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कथित राष्ट्रपिता गांधी पर भारी सच्चा राष्ट्रपुत्र भगत सिंह


लेखक आर्य सागर खारी

आज(2 अक्टूबर) राष्ट्र हिन्दुओं को अपमानित करने वाले महात्मा गाँधी को याद कर रही है, लेकिन देश को गौरव प्रदान करने वाले लाल बहादुर शास्त्री को नहीं। क्यों? कारण है हिन्दू मार खाकर भी शिक्षा नहीं लेना चाहता, जबकि हिन्दू विरोधी गाँधी का नाम लेकर सत्ता का आनंद भोग रहे हैं। नाथूराम गोडसे पागल नहीं था, जो गाँधी को मारा, बल्कि गाँधी से अधिक हिन्दू और देशभक्त था। गाँधी भक्त राष्ट्र को बताएं गाँधी को क्रांतिकारियों से अधिक अंग्रेज़ भक्ति क्यों पसंद थी? क्यों नहीं भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी रुकवाने का प्रयास किया? 

मोहनदास करमचंद गांधी हाड मास का पुतला ही नहीं जैसा भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टाइन ने उनके विषय में कहा था। गांधी अनेक दुर्गुण दोषो का भी पुतला थे। गांधी को परनिंदा करने में बहुत आनंद आता था । इस काम के लिए गांधी बखूबी इस्तेमाल करते थे अपने धनी मित्र मंडली सेठो के द्वारा संचालित पोषित अखबारों का विशेष तौर पर यंग इंडिया अखबार पत्रिका का। मोहनदास करमचंद गांधी क्रांतिकारियों के कटु आलोचक थे कोई मौका वह नहीं चूकते थे भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद बिस्मिल जैसे अमर बलिदानी क्रांतिकारियों के प्रयास से प्रज्वलित परतंत्र भारत की जनता के हृदय में विद्यमान स्वतंत्रता की वैचारिक क्रांति की अग्नि को बुझाने में । आज हम देखते हैं हम गांधी की विपरीत विचारधारा के तौर पर नाथूराम गोडसे को स्थापित करते हैं लेकिन गॉडसे गांधी के जीवन के सांप्रदायिक पक्ष को ही देख पाये जिसमें मुस्लिम तुष्टिकरण प्रधान था लेकिन गांधी की रग रग से असल तौर पर वाकिफ भगत सिंह थे। वह जानते थे गांधी जैसे कुटिल व्यक्ति को उन्हीं की भाषा में कैसे माकूल जवाब दिया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह था नाथूराम गोडसे की अपेक्षा शहीद भगत सिंह का चिंतन अधिक विकसित था वह अधिक स्वाध्यायशील अध्ययनशील थे उन्होंने विश्व इतिहास दुनिया की क्रांति का भली-भांति अध्ययन किया था।

शहीद भगत सिंह ने लाहौर जेल से अनेक वैचारिक लेख परिपत्र पर्चे पत्र कुछ पुस्तकें भी लिखी जिनमें दुर्भाग्य से आज कुछ ही उपलब्ध है उनके अनेक लेख पत्रों का संपादन संग्रहण उनके छोटे भाई कुलतार की सुपुत्री विरेंद्र सिंधु ने किया है।

घटना 30 दिसंबर 1929 की है क्रांतिकारी यशपाल ने तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन की ट्रेन के नीचे बम विस्फोट किया दुर्भाग्य से लार्ड इरविन बच गया धमाका कम तीव्रता का हुआ था। यह वही लॉर्ड इरविन है जो गांधी नेहरू के मित्र थे । ब्रिटिश भारत में अप्रैल 19 27 से लेकर अप्रैल19 31 तक गवर्नर जनरल रहे। इन्हीं के साथ में भगत सिंह की फांसी से 16 दिन पूर्व गांधी ने लंदन जाकर दूसरे गोलमेज सम्मेलन में समझौता किया था। जिसके तहत कांग्रेस के नेताओं अपने भक्तों की रिहाई अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन की वापसी की घोषणा गांधी ने की थी। भगत सिंह साथी क्रांतिकारियों के मुकदमे को सम्मेलन मे उठाया ही नहीं था जानबूझकर गांधी ने। इसके पीछे गांधी का सोचा समझा षड्यंत्र था मूल विषय की और लौटते हैं।

30 दिसंबर 1929 के घटनाक्रम में जब लॉर्ड इरविन बच गया तो देश में अहिंसा वादी नेतृत्व ने अर्थात गांधी वादियो ने और खुद गांधी ने क्रांतिकारियों की निंदा का तूफान खड़ा कर दिया। वायसराय की स्पेशल ट्रेन को बम से उड़ाने के प्रयास के विरुद्ध कांग्रेस द्वारा निंदा प्रस्ताव पारित किया गया यंग इंडिया में गांधी ने “दि कल्ट आफ दी बाम” के नाम से लेख लिखा जिसमें क्रांतिकारियों की कटु आलोचना की उन्हें हतोत्साहित किया गया। कांग्रेस ने जो प्रस्ताव पारित किया उसका मसौदा खुद गांधी ने तैयार किया था उस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए गांधी ने अपनी सारी शक्ति लगा दी । क्रांतिकारियों के विरुद्ध गांधी ने माहौल तैयार करने का प्रयास किया भगत सिंह जैसे प्रखर बुद्धिजीवी वीर कहां चुप रहने वाले थे भगत सिंह ने जेल से ही क्रांतिकारियों की आलोचना के लिए गांधी को जमकर लताड़ा उन्होंने 26 गांधी के लेखों के जवाब में जनवरी 1930 को “बम का दर्शन “नामक शीर्षक से एक विस्तृत परिपत्र लिखा बहुत ही गजब का है यह परिपत्र है।

उस परिपत्र के कुछ चुनिंदा अंश इस प्रकार हैं शहीद भगत सिंह की लेखनी व जुबानी।

“महात्मा गांधी की भक्त सरला देवी चौधुरानी के मत को मैं यहां उद्धृत करना चाहूंगा जो जीवन भर कांग्रेस की भक्त रही है और गांधी भक्त भी हैं। उन्होंने बताया है महात्मा गांधी ने क्रांतिकारियों के विरुद्ध प्रस्ताव को कांग्रेस से पारित कराने में अपना पूरा बल लगा दिया जबकि आधे से अधिक कांग्रेस के सदस्य इसके खिलाफ थे। 1913 की सदस्य संख्या में केवल 31 अधिक मतों से है प्रस्ताव पारित होता सका क्या यह राजनीतिक ईमानदारी थी, जी नहीं। मुझे मालूम हुआ है जिन कांग्रेस के सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया है वह अपनी आत्मा से इसके खिलाफ थे लेकिन महात्मा जी के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा के कारण में अपना विरोध प्रकट ना कर सकें प्रस्ताव के विरुद्ध मत देने में असमर्थ रहे इतना ही नहीं प्रस्ताव पर विचार के दौरान गांधी समर्थको कांग्रेस सदस्यों ने गाली गलौज की क्रांतिकारियों को बुजदिल कहा और उनके कार्यों को घृणित कहा क्या यह शोभा देता है? किसी गांधीवादी को गांधी कांग्रेसियों को वैचारिक वाणी की हिंसा से मुक्त नहीं कर पाए।”

(आज भक्त शब्द राजनीतिक व्यंग्य में देश की सबसे बड़ी सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के समर्थकों के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन शहीद भगत सिंह ने यह शब्द इतिहास में सर्वप्रथम कांग्रेसियों और गांधी समर्थकों के लिए इस्तेमाल किया था।)

