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त्रिपुरा टूलकिट ने ऐसे जलाया गया महाराष्ट्र : 7 तस्वीरें, दावा: कुरान जलाई-मस्जिदों में आग लगा दी

आखिर जिस फेक पोस्ट के कारण रज़ा अकाडेमी ने महाराष्ट्र को साम्प्रदायिकता की आग में झोंका, सरकार को ऐसे लोगों के विरुद्ध ऐसी सख्त कार्यवाही करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी फेक न्यूज़ फ़ैलाने वाले ऐसा साहस न कर पाएं। इन लोगों का काम ही अपने आकाओं के इशारे पर देश में अराजकता फैलाना है। सरकार को इन आकाओं पर नकेल कसनी चाहिए। ताकि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा से देश का माहौल ख़राब होने पाए। रज़ा अकाडेमी से पूछना चाहिए कि क्या बंध का आव्हान करने से पहले समाचार की सत्यता जानने का प्रयास किया गया था? यदि  नहीं तो क्यों नहीं सत्यता जानने की कोशिश की? दंगे में जितना भी नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई दंगाइयों से की जाए।   

त्रिपुरा के नाम पर महाराष्ट्र में पिछले दिनों मुस्लिम दंगाइयों ने जमकर उत्पात मचाया। सैंकड़ों की भीड़ ने सड़कों पर उतरकर तोड़फोड़ की, पुलिस पर पथराव किया। अब इसी घटना को लेकर टाइम्स नाऊ ने अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट प्रकाशित की है। मीडिया चैनल के अनुसार, हिंदुओं और हिंदू संगठनों के ख़िलाफ़ ये हिंसा त्रिपुरा के बारे में फर्जी पोस्ट कर करके फैलाई गई। कहीं इसमें कहा गया कि मुस्लिमों पर हमला हुआ तो कहीं बोला गया कि मस्जिद को जलाया गया।

रिपोर्ट में 7 तस्वीरों का जिक्र है और इन्हीं के बल पर दावा किया गया है कि हिंदुओं के विरुद्ध पूरा अभियान फर्जी तस्वीरों (वीडियो में मौजूद) से चलाया गया। एक फोटो में दो लोग हाथ में जली हुई किताब लेकर दिख रहे हैं। इस तस्वीर को कैप्शन दिया गया कि हिंदू गुंडों ने कुरान की प्रतियाँ जलाई हैं जबकि वास्तविकता में ये तस्वीर जून में दिल्ली के एक रिफ्यूजी कैंप से ली गई थी।

दूसरी तस्वीर में एक इस्लामी उलेमा, इमारतों में लगी आग को ये कहकर फैलाता पाया गया कि त्रिपुरा में 16 मस्जिदों में आग लगा दी गई है जबकि तस्वीर त्रिपुरा के अगरतला की है जिसमें सीपीएम ऑफिस को निशाना बनाया गया था न कि मस्जिदों को।

इसी तरह एक अन्य तस्वीर जिसमें बीजेपी का झंडा देख लोगों की भीड़ वाली तस्वीर पर लिखा गया, ‘भगवा आतंकी आपे से बाहर हो रहे हैं।’ अब ये तस्वीर दरअसल कोलकाता में विहिप द्वारा रामनवमी पर निकाले गए जुलूस की है जिसका त्रिपुरा से लेना-देना नहीं है।

अगले पोस्ट में एक फिरोज खान ने कहा कि दंगाइयों को त्रिपुरा पुलिस संरक्षण प्रदान कर रही है। वहीं राज्य पुलिस की साइबर क्राइम ने इसे फेक तस्वीर कहा। ऐसी ही अगली तस्वीर का जिक्र भी रिपोर्ट में है जो असलियत में पाकिस्तान के निजामाबाद की है। वो भी तब की जब एक धमाके में 4 लोग मारे गए थे।

इसके बाद अगली तस्वीर में कहा गया कि त्रिपुरा में मुस्लिमों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जा रहा है। लेकिन यदि सच का पता लगाएँ तो दावे वाली तस्वीर जौनपुर की है जहाँ 22 अक्टूबर 3 मंजिला बिल्डिंग गिर गई थी। 

महाराष्ट्र में भड़की हिंसा को देखते हुए गृह मंत्रालय पहले ही बयान जारी कर चुका है कि त्रिपुरा में मस्जिद को नुकसान पहुँचाने की खबरें झूठी हैं और तथ्यों को जोड़-तोड़ कर बनाई गई हैं। त्रिपुरा के गोमती जिले के ककराबन इलाके में ऐसी कोई घटना घटित नहीं हुई, जैसी फैलाई जा रही है कि वहाँ मस्जिदों पर हमला हुआ और तोड़फोड़ हुई।

12 नवंबर को महाराष्ट्र के नांदेड़, अमरावती और मालेगाँव समेत कई शहरों में मुस्लिम संगठनों ने त्रिपुरा हिंसा के नाम पर इकट्ठा होकर उपद्रव मचाया था। भीड़ के डर से बाजार में दुकानें बंद हो गईं थी और पुलिस पर भी पथराव किया गया था। इलाके शांत होने के बाद पता चला था कि इस तरह सड़कों पर उतरने से पहले सोशल मीडिया पर जमकर तस्वीरें शेयर हुई थी। कहीं बांग्लादेश के रोहिंग्याओं को त्रिपुरा के मुस्लिम कहा गया था तो कहीं दूसरे राज्यों की तस्वीरें शेयर हुई थी।

