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“राम द्रोही” क्या मंदिर उद्घाटन में जाकर राम नाम ही सत्य है' बोलेंगे?

सुभाष चन्द्र

हिंदुओं के पूजनीय आराध्य भगवान राम और अन्य देवी देवताओं का अपमान करने वालों के लिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद पर बैठे लोगों का अपमान करना कोई बड़ी बात नहीं है, नरेंद्र मोदी तो यह अपमान पिछले 20 वर्षों से झेल रहे है। कांग्रेस का कोई नेता ऐसा होगा जिसने मोदी के लिए अपमानजनक शब्द न कहे हों चाहे वह प्रधानमंत्री पर रहे या उसके पहले मुख्यमंत्री रहते हुए। अपमान ही नहीं कांग्रेस के नेता मोदी जी की हत्या करने की भी वकालत करते रहे हैं और “फर्जी” गांधी चुप रहे हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए घृणित शब्दावली का प्रयोग किया विपक्ष और कांग्रेस ने और अब 72 वर्षीय उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ का मज़ाक उड़ाया 66 वर्ष के कल्याण बनर्जी ने और 53 साल का कांग्रेस का “युवा” नेता “मोहब्बत की दुकान” चलाने वाला राहुल “कालनेमि” उस कुकर्म में शामिल होता है लेकिन 77 वर्ष की सोनिया गांधी किसी को कुछ नहीं कहती। उसे तो सांसदों के निलंबन में लोकतंत्र की हत्या दिखाई दे रही हैं। लेकिन जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से सदन में इंदिरा गाँधी की हत्या की जाँच करने वाले कमीशन द्वारा तैयार रपट को प्रस्तुत करने पर विपक्षी सांसदों को निलंबित करने में क्या लोकतंत्र नज़र आ रहा था? वर्तमान मोदी सरकार को उस रपट को भी सार्वजानिक करना चाहिए ताकि इंदिरा गाँधी की हत्या में शामिल लोगों के नाम सामने आएं। 

लेकिन आज खबर है कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट 22 जनवरी को होने वाले रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए देश के सभी राष्ट्रीय दलों के अध्यक्षों और पूर्व प्रधानमंत्रियों को आमंत्रित कर रहा है। सोनिया गांधी को 10 जनपथ पर निमंत्रण पत्र भेंट किया गया है। इसके अलावा खड़गे, अधीर रंजन चौधरी, मनमोहन सिंह और देवेगौड़ा को भी आमंत्रित किया गया है और केजरीवाल, मायावती एवं अखिलेश यादव आदि को भी बुलाया जायेगा। 

लेकिन सवाल यह उठता है कि ये सभी विपक्षी दलों के नेता क्या निमंत्रण मिलने के बाद भी समारोह में शामिल होने जाएंगे क्योंकि उनकी राजनीति केवल मुस्लिम वोटों के इर्द गिर्द ही घूमती है। कर्नाटक और तेलंगाना चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस मान कर चल रही है कि 2024 के चुनाव में देश भर का मुसलमान उसके साथ रहेगा।  दूसरी तरफ अखिलेश यादव को भी मुस्लिम वोट की चिंता सता रही है और फिर मायावती कैसे उस वोट बैंक को भूल सकती है। ममता, केजरीवाल, शरद पवार और लालू यादव के लिए भी मुसलमानों के मुकाबले हिंदुओं की अहमियत कुछ भी नहीं है। उद्धव ठाकरे भी मुस्लिम वोटों का नया दीवाना बना है।

इसलिए यदि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होते हैं तो उससे देश भर के मुसलमान उनसे नाराज हो सकते हैं और इसलिए अभी जाने के बारे में ये लोग कोई फैसला नहीं करेंगे। अभी पूरे एक महीने तक हिसाब किताब लगाया जाएगा कि रामलला के दर्शन करने से क्या मुस्लिम वोटर बिदक सकता है और यह भी हो सकता है उन्हें खुश करने के लिए अंत समय में ये सभी नेता ऐसा पैंतरा चलेंगे कि जिससे समारोह में न जाने का बहाना बन जाए और दोष भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर मढ़ कर रंग में भंग डालने की कोशिश की जाए।

विपक्ष ऐसी पैंतरेबाजी से भारत की छवि उन 70 से ज्यादा देशों में धूमिल करने की कोशिश करेगा जिसके प्रतिनिधि समारोह में शामिल होने जा रहे हैं। विपक्ष की आज की जगदीप धनकड़ के खिलाफ चल रही राजनीति से उम्मीद की जा सकती है कि वह प्राण प्रतिष्ठा में भी विघ्न डालने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

मुझे पूरी उम्मीद है विपक्ष प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार ही करेगा।

अयोध्या : राममंदिर तोड़ मस्जिद बनाने की धमकी देने वाले मौलाना साजिद राशिदी पर कार्यवाही कब ?

