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तमिलनाडु : ‘सनातन धर्म को उखाड़ फेंकेंगे, भगवा को मिटा देंगे’, हिंदू नेता और IMK प्रमुख अर्जुन संपत पर हमला

                                      IMK के प्रमुख अर्जुन संपत और VCK कार्यकर्ता (साभार: communemag)
तमिलनाडु में डीएमके (DMK) और विदुथालाई चिरुथैगल कच्ची (VCK) के कार्यकर्ताओं ने जबरन इंदु मक्कल काची (IMK) के प्रमुख अर्जुन संपत का घेराव कर उन्हें बाबासाहेब अंबेडकर को श्रद्धांजलि देने से रोकने की कोशिश की।

Communemag की एक रिपोर्ट के अनुसार, IMK प्रमुख अर्जुन संपत भारत रत्न बीआर अंबेडकर की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने चेन्नई के राजा अन्नामलाई पुरम स्थित स्मारक गए थे। इसी दौरान वीसीके और डीएमके के कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें परिसर में प्रवेश करने से रोका।

पार्टी कार्यकर्ताओं ने गेट बंद कर अर्जुन संपत के खिलाफ नारे लगाए। इतना ही नहीं बाबासाहेब आंबेडकर को सम्मान देने के लिए आए आईएमके सदस्यों पर आक्रामक रुख अख्तियार करते और हिंदू विरोधी बयान देते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा ने यह भी कहा कि वे सनातन धर्म को उखाड़ फेंकेंगे और भगवा को मिटा देंगे। वीसीके के झंडे लिए मुस्लिम समुदाय के दो सदस्यों ने अर्जुन संपत का भगवा शॉल खींचने की भी कोशिश की।

VCK और DMK के लोगों ने भारत माता के नारे लगाने पर भी जताई आपत्ति

वामपंथी ‘पेरियारिस्ट’ संगठनों और कम्युनिस्ट संगठनों के लोगों ने कथित तौर पर आईएमके नेता पर हमला करने की कोशिश भी की। साथ ही स्मारक के अंदर ‘भारत माता की जय’ के नारे पर भी आपत्ति जताई। हालाँकि पुलिस की मदद से अर्जुन संपत और आईएमके के अन्य नेता बाद में बाबा साहेब को श्रद्धांजलि देने में सफल हुए।

इस मामले पर अर्जुन संपत ने कहा, “सामाजिक न्याय के ये तथाकथित झंडाबरदार मुझे बाबासाहेब को सम्मान देने से रोक कर, एक प्रकार से मुझसे अछूतों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। बाबासाहेब के नाम का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें खुद पर शर्म आनी चाहिए। वे VCK या DMK के नेता नहीं हैं। वे सभी भारतीयों के नेता हैं।”

संपत ने कहा कि वीसीके और डीएमके के गुंडों का अलोकतांत्रिक और निर्मम व्यवहार उन्हें श्रद्धांजलि देने से नहीं रोक सकेगा। वे बाबा साहेब को सम्मान देने के लिए और अन्य 5 जगहों पर जाएँगे जहाँ उनकी प्रतिमाएँ रखी हुई है। आईएमके नेता ने कहा, “आईएमके बाबासाहेब के सिद्धांत का पालन करता है, जबकि वीसीके गुंडे ईवीआर के अनुसरण करते हैं।”

उन्होंने कहा कि वीसीके प्रमुख को अपने कैडरों पर नजर रखनी चाहिए और उन पर नियंत्रण करना चाहिए जो बाबासाहेब के नाम पर ऐसी तुच्छ हरकतें कर रहे हैं। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से ऐसे उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई करने का भी आग्रह किया है।

हिंसा से संलिप्त VCK

आपको बता दें वामपंथी राजनीतिक दल वीसीके के कार्यकर्ता और विशेषकर इस दल के प्रमुख थोल थिरुमावलवन को हिंदुओं, विशेषकर उच्च जाति समुदायों के खिलाफ उनमें भरे नफरत के लिए जाना जाता है। इन्होंने हमेशा हिंदू संगठनों पर हमला और उनके साथ दुर्व्यवहार किया है।

तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के वेदाचंदुर में हिंदू संगठन, इंदु मक्कल काची (आईएमके) के एक पदाधिकारी मणिकंदन प्रभु पर वीसीके के सदस्यों ने चाकू से हमला कर दिया था। मणिकंदन प्रभु IMK के लिए वेदांतूर विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी के रूप में काम करते थे।