छाज बोले सो बोले छलनी बोले जिसमें 72 छेद

मनोज चतुर्वेदी, समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-पत्र 

(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

एक कहावत है कि छाज बोले सो बोले, छलनी बोले जिसमें 72 छेद। यह कहावत उत्तरप्रदेश की राजनीति में जातिवादी और साम्प्रदायिक तड़का लगाने वाले लाल टोपिधारियों पर बिल्कुल फिट बैठती है।

आज वह लोग योगी सरकार को कानून व्यवस्था सुधारने की सीख दे रहे हैं जिनके ख़ुद के शासनकाल में खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई गईं।

अखिलेश के कार्यकाल में हिन्दू पूजा पद्द्ति पर कुठाराघात हुए, चौरासी कोसी परिक्रमा पर आघात हुए, मुज़फ्फरनगर हिन्दू विरोधी दंगे, महिलाओं का बलात्कार, गुंडागर्दी, लूटपाट आदि आदि। इतना ही नहीं, इनके पिता मुलायम सिंह के कार्यकाल में निहत्ते राम भक्तों पर गोलियां चलवा दीं। लेकिन आज जब वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन सब कुकर्मों को समाप्त कर रहे हैं, समाजवादी पार्टी को बर्दाश्त नहीं हो रहा। 

योगी को अखिलेश यादव की नींद और रोटी हराम करने के लिए मुज़फ्फर नगर दंगों की फाइल खोल कार्यवाही करनी चाहिए। 

अखिलेश से पूछो कि जब इस नगर अध्यक्ष द्वारा एक दलित के मुंह में पेशाब करने पर क्या कार्यवाही की थी? 

उत्तरप्रदेश के इटावा के सैफई महोत्सव में समाजवादी पार्टी के संस्थापक माननीय मुलायम सिंह यादव के भाई और दिग्गज नेता रामगोपाल यादव ने अखिलेश सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था-चुनावी एजेंडे में हमने ग़रीब जनता से वायदा किया था कि ग़रीब सर उठाकर चलेंगे और अपराधी सर झुकाकर चलेंगे। लेकिन हमारी सरकार के नेताओं के संरक्षण में अपराधी सर उठाकर चल रहे हैं। उन्होंने कहा था कि अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जा रहा है। इसलिए मुख्यमंत्री जी गुंडागर्दी बन्द कराइये, वरना हमारी सत्ता दोबारा नहीं आने वाली।"

2012 में यूपी में संभल के भीम नगर में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की जीत के बाद निकाले गए जुलूस में गोली चलने से एक नौ साल के बच्चे की मौत हो गई थी। जुलूस को देखने के लिए जमा हुई भीड़ में यह बच्चा भी शामिल था। चश्मदीदों के मुताबिक जीत के नशे में चूर समाजवादी कार्यकर्ता जुलूस के दौरान हवा में गोलियां चला रहे थे। अचानक एक गोली एक बच्चे को लगी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बच्चा पास में ही एक फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर का बेटा था।

अपराध और भयमुक्‍त प्रदेश का दावा करने वाली सपा सरकार की पोल एनसीआरबी ने खोल दी। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2012-13 में रेप के मामलों में 55 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2012 में 5,676 दंगों के मामले दर्ज किए गए, साल 2013 में यह आंकड़ा बढ़कर 6089 हो गया। 

दिल्ली - कानपुर हाईवे ( एनएच-91) पर  मां-बेटी गैंगरेप हुआ। जिसमें एक पूरे परिवार को बंधक बनाकर लूटपाट की गई और परिवार की दो महिलाओं जो कि रिश्ते में माँ-बेटी थीं, के साथ कई लोगों ने बलात्कार किया। हैवानियत का यह नँगा नाच 4 घण्टे तक चलता रहा।

2012 में यूपी में कुल 227 दंगे हुए. 2013 में 247. 2014 में 242. 2015 में 219. 2016 में भी 100 के ऊपर हो चुके थे. (स्रोत-लल्लन टॉप.कॉम)

मुजफ्फरनगर दंगों में बड़ी जनधन हानि हुई थी। हजारों लोग बेघर हो गए थे, जब यह लोग शिविरों में ठिठुर रहे थे तब अखिलेश यादव सैफई में सलमान खान के ठुमके देख रहे थे।

रामवृक्ष यादव द्वारा 280 एकड़ सरकारी जमीन पर किये गए अतिक्रमण को हटाने गई पुलिस टीम पर हमला हो गया. एसपी और एसएचओ मारे गये. 23 पुलिसवाले अस्पताल में भर्ती हुए. जवाहर पार्क में रामवृक्ष यादव ने कब्जा जमा रखा था. पूरी सेना बना रखी थी. पुलिस के साथ लड़ाई चली. कुल 24 लोग मारे गये. चारों ओर से खुसुर-फुसुर होने लगी कि रामवृक्ष को सपा नेताओं का आशीर्वाद प्राप्त था. क्योंकि बिना उसके इतनी बड़ी घटना नहीं हो सकती. सवाल ये है कि सरकार क्या कर रही थी इतने दिन तक. किसने उसे प्रश्रय दिया था. क्या सरकार अनजान थी. तब तो ये और ज्यादा खतरनाक हो जाएगा. क्या अखिलेश को इसके बारे में पता नहीं था?

 बदायूं में दो नाबालिग लड़कियों के साथ रेप किया गया और उनकी लाश को पेड़ पर लटका दिया गया था। इस नृशंस कांड में तत्कालीन सपा सांसद के कुछ करीबियों का नाम सामने आया था।

शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जलाया गया. इसमें भी सपा के एक मंत्री का नाम आया. क्या वो मंत्री अभी जेल में है? नहीं. ये मामला ही पता नहीं कहां चला गया. जबकि मरते हुए जगेंद्र ने बयान दिया था कि मंत्री राममूर्ति वर्मा की शह पर पुलिस ने जलाया था. इस बयान को आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने ही रिकॉर्ड किया था. राममूर्ति स्टेट बैकवर्ड क्लासेज मिनिस्टर थे. इस मामले की गवाह थी एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता. और विडंबना ये है कि उसी औरत ने मूर्ति और उनके लोगों पर रेप का इल्जाम लगाया था. जगेंद्र ने इसी औरत के लिए लड़ाई लड़ी थी. 

