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अफगानिस्तान के वर्तमान हालात पर मोदी सरकार की नीति कितनी सार्थक ?

डॉ राकेश कुमार आर्यसंपादक,  उगता भारत

अफगानिस्तान में जिस प्रकार तालिबान ने सत्ता पर कब्जा किया है उसे लेकर भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं । भारत सरकार ने अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर जो नीति रणनीति अपनाई है उसकी भी कई लोगों ने यह कहकर आलोचना की है कि भारत सरकार को समय रहते अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करना चाहिए था। उधर अफगानिस्तान के भीतरी हालात भी बहुत ही चिंताजनक हैं। लोग भयभीत हैं और तालिबान के पहले शासन की क्रूरता लोगों की बेचैनी को और भी अधिक बढ़ा रही है।

बहुत ही निष्पक्ष होकर और ईमानदारी के साथ यदि अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम की समीक्षा की जाए तो भारत सरकार ने इस समय जिस प्रकार की नीति रणनीति अफगानिस्तान को लेकर अपनायी है, उसे गलत नहीं कहा जा सकता। हमें भारत सरकार की नीति की आलोचना करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि संसार की सुपरपावर्स इस समय क्यों मौन साधे बैठी हैं ? अमेरिका ने जब देख लिया कि अफगानिस्तान में उसका रहना घाटे का सौदा है और पिछले 20 वर्ष में जिस प्रकार तालिबानी वहां की फौज में भर्ती हो गए हैं उसके चलते फौज में भी बड़ी संख्या में तालिबानियों का वर्चस्व स्थापित हो गया है, तो वह चुपचाप वहां से निकल गया। जबकि चीन और पाकिस्तान ने भारत और अमेरिका दोनों के अफगानिस्तान की सरकार से मित्रतापूर्ण संबंध होने के कारण तालिबानियों को अपना समर्थन दिया है। इसके साथ ही रूस भी तालिबानियों के साथ खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं अन्य मुस्लिम देश भी अफगानिस्तान को लेकर या तो चुप हैं या फिर तालिबान के साथ सहानुभूति दिखाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

ऐसे में इस समय भारत के लिए यही उचित था कि वह भी अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर चुप रहे और आने वाले समय में मुस्लिम देशों और सुपरपावर्स के दृष्टिकोण को देखकर अपनी नीति रणनीति की घोषणा करे। 

हमें यह भी समझना चाहिए कि कई मुस्लिम देश ऐसे हैं जो तालिबान की विजय को उनके अपने देश की आजादी कह रहे हैं, यहां तक कि भारत में भी सपा के शफीक उर रहमान ने कह दिया है कि जैसे अंग्रेजों से हमने अपने देश को आजाद कराया था वैसे ही तालिबान ने अपने देश को अमेरिका से आजाद कराया है। इस पर हमें जश्न मनाना चाहिए।

जो लोग इस समय नरेंद्र मोदी सरकार की इस बात को लेकर आलोचना कर रहे हैं कि उन्होंने समय रहते अफगानिस्तान में हस्तक्षेप नहीं किया, उनके विषय में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह वही लोग हैं जो मोदी सरकार के अफगानिस्तान में सीधे हस्तक्षेप करने पर भी अपना विरोध ही व्यक्त करते और कहते कि एक मुस्लिम देश में यदि मुस्लिम आपस में लड़ भिड़कर मर रहे थे तो उसमें हिंदुस्तान की सेना को भेजने का मोदी सरकार का आखिर औचित्य क्या था? इसलिए ऐसे लोगों की आलोचना पर कोई ध्यान नहीं देना चाहिए जो केवल आलोचना के लिए आलोचना करते हैं और वस्तुस्थिति से आंखें मूंदकर चलते हैं। 

मोदी सरकार की चुप्पी के विरोधी लोगों के बारे में मैं एक बात कहना चाहूंगा कि 1976 में इंदिरा गांधी ने जब बाबासाहेब संविधान की मूल आत्मा अर्थात भारतवर्ष में धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी को ना तो प्रोत्साहन दिया जाएगा और ना ही किसी के अधिकारों का हनन किया जाएगा, का विनाश करते हुए भारत के संविधान में 'सेकुलर' शब्द स्थापित किया था तो उस समय भारतवर्ष का एक ही प्रांत ऐसा था जो कह रहा था कि सेकुलर शब्द को हम अपने यहां लागू नहीं करेंगे । उस प्रान्त का नाम था जम्मू कश्मीर। जम्मू कश्मीर की सरकार ने कुछ समय धारा 370 की आड में यह कहा था कि वह सेकुलरिज्म को स्वीकार नहीं करती । क्योंकि धारा 370 उसे विशेष अधिकार देती है। इसका अभिप्राय हुआ कि जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने कभी भी भारत के सेकुलर ढांचे में विश्वास नहीं किया। वह अपने ढंग से सरकार चलाती रही। इसके चलते ही वहां हिंदुओं का नरसंहार होता रहा और कश्मीरी हिंदुओं को बड़ी संख्या में कश्मीर छोड़ना पड़ा।