इतना ही नहीं थिरुमावलवन ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए यह तक कह दिया था कि हिन्दू धर्म में, खासकर ब्राह्मणों में महिलाओं को सेक्स वर्कर्स (Sex workers) यानी वेश्या माना जाता है। साथ ही, VCK प्रमुख ने कहा कि हिन्दू धर्म में महिलाओं का स्थान पुरुषों से नीचे रखा गया है। 26 सितम्बर को ‘पेरियार टीवी’ (Periyar TV) नाम के यूट्यूब चैनल से बात करते हुए, थिरुमावलवन ने सनातन धर्म और हिंदू मान्यताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में महिलाओं को सेक्स वर्कर माना जाता है।

शरिया कानून पर टिप्पणी सुन भड़के कट्टरपंथी, मधुर सिंह को दी कमलेश तिवारी की तरह मारने की धमकी

मधुर सिंह
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जिस तरह नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध हो रहे धरने-प्रदर्शनों में "हिन्दू से चाहिए आज़ादी", "हिन्दू तेरी कब्र खुदेगी", "fuck Hindutva", "मोदी-योगी तेरी कब्र खुदेगी" आदि हिन्दू विरोधी नारों पर अपने लेखों में स्पष्ट रूप से लिखा था कि जिस तरह हिन्दू और हिन्दुत्व नारेबाजी हो रही है, और हिन्दू का संयम जवाब दे गया और इन नारों के विपरीत दूसरी तरफ से नारेबाजी होगी, उस स्थिति में क्या होगा? क्या विरोध के आयोजक देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का प्रयास कर रहे हैं? जो प्राप्त समाचार के अनुसार सत्यापित होने के कगार पर पहुँच चुकी है। अगर विरोधियों को अपनी बात कहने की अभिव्यक्ति की आज़ादी है, फिर मधुर सिंह की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर इस्लामिक कट्टरपंथी मधुर सिंह क्यों धमकी दे रहे हैं? समय है कि सरकार किसी अनहोनी को होने से रोके। 
अगर भारत में दूसरा कमलेश तिवारी दोहराया जाता है, तो इसके जिम्मेदार नागरिकता कानून के विरोध में हिन्दू विरोधी नारे लगवाने वाले आयोजक भी होंगे। क्योकि उकसाने का काम उनकी तरफ से हुआ है। क्यों नहीं हिन्दू विरोधी नारे तुरन्त रुकवाए गए? दूसरे  प्रदर्शनों में सम्मिलित हिन्दू किस आधार पर यह सब सुनते और देखते रहे? क्या वह सब हिन्दू होने का स्वांग कर रहे हैं?
नागरिकता संशोधन कानून आने के बाद देश में कई तथाकथित सेकुलरों और इस्लामिक कट्टरपंथियों का चेहरा उजागर हुआ। हिंदुओं के साथ हमेशा भाईचारे का दावा करने वाले खुलकर हिंदुत्व का विरोध करने लगे। सोशल मीडिया पर शांत लोगों को भी भड़काया जाने लगा। सीएए का समर्थन करने वालों लोगों को या तो भक्त या फिर हिंदू आतंकी करार दे दिया गया। इसी बीच पोस्टर्स के जरिए अक्सर देश से जुड़े राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर बोलने वाले प्लेकार्ड ब्वॉय मधुर सिंह को कमलेश तिवारी की तरह जान से मारने की धमकी मिली। इस धमकी की वजह अभी हाल ही में उनके द्वारा शरिया पर की गई एक टिप्पणी है।
दरअसल, दो दिन पहले सोशल मीडिया पर मधुर ने सीएए के विरोधी में बोल रही एक मुस्लिम लड़की का वीडियो शेयर किया था। जिसमें वे ट्रिपल तलाक जैसी चीजों का हवाला देकर एनडीए सरकार पर इल्जाम लगा रही थी कि सरकार उनके इस्लामिक कानून में दखलअंदाजी करने का प्रयास कर रही है। लेकिन मुसलमान इस्लामिक कानून के हिसाब से ही रहते हैं।
लड़की का यह वीडियो शेयर करते हुए मधुर ने इस पर अपनी राय दे दी। उन्होंने लिखा कि यही कारण है कि आखिर क्यों ये लोग डरे हुए है और इतना हंगामा कर रहे हैं। ये जानते हैं कि मोदी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने वाला है। जिससे, देश में शरिया लागू करने के इनके मंसूबों पर पानी फिर जाएगा।
