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अयोध्या : खोजी पत्रकारिता के नाम पर इंडियन एक्सप्रेस का फरेब: 15 किमी की दूरी को 5 किमी में समेटा… दूसरे जिले की जमीन को भी राम मंदिर से जोड़ा

                                         अयोध्या की जमीनों को विवादित बनाने की कोशिश क्यों?
तारीख: 24 दिसंबर 2021। इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। श्यामलाल यादव और संदीप सिंह की यह रिपोर्ट अयोध्या में जमीनों की खरीद से जुड़ी है। ‘खोजी पत्रकारिता’ के नाम पर इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद कुछ ऐसे लोगों या उनके रिश्तेदारों ने जमीन खरीदी है जो ‘पद के दुरुपयोग’ का मामला हो सकता है। ऐसे 14 लोगों का जिक्र इस रिपोर्ट में है। इनमें स्थानीय जन प्रतिनिधि, वे अधिकारी जो अयोध्या में तैनात हैं या रहे हैं, स्थानीय रेवेन्यू अधिकारी और इनके करीबियों के बारे में सवाल उठाया गया है।

इस रिपोर्ट में इंडियन एक्सप्रेस ने ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं रखा था, जिससे जमीनों की खरीद में गड़बड़ी दिखे। ​रिपोर्ट में जिनलोगों का उसने जिक्र किया था, उनलोगों ने भी बातचीत में उसके दावे खारिज कर दिए थे। फिर भी इन जमीनों की खरीद विवादित दिखे, पाठकों के मन में संदेह पैदा हो, ऐसा लगे कि राम मंदिर के नाम पर अयोध्या में लूट मची हुई है, रिपोर्ट में सारी जमीनों को राम मंदिर साइट के 5 किलोमीटर की परिधि में बता दिया गया।

इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने मामले जाँच के निर्देश दिए थे। ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट में जिक्र की गई जमीनों की खरीद की पड़ताल शुरू की। हर जगह जाकर जमीन देखी। जैसे ही हमने पड़ताल शुरू की खोजी पत्रकारिता के नाम पर इंडियन एक्सप्रेस की फरेब की परत एक के बाद एक खुलती गई।

                                                 इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का अंश

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में IAS एमपी अग्रवाल, IPS दीपक कुमार, SDM पीयूष चौधरी, DSP अरविन्द चौरसिया, राजस्व अधिकारी पुरुषोत्तम दास गुप्ता, प्रदेश सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही, रिटायर्ड IAS अधिकारी उमाधर द्विवेदी, लेखपाल बद्री उपाध्याय, कानूनगो सुधांशु रंजन, पेशकार दिनेश ओझा, अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय, गोसाईंगंज से भाजपा विधायक इंद्रप्रताप तिवारी खब्बू, अयोध्या से भाजपा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता और प्रदेश OBC आयोग के सदस्य बलराम मौर्या का जिक्र किया गया है।

ऑपइंडिया ने पाया कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का यह दावा झूठा है कि उसकी रिपोर्ट में उल्लेखित सारी जमीन 5 किलोमीटर के दायरे में है। जिन जमीनों का जिक्र किया गया है उसमें से केवल 5 भूखंड ही ऐसे हैं जो इसके दायरे में आते हैं। कई जमीन दूसरे थाना क्षेत्र और दूसरे जिले तक में भी हैं, लेकिन इन्हें भी राम मंदिर से जोड़ दिया गया है।

OBC आयोग के सदस्य बलराम मौर्या

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में राज्य OBC आयोग के सदस्य बलराम मौर्या का भी नाम है। मौर्या द्वारा महेशपुर में जमीन खरीदने की बात कही गई है। महेशपुर जिला अयोध्या की सीमाओं से बाहर जिला गोंडा में है। साथ ही इसकी राम मंदिर परिसर से दूरी 12 किलोमीटर है, जो इंडियन एक्सप्रेस के 5 किलोमीटर के दावे से ज्यादा है। धर्मनगरी अयोध्या और इस स्थान के मध्य सरयू नदी भी पड़ती है। लगभग 1 किलोमीटर लम्बाई बीच में पड़ने वाले पुल की ही है।

                                                                 साभार – गूगल मैप

सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही

उत्तर प्रदेश सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही की पत्नी और बेटे द्वारा जमीन खरीदने की बात कही गई है। यह जमीन अयोध्या के सरायरासी माँझा क्षेत्र में है। जमीन राममंदिर परिसर से इंडियन एक्सप्रेस के 5 किलोमीटर के दावे से उलट लगभग 14 किलोमीटर दूर है। इस स्थान का थाना क्षेत्र भी राम मंदिर परिसर थाना क्षेत्र से अलग है।

ऑपइंडिया ने सरायरासी गाँव का दौरा किया। वह क्षेत्र अभी अधिकतर वीरान है। यह वही गाँव है जहाँ के कई लोगों ने अयोध्या मंदिर पर बाबर के हमले के दौरान मंदिर बचाते हुए अपने प्राण दिए थे।

SDM आयुष चौधरी की चचेरी बहन शोभिता रानी द्वारा रामजन्मभूमि मंदिर परिसर के 5 KM के अंदर 2 अलग-अलग जमीन खरीदे जाने की बात कही गई है। ऑपइंडिया ने इन दोनों स्थानों का दौरा किया। मई 2020 में खरीदी गई पहली जमीन गाँव बिरौली में है, जो राम मंदिर परिसर से लगभग 13 KM दूर है। जमीन झुरमुटों और बेहद ऊबड़-खाबड़ इलाके में है। रास्ता धूल से भरा है।

यह सड़क बिलहरघाट और मसौधा नाम के 2 स्थानीय बाजारों को जोड़ती है।

दूसरी जमीन अयोध्या के गाँव मलिकपुर में है। यह स्थान राम मंदिर से लगभग 10 KM के फ़ासले पर है। दोनों जमीनों के थाना क्षेत्र भी जन्मभूमि परिसर से अलग हैं। यह जमीन नवम्बर 2019 में शोभिता द्वारा संचालित एक संस्था के नाम पर खरीदने का दावा किया गया है। SDM आयुष चौधरी अयोध्या जिले के विभिन्न क्षेत्रों में अक्टूबर 2019 से अक्टूबर 2021 तक तैनात रहे हैं। फिलहाल उनकी तैनाती कानपुर जिले में है।