“गांधी जी ने हम क्रांतिकारियों के विरुद्ध यंग इंडिया में लेख लिखा है क्रांतिकारियों पर दूसरा हमला किया है इस पर आगे कुछ कहने से पहले हम अच्छी तरह विचार करेंगे इसलिए कि उन्होंने तीन बातों का उल्लेख किया है जिसका शीर्षक है उनका विश्वास ,उनके विचार और उनका मत। हम उनके विश्वास के संबंध में विश्लेषण नहीं करेंगे क्योंकि विश्वास में तर्क के लिए स्थान नहीं है गांधीजी जिसे हिंसा कहते हैं और जिस के विरुद्ध उन्होंने जो तर्कसंगत विचार प्रकट किए हैं हम उनका सिलसिलेवार विश्लेषण करेंगे। गांधीजी सोचते हैं कि उनकी यह धारणा सही है कि अधिकतर भारतीय जनता को हिंसा की भावना छू तक नहीं गई है और अहिंसा उनका राजनीतिक शस्त्र बन गया है। हाल ही में उन्होंने देश का जो भ्रमण किया है उस अनुभव के आधार पर उनकी यह धारणा बनी है परंतु उन्होंने अपनी इस यात्रा की से इस भ्रम में ना पडना चाहिए। यह बात सही है कि कांग्रेस के नेता अपने दौरे वहीं तक सीमित रखते है जहां तक डाक गाड़ी उन्हे आराम से पहुंचा सकती है जबकि गांधीजी ने अपनी यात्रा का दायरा वहां तक बढ़ा दिया है जहां तक की मोटर कार द्वारा वे जा सके। गांधी जी अपनी यात्रा में धनी व्यक्ति के ही निवास स्थान पर रुके। इस यात्रा का अधिकतर समय उनके भक्तों द्वारा आयोजित गोष्ठियों में की गई उनकी प्रशंसा सभाओं में यदा-कदा अशिक्षित जनता को दिए जाने वाले भाषणों में मे ही बीता । भारतीय जनता जिसके विषय में उनका दावा है कि वे उन्हें अच्छी तरह समझते हैं परंतु यह बात इस दलील के विरुद्ध है कि वह आम जनता की विचारधारा को जानते हैं कोई व्यक्ति जनसाधारण की विचारधारा को केवल मंचों से भाषण और उपदेश देकर नहीं समझ सकता वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि उसने विभिन्न विषय पर अपने विचार जनता के सामने रखें क्या गांधी जी ने इन वर्षों में आम जनता के सामाजिक जीवन में कभी प्रवेश करने का प्रयत्न किया? क्या कभी उन्होंने किसी शाम को गांव के किसी चौपाल के अलाव के पास बैठकर किसी किसान के विचार जानने का प्रयत्न किया क्या किसी कारखाने के मजदूर के साथ एक शाम को जाकर उसके विचार समझने की कोशिश की है पर हमने यह किया है और इसलिए हम दावा करते हैं कि हम आम जनता को गांधी से अधिक जानते हैं हम गांधीजी को विश्वास दिलाते हैं कि साधारण भारतीय साधारण मानव के समान ही अहिंसा तथा अपने शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत कम समझता है संसार का तो यही नियम है तुम्हारा एक मित्र है तुम उससे इतने प्रेम करते हो कभी-कभी तो इतना अधिक कि तुम उसके लिए अपने प्राण भी देते देते हो तुम्हारा शत्रु है तो उसे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहते हो। क्रांतिकारियों का यह सिद्धांत नितांत सत्य सरल और सीधा है और ध्रुव सत्य है ।आदम और हव्वा के समय से चला आ रहा है तथा इसे समझने में कभी किसी को कठिनाई नहीं हुई। हम यह अनुभव के आधार पर कह रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब लोग क्रांतिकारी विचारधारा को सक्रिय रूप देने के लिए लाखों की संख्या में जमा होंगे।”

“गांधीजी घोषणा करते हैं कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपने आपको पीडा देने की प्रणाली से उन्हें आशा है कि वह 1 दिन विदेशी शासकों का हृदय परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयाई बना लेंगे अब उन्होंने अपने सामाजिक जीवन के चमत्कार की “प्रेम सहिंता “के प्रचार के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया है अडिग विश्वास के साथ उसका प्रचार कर रहे हैं जैसा कि उनके अनुयायियों ने भी किया है परंतु क्या बता सकते हैं कि भारत में कितने शत्रुओं का हृदय परिवर्तन कर उन्हें भारत का मित्र बनाने में समर्थ हुए हैं ।वह कितने ओ डायर, डायर ,रीडिंग और इरविन को भारत का मित्र बना सकें ।यदि किसी को भी नहीं तो भारत उनकी विचारधारा से कैसे सहमत हो सकता है ।वे इंग्लैंड को समझा-बुझाकर इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार कर लेंगे कि वे भारत को स्वतंत्रता दे दे। यदि वायसराय की गाड़ी के नीचे बंबो का विस्फोट ठीक हुआ होता तो दो में से एक बात अवश्य हुई होती तो वायसराय अधिक घायल हो जाते या उनकी मृत्यु हो जाती ऐसी स्थिति में वायसराय तथा राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच मंत्रणा ना हो पाती यह प्रयास रुक जाता और उससे राष्ट्र का भला होता यदि बम का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सजा पा जाता मेरठ तथा लाहौर षड्यंत्र और भुसावल कांड का मुकदमा चलाने वाले केवल भारत के शत्रु को ही मित्र प्रतीत हो सकते हैं”

“गांधी जी यह प्रतिपादन करते हैं कि जब जब हिंसा का प्रयोग हुआ है तब तक सैनिक खर्च बढ़ा है यदि उनका मंतव्य क्रांतिकारियों की पिछले 25 वर्षों की गतिविधियों से है तो हम उनके वक्तव्य को चुनौती देते हैं कि वह अपनी इस कथन को तथ्यों और आंकड़ों से सिद्ध करें। बल्कि हम तो यह कहेंगे कि उनके अहिंसा और सत्याग्रह के प्रयोगों का परिणाम जिनकी तुलना स्वतंत्रता संग्राम से नहीं की जा सकती नौकरशाही पर हुआ है आंदोलन का फिर वह हिंसात्मक हो या हिंसात्मक सफल और असफल परिणाम तो भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा ही”

“गांधी जी का कथन है कि हिंसा से प्रगति का मार्ग अवरुद्ध होकर स्वतंत्र का दिवस स्थगित होता है तो हम इस विषय में उदाहरण दे सकते हैं जिन देशों ने क्रांति हिंसा से काम किया लिया उनकी सामाजिक प्रगति होकर उन्हें राजनीतिक सफलता प्राप्त हुई हम रूस तथा तुर्की का उदाहरण ही ले ले। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के जो न्यायोचित अधिकार माने जाते थे उन्हें प्राप्त करने में अहिंसा का शस्त्र असफल रहा है भारत को स्वराज्य दिलाने में भी असफल रहा जबकि राष्ट्रीय कांग्रेस सदस्यों की बड़ी सेना उसके लिए प्रचार करती रही तथा उस पर लगभग सवा करोड रुपए भी खर्च किया गया हाल ही में बारदोली सत्याग्रह में असफलता सिद्ध हो चुकी है इस अवसर पर सत्ताग्रह के नेता गांधी और पटेल ने बारदोली के किसानों को जो कम से कम अधिकार दिलाने का आश्वासन दिया था उसे भी वह दिलाना सके इसके अतिरिक्त अन्य किसी देशव्यापी आंदोलन की बात हमें मालूम नहीं अब तक इस अहिंसा को एक ही आशीर्वाद मिला है और वह है असफलता का। ऐसी स्थिति में यह आश्चर्य नहीं कि देश में फिर उसके प्रयोग से इंकार कर दिया । गांधीजी के सत्याग्रह जिसका स्वाभाविक परिणाम समझौते में होता है जैसा कि अनेक बार स्पष्ट है। इसलिए जितनी जल्दी हम समझ ले कि स्वतंत्रता और गुलामी में कोई समझौता नहीं होता उतना ही अच्छा है”

“गांधी जी ने सभी विचारशील लोगों से कहा कि वे लोग क्रांतिकारियों से सहयोग करना बंद कर दें तथा उनके कार्यों की निंदा करें जिससे हमारे इस प्रकार उचित देशभक्तों की हिंसात्मक विचारधारा को बल् न मिल सके और वह हिंसा की निरर्थकता तथा और हिंसात्मक कार्यों में जो हानि है उसे समझ सके। क्रांतिकारी अलग-थलग हो जाए अपना कार्यक्रम स्थगित करने के लिए विवस हो जाए। मैं कहना चाहूंगा गांधीजी ने जीवन भर जन जीवन का अनुभव किया पर यह बड़े दुख की बात है कि वह फिर भी क्रांतिकारियों का मनोविज्ञान ना तो समझते हैं और ना समझना ही चाहते हैं वह सिद्धांत अमूल्य है जो प्रत्येक क्रांतिकारी को प्रिय है जो व्यक्ति क्रांतिकारी बनता है जब वह अपना सिर हथेली पर रखकर किसी भी पल आत्म बलिदान के लिए तैयार रहता है तो केवल खेल के लिए नहीं हैं क्रांतिकारी बलिदान इसलिए भी नहीं करता कि जब जनता उसके साथ सहानुभूति दिखाने की स्थिति में हो तो उसकी जय जयकार करें वह इस मार्ग का इसलिए अवलंबन करता है कि उसका सदविवेक उसे इसकी प्रेरणा देता है उसकी आत्मा उसे उसके लिए प्रेरित करती है। एक क्रांतिकारी सबसे अधिक इस सिद्धांत में विश्वास करता है वह केवल तर्क और तर्क नहीं विश्वास करता है किसी प्रकार का गाली गलौज निदा चाहे फिर वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो उसे अपने निश्चित उद्देश्य प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग ना मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा यह कोरी मूर्खता है अनेक क्रांतिकारी जिनकी कार्यों की वैधानिक आंदोलनकारियों ने घोर निंदा की फिर भी वह उसकी परवाह न कर फांसी के तख्ते पर झूल गए यदि तुम चाहते हो कि क्रांतिकारी गतिविधियों को स्थगित कर दें तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ अपना मत प्रमाणित किया जाए यह एक और केवल यही एक रास्ता है बाकी बातों के विषय में किसी को शंका नहीं होना चाहिए इस प्रकार के डराने धमकाने से क्रांतिकारी कदापि हार मानने वाले नहीं है।