अगर बात देश में अभिव्यक्ति की आजादी की है, तो मधुर की राय से किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन कट्टरपंथी फौरन ये टिप्पणी और शरिया शब्द देखकर मधुर को गाली देने लगे। इमाद नाम के शख्स ने उन्हें पर्सनल मैसेज किया कि अगर मुस्लिम शरिया लॉ फॉलो करते हैं, तो इसमें मधुर को क्या दिक्कत है। इतना बोलने के बाद ये मुस्लिम युवक मधुर को गाली देता है और धमकी देता है। इमाद लिखता है, “और वैसे तुम अपनी जान की परवाह करो, मुझे आशा है तुम्हें कमलेश तिवारी की तरह गला काटने की धमकियाँ न मिलती हों।”
इस धमकी के बाद मधुर ने ये स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर किया और बाकी कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया भी देखने लगे। इसी बीच फरदीन नाम का मुस्लिम युवक मधुर को मैसेज में गाली-गलौच करने लगा और साथ ही उनके घर की महिलाओं पर भी आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।
ऑपइंडिया से बातचीत में मधुर ने बताया कि उन्हें सोशल मीडिया पर बहुत सी धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर कुछ फीचर्स पर प्राइवेसी लगा रही ताकि उनकी स्टोरी या पोस्ट पर ऐसा कमेंट न आए। उन्हें लगता है कि कमलेश तिवारी वाली धमकी के बाद उन्होंने जो स्क्रीनशॉट शेयर किया उससे इमाद के दोस्त उन्हें धमका रहे हैं या उन्हें ये भी आशंका है कि वो इमाद के ही फेक अकॉउंट हों। बता दें इमाद ने शायद अपना अकॉउंट डिएक्टिवेट कर दिया है।
मधुर के मुताबिक उनके इंस्टाग्राम पर ज्यादा फॉलोवर नहीं थे। लेकिन जब से उन्होंने सोशल मीडिया पर सीएए के समर्थन में पोस्ट करना शुरू किया उनके फॉलोवर अचानक से बढ़ गए और फिर जब से फॉलोवर बढ़े उन्हें उनके राजनैतिक विचारों के लिए जान से मारने की धमकियाँ दी जानें लगीं। मधुर ने बातचीत में यह भी बताया कि वे इस मामले पर एफआईआर दर्ज कराने की सोच रहे हैं।
मधुर के अनुसार ट्विटर पर तो उन्हें 12 जनवरी से ही लॉक किया हुआ है। वे वहाँ किसी तरह का ट्वीट नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए, क्योंकि बहुत सारे लोगों ने पिछले साल के ट्वीट्स की रिपोर्ट की थी। उनके मुताबिक पुलवामा हमले के बाद उन्होंने एक क्लिन द नेशन के नाम से एक शुरुआत की थी। जिसमें उन्होंने ईमेल अड्रेस मेंशन किया और लोगों ने उसे निजता का हनन बताकर रिपोर्ट कर दिया। हालाँकि उन्होंने आवाज उठाई, लेकिन कुछ भी फर्क़ नहीं पड़ा।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जामिया, JNU से चले आजादी के नारे शाहीनबाग़ तक आते-आते इस्लामिक नारों, हिन्दू विरोधी नारों...
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शाहीन बाग में 700-800 मीटर के अच्छे-खासे दायरे में पिछले डेढ़ महीने से 500 से अधिक मुस्लिम मह....
मधुर सिंह के बारे में बता दें वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं और उन्हें दोबारा चुनावों में लाने के लिए प्लेकार्ड कैंपेन की शुरुआत की। इस कैंपेन के दौरान पुरानी दिल्ली में मुस्लिम लोगों की भीड़ ने उन्हें एक बार घेर भी लिया था और साथ ही धमकी दी थी कि एक बार कांग्रेस को सत्ता में आ जाने दो, हम तुमको सबक सिखाएँगे।(एजेंसीज इनपुट्स सहित)

शाहीन बाग की औरतें: कब मॉंगेंगी हलाला से, माहवारी आते ही निकाह कर देने की रवायत से आजादी