कानूनगो सुधांशु रंजन और लेखपाल बद्री उपाध्याय

रिपोर्ट के मुताबिक कानूनगो सुधांशु रंजन और लेखपाल बद्री उपाध्याय के परिजनों ने गंजा गाँव में जमीन खरीदी। कानूनगो सुधांशु की पत्नी अदिति द्वारा मार्च 2021 जमीन खरीदने का दावा किया गया है। वहीं लेखपाल बद्री उपाध्याय के पिता वशिष्ठ नारायण ने भी मार्च 2021 में ही उसी क्षेत्र में जमीन ली।

ऑपइंडिया की टीम ने इस गाँव का दौरा किया। गंजा गाँव भी राम मंदिर परिधि से लगभग 9 KM दूर है। इसका थानाक्षेत्र भी रामजन्मभूमि से अलग है। यह स्थान अयोध्या-प्रयागराज राजमार्ग पर पड़ने वाले डाभासेमर बाज़ार के पास एक गाँव में आता है।

                                                                                       साभार- गूगल मैप

DSP अरविन्द चौरसिया

इंडियन एक्सप्रेस का दावा है कि अरविन्द चौरसिया के रिश्तेदारों ने अयोध्या के हरकारा का पुरवा और कोरखाना में जमीन खरीदी। यह जमीन चौरसिया के ससुर संतोष कुमार और सास रंजना के नाम से हैं। जमीन जून और सितम्बर माह 2021 में खरीदी गई है। चौरसिया अयोध्या जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में बतौर DSP जुलाई 2017 से अगस्त 2020 तक तैनात रहे। ऑपइंडिया ने इन दोनों स्थानों का दौरा किया। दोनों जमीनों के थाना क्षेत्र राम मंदिर से अलग पाए गए। पहली जमीन हरकारा का पुरवा राम मंदिर से लगभग 15 KM और दूसरी जमीन कोरखाना लगभग 7 KM दूर है। हरकारा का पुरवा अयोध्या-आज़मगढ़ मार्ग पर स्थित है, जबकि कोरखाना अयोध्या कैंट क्षेत्र की बाहरी सीमाओं पर है।

DSP अरविन्द चौरसिया वर्तमान में मेरठ शहर के DSP कोतवाली हैं। जमीन खरीदे जाने के समय भी यहीं थे। पिछले माह मेरठ के कुख्यात कबाड़ी हाजी गल्ला पर कानूनी कार्रवाई करने वाली टीम में वो भी शामिल रहे हैं। हाजी गल्ला के आपराधिक प्रभाव की चर्चा खुद मुख्यमंत्री योगी और उसके इलाके सोतीगंज का नाम प्रधानमंत्री मोदी ने भी लिया था। हाजी गल्ला को पिछली सरकारों के राजनैतिक संरक्षण होने की भी बात कही गई थी।

                                                                                          साभार- गूगल मैप

MRVT की जमीन

विवाद के सबसे प्रमुख विषय के रूप में MRVT (महर्षि रामायण विद्यापीठ ट्रस्ट) का नाम है। इस ट्रस्ट की कुछ जमीनों पर न्यायालय में केस चल रहा है। इसी ट्रस्ट पर दलित से जमीन खरीदने के भी आरोप हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में इन जमीनों को IAS एमपी अग्रवाल, वर्तमान में ADM गोरखपुर पुरुषोत्तम दस गुप्ता, गोसाईंगंज विधायक इंद्रप्रताप तिवारी उर्फ़ खब्बू, वर्तमान DIG अलीगढ़ IPS दीपक कुमार, रिटायर्ड IAS उमाधर द्विवेदी से जोड़ा गया है।

ऑपइंडिया की टीम ने बरहटा माझा का दौरा किया। यह स्थान इंडियन एक्सप्रेस के राम मंदिर से 5 किलोमीटर दायरे के दावे के अंदर पाया गया। यहाँ पर 3 बड़े-बड़े प्लॉटों में बाउंड्री और बड़े गेट लगे दिखे। स्थानीय लोगों ने इन्ही जमीनों को कमिश्नर और DIG के संबंधियों द्वारा खरीदी जमीन बताया। इस स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर नदी के पास दावे के मुताबिक भाजपा विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ़ खब्बू के रिश्तेदार द्वारा ली गई जमीन है। इंद्रप्रताप तिवारी उर्फ़ खब्बू तिवारी फिलहाल एक अन्य मामले में अयोध्या की जेल में हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ये वहीं जमीनें हैं जिनकी दलितों से खरीद को लेकर विवाद चल रहा है, क्योंकि MRVT की सभी जमीनें विवादित नहीं हैं।

विधायक वेद प्रकाश गुप्ता और मेयर ऋषिकेश उपाध्याय

बरहटा माझा में भाजपा विधायक वेद प्रकाश के परिजन द्वारा जमीन लिए जाने का दावा है। यह जमीन राम मंदिर से 5 किलोमीटर के दायरे में जरूर है, लेकिन इसकी खरीदारी MRVT ट्रस्ट से नहीं हुई है। यहाँ पर अधिकतर जमीनों पर मकान बने हुए हैं। सड़कों की हालत ठीक नहीं। नदी के किनारे बने बाँध के बगल स्थित इस इलाके में अधिकतर जमीनें MRVT ट्रस्ट की हैं। मेयर ऋषिकेश उपाध्याय द्वारा काजीपुर चितावा में जमीन लिए जाने का जिक्र है। इस जमीन की दूरी राम मंदिर से 5 किलोमीटर से कुछ ही अधिक है। यह जमीन भी MRVT ट्रस्ट की नहीं है।

