ने इसी शेरनी से अपनी ज़िंदगी की भीख मांगी थी। ठीक वही हाल चिश्ती का भी है, जिसने हज़ारों हिन्दू महिलाओं का बलात्कार किया/करवाया, उनका इस्लामीकरण किया और जिसने इस्लाम स्वीकार नहीं किया उन्हें मरवा दिया गया। आखिर इस हत्यारे की कब्र पर क्यों जाते हैं लोग?   

उस समय सोशल मीडिया का जमाना नहीं था, टीवी मीडिया का भी नहीं। रेडियो पर सिर्फ सरकारी और राष्ट्रीय खबरें चलती थीं। उस दौरान अख़बार और पत्रिकाएँ ही खबरों और विश्लेषण का सबसे बड़ा स्रोत हुआ करती थीं। इसी दौरान ‘दैनिक नवज्योति’ में कुछ ऐसी तस्वीरें छपीं जिसने सबको सन्न कर दिया। ये तस्वीरें थीं उन पीड़िताओं की, जिनकी इज्जत लूटने में दरगाह के खादिमों के परिवार वालों, सफेदपोशों और कांग्रेस नेताओं का गिरोह शामिल था।

इस अख़बार के तत्कालीन संपादक हुआ करते थे दीनबंधु चौधरी, जिनके रिपोर्टर संतोष गुप्ता इस पूरे स्कैंडल की खबर लेकर उनके पास आए थे। खबर छपी भी, लेकिन किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। असल में संतोष गुप्ता ने अजमेर के अनाज मंदिर स्थित ‘भरोसा लेबोरेटरी’, जहाँ फिल्म्स के नेगेटिव पर काम होता था, वहाँ से 4 गुना ज्यादा पैसे देकर फोटो रील्स ले जाते हुए एक व्यक्ति को देखा था। उनके साथ एक दोस्त था, जिसने शुरू में तो आनाकानी की लेकिन बाद में उन्हें 4 रील्स दी।

उन्हें देख कर वो दंग रह गए थे। ‘दैनिक भास्कर’ ने पत्रकार दीनबंधु चौधरी का इंटरव्यू लिया है और उनसे उस जमाने में हुए इस स्कैंडल के बारे में जाना। इसी क्रम में उन्होंने बताया कि अख़बार ने तस्वीरें छापने का निर्णय लिया और प्राइवेट पार्ट्स पर काली पट्टी डाल कर उन्हें प्रकाशित कर दिया गया। बार एसोसिएशन के वकील अख़बार की प्रतियाँ लेकर डीएम-एसपी के पास गए और फिर इस प्रकरण में कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।

इन सबकी शुरुआत कहाँ से हुई, इसका किस्सा भी उन्होंने सुनाया। असल में श्रीहरि रोड पर स्थित एक कॉलेज की लड़की एडमिट कार्ड के लिए फीस के लिए पैसे न होने के कारण रोती हुई जा रही थी, जिसे वहाँ से गुजरते कुछ रसूखदार युवकों ने देखा और उसकी मदद की। उसके बाद रोज मुलाकात करते-करते उन्होंने लड़की से जान-पहचान बढ़ा ली और एक दिन वैन में बिठा कर हटूंडी स्थित अपने फार्महाउस ले गए, जहाँ उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी अश्लील तस्वीरें भी ले ली गईं।

फिर तो ब्लैकमेल कर-कर के आए दिन उसका रेप किया जाने लगा। एक दिन दरिंदों ने उस लड़की से अपनी दोस्त को भी लाने को कहा, मना करने पर तस्वीरें शहर भर में फैला देने की धमकी दी। इस डर से वो अपनी दोस्त को लेकर आई। उसके साथ भी वही दरिंदगी दोहराई गई। फिर दूसरी वाली लड़की को अपनी दोस्त को लाने के लिए कहा गया। इस तरह चेन बनता गया और कई लड़कियाँ इस जाल में फँस गईं। दीनबंधु चौधरी ने ये भी बताया कि कैसे उन्हें ये खबर न छपने की धमकी देते हुए हत्या की धमकियाँ आती थीं।

उन्होंने बताया कि आधी रात को उन्हें फोन कॉल्स आते थे, जिनके जवाब में वो बिना डरे कहते थे कि कायरों की तरह छिप कर बात मत करो, सामने आओ। दीनबंधु चौधरी के पिता दुर्गा प्रसाद चौधरी तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के अच्छे दोस्त थे। खुद मुख्यमंत्री ने उन्हें फोन कॉल कर के ये तस्वीरें न छपने का आग्रह किया और कहा कि इससे उनकी जान को खतरा हो सकता है। लेकिन, दीनबंधु चौधरी ने सफेदपोशों को बेनकाब करने के रास्ते पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