शाहीन बाग, प्रदर्शन
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
शाहीन बाग में 700-800 मीटर के अच्छे-खासे दायरे में पिछले डेढ़ महीने से 500 से अधिक मुस्लिम महिलाएँ  प्रदर्शन कर रही है। वो भी सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ। एक ऐसे कानून के ख़िलाफ़ जिससे वास्तविकता में उनका या उनके समुदाय के किसी भी वर्ग का कोई सरोकार ही नहीं है। लेकिन फिर भी वे बैठी हैं। यहाँ मुस्लिम समुदाय की छोटी बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक कड़ाके की ठंड में अपने घर से सारे कामकाज़, पढ़ाई-लिखाई छोड़ उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। और इस प्रदर्शन को वो अपने अधिकारों और औचित्य को बनाए रखने की लड़ाई बता रही हैं। खैर! किसी वर्ग द्वारा अधिकारों के नाम पर उठाई जा रही आवाजों से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन शाहीन बाग पर बैठीं महिलाओं से कुछ सवाल जरूर हैं।
भारत में मुस्लिमों में निरक्षरता की दर सबसे अधिक है। करीब 43 प्रतिशत। उससे भी दयनीय स्थिति है मुस्लिम महिलाओं की। दो दशक पहले तक भारत में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता का दर 5 प्रतिशत से भी कम था। आज बदलते वातावरण ने और सरकार के प्रयासों ने इन्हें करीब 30 प्रतिशत के लगभग पहुँचाया है। हालाँकि, ये पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन फिर भी सराहनीय है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक स्थिति पर बात हमेशा रूढ़िवादी मजहबी पैरोकारों द्वारा तय किए पैमानों के आधार पर की जाती है और मुस्लिम महिलाएँ इसे ही अपना हकूक समझती हैं। इस्लामिक पैरोकार उनके लिए जिन चीजों की परिभाषा तय करते हैं, वो उसी के आधार पर अपने सपने बुनती हैं। उसी की जमीन पर अपनी सीमा तय करती हैं। और, उसी की सीमा में रहकर आवाज़ उठाती हैं। इस बात का ताजा उदाहरण शाहीन बाग पर बैठीं 500 से अधिक महिलाएँ हैं।
सवाल- उन मामलों से जुड़े हैं, जिन पर वो हमेशा चुप रहीं। सवाल उन मुद्दों से जुड़े हैं, जिन पर मुस्लिम महिलाओं को सदियों से प्रताड़ित किया जाता रहा। सवाल भारत में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति, राजनैतिक स्थिति से जुड़े हैं। सवाल तीन तलाक से जुड़े हैं, हलाला से जुड़े हैं, बहुविवाह से जुड़े हैं और, साथ ही माहवारी आते ही निकाह कर देने की रवायत से जुड़े हैं। जिसके आधार पर कोर्ट को भी चुनौती दी गई
आज शाहीन बाग पर 15 दिसंबर से धरने पर बैठी मुस्लिम महिलाएँ इस प्रदर्शन को अपनी ताकत और अखंडता का पर्याय बता रही हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि सदियों से हजारों बंदिशों में जकड़ी मुस्लिम महिलाओं को कभी अपने अधिकारों के बारे में सोचने की फुरसत नहीं मिली। उन्हें यही नहीं पता चला कि ये उनका अधिकार कि वो शिक्षा प्राप्त करें। अपनी जरूरत के मुताबिक संपति अर्जित करें। अपने राय अभिव्यक्त करें। हिजाब से आजादी पाएँ। हलाला के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ। और शरिया के अनुरूप नहीं, बल्कि संविधान के मुताबिक जीवन का गुजर बसर करें।