IAS अनुज कुमार झा

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में आईएएस अनुज कुमार झा का जिक्र नहीं है। पर कई मीडिया रिपोर्टों में उनके रिश्तेदारों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। वे अयोध्या में डीएम रह चुके हैं। इन आरोपों पर उनका जवाब भी सामने आ चुका है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने या उनके किसी संबंधी ने महर्षि रामायण विद्यापीठ ट्रस्ट से जमीन नहीं खरीदी है। उनके पिता ने एक अन्य स्थान पर रहने के लिए 320 स्क्वायर मीटर जमीन खरीदी है, जिसका MRV ट्रस्ट से कोई लेना-देना नहीं है। वह जमीन किसी दलित की भी नहीं है। यह भी बताया है कि उनके पिता ने यह जमीन किसी ट्रस्ट को नहीं बेची। इसका किसी सरकारी काम में उपयोग नहीं किया गया है।(साभार)

‘अल्लाह का शुक्रिया, Covid ने मुसलमानों को डिटेन्शन कैंप से बचाया’: इरेना अकबर, इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार

नागरिकता संशोधक कानून विरोधी कोरोना महामारी में भी जनता में जहर फ़ैलाने से बाज़ नहीं आ रहे। इंडियन एक्सप्रेस के साथ काम कर चुकी ‘पत्रकार’ इरेना अकबर ने कोविड-19 महामारी के लिए खुदा का शुक्रिया कहा है और यह दावा किया है कि यदि कोरोनावायरस नहीं होता तो भारतीय मुसलमान डिटेन्शन कैंप में होते। एक पत्रकार होते हुए, इरेना को नागरिकता कानून की पूर्ण जानकारी नहीं, या फिर जानकारी होते हुए न होने के स्वांग से अपने अल्पज्ञान से मुसलमानों को भ्रमित करना साबित करता है कि वह एक पत्रकार कम, घुसपैठियों की मददकार अधिक हैं। उनका यह बयान उस दौरान आया जब लिबरल्स यह चर्चा कर रहे थे कि कोविड-19 से लड़ने में किसी ‘संघी’ की सहायता करनी चाहिए अथवा नहीं। जिस समाचार समूह में इरेना जैसे पत्रकार होंगे, उस समाचार पत्र की विश्विनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। 

इरेना अकबर ने कहा, “यदि कोरोना वायरस नहीं होता तो भारतीय मुसलमान डिटेन्शन कैंप में होते। हालाँकि मैं वायरस की शुक्रगुजार नहीं हूँ जिसने मेरी आंटी की जान ली, जिसने मेरे अब्बू को आईसीयू में पहुँचा दिया और कई घरों में ट्रेजेडी का कारण बन गया। मैं इस तथ्य पर बात कर रही हूँ कि जब ‘फासीवादी’ अपने प्लान बना रहे थे तब अल्लाह ने अपना प्लान बना दिया।“

अकबर ने आगे कहा, “भारतीय मुसलमानों के लिए यह कुआँ और खाई की स्थिति है। या तो वो कोविड-19 के डर से मरें या फिर राज्य व्यवस्था की मुस्लिम विरोधी हिंसा के डर से। हालाँकि कोविड-19 हमें चुनकर निशाना तो नहीं बना रहा क्योंकि दूसरे केस में जनता इसका (राज्य आधारित मुस्लिम विरोधी हिंसा) आनंद लेगी।

ऐसा ही एक बयान राहुल गाँधी के सहयोगी अब्बास सिद्दीकी ने पिछले साल कोरोनावायरस की महामारी के दौरान दिया था। सिद्दीकी ने अल्लाह के वायरस से 50 करोड़ भारतीयों की मौत की दुआ माँगी थी। 

न तो भारत में कोई डिटेन्शन कैंप बनाया गया है और न ही मुस्लिमों के खिलाफ कोई राज्य आधारित हिंसा हो रही है लेकिन तथाकथित पत्रकारों द्वारा संकट के समय में ऐसे बयान देना उनकी विषाक्त मानसिकता को जरूर बताता है।

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इरेना अकबर हमेशा से ही ऑनलाइन मंचों पर घृणास्पद बयान देने के लिए जानी जाती रही है। फरवरी 2020 में अकबर ने दलितों पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिमों का गैंगरेप और उनकी हत्या की थी। अकबर हिंदुओं के द्वारा चलाए जा रहे व्यापार के बहिष्कार की बात भी कर चुकी है। उसने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा जामिया के पक्ष में आवाज न उठाने पर घोर निराशा भी व्यक्त की थी। https://fb.watch/4XtLb82jL_/   

'इंडियन एक्सप्रेस' ने भारत-रूस रिश्ते को लेकर चलाई फेक न्यूज़, पुतिन प्रशासन ने लगाई लताड़

भारत-रूस रिश्ते को लेकर देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों में से एक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने झूठ फैलाया है, जिसका रूसी दूतावास ने खंडन किया। रूसी दूतावास ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, “भारतीय मीडिया के एक बड़े प्रकाशन संस्थान के सूत्र गुमराह करने वाले सूत्रों से प्रेरित प्रतीत होते हैं।” ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने दावा किया था कि रूस ने भारत को बातचीत से बाहर रखा है, ऐसे में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान शांति बैठक में भारत को शामिल किया है।

इस खबर में अप्रत्यक्ष रूप से इशारा किया गया था कि भारत और रूस के रिश्ते बिगड़ रहे हैं और रूस ने भारत के साथ बातचीत बंद कर दी है। खबर में बताया गया था कि अमेरिकी स्टेट सेकेट्री एंटोनी ब्लिंकेन ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी को लिखे पत्र में कहा है कि अमेरिका, भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान को मिल कर इस मामले पर बात करनी चाहिए। अफ़ग़ानिस्तान के लिए ‘यूनिफाइड एप्रोच’ के लिए ऐसा करने को कहा गया।

लेकिन, रूस का कहना है कि भारत के साथ उसके रिश्ते मधुर हैं और बातचीत रुकी ही नहीं है। रूस ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को फटकार लगाते हुए कहा, “भारत-रूस के बीच हमेशा से नजदीकी सम्बन्ध रहे हैं और दोनों भविष्य को देखते हुए वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर साथ मिल कर कार्य करते रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति भी अपवाद नहीं है।” रूस ने भारतीय मीडिया में चल रहे झूठ को बेनकाब किया।