कथित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को आईना दिखाने के पश्चात उनकी आलोचना का माकूल जवाब देने के बाद अपने परिपत्र के अंत में शहीद भगत सिंह देशवासियों से सीधी अपील करते हैं जो इस प्रकार है।

“हम प्रत्येक देशभक्त से निवेदन करते हैं कि वह हमारे साथ गंभीरता पूर्वक इस युद्ध में शामिल हो कोई भी व्यक्ति( गाँधी) अहिंसा और ऐसे ही अजीबोगरीब तरीकों से मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ ना करें। स्वतंत्रता राष्ट्र का प्राण है हमारी गुलामी हमारे लिए लज्जास्पद है ना जाने कब हम मे यह बुद्धि और साहस होगा कि हम उससे मुक्ति प्राप्त कर स्वतंत्र हो सके हमारी प्राचीन सभ्यता और गौरव की विरासत का क्या लाभ यदि हम यह सभी स्वाभिमानी ना रहे कि हमें विदेशी गुलामी विदेशी झंडे और बादशाह के सामने सर झुकाने से अपने आप को ना रोक सके। क्या यह अपराध नहीं कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया हमें भिखारी बनाया हमारा समस्त खून चूस लिया। एक जाति और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है क्या जनता भी चाहती है कि अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें। हम बदला लेंगे जो जनता द्वारा ब्रिटिश शासकों से लिया गया न्याय उचित बदला होगा कायरो को पीठ दिखाकर समझौता और शांति की आशा से चिपके रहने दीजिए हम किसी से भीख नहीं मांगते और हम किसी को भी क्षमा नहीं करेंगे हमारे युद्ध विजय, मृत्यु के निर्णय तक चलता ही रहेगा। क्रांति चिरंजीवी हो।(साभार: उगता भारत)

“हम बस नाम के कम्युनिस्ट हैं, लेकिन शास्त्री सुपर कम्युनिस्ट हैं।” : अलेक्सी कोशिगिन, तत्कालीन सोवियत संघ, प्रधानमंत्री

‘Who After Nehru’ यानी, ‘नेहरू के बाद कौन?’ मई 27, 1964 को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्नों पर यही प्रमुख शीर्षक था।

1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला। जिस तरह से ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल को ‘वॉर टाइम प्राइम मिनिस्टर’ कहा जाता है, उसी तरह से यदि लाल बहादुर शास्त्री को भी एक ऐसे समय में चुने गए प्रधानमंत्री की संज्ञा दी जाए, जब भारत हर तरफ से संकट से घिरा हुआ था तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा।

प्रधानमंत्री बनने के लिए शास्त्री जी का जनादेश आसान नहीं था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्र का नेतृत्व करने की उनकी क्षमता को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर एक खंडित सहमति थी। वहीं, 1962 की हार और एक गंभीर खाद्य संकट से जूझने के बाद भारत का मनोबल गिर गया था। 1965 में पाकिस्तान इस ‘कमजोर नेतृत्व’ का फायदा उठाना चाहता था। उम्मीदों के विपरीत, शास्त्री जी ने शुरू से ही संसद में भाषणों के माध्यम से सीमा पर पाकिस्तानी उकसावे का जवाब दिया, जिससे भारत की सीमाएँ और भावना स्पष्ट हो गईं। वह पकिस्तान के राष्ट्रपति खान को यह कठोर संदेश दे चुके थे कि दृढ़ संकल्पित राष्ट्र भारत की इच्छा नहीं है कि पाकिस्तानी क्षेत्र के एक वर्ग इंच का भी अधिग्रहण करे लेकिन कभी भी कश्मीर, जो कि भारत का अभिन्न अंग है, में पाकिस्तान द्वारा किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा।

भारत तब किन हालातों से गुजर रहा था इसका अंदाजा नेहरू की मौत के बाद सी राजगोपालाचारी द्वारा कही गई बातों से लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा था,

“अब भारत के सामने सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित कर पाने में असमर्थता या फिर इस महत्वपूर्ण मुद्दे की उपेक्षा है। कम्म्युनिस्ट आक्रामकता भारत और पाकिस्तान के सभी समझदार लोगों की पहली चिंता होनी चाहिए। मुझे यह भी लगता है कि आर्थिक धरातल पर अब सबसे बड़ा खतरा महंगे टैक्सेशन की नीति और अब तक की योजनाबद्ध सोवियत शैली की योजना भी महँगाई की ओर ले जा रही है। जनसंख्या का महत्वपूर्ण तत्व, जिस पर लोकतंत्र निर्भर करता है, मुद्रास्फीति और कराधान के बीच कुचल दिया जाता है। सामान्य शब्दों में कहें, तो सबसे बड़ा खतरा अब नई सरकार के लिए चली आ रही नीतियों में बदलाव का है।”

नेहरू की मौत के बाद प्रधानमंत्री का चुनाव

नेहरू की मौत के बाद शुरु हुई अगले प्रधानमंत्री की खोज और ये जिम्मेदारी दी गई उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष के कामराज को दिया गया। वर्तमान समय में कई लोग, खासकर कांग्रेस के ही कुछ कद्दावर नेता यह तर्क देते हुए कि कांग्रेस में गैर-गाँधी/नेहरू परिवार से पहले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ही थे। जाहिर सी बात है कि कांग्रेस के समर्थकों द्वारा दिए जाने वाले यह कुतर्क सिर्फ इस राजनीतिक दल में व्याप्त ‘डायनेस्टी पॉलिटिक्स’ के सत्य पर पर्दा डालने के लिए ही इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

नेहरू की मृत्यु के बाद तत्कालीन कांग्रेस जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी के खेमें में बँट चुकी थी। लेकिन एक ओर जहाँ मोरारजी देसाई किसी भी सूरत में मानने को राजी नहीं थे तो वहीं के कामराज खुद मोरारजी देसाई को देश की बागडोर नहीं सौंपना चाहते थे।

लेकिन क्या लाल बहादुर शास्त्री ही तब कांग्रेस की पहली पसंद थे या यह बस इंदिरा गाँधी को सत्ता तक लाने का एक जरिया मात्र था? वास्तव में, इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की जो रणनीति जवाहरलाल नेहरू ने बनाई थी, उसे धरातल तक लाने का काम के कामराज ने ही किया था। वह जानते थे कि अगर मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनते हैं, तो आगे चलकर इंदिरा गाँधी की राजनीति की राह कठिन हो जाएगी।

यही वो समय था जब कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के कामराज ने अप्रत्याशित तरीके से लाल बहादुर शास्त्री का नाम प्रधानमंत्री पद के लिये प्रस्तावित किया और सारे बड़े नाम धराशाई हो गए।

जवाहरलाल नेहरू के मन में अपने उत्तराधिकारी के तौर पर हमेशा से ही उनकी बेटी इंदिरा गाँधी थी। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद लाल बहादुर शास्त्री ने दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैय्यर से कही थी। इसका जिक्र कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में किया है।

कुलदीप नैय्यर ने लिखा, ”एक बार मैंने शास्त्री का मन टटोलते हुए पूछा था कि नेहरू का उत्तराधिकारी कौन होगा? तो शास्त्री ने कहा था कि उनके (नेहरू) दिल में तो उनकी सुपूत्री (इंदिरा गाँधी) हैं। लेकिन ये आसान नहीं होगा।”

कुलदीप नैय्यर ने अपनी इस पुस्तक में इस बात का भी खुलासा किया कि लाल बहादुर शास्त्री नेहरू के दिमाग में अपने उत्तराधिकारी के लिए पहले विकल्प नहीं हैं। इन सभी घटनाक्रमों का भविष्य में क्या प्रभाव पड़ा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंदिरा गाँधी लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद दिल्ली में उनकी समाधि बनाने के पक्ष में नहीं थी।

कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने जब आमरण अनशन की धमकी दी तो मामले की गंभीरता को समझते हुए इंदिरा को फैसला बदलना पड़ा और दिल्ली में शास्त्री जी की समाधि बनवानी पड़ी।

इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की क्रोनोलॉजी

जवाहरलाल नेहरू ने इंदिरा गाँधी को सिर्फ 42 साल की उम्र में कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष बनने में मदद की। कांग्रेस में वंशवाद की राजनीति का पहला चरण यही था। नेहरू की मृत्यु के बाद, इंदिरा गाँधी को राज्यसभा भेजा गया और शास्त्री सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लाल बहादुर शास्त्री जी के देहांत के तुरंत बाद इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री बन गई थी।

