Showing posts with label Romila Thapar. Show all posts
Showing posts with label Romila Thapar. Show all posts

रोमिला थापर जैसे वामपंथियों ने गढ़े हिन्दू-मुस्लिम एकता की कहानी, किया इतिहास से खिलवाड़: विलियम डालरिम्पल

भारतीय इतिहास, वामपंथ
आर.बी.एल.निगम
इतिहासकार और लेखक विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple) ने एक कार्यक्रम के दौरान यह स्वीकार किया कि देश में वामपंथी शिक्षाविदों और नेहरूवादी इतिहासकारों ने वास्तव में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को अपने क़ब्ज़े में कर भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद अपने प्रोपेगेंडा को फैलाना शुरू कर दिया था।
डालरिम्पल ने कोई ऐसी बात नहीं की, जिससे भारतीयों का सिर झुके, बल्कि उन्होंने भारत के समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों पर करारा प्रहार किया है। अक्सर मित्रों, सम्बन्धियों एवं अक्सर अपने लेखों में लिखता रहा हूँ, कि "हम शिक्षित भारतीय शिक्षित होते हुए भी अपने वास्तविक इतिहास के विषय में किसी अशिक्षित से कम नहीं।" जब कभी कोई भारत के वास्तविक इतिहास की बात करता है, उसे संघी, भाजपाई, पागल, शांति का दुश्मन, फिरकापरस्त और न जाने कितने उपनामों से अलंकृत किया जाता रहा है। सेवानिर्वित होने उपरांत एक हिन्दी पाक्षिक का लगभग 3 वर्ष संपादन करते लिखा "लाल किला किसने और कब बनवाया?" जिसकी भरपूर आलोचना भी हुई, मुझे और मेरे माता-पिता के लिए भी अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया। आ गए 2014 के चुनाव। एक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भाजपा पर भारतीय इतिहास और भूगोल को बिगाड़ने का आरोप लगाए जाने पर अपने स्तम्भ "झोंक आँखों के धूल-चित्रगुप्त" में शीर्षक "प्रधानमंत्री राष्ट्र को बताइएं"(देखिए संलग्न पृष्ठ) के अंतर्गत इतिहास से सम्बंधित प्रश्न करने पर लाल किला लेख पर मुझे अपशब्द कहने वालों की ऐसी स्थिति हो गयी, मानो घर में कितना बड़ा मातम हो गया। और जिन इतिहासकारों का डालरिम्पल ने वर्णन किया है, उन्ही छद्दम इतिहासकारों के अलावा अन्य इतिहासकारों से पूछकर डॉ सिंह को जवाब देने के लिए कहा था।      
पिछले हफ्ते दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस द्वारा आयोजित एक टॉक शो – ‘Express Adda’ में बोलते हुए, लेखक डालरिम्पल ने कहा कि यह सच था कि शुरुआत में नेहरूवादी पाठ्य-पुस्तकें रोमिला थापर और अन्य मार्क्सवादियों द्वारा लिखी गई थीं। उन्होंने यह भी कहा कि मार्क्सवादियों ने दिल्ली के राजनीति चश्मे से मुगलों का महिमामंडन और हिन्दू-मुस्लिम एकता के खोखले दावे करते हुए मनगढ़ंत इतिहास को गढ़ने का काम किया। इतिहास लेखन के कार्य में वामपंथियों ने दक्षिणपंथियों को बिल्कुल हाशिए पर रखा और उनके लिए कोई जगह बाक़ी नहीं छोड़ी, जबकि वो यह अच्छी तरह से जानते थे कि वास्तव में वो भारत का इतिहास था ही नहीं, जिसका प्रचार वामपंथी अपने प्रोपेगेंडा के तहत कर रहे थे।
इस कार्यक्रम के होस्ट ने डालरिम्पल से पूछा कि क्या यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद क्या शिक्षाविदों का वामपंथियों द्वारा हरण कर लिया गया था और क्या अकादमिक हिस्से पर वामपंथियों ने लगभग कब्जा कर लिया था, जैसा दक्षिणपंथियों द्वारा आरोप लगाया जाता रहा है?
इसका जवाब देते हुए विलियम डालरिम्पल ने कहा कि विशेष रूप से 1950 के दशक में लिखी गई इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों पर उनकी प्रामाणिकता को लेकर आज भी कई तरह के शक बरक़रार हैं। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर के लगभग सभी नेहरूवादी इतिहासकार महान इतिहासकार थे, जबकि इसके विपरीत दक्षिणपंथी इतिहासकारों की अगली पीढ़ी में वो बात नहीं दिखी।
इस पर डालरिम्पल से पूछा गया कि क्या उनका यह मतलब है कि दक्षिणपंथी वर्ग के द्वारा वामपंथी इतिहासकारों पर जो आरोप लगाए जाते रहे हैं, वो सही हैं? तो डालरिम्पल ने जवाब देते हुए कहा, “मार्क्सवादियों द्वारा लिखी गई इतिहास की किताबों में हिन्दू-मुस्लिम एकता को चाशनी में डूबा, कुछ ज्यादा ही महिमामंडित करता हुआ दर्शाया गया, इसलिए वामंथियों द्वारा गढ़े जा रहे मनगढ़ंत इतिहास पर उन्हें आपत्ति होती थी, जिसका वो पुरज़ोर विरोध भी करते थे।
दरअसल, इस सब बातों में ग़ौर करने वाली बात यह है कि विलियम डालरिम्पल का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब इन मार्क्सवादी इतिहासकारों की विश्वसनीयता और पक्षपात को लेकर देश भर में बड़ी बहस छिड़ी हुई है। इन्होंने (वामपंथियों) अपनी विचारधारा को जनता के बीच पहुँचाने के लिए पाठ्य-पुस्तकों को अपने प्रचार करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। अत: अब यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि हमने जो भारतीय इतिहास पढ़ा है, वह मनगढ़ंत है, और यह वामपंथियों की देन है।
इतिहास की ये पाठ्य-पुस्तकें कुछ और नहीं बल्कि उन नेहरूवादी शिक्षाविदों और मार्क्सवादी विद्वानों की करतूत हैं, जिनके अंदर एक हिन्दू-बहुल देश में हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार से डर बैठा हुआ था। यही कारण है कि धीरे-धीरे एक आंदोलन पनप रहा है, जिसके तहत भारत के इतिहास की किताबों के संशोधन की माँग लगातार की जा रही है।