यदि वे अपने समुदाय के पैरोकारों से इन अधिकारों की माँग करती हैं, तो मजहबी उलेमा और उनके खुद के घर वाले उनके ख़िलाफ़ हो जाते हैं। घर की महिलाएँ ही महिलाओं को उनके लिए बने नियम-कानून बताने लगती हैं। उन्हें निकाह के लिए दबाव बनाया जाता है। निकाह के बाद तीन तलाक आम बताया जाता है। और तलाक के बाद हलाला को केवल अपने शौहर के पास दोबारा लौटने की एक प्रक्रिया।
अभी तक मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में शाहीन बाग का आंदोलन जारी है। लेकिन इसी बीच एक मुस्लिम महिला को उसके शौहर ने तलाक दे दिया। उसके ससुर ने उसका बलात्कार कर दिया। उसका हलाला करवाया गया, उसे मारने की धमकी मिली। लेकिन अधिकारों की दुहाई देने वाली किसी महिला को उसका दर्द नहीं दिखा। अगर मान लिया जाए, कि मुस्लिम महिलाओं का विवेक उनके अधिकारों के लिए सीएए बनने के बाद जागा। तो भी ये घटना बाद की है। क्या डेढ़ महीने से ज्यादा एनडीए सरकार पर आरोप मढ़ने वाली इन महिलाओं को एक भी बार ये मामला आवाज़ उठाने वाला नहीं लगा? या इससे पहले अनेकों बार हुई मजहबी बर्बरता पर इनका दिल नहीं पसीजा?
भाजपा सरकार के केंद्र में आने के बाद तीन तलाक कानून अस्त्तिव में आया। उत्तर प्रदेश समेत देश की कई महिलाओं ने इसके लिए नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की इसके लिए तारीफ की। जाहिर है, इस प्रथा के लिए मुस्लिम महिलाओं में कहीं टीस थी। लेकिन बिना आवाज़ के ये टीस दबी थी। जैसे ही तीन तलाक कानून बना, पीड़िताओं में खुशी की लहर दौड़ गई।
इसी तरह हलाला, बहुविवाह जैसी प्रथाएँ भी हैं। गाँव कनेक्शन की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं के हित में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन की अध्यक्षा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया था कि सहारनपुर जिले में महिलाओं का हलाला करवाने के लिए मदरसों में लड़कों को रखा जाता है। यही नहीं, उम्र और सुन्दरता के अनुसार वो महिलाओं के हलाला का पैसा लेते हैं। अब सोचिए, इनकी स्थिति कितनी बदतर हैं। लेकिन फिर भी आवाज़ उस पर उठानी है, जिस पर इनका समुदाय इजाजत दे।
जामिया की उन पढ़ी-लिखी लड़कियों से इन बातों को समझने की उम्मीद नहीं करती। जिन्होंने ऊँची शिक्षा हासिल करने के बाद भी हिजाब और बुर्के को मॉय लाइफ-मॉय रूल्स का हिस्सा बताया। बल्कि उन औरतों से अपनी बात समझने की है, जिन्हें आज भी हलाला का नाम सुनकर गुस्सा आता है और इसका समर्थन करने वालों से घृणा होती है। जिन्हें संविधान में मिला अपना शिक्षा का अधिकार एक लोकतांत्रिक अधिकार लगता है। 18 साल से कम उम्र में शादी गैरकानूनी लगती है। जो माहवारी होते ही खुद को निकाह करने का सामान नहीं समझतीं। जिसके पीछे कट्टरपंथियों की दकियानूसी सोच, कठमुल्लों के दबाव और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट-1937 बहुत बड़ी वजह हैं।