रूसी दूतावास ने लिखा, “द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताओं में कई बार इस साझेदारी पर जोर दिया गया है, जिसमें अफ़ग़ानिस्तान कॉन्टैक्ट ग्रुप और मॉस्को कन्सल्टेशन्स शामिल हैं। अफ़ग़ानिस्तान समझौते की जटिलता को देखते हुए एक क्षेत्रीय आम-राय की तरफ आगे बढ़ना और अमेरिका समेत सभी साझेदारों के साथ तालमेल बिठाना काफी ज़रूरी है। दोहा में यूएस-तालिबान के बीच हुए समझौते को यूएन सुरक्षा परिषद ने मान्यता दी थी।”

रूस ने कहा कि वो भी इसी समझौते के हिसाब से आगे बढ़ रहा है। रूस ने इस बात पर जोर देते हुए दोहराया कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत का एक बहुत बड़ा किरदार है और इसके लिए समर्पित वार्ताओं में इसकी भागीदारी स्वाभाविक है। रूसी दूतावास ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की उस खबर का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया, जिसमें ‘रूस द्वारा भारत को वार्ता से बाहर रखने’ का दावा किया गया था। साथ ही हैडिंग के उस हिस्से को लाल रंग से प्रदर्शित किया।

इससे पहले ‘द प्रिंट’ इसी तरह की हरकत कर चुका है। ‘द प्रिंट’ ने दावा किया था कि QUAD राष्ट्रों (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान) से रूस खफा है, इसीलिए पिछले 20 वर्षों में पहली बार भारत-रूस की वार्षिक समिट नहीं होगी। क्रेमलिन ने इस खबर को गलत बताते हुए इसे ‘फेक न्यूज़’ और सनसनी पैदा करने के लिए लिखी गई खबर करार दिया था। रूस ने कहा था कि भारत क्षेत्रीय एकता के समावेशी रूप को बढ़ावा दे रहा है, वो तारीफ के लायक है।

इंडियन एक्सप्रेस क्यों झूठी खबरें फैला रहा है?

इंडियन एक्प्रेस ने फैलाया झूठ
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक समय था जब इंडियन एक्सप्रेस अपनी निर्भीक पत्रकारिता के लिए चर्चित था। भारत-पाक युद्ध के दौरान समझौते के लिए ताशकंत तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की वहीं मृत्यु होने पर दिल्ली के समस्त दैनिक अख़बार पूरा कर घर लौट चुके थे, लेकिन मात्र यही अख़बार था, जिसने टेलीप्रिंटर पर समाचार आते ही, अपने प्रिंटिंग स्टाफ को रोक न्यूनतम यानि गिनती के स्टाफ के दम पर अपना प्रथम बदल कर देश को शास्त्री जी का दुखद समाचार देकर सबको आश्चर्यचकित कर समस्त अख़बार रद्दी करवा दिए थे। 
फिर देश में लगी आपातकाल में मीडिया पर लगी सेंसरशिप का घोर विरोध इसी अख़बार ने किया था। खबर सरकार द्वारा सेंसर होने पर उस खबर के स्थान काला Censored प्रकाशित होता था। लेकिन आज वही अख़बार झूठी खबरें प्रकाशित कर कौन सी प्रसिद्धि प्राप्त करना चाह रहा है। नेताओं और सियासतखोरों द्वारा तुष्टिकरण समझ आता है कि चुनाव में कुर्सी चाहिए, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस तुष्टिकरण किस लिए और किसके लिए कर रहा है? क्यों तुष्टिकरण के आधार पर झूठी खबरें प्रकाशित कर तब्लीग़ियों की मदद कर रहा है?
गुजरात हॉस्पिटल में धर्म व मजहब के नाम पर इलाज करने की झूठी खबर 
कोरोना वायरस संक्रमण के बीच मीडिया गिरोह आधी-अधूरी जानकारी पर अफवाहें फैलाने का काम कर रहा है। पिछले दिनों इस संबंध में ‘द वायर’ के एजेंडे की पोल खुली थी और अब बारी इंडियन एक्सप्रेस की है। दरअसल, बुधवार (अप्रैल 15, 2020) को इंडियन एक्प्रेस में एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें दावा किया गया कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में धर्म व मजहब को देखते हुए मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए गए हैं। रिपोर्ट में वजन डालने के लिए ये भी कहा गया कि अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट गुणवंत एच राठौड़ ने खुद दावा किया है कि सरकार के फैसले के अनुसार हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वार्ड तैयार किए गए हैं।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक डॉक्टर राठौड़ ने कहा, “आमतौर पर महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग वार्ड होते हैं। लेकिन यहाँ हमने हिंदू और मुस्लिम मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड बनवाए हैं।” इतना ही नहीं रिपोर्ट ये भी कहती है कि जब डॉक्टर से इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये सरकार का निर्णय है। आप उनसे पूछ सकते हैं।