उन्हें सुरक्षा के लिए 2 गनर भी मुहैया कराए गए, लेकिन उन्होंने ये भी ठुकरा दिया। आज दीनबंधु चौधरी कहते हैं कि अगर उन्होंने सुरक्षा ले ली होती तो ये सन्देश जाता कि वो डर गए हैं। उन्हें रूट बदल कर ऑफिस जाने-आने की सलाह दी गई। इस घटना की शिकार अधिकतर लड़कियाँ नाबालिग थीं, जिनकी उम्र 16-17 साल थी। लड़कियों को धमकाया जाता था कि किसी को इस बारे में कुछ भी बताने पर ये तस्वीरें लीक कर दी जाएँगी।

लेकिन, जिस लैब में रील्स दिए गए थे तस्वीरें निकलवाने के लिए, उन्होंने इसकी कॉपियाँ अपने पास रख लें। लैब कर्मचारियों की नीयत बिगड़ गई और उनके माध्यम से ही ये तस्वीरें शहर भर में सर्कुलेट होने लगीं। 6 लड़कियों ने आत्महत्या का कदम उठा लिया था। अजमेर यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष फारूक चिश्ती, उपाध्यक्ष नफीस चिश्ती और जॉइंट सेक्रेटरी अनवर चिश्ती का नाम इसमें सामने आया। CID को जाँच की जिम्मेदारी मिली, 18 आरोपित बनाए गए।

पीड़िताओं में कई लड़कियों के बारे में कुछ पता ही नहीं चला कि वो कहाँ गईं, कुछ ने नाम-पहचान बदल लिया और कुछ परिवार के साथ कहीं और शिफ्ट हो गईं। ये लड़कियाँ नहीं चाहती थीं कि उनकी पहचान बाहर आए। अजमेर की लड़कियों के रिश्ते होने बंद हो गए थे। बदनामी के डर से वो पीछे हट गई थीं। 12 लड़कियों को केस दर्ज कराने के लिए एक NGO ने राजी किया, लेकिन लगातार धमकियों के कारण 10 पीछे हट गईं। बची हुई 2 ने 16 आरोपितों की पहचान की, उनमें से भी 11 ही गिरफ्तार हुए।

जिन 18 आरोपितों का नाम FIR में था, वो हैं – हरीश दोला (कलर लैब का मैनेजर), फारुख चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस प्रेसिडेंट), नफीस चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस वाइस प्रेसिडेंट), अनवर चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस जॉइंट सेक्रेटरी), पुरुषोत्तम उर्फ बबली (लैब डेवलपर), इकबाल भाटी, कैलाश सोनी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, जमीर हुसैन, अल्मास महाराज, इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पूतन इलाहाबादी, परवेज अंसारी, नसीम उर्फ टारजन, महेश लोदानी (कलर लैब का मालिक), शम्सू उर्फ माराडोना (ड्राइवर), जऊर चिश्ती (लोकल नेता)।

इनमें से एक सलीम चिश्ती तो इस घटना के सामने आने के 2 दशक बाद 2012 में धराया, बुर्के में। उसे जमानत भी मिल गई। नफीस को पकड़ने में भी पुलिस को 11 साल लग गए थे, वो 2003 में धराया था। सोहैल गनी चिश्ती भी 26 साल तक पुलिस की पहुँच से दूर रहा। उसने दिसंबर 2018 में आत्मसमर्पण किया। उसे भी बेल मिल गई। इकबाल भाटी भी 13 साल बाद 2005 में पकड़ाया और उसे भी जमानत मिल गई। अल्मास महाराज का आज तक कोई अता-पता नहीं है, जबकि उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी है।

नसीम उर्फ़ टार्जन जमानत मिलने के बाद कहाँ फरार हुआ, कोई अता-पता नहीं है। मुख्य आरोपित फारूक चिश्ती ने खुद को ‘सिजोफ्रेनिया’ का मरीज बता कर मानसिक रोगी घोषित करवा दिया। राजस्थान हाईकोर्ट ने उसे ये कहते हुए बरी कर दिया कि उसने पर्याप्त सज़ा काट ली है। एक आरोपित पुरुषोत्तम उर्फ़ बबली ने आत्महत्या ही कर ली। उस समय भी सोशल मीडिया होता तो शायद इन आरोपितों की त्वरित गिरफ़्तारी होती और इनका ये खेल इतना लंबा नहीं चलता।

‘हिन्दू की हत्या पर संभोग जैसा सुख’: प्रोपेगेंडाबाज गायिका कारालीसा मोंटेरियो

                                              कारालीसा मोंटेरियो के नाम से वायरल हो रहा ट्वीट
भारत की मोदी सरकार द्वारा जब से तीन तलाक बिल से लेकर कृषि बिल तक मोदी विरोधियों के सुरताल एक जरूर हो रहे हैं, लेकिन सभी ये भूल रहे हैं कि विरोध करते-करते हिन्दू विरोध बहुत जल्द इन सबको पाताल में पहुंचा देगा और भारत से विपक्ष नाम ही लुप्त हो जाएगा। आने वाले चुनावों में जनता इन मोदी विरोधियों से पूछे कि "अगर मोदी सरकार द्वारा लाये गए कानून जन विरोधी हैं, फिर क्यों तुम सब अपने-अपने घोषणा पत्रों में इसका उल्लेख कर जनता को लॉलीपॉप दी जा रही थी? इनके हिन्दू उम्मीदवारों से पूछा जाए कि जब आंदोलनों में हिन्दू विरोधी नारे लग रहे थे, तब क्यों और किस आधार पर इन नारों का समर्थन कर रहे थे? क्या तुम हिन्दू नहीं हो?" आदि आदि। 

मोदी विरोधियों को जिन मुद्दों का विरोध करना चाहिए, उनमें से किसी एक का विरोध करने का साहस नहीं पा रहे, बस अपनी कुर्सी की खातिर हिन्दुओं को कलंकित करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं, पता नहीं कैसे इनके संस्कार हैं? रही बात हिन्दू राष्ट्र की, वह तो दीवारों पर 1555 से लिखा हुआ है, अगर पढ़ नहीं पा रहे हो तो उसमें किसी का क्या कसूर। तब नॉस्त्रेदमस ने स्पष्ट लिखा कि 2014 चुनाव में एक अधेड़ उम्र के नेतृत्व में नयी पार्टी सत्ता में आएगी। इस विषय पर अपने लेखों में विस्तार से लिख चूका हूँ।  

दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के समर्थन में लगातार प्रोपेगेंडा फैला रही गायिका कारालीसा मोंटेरियो के नाम से एक ट्वीट सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इस ट्वीट में लिखा है, “जब भी किसी हिन्दू की हत्या होती है, मुझे संभोग जैसा सुख प्राप्त होता है। मोदी भले कॉन्ग्रेस मुक्त भारत का सपना देखते हों, लेकिन हम जल्द ही हिन्दू मुक्त भारत बनाएँगे। आमीन।”

                                               वायरल हो रहे ट्वीट का स्क्रीनशॉट
आगे बढ़ने से पहले बता दें कि कारालीसा मोंटेरियो वही हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अगस्त 2020 में तब फेक न्यूज़ शेयर की थी, जब कोरोना महामारी अपने चरम पर थी। उन्होंने पीएम मोदी की एक तस्वीर शेयर की थी, जिसमें वो लॉन में बैठ कर अख़बार पढ़ रहे हैं और आसपास कुछ बत्तख घूम रहे हैं। उन्होंने दावा किया था कि जब देश महामारी के संकट से जूझ रहा है, तब पीएम मोदी आराम फरमा रहे हैं।

जबकि सच्चाई ये है कि वो तस्वीर 2013 की थी, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। इसी तरह कारालीसा ने ऑपइंडिया को लेकर भी झूठे दावे किए थे। हाल ही में उन्होंने ऑपइंडिया का एक स्क्रीनशॉट शेयर किया था, जिसमें बताया गया था कि ग्रेटा थनबर्ग का असली नाम गजला भट्ट है, और वो एक कश्मीरी कारोबारी की बेटी हैं। वो स्क्रीनशॉट फर्जी थी और ऑपइंडिया ने कभी ऐसा कुछ लिखा ही नहीं।

अब कारालीसा मोंटेरियो ने हिन्दू की हत्या वाली वायरल ट्वीट के स्क्रीनशॉट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उसे फेक करार दिया है। उन्होंने कहा है कि ये फेक ट्वीट है और इसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि वो कभी ऐसी भाषा का प्रयोग करती ही नहीं हैं। उन्होंने इस मामले में औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की बात कही। साथ ही उद्धव कैबिनेट में कॉन्ग्रेस के मंत्री असलम शेख को टैग भी किया।

‘किसान आंदोलन’ के बीच अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा का बाजार गर्म है और रिहाना से लेकर ग्रेटा तक ने इसके लिए ट्वीट्स किए। खबर आई थी कि स्काईरॉकेट (Skyrocket), जो एक पीआर फर्म है और जिसका डायरेक्टर एक खालिस्तानी एमओ धालीवाल है, ने आंदोलन के पक्ष में ट्वीट करने के लिए पॉप स्टार रिहाना को 2.5 मिलियन डॉलर का भुगतान किया। भारतीय करेंसी में यह 18 करोड़ रुपए से अधिक है।

केजरीवाल सरकार दिल्ली दंगो के आरोपितों को बचा रही, जमानत के लिए छिपाई जानकारी: दिल्ली पुलिस

                                                                                                साभार: financialexpress.com
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस का पक्ष रखते हुए कहा कि फरवरी 2020 में हुए दंगों के एक आरोपित को इसलिए जमानत मिली, क्योंकि सरकारी वकील ने हाईकोर्ट के सामने मामले से जुड़ी जानकारी छुपाई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार के सरकारी वकील (additional public prosecutor) को जानकारी थी कि केंद्र सरकार ने दिल्ली दंगों के लिए विशेष अधिवक्ता नियुक्त किया है।

फिर भी जब आरोपित इलियास की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी तब उसने जाँच एजेंसियों को इस बारे में सूचित नहीं किया। 25 अगस्त 2020 के जमानत आदेश को चुनौती देते हुए ASG विक्रमजीत ने कहा कि दिल्ली सरकार के वकील ने पुलिस को इस बात की जानकारी नहीं दी जो कि हाईकोर्ट से जुड़े हुए थे। इसके विपरीत उन्होंने झूठा बयान दिया कि वह इस बारे में डिप्टी कमिश्नर को जानकारी दे चुका है। हाईकोर्ट ने विशेष सरकारी वकील (special prosecutor) को नोटिस भेजे बिना ही आरोपित को जमानत दे दी।