हलाला 
आज अपने मजहब को ‘हलाला’ जैसे गंभीर रोग से पीड़ित देखने के बावजूद शाहीन बाग पर बैठी महिलाएँ चुप हैं और बिन सिर-पैर के विषय पर नारे बुलंद कर रही हैं। बड़े-बड़े लेखक उन्हें नई क्रांति लिखने वाला करार दे रहे हैं। महिलाओं की आजादी और नारी सशक्तिकरण पर बात करने वाले बुद्धिजीवि इन महिलाओं का समर्थन कर रहे हैं। उनके हिजाब को उनकी पहचान बता रहे हैं। इसलिए ये हलाला से जुड़े कुछ बयान, जो शायद किसी के भी प्रोपगेंडा को ध्वस्त करें और समझने में मदद करें कि मुस्लिम महिलाओं के पास अपने लिए सही विषय पर आवाज उठाने की भी आजादी नहीं है। नीचे दिए बयान बता रहे हैं कि वास्तविकता में हलाला क्या है?
लखनऊ के चौक में रहने वाली फिरदोस (27 वर्ष) बताती हैं, “बीवी से मन भर गया या कोई दूसरी औरत पसन्द आ जाए तो पहली बीवी को तलाक दे दो। जब पहली औरत की कमी महसूस होने लगे तो हलाला करवा दो और निकाह कर लो। औरतें मजबूरी में या अपने बच्चों के कारण हलाला करवाने के लिए तैयार हो जाती हैं।”
पीसीएस अधिकारी रहे और पूर्व विशेष सचिव गृह मोहम्मद इदरीस अम्बर बहराइची के मुताबिक “मेरे गाँव में मेरा एक दोस्त है जिसकी बीवी बहुत सुन्दर है। कई लोगों ने उसकी बीवी की तारीफ कर दी तो गुस्से में आकर तलाक दे दिया। उसके बाद अफसोस करने लगे। लेकिन तलाक दे चुके थे। बीवी सुन्दर थी इसलिए हलाला करवाने में डर था कि कही दूसरे आदमी ने निकाह के बाद तलाक न दिया तो क्या करेंगे। इसलिए उसने हलाला के लिए अपने बहनोई को तैयार किया। लेकिन उसकी बीवी ने हम बिस्तर होने से मना कर दिया।”
नायिका मीना कुमारी को हलाला पर हुई पीड़ा 
बॉलीवुड को हलाला मुद्दे पर अपने समय की चर्चित नायिका मीना कुमारी का हलाला पर हुई पीड़ा को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। किसी विवाद पर शौहर कमाल अमरोही द्वारा तलाक बोलने पर जब गलती का अहसास होने पर मीना को वापस अपनी बीबी बनाने के लिए मीना द्वारा हलाला करवाने पर मीना कुमारी ने कहा था, "मेरे में और वेश्या में क्या फर्क है?"
CAA की आड़ में हिन्दुत्व पर हमला 
क्या शाहीन बाग़ और अन्य स्थानों पर CAA के विरुद्ध वोट के भूखे नेताओं द्वारा भड़का कर सड़क पर उतरने को मजबूर किया जा रहा है, क्या कभी इन महिला-समस्याओं पर सड़क आने के लिए कहा? जबकि हकीकत यह है कि इस कानून से किसी भी भारतीय--चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म से हो--को कोई खतरा नहीं, खतरा केवल घुसपैठियों को है। प्रदर्शन कर रही महिलाओं को अपने नेताओं से यह पूछना चाहिए कि मुस्लिम महिलाओं की मूल समस्याओं पर क्यों सभी ने चुप्पी साधे हुई है? जबकि मुस्लिम देशों में भारत से कहीं अधिक महिलाओं को आज़ादी मिल चुकी है।
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आर.बी.एल.निगम जिस प्रकार पानी बिन मछली तड़पती है, ठीक वही स्थिति नागरिकता कानून बनने के बाद मोदी विरोधियों की होने के...
  