यह घटनाएं तो केवल बानगी भर हैं, सपा सरकार के पांच वर्षों का लेखाजोखा तो इससे कई गुना अधिक है। मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे माफिया और गुंडों को संरक्षण देने वाली सपा सरकार 2012 में जब जीत कर आई थी, तो उसके निरंकुश कार्यकर्ताओ ने कई जगहों पर हिंसा की थी। मीडिया स्रोतों की माने तो कई जगहों पर तो थाने भी फूंक दिए गए थे।

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वेंकैया नायडू ने मायावती की भाषा में दिया करारा जवाब

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वेंकैया नायडू ने मायावती की भाषा में दिया करारा जवाब
बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता और केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने बीएसपी सुप्रीमो मायाव

आज वही समाजवादी पार्टी प्रदेश में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति पर प्रवचन कर रही है। इसे कहते हैं छाज बोले सो बोले, छलनी बोले जिसमें 72 छेद।

हाथरस : जातीय हिंसा की साजिश रचने वाला PFI चेयरमैन अब्दुल सलाम केरल का सरकारी कर्मचारी निकला

                                  केरल के बिजली विभाग में सरकारी पद पर है अब्दुल सलाम

देशभर में विवाद का विषय बन चुके हाथरस केस की जाँच जारी है और इस मामले में रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं। हाथरस की वारदात के बाद उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाने की साजिश हो रही है और इस साजिश में PFI यानी, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का हाथ सामने आया है। हाथरस में जातीय दंगा भड़काने की साजिश रचने वाला PFI का चेयरमैन अब्दुल सलाम केरल के बिजली विभाग का कर्मचारी है।

जानकारी के मुताबिक PFI का चेयरमैन केरल में सरकारी कर्मचारी है। जिसका नाम अब्दुल सलाम है और वह केरल में बिजली विभाग में कार्मचारी है। अब्दुल सलाम केरल विद्युत बोर्ड में वरिष्ठ सहायक कम कैशियर के पद पर तैनात है। एबीपी न्यूज का दावा है कि उसके पास पीएफआई के चेयरमैन की कई जानकारियाँ हैं और यही वो शख्स है जो सरकारी कर्मचारी रहते हुए देश में दंगे की साजिश रच रहा है।

ऐसे में क्या केरल सरकार अब्दुल सलाम को निष्कासित कर जेल में डालेगी? केवल जेल में ही नहीं, इनको मिलने वाली समस्त सरकारी सुविधाएं जैसे पेंशन आदि भी समाप्त कर देनी चाहिए। देश की शांति भंग करने वाले ऐसे लोग किसी भी सहानुभूति के अधिकारी नहीं। केरल में पॉपुलर फ्रंट के कार्यालयों पर कोर्ट के माध्यम से सील कर, समस्त पदाधिकारियों, कर्मचारियों और इनके समर्थकों पर सख्त कार्यवाही की जाए। इनके समस्त बैंक खातों की जाँच कर, सील किए जाएं। 

केरल के मल्लापुरम जिले में रहने वाले अब्दुल सलाम की साल 2000 में सरकारी नौकरी पर नियुक्ति हुई थी। अब्दुल पर बिना इजाजत विदेश जाने के भी आरोप लगे हैं। केरल के बिजली विभाग में काम करने वाला अब्दुल सलाम उस पीएफआई संगठन का मुखिया है, जिस पर उत्तर प्रदेश के हाथरस में दंगा भड़काने की साजिश का आरोप है। पीएफआई संगठन का नाम नागरिकता कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में सुर्खियों में आया था। 

मीडिया खबरों में ईडी की रिपोर्ट का हवाला देकर बताया जा रहा है कि इस कांड के बहाने जातीय दंगा फैलाने के लिए पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पास मॉरिशस से 50 करोड़ रुपए आए थे।

इसके अलावा, ईडी ने दावा किया है कि पूरी फंडिंग 100 करोड़ रुपए से अधिक की थी। अब आगे पूरे मामले की पड़ताल की जा रही है। जानकारी के अनुसार, सोशल मीडिया से अफवाहों को फैला कर प्रदेश और देश की शांति व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश रची जा रही थी। हालाँकि, उत्तर प्रदेश पुलिस की मुस्तैदी और खूफिया एजेंसियों के अलर्ट होने के कारण इस पूरी साजिश का पर्दाफाश हो गया।

मामले पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि विपक्ष राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश कर रहा है। योगी ने कहा था, “जिसे विकास अच्छा नहीं लग रहा, वे लोग देश में और प्रदेश में भी जातीय दंगा, सांप्रदायिक दंगा भड़काना चाहते हैं। इस दंगे की आड़ में विकास रुकेगा। इस दंगे की आड़ में उनकी रोटियाँ सेंकने के लिए उनको अवसर मिलेगा, इसलिए नए-नए षड्यंत्र करते रहते हैं।”

उल्लेखनीय है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश के हाथरस जाते हुए 4 संदिग्ध लोगों को मथुरा पुलिस ने 5 अक्टूबर को गिरफ्तार किया था। पड़ताल में पता चला था कि इनके लिंक पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) से हैं। टोल प्लाजा पर चेकिंग के दौरान इनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब मथुरा पुलिस इनसे जुड़े हर पहलू पर जाँच कर रही है।