साजिद राशिदी




ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के मौलाना साजिद राशिदी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
शहर बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए यानि जिस बात का शुरू से ही अंदेशा था, वह नफरत और जहर किसी न किसी रूप में बाहर आनी शुरू हो चुकी है। और जो लोग जहर फैला रहे हैं, केंद्र सरकार उसका संज्ञान लेकर इन्हें और इन्हें समर्थन देने वाली पार्टियों को भी सचेत कर, सख्त कार्यवाही करे। भारत की धरती अब दंगों से लाल नहीं होनी चाहिए। इन मौलानाओं और इनके घर के किसी परिन्दे तक को खिरोंज तक नहीं आएगी, लेकिन मारा जायेगा बेगुनाह, फिर उन लाशों पर बैठ मालपुए खाएंगे।  
2013 में प्रकाशित मेरा स्तम्भ 
Image may contain: 2 peopleये लोग भूल रहे हैं कि अभी अयोध्या से कलंक मिटा है, मथुरा, काशी और हज़ारों स्थल बाकी हैं, जहाँ से कलंक मिटना शेष है। स्मरण हो, विश्व हिन्दू परिषद ने प्रारम्भ में ही कहा था, "हमारे ये तीन तीर्थ--अयोध्या, मथुरा और काशी-- दे दो, अन्यथा 6000 लेकर रहेंगे।" अब कोई ऐसी सरकार नहीं है और न ही भविष्य में आएगी, जो सबूतों को कोर्ट से छुपा सके। राम मंदिर के सबूतों को छुपाने वाली पार्टियों का हश्र सबके सामने है, सभी हाशिए पर आ गयी। जिस कारण अयोध्या मुद्दा इतने वर्षों तक एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट में घूमता रहा, क्योकि कुर्सी के भूखे नेता अदालतों में मंदिर के मिले प्रमाणों को छुपाकर हिन्दुओं को साम्प्रदायिक और मुस्लिम विरोधी सिद्ध कर रहे थे।  
5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ। इसके एक दिन बाद ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के मुखिया ने राम मंदिर पर विवादित बयान दिया। मौलाना साजिद राशिदी ने राम मंदिर को तोड़ने की धमकी दी। राशिदी के मुताबिक़, आने वाले समय में मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाई जा सकती है। विवादित ज़मीन पर मस्जिद थी और वहीं रहेगी। इस बयान पर भाजपा प्रवक्ता शलभमणि त्रिपाठी ने राशिदी को जवाब दिया है।
त्रिपाठी ने कहा, “यही भावना रही तो टीवी स्क्रीन से निकल कर कभी भी यूपी के चौराहों पर सरकारी पोस्टरों में चिपक जाओगे।” भाजपा प्रवक्ता और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी ने ट्वीट कर कहा,
“यह 500 साल पुराना भारत नहीं है। यह मोदी जी का नया भारत है, UP, योगीजी, सीएए प्रदर्शन, पोस्टर, कुर्की, सरकारी वसूली यह सब याद है ना। वही जिससे बचने के लिए गुहार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट तक दौड़े थे। यही भावना रही तो टीवी स्क्रीन से निकल कर कभी भी यूपी के चौराहों पर सरकारी पोस्टरों में चिपक जाओगे।”
  
मौलाना साजिद रशिदी ने राम मंदिर पर अपने बयान में कहा था,
“एक मस्जिद हमेशा एक मस्जिद ही रहती है। यह कुछ और बनाने के लिए तोड़ी नहीं जा सकती है। हम ऐसा मानते हैं और भरोसा करते हैं कि वहाँ मस्जिद थी और मस्जिद ही रहेगी। वह मस्जिद एक मंदिर को तोड़ कर नहीं बनाई गई थी, लेकिन अब ऐसा हो सकता है कि कभी मंदिर तोड़ कर उस जगह पर मस्जिद बनाई जाए। प्रधानमंत्री ने अयोध्या के मंदिर निर्माण कार्यक्रम में शामिल होकर संविधान की अवहेलना की है। उस ज़मीन पर बाबरी मस्जिद थी जिसे हिटलर की फ़ौज से मिलते -जुलते लोगों ने तोड़ा था। जो लोग इंसाफ में भरोसा रखते हैं वह किसी न किसी दिन उस मंदिर को मस्जिद में तब्दील कर देंगे।”




 
लोकसभा सांसद और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लीमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मुद्दे पर जहर उगला था। ओवैसी ने कहा था कि बाबरी मस्जिद थी और वही रहेगी। बुधवार की सुबह ट्वीट करते हुए ओवैसी ने कहा “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी इंशाअल्लाह #BabriZindaHai।”

इसके अलावा ओवैसी ने यह भी कहा प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान की शपथ का उल्लंघन किया है। हिंदुत्व की कामयाबी धर्मनिरपेक्षता की हार है। यह सिर्फ और सिर्फ हिंदू राष्ट्र की नींव रखी गई है। जहाँ मुसलमानों ने नमाज़ पढ़ी उसे सर्वोच्च न्यायालय में झूठ बोल कर तबाह किया गया। ओवैसी के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भूमि पूजन को सिम्बल ऑफ़ इंडिया बताया, जबकि देश का सिम्बल कोई भी धार्मिक जगह नहीं हो सकती है। 
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असम के सोनितपुर जिले में थेलामारा और ढेकियाजुली पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों में सीआर...
4 अगस्त के दिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से भी राम मंदिर मुद्दे पर बयान जारी किया गया था। बोर्ड द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था, “बाबरी हमेशा एक मस्जिद ही रहेगी। हागिया सोफ़िया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी और शर्मनाक तरीके से ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया। बहुसंख्यक समाज के तुष्टिकरण वाले इस निर्णय से मस्जिद का दर्जा नहीं बदल सकता। दिल तोड़ने की ज़रूरत नहीं है, हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते हैं।”

क्या बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की मिलीभगत थी?