क्या रोमिला थापर के लिए वामपंथी नियम-कायदे ताक पर रखना चाहते हैं?

रोमिला थापर, जेएनयू
वामपंथी मीडिया गुट ने फासिज़्म का रोना शुरू कर दिया है। उनका शायद मानना है कि लेफ्ट लिबरल प्रोफेसरों या कथित विशेषज्ञों की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़े किए जा सकते और वे जो कह दें, वही दुनिया का अंतिम सत्य होता है। खैर, आप यह जान कर चौंक जाएँगे कि वामपंथियों के इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि जेएनयू प्रशासन द्वारा सीवी माँगने का निर्णय एक रूटीन प्रक्रिया है

सिर्फ़ रोमिला थापर ही नहीं बल्कि 75 की उम्र पार कर चुके सभी एमेरिटस प्रोफेसरों से जेएनयू प्रशासन द्वारा उनकी सीवी माँगी गई है। जेएनयू ने कुल 25 प्रोफेसरों को आजीवन एमेरिटस प्रोफेसर की मान्यता दी है। अब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसकी समीक्षा करने का निर्णय लिया है। अधिकतर एमेरिटस प्रोफेसरों ने पिछले 3 वर्षों में एक बार भी यूनिवर्सिटी में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है और न ही विश्वविद्यालय के अकादमिक कार्यों में कोई योगदान दिया है। ये रही सच्चाई:

 मीडिया में ये बात ज़ोर-शोर से चल रही है कि जेएनयू ने रोमिला थापर से सीवी माँगी है। अगर उन्होंने अपना सीवी नहीं दिखाया तो उन्हें एमेरिटस प्रोफेसर के पद से हटा दिया जाएगा। वामपंथियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि ये थापर का अपमान है। वहीं कुछ अन्य लोगों ने जेएनयू प्रशासन पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जेएनयू थापर से उनकी सीवी कैसे माँग सकता है? हालाँकि, उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया कि जेएनयू ऐसा क्यों नहीं कर सकता।

क्या रोमिला थापर जेएनयू जैसे बड़े संस्थानों के नियम-क़ायदों से ऊपर हैं? क्या रोमिला थापर किसी संस्था में उसके नियम-क़ानून का पालन किए बिना बने रहना चाहती हैं। आख़िर रोमिला थापर के पास ऐसा क्या है कि जेएनयू उनके कहे अनुसार अपना काम करे? मीडिया आउटलेट्स ने यह भी लिखा कि किसी भी एमेरिटस प्रोफेसर से सीवी नहीं माँगी जाती और जानबूझ कर ऐसा किया गया है।

इसीलिए, जेएनयू की एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके सभी एमेरिटस प्रोफेसरों की सीवी माँगी है, ताकि उनकी समीक्षा की जा सके। यह जेएनयू के नियम-क़ानून के अंतर्गत किया जा रहा है। जेएनयू के नियम-क़ायदों के मुताबिक़ [Rule-32(g)], जब कोई एमेरिटस प्रोफेसर 75 की उम्र को पार कर जाता है तो यूनिवर्सिटी उनके स्वास्थ्य, उपस्थिति और क्रियाकलापों के आधार पर यह निर्णय लेगा कि उनको मिली मान्यता बरकरार रखी जाए या नहीं।
रोमिला थापर 87 वर्ष की हो गई हैं और 75 से ज्यादा उम्र वाले एमेरिटस प्रोफेसरों की समीक्षा होगी तो वह इस सूची में ऑटोमैटिक आ जाती हैं। फिर इतना हंगामा क्यों? क्या जेएनयू रोमिला थापर के लिए अपने नियम-क़ानून बदल ले? वामपंथियों की सोच यह है कि जेएनयू के पास दो नियम-क़ानून होने चाहिए। एक सामान्य लोगों के लिए और एक वामपंथी प्रोफेसरों के लिए।
अवलोकन करें:-
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार हिन्दुओं को बदनाम करने और उनके इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए कुख्यात इतिहासका.....

जितनी भी ट्वीट्स देखी, उन सभी में गिरोह विशेष ने मोदी और जेएनयू द्वारा रोमिला थापर को परेशान करने का आरोप लगाया है। अब प्रशान्त भूषण जैसे लोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है, जो आतंकवादी की फांसी रुकवाने आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवा दे।  

JNU का रोमिला थापर को नोटिस; योग्यता साबित करनी होगी, CV दिखाइए

रोमिला थापर
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
हिन्दुओं को बदनाम करने और उनके इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए कुख्यात इतिहासकार और JNU की प्रोफेसर एमेरिटस रोमिला थापर को विश्विवद्यालय प्रशासन ने पद पर बने रहने के लिए अपना CV जमा करने को कहा है। उसके आधार पर प्रशासन यह तय करेगा कि प्रोफेसर एमेरिटस के तौर पर विश्वविद्यालय को उनकी सेवाएँ आगे चाहिए या नहीं। हिन्दू इतिहास में “आर्य आक्रमण सिद्धांत”, “हिन्दुओं ने बौद्धों को प्रताड़ित किया” जैसे झूठों को खुराक देने, अयोध्या में राम मंदिर के अस्तित्व को बेवजह झुठलाने की कोशिशों आदि के लिए जाना जाता है।
पिताश्री के पीछे वास्कट पहने बैठे स्वतन्त्रता सैनानी
प्रो नन्द किशोर निगम 
इतना ही नहीं चंद चाँदी के टुकड़ों की खातिर थापर जैसे तथाकथित इतिहासकारों ने मुग़ल आक्रान्ताओं को महान दर्शा कर भारत के वास्तविक इतिहास को धूमिल कर दिया और वास्तविक इतिहास की बात करने वालों को साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और गंगा-यमुना तहजीब का दुश्मन घोषित करते रहे। क्रांतिकारियों को आतंकवादी और छद्दम स्वतन्त्रता सैनानियों को महान स्वतन्त्रता सैनिक, जबकि किसी भी वास्तविक स्वतन्त्रता सैनानी ने भारत के स्वतंत्र होने पर सरकार से कोई अपेक्षा कभी नहीं की। मेरे आदरणीय ताऊजी प्रो नन्द किशोर निगम, कुवैत में भारत के प्रथम कॉउन्सिल जनरल और पाकिस्तान में ट्रेड कमिश्नर रहे। जो आजीवन कुंवारे रहे क्योकि जेलों में क्रांतिकारियों की पिटाई और अँधेरी कोठरियों में रहकर, कई बिमारियों के शिकार हो गए थे। एक दिन दिसम्बर महीने में उनसे क्रांतिकारियों के और बम-बारूद ठिकाने पूछने के लिए नंगा कर बर्फ की सिल्लियों पर लिटाकर लोहे की चैनों से पिटाई करते समय माथे के ऊपर लगी चेन से ऐसा घाव हुआ जो उनके साथ चिता में गया। 1972 में बांग्लादेश बनने उपरान्त तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी के हाथों शेख मुजीबुर रहमान की उपस्थिति में ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया था क्योकि बांग्लादेश बनने में इस क्रांतिकारियों का भी गुप्त रूप से बहुत बड़ा योगदान था, इसी कारण जिस दिन स्वतन्त्रता सैनानियों को ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया था, उस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पंडित चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह आदि के जयकारों से सभागार गूंज उठा था। 
स्मरण हो, जितने भी वास्तविक स्वतन्त्रता सैनानी थे, इतने आत्म-सम्मानी थे, आज़ादी की लड़ाई के बदले कभी सरकार से अपने आप किसी पुरस्कार की न कोई कामना की और न ही चमचागिरी।   
सदमें में बुद्धिजीवी 
मीडिया खबरों के मुताबिक JNU प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद से कई प्रोफेसर झटके में हैं। उनका कहना है कि प्रोफेसर एमेरिटस को पहले कभी भी CV जमा कर अपनी योग्यता साबित नहीं करनी पड़ी है। द टेलीग्राफ़ को दो प्रोफेसरों ने तो बताया कि एक बार जो इस पद पर काबिज़ हो गया, वह अमूमन जीवन-भर पद पर बना रहता है। खुद प्रोफेसर थापर 1993 से यानी 26 वर्षों से इस पद पर कायम हैं।

इतिहास के ही एक दूसरे JNU वाले जानकार प्रोफेसर इरफ़ान हबीब ने ट्वीट किया कि इस प्रशासन से इसके अलावा क्या उम्मीद की जा सकती है।
इतिहास के नोबेल से मोदी पर हमले तक फैला है थापर का करिअर 
JNU में 1970 से 1991 तक शिक्षिका रहने वालीं प्रोफेसर थापर को अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ़ कॉन्ग्रेस का प्रतिष्ठित क्लूग प्राइज़ मिल चुका है, यह प्राइज़ उन विषयों के लिए दिया जाता है, जिन विषयों पर नोबेल नहीं मिलता है। लेकिन उन्हें हाल-फ़िलहाल में मोदी के खिलाफ अपनी किताब The Public Intellectual in India में लिखने के लिए अधिक जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने नयनतारा सहगल, अमिताव घोष, मरहूम गिरीश कर्नाड और खूँखार नक्सलियों को “बंदूक वाले गाँधीवादी” और पाकिस्तानी सेना को हिंदुस्तानी सेना से बेहतर बताने वाली लेखिका अरुंधति रॉय के साथ मिलकर मोदी को हराने की अपील वाला पत्र लोकसभा चुनावों के ठीक पहले जारी किया था।