जो लोग यह दावा करते हैं कि नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बनने की रेस में इंदिरा गाँधी का नाम तक नहीं लिया गया था उन्हें ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की उस खबर का हवाला दिया जाना चाहिए जिसमें नेहरू की मृत्यु से ठीक 5 महीने पहले ही जनवरी 09, 1964 को नेहरू के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में इंदिरा गाँधी का उल्लेख किया गया था।

नेहरू और शास्त्री की मौत के बाद सत्ता परिवर्तन का गवाह बने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डीपी मिश्रा, नेहरू के इस पूरे खेल की योजना बताते हुए कहते हैं –

“नेहरू द्वारा विकसित की गई रणनीति के अनुसार, अपनी बेटी को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार किया जाना था, फिर मोरारजी देसाई और जगजीवन राम – दो महत्वाकांक्षी, सक्षम और प्रभावशाली प्रतिद्वंद्वियों को हटाना, और अंत में सरकार और कॉन्ग्रेस, दोनों को ऐसे पुरुष के हाथों में देना होगा जिसे उनकी बेटी द्वारा आसानी से हटाया जा सकता हो।”

“कामराज योजना के माध्यम से, उन्होंने अपनी सरकार से देसाई और जगजीवन राम को हटा दिया। कामराज को कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया और सरकार को गुलजारीलाल नंदा, टीटी कृष्णामाचारी और लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में छोड़ दिया।”

‘सुपर कम्युनिस्ट लाल बहादुर शास्त्री’

शास्त्री जी को रूस में ‘सुपर कम्युनिस्ट’ बुलाए जाने की घटना से शायद ही बहुत लोग वाकिफ हों। दरअसल, जनवरी 03, 1966 में ताशकंद के दौर पर गए लाल बहादुर शास्त्री ने तत्कालीन सोवियत संघ के अपने समकक्ष अलेक्सी कोशिगिन (Alexei Kosygin) द्वारा उपहार में दिए गए कोट को अपने साथ गए एक स्टाफ को दे दिया था। इससे प्रेरित होकर रूसी प्रधानमंत्री कोशिगिन ने उन्हें ‘सुपर कम्युनिस्ट’ कहा था।

जब शास्त्री जी रूस पहुँचे तो उनके शरीर पर उन्हें ठंड से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं थे। यह देखकर कोशिगिन ने शास्त्री जी को एक ओवरकोट उपहार में दिया था। उनका कहना था कि ‘मैंने इसे अपने एक स्टाफ को दे दिया, जो कड़ाके की ठंड में पहनने के लिए अच्छा ऊनी कोट नहीं लाया था।’

इस पर कोशिगिन ने शास्त्री और जनरल अयुब खान के सम्मान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में इस घटना का जिक्र करते हुए कहा, “हम बस नाम के कम्युनिस्ट हैं, लेकिन शास्त्री सुपर कम्युनिस्ट हैं।”

शास्त्री जी के जीवन मूल्य और उनके जीवन से जुड़े कई ऐसी पहलू हैं, जो उन्हें किसी भी समय और काल के राजनेता से कहीं ऊपर साबित करते हैं लेकिन शास्त्री जी के व्यक्तित्व को समेट पाना इतना भी आसान नहीं है।

चाहे कर्ज लेकर फ़िएट कार खरीदने की घटना हो, अकाल के समय अपने घर पर खेती कर देशवासियों को संदेश देने का उदाहरण या फिर सादे जीवनशीली के कारण रूस में ‘सुपर कॉमरेड’ कहलाए जाने की घटना हो, शास्त्री जी के रूप में इस देश को अकस्मात् ही सही लेकिन एक विराट व्यक्तित्व मिला था, जिसे कि दुर्भाग्यवश हमने शायद बहुत ही कम समय में खो भी दिया।

लाल बहादुर शास्त्री ने मात्र अपने 18 महीने के कार्यकाल में ही ‘नेहरू के बाद कौन?’ जैसे सवालों का बेहद सटीक जवाब दे दिया था। बेहद आम, सरल स्वभाव के शास्त्री जी ने महज 18 महीनों में नेहरू को कद के सामने एक ऐसी और कहीं अधिक मजबूत तस्वीर पेश कर डाली थी, जिसका एकमात्र ध्येय भारत निर्माण था। और ऐसा उन्होंने समकालीन नेताओं की तरह अंतरराष्ट्रीय पत्राचार, सैद्धांतिक भाषण या फोटोग्राफ से नहीं बल्कि अपने द्वारा किए गए कार्यों से कर के दिखाया। एमके गाँधी जिस परिवर्तन की बात करते थे, शास्त्री जी वो परिवर्तन स्वयं बने।

 

तिरस्कृत हुए, मौत के 16 साल बाद, नरसिम्हा राव कांग्रेस को क्यों आए याद?

नरसिम्हा राव, सोनिया गॉंधी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
किसी ने यदि गुलामों को न देखा हो तो कांग्रेस पार्टी को देखा जा सकता है। यह कोई आरोप नहीं, कटु सत्य है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज सोनिया गाँधी तक पार्टी में एकछत्र शहंशाह बन कर अपनी बात आदेश मान लागू करते जरूर अनुभव किया जा सकता है। कांग्रेस में एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता हुए हैं, लेकिन पार्टी में गुलामों के मिलते साथ ने उन सभी को दरकिनार किया जाता रहा। लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री रहते अपने कामों से जवाहर लाल नेहरू के 18 वर्ष भुलवा दिए थे। शायद यही कारण था कि ताशकंत में उनकी हत्या करवा दी गयी। वरना क्या कारण था कि उनकी आकस्मित मृत्यु की जाँच क्यों नहीं हुई? क्यों नहीं उनका पोस्टमॉर्टेम करवा गया? क्यों उनके परिवार को शास्त्री से दूर रखा जा रहा था? यदि उनकी धर्मपत्नी ललिता जी द्वारा अपने पति के शव से दूर रखने पर हंगामा करने उपरांत परिवार को उनके शव के पास जाने दिया था। 
इतना ही नहीं, परिवार के गुलामों ने अपने आकाओं के अध्यक्ष पद पर आसीन किए जाने के लिए सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था। किसी को गुलाम देखने हैं तो कांग्रेस पार्टी को देख लें।
जब कांग्रेस ने अपने ही मंत्रियों और सेना चीफ की जासूसी करवाई थी 
कांग्रेस पार्टी और उसके नेता इन दिनों वाट्सएप पर कुछ लोगों की कथित जासूसी को लेकर केंद्र सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बिना की किसी तथ्य के सरकार को घेरने में लगे हैं। लेकिन वो उस वक्त को भूल गए हैं जब उनके और उनकी मां सोनिया गांधी के इशारे पर यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई थी। 
सोनिया के इशारे पर हो रही थी प्रणब की ...
प्रणब मुखर्जी के घर जासूसी
आज बिना किसी सबूत के केंद्र सरकार पर कुछ लोगों की जासूसी कराना का आरोप लगाने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने अपनी ही सरकार के वित्त मंत्री और वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई थी। बात 2011 की है, जब प्रणब मुखर्जी के दफ्तर पर जासूसी खबर मीडिया में छाई हुई थी। तब इसकी शिकायत खुद प्रणब मुखर्जी ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह से की थी और इसकी जांच कराने की मांग की थी।

जासूसी का मामला तब सामने आया था, जब तत्कालीन यूपीए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री प्रणब मुखर्जी के ऑफिस में 16 अहम जगहों पर गोंद लगी मिली है। इन जगहों में खुद मुखर्जी का ऑफिस, उनकी करीबी सलाहकार ओमिता पॉल का ऑफिस, उनके प्राइवेट सेक्रेटरी मनोज पंत का ऑफिस और वित्त मंत्री द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दो कॉन्फ्रेंस हॉल शामिल थे। तब वित्त मंत्रालय की ओर से पहली बार प्राइवेट इनवेस्टिगेटर्स की मदद से मंत्रालय के अति महत्वपूर्ण कक्षों की ‘इलेक्ट्रॉनिक स्वीपिंग’ कराई गई थी। इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले की शिकायत की थी। तब प्राइवेट इनवेस्टिगेटर्स का कहना था कि गोंद खास मकसद से चिपकाई गई थी। गोंद के बाहरी हिस्से में हल्की लकीर जैसे निशान मिले हैं जो इस बात का संकेत हैं कि वहां कोई छोटे उपकरण लगाए गए होंगे जो हटा लिए गए।
रिटायर्ड आर्मी चीफ वी के सिंह के घर जासूसी
यूपीए शासन के दौरान ही पूर्व आर्मी चीफ जनरल (रिटायर्ड) वी के सिंह की भी जासूसी कराने का मामला सामने आया था। जनवरी 2013 में वी के सिंह के परिवारवालों ने आरोप लगाया था कि उनके घर में जासूसी करने के लिए बगिंग की कोशिश की गई। 4 जनवरी 2013 को दिल्‍ली के कैंटोनमेंट एरिया स्थित पूर्व जनरल के घर में घुसे सेना के मेजर को पकड़ा गया था। पकड़ा गया मेजर आर. विक्रम सिंह सेना के सिग्‍नल कोर 1, सिग्‍नल यूनिट में तैनात था। मेजर की गतिविधि संदिग्‍ध लगी तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़ा और पूछताछ की।