दूसरे, यदि नागरिकता कानून मुसलमानों के विरुद्ध है, फिर हिन्दुत्व के विरुद्ध नारेबाजी क्यों? जो प्रमाणित करता है कि अपने खिसकते वोट बैंक को बचाने के लिए यह सब स्वांग रचा जा रहा है, जो प्रदर्शन में भाग ले रहे/रही हिन्दू पुरुष एवं महिलाओं को भी समझनी चाहिए। जिस दिन भारत में घुसे घुसपैठियों को निकालने में सरकार सफल हो गयी, मोदी विरोधियों के जमीन खिसक जाने से वो कहीं के नहीं रहेंगे। यह है विरोध की कटु सच्चाई।  

"आज़ादी तो तेरा बाप भी देगा, आज़ादी तेरी माँ भी देगी"

शाहीनबाग़
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जामिया, JNU से चले आजादी के नारे शाहीनबाग़ तक आते-आते इस्लामिक नारों, हिन्दू विरोधी नारों और गृह युद्ध की धमकियों में तब्दील हो गए और तुरंत इस पूरे अभियान की पोल खुल गई। यही वजह है कि NRC और CAA के विरोध में बताए जा रहे इस पूरे विरोध और हंगामे को अब किसी ने भी गंभीरता से लेना छोड़ दिया है। लेकिन इस विरोध प्रदर्शन का तरीका और इसकी रणनीतियाँ बिलकुल भी नजरअंदाज कर देने लायक नहीं लगती हैं।
ये वामपंथी, कांग्रेस और इनके समर्थक पार्टियां विरोध को इस्लामिक उन्माद का रंग देने पर समझ बैठे थे, कि इस्लामिक रंग देखकर सरकार और हिन्दू डर जाएंगे। इन उन्मादियों और इनके समर्थक नेताओं को नहीं मालूम कि दूसरे लोगों ने चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं। आ रहे हैं वो भी इन्हे जिन्ना वाली आज़ादी देने सड़क पर आने प्रारम्भ हो चुके हैं। और जिस दिन नागरिकता कानून के विरोधियों की भांति बदजुबान होगी, देखना "गंगा-यमुना की तहजीब", #metoo, #moblynching, #award vapsi, #intolerance, #not in my name आदि जितने भी गैंगस्टर हैं, सब अपने बिलों से निकल इधर-उधर भागते नज़र आएंगे। इनको जवाब में अभी केवल दो ही वीडियो नीचे प्रस्तुत हैं। लाल कुआँ दिल्ली में किए उन्माद से शायद किसी ने सबक नहीं लिया? 
जहाँ तक शाहीन बाग़ में जमा उन्मादियों की बात है, इस बिकाऊ जमाओरों की सच्चाई मोदी विरोधी मीडिया ने भी उजागर करना शुरू कर दिया। आखिरकार, सच्चाई को लम्बे समय तक छुपाकर नहीं रखा जा सकता। दूसरे, यह उन्माद केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही है।     
लिबरल होने का अभिनय करते आ रही यह भीड़ अब बच्चों के जरिए अपने वामपंथ के जहर और अपने प्रोपेगेंडा को हवा दे रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो शेयर किए जा रहे हैं जो शाहीन बाग़ में चल रहे कथित CAA-NRC विरोध प्रदर्शन के दौरान बनाए गए हैं। कथित इसलिए क्योंकि CAA-NRC का विरोध तो बस बहाना है।
इन वीडियो में ‘लिबरल्स’ की भीड़ बच्चों को कन्धों पर बिठाकर और उनके पास माइक देकर जो नारे लगवा रही है, वो स्पष्ट करता है कि इस सारे हंगामे का कारण कोई कानून नहीं बल्कि कुछ ऐसे लोगों का सत्ता में होना है जिनके हाथ में देश की कमान देखकर बुर्जुआ कॉमरेड को आपत्ति है। वीडियो में बच्चा नारे लगाते हुए कहता है- ‘हम ले के रहेंगे आज़ादी, तेरा बाप भी देगा आज़ादी, तेरी माँ भी देगी आज़ादी।’ जो विचारधारा इस देश में कॉन्ग्रेस का नमक खाकर तंदुरुस्त हुई है वो उसकी भक्तिधारा में चंद नारे तो लगा ही सकती है।
वहीं, एक दूसरे वीडियो में हरे लिबास में एक मौलवी किसी सार्वजानिक सभा को भाषण देते हुए गृह मंत्री अमित शाह को आटे का थैला बताते हुए धमकी दे रहा है। इस वीडियो में मौलवी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ ही उनके समर्थकों को डंडे से पीटने की बात कही है जिस पर एक उन्मादी भीड़ भी खूब तालियाँ बजा रही है और वाह-वाही दे रही है।



मौलवी का कहना है कि अगर मुसलमान को भगाने की बात कही तो तिरंगे के डंडे से वो यहाँ मौजूद लोगों को पीटेंगे। वीडियो में हरे लिबास पहने मौलवी ने यह भी स्पष्ट किया है कि हिन्दुओं से वो मुसलमान भी नहीं डरता है जिसका कि अभी तक ख़तना भी नहीं हुआ है।
CAA-NRC के विरोध के नाम पर हिन्दुओं की महिलाओं को बुर्का पहनाए जाने से लेकर स्वस्तिक के चिन्हों को कुचलने और फ़क़ हिंदुत्व जैसे सन्देश सार्वजानिक रूप से दिए जा रहे हैं। मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही अक्सर मीडिया और कुछ उदारवादी विचारकों ने स्टूडियो में बैठकर ‘डर का माहौल’ जैसे नारे दिए। इन्हीं का एक बड़ा समर्थक वर्ग है जो इस नारे पर यकीन करता हुआ इसे आगे बढ़ाता रहा।  
अब इनको जवाब देने वाली वीडियो का भी आनंद लें:-