इंडियन एक्सप्रेस की ये रिपोर्ट वाकई चौंकाने वाली है कि धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसा भेदभाव क्यों? अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग USCIRF ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तरह का दावा किया। लेकिन इन सभी रिपोर्टों पर उस समय सवालिया निशान लग गया, जब गुजरात सरकार ने ऐसे किसी भी वर्गीकरण को ख़ारिज कर दिया। गुजरात के स्वास्थ्य विभाग ने भी इस बिंदु को पूरी तरह से खारिज करते हुए अपनी ओर से बयान जारी किया।
स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में किसी भी मरीज के लिए धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं किया गया है। कोरोना मरीजों को उनके लक्षण, उनकी गंभीरता के आधार पर और डॉक्टरों की सिफारिशों आदि पर इलाज किया जा रहा है।
इसके बाद, डॉक्टर राठौर का खुद भी इस संबंध में बयान आया। उन्होंने कहा ”मेरा बयान कुछ खबरों में गलत तरीके से पेश किया जा रहा है कि हमने हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग वार्ड बनवाएँ। मेरे नाम पर गढ़ी गई ये रिपोर्ट झूठी और निराधार है। मैं इसकी निंदा करता हूँ।” उन्होंने ये भी बताया कि वार्डों को महिला-पुरुष और बच्चों के लिए अलग-अलग किया गया है, वो भी उनकी मेडिकल स्थिति देखकर न कि धार्मिक आधार पर।
वहीं विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में अमेरिकी आयोग के दावे को ख़ारिज किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी अमेरिकी आयोग भारत में कोविड-19 से निपटने के लिए पालन किए जाने वाले पेशेवर मेडिकल प्रोटोकॉल पर गुमराह करने वाली रिपोर्ट फैला रहा है।
ये पहला मौक़ा नहीं है जब इंडियन एक्सप्रेस ने किसी खबर को धार्मिक रंग देने का प्रयास किया हो। 2019 में भी ऐसा मामला आया था। उस समय इंडियन एक्प्रेस में एक घटना को साम्प्रदायिक रूप देकर तूल दिया था और रिपोर्ट की थी कि 5 लोगों ने धर्म जानने के लिए 1 मुस्लिम को बुरी तरह मारा। जबकि पीड़ित ने खुद इस तरह का कोई बयान नहीं दिया था। मगर, इंडियन एक्प्रेस ने इस घटना को बिना आधार मजहबी रंग दिया। 
इसी प्रकार साल 2015 में इंडियन एक्प्रेस ने दावा किया अहमदाबाद में नगर निगम द्वारा संचालित जो स्कूल मुस्लिम बहुल इलाके में हैं उनकी यूनिफॉर्म हरे रंग की है। वहीं हिंदू बहुल इलाके में केसरिया। बाद में पता चला कि यह मीडिया संस्थान की कल्पना से इतर कुछ नहीं था। असल में यूनिफॉर्म के कलर को लेकर फैसला स्कूल की प्रबंधन समिति ने अपनी पसंद के हिसाब से किया था।
आँध्र प्रदेश, तबलीगी जमात, कोरोना वायरस
खबर तबलीगी जमातियों की और फोटो हिंदू पति-पत्नी की
दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ से होकर वापस लौटे तबलीगी जमातियों के कारण कम से कम 40 बच्चों पर कोरोना की गाज गिरी है। मात्र 3-17 साल के ये बच्चे आँध्र प्रदेश में कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी बच्चे अपने परिजनों के कारण संक्रमित हुए, जो जमात के कार्यक्रम में शामिल होकर घर वापस लौटे थे।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में कहा कि सभी बच्चे दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात की बैठक में भाग लेने वाले परिजनों से वायरस के संपर्क में आए। रिपोर्ट की मानें तो जमात में शामिल होकर वापस लौटने वालों को ये नहीं मालूम था कि वे संक्रमित हैं और अंजाने में उन्होंने ये संक्रमण अपने परिवार के सदस्यों को दे दिया। हालाँकि, प्रशासन का कहना है कि संक्रमित हुए बच्चों में से किसी की हालत अभी गंभीर नहीं है। इसलिए हो सकता है ये जल्दी ठीक हो जाएँ।
15 अप्रैल तक आँध्र प्रदेश में कोरोना के 475 मामले सामने आए थे। इन 475 में 124 महिलाएँ थीं। अधिकारियों ने कहा कि कुछ मामलों में परिवार के एक संक्रमित सदस्य, जो निजामुद्दीन मरकज से होकर लौटा था, उसने परिवार में सभी महिलाओं, माताओं, बहनों, पत्नियों, बेटियों और दादी को संक्रमण दे दिया। एक जानकारी के अनुसार, जहाँ ये कहा जा रहा है कि ये वायरस बुजुर्गों के लिए सबसे खतरनाक है, वहाँ आँध्र प्रदेश में 36 ऐसे केस हैं, जिनकी उम्र 60 पार कर चुकी है।
आंध्र प्रदेश में कोरोना फैलने के पीछे तबलीग 
अभी हाल ही में आँध्र प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ने कोरोना फैलाने के लिए जमातियों को जिम्मेदार ठहराया था।। हालाँकि बाद में उन्होंने लोगों की प्रतिक्रिया देखकर इसे वापस लेने की बात की थी। वहीं तेलंगाना के स्वास्थ्य मंत्री एटेला राजेंदर ने भी माना था कि जमाती अगर नहीं होते तो राज्य कोरोना वायरस से मुक्त हो जाता। एक खबर के अनुसार आँध्र प्रदेश व तेलंगाना दोनों जगहों के 250 हॉट्सपॉट ऐसे हैं, जिनका संबंध सीधा तबलीगी जमात से है।
एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को राज्य में 19 नए मामले सामने आए। मगर, 16 अप्रैल को सुबह 8 बजे तक ये संख्या 22 नए मामले के साथ बढ़ गई और राज्य में कोरोना पॉजिटिवों की संख्या 525 पहुँच गई। संक्रमितों में से 20 मरीज रिकवर कर चुके हैं। जबकि राज्य में 14 लोगों की मौत हो गई है। कुरनूल जिले में सबसे अधिक 75 मामले हैं, इसके बाद गुंटूर और नेल्लोर जिले में क्रमशः 51 और 48 मामले हैं।
आलोचनाओं के घेरे में 
इंडियन एक्सप्रेस को कोरोना पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए पिछले 2 दिनों से सोशल मीडिया पर घेरा जा रहा है। इससे पहले उन्होंने अपनी एक रिपोर्ट में अहमदाबाद के अस्पताल को लेकर झूठे दावे किए थे और अब इस रिपोर्ट को भी सोशल मीडिया पर जमकर दुत्कारा जा रहा है। इस आलोचना के पीछे वजह इंडियन एक्प्रेस की वो हरकतें हैं, जो हर बार किसी भी एक खबर को धार्मिक रंग देने में प्रयासरत रहती है।