आज जब केंद्र की मोदी सरकार ने धारा 370 हटा दी है तो जिस कांग्रेस के प्रस्ताव को जम्मू कश्मीर की सरकार ने 1976 में मानने से इनकार कर दिया था, वहीं कांग्रेस इस समय कह रही है कि धारा 370 के चलते कश्मीर में सेकुलरिज्म सुरक्षित था। इसके हटते ही सेक्युलरिज्म की और लोकतंत्र की हत्या हो गई है। बस, इसी को ध्यान से समझ लिया जाना चाहिए कि कुछ लोग विपक्ष की राजनीति करते हुए धारा 370 के रहते जैसे देश को तोड़ने की चालों में लगे रहे और उसके हटने पर कहते हैं कि लोकतंत्र और सेकुलरिज्म की हत्या हो गई है, वैसे ही कुछ लोग हैं जो बुद्धिजीवी होकर भी सरकार की प्रत्येक नीति की आलोचना करने को अपना धर्म मानते हैं। 'राष्ट्र निर्माण' के कार्यों में लगे रहने का संकल्प लेकर भी जो लोग किसी पार्टी विशेष से बंध कर अपनी बौद्धिक क्षमताओं को गिरवी रख देते हैं और उचित निर्णय का स्वागत करने का लोकतांत्रिक भाव भी खो देते हैं, उनसे कैसे 'राष्ट्र निर्माण' की अपेक्षा की जा सकती है ?

मैंने देखा है कि कुछ लोग 'राष्ट्र निर्माण' का संकल्प लेकर भी किसी जाति विशेष से प्रभावित होकर अपने संगठन चलाते हैं। उनसे आप कोई अपेक्षा राष्ट्र निर्माण की नहीं कर सकते हैं, जो खुल्लम-खुल्ला जातिवाद के नारों से प्रेरित होकर काम करने के अभ्यासी हों। अस्तु।

इस सब के उपरांत भी हमारा इंद्र की मोदी सरकार से आग्रह है कि अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम के पश्चात जिस प्रकार शरणार्थी भारत में आ रहे हैं, उनके प्रति सरकार को अपनी ठोस और स्पष्ट नीति अपनानी चाहिए। थोक के भाव में भारत में अफगानिस्तानी शरणार्थियों को शरण देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। ऐसे शरणार्थियों को ले लेकर पहले भी भारत ने हानि  उठाई है। उस उदाहरण को सामने रखकर सरकार को इस समय शरणार्थियों के प्रति अपनी परंपरागत नीति पर विचार करना चाहिए। केंद्र की वर्तमान सरकार वीर सावरकर जी के सिद्धांतों में विश्वास रखने वाली सरकार है। सावरकर जी ने कई अवसरों पर यह कहा है कि भारत के नेतृत्व ने सद्गुणों को अपनाकर देश के साथ घात किया है। जैसे पृथ्वीराज चौहान गोरी के साथ अपना अंतिम युद्ध केवल इसलिए हार गये कि गौरी ने अपने सैन्य दल के सामने गायों को कर लिया था। पृथ्वीराज चौहान ने गायों पर हथियार चलाने से इंकार कर दिया। इतिहासकारों का मानना है कि यदि उस दिन कुछ गाय मर जातीं और शत्रु को भगा दिया जाता तो बाद में मरने वाली करोड़ों गायों की रक्षा हो सकती थी। साथ ही उन करोड़ों लोगों को धर्मांतरण से रोका जा सकता था जिन्होंने मुस्लिम शासन में अत्याचार सहते हुए अपना धर्मांतरण कर लिया। पृथ्वीराज चौहान के इस सद्गुण ने हमारे भीतर विकृति पैदा की। बस ,यही बात आज भी है कि हम शरणार्थियों को शरण देने के अपने सद्गुण से फिर किसी नई विकृति को पैदा ना करें । पहले ही रोहिंग्या और दूसरे शरणार्थियों ने  देश के लिए कई प्रकार की समस्याओं को जन्म दे दिया है ।

'सद्गुण विकृति' का परंपरागत भूत यदि इस समय केंद्र की हिंदूवादी राष्ट्रवादी सरकार के सिर पर भी चढ़ा तो वह हमारे लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं होगा । हमें स्पष्ट कर देना चाहिए कि जो भी शरणार्थी भारत की ओर बढ़े चले आ रहे हैं, उन्हें किसी मुस्लिम देश में जाकर शरण लेनी चाहिए । वैसे भी इस समय भाईचारे में विश्वास रखने वाले 'शांति के मजहब' के मानने वाले लोगों और देशों को अपने इन गुणों को प्रदर्शित करने का उचित अवसर प्राप्त है। उन्हें स्वयं ही अपने 'भाइयों' को अपने देश में शरण देनी चाहिए।

तालिबान को लेकर हमें यह समझना चाहिए कि भारतीय उपमहाद्वीप में यदि इसका सबसे बड़ा शत्रु है तो वह भारत ही है। यद्यपि तालिबान सरकार लोगों को और संसार के शेष देशों को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी शत्रुता किसी से भी नहीं है । वह अपने देश को अपने तरीके से चलाने में विश्वास रखते हैं, परंतु यह जो कुछ कह रहे हैं, उसका अभिप्राय वही नहीं है । निश्चित रूप से उनका छुपा हुआ एजेंडा भारत के लिए घातक हो सकता है। भारत के भीतर भी तालिबानी सोच रखने वाले लोग तालिबान से ऊर्जा ले रहे हैं और उन ऊर्जा लेने वाले लोगों की पीठ पर देश के कई राजनीतिक दल अपना आशीर्वाद का हाथ फेरते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन लोगों को देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता से इतना प्यार नहीं है, जितना सत्ता से है। उसके लिए ये कुछ भी कर सकते हैं । किसी से भी हाथ मिला सकते हैं और वोटों को अपने पक्ष में लेने के लिए कोई भी हथकंडा अपना सकते हैं। 