पी.वी. नरसिंह राव की जयन्ती पर ...नरसिम्हा राव की मौत के 16 साल बाद तिरस्कार पर कांग्रेस को पछतावा या मौकापरस्ती? 
उन्होंने बेहद मुश्किल वक्त में देश और कांग्रेस का नेतृत्व सॅंभाला था। वे नेहरू-गॉंधी परिवार के बाहर के पहले शख्स थे, जिसने बतौर प्रधानमंत्री पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया। उस शख्सियत का नाम था पीवी नरसिम्हा राव।
राव को जीते जी सोनिया गॉंधी के इशारे पर पहले कांग्रेस में अपमानित कर किनारे लगाया गया। मृत्यु हुई तो दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार होने नहीं दिया गया। उनके शव को कांग्रेस कार्यालय में लाने तक की अनुमति नहीं दी गई। दिल्ली में उनका मेमोरियल 2015 में तब बन पाया, जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार चल रही थी।
दिसंबर 2004 में मौत के बाद राव का जब तिरस्कार हुआ तो मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। वित्त मंत्री बनाकर राजनीति में मनमोहन को लाने वाले भी राव थे। लेकिन मनमोहन सिंह ने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होना भी उचित नहीं समझा।
“यूपीए काल में किसी भी बड़े कांग्रेस नेता ने दिवंगत पूर्व पीएम नरसिम्हा राव के जन्मदिवस या पुण्यतिथि के कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अब उनकी मौत के 16 सालों बाद आप कार्यक्रम क्यों आयोजित कर रहे हो? कांग्रेस आलाकमान ने उनके योगदानों को हाइलाइट नहीं किया। दिल्ली में कोई कार्यक्रम नहीं हो रहा। कांग्रेस उन्हें तेलंगाना तक ही क्यों सीमित करना चाहती है? वो तो एक राष्ट्रीय नेता थे।”
इस घटना के 16 साल बाद जब कांग्रेस का सूर्य ढलता दिख रहा उसने राव को लेकर यू टर्न मारा है। सोनिया गॉंधी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर उनकी प्रशंसा की है। हैदराबाद में शुक्रवार को कांग्रेस की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में सोनिया गॉंधी का पत्र पढ़ा गया। इसमें उन्होंने राव को प्रधानमंत्री के रूप में साहसिक फैसलों से देश को नई दिशा देने का श्रेय दिया गया।
सोनिया ने पत्र में लिखा, “राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में एक लंबे कैरियर के बाद वह गंभीर आर्थिक संकट के समय भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके साहसिक नेतृत्व के माध्यम से हमारा देश कई चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार करने में सक्षम हुआ। 24 जुलाई 1991 का केंद्रीय बजट और हमारे देश के आर्थिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।”
वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राव को देश का ‘महान सपूत’ और भारत में आर्थिक सुधारों का जनक बताया है। उन्होंने कहा, “आर्थिक सुधार और उदारीकरण में वाकई उनके सबसे बड़े योगदान हैं। विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदानों को कम करके आँका नहीं जा सकता है।”
भारत में खुली अर्थव्यवस्था का श्रेय राव को देते हुए मनमोहन ने कहा, “यह एक कठिन विकल्प और साहसी फैसला था और यह संभव इसलिए हो सका क्योंकि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने मुझे चीजों को शुरू करने की आजादी दी, क्योंकि वह उस समय भारत की अर्थव्यवस्था की समस्या को पूरी तरह से समझ रहे थे।”
राजीव गॉंधी की हत्या के बाद अचानक राव को जिम्मेदारी सॅंभालनी पड़ी थी। लेकिन कांग्रेस में सोनिया गाँधी के उदय के साथ ही उनका तिरस्कार शुरू हो गया था, जो उनकी मृत्यु के बाद तक चलता रहा।
23 दिसंबर 2004 को राव की मृत्यु हुई थी और 27 दिसंबर को स्तंभकार एमडी नलपत ने लिखा,”वास्तव में, 1998 में कांग्रेस की कमान नेहरू वंश के हाथों में दोबारा आने से बाद, AICC के पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री होने के बावजूद, नरसिम्हा राव को कांग्रेस कार्यसमिति से न केवल बाहर किया गया था, बल्कि उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य की सूची से भी निकाल दिया गया था। उस सूची में केवल वे थे जो आलाकमान की जय-जयकार करते थे।”
नलपत ने दावा किया था कि राव के अंतिम संस्कार के विषय पर चर्चा के लिए दोपहर 3 बजे एक विशेष केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने के बावजूद, 9 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर उनके शव को लाकर एक मंच पर रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। वहाँ न फूल थे और न शोक सभा में आए लोगों के बैठने के लिए कारपेट। यहाँ तक लॉन के शामियाने में कोई इंतजाम नहीं था।
यह सिलसिला राव के देहांत पर भी खत्म नहीं हुआ था। उनके निधन के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने उनका तिरस्कार करना नहीं बंद किया। वे हमेशा पार्टी के निशाने पर हमेशा रहे। पिछले वर्ष राव के पोते एनवी सुभाष ने इसके लिए पार्टी को आड़े हाथों भी लिया था। लगातार राव पर लगते आरोपों को देखते हुए उन्होंने गाँधी परिवार से उस अन्याय के लिए माफी माँगने को कहा था, जो उन्होंने नरसिम्हा राव के साथ किया।




एन वी सुभाष ने AICC सचिव जी चिन्ना रेड्डी के एक बयान पर कहा था कि राव ने अपने कार्यकाल के दौरान नेहरू-गाँधी परिवार को ‘दरकिनार’ करने की कोशिश की थी, ‘यह सच नहीं है और निंदनीय’ है। उन्होंने दावा किया कि राव, गाँधी परिवार के सबसे भरोसेमंद और वफादार नेता थे और हमेशा कई मुद्दों पर गाँधी परिवार का मार्गदर्शन करते थे।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मौत के 16 साल बाद राव को लेकर कांग्रेस के स्टैंड में यह​ बदलाव पाश्चाताप है या फिर मौकापरस्ती?
असल में यह राव का जन्म शताब्दी वर्ष है। उनकी जयंती पर पिछले महीने कई अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा था। इसमें उन्हें ‘तेलंगाना का बेटा… भारत का गर्व’ बताया गया था। यह विज्ञापन तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी टीआरएस की तरफ से प्रकाशित किए गए थे। इसी विज्ञापन ने अचानक से राव को राजनीति में फिर से प्रासंगिक बनाते हुए कांग्रेस को अपने स्टैंड में बदलाव के लिए मजबूर किया।
इस विज्ञापन के बाद कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से पोस्ट कर उन्हें दूरदर्शी नेता बताया गया था। राहुल गॉंधी से लेकर मनमोहन सिंह तक सबने उन्हें याद किया। लेकिन सोनिया उस वक्त भी चुप रहीं। अचानक से राव को लेकर सोनिया का मुखर होना कभी मजबूत गढ़ रहे दक्षिण भारत में जमीन तलाशने की कांग्रेस रणनीति का हिस्सा है।
कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता बीजेपी के हाथों गॅंवा चुकी है। तेलंगाना में टीआरएस ने उसकी जगह ले ली है। आंध्र प्रदेश से उसे उस जगन मोहन रेड्डी ने उखाड़ फेंका है, जिसे कभी उसने पार्टी से बाहर कर दिया था। तमिलनाडु में उसकी उम्मीदें डीएमके पर टिकी है। बीते साल आम चुनावों में भी इन राज्यों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। ऐसे में यह करनी पर पछतावे से ज्यादा राव की विरासत पर दावा कर कम से कम तेलंगाना में पैठ बनाने की कवायद दिखती है।
शायद कांग्रेस के लिए अब इस मोर्चे पर देर हो चुकी है। राव के लिए भारत रत्न की मॉंग और जन्म शताब्दी के मौके पर साल भर के कार्यक्रम का ऐलान कर इस विरासत पर टीआरएस पहले ही दावा ठोक चुकी है।

काश! आज लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री होते, कोई JNU देश-विरोधी नारे लगाने की हिम्मत नहीं कर पाता