इसी रिपोर्ट को देखिए। जिसमें भीतर में साफ लिखा है कि बच्चों को कोरोना उनके उन परिजनों के कारण हुआ, जो जमाती थे। मगर संस्थान ने इस खबर में एक ऐसी फीचर इमेज का इस्तेमाल किया, जिसमें एक हिंदू कपल की स्क्रीनिंग होते दिखाई गई। इसका क्या मतलब है? क्या जमातियों की या मरकज की तस्वीरें मौजूद नहीं हैं? या फिर अपने पाठकों को बरगलाना है?
अवलोकन करें:-

संस्थान की इस हरकत के लिए न केवल सोशल मीडिया यूजर्स उनकी मंशा पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। बल्कि लेखिका शेफाली वैद्य ने भी इस पर प्रश्न उठाया है और साथ ही भ्रामक तस्वीर के लिए मीडिया संस्थान को लताड़ा है। उन्होंने पूछा है कि क्या खबर के अनुरूप तस्वीर इस्तेमाल करना ईशनिंदा होती?

रोमिला थापर जैसे वामपंथियों ने गढ़े हिन्दू-मुस्लिम एकता की कहानी, किया इतिहास से खिलवाड़: विलियम डालरिम्पल

भारतीय इतिहास, वामपंथ
आर.बी.एल.निगम
इतिहासकार और लेखक विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple) ने एक कार्यक्रम के दौरान यह स्वीकार किया कि देश में वामपंथी शिक्षाविदों और नेहरूवादी इतिहासकारों ने वास्तव में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को अपने क़ब्ज़े में कर भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद अपने प्रोपेगेंडा को फैलाना शुरू कर दिया था।
डालरिम्पल ने कोई ऐसी बात नहीं की, जिससे भारतीयों का सिर झुके, बल्कि उन्होंने भारत के समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों पर करारा प्रहार किया है। अक्सर मित्रों, सम्बन्धियों एवं अक्सर अपने लेखों में लिखता रहा हूँ, कि "हम शिक्षित भारतीय शिक्षित होते हुए भी अपने वास्तविक इतिहास के विषय में किसी अशिक्षित से कम नहीं।" जब कभी कोई भारत के वास्तविक इतिहास की बात करता है, उसे संघी, भाजपाई, पागल, शांति का दुश्मन, फिरकापरस्त और न जाने कितने उपनामों से अलंकृत किया जाता रहा है। सेवानिर्वित होने उपरांत एक हिन्दी पाक्षिक का लगभग 3 वर्ष संपादन करते लिखा "लाल किला किसने और कब बनवाया?" जिसकी भरपूर आलोचना भी हुई, मुझे और मेरे माता-पिता के लिए भी अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया। आ गए 2014 के चुनाव। एक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भाजपा पर भारतीय इतिहास और भूगोल को बिगाड़ने का आरोप लगाए जाने पर अपने स्तम्भ "झोंक आँखों के धूल-चित्रगुप्त" में शीर्षक "प्रधानमंत्री राष्ट्र को बताइएं"(देखिए संलग्न पृष्ठ) के अंतर्गत इतिहास से सम्बंधित प्रश्न करने पर लाल किला लेख पर मुझे अपशब्द कहने वालों की ऐसी स्थिति हो गयी, मानो घर में कितना बड़ा मातम हो गया। और जिन इतिहासकारों का डालरिम्पल ने वर्णन किया है, उन्ही छद्दम इतिहासकारों के अलावा अन्य इतिहासकारों से पूछकर डॉ सिंह को जवाब देने के लिए कहा था।      
पिछले हफ्ते दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस द्वारा आयोजित एक टॉक शो – ‘Express Adda’ में बोलते हुए, लेखक डालरिम्पल ने कहा कि यह सच था कि शुरुआत में नेहरूवादी पाठ्य-पुस्तकें रोमिला थापर और अन्य मार्क्सवादियों द्वारा लिखी गई थीं। उन्होंने यह भी कहा कि मार्क्सवादियों ने दिल्ली के राजनीति चश्मे से मुगलों का महिमामंडन और हिन्दू-मुस्लिम एकता के खोखले दावे करते हुए मनगढ़ंत इतिहास को गढ़ने का काम किया। इतिहास लेखन के कार्य में वामपंथियों ने दक्षिणपंथियों को बिल्कुल हाशिए पर रखा और उनके लिए कोई जगह बाक़ी नहीं छोड़ी, जबकि वो यह अच्छी तरह से जानते थे कि वास्तव में वो भारत का इतिहास था ही नहीं, जिसका प्रचार वामपंथी अपने प्रोपेगेंडा के तहत कर रहे थे।
इस कार्यक्रम के होस्ट ने डालरिम्पल से पूछा कि क्या यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद क्या शिक्षाविदों का वामपंथियों द्वारा हरण कर लिया गया था और क्या अकादमिक हिस्से पर वामपंथियों ने लगभग कब्जा कर लिया था, जैसा दक्षिणपंथियों द्वारा आरोप लगाया जाता रहा है?
इसका जवाब देते हुए विलियम डालरिम्पल ने कहा कि विशेष रूप से 1950 के दशक में लिखी गई इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों पर उनकी प्रामाणिकता को लेकर आज भी कई तरह के शक बरक़रार हैं। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर के लगभग सभी नेहरूवादी इतिहासकार महान इतिहासकार थे, जबकि इसके विपरीत दक्षिणपंथी इतिहासकारों की अगली पीढ़ी में वो बात नहीं दिखी।
इस पर डालरिम्पल से पूछा गया कि क्या उनका यह मतलब है कि दक्षिणपंथी वर्ग के द्वारा वामपंथी इतिहासकारों पर जो आरोप लगाए जाते रहे हैं, वो सही हैं? तो डालरिम्पल ने जवाब देते हुए कहा, “मार्क्सवादियों द्वारा लिखी गई इतिहास की किताबों में हिन्दू-मुस्लिम एकता को चाशनी में डूबा, कुछ ज्यादा ही महिमामंडित करता हुआ दर्शाया गया, इसलिए वामंथियों द्वारा गढ़े जा रहे मनगढ़ंत इतिहास पर उन्हें आपत्ति होती थी, जिसका वो पुरज़ोर विरोध भी करते थे।
दरअसल, इस सब बातों में ग़ौर करने वाली बात यह है कि विलियम डालरिम्पल का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब इन मार्क्सवादी इतिहासकारों की विश्वसनीयता और पक्षपात को लेकर देश भर में बड़ी बहस छिड़ी हुई है। इन्होंने (वामपंथियों) अपनी विचारधारा को जनता के बीच पहुँचाने के लिए पाठ्य-पुस्तकों को अपने प्रचार करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। अत: अब यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि हमने जो भारतीय इतिहास पढ़ा है, वह मनगढ़ंत है, और यह वामपंथियों की देन है।
इतिहास की ये पाठ्य-पुस्तकें कुछ और नहीं बल्कि उन नेहरूवादी शिक्षाविदों और मार्क्सवादी विद्वानों की करतूत हैं, जिनके अंदर एक हिन्दू-बहुल देश में हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार से डर बैठा हुआ था। यही कारण है कि धीरे-धीरे एक आंदोलन पनप रहा है, जिसके तहत भारत के इतिहास की किताबों के संशोधन की माँग लगातार की जा रही है।