अफगानिस्तान की नई तालिबान सरकार अभी सत्ता में नहीं आई है ,परंतु उसने पहले ही एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए अफगानिस्तान की जेलों में बंद बड़े 2300 खूंखार आतंकवादियों को छोड़ दिया है। इन खूंखार आतंकियों में टीटीपी के डिप्टी चीफ फकीर मोहम्मद को भी जेल से बाहर कर दिया गया है। जिन आतंकियों को जेलों से बाहर किया गया है उनमें तहरीक-ए-तालिबान, अलकायदा और आईएसआईएस के हैं। ये सब अफगानिस्तान की अलग-अलग जेलों में बंद थे।

कहने के लिए तो तालिबान ने भारत सरकार से कहा है कि वह अफगानिस्तान में अपनी परियोजनाओं को पूर्ण करे। लेकिन उसकी नीति भारत के प्रति क्या होगी और उसके द्वारा छोड़े गए इन खूंखार आतंकवादियों का नजरिया भी भारत के बारे में क्या होगा ? - यह देखना अभी शेष है । यद्यपि तालिबान के पहले शासन को देखते हुए यह बात कही जा सकती है कि उसका दृष्टिकोण भारत के बारे में कठोर ही रहेगा। जिन आतंकी संगठनों के लोगों को आतंकवादियों को तालिबान ने जेलों से बाहर किया है उनके संपर्क सूत्र भारत में पहले से रहे हैं। निश्चित रूप से अब भारत में उनके लोग और भी अधिक अतिवादी दृष्टिकोण अपनाएंगे। जिससे भारत की भीतरी समस्याएं बढ़ सकती हैं। 

चीन और पाकिस्तान दोनों ही यह चाहेंगे कि भारत में अस्थिरता बढ़े। अमेरिका का वर्तमान नेतृत्व भी भारत को इतना पसंद नहीं करता जितना पहला नेतृत्व करता था। जहां तक रूस की बात है तो वह अमेरिका को नीचा दिखाने के लिए तालिबान को अपना समर्थन दे रहा है। ऐसे में उसकी तालिबान के साथ सहानुभूति उसके मित्र भारत को परेशान कर सकती है। पर उस परेशानी पर रूस क्या दृष्टिकोण अपनाएगा ?  इसे अभी स्पष्ट किया जाना संभव नहीं। 

 भारत के लोगों को आज इतिहास से भी सबक लेने की आवश्यकता है। मैं कहना चाहूंगा कि आज तालिबान के भय से जिस प्रकार अफगानिस्तान में लोग अपने परिजनों और प्रियजनों को छोड़ छोड़कर भी विदेशों को भाग रहे हैं और हवाई जहाज के पहियों तक पर लटक कर अपनी प्राण रक्षा करने को आतुर दिखाई दे रहे हैं, कभी यही स्थिति इस देश में हिंदुओं की उन मुस्लिम आक्रमणकारियों के समय होती होगी जो हमारे शहरों, गांवों ,कस्बों को उजाड़ते थे और बड़ी संख्या में हिंदू नरसंहार करते इस्लाम की तलवार की प्यास बुझाते थे। तब क्या मंजर होता होगा और किस प्रकार लोग उस समय अपने प्राणों की रक्षा के लिए भयभीत होकर इधर-उधर भागते होंगे? उसे आज का अफगानिस्तान समझाने के लिए पर्याप्त है। देश के कम्युनिस्टों, कांग्रेसियों और उन धर्मनिरपेक्षियों को भी अफगानिस्तान के मंजर से सबक लेने की आवश्यकता है जो कहते हैं कि हिंदुस्तान में इस्लाम ने कभी कोई नरसंहार किया ही नहीं या इस्लाम तो 'शांति का मज़हब' है। इस्लाम की शांति खून की प्यासी रही है और रहेगी। इसलिए खून के प्यासे लोगों को मोदी सरकार अपने देश में शरण ना दे और उनसे उचित दूरी बनाकर चलती रहे, इसी में देश का लाभ है । शफीक उर रहमान जैसे लोगों का 'इलाज' भी इस समय होना आवश्यक है। क्योंकि ये ही वे लोग हैं जो देश में आग लगाने का काम करते हैं। ये लोग ही देश में तालिबानी विचारों का बीजारोपण कर उन्हे खुराक देते हैं। इससे पहले कि यह अपने उद्देश्य में सफल हो सरकार इन्हें ही उचित 'खुराक' दे दे तो अच्छा है।

गिरफ्तार हो सकते हैं मुनव्वर राना, वाल्मीकि पर घटिया कमेंट कर फँसे

                     महर्षि वाल्मीकि पर टिप्पणी को लेकर राखी सावंत पर भी हुई थी कार्रवाई (फाइल फोटो)
मुनव्वर राना अक्सर अपने बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। अब उन्होंने तालिबान का महिमामंडन किया है। उन्होंने कहा है कि तालिबान ने अपने मुल्क को आज़ाद कराया। इसके बाद ‘न्यूज नेशन’ चैनल पर दीपक चौरसिया से बात करते हुए मुनव्वर राना ने कहा कि दो बड़े दुश्मनों को, जो रूस और अमेरिका से ज़िंदगी भर लड़े हों, तो उन पर कितने जुल्म हुए होंगे इसका भी हिसाब निकाला जाना चाहिए। उन्होंने भगवान वाल्मीकि से तालिबान की तुलना कर डाली।

वहीं ‘नवभारत टाइम्स’ से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अपने मुल्क के लिए लड़ने वाले को आतंकी कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने कहा कि इसे समझने के लिए दूर तक जाना पड़ेगा और हिंदुस्तानी होकर नहीं सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि तालिबान ने अपने मुल्क को आज़ाद कराया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान हजारों वर्षों से हिंदुस्तान का दोस्त है और उनका वीजा भी नहीं लगता।