हाथरस : 100 करोड़ की फंडिंग, जातीय दंगों और हिन्दुओं में फूट डालने की साजिश

हाथरस मामले में योगी सरकार को भेजी गई खुफिया जाँच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जाँच एजेंसियों को योगी सरकार के खिलाफ खतरनाक साजिश के अहम सुराग मिले हैं। हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए बड़ी साजिश रचने की बात सामने आ रही है। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की साजिश भी रची गई थी। इसके लिए बकायदा फंडिंग की बात भी सामने आई है। यूपी सरकार को भेजी गई खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

दंगे भड़काने के लिए अफवाहों और फर्जी सूचनाओं का सहारा लिया जा रहा। साजिश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और सरकार के निशाने पर रहे माफियाओं की मिलीभगत के ठोस सबूत मिले हैं। प्रदेश में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। इस रिपोर्ट में योगी सरकार को बदनाम करने के लिए 100 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात भी सामने आ रही है।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हो रहे महिलाओं के शील भंग होने पर इस तरह कोहराम नहीं मचा, जो आज हाथरस कांड में देखने को मिल रहा है। ये दोहरा मापदंड वास्तव में किसी बड़ी साज़िश होने का प्रमाण स्वयं प्रस्तुत कर रहे हैं।  

बताया जा रहा है कि पीड़ित लड़की की जीभ काटे जाने, अंग-भंग करने और गैंगरेप से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर नफरत की आग भड़काने की कोशिश की गई। वहीं अफवाह फैलाने के लिए ढेरों वेरिफाइड सोशल मीडिया अकाउंट का भी इस्तेमाल किया गया। जाँच एजेसियाँ वेरिफाइड अकाउंट्स का ब्योरा तैयार करने में जुटी हैं।

ऐसे में प्रश्न यह भी होता है कि जब पीड़िता की जीभ काट दी थी, फिर पीड़िता ने पुलिस को बयान कैसे दिया? परिवार सीबीआई और नार्को टेस्ट से क्यों पीछे भाग रहा है, जबकि आरोपित परिवार इन्हीं जांचों के लिए मांग कर रहा है?

बताया गया कि हाथरस साजिश में CAA को लेकर हुए उपद्रव में शामिल रहे संगठनों की भूमिका के भी सबूत मिले हैं। उपद्रवियों के पोस्टर लगाए जाने, उपद्रवियों से वसूली कराए जाने और घरों की कुर्की कराने जाने की सीएम योगी की कार्रवाइयों से परेशान तत्वों ने बड़ी साजिश रची। इस दौरान कथित गैंगरेप पीड़ित लड़की से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर मामले को तूल दिया गया।

इसके साथ ही हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है, जिसके सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे है। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

ऑडियो टेप से खुलासा हुआ है कि सीएम से पीड़ित परिवार की बातचीत के तुरंत बाद एक महिला पत्रकार ने उन्हें भड़काया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अगर सीएम की बात मान ली तो पुलिस म्हें ही अपराधी साबित कर देगी। इस बातचीत के बाद परिवार दहशत में आ गई।

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हाथरस : योगी विरोधी पहुंचे UNSC

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हाथरस : योगी विरोधी पहुंचे UNSC
कुछ लोगों को दूसरे की फटी में पैर फंसाने की आदत होती है, जो उत्तर प्रदेश के मु

ऑडियो टेप की फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आते ही भड़काने वालों का पॉलीग्राफ और नार्को की तैयारी में जाँच एजेंसियाँ जुटी हैं। पीड़ित परिवार द्वारा नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट और सीबीआई जाँच से मना करने पर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपित पक्ष हर तरह की जाँच के लिए तैयार है।

मोदी-योगी सरकार को बदनाम करने के लिए इस्लामी मुल्कों की फंडिंग

ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस मामले में बड़े सुराग हाथ लगे हैं। इसके लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ-साथ कई इस्लामी मुल्कों ने भी फंडिंग की थी। रातोंरात ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम से एक वेबसाइट भी बना ली गई थी। इस वेबसाइट पर विरोध प्रदर्शन की आड़ में देश-प्रदेश में दंगे करने और उसके बाद उससे बचने के तौर-तरीके बताए गए थे।

अफवाहों का बाजार गर्म करने के लिए मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया का भी भरपूर उपयोग किया गया था। ख़ुफ़िया एजेंसियों के अनुसार, ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नामक वेबसाइट को एक साजिश के तहत सुर्ख़ियों में लाया गया और हजारों लोग देखते ही देखते इससे जुड़ गए। इस वेबसाइट से जुड़े लोगों में से अधिकतर की आईडी फर्जी निकली है। इस वेबसाइट के डिटेल्स खँगालने के बाद इस मामले में और भी खुलासे हो सकते हैं।

‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, जिस तरह से अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दंगे भड़क गए थे, ठीक उसी तरह से उत्तर प्रदेश को दंगों की आग में झोंकने की तैयारी थी। मुस्लिम मुल्कों और इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने हिन्दू समुदाय में फूट डालने के लिए फंडिंग की थी। ये भी सामने आया है कि हाथरस पर बनाई गई वेबसाइट के पीछे सीएए विरोधियों और देशविरोधी तत्वों का हाथ था, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बदला लेना चाहते थे।

साथ ही कोरोना वायरस की आड़ में पुलिस-प्रशासन से बचने के ‘नुस्खे’ भी इस वेबसाइट पर बताए गए थे। इस पर बताया गया था कि चेहरे पर मास्क लगा कर दंगे करने के बाद पुलिस-प्रशासन से बचा जा सकता है क्योंकि आजकल मास्क लगाना अनिवार्य भी है। साथ ही हिन्दू समुदाय में फूट डालने और उत्तर प्रदेश को नफरत की आग में झोंकने की ‘तरकीबें’ समझाई गई थीं। वेबसाइट पर कई अन्य आपत्तिजनक सामग्रियाँ भी थीं।