लाल बहादुर शास्त्री की मौत की जांच कराए मोदी सरकार -- अनिल शास्त्री

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के छोटे पुत्र अनिल शास्त्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध है कि पिताजी की मौत से जुड़े दस्तावेजों का खुलासा किया जाए। राजनारायण कमेटी की रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जाए। हो सकता है उनकी मौत प्राकृतिक हुई हो, लेकिन संदेह से परदा उठना चाहिए।
लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय के लोकार्पण समारोह के बाद पत्रकारों से बातचीत में अनिल शास्त्री ने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि मैं कहीं रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर जाता हूं तो लोग पूछते हैं, शास्त्री जी की मौत का कारण क्या था?
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उपरोक्त लेख में उठाए गए प्रश्न आज भी अनसुलझे पड़े हैं ! क्यों?
अनिल शास्त्री 1989 में वाराणसी के सांसद रहे हैं। उन्होंने कहा कि सेंट्रल  इंफॉरमेशन कमिश्नर ने पीएमओ को पत्र लिखा है कि शास्त्री जी की मौत से संबंधित दस्तावेज का खुलासा होना चाहिए। सीआईसी ने पीएमओ को यह भी लिखा है कि जनता पार्टी ने 1977 में राजनारायण कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी की रिपोर्ट मिल नहीं रही है। इस रिपोर्ट को जनता के बीच सार्वजनिक करना चािहए। रिपोर्ट का न मिलना गंभीर मसला है। 
शास्त्री जी की मौत पर सवाल उठने के कई कारण हैं। जहां उन्हें ठहराया गया था वह जगह ताशकंद शहर से 15 किमी दूर थी। जहां डाक्टरों को पहुंचने में 15 से 20 मिनट लग गये। जहां वह ठहरे थे, वहां चिकित्सकीय व्यवस्था तक नहीं थी। यदि एंबुलेंस होती तो कम से कम अस्पताल तक पहुंचा सकती थी।
सबसे बड़ी बात यह है कि एक प्रधानमंत्री के शयन कक्ष में अपने निजी सचिव को बुलाने के लिए न तो घंटी थी और न ही टेलीफोन। जिस समय उनकी तबियत खराब हुई वे निजी सचिव के पास जाने के लिए कुछ दूर तक चलकर आए। न तो उनकी डायरी वापस आई और न ही थर्मस। 
शास्त्री जी की नवासी मेरी समधन श्रीमति शीला श्रीवास्तव भी अक्सर फुर्सत के क्षणों में अपने नाना को याद करते बताती है कि "अपने नाना को अंतिम बार ताशकंत जाते देखा था, लेकिन वहां से उनका शव आने पर किसी को उनके पास तक नहीं जाने दिया था। नानी (श्रीमती ललिता शास्त्री) और बड़े मामा हरी द्वारा खूब हंगामा करने उपरान्त ही सिर्फ बड़ों को उनके पास जाने दिया था। नाना के शरीर पर जगह-जगह नीले निशान पड़े हुए थे।" अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या उस समय हमारी चिकित्सा पद्द्ति इतनी निष्क्रिय थी कि मृतक के शरीर पर पड़े नीले निशानों का आकलन कर सके? यदि नहीं, तो पोस्ट-मॉर्टम क्यों नहीं करवाया गया? किन लोगों ने ऐसा करने से रोका था? जो शायद सिद्ध करता है कि लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु, मृत्यु नहीं बल्कि राजनायिक हत्या थी। 
कहते हैं, 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान शास्त्रीजी केवल सीमा पर  दुश्मन से नहीं, बल्कि देश में छिपे बैठे पाकिस्तान समर्थकों से भी लड़ाई लड़ रहे थे। देश से गद्दारी कर रहे किसी भी प्रतिभाशाली तक को नहीं बक्शा था। जो छद्दम धर्म-निरपेक्षों को रास नहीं आने के कारण ही शायद उनकी हत्या करवा दी गयी थी। जिसका उल्लेख स्वतन्त्र पत्रकारिता करते अपने सर्वाधिक प्रकाशित लेख "देश की राजनीती में अभिनेताओं का हस्तक्षेप" में किया था, जिसे अपनी पुस्तक में भी सम्मिलित किया था।  उन दिनों गैर-फ़िल्मी "कहनी है एक बात हमें आज, देश के वीर सिपाहियों से, संभल कर रहना, देश में छिपे गद्दारों से..." गीत बहुत चर्चित था। काश ! ताशकंत से जीवित आ गए होते, देश से गद्दारी करने वालों का बहुत ही बुरा हश्र होता, इस काम को "बौना" शास्त्री ही कर सकते थे? शायद यही कारण है 2 अक्टूबर को जिसे देखो गाँधी-गाँधी करता  रहता है, शास्त्रीजी को कितने लोग याद करते हैं? 
शास्त्रीजी की मृत्यु का समाचार सर्वप्रथम अंग्रेजी दैनिक Indian Express में प्रकाशित हुआ था। बाजार में सबसे देरी से आने के बावजूद, सर्वाधिक बिकने वाला भी वही दैनिक था। क्योकि टेलीप्रिंटर पर रात को जिस समय समाचार आया था, उस समय सम्पादकीय विभाग भी काम पूरा कर अपने घर को निकल चुके होते थे। किसी कारणवश एक्सप्रेस सम्पादकीय के कुछ रुके हुए थे, समाचार देखते ही मुख्यसंपादक से सम्पर्क कर, छपाई रुकवाकर, बचे हुए स्टाफ ने प्रथम पृष्ठ तैयार कर ताजे समाचार के साथ शोक समाचार दिया।     

जहां बीता बचपन आज वहां तीन पीढ़ियां एक साथ

मौका था लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय के लोकार्पण समारोह का। माहौल था राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इंतजार का। इन सबके बीच पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की तीन पीढ़ियां लंबे समय बाद एक साथ उस आवास में एकत्र हुई जहां बचपन बीता था। सबके चेहरे पर अपने घर के संग्रहालय बनने की खुशी दिखी।

नई पीढ़ी के लोगों को पुरानी पीढ़ी के लोग बताते दिखे की यहां पर सोते थे, यहां खेलते थे। बचपन में छिपने के स्थान और फूटी खपरैल से बारिश में टपकती बूंदों के उस स्थान को दिखा रहे थे जो आज चमाचम हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री की तीन पीढि़यों में सुनील शास्त्री, मीरा शास्त्री, मंजू शास्त्री, नीरा शास्त्री, सिद्धार्थनाथ सिंह, विनम्र शास्त्री, जया शास्त्री, वैभव शास्त्री, पूजा शास्त्री, जान्या शास्त्री, समीप शास्त्री, सविता सिंह शामिल रहे। 

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी  

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी दर्शाई गई है। बच्चों के आग्रह पर पूर्व पीएम ने बतौर प्रधानमंत्री एक फिएट बैंक से लोन लेकर खरीदा था। किस्तों की अदायगी के पूर्व वे गोलोकवासी हो गए। बैंक अधिकारियों ने ललिता शास्त्री से किस्त माफ करने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया।
भारत के लाल की ललिता ने सच्ची अर्धांगिनी के रूप में न केवल लौकिक जीवन में उनका ख्याल रखा बल्कि पारलौकिक जीवन में शास्त्री जी के स्वाभिमानी आत्मा पर आंच नहीं आने दी। अपने पारिवारिक पेंशन से कार की बची किस्तों का भुगतान किया।

संग्रहालय में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय में कुल 14 कमरे हैं। इन कमरों में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम दिखाया गया है। उनका जीवन परिचय महत्वपूर्ण तिथियों के साथ एक कमरे में लगाया गया है। इसमें दो अक्तूबर 1904 को पूर्व पीएम के जन्म से लेकर 12 जनवरी 1966 को नई दिल्ली में विजय घाट पर अंत्येष्टि तक के बारे में जानकारी दी गई है। पूर्व पीएम की स्मृतियों से जुड़ी 150 से अधिक चित्र लगाए गए हैं।
एक कमरे में उनके पिता शारदा प्रसाद और माता रामदुलारी देवी का ब्लैक एंड व्हाइट फोटो लगाई गई है। इसमें पूर्व पीएम के वंश वृक्ष का जिक्र किया गया है। एक कमरे में खटिया पर सफेद चादर और तकिया, बल्ब, जलता हुआ लालटेन, बेना रखा गया है। जिसमें पूर्व पीएम विश्राम करते थे। इसी कमरे में छत पर जाने के लिए सीढ़ी बनाई गई है।
एक कमरे में उनका बैठका था। जहां बैठकर बातचीत करते थे। उनके भाषण और कहे वाक्य को स्लोगन बनाकर लगाया गया है। ललिता शास्त्री की प्रतिमा के पास जवान और किसान को दिखाया गया है। रसोई घर में सिलबट्टा, ओखली, मूसर, पत्थर की चक्की, चौका, बेलन, मिट्टी का चूल्हा, केतली, मथनी, गिलास, लोटा, थाली, पानी भरने का पीतल का गगरा सहित आदि सामान रखे गए हैं। खटिया मचिया सहित कई जरूरी सामान रखे हैं। दो कमरों के बीच में आंगननुमा जगह पर जय जवान और जय किसान के नारे बंदूक और हल के जरिए दिखाया गया है।
उन्होंने माँ को नहीं बताया था कि वो रेलमंत्री हैं।  कहा था, ''मैं रेलवे में नौकरी करता हूँ।'' 
वो एक बार किसी कार्यक्रम मे आए थे जब उनकी माँ भी वहाँ पूछते पूछते पहुची कि मेरा बेटा भी आया हैं वो भी रेलवे में हैं। 
लोगों ने पूछा क्या नाम है तो उन्होंने जब नाम बताया तो सब चौक गए बोले, ''ये झूठ बोल रही है।''
पर वो बोली, ''नहीं वो आए है।''
लोगो ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री के सामने ले जाकर पूछा, ''क्या वहीं हैं ?''
तो माँ बोली, ''हाँ, वो मेरा बेटा है।'' 
लोग, मंत्री जी से दिखा कर बोले, ''वो आपकी माँ है।'' 
तो उन्होंने अपनी माँ को बुला कर पास बैठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया।
तो पत्रकारों ने पुछा, ''आप ने, उनके सामने भाषण क्यों नहीं दिया।'' 
''मेरी माँ को नहीं पता कि मैं मंत्री हूँ। अगर उन्हें पता चल जाय तो लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं मना भी नहीं कर पाउंगा।  ...... ...... और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा।''
जवाब सुन कर, सब सन्न रह गए। 
"कहाँ गए वो निस्वार्थी सच्चे ईमानदार लोग ...... '' 

हम सदैव स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को अपना जीवन आदर्श मानकर कार्य करते रहेंगे