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Image result for लाल बहादुर शास्त्रीआर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जिस तरह कुछ वर्षों से दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वामपंथी और कांग्रेस समर्थित छात्रों द्वारा उपद्रव मचाया जा रहा है, विद्यार्थी एवं शोधकर्ताओं के लिए बहुत ही शर्मनाक है। जिस देश में रहे, खाएं और पिएं उसी को तोड़ने के नारों से आसमान सिर पर उठाने का साहस कर रहे हैं। और अब CAA के नाम पर हुए विरोध से पदभ्रष्ट हुए बिना सिर-पैर के मुद्दों पर देश में अराजकता फ़ैलाने का प्रयास कर रहे हैं। 
जेएनयू में लगे देश तोड़ने नारे लगने पर पुलिस द्वारा देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया, परन्तु दुर्भाग्य से दिल्ली में इनके गुप्त समर्थक अरविन्द केजरीवाल की सरकार होने के कारण दिल्ली सरकार द्वारा इजाजत न देने के कारण वही गैंग आज़ाद घूम रहा है। काश ! आज लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री होते, स्थिति एकदम विपरीत होती। लाल बहादुर कद में जितने छोटे थे, देश से गद्दारी करने वालों के लिए अपने कद से 200 गुना सख्त थे, जिसका प्रमाण 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान देखने को मिला था। जब पाकिस्तान स्लीपरों पर पहाड़ बन टूट पड़े थे। शास्त्री जी के बाद नरेन्द्र मोदी ने आर्मी और सुरक्षा कर्मियों को खुली छूट मिली जरूर है, लेकिन जेएनयू एवं यूनिवर्सीटियों में उठ रही देश-विरोधियों पर शिकंजा कसने में असमर्थ हैं।    
Image result for सुब्रमण्यम स्वामी JNU पर सुब्रह्मण्यम स्वामी का प्लान: 2 साल चले ‘सफाई अभियान’, जवानों को करो तैनात
जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर जारी गहमागहमी के बीच भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस विश्वविद्यालय को लेकर अपना प्लान सामने रखा है। बकौल स्वामी जेएनयू कैंपस में पुलिस स्टेशन बनना चाहिए। बीएसएसएफ और सीआरपीएफ जवाने की तैनाती होनी चाहिए। यूनिवर्सिटी को दो साल के लिए बंद कर जरूरी ‘सफाई अभियान’ चलाया जाए। साथ ही कहा है कि इसके बाद जब दोबारा जेएनयू को खोला जाए तो उसका नाम बदलकर सुभाष चंद्र बोस विश्‍वविद्यालय कर देना चाहिए।
स्वामी ने अहमदाबाद के थलतेज में एक निजी विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से कहा कि सरकार को जेएनयू को लेकर बड़ा कदम उठाना चाहिए। इसकी सफाई के लिए इसे कम से कम दो साल के लिए बंद कर देना चाहिए और जब यह वापस से शुरू हो तो इसका नाम बदल कर सुभाष चंद्र बोस विश्वविद्यालय कर दिया जाना चाहिए।
जेएनयू-दिल्ली पुलिसस्‍वामी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने जान-बूझकर जेएनयू में अयोग्य और अशिक्षित लोगों को प्रवेश दिया। इससे वहाँ के हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जेएनयू के हॉस्टल का किराया 10 रुपए है और वहाँ 35 से 40 साल तक के लोग छात्र हैं और हर साल फेल होते रहते हैं। इन लोगों का एक ही उद्देश्य होता है कि जेएनयू के हॉस्टल को रहने के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करें और वो पूरे देश में घूम-घूम कर समाजवादी कार्यक्रमों में हिस्सा लें।
उन्होंने कहा कि बंद करने से पहले अच्छे छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय और आंबेडकर विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर देना चाहिए एवं हुल्लड़बाजों को बाहर कर देना चाहिए। स्वामी ने कहा कि नेहरू के नाम पर पहले से ही कई संस्थान है, इसलिए जेएनयू का नाम बदल दिया जाना चाहिए। स्वामी ने दावा किया कि जेएनयू तथा अन्यत्र हो रहे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के हिंसक विरोध के पीछे आतंकी और विदेशी तत्वों का भी हाथ है।
साथ ही स्‍वामी ने जेएनयू में पुलिस स्टेशन बनाए जाने की माँग की है। उन्होंने कहा कि जेएनयू में सिर्फ दिल्ली पुलिस से काम नहीं चलेगा। वहाँ पर बीएसएफ और सीआरपीएफ की तैनाती जाए। इसके बाद ही वहाँ के हालात सामान्य हो सकेंगे। स्वामी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “सुरक्षा का मतलब हरेक कैंपस के अंदर पुलिस स्‍टेशन बनाया जाना है। आज आपको पुलिस बुलाना पड़ता है जिसमें काफी समय लग जाता है। देश में विश्‍वविद्यालयों के अंदर पुलिस स्‍टेशन का होना बहुत जरूरी है। यह केवल जेएनयू के लिए नहीं है। लेकिन हमें इसकी शुरुआत जेएनयू से करनी चाहिए।”

क्या 53 साल बाद सामने आ पाएगा लाल बहादुर शास्त्री की मौत का सच?

53 साल बाद खुलेगा लाल बहादुर शास्त्री की मौत का सच, रिलीज हुआ फिल्म का Trailer
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
इन दिनों बॉलीवुड भी पूरी तरह से चुनाव के मौसम और राजनीति के रंग में रंगा नजर आ रहा है। जहां अगले महीने की शुरुआत में पीएम मोदी की बायोपिक 'पीएम नरेंद्र मोदी' पर्दे पर आ रही है
बॉलीवुड में देश के कई मंत्रियों पर फिल्में बन चुकी हैं, इसी कड़ी में देश के दूसरे प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री पर फिल्म बनाई गई है। लाल बहादुर शास्त्री की मौत से जुड़ी इस मिस्ट्री थ्रिलर फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' का ट्रेलर रिलीज किया गया है फिल्म के ट्रेलर को देखकर लगता है कि इसमें कई सारे मुद्दों को उठाया गया है जो शास्त्री जी की रहस्यमयी मृत्यु से जुड़े हुए हैं फिल्म का निर्माण विवेक अग्निहोत्री ने किया है इस फिल्म में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कई दिग्गज चेहरे काम करते नजर आ रहे हैंफिल्म का ट्रेलर शुरू होता है एक बैकग्राउंड आवाज के साथ जो बताती है कि दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी के दूसरे प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद जाते हैं और वहां पर पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग को खत्म करने के लिए समझौता पत्र पर साइन करते हैं दूसरे ही दिन उनकी मौत हो जाती है सैकड़ों सवालों के बीच इस मौत पर कोई भी जांच कमेटी नहीं बिठाई जाता है? इसके बाद मिथुन चक्रवर्ती विपक्ष नेता श्याम सुंदर त्रिपाठी के रोल में बोलते नजर आ रहे हैं कि शास्त्री जी मरे या मार दिए गए? फिल्म देखने की उत्सुकता को और बढ़ा देता है
Related imageज्ञात हो, जब उनका मृतक शरीर दिल्ली लाया गया था, उनके परिवार तक को दूर रखने का भरपूर प्रयास किया था। लेकिन विधवा हुई ललिता शास्त्री के द्वारा हंगामा किये जाने उपरान्त ही पत्नी और पुत्र को उनके पास जाने दिया गया था। क्योकि ललिता शास्त्री का विरोध किसी अनहोनी का स्पष्ट दे रहा था। ताशकंत समझौते के विरोध में शास्त्री के दिल्ली आगमन पर काले झंडे दिखाए जाने की तैयारी कर चुकी तत्कालीन भारतीय जनसंघ स्तब्ध थी, परन्तु इस गुत्थी से पर्दा हटाने की किसी ओर से गंभीर मांग नहीं हुई।  
फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती के अलावा नसीरुद्दीन शाह, श्वेता बासु, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक, मंदिरा बेदी, पल्लवी जोशी, अंकुर राठी और प्रकाश बेलावाड़ी नजर आएंगे हैं। फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' 12 अप्रैल को रिलीज होगी। फिल्म में पंकज त्रिपाठी साइंटिस्ट गंगाराम झा के किरदार में नजर आएंगे तो एक्ट्रेस पल्लवी जोशी पद्मश्री लेखिका आयशा अली शाह की भूमिका में दिखेंगी। वहीं फिल्म में श्वेता बसु प्रसाद पत्रकार रागिनी फुले की भूमिका निभाती दिखेंगी
फिल्म का ट्रेलर जितना शानदार है, उससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिल्म देखने की उत्सुकता लोगों में बढ़ जाएगी। बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज तक मिस्ट्री बनी हुई है। 11 जनवरी 1966 को खबर आई कि हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई है। हालांकि इस पर अभी भी संदेह बरकरार है।दो साल पहले शास्त्री जी के परिवार ने उनकी मौत से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करने की मांग सरकार से की थी
हैरानी की बात तो यह है कि "इतने वर्ष कांग्रेस से जुड़े होने के बावजूद परिवार ने अपने पिता की रहस्मयी मृत्यु की जाँच की माँग क्यों नहीं की?" आखिरकार, इस परिवार को भी वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से कुछ उम्मीद नज़र आ रही है। 
मिथुन चक्रवर्ती से लेकर पंकज त्रिपाठी तक, सबकी जुबान पर एक सवाल- 'हू किल्ड शास्त्री?'
फिल्म में लाल बहादुर शास्त्री की मौत की गुत्थी को दिखाया गया है, फोटो साभार:twitter@taranadarsh