अपनी याचिका में दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार के वकील ने खुफ़िया एजेंसियों को धोखे में रखा और सही जानकारी को रोके रखा। इतना ही नहीं उन्होंने आधिकारिक अनुमति के बगैर इस प्रकरण में दखल दिया और ऐसे बयान दिए जिसकी वजह से आरोपित के पक्ष में जमानत आदेश जारी किया गया। दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ यह इकलौता मामला नहीं है और दिल्ली सरकार के इसी वकील का अन्य मामलों में भी ऐसा ही रवैया था। जिसमें इसने न तो विशेष सरकारी वकील को कोई जानकारी दी और न ही हाईकोर्ट में मौजूद दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को। 

इसके बाद विक्रमजीत बनर्जी ने दो पुलिसकर्मियों का निजी हलफ़नामा जमा किया, जिसमें लिखा था कि उन्हें इलियास की जमानत याचिका पर सुनवाई की जानकारी नहीं थी। इलियास पर हत्या का प्रयास, दंगा भड़काना, आगजनी जैसे मामलों के तहत दयालपुर पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज है। हाईकोर्ट के आदेश को ‘विचित्र’ बताते हुए बनर्जी ने कहा कि आदेश के आधार पर कहा जा सकता है कि न तो इलियास की चार्जशीट का संज्ञान लिया गया और न ही उसके खिलाफ़ मौजूद तमाम सबूतों पर गौर किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ASG विक्रमजीत से कहा कि दिल्ली पुलिस के लिए सही यही होगा कि वह दिल्ली हाईकोर्ट को अपने आदेश की समीक्षा के लिए राज़ी करें।

2020 हिन्दू विरोधी दंगा 

फरवरी 2020 के दौरान शाहीन बाग़ में सीएए-एनअआरसी विरोधी प्रदर्शन के हिंसक होते ही देश की राजधानी दिल्ली दंगों की चपेट में आ गई थी। फ़िलहाल दिल्ली पुलिस आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता ताहिर हुसैन की दंगों में कथित भूमिका की जाँच कर रही है। ताहिर हुसैन पर आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) के अंकित शर्मा की हत्या और दिल्ली दंगे भड़काने का आरोप है।  

‘बुर्काधारी महिलाओं ने दिल्ली दंगों में किया था पुलिस पर हमला’

                                       बड़ी साजिश का हिस्सा थी हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या
दिल्ली की एक अदालत ने पिछले साल दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले में एक आरोपित द्वारा दायर जमानत याचिका को शुक्रवार (जनवरी 08, 2021) को रद्द कर दिया।

रिपोर्टों के अनुसार, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने दिल्ली के चाँद बाग इलाके की निवासी तबस्सुम की जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसके कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) से पता चला है कि वह दिल्ली दंगों के कई सह-अभियुक्तों के साथ लगातार संपर्क में थी। न्यायाधीश ने आगे कहा कि आवेदक के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर थे।

न्यायाधीश ने कहा, “अपराध के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, मुझे आवेदक को जमानत देने के लायक मामला नहीं लगता। इसलिए जमानत की अर्जी खारिज कर दी गई है।”

दिल्ली की अदालत के फैसले से यह साबित होता है कि संसद द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित किए जाने के बाद दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे न सिर्फ भारत को अस्थिर करने के लिए था, बल्कि हिंदू आबादी को निशाना बनाने के लिए पहले से रची गई साजिश थी।

दंगा-अभियुक्तों की जमानत को खारिज करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि यह साफ तौर पर स्पष्ट है कि प्रदर्शनकारियों और आयोजकों ने भीड़ में व्यक्तियों को प्रेरित किया था और कुछ असामाजिक तत्वों ने अपराध स्थल को घेर लिया था। और वो पत्थर, लाठी, धारदार हथियार एवं दूसरे तरह के हथियारों से लैस थे।

न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी की, “यहाँ तक कि बुर्का पहने महिलाएँ स्पष्ट रूप से पुलिस पार्टी पर हाथों में लाठी और अन्य सामग्री से हमला करती हुई दिखाई देती हैं। यह भी रिकॉर्ड में आया है कि भीड़ में से कुछ लोगों ने 25 फूटा रोड पर ऊँची इमारतों की छतों पर कब्जा कर लिया था, जिनके पास बंदूक आदि कई अन्य दंगा करने का सामान था।”

हिंदू-विरोधी दंगे एक अच्छी तरह से रची गई साजिश थी: दिल्ली कोर्ट

न्यायमूर्ति यादव ने उल्लेख किया कि यह सब प्रथम दृष्टया इंगित करता है कि सब कुछ एक अच्छी तरह से रची साजिश के तहत किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि वज़ीराबाद रोड को अवरुद्ध कर दिया गया था और पुलिस द्वारा विरोध करने पर बल का प्रयोग कर किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे।

दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि तबस्सुम सरकार के खिलाफ मुस्लिम भीड़ को उकसाने के लिए अन्य दंगाइयों के साथ मंच साझा करती थी जिसके कारण 24 फरवरी, 2020 को हिंसा हुई, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली के उत्तर पूर्वी जिले में हेड कांस्टेबल रतन लाल समेत 50 से अधिक लोग मारे गए।

पुलिस ने यह भी कहा कि भीड़ के हमले के दौरान भीड़ ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर हमला किया, जिसके कारण पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) शाहदरा, अमित शर्मा, अनुज कुमार, एसीपी गोकलपुरी और 51 अन्य पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। दो वरिष्ठ अधिकारियों अमित शर्मा, अनुज कुमार को गंभीर चोटें आईं, जबकि कांस्टेबल रतन लाल को उन्मादी भीड़ ने मार डाला।

अपने आवेदन में, आरोपित तबस्सुम ने कबूल किया कि उसने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था, हालाँकि, दावा किया कि कुछ कानूनों का विरोध करना उसका ‘कानूनी और मौलिक अधिकार’ था, जिसे उससे दूर नहीं किया जा सकता था। उसका कहना था कि नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) और नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) एक विशेष धर्म के खिलाफ थे।

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान रतन लाल की हत्या

फरवरी में पूर्वोत्तर दिल्ली में भड़की हिंसा के दौरान हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या के संबंध में दायर चार्जशीट में कहा गया है कि रतन लाल की हत्या राष्ट्रीय राजधानी में सांप्रदायिक दंगों को बढ़ाने के लिए एक गहरी साजिश का हिस्सा थी। पुलिस ने इस मामले में 1100 पन्नों की चार्जशीट दायर की।

पुलिस ने चार्जशीट में खुलासा किया कि इससे 2 दिन पहले 22 फ़रवरी को ही 50 लोगों के एक समूह ने बैठक की थी, जहाँ हिंसा की पूरी साज़िश रची गई। दंगाइयों ने अपने घर के बच्चों व बुजुर्गों को पहले ही घर के भीतर रहने को बोल दिया था और ख़ुद हथियार लेकर निकले।

पुलिस की चार्जशीट में ये भी कहा गया कि रतनलाल की हत्या एक गहरी साजिश का हिस्सा थी। 24 फरवरी को मौजपुर क्रॉसिंग के पास हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच झड़प से दोपहर 12 बजे के क़रीब हिंसा भड़क उठी थी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 5000 लोग वहाँ जुट गए थे और पत्थरबाजी भी हो रही थी। 1 बजे एक बड़ी भीड़ ने चाँदबाग में डीसीपी और अन्य पुलिस अधिकारियों पर हमला बोल दिया, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

दिल्ली पुलिस की मानें तो चाँदबाग में जिस तरह से सीएए विरोधी प्रदर्शन में लोगों को भड़काया गया और धरने पर बिठाया गया, उसका दंगे फैलाने में अहम रोल था। रतन लाल की हत्या भी साज़िश का हिस्सा थी।

ये लोग 23 फरवरी को भी हंगामे के लिए निकले थे, लेकिन उस दिन ज्यादा कुछ नहीं किया गया और ये सभी वापस आ गए। 24 फरवरी को सारे उपद्रवी एक बार फिर से घर से बाहर निकले और हिंसा शुरू कर दी। शाहदरा के डीसीपी अमित शर्मा, एसपी अनुज शर्मा और हेड कांस्टेबल रतनलाल गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में इलाज के दौरान रतनलाल की मौत हो गई थी।

‘CAA विरोधी आंदोलन सत्याग्रह नहीं, यह आतंकी गतिविधि के दायरे में’: गुवाहाटी हाईकोर्ट

                                        अखिल गोगोई की जमानत याचिका गुवाहाटी हाईकोर्ट ने की खारिज
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने गुरुवार (7 जनवरी 2021) को ‘एक्टिविस्ट’ अखिल गोगोई की जमानत याचिका खारिज की दी। वह देशद्रोह और सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने सहित कई आरोपों में दिसंबर 2019 से जेल में बंद है। हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए विशेष एनआईए कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अखिल को असम में ऐंटी सीएए हिंसा में उसकी भूमिका को लेकर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 

उच्च न्यायालय ने एनआईए की एक विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें गोगोई के खिलाफ दर्ज 13 मामलों में से एक मामले में जमानत याचिका खारिज कर दिया गया था। बता दें कि गोगोई को इस मामले के अलावा सभी अन्य मामलो में जमानत मिल चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि असम में जो ऐंटी सीएए आंदोलन हुआ था वह सत्याग्रह नहीं था, बल्कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में परिभाषित टेररिस्ट ऐक्ट के तहत आता है। जस्टिस कल्याण राय सुराना और अजीत बाठकुर की बेंच ने आदेश में कहा, “हिंसा का इस्तेमाल करते हुए अखिल के नेतृत्व वाली भीड़ ने अहिंसक आंदोलन की अवधारणा को ही खारिज कर दिया था। आंदोलन के जरिए सरकारी मशीनरी को कमजोर करने, आर्थिक नाकेबंदी, समुदायों के बीच नफरत फैलाने और शांति में बाधा उत्पन्न करके सरकार के प्रति अंसतोष पैदा करने की कोशिश की गई थी।” कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधि यूएपीए की धारा 15 के तहत आतंकी कार्य के रूप में परिभाषित है।