मुनव्वर राना को शायद कानून का ज्ञान नहीं। शायद वो अखबार भी नहीं पढ़ते होंगे। इसी वजह से ऋषि वाल्मिकी की तुलना तालिबान से कर दी, उन्हें डकैत बोल दिया। ज्ञान होता तो ऐसा नहीं करते।

मुनव्वर राना ने भगवान वाल्मीकि पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। अभिनेत्री राखी सावंत ने भी कभी इसी तरह की टिप्पणी की थी, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2017 में पंजाब पुलिस ने मुंबई जाकर राखी सावंत को गिरफ्तार किया था। उन्होंने ‘रामायण’ के रचयिता पर टिप्पणी कर के वाल्मीकि समाज की भावनाओं को आहत किया था। शिकायत में कहा गया था कि इससे बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएँ आहत हुई हैं।

राखी सावंत ने महर्षि वाल्मीकि को ‘हत्यारा’ बता दिया था और कहा था कि इसके बावजूद उन्होंने रामायण लिखा। अभिनेत्री उस समय उदाहरण दे रही थीं कि कैसे लोगों का व्यवहार और परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। 2014 में एक जन्मदिन की पार्टी में गायक मीका सिंह ने राखी सावंत को जबरन किस किया था। इसी क्रम में उन्होंने मीका सिंह की तुलना महर्षि वाल्मीकि से कर डाली। उन्होंने दावा किया था कि महर्षि वाल्मीकि की तरह मीका भी बदल गए हैं और निर्दोष हो गए हैं।

राखी सावंत ने बाद में इसका बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने बचपन से ये कहानी पढ़ी है कि कैसे वाल्मीकि डाकू से संत बन गए। उन्होंने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा था कि उन पर आरोप तय कर के किसी को कुछ नहीं मिलेगा। बाद में उन्होंने महर्षि वाल्मीकि और वाल्मीकि समुदाय के सम्मान की बात कही थी। लुधियाना के एक कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें क्यों निशाना बनाया जा रहा, ये नहीं पता।

हालाँकि, तब पंजाब पुलिस ने राखी सावंत की गिरफ़्तारी की बात से इनकार करते हुए कहा था कि उन्होंने खुद ही आत्मसमर्पण किया है। अब शायर मुनव्वर राना ने भी कुछ इसी तरह का बयान दिया है, जिससे उनकी गिरफ़्तारी हो सकती है। मुनव्वर राना ने ‘न्यूज़ नेशन’ पर पत्रकार दीपक चौरसिया से बात करते हुए कहा, “वाल्मीकि रामायण लिख देता है तो वो देवता हो जाता है, उससे पहले वो डाकू होता है।”

उन्होंने महर्षि वाल्मीकि की तुलना तालिबान से करते हुए कहा, “इंसान का कैरेक्टर बदलता रहता है। वाल्मीकि का जो इतिहास था, उसे तो हमें निकालना पड़ेगा न। हमें तो अफगानी अच्छे लगते हैं। वाल्मीकि को आप भगवान कह रहे हैं, लेकिन आपके मजहब में तो किसी को भी भगवान कह दिया जाता है। वो लेखक थे। उनका काम था रामायण निकला, जो उन्होंने किया।” हालाँकि, इस पर दीपक चौरसिया ने उन्हें टोका भी था।

कश्मीर घाटी पर हमले के लिए पाक के जैश-ए-मोहम्मद ने 400 आतंकियों को अफगान कैंप में किया प्रशिक्षित

जैश 400 आतंकी कश्मीर
                                                                                           प्रतीकात्मक 