मिथुन चक्रवर्ती ने पूछा "शास्त्री जी को किसने मारा?"
कौन होगा क्या
इस फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती ने काफी अहम किरदार में नजर आ रहे हैं। वे यहां श्याम सुंदर त्रिपाठी की भूमिका में होंगे। उनका लुक लंबे बालों के साथ काफी अट्रेक्टिव नजर आ रहा है। 

वहीं यहां नामी एक्ट्रेस पल्लवी जोशी का भी एक पोस्टर सामने आया है। फिल्म में पल्लवी आयशा अली शाह की भूमिका में हैं। उनके लुक्स को देखकर समझ आ रहा है कि वह शायद किसी जज या वकील का रोल निभा रही हैं
पंकज त्रिपाठी एक बार फिर पूरी तरह से अपने किरदार में उतरे हुए नजर आ रहे हैं। उनका यह गेटअप बता रहा है कि पंकज फिर से तारीफ बटोरने की तैयारी में हैं। वह इस फिल्म में गंगाराम झा के किरदार में होंगे
वहीं फिल्म में श्वेता बसु प्रसाद ने रागिनी फुले की भूमिका निभाई है। उनका लुक भी पहले से काफी बदला हुआ नजर आ रहा है। गौरतलब है कि यह फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' भारत के चर्चित और दूसरे प्रधानमंत्री लाल बाहदुर शास्त्री की डेथ मिस्ट्री पर बनाई गई है। फिल्म का नाम 'द ताशकंद फाइल्स' रखा गया है क्योंकि लाल बाहदुर शास्त्री की मौत ताशकंद में ही हुई थी। वह उस समय पर राजनीतिक दौरे पर थे
इस ऐतिहासिक घटना पर आधारित फिल्म के निर्माता-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री हैं। फिल्म के मुख्य किरदारों में नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती, श्वेता बासु, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक, मंदिरा बेदी, पल्लवी जोशी, अंकुर राठी और प्रकाश बेलावाड़ी के नाम शुमार हैं
10 जनवरी 1966 को उज्बेकिस्तान के ताशकंद शहर में एक अंर्तराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौता हुआ था। इस समझौते को ताशकंद समझौता कहते हैं। इसी के अगले दिन 11 जनवरी को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध तरीके से मृत्यु हो गई थी
ये वही शास्त्री जी हैं, जिन्होंने अपने प्रधानमंत्री रहते लाहौर पर कब्ज़ा जमाया था। पुरे विश्व ने जोर लगा लिया लेकिन लाहौर देने से इनकार कर दिया था! आख़िरकार ताशकंद में उनकी रहस्यमय मौत हो गयी, जिसका आज तक पता नहीं लगाया जा सका है!
1. जब इंदिरा गांधी शास्त्री जी के के घर (प्रधान मंत्री आवास ) पर पहुँची तो कहा कि यह तो चपरासी का घर लग रहा है, इतनी सादगी थी हमारे शास्त्रीजी में...
2. जब 1965 में पाकिस्तान से युद्ध हुआ तो वे भारतीय सेना का मनोबल इतना बढ़ा दिये थे कि भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को गाजर-मूली की तरह काटती चली गयी थी और पाकिस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा जीत लिया था।
3. जब भारत पाकिस्तान का युद्ध चल रहा तो अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए कहा था कि भारत युद्ध खत्म कर दे नहीं तो अमेरिका भारत को गेहूँ देना बंद कर देगा,तो इसके जवाब में शास्त्री जी ने कहा था कि हम स्वाभिमान से भूखे रहना पसंद करेंगे,किसी के सामने भीख मांगने की जगह. वे देशवासियों से निवेदन किये थे कि जब तक अनाज की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक सब लोग सोमवार का व्रत रखना चालू कर दें और खाना कम खाया करें।
4. जब शास्त्री जी ताशकंद समझोते के लिए जा रहे थे तो उनकी पत्नी ने कहा था कि अब तो इस पुरानी फटी धोती की जगह नई धोती खरीद लीजिये, तो शास्त्री जी ने कहा इस देश मे अभी भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो फटी हुई धोती पहनते हैं. इसलिए मै अच्छे कपडे कैसे पहन सकता हूँ? क्योंकि वे उन गरीबों के ही नेता थे अमीरों के नहीं. वे अपनी फटी पुरानी धोती को अपने हाथ से सिलकर ताशकंद समझोते के लिए गए।
5. जब पाकिस्तान से युद्ध चल रहा था तो शास्त्री जी ने देशवासियों से कहा कि युद्ध में बहुत रूपया खर्च हो सकता है. इसलिए सभी लोग अपने फालतू के खर्च कम कर दें और जितना हो सके सेना को धन राशि देकर सहयोग करें । खर्च कम करने वाली बात शास्त्री जी ने अपने खुद के दैनिक जीवन में भी उतारी । उन्होने अपने घर के सारे काम करने वाले नौकरों को हटा दिया था और वे खुद ही अपने काम करते थे.
6. शास्त्री जी दिखने में जरूर छोटे थे, पर वे सच में बहुत बहादुर और स्वाभिमानी थे.
7. जब शास्त्री जी की मृत्यु हुई तो कुछ नीच लोगों ने उन पर इल्ज़ाम लगाया की वे भ्रष्ट थे. पर जांच होने के बाद पता चला कि उनके बैंक खाते में मात्र365/- रूपये थे। इससे पता चलता है कि शास्त्री जी कितने ईमानदार थे.
8. शास्त्री जी अभी तक के एक मात्र ऐसे प्रधान मंत्री रहे हैं जिन्होंने देश के बजट मे से 25 प्रतिशत सेना के ऊपर खर्च करने का फैसला लिया था । शास्त्री जी हमेशा कहते थे कि देश का जवान और किसान सबसे महत्वपूर्ण हैं. इसलिए इन्हे कोई भी तकलीफ नहीं होना चाहिए. शास्त्री जी ने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया.
9. चर्चा है कि जब शास्त्रीजी ताशकंद गए थे तो उन्हें जहर देकर मार दिया गया था और देश मे झूठी खबर फैला दी गयी थी की शास्त्री जी की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई । और आज तक इस बात पर से पर्दा नहीं हटा है.
10. शास्त्री जी जातिवाद के खिलाफ थे. हम धन्य हैं कि हमारी भूमि पर ऐसे स्वाभिमानी और देश भक्त इंसान ने जन्म लिया । यह बहुत गौरव की बात है कि हमें शास्त्री जी जैसे प्रधान मंत्री मिले. 

लाल बहादुर शास्त्री की मौत की जांच कराए मोदी सरकार -- अनिल शास्त्री

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के छोटे पुत्र अनिल शास्त्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध है कि पिताजी की मौत से जुड़े दस्तावेजों का खुलासा किया जाए। राजनारायण कमेटी की रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जाए। हो सकता है उनकी मौत प्राकृतिक हुई हो, लेकिन संदेह से परदा उठना चाहिए।
लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय के लोकार्पण समारोह के बाद पत्रकारों से बातचीत में अनिल शास्त्री ने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि मैं कहीं रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर जाता हूं तो लोग पूछते हैं, शास्त्री जी की मौत का कारण क्या था?
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उपरोक्त लेख में उठाए गए प्रश्न आज भी अनसुलझे पड़े हैं ! क्यों?
अनिल शास्त्री 1989 में वाराणसी के सांसद रहे हैं। उन्होंने कहा कि सेंट्रल  इंफॉरमेशन कमिश्नर ने पीएमओ को पत्र लिखा है कि शास्त्री जी की मौत से संबंधित दस्तावेज का खुलासा होना चाहिए। सीआईसी ने पीएमओ को यह भी लिखा है कि जनता पार्टी ने 1977 में राजनारायण कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी की रिपोर्ट मिल नहीं रही है। इस रिपोर्ट को जनता के बीच सार्वजनिक करना चािहए। रिपोर्ट का न मिलना गंभीर मसला है। 
शास्त्री जी की मौत पर सवाल उठने के कई कारण हैं। जहां उन्हें ठहराया गया था वह जगह ताशकंद शहर से 15 किमी दूर थी। जहां डाक्टरों को पहुंचने में 15 से 20 मिनट लग गये। जहां वह ठहरे थे, वहां चिकित्सकीय व्यवस्था तक नहीं थी। यदि एंबुलेंस होती तो कम से कम अस्पताल तक पहुंचा सकती थी।
सबसे बड़ी बात यह है कि एक प्रधानमंत्री के शयन कक्ष में अपने निजी सचिव को बुलाने के लिए न तो घंटी थी और न ही टेलीफोन। जिस समय उनकी तबियत खराब हुई वे निजी सचिव के पास जाने के लिए कुछ दूर तक चलकर आए। न तो उनकी डायरी वापस आई और न ही थर्मस। 
शास्त्री जी की नवासी मेरी समधन श्रीमति शीला श्रीवास्तव भी अक्सर फुर्सत के क्षणों में अपने नाना को याद करते बताती है कि "अपने नाना को अंतिम बार ताशकंत जाते देखा था, लेकिन वहां से उनका शव आने पर किसी को उनके पास तक नहीं जाने दिया था। नानी (श्रीमती ललिता शास्त्री) और बड़े मामा हरी द्वारा खूब हंगामा करने उपरान्त ही सिर्फ बड़ों को उनके पास जाने दिया था। नाना के शरीर पर जगह-जगह नीले निशान पड़े हुए थे।" अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या उस समय हमारी चिकित्सा पद्द्ति इतनी निष्क्रिय थी कि मृतक के शरीर पर पड़े नीले निशानों का आकलन कर सके? यदि नहीं, तो पोस्ट-मॉर्टम क्यों नहीं करवाया गया? किन लोगों ने ऐसा करने से रोका था? जो शायद सिद्ध करता है कि लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु, मृत्यु नहीं बल्कि राजनायिक हत्या थी। 
कहते हैं, 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान शास्त्रीजी केवल सीमा पर  दुश्मन से नहीं, बल्कि देश में छिपे बैठे पाकिस्तान समर्थकों से भी लड़ाई लड़ रहे थे। देश से गद्दारी कर रहे किसी भी प्रतिभाशाली तक को नहीं बक्शा था। जो छद्दम धर्म-निरपेक्षों को रास नहीं आने के कारण ही शायद उनकी हत्या करवा दी गयी थी। जिसका उल्लेख स्वतन्त्र पत्रकारिता करते अपने सर्वाधिक प्रकाशित लेख "देश की राजनीती में अभिनेताओं का हस्तक्षेप" में किया था, जिसे अपनी पुस्तक में भी सम्मिलित किया था।  उन दिनों गैर-फ़िल्मी "कहनी है एक बात हमें आज, देश के वीर सिपाहियों से, संभल कर रहना, देश में छिपे गद्दारों से..." गीत बहुत चर्चित था। काश ! ताशकंत से जीवित आ गए होते, देश से गद्दारी करने वालों का बहुत ही बुरा हश्र होता, इस काम को "बौना" शास्त्री ही कर सकते थे? शायद यही कारण है 2 अक्टूबर को जिसे देखो गाँधी-गाँधी करता  रहता है, शास्त्रीजी को कितने लोग याद करते हैं? 
शास्त्रीजी की मृत्यु का समाचार सर्वप्रथम अंग्रेजी दैनिक Indian Express में प्रकाशित हुआ था। बाजार में सबसे देरी से आने के बावजूद, सर्वाधिक बिकने वाला भी वही दैनिक था। क्योकि टेलीप्रिंटर पर रात को जिस समय समाचार आया था, उस समय सम्पादकीय विभाग भी काम पूरा कर अपने घर को निकल चुके होते थे। किसी कारणवश एक्सप्रेस सम्पादकीय के कुछ रुके हुए थे, समाचार देखते ही मुख्यसंपादक से सम्पर्क कर, छपाई रुकवाकर, बचे हुए स्टाफ ने प्रथम पृष्ठ तैयार कर ताजे समाचार के साथ शोक समाचार दिया।     

जहां बीता बचपन आज वहां तीन पीढ़ियां एक साथ

मौका था लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय के लोकार्पण समारोह का। माहौल था राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इंतजार का। इन सबके बीच पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की तीन पीढ़ियां लंबे समय बाद एक साथ उस आवास में एकत्र हुई जहां बचपन बीता था। सबके चेहरे पर अपने घर के संग्रहालय बनने की खुशी दिखी।

नई पीढ़ी के लोगों को पुरानी पीढ़ी के लोग बताते दिखे की यहां पर सोते थे, यहां खेलते थे। बचपन में छिपने के स्थान और फूटी खपरैल से बारिश में टपकती बूंदों के उस स्थान को दिखा रहे थे जो आज चमाचम हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री की तीन पीढि़यों में सुनील शास्त्री, मीरा शास्त्री, मंजू शास्त्री, नीरा शास्त्री, सिद्धार्थनाथ सिंह, विनम्र शास्त्री, जया शास्त्री, वैभव शास्त्री, पूजा शास्त्री, जान्या शास्त्री, समीप शास्त्री, सविता सिंह शामिल रहे। 

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी  

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी दर्शाई गई है। बच्चों के आग्रह पर पूर्व पीएम ने बतौर प्रधानमंत्री एक फिएट बैंक से लोन लेकर खरीदा था। किस्तों की अदायगी के पूर्व वे गोलोकवासी हो गए। बैंक अधिकारियों ने ललिता शास्त्री से किस्त माफ करने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया।
भारत के लाल की ललिता ने सच्ची अर्धांगिनी के रूप में न केवल लौकिक जीवन में उनका ख्याल रखा बल्कि पारलौकिक जीवन में शास्त्री जी के स्वाभिमानी आत्मा पर आंच नहीं आने दी। अपने पारिवारिक पेंशन से कार की बची किस्तों का भुगतान किया।

संग्रहालय में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय में कुल 14 कमरे हैं। इन कमरों में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम दिखाया गया है। उनका जीवन परिचय महत्वपूर्ण तिथियों के साथ एक कमरे में लगाया गया है। इसमें दो अक्तूबर 1904 को पूर्व पीएम के जन्म से लेकर 12 जनवरी 1966 को नई दिल्ली में विजय घाट पर अंत्येष्टि तक के बारे में जानकारी दी गई है। पूर्व पीएम की स्मृतियों से जुड़ी 150 से अधिक चित्र लगाए गए हैं।
एक कमरे में उनके पिता शारदा प्रसाद और माता रामदुलारी देवी का ब्लैक एंड व्हाइट फोटो लगाई गई है। इसमें पूर्व पीएम के वंश वृक्ष का जिक्र किया गया है। एक कमरे में खटिया पर सफेद चादर और तकिया, बल्ब, जलता हुआ लालटेन, बेना रखा गया है। जिसमें पूर्व पीएम विश्राम करते थे। इसी कमरे में छत पर जाने के लिए सीढ़ी बनाई गई है।
एक कमरे में उनका बैठका था। जहां बैठकर बातचीत करते थे। उनके भाषण और कहे वाक्य को स्लोगन बनाकर लगाया गया है। ललिता शास्त्री की प्रतिमा के पास जवान और किसान को दिखाया गया है। रसोई घर में सिलबट्टा, ओखली, मूसर, पत्थर की चक्की, चौका, बेलन, मिट्टी का चूल्हा, केतली, मथनी, गिलास, लोटा, थाली, पानी भरने का पीतल का गगरा सहित आदि सामान रखे गए हैं। खटिया मचिया सहित कई जरूरी सामान रखे हैं। दो कमरों के बीच में आंगननुमा जगह पर जय जवान और जय किसान के नारे बंदूक और हल के जरिए दिखाया गया है।
उन्होंने माँ को नहीं बताया था कि वो रेलमंत्री हैं।  कहा था, ''मैं रेलवे में नौकरी करता हूँ।'' 
वो एक बार किसी कार्यक्रम मे आए थे जब उनकी माँ भी वहाँ पूछते पूछते पहुची कि मेरा बेटा भी आया हैं वो भी रेलवे में हैं। 
लोगों ने पूछा क्या नाम है तो उन्होंने जब नाम बताया तो सब चौक गए बोले, ''ये झूठ बोल रही है।''
पर वो बोली, ''नहीं वो आए है।''
लोगो ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री के सामने ले जाकर पूछा, ''क्या वहीं हैं ?''
तो माँ बोली, ''हाँ, वो मेरा बेटा है।'' 
लोग, मंत्री जी से दिखा कर बोले, ''वो आपकी माँ है।'' 
तो उन्होंने अपनी माँ को बुला कर पास बैठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया।
तो पत्रकारों ने पुछा, ''आप ने, उनके सामने भाषण क्यों नहीं दिया।'' 
''मेरी माँ को नहीं पता कि मैं मंत्री हूँ। अगर उन्हें पता चल जाय तो लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं मना भी नहीं कर पाउंगा।  ...... ...... और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा।''
जवाब सुन कर, सब सन्न रह गए। 
"कहाँ गए वो निस्वार्थी सच्चे ईमानदार लोग ...... '' 

हम सदैव स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को अपना जीवन आदर्श मानकर कार्य करते रहेंगे