नरसिम्हा रावजब राम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक इंसान यानि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की भूमिका हमेशा एक पहेली बनी रहेगी। पीवी नरसिम्हा राव को परिस्थिति की माँग के मुताबिक चीजों को लागू करने के लिए जाना जाता है।
पीवी नरसिम्हा राव को भारत में आर्थिक सुधार के युग की शुरुआत के लिए भी जाना जाता है। हालाँकि, 6 दिसम्बर 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव राम जन्मभूमि पर कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराते हुए चुपचाप देखते रहे।
इस बात को लेकर कांग्रेस पार्टी के भीतर उनके आलोचकों ने आरोप लगाया कि उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपित प्रमुख षड्यंत्रकारियों के साथ हाथ मिलाया था। यह आरोप लगाया जाता है कि वो पूरे घटनाक्रम से वाकिफ थे, उन्हें पता था कि क्या होने वाला है, इसके बावजूद उन्होंने चुप्पी साधे रखी और चीजों को होने दिया। उन पर धोती के नीचे निक्कर पहनने तक का आरोप लगाया गया था। 
यह सच है कि जीवन के आखिरी चरण और उनके मरने के बाद भी पीवी नरसिम्हा राव को अपनी पार्टी से ज्यादा विपक्षी पार्टी के राजनेताओं का समर्थन मिला। राम मंदिर भूमि पूजन के साथ हमें बाबरी मस्जिद के विनाश के घातक दिन पर उनके कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। शायद, मुस्लिम वोटबैंक के नाराज होने के डर से उनके शव तक पार्टी ऑफिस में नहीं आने दिया।    
जिन दिनों विध्वंस होने वाला था, उन दिनों उन्होंने राज्य(उत्तर प्रदेश) में भाजपा सरकार को खारिज करने पर विचार किया था। अपनी पुस्तक ‘अयोध्या: 6 दिसंबर 1992’ में नरसिम्हा राव का कहना है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति हाथ से बाहर निकलने पर हस्तक्षेप के लिए केंद्र सरकार को सूचित करना राज्यपाल का विशेषाधिकार है।
इसके साथ नरसिम्हा राव ने लिखा कि हाल ही में अंतिम विध्वंस से पाँच दिन पहले, तब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने केंद्र से सामान्य कानून और व्यवस्था की स्थिति के लिए संवाद किया था। इस दौरान चीजों के सांप्रदायिक पहलू पर विशेष तौर से बात की गई। यह वास्तव में संतोषजनक था। राज्यपाल की रिपोर्ट में कहा गया कि यद्यपि कारसेवक अयोध्या में बड़ी संख्या में एकत्रित हो रहे थे, मगर वे शांतिपूर्वक थे।
रिपोर्ट में कहा गया था, “ऐसी खबरें हैं कि बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुँच रहे हैं, लेकिन वे शांतिपूर्ण हैं। मेरी राय में, इस समय यूपी सरकार की बर्खास्तगी या राज्य विधानसभा को भंग करने या राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे कठोर कदम उठाने का समय नहीं है।”
नरसिम्हा राव ने अप्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट पर कुछ दोषारोपण करते हुए कहा था, “अयोध्या में विवादित ढाँचे को पर्याप्त सुरक्षा देने के सीमित और विशिष्ट उद्देश्य के लिए केंद्र सरकार को रिसीवर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का इनकार भी एक सार्थक संकेत है।”
नरसिम्हा राव ने राजीव गाँधी पर भी उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “अयोध्या के विकास के लिए इंदिरा गाँधी की कई योजनाएँ थीं। इस भावनात्मक मुद्दे की राजनीतिक तनाव का असर इंदिरा गाँधी पर नहीं पड़ी। मगर उनकी मृत्यु के बाद, उनके बेटे ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला और तब से, विनाशकारी चरणों की एक शृंखला शुरू हुई।”
इस तरह, राव के अनुसार, वह संवैधानिक मानदंडों और ऐतिहासिक मिसाल से बँधे थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने निजी सचिव से कहा था, “लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को बिना किसी वैध कारण के एहतियात के तौर पर कैसे बर्खास्त किया जा सकता है? क्या यह संवैधानिक होगा? क्या हम एक असंवैधानिक रूप से असंवैधानिक कृत्य का सहारा ले रहे हैं?”
नरसिम्हा राव के पर्सनल फिजिशियन के श्रीनाथ रेड्डी का मानना है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दिन नरसिम्हा वास्तव में व्यथित थे। के श्रीनाथ रेड्डी ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने बाबरी मस्जिद को नीचे गिरते हुए देखा था, तो नरसिम्हा राव से मिलने पहुँचे थे। वो प्रधानमंत्री को लेकर चिंतित थे, जो कि दिल की बीमारी से पीड़ित थे।
रेड्डी ने बताया, “जैसा कि मुझे उम्मीद था, उनका दिल तेजी से धड़क रहा था … नाड़ी काफी तेज़ थी … बीपी बढ़ गया था। उनका चेहरा लाल हो रहा था, वे उत्तेजित थे।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं एक डॉक्टर के रूप में काफी आश्वस्त हूँ कि विध्वंस के लिए उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया सच्ची व्याकुलता थी। यह उस व्यक्ति का नहीं था, जिसने इसकी योजना बनाई होगी या इसमें उनकी कोई संलिप्तता होगी।”
यदि उनके डॉक्टर की तत्कालीन स्वास्थ्य स्थिति का विवरण सटीक है, तो यह साबित होता है कि नरसिम्हा राव को यह पता नहीं था कि क्या होने वाला था। यह ज्ञात है कि वह व्यक्तिगत रूप से समाधान निकालकर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे और हिंदू संगठन के नेताओं से यह आश्वासन लेने का प्रयास कर रहे थे कि मस्जिद क्षतिग्रस्त नहीं होगी।
ऐसा कहा जाता है कि नरसिम्हा राव ने 1992 के नवंबर का अधिकांश समय भाजपा के नेताओं के साथ गुप्त वार्ता में बिताया। इन वार्ताओं में क्या चर्चा हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालाँकि उनके आलोचको का मानना है कि 6 दिसंबर 1992 को जो हुआ, उसमें वह भी शामिल थे।
राम जन्मभूमि के साथ कई और प्रकरण जुड़े हुए हैं। वैसे बाबरी विध्वंस में राव की भूमिका भी संभवतः आने वाले लंबे समय तक या फिर शायद, अनंत काल के लिए एक पहेली बनी रहेगी।

जब बाबरी विध्वंस को ‘राष्ट्रीय कलंक’ बताने पर शेखर गुप्ता को बंद करनी पड़ी थी मैगजीन

लिबरल-राम मंदिर
अयोध्या में पवित्र श्रीराम मंदिर के ऐतिहासिक भूमिपूजन के अवसर पर पूरा देश उत्सव के मूड में है, लेकिन देश के कुछ चुनिन्दा इस्लामिक और सेक्युलर विचारकों ने आज इस शुभ दिन पर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने का अपना पारम्परिक व्यवसाय जारी रखते हुए खुद को प्रासंगिक बनाए रखा है।
इन लोगों ने जनमानस की नस पढ़ने की भी जहमंत नहीं की। कहने को कोई सियासत का बड़ा खिलाडी तो कोई खोजी पत्रकार बन जनता को गुमराह ही करते रहे। अपनी तिजोरियां भरने के लालच में राम की वास्तविकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाते रहे। धर्म-निरपेक्षता के बन रहे किसी सुरमा भोपाली ने तुष्टिकरण के चलते मुग़ल वंशज बनने की चाहत में, यह पूछने तक का साहस नहीं किया कि "खुदाई में मिले मंदिर के अवशेषों को किस कारण कोर्ट से छुपाया गया? लेकिन अपना जमीर बेच जनता को दंगों की आग में झोंक मालपुए खाते रहे। क्या यही उनकी योग्यता है? क्या झूठ के पुलंदे बांध सिर्फ हिन्दू और हिन्दू धर्म को अपमानित करने को धर्म निरपेक्षता, लोकतंत्र और समाजवाद कहते हैं? क्या इसी का नाम गंगा-जमुना तहजीब है? अगर यही गंगा-जमुना तहजीब है, बंद करो इस धूर्त नारे को। आखिर इस धूर्तता का कब जनाजा निकलेगा?  
लिबरल जमात का यह मानसिक आघात सिर्फ भूमिपूजन के दिन ही शुरू नहीं हुआ बल्कि पिछले काफी समय से वो इस ‘बुरे दौर’ से गुजर रहे थे और आज उनका यह दुःख बरबस फूट रहा है। यही वजह है कि कुछ ही दिन पहले ट्विटर पर ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ जैसे दुखद हैशटैग ट्रेंड कर रहे थे।
आज के दिन की शुरुआत में ही सबसे पहले जहाँ ओवैसी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक जहरीले बयान से हुई, वहीं यह क्रम पूरे दिन जारी रहा और इस्लामिक प्रपंचकारी राणा अयूब से लेकर आरफ़ा खानम रह-रहकर अपना दर्द ट्विटर पर उगलते रहे।
इस्लामिक विचारधारा समर्थक राना अयूब तो इस बात से भी खफ़ा हैं कि कॉन्ग्रेसी नेता भी राम मंदिर के जश्न में हिन्दुओं के साथ अपनी उपास्थिति दर्ज कराने के लिए मरे जा रहे हैं।
दरअसल, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट में लिखा- “अयोध्या में राम मंदिर की ऐतिहासिक नींव रखने पर भारत के लोगों को मेरी हार्दिक बधाई, जो कि हर भारतीय की लम्बे समय से इच्छा थी। भगवान राम के धर्म का सार्वभौमिक संदेश न केवल भारत के लिए, बल्कि दुनिया के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।”
इस से राना अयूब अपने भीतर के ज्वालामुखी को रोक नहीं सकीं और उन्होंने इस ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा – “भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस अपना असली चेहरा दिखाते हुए।”
2002 के गुजरात दंगों की काल्पनिक कहनियों को अपनी पत्रकारिता बताने वाली राना ने इससे पहले एक अन्य ट्वीट में लिखा – “हम हैरान क्यों हैं? यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जिसने मुस्लिमों का नरसंहार किया और उसके लिए उसे सत्ता मिली। वह शख्स, जिसने उन्हें हिंदू भारत का सपना बेचा था और अब इसे पूरा कर रहा है। यह नाटक बंद करो।”


वहीं, जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद ने राम मंदिर पर कोई विशेष टिप्पणी ना करते हुए बस पीएम मोदी की दाढ़ी और नए लुक पर सवाल किया कि आखिर मोदी जी ‘एर्तुग्रुल दाढ़ी’ क्यों रख रहे हैं?

शेहला के इस ट्वीट के जवाब में कई तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं, जिनमें से कुछ लोगों ने भाषा की मर्यादा का ध्यान ना रखते हुए पीएम मोदी की दाढ़ी की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भी की।
शीला भट्ट ने द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता से जुड़े एक किस्से को याद दिलाते हुए ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन की कवर फोटो शेयर किया जिसमें अयोध्या बाबरी विध्वंस का जिक्र करते हुए मुख्य पन्ने पर लिखा था- “राष्ट्रीय कलंक।”
इस फोटो के साथ शीला भट्ट ने लिखा है – “दिसंबर 1992 में, इंडिया टुडे के गुजराती संस्करण, (तब, मैं वरिष्ठ संपादक थी और शेखर गुप्ता इसके संपादक थे) ने इसके कवर पर लिखा था ‘राष्ट्र नु कलंक।’ गुजरात का तब तक इतना भगवाकरण कर दिया गया था कि पाठकों ने गुजराती इंडिया टुडे के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। आखिरकार गुजराती संस्करण बंद हो गया।”
इसके जवाब में शेखर गुप्ता ने अपने दर्द का स्मरण करते हुए लिखा है – “हमने अक्टूबर 1992 में गुजराती संस्करण का शुभारंभ किया था। 6 सप्ताह के भीतर, हम 75 हजार तक बढ़ गए थे। इसके बाद अयोध्या के शीर्षक और कवरेज में विरोध की बाढ़ आई। अगले 4 हफ्तों में, हम 25 हजार तक गिर गए। संस्करण हमारे मार्केटिंग हेड के कहे अनुसार ही डूब गया।”

‘द प्रिंट’ की ही जर्नलिस्ट जैनाब सिकंदर ने ट्वीट किया है – “मुझे अयोध्या में सैंटा की मौजूदगी महसूस हो रही है।”

इसके जवाब में उन्हें ट्विटर यूजर ने कई क्रिएटिव जवाब दिए –


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का भूमिपूजन किए जाने पर असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) देश है और पीएम मोदी ने राम मंदिर की आधारशिला रखकर प्रधानमंत्री कार्यालय की शपथ का उल्लंघन किया है। ओवैसी ने कहा कि यह लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की हार और हिंदुत्व की सफलता का दिन है।

इसके अलावा आईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपना दर्द शेयर करते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं भावुक हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं भी उतना ही भावुक हूँ क्योंकि मैं सह-अस्तित्व और नागरिकता की समानता में विश्वास करता हूँ। प्रधानमंत्री, मैं भावुक हूँ क्योंकि एक मस्जिद 450 साल से वहाँ खड़ी थी।”

असदुद्दीन ओवैसी पंडित वंश के हैं, जो मुस्लिम में परिवर्तित हो गए : याकूब हबीबुद्दीन तुसी, बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के परपोते

Prince Tucy calls Owaisi 'A Joker' | Mughal descendant who donated ...मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के परपोते याकूब हबीबुद्दीन तुसी (Yakub Habeebuddin Tucy) उर्फ, प्रिंस तुसी ने समाचार चैनल ‘News X’ के साथ एक इंटरव्यू में AIMIM नेता ओवैसी को जोकर बताते हुए कहा कि उनके परिवार की अयोध्या में बने राम मंदिर को देखने की इच्छा है।
अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन का स्वागत करते हुए, प्रिंस तुसी ने कहा कि उनके परिवार इस बात से उत्साहित हैं कि मीर बाक़ी द्वारा किए गए ऐतिहासिक गलत काम को समाप्त किया जाएगा।
तुसी ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह उनके पूर्वज, मुगल सम्राट बाबर नहीं थे, बल्कि उनके सहयोगी मीर बाकी थे, जिन्होंने अयोध्या में 15वीं शताब्दी में निर्मित मंदिर को नष्ट कर दिया था।
जब प्रिंस तुसी से असदुद्दीन ओवैसी और अन्य विपक्षी नेताओं जैसे आलोचकों, जिन्होंने अयोध्या में समारोह के लिए प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा पर सवाल उठाए थे, के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि वह एक जोकर है और पीएम मोदी की यात्रा पर उसकी आपत्ति पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
प्रिंस तुसी ने आगे कहा, “पीएम मोदी सभी समुदायों के प्रधानमंत्री हैं। पिछली बार, उन्होंने बोहरा समुदाय के कार्यक्रम का दौरा किया। इस बार वह हिंदुओं के एक समारोह में शामिल होंगे। जैसा कि मैंने पहले कहा था कि असदुद्दीन ओवैसी एक जोकर है। वह पंडित वंश के हैं, जो मुस्लिम में परिवर्तित हो गए। ओवैसी केवल अपने विरोध प्रदर्शनों के साथ सस्ते पब्लिसिटी की कोशिश कर रहे हैं।”
Uttar Pradesh: Prince Yakub Habeebuddin Tucy accepts Guilt for his ...
खुद को बहादुर शाह जफर का वंशज कहने वाले याकूब हबीबुद्दीन तुसी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए 1.8 करोड़ रुपए की सोने की ईंट भी दान कर रहे हैं। अपने दान के बारे में बात करते हुए, तुसी ने कहा कि वह यह दान बहुलवाद और भाईचारे को लेकर धर्मनिरपेक्षता का संदेश देने के लिए कर रहे हैं।
तुसी ने कहा, “इस्लाम हमें सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाता है। बाबर को लेकर एक खेल खेला गया था और उसकी कोई गलती नहीं थी। उसने मंदिर को ध्वस्त नहीं किया। मेरे सहित सभी मुगल धर्मनिरपेक्ष थे। मैं क्रॉस-कम्युनिटी एकता और भाईचारे के संदेश के रूप में एक सोने की ईंट भेज रहा हूँ।”
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या विवाद पर सुनाए गए फैसले का याकूब हबीबुद्दीन उर्फ़ प्रिंस तुसी ने भी स्वागत किया था। इसके साथ ही, उन्होंने कहा था कि मंदिर निर्माण के लिए वे सोने की ईंट भी ट्रस्ट को देंगे।
प्रिंस तुसी ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा था कि जिस तरह से देश में 26 जनवरी और 15 अगस्त को खुशियाँ मनाई जाती है, उसी तरह से आज के दिन को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सभी हिन्दू और मुसलमान भाई को कबूल करना चाहिए।

‘बाबरी विध्वंस’ के लिए प्रियंका पर ओवैसी का कटाक्ष -- खुशी है कि अब नाटक नहीं कर रहे

ओवैसी प्रियंका गाँधी
अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन पाँच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होगा। इस भूमि पूजन से पहले लगातार राजनीतिक बयानबाजी भी हो रही है। लेकिन इस सभी के बीच कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने बयान जारी करते हुए कहा कि भूमि पूजन का कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बने।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने प्रियंका के इस ट्वीट को लेकर उनकी खिंचाई की। ओवैसी ने कांग्रेस पार्टी पर उस ‘आंदोलन में योगदान देने का आरोप लगाया जिसने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।’ 
ओवैसी इस बात को भी भूल रहे हैं कि ताला भी कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में खुला था, और शिलान्यास भी। क्यों? उस समय ऐसी कौन-सी मजबूरी आ गयी थी, जो ताला खुलवाने से लेकर शिलान्यास तक हो गया? कुछ स्मरण भी आ रहा है कि विरोध का एक भी स्वर नहीं निकला था। ये नाटक क्या था? और आज चीख-चिल्लाट? उस समय शाहबानो के अलावा वो कौन-सा दबाव था, जिसने तब राम विरोधियों की आवाज़ बंद कर दी थी? और उस संगीन मामले के ठंठा होते ही वापस मंदिर मुद्दा कोर्ट में ले गए, ओवैसी साहब दाल में कुछ काला नहीं, पूरी दाल ही काली है, क्यों ठीक कहा ना? क्यों मुस्लिम होकर मुस्लिम के खून की होली खेली जा रही है? दंगे में हिन्दू ही नहीं मुसलमान भी मरता है। 
ओवैसी ने प्रियंका गाँधी के ट्वीट पर टिप्पणी करते हुए लिखा, “खुशी है कि वे अब और नाटक नहीं कर रहे हैं। यह अच्छी बात है कि वो भी अतिवादी विचारधार को गले से लगा रही हैं। लेकिन भाईचारे के मुद्दे पर वो खोखली बातें क्यों करती हैं। शर्म मत कीजिए, आप इस बात पर गर्व महसूस करिए कि किस तरह से आपकी पार्टी ने उस आंदोलन में योगदान दिया, जिसकी वजह से हमारे बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।”

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने अपने ट्वीट में लिखा था, “सरलता, साहस, संयम, त्याग, वचनवद्धता, दीनबंधु राम नाम का सार है। राम सबमें हैं, राम सबके साथ हैं। भगवान राम और माता सीता के संदेश और उनकी कृपा के साथ रामलला के मंदिर के भूमिपूजन का कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बने।” इसके साथ प्रियंका गाँधी ने अपना वक्तव्य भी शेयर किया है, जिसके अंत में उन्होंने ‘जय सियाराम’ लिखा है।
प्रियंका गाँधी वाड्रा की ओर से ये बयान तब आया, जब कांग्रेस की ओर से राम मंदिर को लेकर अलग-अलग तरह के बयान सामने आ रहे थे। एक तरफ मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भूमि पूजन का समर्थन किया, साथ ही स्वागत भी किया। उन्होंने लोगों को भूमि पूजन की बधाई भी दी। इतना ही नहीं कमलनाथ ने अपने ट्विटर पर प्रोफाइल फोटो भी बदल ली है और भगवा वस्त्र में नज़र आ रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर दिग्विजय सिंह की ओर से भूमि पूजन के वक्त पर सवाल खड़े किए गए थे, उन्होंने कहा था कि अभी शुभ मुहूर्त नहीं है ऐसे में इसे कुछ वक्त के लिए टाल देना चाहिए।
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उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भगवान राम के मंदिर बनाने की औपचारिक शुरुआत बुधवार (अगस्त 5, 2020) को प्रधानमंत्री नरेंद्र .....
इतना ही नहीं दिग्विजय सिंह ने शुभ मुहूर्त ना होने और भाजपा नेताओं को कोरोना होने के कनेक्शन को जोड़ दिया था जिस पर काफी विवाद हुआ था। इन बयानों के बाद ही भाजपा की ओर से आरोप लगाया जा रहा था कि कॉन्ग्रेस एक बार फिर मंदिर निर्माण में अड़ंगा लगा रही है।

राममंदिर भूमि पूजन एकता का कार्यक्रम बनेगा: प्रियंका गाँधी

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भगवान राम के मंदिर बनाने की औपचारिक शुरुआत बुधवार (अगस्त 5, 2020) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भूमिपूजन में मंदिर की नींव रखने के साथ ही हो जाएगी। इसी क्रम में अब कांग्रेस नेता भी एक-एक कर के रामभक्त बनते जा रहे हैं। जो राम के अस्तित्व को काल्पनिक कहते थे, मन्दिर मुक्ति आंदोलन को साम्प्रदायिकता का नाम दिया जाता था, खुदाई में सबूतों को छुपाकर मंदिर में अवरोध उत्पन्न किये जा रहे थे, आज उसी कांग्रेस जनता की नब्ज को पढ़ हिन्दुओं के आराध्य पुरुषोत्तम श्रीराम को स्वीकार कर रहे हैं। इसमें नया नाम प्रियंका गाँधी का जुड़ा है, जिन्हें राज्य में पार्टी के पुनरुद्धार की कमान सौंपी गई है। प्रियंका गाँधी ने अयोध्या में राम मंदिर बनने के स्वागत किया है।
प्रियंका गाँधी ने कहा कि सरलता, साहस, संयम, त्याग, वचनवद्धता, दीनबंधु राम नाम का सार है। राम सबमें हैं, राम सबके साथ हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि भगवान राम और माता सीता के संदेश और उनकी कृपा के साथ रामलला के मंदिर के भूमिपूजन का कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बने। बता दें कि कांग्रेस पर अक्सर आरोप लगते हैं कि उसने सत्ता में रहते राम के अस्तित्व को नकार दिया था।
इतना ही नहीं, प्रियंका गाँधी ने तो यहाँ तक कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति में रामायण की गहरी और अमिट छाप है। उन्होंने कहा कि भगवान राम और सीता की गाथा हज़ारों वर्षों से भारत की संस्कृति और इतिहास का हिस्सा रही हैं। उन्होंने नीति, कर्तव्यपरायणता, धर्म, प्रेम, पराक्रम, सेवा और उदात्तता का प्रेरणास्रोत रामायण को ही करार दिया। उन्होंने राम ही नहीं बल्कि श्रीहरि के अन्य रूपों का भी गुणगान किया।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि भगवान राम का चरित्र युगों-युगो से लोगों को जोड़ने का माध्यम रहा है। उन्होंने शबरी, सुग्रीव, वाल्मीकि, भास, कम्बन, कबीर, तुलसीदास, रैदास और वारिस अली शाह का जिक्र करते हुए कहा कि राम सबके हैं, सबके दाता हैं। मैथिलीशरण गुप्त और महाप्राण निराला जैसे कवियों का जिक्र करते हुए प्रियंका गाँधी ने राम के लिए उनके द्वारा दिए गए वक्तव्यों को याद किया।
जहाँ एक तरफ दिग्विजय सिंह और प्रमोद कृष्णन सरीखे कांग्रेस नेता बुधवार को होने वाले अयोध्या भूमिपूजन का विरोध करते हुए मुहूर्त पर सवाल उठा रहे हैं, प्रियंका ने इसका स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि रामलला का ये कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व, सांस्कृतिक समागम का कार्यक्रम बनेगा। प्रियंका गाँधी ने कहा कि चारों दिशाओं में रामकथा अनगिनत रूपों में लोकप्रिय होती आ रही है।
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कर्नाटक के पुजारी विजयेंद्र (इनसेट) को मौत की धमकी! अयोध्या में राममंदिर विरोधी तारीख मिलने से इतने अधिक विचलित हो ....
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कमलनाथ आज 4 अगस्त के दिन एक बड़ा आयोजन कर रहे हैं। 5 अगस्त के दिन होने वाले राम मंदिर के भूमि पूजन से एक दिन पहले वह भोपाल स्थित अपने आवास पर हनुमान चालीसा का पाठ कराएँगे। इतना ही नहीं, इस दिन मध्य प्रदेश कांग्रेस के तमाम नेता अपने घरों या स्थानीय मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं।

राम मंदिर भूमि पूजन का मुहूर्त बताने वाले पुजारी को मौत की धमकी

राम मंदिर मुहूर्त पुजारी धमकी
कर्नाटक के पुजारी विजयेंद्र (इनसेट) को मौत की धमकी!
अयोध्या में राममंदिर विरोधी तारीख मिलने से इतने अधिक विचलित हो गए हैं कि अब मुहुर्त का दिन और समय बताने वाले पुजारी विजयेंद्र को मौत की धमकी देने के मामले को हलके में नहीं लेना चाहिए। इसका मतलब है कि राममंदिर अवरोध उत्पन्न करने वाले किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। 
अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन से ठीक एक दिन पहले इस पूरे कार्यक्रम की एक तरह से नींव रखने वाले पुजारी को मौत की धमकी मिली है। यह पुजारी हैं कर्नाटक के विजयेंद्र। पुजारी विजयेंद्र को मिली धमकी इसलिए महत्वपूर्ण है और किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही है क्योंकि यही वो पुजारी हैं, जिन्होंने राम मंदिर भूमि पूजन का मुहूर्त बताया था।
वीडियो में 5 मिनट 20 सेकंड के बाद से पुजारी विजयेंद्र को मिली धमकी का जिक्र।


कर्नाटक के पुजारी विजयेंद्र ने ही राम मंदिर भूमि पूजन के लिए 29 जुलाई, 31 जुलाई, 3 अगस्त और 5 अगस्त का मुहूर्त निकाला था। बाद में सबकी सहमति से 5 अगस्त को इस शुभ कार्य के लिए दिन फाइनल किया गया। अब इन्हीं पुजारी विजयेंद्र को कर्नाटक में फोन पर जान से मारने की धमकी मिल रही है।
कर्नाटक के बेलगावी स्थित तिलकवाड़ी पुलिस स्टेशन में इस संबंध में मामला दर्ज किया गया है। वहाँ की पुलिस ने बताया कि 75 वर्ष के पुजारी विजयेंद्र को फोन पर धमकी मिली है। इस पूरे मामले पर पुजारी विजयेंद्र ने कहा:
“फोन करने वालों ने नाम नहीं बताया। वो धमकी दे रहे थे। कहा कि मुहूर्त की तारीख क्यों बताई? इसमें शामिल क्यों हो रहे हो? मैंने कहा कि आयोजकों ने मुझसे इसके लिए आग्रह किया था और मैंने धर्म का पालन किया। कई जगहों से, कई बार फोन आ रहे हैं। लेकिन मैं इसे गंभीरता से नहीं ले रहा।”
 
मामले की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक पुलिस ने पुजारी विजयेंद्र के घर पर कुछ पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी है। पुलिस के अनुसार कॉल करने वाले ने पुजारी विजयेंद्र से मुहूर्त के समय को वापस लेने को कहा।
पुजारी विजयेंद्र पिछले कई सालों से राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं। इस साल फरवरी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर भूमि पूजन के लिए मुहूर्त निकालने के लिए उनसे संपर्क किया था।

NDTV ने कल्याण सिंह से पूछा :आपने गोली चलवा कर हज़ारों कारसेवकों को क्यों नहीं मरवाया?

Babri demolition: Is Kalyan Singh guilty? - YouTube
जब अगस्त 5 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में भव्य राममंदिर का शिलान्यास कर रहे होंगे, हिन्दू विरोधियों के साथ-साथ NDTV भी शोकाकुल हो रहा होगा। संभव है हिन्दू होते हुए अंदर ही अंदर लाख ख़ुशी भी हो रही हो, लेकिन उजागर करना कठिन होगा। 
दिसंबर 1992 में उत्तर प्रदेश में विवादित ढॉंचे का ध्वंस के बाद कल्याण सिंह को अपनी सरकार गँवानी पड़ी थी। भले ही उनकी सरकार चली गई और बाद में कुछ कारणों से वे भाजपा से सस्पेंड भी किए गए, लेकिन राम मंदिर पर उनका स्टैंड ज्यों का त्यों रहा। एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी को दिसंबर 2009 में दिए गए इंटरव्यू में भी ये साफ़ झलकता है। यही वो इंटरव्यू है, जिससे पता चलता है कि किस कदर एनडीटीवी रामभक्तों की लाशों पर ठहाके लगाना चाहता था।
बुधवार (अगस्त 5, 2020) को राम जन्मभूमि अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर का भूमिपूजन कार्यक्रम है। इसमें कल्याण सिंह भी मौजूद रहेंगे। कल्याण सिंह का रुख आज भी वही है, लेकिन एनडीटीवी भी नहीं बदला है। कल को विजय त्रिवेदी रामभक्तों की लाश देखना चाहते थे, अब रवीश कुमार राम मंदिर से खार खाए बैठे हैं। आइए, आपको बताते हैं कि क्या था उस इंटरव्यू में।
दरअसल, विजय त्रिवेदी इस बात पर कल्याण सिंह को घेरने में लगे हुए थे कि आखिर ढाँचा गिरने के बाद उन्होंने उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की, जिनके रहते ये सब हुए। आखिर पुलिस अधिकारियों ने गोली चलाने का निर्देश क्यों नहीं दिया? त्रिवेदी के शब्दों का अर्थ ये था कि रामभक्तों पर गोली चला कर उनका कत्लेआम क्यों नहीं मचाया गया, वो भी एक विवादित ढाँचे को बचाने के लिए।

EXCLUSIVE- Kalyan Singh nails Mulayam Yadav on his claim about ...400 Saal Purane Kalank Babri Dhanche Ko Mitaya Aise Veer Neta The ...इस पर कल्याण सिंह ने उन्हें ये बता कर सन्न कर दिया कि उन्होंने ही अधिकारियों को सख्त आदेश दिए थे कि वहाँ जुटे लोगों पर गोली न चलाई जाए, जिसका उन्होंने पालन किया। सारा दोष अपने ऊपर लेते हुए कल्याण सिंह ने अधिकारियों को पाक-साफ़ बताया। इसके बाद एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी ने उन्हें जो सलाह दी, वो न सिर्फ़ चैनल की हिन्दूघृणा की सोच को दर्शाता है, बल्कि राम मंदिर के प्रति उसकी घृणा को भी दिखाता है।
तब एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी ने उन्हें कहा कि आखिर कल्याण सिंह ने गोली न चलवा कर हजारों लोगों के मारे जाने के बदले करोड़ों लोगों को बाँटने का फैसला कैसे ले लिया? यानी, एनडीटीवी अपनी एक धारणा के बदले हज़ारों रामभक्तों की लाश चाहता था। त्रिवेदी ने ये धारणा बना ली थी थी ‘लोग बँट गए’। बस इसके लिए हज़ारों श्रद्धालुओं की लाशें बिछा दी जाएँ, ऐसा उनका सोचना था।
एनडीटीवी के इस इंटरव्यू में विजय त्रिवेदी बार-बार इसी बात पर कल्याण सिंह को घेरने की कोशिश करते हुए नज़र आए कि आखिर उन्होंने कारसेवकों पर गोली क्यों नहीं चलवाई? हज़ारो लोगों के मरने’ की बात वो इतनी आसानी से कह रहे थे, जैसे कि वो सभी आतंकवादी हों। जबकि वे सभी आमजन थे। यही एनडीटीवी आतंकियों और नक्सलियों को Whitewash करता रहता है। 
इस वीडियो को भी देखिए:
सुरक्षा के इंतजाम न रहने के आरोपों और खुद के मजबूत मुख्यमंत्री की छवि पर उठे सवालों का जवाब में उदाहरण गिनाते हुए कल्याण सिंह ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति की सुरक्षा के पूरे इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। इंदिरा गाँधी की सुरक्षा के पूरे इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। राजीव गाँधी की सुरक्षा के पक्के इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। उन्होंने इसे राष्ट्रीय गर्व का दिन भी करार दिया।
6 दिसंबर 1992 को विवादित ढाँचा गिराए जाने के 10 दिन बाद गृह मंत्रालय ने लिब्राहन आयोग का गठन किया था। इस आयोग को ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल लोगों का नाम सामने आए। इस आयोग ने लगभग 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें कल्याण सिंह को अहम किरदार बताया था। कोर्ट की सुनवाई इस मामले में अभी तक चल रही है।
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गोधरा : जब दंगाइयों ने साबरमती एक्सप्रेस, कोच एस-6 को आग लगा दी थी गोधरा में 27 फरवरी 2002 की सुबह साबरमती एक्सप्रेस के को.....
राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के तुरंत बाद भी उन्होंने कहा था कि अयोध्या करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्रबिंदु है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होता है तो इससे करोड़ों भारतीयों की इच्छा पूरी होगी। दोबारा बीजेपी का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को राम मंदिर मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कहा था। अब वे 5 अगस्त को भव्य राम मंदिर भूमि पूजन के साक्षी बनेंगे।