इस वेबसाइट पर ‘वॉलंटियर्स’ की मदद से हेट स्पीच और भड़काऊ राजनीति करने के लिए कई सामग्रियाँ तैयार की गई थीं, ताकि देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठा सकें। पूरी स्क्रिप्ट तैयार करने और इसकी फंडिंग में पीएफआई और एसडीपीआई जैसे संगठनों का नाम सामने आ रहा है। रविवार (अक्टूबर 4, 2020) की देर रात जैसे ही पुलिस का तलाशी अभियान और छापेमारी शुरू हुई, ये वेबसाइट अचानक से बंद हो गया।

इसके लिए फेक न्यूज़ की एक बड़ी खेप तैयार की गई थी। साथ ही फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी डाली गई थीं, जिन्हें वायरल कर नफरत का माहौल बनाया जा सके। दंगे भड़काने के लिए छेड़छाड़ किए हुए विजुअल्स का इस्तेमाल भी किया गया था। इसमें ये भी समझाया गया था कि पुलिसकर्मियों को कैसे निशाना बनाया जाए। इसके लिए मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया के एकाउंट्स का भी इस्तेमाल किया गया।

इससे पहले खबर आई थी कि हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश के मामले में सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे हैं। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों में आरोपी अतहर खान : ‘हमें आईएसआई का आदेश है, सीएए विरोधी प्रदर्शन को उग्र बनाना है’

                                  साभार: Times of India
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में जाँच जारी है। हर दिन भयावह खुलासे हो रहे हैं। इसी कड़ी में एक नया खुलासा अतहर खान ने किया है। दंगों के मामले में दिल्ली पुलिस ने एक चार्जशीट दायर की थी, जिसमें अतहर खान का नाम शामिल था। जाँच के दौरान अतहर खान ने कुल 3 ऐसे लोगों के नाम बताए जो खालिस्तान समर्थक हैं और पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई से लगातार संपर्क में थे।

ख़बरों के मुताबिक़ अतहर खान को दिल्ली पुलिस ने 12 जुलाई को गिरफ्तार किया था। उस पर गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत कार्रवाई की गई है। अतहर ने बताया कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों में 3 ऐसे लोग भी शामिल थे, जो खालिस्तान समर्थक हैं और आईएसआई से जुड़े हुए हैं।

हैरानी की बात तो यह है कि जो पाकिस्तान आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के कारण विश्व में अलग-थलग होने के कारण कंगाली के हाशिए पर खड़ा होने के बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। क्योकि वह जानता है कि हिन्दुस्तान में बिकाऊ लोगों की कमी नहीं, और उनको संरक्षण देने वाले कुर्सी के भूखे नेताओं की भी कमी नहीं, यानि भारत में रहकर भारत से ही गद्दारी करने वाले हर स्तर पर तैयार हैं, बस खरीदार चाहिए। जिसके लगातार प्रमाण भी सामने आ रहे हैं। 5 खातों में 1.61 करोड़ रूपए की फंडिंग, लेकिन आम नागरिक हिन्दू विरोधी दंगों के लिए CAA और NRC को ही जिम्मेदार मानता रहा, उसे नहीं मालूम कि इस आड़ में बिकाऊ अपनी तिजोरियाँ भरकर, दुश्मन के हाथों की कठपुतली बन देश में अराजकता और साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं। क्या ये बिकाऊ किसी के हमदर्द बन सकते हैं?  

                                                       साभार: Asia Times 
अतहर खान ने पुलिस को पूछताछ में बताया, “मेरे साथी रिज़वान ने फरवरी में मुझे इस बात की जानकारी दी थी। हमें खालिस्तानी आंदोलन समर्थकों बगीचा सिंह और लवप्रीत सिंह से शाहीन बाग़ में मिलना था।” अतहर ने बताया कि बगीचा सिंह और लवप्रीत सिंह आईएसआई से लगातार संपर्क में थे और उन्हें आईएसआई का समर्थन भी प्राप्त था। अतहर के अनुसार दोनों कहते थे, आईएसआई ने आदेश दिया है कि उन्हें सीएए और एनआरसी के विरोध प्रदर्शन को उग्र बनाना है और लोगों को सरकार से लड़ने में मदद करना है। 

अतहर खान ने इसके अलावा भी कई हैरान करने वाले खुलास किए। उसने बताया कि उसके साथी रिज़वान सिद्दीकी ने कहा था कि खालिस्तानी समर्थकों ने दंगे भड़काने में मदद करने का वादा किया है। इतना ही नहीं उन्होंने धरना-प्रदर्शन वाली जगह पर अपने गुट का एक आदमी भेजने की बात भी कही थी। अतहर खान ने बताया, “कई दिनों बाद प्रदर्शन वाली जगह (चाँद बाग़) पर एक जबरंग सिंह नाम का व्यक्ति आया। उसने बताया कि बगीचा सिंह ने उसे भेजा है, उसने चाँद बाग़ में सरकार और देश के विरोध में भड़काऊ भाषण दिए थे।”

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दिल्ली दंगा और CAA विरोधी उपद्रव : ताहिर और इशरत जहाँ सहित 5 के खाते में हुई थी 1.61 करोड़ रुपए की फंडिंग

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों से सम्बंधित कुछ व्हाट्सएप चैट सामने आई हैं जिनके ज़रिए खुलासा हुआ है कि दंगे पूरी तरह सुनियोजित थे।

स्वीडन के बाद नॉर्वे में इस्लामीकरण रोकने के लिए निकली रैली

नॉर्वे स्वीडन इस्लामिक भीड़ कुरान
भारत को वोट के भूखे नेताओं ने सराय बना दिया है। कट्टरपंथियों की हर नाजायज मांग के आगे घुटने टेके जाते हैं। 1972 में पाकिस्तान को तोड़ बांग्लादेश बनाए जाने के कारण मुस्लिम वोट को खिसकते देख तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने Muslim Personal Law Board बनवाकर मुस्लिम वोट कांग्रेस पाले में रखने में कामयाब हुई। फिर राजीव गाँधी ने मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में आए निर्णय को पार्लियामेंट के माध्यम से बदल दिया, जिसे शाहबानो के नाम से ज्यादा जाना जाता है। फिर 1986 में दिल्ली की एक अदालत द्वारा कुरान के विरुद्ध दिए निर्णय को भी निरस्त कर दिया। कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा इसी गंभीर समस्या पर सत्ता का दुरूपयोग कर बदलवाने में सफल होने पर कांग्रेस सुरमा भोपाली बन गयी। यानि भारत में अब तक सियासत मजहब देख कर किए जाने के ही कारण आए दिन दंगे-फसाद होते रहते हैं। 
स्वीडन में शुक्रवार (अगस्त 28, 2020) को कुरान जलाने की घटना सामने के बाद इस्लामिक भीड़ ने वहाँ जम कर हिंसा की। अल्लाह हू अकबर के नारों के साथ भीड़ ने पत्थरबाजी की। सड़कों को जाम करके आगजनी की कोशिश की गई। इसी बीच नॉर्वे में भी स्वीडन जैसी एक रैली निकाले जाने की खबर अगले ही दिन सामने आई।
जानकारी के मुताबिक, नॉर्वे की राजधानी ओसलो में शनिवार को यह रैली निकाली गई। इस रैली को Stop Islamisation of Norway (SIAN) नामक समूह ने आयोजित किया। ये रैली संसद की बिल्डिंग के पास निकाली गई। सैंकड़ों लोग इसमें शामिल हुए। यहाँ रैली का विरोध करने वाले भी आए। मगर, पुलिस ने उन्हें उस समय रोक दिया।
रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि धुर दक्षिणपंथियों का यह प्रदर्शन करीब दो घंटे तक चला। स्‍टॉप इस्‍लामाइजेशन ऑफ नार्वे के नेता लार्स थोर्सन ने वहाँ इस्‍लाम विरोधी कई बयान दिए। उन्होंने पैगंबर के बारे में बातें कहीं और संस्था के लोग नारेबाजी करते रहे।
न्यूज एजेंसी एनटीबी ने दावा किया कि इस रैली में एक SIAN की एक महिला सदस्य ने पहले पवित्र कुरान के पन्नों को फाड़ा और फिर उन पर थूक भी दिया। इसके अलावा उसने दूसरे पक्ष के प्रदर्शनकारियों से यह भी कहा, “देखों अब मैं कुरान को अपवित्र कर दूँगी।”
इसके बाद इस्‍लाम‍ समर्थकों ने पुलिस के बैरिकेडिंग को तोड़ दिया और स्‍टॉप इस्‍लामाइजेशन ऑफ नार्वे के समर्थकों से भिड़ गए। दोनों के बीच जमकर मारपीट हुई। हालाँकि, बाद में प्रशासन ने पेपर स्प्रे और टियर गैस का इस्तेमाल करके दोनों समूहों को अलग कर दिया।
पुलिस ने इस संबंध में 29 लोगों को गिरफ्तार भी किया। जबकि एक व्‍यक्ति घायल हो गया। कहा जा रहा है कि भड़काऊ बातें करने वाली महिला पर पहले ऐसे प्रोटेस्टों में हेट स्पीच के आरोप लग चुके हैं।
स्वीडन के मालमो में शुक्रवार की घटना के बाद नॉर्वे में यह मामला प्रकाश में आया था। स्वीडन में दक्षिणपंथियों द्वारा कुरान की प्रति जलाने के बाद हिंसा भड़की थी और इस्लामिक भीड़ ने काफी तबाही मचाई थी। वहीं इससे पहले नवम्बर 2019 में भी नार्वे में इस्लाम के ख़िलाफ़ हुई रैली में एक व्यक्ति ने कुरान जला दी थी, जिसके बाद हंगामा शुरू हो गया था।
पाकिस्तान ने नॉर्वे और स्वीडन में हुई इन घटनाओं की निंदा करते हुए अगस्त 30 को अपना बयान जारी किया और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मजहबी नफरत को जस्टिफाई नहीं कर सकती। इसके अलावा विदेश कार्यालय के प्रवक्ता जाहिर हाफिज चौधरी ने कहा, “इस तरह से इस्लामोफोबिक घटनाओं की बढ़ोतरी किसी भी मजहब की भावना के ख़िलाफ़ है।”
जबकि पाकिस्तान में ही हिन्दुओं के मंदिरों को तोडा जा रहा है, हिन्दुओं को जबरन इस्लाम कबूल करवाया जा रहा है, लेकिन आदत है दूसरे की फटी में तांग फंसाने की, पाकिस्तान अपनी गिरेवान में झांक कर देखे पहले। 




उन्होंने आगे कहा, “दूसरों की धार्मिक मान्यताओं के लिए सम्मान सुनिश्चित करना एक सामूहिक जिम्मेदारी है और वैश्विक शांति और समृद्धि के लिए बिल्कुल महत्वपूर्ण है।”

स्वीडन दंगे : आगजनी के बाद अब नॉर्वे की राजधानी में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने किया दंगा

नॉर्वे में मुस्लिमों का उग्र प्रदर्शन
नॉर्वे में मुस्लिमों का उग्र प्रदर्शन (साभार: Amy Mek)
उत्तरी यूरोप में स्वीडन नाम का एक देश है। एक ख़ुशनुमा देश की आपकी कल्पना में जो-जो चीजें हो सकती हैं, उनमें से ज़्यादातर गुण हैं स्वीडन में। एक अच्छी इकॉनमी।अच्छा जीवनस्तर, प्रफेशनल और पर्सनल ज़िंदगी के बीच बैलेंस, अच्छी हेल्थकेयर सुविधाएं, बुजुर्गों की देखभाल, बच्चे की पैदाइश पर मां-बाप के लिए 480 दिनों की पेड लीव, नागरिकों के लिए मुफ़्त स्कूली शिक्षा, पर्यावरण को लेकर सजगता, लैंगिक समानता, मज़बूत लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आज़ादी, स्वतंत्र मीडिया, सामाजिक जीवन में अनुशासन, पारदर्शी सिस्टम, सुरक्षित माहौल, आपसी सहमति से चीजें तय करने की संस्कृति। ऐसी ही बातों के कारण दुनिया के सबसे तरक्कीपसंद और शांति-अमन वाले देशों में गिनती होती है स्वीडन की।
Sweden: Riots break out after anti-immigration group burns Quran
एक फ़साद की कहानी. ऐसा फ़साद, जो स्वीडन से ज़्यादा भारत में रिपोर्ट हुआ। इसे लेकर स्वीडन से कहीं ज़्यादा हाय-तौबा बाहर के देशों में मची। क्या मामला है,
स्वीडन के मोल्मो शहर में हिंसा और आगजनी के अगले दिन 30 अगस्त, 2020 को मुस्लिम कट्टरपंथियों ने नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में भी इस तरह दंगे को अंजाम दिया। स्‍टॉप इस्‍लामाइजेशन ऑफ नॉर्वे (SIAN) की रैली के प्रदर्शनकारियों से मुस्लिम भीड़ के टकराव के कारण यह हालात पैदा हुए।
रिपोर्ट के अनुसार, ओस्लो में अगस्त 29 को संसद भवन के पास एक इस्लाम विरोधी रैली का आयोजन किया गया था। लेकिन, इन प्रदर्शनकारियों की भिड़ंत इस रैली के जवाब में मुसलमानों के प्रदर्शन से हो गई।