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक तरफ विश्व कोरोना से लड़ रहा है, लेकिन पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए आतंकवाद को बढ़ावा देने में मस्त है। पाकिस्तान को न अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने का होश है और न ही फ़ैल रहे कोरोना का। विपरीत इसके अपनी जनता का कोरोना से ध्यान हटाने के लिए कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां तेज करने पर, अगर भारत द्वारा पुनः कोई स्ट्राइक करने पर मीडिया से लेकर सियासत तक उसी स्ट्राइक की माला जपते नज़र आएंगे। एक डर जो जनता में पनप रहा है कि कहीं अबकी बार भारत की ओर से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर ही स्ट्राइक कर अपने में न मिला ले।   
दूसरी ओर, पाकिस्तान में यह भी चर्चा हो रही है कि आतंकवादी हरकतों पर खर्च करने के लिए सरकार के पास धन कहाँ से आ रहा है? यदि सरकार के पास इन गतिविधियों के लिए पर्याप्त धन है, फिर जनहित की ओर क्यों नहीं ध्यान दिया जा रहा? या फिर आतंकवादी हरकतों को दुबारा शुरू कर पाकिस्तान को ब्लैकलिस्टेड होने का मन बना जा चुका है?   
जम्मू-कश्मीर को निशाना बनाने वाले आतंकी समूह जैश-ए-मोहम्मद ने अफगानिस्तान में अपने प्रशिक्षण शिविरों में 400 आतंकवादियों को तैयार किया है, जिन्हें कश्मीर घाटी में भेजे जाने से पहले तालिबान यूनिट्स के साथ तैनात किया गया है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने बताया कि पिछले महीने 12 अप्रैल को जब अफगानिस्तान फोर्स आतंक रोधी मिशन पर थी, तो गिरफ्तार किए गए आतंकियों से प्रारंभिक पूछताछ में उन्हें एक आतंकी कैंप के बारे में पता चला था। हालाँकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि वहाँ पर आधा दर्जन से अधिक आतंकी कैंप थे।
दिल्ली और काबुल में आतंकवाद विरोधी अधिकारियों ने बताया कि तालिबान के अफ़गानिस्तान सुलह ज़ाल्मे ख़ालिज़ाद के लिए अमेरिकी विशेष प्रतिनिधि के साथ 29 फरवरी के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जैश-ए-मोहम्मद ने इन शिविरों में 400 लड़ाकों को तैयार किया था।
काबुल में एक आतंक रोधी अधिकारी ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, “पूर्वी अफगानिस्तान में खोस्त से जलालाबाद के बीच और कंधार प्रांत में पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाकों में भी जैश कैडर को तालिबान इकाइयों के साथ तैनात किया गया है।”
अधिकारियों ने कहा कि तालिबान और जैश-ए-मोहम्मद के बीच आपसी तालमेल है। कुछ खुफिया रिपोर्टों में कहा गया है कि लश्कर-ए-तैयबा ने जैश शिविरों में प्रशिक्षण के लिए अपने कैडर भी भेजे हैं। जिन्हें पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस द्वारा सहायता दिया जा रहा है।
अफगान फोर्स द्वारा गिरफ्तार किए गए जैश के एक ऑपरेटिव्स में से एक जरार ने पूछताछ के दौरान बताया कि फोर्स द्वारा तहस-नहस किए गए ट्रेनिंग बेस को ‘पाकिस्तान के सैन्य कर्मियों द्वारा प्रशिक्षित, सुसज्जित और समर्थित बनाया जा रहा था।’ उनमें से कई ने बताया कि पाकिस्तानी सेना की तरफ से उन्हें हर तरह की मदद की जाती है, ताकि वो बच सके। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के निवासी के रूप में पहचाने जाने वाले ज़ेरार उनमें से एक था। उसे 15 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था।
मौलाना मसूद अजहर द्वारा स्थापित आतंकवादी समूह को उसके छोटे भाई मुफ्ती अब्दुल रऊफ असगर द्वारा चलाया जा रहा है। काबुल में राजनयिकों का कहना है कि मसूद अजहर के बड़े भाई, इब्राहिम अजहर को मध्य अफगानिस्तान में गजनी शहर में देखा गया है, संभवत: तालिबान के साथ संबंधों को गहरा करने के प्रयास के संदर्भ में वो वहाँ गए हों।
पिछले दिनों NIA ने आतंकी और जैश-ए-मोहम्मद के ओवर ग्राउंड वर्कर शाकिर बशीर मागरे को कश्मीर से गिरफ्तार किया था। शाकिर ने पुलवामा के आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार को शरण और हमले के लिए अन्य सहायता उपलब्ध कराई थी।
आदिल अहमद डार ही वो आतंकी था जो कार में सवार होकर सुरक्षाबल के काफिले में जा घुसा था। शाकिर ने खुलासा किया कि उसने आदिल अहमद डार और एक और अन्य सहयोगी मोहम्मद उमर फारूक को साल 2018 के आखिरी से फरवरी में किए हमले तक अपने घर में शरण दी थी। शाकिर ने कार में रखे विस्फोटक को तैयार किया। लेथपोरा स्थित दुकान से वह सीआरपीएफ काफिले की मूवमेंट पर नजर रखता था।

कोरोना संकट में विश्व संकट मोचन बनता भारत

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कहावत है 'हिरण हरियाली को देख रोता है', कुछ जाहिल जमातियों द्वारा डॉक्टर, पुलिस और नर्सों पर थूक, पत्थर फेंकना, हॉस्पिटल में नर्सों के सामने नंगा होने वालों और इन दुष्कर्मों का समर्थन करने वालों पर सटीक बैठती है। जो बीमारी में भी हिन्दू-मुस्लिम कर रहे हैं। राष्ट्र को बताएं अब तक कुल कितने जमाती मस्जिदों से पकडे? किसने छिपाया और क्यों? क्या यह मानवहित में है? तुष्टिकरण करने के लिए बहुत ज़िंदगी हैं, पहले इस संक्रामक बीमारी से मुक्ति पाने के लिए एकजुट होकर छिपे हुए और छिपाने वालों से जमातियों को बाहर आने  लिए क्यों नहीं कहते?
Image may contain: one or more people, text that says 'अंग्रेज यहां लड़ने के लिए अपने सैनिक नही लाए थे क्योंकि उन्हे यहां के गद्दारों पर पूरा भरोसा था Achhe Din'लॉक डाउन में मुफ्त वितरित हो रहे खाने का दुरूपयोग हो रहा है, वह भी ले रहा है, जिसे जरुरत नहीं। बेशर्मी की भी हद होती है। उसके बावजूद मोदी और मोदी सरकार को बुरा-भला कहा जा रहा है, कुछ बिकाऊ पत्रकार भ्रामक खबरे प्रसारित कर सरकार के प्रयासों पर पानी फेरने में दिन-रात एक किए हुए हैं, विपरीत इसके भारत के प्रयासों को विश्व सराहा रहा है। भारत से दवाइयों की मदद मांग रहा है। जिसे देश आभास होता है कि कल तक जो विश्व भारत को इतने सम्मान से नहीं देखता था, आज कोरोना ने उसी भारत को विश्व गुरु बनने के द्वार पर ला खड़ा कर दिया है।   
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत कोरोना संकट काल में कई देशों के लिए संकटमोचक बन कर सामने आया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले सार्क और फिर जी-20 देशों के जरिए दिखाया कि कोरोना के कहर से कैसे मिलकर निपटा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं से संवाद किया और जरूरतमंद देशों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया। अमेरिका, इजरायल और ब्राजील के अलावा भारत ने स्पेन, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव समेत कई देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा समेत दूसरी सहायता देने का फैसला किया। इससे वैश्विक धारणा बनाने में मदद मिली है कि भारत याचक नहीं, अब दाता बन चुका है। भारत उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, पेरासिटामोल और अन्य जरूरी वस्तुएं उपलब्ध करा रहा है। इस कोरोना काल में मदद पाने वाले देशों की सूची लंबी होती जा रही है और मदद के लिए वे भारत का शुक्रिया अदा कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने की प्रशंसा
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भारत की जमकर प्रशंसा की है। उन्होंने तो दुनिया के दूसरे देशों को भी भारत से सीख लेने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि मुश्किल समय में कैसा व्यवहार करना चाहिए और दूसरों की मदद की भावना से काम करना चाहिए वह भारत से सीखने की जरूरत है