क्या उस वर्ग को ये वीडियो और सार्वजानिक सभाएँ शांति का संदेश नजर आती होंगी? या सिर्फ वो इसलिए इस पर चुप रह जाते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि वास्तव में डर किन लोगों से होना चाहिए?
अपने विरोध प्रदर्शन में बच्चों का इस्तेमाल मजहबी और अश्लील नारे लगाने तक के लिए यह शाहीन बाग़ की भीड़ तैयार हो चुकी है। नैतिकता के मामले में तो वामपंथ से कभी कोई उम्मीद थी भी नहीं लेकिन अब वो अपने ही उस आवरण से बाहर आ चुके हैं जिस ‘उदारवादी’ नक़ाब के पीछे वो खुद को वर्षों तक छुपाते आए थे। इस विरोध प्रदर्शन के पूरे किस्से ने बता दिया है कि वामपंथ और कट्टरपंथियों की इस मिलीभगत का वास्तविक मर्म जनता नहीं बल्कि इस विचारधारा की लाश कंधे पर ढो रहे कुछ चुनिंदा लोग ही हैं।
लेकिन अब हम देख सकते हैं कि कि एक भीड़ ऐसी भी है, जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही हो सकता है। क्योंकि यही तो उनके अस्तित्व का कारण भी है।
‘मस्जिदों से ऐलान हुआ, पहले से पता था कि क्या करना है’ – दिल्ली में उपद्रव और दंगों के पीछे मुल्ला-मौलवी?
भाजपा के आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने एक वीडियो शेयर कर बताया है कि किस तरह संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर मजहबी उन्माद फैलाने की साज़िश रची जा रही है। यहाँ तक कि मस्जिदों से घोषणा की गई ताकि उपद्रवी सड़क पर उतर कर हिंसा करें। मालवीय ने दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर मस्जिदों से हुई भड़काऊ घोषणाओं को जिम्मेदार ठहराया है।
अमित मालवीय ने कहा कि इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यकों का क्या होता होगा। बता दें कि सीएए भी उन्हीं अल्पसंख्यकों के लिए है, जिन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में प्रताड़ित किया गया और उस प्रताड़ना से तंग आकर वो पिछले 5 वर्षों या इससे अधिक समय से भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। मालवीय ने मस्जिदों से भड़काऊ घोषणाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये सारी घटनाएँ बताती हैं कि सीएए ज़रूरी है।
अवलोकन करें:-
इसी तरह जब जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में देश-विरोधी नारे लगते हैं, विपक्ष उनके साथ खड़ा हो जाता है, क्यों? ऐसे नेता एवं उनकी पार्टी क्या कभी देशहित कर सकती हैं? आखिर कौन-सी आज़ादी की मंशा है? क्या इस तरह के नारे लगाने वाले और उनको समर्थन देने वाली पार्टियां किसी गुलाम देश में रह रहे हैं? जब प्रदर्शनकारियों द्वारा "हिन्दू से चाहिए आज़ादी", "हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी", "मोदी-योगी की कब्र खुदेगी" आदि आदि उत्तेजक नारे लग रहे हैं, 'गंगा-यमुना तहजीब' की बात करने वाले किस बिल में घुसकर बैठे हैं? क्यों नहीं इन हिन्दू भावनाओं को भड़काने वाले नारों का विरोध करते? ये सब तभी बाहर निकलेंगे, जब दूसरी तरफ से पलटवार होगा। अभी सब कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं।

अमित मालवीय ने ‘इंडिया टुडे’ के एक वीडियो को शेयर किया, जिसमें लोग बता रहे हैं कि वो क्यों सड़कों पर उतरे। नीचे संलग्न किए गए ट्वीट में आप मालवीय का बयान और उनके द्वारा शेयर किए गए वीडियो को देख सकते हैं:

दिल्ली में हिंसा के दौरान दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की, जैसा जम्मू कश्मीर में वर्षों से होता आ रहा है। जम्मू कश्मीर में भी कश्मीरी पंडितों को निकाले जाने के बाद से लेकर अब तक, कई बार विभिन्न मस्जिदों से भड़काऊ ऐलान होने की ख़बरें आती रहती हैं। ‘इंडिया टुडे’ से बातचीत में दिल्ली एक एक उपद्रवी ने कहा:
“हमारे क्षेत्र में कई दिनों से अनाउंसमेंट हो रही थी कि कि मंगलवार को इतने बजे एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होगा। कई लोगों को पहले से ही पता था और जिन्हें नहीं पता था, उन्होंने मस्जिदों से अनाउंस कर के कहा गया कि आप सड़क पर उतरो।”
उक्त उपद्रवी की बातों से साफ़ हो जाता है कि मस्जिदों से ऐलान कर लोगों को सड़क पर उतरने को कहा गया। इसके बाद हिंसा भड़की और पुलिस व दंगाइयों के बीच झड़प हुई। पत्थरबाजी में कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए।