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क्या बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की मिलीभगत थी?

नरसिम्हा रावजब राम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक इंसान यानि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की भूमिका हमेशा एक पहेली बनी रहेगी। पीवी नरसिम्हा राव को परिस्थिति की माँग के मुताबिक चीजों को लागू करने के लिए जाना जाता है।
पीवी नरसिम्हा राव को भारत में आर्थिक सुधार के युग की शुरुआत के लिए भी जाना जाता है। हालाँकि, 6 दिसम्बर 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव राम जन्मभूमि पर कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराते हुए चुपचाप देखते रहे।
इस बात को लेकर कांग्रेस पार्टी के भीतर उनके आलोचकों ने आरोप लगाया कि उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपित प्रमुख षड्यंत्रकारियों के साथ हाथ मिलाया था। यह आरोप लगाया जाता है कि वो पूरे घटनाक्रम से वाकिफ थे, उन्हें पता था कि क्या होने वाला है, इसके बावजूद उन्होंने चुप्पी साधे रखी और चीजों को होने दिया। उन पर धोती के नीचे निक्कर पहनने तक का आरोप लगाया गया था। 
यह सच है कि जीवन के आखिरी चरण और उनके मरने के बाद भी पीवी नरसिम्हा राव को अपनी पार्टी से ज्यादा विपक्षी पार्टी के राजनेताओं का समर्थन मिला। राम मंदिर भूमि पूजन के साथ हमें बाबरी मस्जिद के विनाश के घातक दिन पर उनके कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। शायद, मुस्लिम वोटबैंक के नाराज होने के डर से उनके शव तक पार्टी ऑफिस में नहीं आने दिया।    
जिन दिनों विध्वंस होने वाला था, उन दिनों उन्होंने राज्य(उत्तर प्रदेश) में भाजपा सरकार को खारिज करने पर विचार किया था। अपनी पुस्तक ‘अयोध्या: 6 दिसंबर 1992’ में नरसिम्हा राव का कहना है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति हाथ से बाहर निकलने पर हस्तक्षेप के लिए केंद्र सरकार को सूचित करना राज्यपाल का विशेषाधिकार है।
इसके साथ नरसिम्हा राव ने लिखा कि हाल ही में अंतिम विध्वंस से पाँच दिन पहले, तब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने केंद्र से सामान्य कानून और व्यवस्था की स्थिति के लिए संवाद किया था। इस दौरान चीजों के सांप्रदायिक पहलू पर विशेष तौर से बात की गई। यह वास्तव में संतोषजनक था। राज्यपाल की रिपोर्ट में कहा गया कि यद्यपि कारसेवक अयोध्या में बड़ी संख्या में एकत्रित हो रहे थे, मगर वे शांतिपूर्वक थे।
रिपोर्ट में कहा गया था, “ऐसी खबरें हैं कि बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुँच रहे हैं, लेकिन वे शांतिपूर्ण हैं। मेरी राय में, इस समय यूपी सरकार की बर्खास्तगी या राज्य विधानसभा को भंग करने या राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे कठोर कदम उठाने का समय नहीं है।”
नरसिम्हा राव ने अप्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट पर कुछ दोषारोपण करते हुए कहा था, “अयोध्या में विवादित ढाँचे को पर्याप्त सुरक्षा देने के सीमित और विशिष्ट उद्देश्य के लिए केंद्र सरकार को रिसीवर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का इनकार भी एक सार्थक संकेत है।”
नरसिम्हा राव ने राजीव गाँधी पर भी उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “अयोध्या के विकास के लिए इंदिरा गाँधी की कई योजनाएँ थीं। इस भावनात्मक मुद्दे की राजनीतिक तनाव का असर इंदिरा गाँधी पर नहीं पड़ी। मगर उनकी मृत्यु के बाद, उनके बेटे ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला और तब से, विनाशकारी चरणों की एक शृंखला शुरू हुई।”
इस तरह, राव के अनुसार, वह संवैधानिक मानदंडों और ऐतिहासिक मिसाल से बँधे थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने निजी सचिव से कहा था, “लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को बिना किसी वैध कारण के एहतियात के तौर पर कैसे बर्खास्त किया जा सकता है? क्या यह संवैधानिक होगा? क्या हम एक असंवैधानिक रूप से असंवैधानिक कृत्य का सहारा ले रहे हैं?”
नरसिम्हा राव के पर्सनल फिजिशियन के श्रीनाथ रेड्डी का मानना है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दिन नरसिम्हा वास्तव में व्यथित थे। के श्रीनाथ रेड्डी ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने बाबरी मस्जिद को नीचे गिरते हुए देखा था, तो नरसिम्हा राव से मिलने पहुँचे थे। वो प्रधानमंत्री को लेकर चिंतित थे, जो कि दिल की बीमारी से पीड़ित थे।
रेड्डी ने बताया, “जैसा कि मुझे उम्मीद था, उनका दिल तेजी से धड़क रहा था … नाड़ी काफी तेज़ थी … बीपी बढ़ गया था। उनका चेहरा लाल हो रहा था, वे उत्तेजित थे।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं एक डॉक्टर के रूप में काफी आश्वस्त हूँ कि विध्वंस के लिए उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया सच्ची व्याकुलता थी। यह उस व्यक्ति का नहीं था, जिसने इसकी योजना बनाई होगी या इसमें उनकी कोई संलिप्तता होगी।”
यदि उनके डॉक्टर की तत्कालीन स्वास्थ्य स्थिति का विवरण सटीक है, तो यह साबित होता है कि नरसिम्हा राव को यह पता नहीं था कि क्या होने वाला था। यह ज्ञात है कि वह व्यक्तिगत रूप से समाधान निकालकर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे और हिंदू संगठन के नेताओं से यह आश्वासन लेने का प्रयास कर रहे थे कि मस्जिद क्षतिग्रस्त नहीं होगी।
ऐसा कहा जाता है कि नरसिम्हा राव ने 1992 के नवंबर का अधिकांश समय भाजपा के नेताओं के साथ गुप्त वार्ता में बिताया। इन वार्ताओं में क्या चर्चा हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालाँकि उनके आलोचको का मानना है कि 6 दिसंबर 1992 को जो हुआ, उसमें वह भी शामिल थे।
राम जन्मभूमि के साथ कई और प्रकरण जुड़े हुए हैं। वैसे बाबरी विध्वंस में राव की भूमिका भी संभवतः आने वाले लंबे समय तक या फिर शायद, अनंत काल के लिए एक पहेली बनी रहेगी।

तिरस्कृत हुए, मौत के 16 साल बाद, नरसिम्हा राव कांग्रेस को क्यों आए याद?

नरसिम्हा राव, सोनिया गॉंधी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
किसी ने यदि गुलामों को न देखा हो तो कांग्रेस पार्टी को देखा जा सकता है। यह कोई आरोप नहीं, कटु सत्य है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज सोनिया गाँधी तक पार्टी में एकछत्र शहंशाह बन कर अपनी बात आदेश मान लागू करते जरूर अनुभव किया जा सकता है। कांग्रेस में एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता हुए हैं, लेकिन पार्टी में गुलामों के मिलते साथ ने उन सभी को दरकिनार किया जाता रहा। लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री रहते अपने कामों से जवाहर लाल नेहरू के 18 वर्ष भुलवा दिए थे। शायद यही कारण था कि ताशकंत में उनकी हत्या करवा दी गयी। वरना क्या कारण था कि उनकी आकस्मित मृत्यु की जाँच क्यों नहीं हुई? क्यों नहीं उनका पोस्टमॉर्टेम करवा गया? क्यों उनके परिवार को शास्त्री से दूर रखा जा रहा था? यदि उनकी धर्मपत्नी ललिता जी द्वारा अपने पति के शव से दूर रखने पर हंगामा करने उपरांत परिवार को उनके शव के पास जाने दिया था। 
इतना ही नहीं, परिवार के गुलामों ने अपने आकाओं के अध्यक्ष पद पर आसीन किए जाने के लिए सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था। किसी को गुलाम देखने हैं तो कांग्रेस पार्टी को देख लें।
जब कांग्रेस ने अपने ही मंत्रियों और सेना चीफ की जासूसी करवाई थी 
कांग्रेस पार्टी और उसके नेता इन दिनों वाट्सएप पर कुछ लोगों की कथित जासूसी को लेकर केंद्र सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बिना की किसी तथ्य के सरकार को घेरने में लगे हैं। लेकिन वो उस वक्त को भूल गए हैं जब उनके और उनकी मां सोनिया गांधी के इशारे पर यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई थी। 
सोनिया के इशारे पर हो रही थी प्रणब की ...
प्रणब मुखर्जी के घर जासूसी
आज बिना किसी सबूत के केंद्र सरकार पर कुछ लोगों की जासूसी कराना का आरोप लगाने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने अपनी ही सरकार के वित्त मंत्री और वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई थी। बात 2011 की है, जब प्रणब मुखर्जी के दफ्तर पर जासूसी खबर मीडिया में छाई हुई थी। तब इसकी शिकायत खुद प्रणब मुखर्जी ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह से की थी और इसकी जांच कराने की मांग की थी।

जासूसी का मामला तब सामने आया था, जब तत्कालीन यूपीए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री प्रणब मुखर्जी के ऑफिस में 16 अहम जगहों पर गोंद लगी मिली है। इन जगहों में खुद मुखर्जी का ऑफिस, उनकी करीबी सलाहकार ओमिता पॉल का ऑफिस, उनके प्राइवेट सेक्रेटरी मनोज पंत का ऑफिस और वित्त मंत्री द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दो कॉन्फ्रेंस हॉल शामिल थे। तब वित्त मंत्रालय की ओर से पहली बार प्राइवेट इनवेस्टिगेटर्स की मदद से मंत्रालय के अति महत्वपूर्ण कक्षों की ‘इलेक्ट्रॉनिक स्वीपिंग’ कराई गई थी। इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले की शिकायत की थी। तब प्राइवेट इनवेस्टिगेटर्स का कहना था कि गोंद खास मकसद से चिपकाई गई थी। गोंद के बाहरी हिस्से में हल्की लकीर जैसे निशान मिले हैं जो इस बात का संकेत हैं कि वहां कोई छोटे उपकरण लगाए गए होंगे जो हटा लिए गए।
रिटायर्ड आर्मी चीफ वी के सिंह के घर जासूसी
यूपीए शासन के दौरान ही पूर्व आर्मी चीफ जनरल (रिटायर्ड) वी के सिंह की भी जासूसी कराने का मामला सामने आया था। जनवरी 2013 में वी के सिंह के परिवारवालों ने आरोप लगाया था कि उनके घर में जासूसी करने के लिए बगिंग की कोशिश की गई। 4 जनवरी 2013 को दिल्‍ली के कैंटोनमेंट एरिया स्थित पूर्व जनरल के घर में घुसे सेना के मेजर को पकड़ा गया था। पकड़ा गया मेजर आर. विक्रम सिंह सेना के सिग्‍नल कोर 1, सिग्‍नल यूनिट में तैनात था। मेजर की गतिविधि संदिग्‍ध लगी तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़ा और पूछताछ की।

पी.वी. नरसिंह राव की जयन्ती पर ...नरसिम्हा राव की मौत के 16 साल बाद तिरस्कार पर कांग्रेस को पछतावा या मौकापरस्ती? 
उन्होंने बेहद मुश्किल वक्त में देश और कांग्रेस का नेतृत्व सॅंभाला था। वे नेहरू-गॉंधी परिवार के बाहर के पहले शख्स थे, जिसने बतौर प्रधानमंत्री पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया। उस शख्सियत का नाम था पीवी नरसिम्हा राव।
राव को जीते जी सोनिया गॉंधी के इशारे पर पहले कांग्रेस में अपमानित कर किनारे लगाया गया। मृत्यु हुई तो दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार होने नहीं दिया गया। उनके शव को कांग्रेस कार्यालय में लाने तक की अनुमति नहीं दी गई। दिल्ली में उनका मेमोरियल 2015 में तब बन पाया, जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार चल रही थी।
दिसंबर 2004 में मौत के बाद राव का जब तिरस्कार हुआ तो मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। वित्त मंत्री बनाकर राजनीति में मनमोहन को लाने वाले भी राव थे। लेकिन मनमोहन सिंह ने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होना भी उचित नहीं समझा।
“यूपीए काल में किसी भी बड़े कांग्रेस नेता ने दिवंगत पूर्व पीएम नरसिम्हा राव के जन्मदिवस या पुण्यतिथि के कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अब उनकी मौत के 16 सालों बाद आप कार्यक्रम क्यों आयोजित कर रहे हो? कांग्रेस आलाकमान ने उनके योगदानों को हाइलाइट नहीं किया। दिल्ली में कोई कार्यक्रम नहीं हो रहा। कांग्रेस उन्हें तेलंगाना तक ही क्यों सीमित करना चाहती है? वो तो एक राष्ट्रीय नेता थे।”
इस घटना के 16 साल बाद जब कांग्रेस का सूर्य ढलता दिख रहा उसने राव को लेकर यू टर्न मारा है। सोनिया गॉंधी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर उनकी प्रशंसा की है। हैदराबाद में शुक्रवार को कांग्रेस की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में सोनिया गॉंधी का पत्र पढ़ा गया। इसमें उन्होंने राव को प्रधानमंत्री के रूप में साहसिक फैसलों से देश को नई दिशा देने का श्रेय दिया गया।
सोनिया ने पत्र में लिखा, “राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में एक लंबे कैरियर के बाद वह गंभीर आर्थिक संकट के समय भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके साहसिक नेतृत्व के माध्यम से हमारा देश कई चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार करने में सक्षम हुआ। 24 जुलाई 1991 का केंद्रीय बजट और हमारे देश के आर्थिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।”
वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राव को देश का ‘महान सपूत’ और भारत में आर्थिक सुधारों का जनक बताया है। उन्होंने कहा, “आर्थिक सुधार और उदारीकरण में वाकई उनके सबसे बड़े योगदान हैं। विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदानों को कम करके आँका नहीं जा सकता है।”
भारत में खुली अर्थव्यवस्था का श्रेय राव को देते हुए मनमोहन ने कहा, “यह एक कठिन विकल्प और साहसी फैसला था और यह संभव इसलिए हो सका क्योंकि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने मुझे चीजों को शुरू करने की आजादी दी, क्योंकि वह उस समय भारत की अर्थव्यवस्था की समस्या को पूरी तरह से समझ रहे थे।”
राजीव गॉंधी की हत्या के बाद अचानक राव को जिम्मेदारी सॅंभालनी पड़ी थी। लेकिन कांग्रेस में सोनिया गाँधी के उदय के साथ ही उनका तिरस्कार शुरू हो गया था, जो उनकी मृत्यु के बाद तक चलता रहा।
23 दिसंबर 2004 को राव की मृत्यु हुई थी और 27 दिसंबर को स्तंभकार एमडी नलपत ने लिखा,”वास्तव में, 1998 में कांग्रेस की कमान नेहरू वंश के हाथों में दोबारा आने से बाद, AICC के पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री होने के बावजूद, नरसिम्हा राव को कांग्रेस कार्यसमिति से न केवल बाहर किया गया था, बल्कि उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य की सूची से भी निकाल दिया गया था। उस सूची में केवल वे थे जो आलाकमान की जय-जयकार करते थे।”
नलपत ने दावा किया था कि राव के अंतिम संस्कार के विषय पर चर्चा के लिए दोपहर 3 बजे एक विशेष केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने के बावजूद, 9 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर उनके शव को लाकर एक मंच पर रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। वहाँ न फूल थे और न शोक सभा में आए लोगों के बैठने के लिए कारपेट। यहाँ तक लॉन के शामियाने में कोई इंतजाम नहीं था।
यह सिलसिला राव के देहांत पर भी खत्म नहीं हुआ था। उनके निधन के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने उनका तिरस्कार करना नहीं बंद किया। वे हमेशा पार्टी के निशाने पर हमेशा रहे। पिछले वर्ष राव के पोते एनवी सुभाष ने इसके लिए पार्टी को आड़े हाथों भी लिया था। लगातार राव पर लगते आरोपों को देखते हुए उन्होंने गाँधी परिवार से उस अन्याय के लिए माफी माँगने को कहा था, जो उन्होंने नरसिम्हा राव के साथ किया।




एन वी सुभाष ने AICC सचिव जी चिन्ना रेड्डी के एक बयान पर कहा था कि राव ने अपने कार्यकाल के दौरान नेहरू-गाँधी परिवार को ‘दरकिनार’ करने की कोशिश की थी, ‘यह सच नहीं है और निंदनीय’ है। उन्होंने दावा किया कि राव, गाँधी परिवार के सबसे भरोसेमंद और वफादार नेता थे और हमेशा कई मुद्दों पर गाँधी परिवार का मार्गदर्शन करते थे।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मौत के 16 साल बाद राव को लेकर कांग्रेस के स्टैंड में यह​ बदलाव पाश्चाताप है या फिर मौकापरस्ती?
असल में यह राव का जन्म शताब्दी वर्ष है। उनकी जयंती पर पिछले महीने कई अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा था। इसमें उन्हें ‘तेलंगाना का बेटा… भारत का गर्व’ बताया गया था। यह विज्ञापन तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी टीआरएस की तरफ से प्रकाशित किए गए थे। इसी विज्ञापन ने अचानक से राव को राजनीति में फिर से प्रासंगिक बनाते हुए कांग्रेस को अपने स्टैंड में बदलाव के लिए मजबूर किया।
इस विज्ञापन के बाद कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से पोस्ट कर उन्हें दूरदर्शी नेता बताया गया था। राहुल गॉंधी से लेकर मनमोहन सिंह तक सबने उन्हें याद किया। लेकिन सोनिया उस वक्त भी चुप रहीं। अचानक से राव को लेकर सोनिया का मुखर होना कभी मजबूत गढ़ रहे दक्षिण भारत में जमीन तलाशने की कांग्रेस रणनीति का हिस्सा है।
कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता बीजेपी के हाथों गॅंवा चुकी है। तेलंगाना में टीआरएस ने उसकी जगह ले ली है। आंध्र प्रदेश से उसे उस जगन मोहन रेड्डी ने उखाड़ फेंका है, जिसे कभी उसने पार्टी से बाहर कर दिया था। तमिलनाडु में उसकी उम्मीदें डीएमके पर टिकी है। बीते साल आम चुनावों में भी इन राज्यों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। ऐसे में यह करनी पर पछतावे से ज्यादा राव की विरासत पर दावा कर कम से कम तेलंगाना में पैठ बनाने की कवायद दिखती है।
शायद कांग्रेस के लिए अब इस मोर्चे पर देर हो चुकी है। राव के लिए भारत रत्न की मॉंग और जन्म शताब्दी के मौके पर साल भर के कार्यक्रम का ऐलान कर इस विरासत पर टीआरएस पहले ही दावा ठोक चुकी है।

आखिर किस साज़िश के तहत डॉ मनमोहन सिंह ने 84 दंगों का दोष नरसिम्हा राव के सिर मंढा?

पूर्व PM मनमोहन सिंह का खुलासा, अगर नरसिम्हा राव ने मान ली होती गुजराल की ये सलाह तो रुक सकते थे 84 के दंगे
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर बड़ा बयान दिया है। एक कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि अगर तत्कालीन गृह मंत्री नरसिम्हा राव ने इंद्र कुमार गुजराल की सलाह मानी होती और तत्परता दिखाई होती तो नरसंहार को रोका जा सकता था। डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा, ''जब 84 के दंगे हुए तो इंद्र कुमार गुजराल उस वक्त के गृह मंत्री नरसिम्हा राव के पास गए और उनसे कहा कि स्थिति बहुत नाजुक है। ऐसे में सरकार जितनी जल्दी सेना को बुला ले उतना ठीक। अगर वह सलाह मान ली गई होती तो 84 में हुए नरसंहार को रोका जा सकता था''
अब प्रश्न यह होता है कि किस कारण डॉ मनमोहन सिंह ने इतने वर्षो तक इस बात को उजागर क्यों नहीं किया? क्या कांग्रेस द्वारा मिले आदेश के बाद कांग्रेस की छवि सुधारने के लिए इतने वर्षों बाद इस राज को खोला? वास्तव में किसी सोंची-समझी राजनीती के तहत इस राज से पर्दा हटाया गया है। 
जहाँ तक तत्कालीन गृहमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा सेना को बुलाने के लिए निर्णय की बात है, इतने वर्ष देश के प्रधानमंत्री रहते डॉ सिंह को इसका भी अच्छा-खासा अनुभव हो गया होगा कि आला कमान के हुक्म के बिना प्रधानमंत्री तक कोई निर्णय लेने में असमर्थ होता है, गृहमंत्री की क्या ताकत। आलाकमान की अनुमति के बिना कुछ न कर सकने का दर्द तो वह स्वयं भी कई बार व्यक्त कर चुके हैं। यानि 1984 सिख दंगों का दोष नरसिम्हा राव पर थोपना किसी साज़िश के तहत किया गया है। अन्यथा नरसिम्हा राव अपने आपमें एक प्रभावी नेता थे। लेकिन जब आलाकमान का हुक्म न हो, कांग्रेस के गृहमंत्री तो क्या प्रधानमंत्री में आलाकमान के विरुद्ध जाने की ताकत नहीं। 

दिसम्बर 4 को पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की जयंती थी। इस मौके पर देश के तमाम हिस्सों में कई कार्यक्रम आयोजित किये गए थे। इसी कड़ी में दिल्ली में भी कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। जिसमें पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह समेत तमाम लोगों ने शिरकत की। इससे पहले तमाम नेताओं ने इंद्र कुमार गुजराल को याद किया और सोशल मीडिया के जरिये श्रद्धांजलि दी 

पूर्व रॉ अधिकारी यादव ने हामिद अंसारी को किया बेनकाब

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर रॉ के एक पूर्व अधिकारी आर.के. यादव ने कुछ ऐसे हैरान करने वाले खुलासे किए हैं, जिनसे पता चलता है कि भारत में उच्च पदों पर बैठ चुका यह व्यक्ति केवल एक कट्टरपंथी ही नहीं, बल्कि एक देशद्रोह भी है। यादव ने अपनी पुस्तक "मिशन आर एन्ड डब्लू(Mission R&AW) " में कुछ ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया है, जो हामिद की निष्ठां पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।
हैरानी की बात यह है कि इस सबके बावजूद 2007 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी की पसंद पर उन्हें भारत का उपराष्ट्रपति बना दिया गया। इस पद पर वह 10 वर्ष तक आसीन रहे। हाल ही में, हामिद अन्सारी ने मुसलमानों के लिए अलग शरिया अदालतों का समर्थन कर सबको चौंका दिया था। तब यह सवाल उठा कि देश की एक संवैधानिक पद पर रहा आदमी कैसे इस्लामिक कोर्ट की वकालत कर सकता है? हामिद अन्सारी पहले भी अपनी कट्टरपंथी सोंच के कई संकेत दे चुके हैं। कुछ समय पूर्व वह केरल के कट्टरपंथी संगठन पीएफआई की बैठक में गए थे।
रॉ के लिए काम कर चुके आर के यादव ने Mission R&AW के नाम से एक किताब भी लिखी हैयादव का बड़ा खुलासा
आर के यादव ने अपनी पुस्तक में उस घटना का उल्लेख किया है, जब 1990 में ईरान में भारत के राजदूत थे। उन्होंने लिखा है कि कैसे ईरान में हामिद के राजदूत रहते वहां पर काम कर रहे रॉ जासूसों और खबरियों की शामत आ गयी थी। यादव ने अपनी पुस्तक में एक "कपूर" नाम के एक जासूस का जिक्र किया है, जिसको   ईरान की ख़ुफ़िया एजेंसी ने अगवा कर लिया था। उसको कहाँ ले जाया गया, इस बारे में भारतीय दूतावास को कोई जानकारी नहीं दी गयी। तीन दिनों तक ईरान ख़ुफ़िया एजेंसी ने कपूर को अमानवीय यातनाएं दीं और फिर मरने के लिए एक खाली जगह पर फेंक दिया था। एक राजदूत के तौर पर हामिद की जिम्मेदारी थी कि वो ईरान सरकार से इस घटना की औपचारिक शिकायत दर्ज करवाते। जो उन्होंने नहीं किया, जिस कारण राजदूत अधिकारियों में हामिद के प्रति काफी रोष था। इसी दौरान एक और जासूस "माथुर" को अगवा कर लिया गया। वह भी दो दिन तक गायब रहा, लेकिन अन्सारी ने तब भी चुप्पी साधे रखी।
दूतावास कर्मचारियों की बगावत
हामिद अन्सारी के रहस्यमय रवैये से दूतावास कर्मचारियों का सब्र टूट गया। माथुर की पत्नी और दूतावास कर्मचारियों की पत्नियों ने राजदूत हामिद अंसारी से मिलने का समय माँगा। लेकिन हामिद अंसारी ने मिलने से मना कर दिया। हामिद के मना करने के बाद लगभग 30 महिलाओं ने हमीद अंसारी के कक्ष में हमला बोल, उन्हें घेराव किया। उनका केवल इतना ही कहना था कि आखिर किस कारण भारतीयों को अगवा किए जाने पर क्यों चुप्पी साधे हो? क्यों नहीं ईरानी अधिकारियों से विरोध दर्ज करवाया जा रहा? मामले की गम्भीरता को देखते हुए और राजदूत हामिद अंसारी के रवैये को देखते हुए, ईरान में सक्रीय अन्य रॉ अधिकारीयों ने तुरन्त नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय को अतिशीघ्र संज्ञान लेने को कहा। उस समय विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी से भी हस्ताक्षेप करने का अनुरोध किया। इसके बाद विदेश मंत्रालय के तुरंत हरकत में आने पर माथुर को रिहा कर दिया। पता चला कि माथुर को दो दिन हिरासत में थर्ड डिग्री की यातनाएँ दी थीं। राजदूत हामिद के इस रवैये ने ईरान में भारतीय खुफ़ियों को बुरी तरह से हिला कर रख दिया था। कपूर और माथुर दोनों ही भारतीय दूतावास में बतौर कर्मचारी सक्रीय थे।
हमीद अंसारी की नियत
हामिद अंसारी भारतीय विदेश सेवा(आई एफ एस ) के अधिकारी थे और इस हैसियत से वह ईरान के अलावा सऊदी अरब और कई दूसरे खाड़ी देशों में भारतीय राजदूत रहे। ईरान में घटित इन घटनाओं ने हामिद अंसारी की निष्ठां पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। कहते हैं, रॉ एवं अन्य सूचना एजेन्सियां हामिद पर संदेह करने लगी थीं। ईरान में रॉ के जासूस इसलिए भेजे जाते थे, ताकि वहां रहकर पाकिस्तान पर निगाह रखी जा सके, क्योकि पाकिस्तान और ईरान की सीमाएँ आपस में लगी हुई हैं। जिस माथुर को पकड़ा गया था, वह तेहरान में कश्मीरी आतंकवादियों के नेटवर्क का भांडा भोड़ने को ही था कि उसे अगवा कर लिया गया। वह अपने ख़ुफ़िया इनपुट नियमित समय पर भारत भेजता था और इसकी जानकारी राजदूत अंसारी को भी रहती थी। आर के यादव की पुस्तक के अनुसार राजदूत हामिद अंसारी को माथुर की इन इनपुट्स पर ऐतराज था। जिस दिन माथुर को अगवा किया गया था, उस दिन राजदूत हामिद अंसारी ने अपनी रोटिन रपट भेजी कि वह गायब है, लेकिन इस मुद्दे पर कोई कार्यवाही नहीं की।
हामिद अंसारी के विरुद्ध रिपोर्ट
आर के यादव ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि तेहरान से रॉ अधिकारी एन के सूद ने दिल्ली में उनके पास फोन किया और पुरे घटनाक्रम की जानकारी दी। अगले ही दिन यादव ने विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात की। वाजपेयी ने प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव से मिलकर घटनाक्रम पर गम्भीरता से चर्चा की। इस पर प्रधानमंत्री राव ने, विषय की गम्भीरता को देखते हुए, तुरन्त कार्यवाही की। परिमाणस्वरुप, ईरानी अफसरों ने माथुर को छोड़ दिया। जिसके बाद माथुर को दिल्ली बुला लिया गया। दोनों जासूसों के इनपुट्स के आधार पर रॉ के वरिष्ठ अधिकारी को जाँच के लिए तेहरान भेजा गया। जिसने रॉ के सचिव को दी रिपोर्ट में हामिद अंसारी के रवैये को संदेहस्पद बताया।
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बात 1990 के दशक के आखिरी वर्षों का है जब, H. Ansari ईरान मे भारत के Ambassador हुआ करते थे । उस समय तेहरान मे पोस्टेड RAW के जासूस Mr. Kapo...
एक और अफसर हुआ अगवा
मामला शांत होने के कुछ ही दिन बाद तेहरान में भारतीय दूतावास के सिक्योरिटी अफसर मोहम्मद उमर से ईरान की खुफ़िआ एजेंसी ने सम्पर्क किया। और अपने(ईरान) के लिए काम करने का ऑफर दिया। उमर ने ऐसा करने से मना कर दिया, और इसके बारे में राजदूत हामिद अंसारी को औपचारिक रूप से जानकारी दी गयी।लेकिन कुछ ही दिनों के अंदर उसे भी अगवा कर लिया गया। उसे बुरी तरह से मारा-पीटा गया। और बाद में तेहरान के बाहरी इलाके में फेंक दिया गया। इस बार भी राजदूत हामिद ने ईरान सरकार से विरोध दर्ज नहीं करवाया। इतना ही नहीं, कर्मचारियों को हिदायत दी कि इस मसले पर अपना मुँह बन्द रखें। जब बुरी तरह घायल मोहम्मद उमर को दूतावास लाया गया, तो हामिद अंसारी ने उसे दिल्ली भेजने की कवायत शुरू कर दी। इस पर रॉ के बाकि ऑपरेटिव्स ने विरोध दर्ज कराया। जिस पर वहां के रॉ के स्टेशन चीफ वेणुगोपाल ने राजदूत हामिद का आदेश मानने से साफ मना कर दिया।
क्या अंसारी गद्दारी कर रहे थे?
इस बारे में पुस्तक में बताया गया है कि ईरान के साथ हामिद अंसारी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। हैरानी है कि इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने कर्मचारियों के अगवा और टार्चर किये जाने का विरोध तक नहीं किया। रॉ अधिकारी यादव ने अपनी पुस्तक में इन घटनाओं का केवल उल्लेख किया है, लेकिन इन घटनाक्रमों पर किसी राजदूत द्वारा चुप्पी साधना बहुत कुछ व्यक्त कर रही हैं। हामिद राजदूत के तौर पर ईरान में क्या कर रहे थे? यह भी सम्भावनाएं व्यक्त की जा रहीं है कि रॉ जासूसों को पकड़वाने में हामिद अंसारी की ही गुप्त भूमिका रही हो? क्योकि राजदूत को सब जानकारी होती है कि कौन क्या है और क्या कर रहा है? ईरान में सक्रिय जासूसों की ईरान में कोई दिलचस्पी नहीं, बल्कि पाकिस्तान पर निगाह रखना है। अगर उन्हें रोकना चाहते थे तो यह भी समझना मुश्किल नहीं कि वो भारत के राजदूत होते हुए पाकिस्तान की सहायता कर रहे हो? इससे पूर्व आर के यादव कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल की सच्चाई भी उजागर कर चुके हैं।        
हामिद अंसारी की सोंच शुरू से ही राष्ट्र विरोधी 
10 अगस्त 2017 को उपराष्ट्रपति का पद छोड़ने के बाद से हामिद अंसारी लगातार अपने बयानों के कारण विवादों में बने हुए हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर का मामला हो, तीन तलाक के कानून का विरोध हो या देश के हर जिले में शरिया अदालतें स्थापित करने का ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड का प्रस्ताव हो, सभी का हामिद अंसारी ने समर्थन किया है। हामिद अंसारी लगातार कह रहे हैं कि देश के मुसलमानों के मन में भय पैदा हो रहा है। हामिद अंसारी की इस देश विरोधी सोच की कुछ और परतों को रॉ के पूर्व अधिकारी आर के यादव ने Mission R&AW में  उजागर किया है।
हामिद अंसारी के चरित्र के बारे में रॉ के अधिकारी आर के यादव ने यह बात लंबी जांच पड़ताल और अनुभव के आधार पर कही है। अपने अनुभवों के आधार पर लिखी गई किताब Mission R&AW में हामिद अंसारी के दोहरे चरित्र पर एक पूरा अध्याय- Bizarre R&AW Incidents- ही लिखा है।
हामिद अंसारी ने ईरान में कश्मीर आंदोलनकारियों  का साथ दिया
आर के यादव –Bizarre R&AW Incidents में लिखते हैं कि रॉ के अधिकारी डी बी माथुर, तेहरान के करीब कौम में कश्मीर के युवकों के लिए चल रहे ट्रेनिंग कैंप पर नियमित रुप से दिल्ली को रिपोर्ट भेजते रहते थे। ये सभी रिपोर्ट्स राजदूत हामिद अंसारी के पास से होकर गुजरती थीं, इनमें से कई रिपोर्ट्स को लेकर हामिद अंसारी काफी विरोध में रहते थे। इसी दौरान, एक सुबह डी बी माथुर को ईरान की गुप्तचर संस्था ने अगवा कर लिया, लेकिन हामिद अंसारी ने ईरान की सरकार से इस बारे में कोई बात नहीं की और बहुत ही साधारण रिपोर्ट दिल्ली भेज कर शांत हो गए। दो दिनों तक डी बी माथुर के बारे में कोई जानकारी न मिलने पर भारतीय दूतावास के करीब 30 अधिकारियों की पत्नियों ने हामिद अंसारी के चैम्बर में जबरदस्ती घुसकर विरोध भी दर्ज कराया था।
कांग्रेस ने ऐसे व्यक्ति को उपराष्ट्रपति बनाया
विभिन्न देशों में भारत के राजदूत रह चुके हामिद अंसारी ने ऐसे काम किए हैं, जिससे भारत की सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों की पहचान दूसरे देशों के सामने आ गई। हामिद अंसारी ने ऐसा एक बार नहीं कई बार किया, जिससे स्पष्ट होता है कि हामिद अंसारी की सोच ही भारत विरोधी है। ऐसे भारत विरोधी चेहरे को कांग्रेस ने देश का उपराष्ट्रपति बनाया। आजकल हामिद अंसारी कांग्रेस की तरफ से मुसलमानों के पैरोकार बन कर सामने आ रहे हैं।     

अयोध्या में राम मन्दिर के लिए मोदी सरकार का साहसिक कदम

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के मसले पर मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन दायर की है। राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर प्रस्ताव को लेकर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। लगभग 0.3 एकड़ भूमि जो कि विवादित है उसे छोड़कर शेष 70 एकड़ भूमि जो अधिग्रहित की गई थी, उसे मालिकों को वापस किया जा सकता है और यह 70 एकड़ भूमि है जिसे मोदी सरकार ने याचिका के माध्यम से अधिग्रहित करने की परमिशन मांगी है।
केंद्र सरकार ने 70 एकड़ जमीन अधिकृत की है। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि पर यथास्थिति के आदेश वापस लेने की अर्जी है। अर्जी में कहा गया है कि 2.77 एकड़ जमीन पर निर्माण का अधिकार मिले। सरकार ने हिन्दू पक्षकारों को दी जमीन रामजन्म भूमि न्यास को देने की अपील की है।

अयोध्या की कौन सी जमीन लौटाना चाहती है मोदी सरकार?

अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद मामले में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गैर- विवादित जमीन 67 एकड़ जमीन को उसके मालिकों को लौटाने की इजाजत मांगी है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि यथास्थिति को हटाते हुए 67 एकड़ गैर विवादित जमीन को उसके मालिकों को वापस करने की अनुमति दी जाए. 1993 में अयोध्या में विवादित स्थल सहित आसपास की करीब 70 एकड़ जमीन का केंद्र सरकार ने अधिग्रहण किया था.
हालांकि, केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि अयोध्या मामले में महज 0.313 एकड़ जमीन पर ही विवाद है और बाकी जमीन पर यथास्थिति रखने की जरूरत नहीं है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि अयोध्या में विवादित स्थल के आस-पास की हिंदू पक्षकारों की जो जमीन अधिग्रहित की गई थी, उसे रामजन्मभूमि न्यास को सौंप दिया जाए.
नरसिम्हा राव सरकार ने किया था अधिग्रहण
बता दें कि 6 दिसंबर, 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने 1993 में अध्यादेश लाकर विवादित स्थल और आस-पास की जमीन का अधिग्रहण किया था. इसमें 40 एकड़ जमीन रामजन्मभूमि न्यास की है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की याचिका में कहा कि हम चाहते हैं कि इसे उन्हें वापस कर दी जाए ताकि विवादित भूमि तक पहुंचने का रास्ता वगैरह बनाया जा सके.
सही मालिक को जमीन लौटाएगी सरकार
हालांकि, इस्माइल फारुकी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि जो जमीन बचेगी उसे उसके सही मालिक को वापस करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है. उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी जजमेंट में 1994 में तमाम दावेदारी वाले अर्जी को बहाल कर दिया था. कोर्ट ने जमीन को सरकार के पास ही रखने को कहा था और आदेश दिया था कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसके बाद सरकार जिनकी जमीनें हैं, उन्हें सौंप दे.
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....

2.77 एकड़ विवादित जमीन की क्या है स्थिति?

गौरतलब है कि अयोध्या विवाद मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने 30 सितंबर, 2010 को फैसला दिया था. अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को 3 हिस्सों में बांट दिया था, जिसमें रामलला विराजमान वाला हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया. दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया है. हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद 9 मई, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया था. इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है.