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189,00,00,000 रूपए इस मॉनसून सत्र में बर्बाद करेगा बेगैरत विपक्ष? मोदी सरकार ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा को तैयार, फिर भी जारी है हुड़दंग

बेसिर पैर का हंगामा कर जनता के धन को बर्बाद करता INDI गठबंधन 
सोमवार (21 जुलाई, 2025 को संसद का मॉनसून सत्र चालू हुआ, जो 21 जुलाई 2025 से 21 अगस्त, 2025 तक चलेगा। 32 दिनों वाले इस सत्र में 21 बार संसद की बैठक होगी। विपक्ष के हंगामे के चलते संसद का पहला दिन ही कामकाज के मामले में ठप हो गया। पहले प्रश्न काल के दौरान व्यवधान हुआ तो 12 बजे तक लोकसभा की कार्यवाही रोकी गई, फिर हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही 2 बजे तक रोक दी गई।

संसद में हंगामा और कार्यवाही रुकना कोई विचित्र बात नहीं है। दुनिया भर की सांसदों में यह होता है। लेकिन लगातार पूरे-पूरे दिन संसद ना चलने देना और पहले बैठकों में सहमति बनाने के बाद भी डेडलॉक पैदा करना भारत के विपक्ष की आदत बन गई है। अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि लोग पहले ही बता देते हैं कि संसद का सत्र चालू होने से पहले या तो कोई रिपोर्ट आएगी या कोई ऐसा मुद्दा उठेगा जिस पर हंगामा होगा, इसके बाद संसद सत्र बर्बाद होगा।

संविधान की रक्षा करने का रोना रोने वाले INDI गठबंधन को ना ही महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और ना ही अन्य संवैधानिक संस्थाओं तक का सम्म्मान नहीं करता। क्या ऐसे बेगैरत INDI गठबंधन से देश के सम्मान की कल्पना की जा सकती है, ये सबसे बड़ा प्रश्न है, जिसका जवाब जनता को इस ठग INDI गठबंधन से पूछनी चाहिए। इस तरह का बेगैरत विपक्ष भारत ने कभी नहीं देखा। क्या ये INDI गठबंधन वर्तमान युग का जयचन्द गैंग है?            

कार्यवाही रुकना यानी करोड़ों की बर्बादी

मॉनसून सत्र का पहले ही दिन हंगामा भरा होना कोई शुभ संकेत नहीं है। यह सत्र 32 दिन चलने वाला है और इसमें 21 दिन संसद की बैठक होगी। नियमानुसार, हर दिन संसद के दोनों सदन 6 घंटे काम करते हैं। यह समय घट-बढ़ भी सकता है।

लेकिन 21 दिन भी संसद चले और 6 घंटे भी काम करे तो इस पर भारी-भरकम खर्च होता है। यह खर्च जनता के पैसे का होता है, जिसे हम टैक्स कहते हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव PDT आचार्य ने कई वर्षों पहले बताया था कि संसद का एक मिनट चलाने पर भी 2.5 लाख रूपए का खर्च होता है।

इसमें सांसदों की तनख्वाह, बिजली-पानी के बिल समेत बाकी खर्च शामिल होते हैं। यह खर्च अभी तक काफी बढ़ गया होगा। लेकिन 2.5 लाख रूपए खर्च आज भी प्रति मिनट माना जाए, तो इस मॉनसून सत्र पर सैकड़ों करोड़ खर्च होने वाले हैं।

सीधी गणित के हिसाब से इस संसद सत्र पर 2.5 लाख रूपए/मिनट के हिसाब से 189 करोड़ रूपए खर्च होने हैं। 21 दिन में संसद 126 घंटे चलने वाली है। यानी इसकी कार्रवाई 7560 मिनट चलेगी। इन 7560 मिनटों को 2.5 लाख रूपए से गुना करे तो यह 189 करोड़ रूपए की धनराशि खर्च होगी।

संसद के खर्च इसके अलावा और भी होते हैं, जैसे सांसदों को संसद सत्र के दौरान आने का हर दिन का 2500 रूपए भत्ता भी मिलता है। ऐसे में यह खर्च बढ़ता ही है, देश के लोकतंत्र के मंदिर पर खर्च हो, इससे किसी को ऐतराज नहीं है, लेकिन जिस तरह से इस सत्र की शुरुआत हुई है उससे अच्छे आसार नहीं लगते।

सरकार इस सत्र के पहले हुई सर्वदलीय बैठक में कह चुकी है कि वह ऑपरेशन सिंदूर समेत सभी मुद्दों पर बात करने को तैयार है। विपक्ष की माँग थी कि इस दौरान बिहार में चुनाव आयोग की पुनरीक्षण प्रक्रिया पर बात हो और एअर इंडिया हादसे को लेकर भी बात हो।

सरकार ने इसके लिए भी हामी भरी थी। हालाँकि, पहला दिन ही हंगामे की भेंट चढ़ा दिया गया। ऐसे में यह आशंका और गहरी हो जाती है कि इस बार भी जनता ठगी सी रह जाएगी और लगभग 200 करोड़ रूपए को सिर्फ तख्तियों और हंगामों में सिमटता देखेगी।

पहले के सत्र भी हो चुके बर्बाद

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब संसद का सत्र शुरू होने से पहले ही उसे बर्बाद करने की ठान ली गई हो। विपक्ष ने इस बार मॉनसून सत्र मुद्दा बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया और ऑपरेशन सिंदूर तथा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान बनाए हैं लेकिन इससे पहले भी हर बार संसद सत्र को बर्बाद करने की पटकथा लिख ली जाती है।

विपक्ष ने पेगासस स्नूपिंग के आधारहीन आरोपों के लेकर राफेल और अडानी-हिंडनबर्ग तक के मुद्दे उठाए हैं। यह मुद्दे संसद क सत्र बर्बाद करने में बड़ा कारण रहे हैं। बजट सत्र 2023 को बर्बाद करने के लिए कांग्रेस और विपक्ष ने अडानी के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा प्रकाशित हिट जॉब वाली रिपोर्ट मुद्दा उठाया था और पूरा सत्र बर्बाद कर दिया था।

इसी सत्र के पहले BBC की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनाई प्रोपेगेंडा डाक्यूमेंट्री को लेकर भी बवाल विपक्ष ने किया था। 2023 के ही शीत सत्र के पहले एप्पल फोन की नोटिफिकेशन पर बवाल विपक्ष ने मचाया था। हालाँकि, यह मुद्दा बड़ा बनता लेकिन एप्पल ने सफाई दे दी।

इससे भी 2021 में मॉनसून सत्र के पहले पेगासस की स्टोरी को लेकर बवाल मचाया गया था और दावा किया गया था कि सरकार स्नूपिंग में लिप्त है। यह कहानी बाद में झूठी निकली लेकिन संसद का सत्र बर्बाद हो गया। इसमें भी जनता का अरबों रुपया बर्बाद हुआ।

2021 में राहुल गाँधी ने राफेल विमान खरीद में घोटाले का कथित मामला उठाया। यह विदेशी मीडिया में कुछ रिपोर्ट्स आने के बाद उठाया गया था। इसको लेकर 2021 में संसद के सत्र हंगामे भरे रहे। राफेल मामले में हवा-हवाई दावे संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक नहीं टिक पाए। लेकिन संसद का समय बर्बाद होता गया।

इस दौरान जिस समय का उपयोग देश में नए कानून की चर्चा, पुराने कानूनों में सुधार करने और जनता के प्रश्न उठाने के लिए होना चाहिए था, उसका उपयोग विपक्ष ने तख्तियाँ उछालने और हंगामा मचाने में किया। विपक्ष ने इस दौरान कई मौकों पर डेडलॉक की स्थिति पैदा की और संसदीय काम जहाँ का तहाँ लटक गया।

क्यों चिंताजनक है यह ट्रेंड?

संसद को चलाना पक्ष और विपक्ष दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है। संसद का कम दिनों चलना और कम काम करना चिंताजनक इसलिए भी है कि इससे व्यवस्था के दूसरे हिस्सों को प्रभाव बढ़ाने का मौक़ा मिलता है। एक रिपोर्ट बताती है कि जहाँ पहली लोकसभा (1952-57) साल में 135 दिन बैठी तो वहीं 17वीं लोकसभा (2019-24) मात्र 55 दिन चली।

इससे भी चिंताजनक यह ट्रेंड है कि इन 17वीं लोकसभा का लगभग 50% समय हंगामे और बवाल की भेंट चढ़ गया। इससे जहाँ एक ओर जनता का पैसा बर्बाद होता है तो वहीं दूसरी तरफ महत्वपूर्ण विधेयकों पर तक चर्चा नहीं हो पाती।

ऐसे में विपक्ष को सिर्फ हंगामे की जगह अपने तर्क और सबूत के आधार पर संसद में सरकार को घेरने की नीति बनानी चाहिए ना कि कार्यवाही पर ही ग्रहण लगा देना चाहिए। इससे जनता का विश्वास बढ़ेगा ही, देश का लोकतंत्र मजबूत होगा और सरकारी पैसे की बर्बादी रुकेगी।

बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और ब्लिट्ज के संपादक शोएब चौधरी के चौकाने वाले खुलासों पर सोनिया परिवार और समस्त विपक्ष में मातम क्यों ? देखिए वीडियो

सड़क से लेकर संसद को सिर उठाने वाली कांग्रेस और समस्त विपक्ष बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और ब्लिट्ज के संपादक शोएब चौधरी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के संबंध में एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे पर अशांत क्यों है? यदि यही खुलासे किसी भारतीय ने कर दिए होते, पता नहीं कितने मुकदमें करने के साथ-साथ गिरफ़्तारी के लिए धरने और प्रदर्शन हो रहे होते। ये वही शोएब चौधरी है जिसने राहुल गाँधी के बच्चे होने का खुलासा किया है। शोएब के खुलासों की सच्चाई जानने के लिए कांग्रेस समर्पित यूपीए सरकार में गिरफ्तार स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित की गिरफ़्तारी की सच्चाई को सार्वजनिक करने का समय आ गया है। विशेषकर कर्नल पुरोहित की। लेकिन उस समय कांग्रेस और इसकी समर्थक पार्टियां इस्लामिक आतंकवाद को संरक्षण देने 'हिन्दू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' का नाम देकर हिन्दुओं को कलंकित करने में व्यस्त थे और मूर्ख हिन्दू इनके दुष्प्रचार का शिकार होता रहा।

     
2024 लोकसभा चुनावों में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हराने विपक्ष भारत विरोधी विदेशियों के हाथ की कठपुतली बने रहने के समाचार सुर्ख़ियों में थे, लेकिन लालची और पागल मतदाता इनके झांसे में आकर मोदी के विरुद्ध मतदान करते नज़र आए। मोदी विश्व का ऐसा विचित्र प्रधानमंत्री है जिसको थोक भाव में गालियां देकर अपमानित किया गया है, लेकिन विपक्ष के गले की फांस तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गयी।
गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग को शोएब द्वारा गाँधी परिवार पर लगाये गंभीर आरोपों का संज्ञान लेकर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।

जिन ख़ानदानों में सत्ता पाने के लिए अपने अपनो को भी रास्ते से हटा देने का इतिहास हो, वे परिवार से बाहर वालों के लिए तो कुछ भी करवाना कौन-सी बड़ी बात है। जो मीडिया जिनके दरबार में होने पर गर्व महसूस करता हो , वह उसके बारे में क्या कुछ असलियत बोलने की हिम्मत कैसे करेगा। पर जो व्यक्ति किसी भी शक्तिशाली व्यक्ति के बारे कुछ कड़वे सच बोलेगा तो वह जानता ही होता है कि बिना किसी तथ्य के अगर बोलेगा तो भयानक परिणाम भुगतने ही पड़ेगा।

जनता के सामने ये सच्चाई को सामने लाने के लिए आप दोनों को ही बहुत धन्यवाद आज भारत के सभी सनातनी अपनी आँखों में लगी पट्टी खोल लें, कानों में लगी रुई निकाल लें और इस राष्ट्र के विरुद्ध होनेवाली विनाशकारी षड्‌यंत्रों के प्रति सावधान हो जाएं वैसे मैंने कुछ समय पहले अपने साथियों और दोस्तों से कहा था कि इस ' बैल बुद्धि ' मानव की अम्मी जान यानि माईनो वास्तव में एक C.I.A. एजेंट है जिसे Plant किया गया है

बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और ब्लिट्ज के संपादक शोएब चौधरी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के संबंध में एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। सोनिया के राजीव गांधी से शादी से पहले के रिश्तों, उनके परिवार की बैकग्राउंड, उनके जन्म और जन्म स्थान को लेकर भी कई नए तथ्य सामने लाने का दावा उन्होंने कर दिया है, जो उनके ऑनलाइन एडिशन पर भी उपलब्ध है। राहुल गांधी की पत्नी है, दो बच्चे हैं। उनके दूसरे अफ़ेयर्स के बारे में, उनके बिज़नेस के संबंध में, लंदन से लेकर म्यांमार तक की उनकी यात्राओं के रहस्य के बारे में भी उन्होंने खुलासे किए हैं। उन्होंने दावा किया है कि इस संबंध में उनके पास सबूत हैं। 

साथ में चुनौती दी है कि मुझे गांधी परिवार अदालत में घसीटे ताकि मैं सारे तथ्यों को अदालत के ज़रिए सामने ला सकूँ और उसके बाद वो सब मीडिया के ज़रिए दुनिया को पता लगे। बांग्लादेश में तख्ता पलट के बाद उन्होंने राहुल गांधी की इसमें भूमिका को लेकर लोगों को चौंका दिया था। तभी से वह लगातार उनके परिवार पर अटैक कर रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि राहुल-सोनिया या कांग्रेस की ओर से न तो उनके द्वारा उजागर की जा रही कहानियों का खंडन किया जा रहा है, न उन्हें चुनौती दी जा रही है। OCN Network के संपादक ओमकार चौधरी ने शोएब चौधरी से इन खुलासों पर यह ख़ास बातचीत की है।

 

अवलोकन करें : -

तुम वो ही बात क्यों पूछते हो, जो बताने के काबिल नहीं है! हर बात पर ज्ञान पेलने वाला राहुल गांधी अप

हे भारत के विपक्ष! माना तुम खलिहर हो पर ‘राजा का डंडा’ नहीं है सेंगोल, भारत की स्वतंत्रता का वह प्रतीक है जिसे तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने कर दिया था दफन; विपक्ष क्यों भारतीय इतिहास से डर रहा है?

                                                           सेंगोल से विपक्ष को क्या समस्या?
यह कटु सत्य है कि इतिहास दोहराया जाता है, जिसे आज(जून 27) विपक्ष के नाम पर लोक सभा में सांसद के रूप में पहुंचे जयचन्द वंशज साकार करने का प्रयत्न कर रहे हैं। अगर जयचन्द नहीं होता, देश से हिन्दू साम्राज्य नहीं जाता। यह देश का दुर्भाग्य है कि जब संसद में सेंगोल की स्थापना की गयी थी, तब इसका इतिहास भी बताया गया था, उसके बावजूद जब सांसद ही हटाने की आवाज़ उठाएं, मतलब जनता को समझ जाना चाहिए और ऐसे लोगों को वोट देकर संसद में पहुँचाने का खेद व्यक्त करना चाहिए। इन्हीं जैसों की वजह से गौरवशाली हिन्दू साम्राज्य को धूमिल कर गाज़ियों, जिन्हें मुग़ल बादशाह कहलवाया  जाता है, के खुनी अत्याचारों को पर्दा डाल महान बता दिया गया। एक गाज़ी और बादशाह में बहुत गहरा फर्क होता है। या चालू भाषा में पूछा जाए कि क्या ISIS को क्या कहोगे? सेंगोल का विरोध करने सांसदों को भारत के वास्तविक इतिहास को पढ़ने की उसी तरह जिस तरह किसी अनपढ़ को शिक्षित होने के लिए स्कूल जाने की। जब सांसद ही भारत के वास्तविक इतिहास से अज्ञान होगा, देश का क्या हित करेगा?  

लोकसभा सदन शुरू होने के बाद विपक्ष द्वारा हाल में सेंगोल को संसद से हटाने की माँग उठाई गई है। बहस छेड़ने वाले समाजवादी पार्टी के सांसद आर के चौधरी हैं। उन्होंने सेंगोल को ‘राजा का डंडा’ बताया है और पूछा है कि क्या इससे सरकार चलेगी। उन्होंने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि सेंगोल संसद में नहीं होना चाहिए। संसद लोकतंत्र का मंदिर है किसी राजे-रजवाड़े का महल नहीं। इसे हटाकर वहाँ भारतीय संविधान की विशालकाय प्रति स्थापित की जानी चाहिए।

सपा सांसद द्वारा उठाए गए इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं द्वारा इस माँग का समर्थन किया गया है। इसी तरह सेंगोल को हटाने की माँग आरजेडी लीडर मीसा भारती ने भी की। उन्होंने कहा कि ये लोकतंत्र है राजतंत्र नहीं… सेंगोल हटना चाहिए। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नेता संजय राउत ने इस मुद्दे पर कहा कि वो अपने गठबंधन के साथ बैठ इस पर निर्णय लेंगे। संविधान अहम है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने विपक्ष की ऐसी बातों को सुन हैरानी जताई और ‘बेतुकी’ बताते हुए कहा कि सेंगोल किसी कीमत में संसद से नहीं हट सकता।

अब पक्ष-विपक्ष में सेंगोल पर छिड़ी बहस में आगे बढ़ने से पहले समझते हैं कि आखिर ये है क्या और इसकी महत्वता क्या है, भारत के प्राचीन इतिहास में इसे क्यों इतना जरूरी माना गया और क्यों इसे स्वतंत्रता का प्रतीक कहते हैं।

सेंगोल का प्राचीन इतिहास

सेंगोल का इतिहास भारत में चोल वंश के साथ जुड़ा हुआ है। चोल साम्राज्य भारत के सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक राज करने वाले राजवंशों में से एक रहा है। 300 ईसापूर्व में भी इसका वर्णन मिलता है। 1500 से भी अधिक वर्षों तक इस राजवंश ने शासन किया। बताया जाता है कि चोल राजा शिवभक्त होते थे इसीलिए इनके राजदंड यानी सेंगोल में सबसे ऊपर भगवान शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा है।
सेंगोल को शुरुआती काल से ही सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक माना जाता रहा है। पुराने सय में पुरोहितों द्वारा इसे उस शासक को सौंपा जाता था जब उसके शासन का शुभारंभ होता था। भारत में इसकी महत्वता उसी काल से थी। बीच में मुगल काल और अंग्रेजों का राज शुरू होने के बाद इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे ही देश को स्वतंत्रता मिली ‘सेंगोल’ दोबारा प्रासंगिक हुआ।

स्वतंत्रता का प्रतीक है सेंगोल, जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण के चलते नहीं दी तवज्जो

1947 में जब देश को आजादी मिली उस समय में एक विडंबना ये खड़ी हुई कि आखिर सत्ता हस्तांतरण होगा कैसे? इसका प्रतीक क्या होगा? कैसे पता चलेगा कि अंग्रेजों ने भारत को छोड़ दिया है? इसी समस्या के समाधान के लिए अंग्रेजों के अंतिम गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू के पास गए। उन्होंने उनसे पूछा कि आखिर आपके देश में सत्ता हस्तांतरण को लेकर क्या रीति-रिवाज हैं, वो उसके मुताबिक आगे की प्रक्रिया करेंगे।
अब जवाहरलाल नेहरू, इस सवाल का जवाब कैसे देते, उन्होंने तो देखा ही सिर्फ अंग्रेजों का रहन-सहन था। यही वजह है कि सत्ता हस्तांतरण के बारे में जानकारी लेने की जगह वह ‘स्वतंत्रता पार्टी’ के संस्थापक रहे चक्रवर्ती राजगोपालचारी से इस बारे में पूछा, जो भारतीय संस्कृति की गहरी समझ रखते थे।
उन्होंने नेहरू को पुरानी संस्कृति के बारे में बताया और समस्या का समाधान ‘सेंगोल’ के रूप में किया। इसके बाद करीबन 15 हजार रुपए में इसे मद्रास के प्रसिद्ध ज्वैलर्स वुम्मिडी बंगारू चेट्टी एंड सन्स द्वारा तैयार किया गया। फिर आखिर में विधि अनुष्ठान करवाकर, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ये सेंगोल जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया और 14 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण का अनुष्ठान पूरा हुआ … भारत में लोकतंत्र कायम हुआ। आगे देश का दुर्भाग्य कहिए या फिर सेकुलर नेताओं की हिंदूविरोधी मानसिकता कि आजादी के इस प्रतीक को न तो नेहरू ने खुद तवज्जो दी न कि कॉन्ग्रेस ने।

PM मोदी ने पता लगते ही सेंगोल को दिया सम्मान

साल 2021 में प्रधानमंत्री मोदी को एक खत के जरिए सेंगोल के बारे में पता चला। यह खत चर्चित डांसर पद्म सुब्रमण्यम ने उन्हें लिखा था। अपने लेटर में उन्होंने पीएम मोदी को सेंगोल के बारे में बताया था। पीएमओ ने इस लेटर को गंभीरता से लिया और संस्कृति मंत्रालय इस सेंगोल की खोज में जुटी। आखिरकार पता चला कि ये सेंगोल इलाहाबाद के म्यूजियम में रखा हुआ है। सेंगोल के अस्तित्व को कंफर्म करने के लिए मंत्रालय की टीम वुम्मिडी बंगारू चेट्ठी परिवार से भी मिली जिन्होंने कंफर्म किया कि सेंगोल तैयार किया गया था।
सेंगोल की महत्वता जानने के बाद ही पीएम मोदी ने इसे संसद में अहम स्थान देने का संकल्प लिया और 2023 में नए संसद के उद्घाटन के साथ इसे भी वहाँ स्थापित किया गया और जन-जन को मीडिया के जरिए इसकी महत्वता के बारे में पता चला।

मुद्दे नहीं बचे तो सेंगोल के पीछे पड़ा विपक्ष

आज सदन में संख्या बढ़ने के बाद विपक्ष नेता जो सवाल खड़े कर रहे हैं कि ये ‘सेंगोल’ राजतंत्र में इस्तेमाल होता था लोकतंत्र में इसकी जरूरत नहीं, उन्हें ये सारा इतिहास पढ़ने-समझने की जरूरत है, ताकि उन्हें भी पता रहे कि भारत की संस्कृतियों से नफरत करने में वो इतना न गिरें कि स्वतंत्रता के प्रतीक को संसद से हटाने की बात छेड़ें। उनके लिए इस चिन्ह से नफरत केवल इसलिए है क्योंकि इसका संबंध प्राचीन भारत से है जहाँ वेदों का महत्व था।
विपक्ष द्वारा अचानक सदन की शुरुआत होने के बाद सेंगोल हटाने की माँग उठना सिर्फ ये दिखाती है कि उनके पास राष्ट्रहित से जुड़े या जनता से संबंधिक कोई मुद्दा नहीं बचा है। वो सत्ताधारी पक्ष को जनता के हित में काम करने की सलाह या तरीके बताने की बजाय अपने में ही उलझे हुए हैं। हाल में उन्होंने इमरजेंसी का विरोध करने पर संसद के बाहर जाने का प्रयास किया। मानो वो ठहरा रहे हो कि इमरजेंसी लोकतंत्र पर धब्बा नहीं था। उस मुद्दे के बाद वो अब सेंगोल का मुद्दा लेकर आए हैं। वो सेंगोल, जिसे लेकर सारी पार्टियों को कॉन्ग्रेस से सवाल करना चाहिए कि उन्होंने इतने वर्ष उसपर क्यों ध्यान नहीं दिया, वो पार्टियाँ अब एकजुट होकर आजादी के प्रतीक को गलत दिखाने की कोशिशों में हैं।

अकेले भाजपा जीत सकती है 350 सीटें; विपक्ष का प्रभावहीन और कमजोर नेतृत्व मुख्य कारण : सुरजीत भल्ला, अर्थशास्त्री


देश के नामी अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर भविष्यवाणी की है। उन्होंने दावा किया है कि भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर लगभग 350 सीटें जीत सकती है। इसी के साथ उन्होंने यह भी बताया कि तमिलनाडु में भाजपा को 5 सीटें मिल सकती हैं। सुरजीत भल्ला ने विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या मजबूत नेतृत्व का न होना बताया है।

सुरजीत भल्ला ने कहा कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर 330 से 350 सीटों के बीच जीत सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन भी पार्टियों के प्रचार में नरेंद्र मोदी शामिल हो रहे हैं, उनको साल 2019 के मुकाबले 2024 में 5 से 7 प्रतिशत अधिक वोटों का फायदा मिल सकता है।

अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला 20 अप्रैल को NDTV को दिए गए एक इंटरव्यू के दौरान कहीं। इस इंटरव्यू में एंकर ने उनके द्वारा लिखी गई किताब ‘हाउ वी वोट’ का जिक्र किया। इस किताब के एक चैप्टर में भारत की राजनीति का जिक्र है।

सुरजीत भल्ला ने विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस को लगभग 44 सीटें मिलने का अनुमान जताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालातों को देखते हुए कॉन्ग्रेस को 2014 के मुकाबले 2024 में लगभग 2% वोटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। सुरजीत ने विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या मजबूत नेतृत्व न होना बताया है।

विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे बेरोजगारी और आर्थिक हालातों के मुद्दों पर सुरजीत ने कहा कि ये वोटरों के मन पर बहुत असर नहीं डाल पाएँगे। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर में विपक्ष चुनी सरकारों के खिलाफ ऐसे मुद्दे उठाता रहता है।

इंटरव्यू के दौरान सुरजीत ने दक्षिण भारत में भाजपा के प्रदर्शन पर भी अपने विचार रखे। सुरजीत ने कहा कि साल 2024 में भारतीय जनता पार्टी तमिलनाडु में लगभग 5 या उस से अधिक सीटें जीत सकती है। वहीं केरल में उनके अनुमान से भाजपा की झोली में 1 या 2 सीट मिलने का अनुमान जताया है।

वोटरों के मन की बात का जिक्र भी अर्थशास्त्री ने किया। उन्होंने कहा कि लोग इस बात के लिए वोट देते हैं कि उनके द्वारा चुनी सरकार ने उन के जीवन को कितना सुधारा। जाति या लिंग का फैक्टर उन्होंने चुनावों पर बहुत कम असर डालने वाला बताया।

अहसानफरामोश फर्जी गांधी, देश से बस मांगता फिरता है; सारा विपक्ष सनातन का शत्रु; उदयनिधि स्टालिन को सीधी सजा का ऐलान करे सुप्रीम कोर्ट

 सुभाष चन्द्र

अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनने से पहले विपक्षी ये कहकर तंज कसते थे कि ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, तारीख नहीं बताएँगे।’ रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए, तो विपक्षी दलों ने ये कहकर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार किया कि ये बीजेपी का मंदिर है। विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने तमाम घृणा भरे बयान दिए, फिर भी बीजेपी के प्रति आम जन का समर्थन बढ़ता ही चला गया।

लेखक 
अब हताशा में आए विपक्षी नेता एक बार फिर से भगवान राम का ही नाम लेकर बीजेपी को निशाना बना रहे हैं। भले ही वो बीजेपी को निशाना बना रहे हों, लेकिन देश का आम जन अब उनके बयानों को अपने विरुद्ध समझने लगा है। इसके बावजूद उनकी आँखें खुलती नहीं दिख रही हैं। इसी कड़ी में विपक्ष की तीन सबसे बड़ी पार्टियों कॉन्ग्रेस, डीएमके और टीएमसी ने एक ही समय में अलग-अलग बयानों के माध्यम से फिर से भगवान राम और भारतीय के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन किया है। चाहे वो कॉन्ग्रेस के युवराज राहुल गाँधी हों, या डीएमसे के ए राजा… या फिर टीएमसी विधायक रामेंदु सिन्हा रॉय।

समूचा विपक्ष सनातन धर्म और भगवान राम का शत्रु बना हुआ है जिस किसी के मुंह में जो आ रहा है बक रहा है आज ममता की TMC के एक विधायक रामेंदु सिन्हा राय ने कह दिया कि श्रीराम मंदिर “अपवित्र” और कहा कि किसी हिन्दू को उस मंदिर में पूजा नहीं करनी चाहिए DMK का A Raja खुलकर बोला है कि हम राम के शत्रु हैं और पहले उसी ने उदयनिधि स्टालिन के सुर में सुर मिलाते हुए सनातन धर्म की तुलना HIV और Leprosy से की थी जबकि उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को डेंगू मलेरिया और कोरोना कहते हुए कहा था कि इसका  विरोध नहीं होना चाहिए बल्कि इसे ख़त्म कर देना चाहिए 

इसके अलावा भी स्वामी प्रसाद मौर्य और लालू की पार्टी और अन्य दलों के नेताओं ने सनातन धर्म, रामचरितमानस और भगवान राम के लिए अपमानजनक शब्द बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी राहुल “कालनेमि” या उसके “फर्जी गांधी” परिवार के किसी सदस्य ने किसी बात का विरोध नहीं किया बल्कि राहुल ने तो कुछ दिन पहले यहां तक कहा कि “भारत माता की जय” और “जय श्रीराम” का नारा लगाने वाले एक दिन भूखे मर जाएंगे

अभी एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें राहुल कालनेमि लोगों से पूछ रहा है कि “ये जो सोने की चिड़िया है, जिसे भारत माता कहते हैं और दुनिया भी इसे सोने की चिड़िया कहती है उसमे से मुझे कितना सोना मिला”

यह अहसानफरामोश देश से केवल मांगना जानता है लेकिन कभी यह नहीं बताता कि इसने देश के लिए क्या किया कितना सोना मिला यह जानने के लिए राहुल “कालनेमि” को पता होना चाहिए कि एक नाकाबिल निकम्मे आशिक व्यक्ति नेहरू की वजह से देश के टुकड़े हुए और वह प्रधानमंत्री बन गया और उसी वजह से आज यह आवारा सा फर्जी गांधी मौज कर रहा है 

राहुल “कालनेमि” बताएं कि पिछले चुनाव में उसने जो 15 करोड़ की संपत्ति घोषित की थी वह कहां से आई और जो सोनिया गांधी ने इस राज्यसभा के चुनाव में 12.80 करोड़ की संपत्ति घोषित की है वह कहां से आई जीजा जी और बहन के पास करोड़ो की जमीन कहां से आई समस्या यह है कि ये “फर्जी गांधी” खानदान देश को लूटना ही जानता है

कल सुप्रीम कोर्ट में उदयनिधि स्टालिन की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने अपील करते हुए कहा कि स्टालिन के खिलाफ 6 राज्यों में दायर सभी मुकदमों को एक जगह कर दिया जाए और इसके लिए उसने अर्नब गोस्वामी और नूपुर शर्मा के cases का हवाला दिया जबकि सच्चाई यह है कि दोनों के खिलाफ अलग अलग राज्यों में cases कांग्रेस ने ही दर्ज कराए थे और अर्नब के cases club करने का विरोध खुद अभिषेक मनु सिंघवी ने किया था

कल सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने उदयनिधि स्टालिन को बड़े संयमित अंदाज में कहा कि आप मंत्री हैं आपको पता होना चाहिए कि जो आपने कहा उसके परिणाम क्या हो सकते थे, बयान देते हुए सावधानी बरतनी चाहिए थी

दूसरी तरफ यह शालीनता नूपुर शर्मा के लिए नहीं दिखाई गई, उसके लिए तो जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत ने अदालत के इतिहास की सबसे भयंकर “hate speech” देते हुए उसे देश को आग लगाने के लिए जिम्मेदार कह दिया था

अब सवाल उठता है कि 22 सितंबर, 2023 को जो नोटिस बहुत हीलाहवाली के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उदयनिधि स्टालिन को दिया था, उसका जवाब देने की बजाय उसने cases को club करने की अपील की जिसका मतलब है वह अपने बयान को गलत नहीं बता रहा इसलिए ऐसे में उस पर कहीं कोई case चलाने की बजाय सुप्रीम कोर्ट को सीधे सजा का ऐलान कर देना चाहिए सुप्रीम कोर्ट ऐसा करने में सक्षम है अगर इच्छा शक्ति हो

INDI गठबंधन से नाराज हुए नीतीश कुमार तो JDU ने बुलाई बड़ी बैठक; क्या 2024 चुनाव से पहले ही गठबंधन कुनबा बिखर जाएगा?

INDI गठबंधन की हुई चौथी बैठक के बाद जनता यूनाइटिड दल के अध्यक्ष नाराज हैं। वहीं उनके एक सांसद ‘सुनील कुमार पिंटू’ ने विपक्षी बैठक को ‘बेनतीजा’ और ‘फ्लाप’ बताया है। उन्होंने कहा कि इस बैठक पर विपक्षी दलों की दृष्टि थी क्योंकि उन्हें लगा कि कोई मजबूत निर्णय निकलकर आएगा। लेकिन कल भी मीटिंग टांय-टांय फिस्स हो गई।

उन्होंने बताया पहले तो मीटिंग्स में चाय समोसे चलते थे पर अभी कांग्रेस ने खुद कह रखा है कि फंड की कमी है। लोग उन्हें डोनेट करें। जेडीयू सांसद ने कहा कि कल की मीटिंग तो बस चाय बिस्कुट पर रह हई समोसे भी नहीं आ पाए।

सीतामढ़ी से जदयू के सांसद सुनील कुमार पिंटू इससे पहले भी इंडी की बैठक के बारे में बोल चुके हैं कि वहाँ सिर्फ चाय समोसा पार्टी होती है। इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी तारीफ की थी। तीन राज्यों में मिली भाजपा की जीत पर कहा था ‘मोदी है तो गारंटी है’ के नारे पर जनता ने मुहर लगाई है। वह नेहरू पर भी निशाना साध चुके हैं।

उनके इन्हीं बयानों से खफा नाराज होकर जदयू ने उनसे उनका इस्तीफा माँग लिया था। जदयू ने उनसे नाराजगी जताते हुए कहा था कि उन्होंने पार्टी के नाम पर वोट लिया और अब पार्टी लाइन से हटकर बयानबाजी कर रहे हैं। रिपोर्ट्स बता रही हैं कि जदयू अगली बार सीतामढ़ से देवेश चंद्र ठाकुर को चुनाव लड़ा सकती हैं।

जदयू सांसद के बयान के अलावा यदि देखें तो इंडी गठबंधन की बैठक से नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव भी नजर आ रहे हैं। जदयू ने 29 दिसंबर को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (99 सदस्य) और राष्ट्रीय परिषद (200 सदस्य) की बैठक बुलाई है।

दरअसल, इंडी की बैठक को लेकर बताया गया है कि कल जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम बढ़ाया गया तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव नाराज होकर बैठक से जल्दी निकल गए।

खड़गे के नाम को विपक्षी गठबंधन की बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आगे बढ़ाया था। जबकि इससे पहले लालू यादव ने बिहार के सीएम नीतीश कुमार का नाम इस पद के लिए आगे बढ़ाने पर समर्थन दिया था। लेकिन विपक्ष की बैठक में इस नाम पर सहमित नहीं बनी। अपना नाम आगे होने पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर कोई भी फैसला चुनाव के बाद किया जाएगा।

जबकि हकीकत यह है कि गठबंधन में शामिल कोई भी पार्टी कांग्रेस को प्रधानमंत्री पद पर नहीं चाहता। यदि कांग्रेस के किसी भी नेता को प्रधानमंत्री मनोनीत किया जाने पर हार निश्चित है। दूसरे, खड़के को प्रधानमंत्री मनोनीत करने का मतलब अप्रत्यक्ष रूप से गाँधी परिवार का सत्ता में हस्तक्षेप, जो किसी को बर्दाश्त नहीं। 

अब जेडीयू की बैठक में पार्टी ने राष्ट्रीय पदाधिकारियों, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों, दोनों सदनों के सांसदों, जिलाध्यक्षों और समिति के सदस्यों को शामिल होने के लिए कहा है। पार्टी अध्यक्ष नीतीश कुमार के हाव-भाव देख मीडिया में कयास लगने लगे हैं कि शायद वो इन बैठकों में चौंकाने वाले निर्णय लें।

भयानक साजिश – प्रशांत किशोर और मोहता बानो द्वारा!