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने की भारत की तारीफ
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘कोविड-19’ के खिलाफ लड़ाई में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की आपूर्ति करने के फैसले के लिए अपना आभार व्यक्त किया। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा से बैन हटाने पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ने प्रधानमंत्री मोदी को महान बताया और कहा कि वो भारत का शुक्रिया अदा करते हैं। फॉक्स न्यूज से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो भारतीय पीएम मोदी की तारीफ करते हैं। निर्यात पर ढील देने के बाद अमेरिका को अब यह दवा मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि मैं सराहना करूंगा कि भारत हमारे द्वारा ऑर्डर की गईं टैबलेट्स की खेप को जारी करेगा। अमेरिका के राष्ट्रपति के ट्वीट का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच साझेदारी इससे पहले कभी भी इतनी अधिक मजबूत नहीं रही है। भारत मानवता की मदद के लिए अपनी ओर से हरसंभव अथक कोशिश करेगा।


अफगानिस्तान ने अदा किया शुक्रिया
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने मदद के लिए प्रधानमंत्री मोदी का शुक्रिया अदा किया है। राष्ट्रपति गनी ने कहा, ‘प्रिय मित्र नरेन्द्र मोदी, हमें 5 लाख हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन टेबलेट, एक लाख पैरासीटामोल टैबलेट और 75,000 मीट्रिक गेंहू भेजने के लिए धन्यवाद। गेंहू की पहली खेप जल्द ही अफगान के लोगों के लिए पहुंच जाएगी।’

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति को जवाब देते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ट्वीट संदेश में कहा, “भारत और अफगानिस्तान के बीच एक विशेष प्रकार की दोस्ती है, जो ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक संबंधों पर आधारित है। लंबे समय से, हमने आतंकवाद के संकट के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ाई लड़ी है। हम इसी तरह एकजुटता और साझा संकल्प के साथ कोविड-19 का मुकाबला करेंगे।”



मॉरीशस के पीएम ने जताया प्रधानमंत्री मोदी का आभार
कोरोना संकट के बीच भारत से मिली मदद के लिए मॉरिशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ ने प्रधानमंत्री मोदी का आभार जताया। प्रधानमंत्री जगन्नाथ ने अपने ट्वीट संदेश में कहा कि मैं एयर इंडिया की एक विशेष उड़ान से कल बुधवार, 15 अप्रैल को मॉरिशस पहुंची भारत सरकार की चिकित्सा मदद के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बहुत आभारी हूं। यह भारत और मॉरिशस के बीच के धनिष्ठ संबंध को दर्शाता है।



ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा प्रभु हनुमान की तरह पहुंचाई संजीवनी बूटी
ब्राजील के राष्‍ट्रपति जायर एम बोल्‍सोनारो ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना भगवान हनुमान से की करते हुए हाइड्रोक्‍सीक्‍लोरोक्‍वीन दवा को संजीवनी बूटी बताया। उन्होंने कहा कि भारत की ओर से दी गई इस हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा से लोगों के प्राण बचेंगे और इस संकट की घड़ी में भारत और ब्राजील मिलकर कामयाब होंगे। प्रधानमंत्री मोदी को भेजे पत्र में राष्‍ट्रपति बोल्‍सोनारो ने लिखा है कि जिस तरह हनुमान जी ने हिमालय से पवित्र दवा (संजीवनी बूटी) लाकर भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण की जान बचाई थी, उसी तरह भारत और ब्राजील एक साथ मिलकर इस वैश्विक संकट का सामना कर लोगों के प्राण को बचा सकते हैं।



ब्राजील के राष्‍ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में उन्‍हें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के लिए धन्‍यवाद दिया।
प्रधानमंत्री ने अपने जवाब में कहा “भारत और ब्राजील के बीच साझेदारी मौजूदा चुनौतीपूर्ण समय में पहले से कहीं अधिक मजबूत है। भारत इस महामारी के खिलाफ मानवता की लड़ाई में योगदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
इजरायल के पीएम ने जताया भारत का आभार
कोरोना वायरस महामारी को खत्म करने के लिए फिलहाल सबसे अहम दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन है। भारत ने इस दवा की खेप इजरायल को भिजवाई है। दवा मिलने के बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी का शुक्रिया अदा किया। इसके जवाब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमें साथ मिलकर इस महामारी से लड़ना होगा। भारत अपने मित्रों के लिए जो संभव है, वह करने को तैयार है। इजरायल के लोगों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं।



कजाकिस्तान के राष्ट्रपति तोकायेव ने कहा धन्यवाद
भारत की ओर से चिकित्सीय आपूर्ति मिलने पर कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि भारत सरकार खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद। मित्रता और एकजुटता का यह उच्च स्तर तब भी दिखाया गया जब भारत ने दवाओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।


सेसेल्स ने जताया आभार
सेसेल्स के लिए स्पेशल इंडियन एयरफोर्स के विमान से दवा भेजी गई है। इन दवाइयों में पैरासीटामॉल, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का नाम सबसे ऊपर आ रहा है। सेसेल्स ने मदद के लिए भारत का आभार जताया है। राष्ट्रपति डैनी फॉरे ने संकट की इस घड़ी में सेशेल्स को दिए गए समर्थन के लिए प्रधानमंत्री मोदी, उनकी सरकार और भारत के लोगों का दिल से आभार व्यक्त किया।


मालदीव के राष्ट्रपति के प्रधानमंत्री मोदी से बात कर की तारीफ
कोरोना संकट पर मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ टेलीफोन पर बातचीत में मदद के लिए भारत का शुक्रिया अदा किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर खुशी जताई कि मालदीव में पहले तैनात किए गए भारतीय चिकित्सा दल और फि‍र बाद में भारत द्वारा उपहार में दी गई आवश्यक दवाओं ने द्वीप में संक्रमण के फैलाव को नियंत्रित करने में उल्‍लेखनीय योगदान दिया है।

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि कोरोना जिसने विश्व में अपनी चादर फैला रखी है, कहीं हि....
मालदीव के राष्ट्रपति ने सार्क देशों की मदद के लिए COVID-19 फंड बनाने पर प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा दोहराई। इसके साथ ही राष्ट्रपति ने चीन के वुहान से मालदीव के निवासियों की सुरक्षित निकासी और जरूरी सामानों की आपूर्ति के लिए प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद दिया।

‘IS आतंकी तो नमाज भी नहीं पढ़ते,… मैं तो खलीफा के हिसाब से जीने के लिए ज्वाइन की थी’

ISIS
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दुनियां को इस्लामिक बना शरिया लागू करने वाले जब खुद ही नमाज़ नहीं पढ़ते, शायद शरिया का मतलब भी जानते होंगे, इस पर शंका होना लाजमी है। जिस तरह की रिपोर्ट्स आ रही हैं, गुंडों का गैंग विश्व में इस्लाम के नाम पर गुंडागर्दी फैलाकर इस्लाम को बदनाम कर रहा है।
दूसरे, भारत वापस आने की इच्छुक आयशा की बातों पर सन्देह होता है कि आखिर लगभग चार वर्ष आतंकियों के बीच रहकर नमाज न पढ़ने के रहस्योघाटन में कोई षड़यंत्र लगता है। क्योकि जिस तरह CAA विरोध में हिन्दुत्व, मोदी, योगी और अमित के विरुद्ध नारेबाजी और दिल्ली के उत्तर-पूर्वी में हिन्दू विरोधी दंगा हुआ, लगता है ISIS के सरगना इस काम को अंजाम देने के उद्देश्य से आयशा और फातिमा को भारत भेजने की साज़िश है। 
ज्ञात हो, अभी कुछ ही वर्ष पूर्व ब्रिटेन की ख़ूबसूरत लड़की आयशा ने भी जब आतंकियों के बीच कुछ वर्ष बिता ब्रिटेन वापस आने की इच्छा व्यक्त करने पर ब्रिटिश सरकार ने उसके ब्रिटेन आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।  
इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के लिए केरल से भागकर अफगानिस्तान जाने वाली लड़कियों में एक नाम सोनिया सेबेस्टियन उर्फ आयशा का है। आयशा ने कुछ समय पहले ISIS मॉड्यूल के कासरगोड रिंग लीडर अब्दुल राशिद से निकाह किया था और उसके बाद कई युवकों को कट्टरपंथी बनाने का काम किया था। मगर, आज अपने शौहर की मौत के बाद आयशा वापस भारत लौटना चाहती है। अब उसका कहना है कि आईएस के गढ़ में स्थितियाँ उसकी उम्मीदों के विपरीत थीं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयशा का पति अब्दुल राशिद अब्दुल्ला भी आईएस को लेकर काफी निराश था। इसलिए उसने वहाँ आत्महत्या कर ली। जबकि अफगानिस्तान के सुरक्षाबल द्वारा आतंकियों को पकड़ने के लिए शुरू किए गए अभियान में आयशा ने आत्मसमर्पण कर दिया। अब फिलहाल वह काबुल की एक जेल में बंद है और कहती है कि वह इस्लामिक स्टेट से नहीं जुड़े रहना चाहती।
आयशा का कहना है, “मुझे लगता है कि बहुत से लोग जो (आईएस में शामिल होने) आना चाहते हैं, उनकी भी यही उम्मीदें हैं। मैं उन्हें निर्णय लेने से पहले दो बार सोचने का सुझाव दूँगी।”
खबर के अनुसार, आयशा ने वहाँ की पोल-पट्टी खोलते हुए कहा कि हम अफगानिस्तान यह सोचकर गए थे कि ‘खलीफा’ के हिसाब से इस्लामी जीवन जी सकेंगे। लेकिन जब हम यहाँ पहुँचे, तो हमने महसूस किया कि लोग नमाज पढ़ने तक के लिए भी नहीं जा रहे थे।
राशिद ने 90 से ज्यादा ऑडियो क्लिप भेजकर आईएस के विभिन्न पहलुओं को केरल के लोगों तक पहुँचाया था। लेकिन आयशा के मुताबिक उसका पति अफगानिस्तान जाकर इन चीजों को देखकर बहुत निराश हुआ और इसके बाद उसने ऑडियो मैसेज भेजना बंद कर दिया। आयशा ने कहा कि वह केरल वापस लौटना चाहती है और राशिद के माता-पिता के साथ रहना चाहती है।
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जिहादी ईसा और पत्नी फातिमा आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जब से भारत में नागरिकता संशोधक कानून बना है, मोदी विरोधियो....
आयशा के साथ एक अन्य लड़की और है। नाम है फातिमा उर्फ निमिषा। जानकारी के अनुसार, निमिषा ने भी कुछ साल पहले एक ईसाई से शादी की थी। मगर बाद में दोनों ने इस्लाम कबूल कर लिया था और दोनों अफगानिस्तान चले गए। आज आयशा की तरह निमिषा का भी कहना है कि वह भारत लौटना चाहती है बशर्ते उसे कैद में न रखा जाए और टार्चर न किया जाए। उसका कहना है, “मैं यह नहीं कह सकती कि मैं अफगानिस्तान में रहना चाहती हूँ क्योंकि यह मेरी जगह नहीं है। भारत मेरी जगह है।”

दिल्ली दंगों का बदला लेने के लिए काबुल में ‘मुस्लिम भीड़’ ने बनाया सिख की दुकान को निशाना

काबुल, अफगानिस्तान, सिख पर हमला, वीडियो
काबुल में सिख की दुकान पर हमला
दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों का असर अब दूर दराज इस्लामिक देशों में भी दिखने लगा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिल्ली दंगों का बदला लेने के लिए काबुल में एक सिख दुकानदार की दुकान पर साम्प्रदायिक भीड़ द्वारा हमला किया गया। हमले का विडियो पूर्व विधायक एवं अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने अपने ट्विटर पर शेयर की।
उन्होंने इस हमले की सूचना देते हुए अपने ट्विटर पर लिखा, “मुझे ये साझा करते हुए बहुत निराशा हो रही है कि दिल्ली दंगों का बदला लेने के लिए काबुल में साम्प्रदायिक भीड़ द्वारा सिख दुकानदार की दुकान पर हमला हुआ। मैं इन गुंडों को बताना चाहता हूँ कि सिख तो दिल्ली दंगों में पीड़ितों के मददगार रहे हैं। सिखों ने ही इन दंगों में पीड़ित लोगों को लंगर और दवाई उपलब्ध कराई है।”


मनजिंदर सिंह सिरसा ने काबुल में हुए इस हमले की एक अन्य वीडियो को भी ट्विपर पर शेयर किया है और इस तरह की घटनाओं को शर्मनाक बताया है। उन्होंने इस घटना पर फौरन कार्रवाई के लिए विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से और काबुल में स्थित भारत की एंबैसी से गुहार लगाई है कि वे इस मामले को अफगानिस्तान सरकार के सामने उठाएँ और वहाँ पर सिखों और हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
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पूर्व विधायक द्वारा जारी की गई वीडियो में हम देख सकते हैं कि जिस दुकानदार पर हमलावरों ने हमला किया, वे विडियो में हाथ जोड़े स्तब्ध खड़े हैं। जबकि उनकी दुकान का सारा सामान उथला-पुथला जा चुका है।

भारत की घेराबंदी से घबराया पाकिस्तान

भारत की घेराबंदी से घबराया पाकिस्तान, अफगानिस्तान में कमजोर सरकार बनवाने की कर रहा कोशिश: रिपोर्टअफगानिस्तान-ईरान में भारत की कूटनीतिक और व्यापारिक मौजदूगी से पाकिस्तान परेशान हो गया है. अमेरिकी सांसदों (US Congressional Report) की हालिया रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि भारत की घेराबंदी से घबराया पाकिस्तान अब अफगानिस्तान और ईरान में अपने मंसूबे साधने में जुटा है. इसके लिए इमरान सरकार एक तरफ ईरान से नज़दीकी बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर अफगानिस्तान में कमजोर सरकार बनवाने की कोशिशों में भी लगा हुआ है.
अमेरिकी संसद की एक स्वतंत्र द्विदलीय रिसर्च सर्विस (CRS) ने अफगानिस्तान के मौजूदा हालात पर अपनी हालिया रिपोर्ट में ये जानकारी दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान (Pakistan) ने अफगानिस्तान में वैसे तो कई दशक तक सक्रियता दिखाई, लेकिन ये सक्रियता नकारात्मक थी. दरअसल, पाकिस्तान भारत-अफगानिस्तान की बढ़ती दोस्ती को लेकर डरा हुआ है और भारत के खिलाफ अपने मंसूबों के लिए पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान का इस्तेमाल करना चाहता है. ऐसे में इमरान सरकार अफगानिस्तान में एक कमजोर सरकार चाहती है.
CRS ने अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान को अफगानिस्तान को सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी बताया. रिपोर्ट के मुताबिक, एक अहम पड़ोसी होने के नाते पाकिस्तान ने इतने सालों में अफगानिस्तान के मामलों में अपने मंसूबों को साधने के लिए नकारात्मक सक्रियता दिखाई.'
CRS की रिपोर्ट में लिखा है, 'पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने अफगान के विद्रोही समूहों के साथ अच्छे संबंध रखे. इसमें खासकर हक्कानी नेटवर्क के साथ पाकिस्तान के खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के अच्छे रिश्ते हैं. वहीं, विदेशी आतंकी संगठन (FTO) के साथ भी पाकिस्तान नरमी बरतता है.'
CRS ने अपनी रिपोर्ट में अफगान मिलिट्री विद्रोही होने और सरकार के गिरने की आशंका भी जाहिर की है.