इसमें कोई दो राय नहीं, सीसीए विरोध में दिल्ली में भी "हिन्दुत्व विरोधी", "हिन्दू विरोधी", "मोदी और योगी विरोधी" आदि नारों का क्या मतलब था?(देखिए चित्र) और संविधान की दुहाई देने वाली बेशर्म पार्टियां चुप्पी साधे रहीं। हाँ, अगर नारे विपरीप होते यही बेशर्म पार्टियां "गंगा-जमुनी तहजीब" आदि स्वांग भरे बोल बोल रहे होते। जो इस बात को सिद्ध करता है कि सीसीए विरोध की आड़ में भारत में अराजकता फैलाना ही इनका मुख्य उद्देश्य था। 

गोगोई ने एनआईए द्वारा असम में सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में दर्ज दो मामलों में से एक में जमानत हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी। यह एकमात्र मामला बचा था जहाँ विशेष एनआईए अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। गुवाहाटी कोर्ट की एक खंडपीठ ने एनआईए अदालत के फैसले को बरकरार रखा और गोगोई द्वारा दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

अखिल गोगोई, कृषक मुक्ति संग्राम परिषद और राइजोर दल का नेता है। संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ कथित हिंसक प्रदर्शन के मामले में गोगोई को जोरहाट से दिसंबर 2019 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वह गुवाहाटी केंद्रीय कारागार में बंद है।

यह मामला शुरू में गुवाहाटी के चंदमारी पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में इसे एनआईए को ट्रांसफर कर दिया गया। गोगोई पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, राजद्रोह, आपराधिक साजिश, आतंकवादी संगठनों को समर्थन, सहित अन्य आरोप लगाए गए हैं। 

उसे 12 दिसंबर 2019 को CAA के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था। केंद्र सरकार द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से संबंधित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए यह कानून पारित किया गया था। उसके तीन साथियों को एक दिन बाद गिरफ्तार किया गया था।

गोगोई को बाद में एनआईए को सौंप दिया गया और एक अदालत ने उसे 17 दिसंबर को एजेंसी की 10 दिन की हिरासत में भेज दिया। उसे पूछताछ के लिए नई दिल्ली भी लाया गया। गोगोई को 25 दिसंबर को वापस गुवाहाटी ले जाया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में है।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : ‘मैंने ही लोगों से कहा- पत्थर, तेजाब, पेट्रोल व हथियारों को इकट्ठा करें’: उमर खालिद

कट्टरपंथी मुस्लिम और हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद ने कथित तौर पर पुलिस के सामने कबूल किया है कि वह मुस्लिम समूहों को संगठित करने, उन्हें उकसाने और बड़े पैमाने पर हिंसा की साजिश रचने में शामिल था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, 2020 की शुरुआत में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के हिंदू विरोधी दंगों के सिलसिले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद के खिलाफ बुधवार(दिसंबर 30) को चार्जशीट दाखिल की थी। 100 पन्नों की चार्जशीट में उमर खालिद पर दिल्ली की सड़कों पर दंगे भड़काने, दंगों की साजिश रचने, देश विरोधी भाषण देने और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

खबरों के अनुसार, उमर खालिद ने खुद अपने आरोपों को स्वीकार किया है कि उसने मुस्लिम संगठनों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। उमर खालिद ने दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में मुस्लिमों को नए कानून के खिलाफ भड़का कर हिंसा की साजिश रचने और महिलाओं व बच्‍चों का इस्‍तेमाल कर पूरी दिल्ली में चक्का जाम करने से संबंधी कई खुलासे किए हैं।

क्राइम ब्रांच ने चार्जशीट में दंगों के मास्टमाइंड को लेकर कहा है कि 8 जनवरी को शाहीन बाग में उमर खालिद, खालिद सैफी और ताहिर हुसैन ने मिलकर दिल्ली दंगों की प्लानिंग के लिए एक मीटिंग की थी। दंगों को पूरे देश में भड़काने के लिए उमर खालिद ने कई राज्‍यों का दौरा किया भी किया था। इस दौरान उसने भड़काऊ भाषण देकर नागरिकता कानून के खिलाफ लोगों को दंगे के लिए उकसाया था।

पुलिस को दिए बयान में उमर ने कबूला, “2019 में जिस तरह से संसद में भारत सरकार ने नागरिकता संसोधन बिल पेश किया। उसके बाद मैंने अपने साथी जो यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सदस्य थे, हम सब ने मिलकर एक मीटिंग की कि एंटी सीएए (CAA) बिल मुसलमानों के खिलाफ है। इसके लिए हमें आवाज उठानी चाहिए। मेरी बात पर यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सदस्य सहमत हो गए। तब हमने योजना बनाई की JNU और जामिया (Jamia) के मुस्लिम छात्र मिलकर इस बिल के खिलाफ आवाज उठाते है क्योंकि भारत सरकार बिना दबाव बनाए इस बिल को वापस नही लेगी। जिसके बाद हमने यूनाइटेड अगेंस्ट हेट, जेएनयू और जामिया के मुस्लिम छात्रों को इकट्ठा करने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, जिसमें देखते ही देखते काफी लोग इकट्ठा हो गए।”

उमर ने आगे कहा, “फिर हमने जंतर-मंतर पर धरने प्रदर्शन किए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किए। जिसके बाद मैंने अपने साथियों के साथ मीटिंग की और आंदोलन को अगले पड़ाव पर ले जाने की प्लानिंग बनाई। जिसके लिए हमने बच्चों और औरतों को आगे रखकर पूरी दिल्ली में चक्का जाम करने की योजना बनाई। इसके लिए बाकायदा एक और नया व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया ‘हम भारत के लोग’ नाम से। उधर तब तक एंटी CAA बिल लोकसभा में पास कर दिया गया था और यह एक कानून बन गया।”

उसने आगे बताया, “इसके बाद हमने योजना बनाई कि हमें और सख्त तरीक़े से चक्का जाम करने की जरूरत है। हमने 16 और 17 फरवरी की शाम एक मीटिंग में तय किया कि दंगा ही एक मात्र तरीका है जिससे भारत सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है। फिर मैंने ही लोगों से कहा कि वो अपने पास पत्थर, तेजाब, पेट्रोल और हथियारों को इकट्ठा करके रखें और जब जरूरत पड़ेगी इसका इस्तेमाल करें।”

खालिद ने खुलासा किया कि, वह दिल्ली में करीब 23-24 जगह चल रहे एंटी CAA प्रदर्शनो में शामिल हुआ था। “मैं अमरावती और महाराष्ट्र भी प्रदर्शन में शामिल होने गया था। जहाँ मैंने कहा की हम सब डोनॉल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान 24 फरवरी को सड़कों पर आकर भारत सरकार पर दबाव बनाएँगें और हमारे लोगों ने अपनी योजना के मुताबिक डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के दौरान ही 24 तारीख को दिल्ली के अलग-अलग इलाको में चक्का जाम दंगे करवाना शुरू कर दिए। देखते ही देखते उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाको में दंगे फैल गए।”

खालिद को पुलिस ने 14 सितंबर को भयावह पूर्वोत्तर दिल्ली दंगों में कथित रूप से शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया था। पुलिस ने जाँच के लिए उसे समन जारी किया था जिसके बाद वह गिरफ्तार कर लिया गया।

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने हाल ही में दिल्ली दंगों के मामले में आरोपित 18 लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मंजूरी दे दी थी, जिसमें हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के मुख्य साजिशकर्ता कट्टरपंथी उमर खालिद, शरजील इमाम, AAP के पूर्व नेता ताहिर हुसैन और अन्य कई लोगों को देशद्रोह के आरोप में शामिल किया गया था।

इसके अलावा दिल्ली सरकार ने हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के मामले में नताशा नरवाल, देवांगना कालिता, पूर्व कॉन्ग्रेस नेता इशरत जहाँ और 15 अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी प्रदान कर दी है। बता दें साल 2020 की शुरूआत में हुए इस दंगे में लगभग 50 लोगों ने अपनी जान गँवाई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे।

दिल्ली दंगा और CAA विरोधी उपद्रव : ताहिर और इशरत जहाँ सहित 5 के खाते में हुई थी 1.61 करोड़ रुपए की फंडिंग

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत में नागरिकता संशोधक कानून कई वर्षों से तुष्टिकरण पुजारियों ने ठंठे बस्ते में डाला हुआ था, क्योकि उन्हें मुस्लिम वोट के खिसकने का डर सता रहा था। तुष्टिकरण पुजारी जानते थे कि इस कानून के बनने के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और रोहिंग्या मुसलमानों को बाहर निकालने का मतलब है अपने वोट बैंक को कठोर प्रहार होने से उनकी ही कुर्सी नहीं रहेगी। इस कारण इस कानून से ये सब दूरी बनाए हुए थे, लेकिन मोदी सरकार द्वारा इस कानून को बनाकर तुष्टिकरण पुजारियों के वोट बैंक पर हथौड़ा मारा जाने पर इन सब को बौखलाहट होने के कारण जगह-जगह शाहीन बाग़ बना कर समस्त देश को गुमराह कर रहे थे। 
दिल्ली सीएए विरोधी दंगों की फंडिंग को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। पता चला है कि कांग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहाँ, एक्टिविस्ट खालिद सैफी, आम आदमी पार्टी के पार्षद रहे ताहिर हुसैन, जामिया मिल्लिया इस्लामिया एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष शिफा उर रहमान और जामिया के ही मीरान हैदर को हिन्दू-विरोधी दंगों के लिए 1.61 करोड़ रुपए की फंडिंग मिली थी। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में ये खुलासा हुआ है।
नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में हुए दंगों को लेकर पुलिस ने 15 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है, जिन्होंने इस पूरे वारदात की साजिश रची। दिसंबर 10, 2019 को ही इशरत जहाँ के बैंक अकाउंट में एक कॉर्पोरेशन बैंक अकाउंट से 4 लाख रुपए पहुँच गए थे। जाँच में पता चला कि ये अकाउंट मूल रूप से महाराष्ट्र के महादेव विजय कस्ते के नाम से रजिस्टर्ड है। महादेव को इस बारे में कुछ पता नहीं था। वो समीर अब्दुल साई नामक व्यक्ति के पास बतौर ड्राइवर कार्यरत थे।
महादेव ने बताया कि उन्होंने समीर अब्दुल साई के कहने पर आईसीआईसीआई बैंक से 4.137 लाख का गोल्ड लोन लिया और बैंक द्वारा इतनी ही रकम उनके कॉर्पोरेशन बैंक अकाउंट में डाली गई। इसके बाद साई ने उसमें से 4 लाख रुपए इशरत जहाँ को भेजे। साई ने पूछताछ में खुलासा किया कि गाजियाबाद का इमरान सिद्दीकी उसका बिजनेस पार्टनर है। दिसंबर 2019 में उसने इशरत जहाँ, गुलजार अली और बिलाल अहमद के बैंक अकाउंट डिटेल्स देकर उनमें तुरंत 10-10 लाख रुपए ट्रांसफर करने को कहा था।
जब साई ने इतनी रकम भेजने में असमर्थता जताई तो फिर उसने इशरत जहाँ के अकाउंट में 5 लाख रुपए तुरंत डालने को कहा। वहीं इमरान रिश्ते में इशरत का देवर लगता है और उसने इशरत से 4 लाख रुपए लिए थे। उसने दावा किया कि ये रकम उसने बिजनेस के लिए ली थी। हालाँकि, उसे अपने आईटी रिटर्न में न सिर्फ ये बातें छिपाई, बल्कि पूछताछ में उन रुपयों के खर्च का हिसाब-किताब भी नहीं दे पाया।
वहीं जाँच में आगे पता चला कि इशरत जहाँ ने जनवरी 10, 2020 को खुद ही अपने बैंक अकाउंट से 4.609 लाख रुपए की निकासी कैश के रूप में की थी। जाँच में पता चला कि इस रकम का इस्तेमाल उसने अपने परिचित अब्दुल खालिद के माध्यम से हथियार खरीदने और सीएए विरोधी प्रदर्शनों की फंडिंग में की थी। इन हथियारों का दंगों में इस्तेमाल हुआ। दिसंबर 1, 2019 से फ़रवरी 26, 2020 तक ताहिर हुसैन से जुड़े एक बैंक अकाउंट से भी 17.25 लाख रुपए निकाले गए।
साथ ही ‘श्री साई ट्रेडर्स’ को आरटीजीएस के जरिए जनवरी 7 को 20 लाख रुपए, जनवरी 13 को 10 लाख रुपए और जनवरी 14 को 14 लाख रुपए और फिर उसी दिन 16 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए थे। ताहिर हुसैन ने 60 लाख रुपए को कैश में बदलने के लिए ये सब किया और इसके लिए उसने कमीशन चैनल का सहारा लिया। ताहिर हुसैन ने लोगों को दंगों के लिए जुटाने, हथियार व अन्य चीजों की व्यवस्था करने और विरोध प्रदर्शनों को संचालित करने में बड़ी रकम खर्च की।
जामिया मिल्लिया इस्मालिया के एलुमनाई असोसिएशन ने इसमें बड़ा किरदार अदा किया। AAJMI के दो बैंक एकाउंट्स थे। ऊपर दी गई अवधि में इनमें से एक बैंक अकाउंट में 87.5 हजार रुपए डाले गए। शिफा उर रहमान ने सीएए विरोधी प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए 70,000 रुपए निकाले थे। AAJMI को इन कार्यों के लिए कुल 7.6 लाख रुपए मिले थे। इनमें से 5.55 लाख रुपए विदेश में कार्यरत जामिया के पूर्व छात्रों ने भेजे।
इस मामले में और जाँच जारी है लेकिन इतना खुलासा हुआ है कि इस फंडिंग को छिपाने के लिए अलग-अलग खर्चों का फेक बिल भी तैयार किया गया था। सऊदी, यूएई, ओमान और क़तर से जामिया के पूर्व छात्रों ने रुपए भेजे थे। मीरान हैदर के अकाउंट में भी इस अवधि में 86,644 रुपए ट्रांसफर हुए थे। उसके पास से मिले रजिस्टर के हिसाब से उसे दंगों को भड़काने के लिए 4.825 लाख रुपए प्राप्त हुए थे। इससे साफ़ है कि दिल्ली दंगों की फंडिंग के लिए ताहिर और इशरत सहित इन पाँचों ने जम पर फंडिंग का जुगाड़ किया था।