उगता भारत ब्यूरो 
विपक्ष बहुत ही भयावह साजिश पर काम कर रहा है।

पूरी तरह से जानते हुए, वे 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी और बीजेपी को नहीं हरा सकते हैं, और अच्छी तरह से जानते हुए, अगर वे हार गए तो उनके दिन गिने जाएंगे, वे बहुत ही भयावह साजिश पर काम कर रहे हैं।

यदि विपक्ष भाजपा और मोदी को हराने के लिए संयुक्त ताकत नहीं लगा सकता है, और अपना खुद का पीएम नहीं रख सकता है, तो उन्होंने कार्रवाई की दूसरी पंक्ति पर काम करना शुरू कर दिया है।

पीएम पद नहीं तो राष्ट्रपति पद क्यों नहीं?

विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में सभी दलों द्वारा समर्थित एक बहुत वरिष्ठ, अच्छी तरह से समर्थन करने के लिए अपनी संयुक्त ताकत लगा रहा है।

एक बार जब उन्हें अपना राष्ट्रपति मिल जाता है, तो वही सरकार के पूरे कामकाज में एक विस्तार ला सकता है।

राष्ट्रपति लोकसभा और राजसभा द्वारा पारित प्रत्येक विधेयक को रोक कर वापस भेज देंगे।

वह सचमुच सभी सरकारी कामकाज को तब तक बंद कर देगा, जब तक कि सरकार झुक न जाए और अपने घुटनों पर न आ जाए।

और सरकार को उन सभी फैसलों को उलटने के लिए मजबूर करें जो विपक्ष के अनुकूल नहीं हैं।

राष्ट्रपति पूरी तरह से सरकारी तंत्र को रोककर भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ सभी मामलों को छोड़ने के लिए सरकार के साथ बातचीत करेंगे।

और सरकार को सीएए, नागरिकता अधिनियम, 370 आदि को वापस लेने के लिए मजबूर करें, जो विपक्ष के प्रतिकूल हैं।

सभी विपक्षी दलों द्वारा सर्वसम्मति से समर्थन किए जाने वाले आम उम्मीदवार शरद पवार हैं। शरद पवार अध्यक्ष पद के लिए कमर कस रहे हैं.

और ममता बनर्जी के सीधे मार्गदर्शन और देखरेख में मास्टर रणनीतिकार प्रशांत किशोर को काम पर रखा गया है।

डब्ल्यूबी चुनावों में उनकी हालिया शानदार सफलता के बाद, संयुक्त विपक्ष उन्हें देने के लिए देख रहा है।

वर्तमान में विधानसभा की सीटें विपक्ष के पक्ष में हैं।

पश्चिम बंगाल में हाल की जीत के साथ, पैमाने विपक्ष के पक्ष में झुक गया है ताकि वे अपना खुद का राष्ट्रपति चुन सकें।

बीजेपी के लिए सिर्फ यूपी चुनाव में अच्छी संख्या में सीटें मिलने की उम्मीद है.

अगर उन्हें यूपी में प्रचंड बहुमत मिलता है, तो उनके पास अपनी पसंद का राष्ट्रपति पाने के लिए पर्याप्त संख्या है।

यदि उन्हें यूपी में वांछित सीटें नहीं मिलती हैं, तो उनके पास एक संयुक्त विपक्ष के खिलाफ बहुत कठिन समय होगा, जिसे कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, लालूज राजद, ममता बनर्जी, केजरीवाल की आप, अकाली दल का समर्थन प्राप्त होगा। , DMK, CPI, CPM, चंद्रबाबू के तेलगु देशम और अन्य सभी लालू पंजू।

विपक्षी शासित राज्यों में एमएलसी के मजबूत आधार के साथ, विपक्ष के पास अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुने जाने का अच्छा मौका है।

उम्मीद है कि उड़ीसा के बीजू पटनायक विपक्ष में शामिल नहीं होंगे और राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। इंतजार करना और देखना।

भाजपा को अगले कुछ महीनों में बहुत सावधान रहना होगा, छोटे क्षेत्रीय दलों से हर संभव समर्थन हासिल करने के लिए ताकि राज्य, विधानसभा में उनकी ताकत यूपी सीटों के साथ या बिना संयुक्त विपक्ष को हराने के लिए पर्याप्त हो।

यदि भाजपा राष्ट्रपति पद की दौड़ हार जाती है, तो 2024 के लोकसभा चुनावों में 400 सीटों और प्रचंड जीत के साथ भी उन्हें सरकार चलाने में मदद नहीं मिलेगी, अगर उनके पास अपना राष्ट्रपति नहीं है।

देश के लिए बहुत ही भयावह दौर आने वाला है।

और यह सब जानते हुए, विपक्ष अपने समर्थित उम्मीदवार को भारत के अगले राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।

सभी भारतीय पात्र मतदाताओं के साथ साझा करें!

भगवान इन से भारत की रक्षा करें!(साभार)