SIAN की रैली के दौरान, मुस्लिम भीड़ ओस्लो की सड़कों पर जमा होकर ड्रम बजाने, गाने और नारे लगाने लगी। मुस्लिम भीड़ में शामिल कुछ लोग पुलिस वैन को लात मारते और गाड़ी के ऊपर चढ़ते हुए भी देखे गए।
Norway Riot : Quran Pages Torn -After Sweden Riotsपॉलिटिकल पार्टी के लोगों ने क़ुरान की एक प्रति में आग लगा दी?
स्वीडन के दक्षिणी हिस्से में एक शहर है- मालमो. 28 अगस्त को मुस्लिम भीड़ द्वारा किए गए झड़प के बाद ओस्लो की सड़कों पर तनाव बढ़ गया। वहीं इस झड़प से नाराज SIAN की एक महिला सदस्य ने कुरान के पन्नों को फाड़ दिया और उन पर थूक दिया।
कथित तौर पर फैनी ब्रेटन नाम की महिला ने कुरान को फाड़ते हुए कहा, “देखो, अब मैं कुरान को अपवित्र कर रही हूँ।” इसके बाद महिला पर तुरंत मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया।
वहीं पुलिस ने स्थिति को बेकाबू होते देख मुस्लिम भीड़ और प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आँसू गैस और स्प्रे का इस्तेमाल किया। मुस्लिम भीड़ की हिंसा को मद्देनजर रखते हुए पुलिस ने पहले SIAN द्वारा आयोजित रैली को समाप्त कर उन्हें हाँ से खदेड़ा।
पुलिस ने इस मामले में बैरिकेड्स से कूदने की कोशिश करने वालों और SIAN के प्रदर्शन में बाधा डालने वाले कुछ नाबालिगों सहित लगभग 29 लोगों को गिरफ्तार किया। कथित तौर पर इन लोगों ने पत्थर और अंडे पुलिस पर फेंके थे।
Bhawna 🇮🇳 on Twitter: ".... Be it Delhi, Bangalore or Sweden Riots and  Violence has a Single Source Different Countries Same Religion.…  https://t.co/56lE0JSqcK"
नॉर्वे में विरोध-प्रदर्शन शुक्रवार को स्वीडिश शहर माल्मो में हुई एक ऐसी ही घटना के बाद में हुआ। वहाँ भी कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ ने स्वीडन के नागरिकों को निशाना बनाया था और माल्मो की सड़कों पर सरकार और वहाँ के लोगों की संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया था।
इससे पहले स्वीडन में ‘स्ट्राम कर्स’ समूह के लोगों द्वारा कुरान की कॉपी को जलाने के बाद अल्लाह हू अकबर के नारों के साथ मुस्लिम भीड़ ने वहाँ की सड़कों पर हिंसक दंगे को अंजाम दिया था। कथित तौर पर डेनमार्क एन्टी- इमीग्रेशन राजनीतिक दल के नेता रास्मुस पालुदान की गिरफ्तारी के विरोध में उनके समर्थकों ने कुरान को जला दिया था। इसके जवाब में कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने सड़कों पर उतर हिंसा की। दंगाइयों ने सड़क के किनारे खड़ी कई कारों के टायर में आग लगा दी। पुलिस पर भी पथराव किया।
15+ Trending of Sweden Riots Burning Malmo Hindi Memesकौन थे ये लोग? ख़बरों के मुताबिक, ये स्ट्राम कुर्स नाम की एक पॉलिटिकल पार्टी के लोग थे.
अब यहां एक ट्विस्ट है. ये ट्विस्ट समझाने के लिए हमें आपको स्वीडन के पड़ोसी देश डेनमार्क लेकर चलना होगा। क्यों? क्योंकि स्ट्राम कुर्स स्वीडन की पार्टी नहीं है। वो डेनमार्क की पॉलिटिकल पार्टी है। इस पार्टी के मुखिया का नाम है रासमुस पालुदान। पालुदान की पॉलिटिक्स का मूल है- इस्लाम और इमिग्रेंट्स का कट्टर विरोध। रासमुस और उनकी पार्टी मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलाती है। ये लोग मुसलमानों को यूरोप से निकाल फेंकने की वकालत करते हैं। सोशल मीडिया पर भड़काऊ विडियो डालते हैं। मुस्लिमों के नरसंहार की अपील करते हैं। इसी मुस्लिम विरोधी अजेंडे पर चलते हुए स्ट्राम कुर्स ने जून 2019 के डेनमार्क चुनाव में भी हिस्सा लिया। मगर इन्हें कुछ गिने-चुने ही वोट मिले।
बाद में पता चला कि चुनाव में हिस्सा लेने के लिए इन्होंने धोखाधड़ी की थी। इस आधार पर स्ट्रास कुर्स के ऊपर तात्कालिक पाबंदी लगा दी गई। इस पाबंदी से बचने के लिए स्ट्रास कुर्स ने अपना नाम बदलकर ‘हार्ड लाइन’ कर लिया और अपना मुस्लिम-विरोधी अजेंडा चलाते रहे।
इस ऐंटी-इस्लाम पॉलिटिक्स का आधार क्या है?
ये आधार जुड़ा है मुस्लिम शरणार्थियों के साथ। इन शरणार्थियों की कहानी जुड़ी है मिडिलईस्ट से। 2011-12 में मिडिलईस्ट के भीतर बड़े स्तर पर हिंसा शुरू हुई। पहले अरब स्प्रिंग और फिर आतंकवाद के कारण यहां ख़ूब मारकाट मची। जान बचाने के लिए यहां के लोग विदेश पलायन करने लगे। शरणार्थियों का एक बड़ा हिस्सा यूरोप भी पहुंचा। इन्हें पनाह देने वालों में जर्मनी और स्वीडन जैसे देश आगे थे।
शरणार्थियों के साथ मानवीयता दिखाने के लिए इन देशों की काफी तारीफ़ हुई। मगर इनके यहां एक छोटा धड़ा इन शरणार्थियों से खुश नहीं था। ये धड़ा मुस्लिमों को शंका की नज़र से देखता था। इनका मानना था कि मुस्लिम कट्टर होते हैं। अपने तौर-तरीकों के प्रति लचीले नहीं होते। ये मुस्लिम उनके लिबरल और सेक्युलर सिस्टम का इस्लामीकरण कर देंगे। इनके कारण हिंसा, अव्यवस्था और कट्टरता बढ़ जाएगी। मुसलमानों से जुड़ी इस शंका को भड़काने का काम किया दक्षिणपंथी पॉलिटिक्स ने। यूरोप के कई हिस्सों में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए सपोर्ट बढ़ने लगा। रासमुस पालुदान और उसकी स्ट्राम कुर्स पार्टी इसी ऐंटी-मुस्लिम राजनीति के उभार की एक मिसाल हैं ।
यूरोप की तरफ से स्वीडन में घुसने का एंट्री पॉइंट है मालमो
ये सारा बैकग्राउंड बताने के बाद अब दोबारा चलते हैं मालमो शहर। ये शहर स्वीडन और डेनमार्क की सीमा के पास बसा है। आप 40 मिनट में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन से मालमो पहुंच सकते हैं। जैसे हमारे यहां दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा और गुड़गांव में आना-जाना होता है, वैसा ही मामला यहां भी है। दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे के शहरों में काम करते हैं।

मालमो शहर में एक और ख़ास बात है, यूरोप की तरफ से स्वीडन में घुसने का एंट्री पॉइंट है। फिर चाहे आप रेल से आएं या सड़क के रास्ते। आप पर्यटक हों या फिर इमिग्रेंट, इसी रास्ते से स्वीडन में दाखिल होंगे। ऐसे में स्वीडन आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों की एक अच्छी-खासी तादाद रहती है यहां। इन इमिग्रेंट्स की मौजूदगी के कारण ये शहर ऐंटी-मुस्लिम पॉलिटिक्स के फ़ोकस में रहता है। यहां पर हुई छोटी से छोटी घटना, जिसका लिंक मुस्लिम इमिग्रेंट समुदाय से हो, मिसाल बना दी जाती है।
मालमो शहर की ये डेमोग्रफी। उसका भूगोल। डेनमार्क के साथ उसके नज़दीकी सामाजिक-आर्थिक रिश्ते।इन वजहों से मालमो में होने वाली घटनाओं के ज़्यादा हाइलाइट होने की संभावना रहती है। हाइलाइट होने की इसी उम्मीद के कारण  स्ट्राम कुर्स ने मालमो शहर पर फोकस किया। सोचा, यहां ऐंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट भड़काकर डेनमार्क में फ़ायदा कैश करेंगे।
इसी पृष्ठभूमि में आई 25 अगस्त की तारीख़
इस रोज़ रासमुस ने स्वीडिश अथॉरिटीज़ से एक रैली की परमिशन मांगी। रासमुस ने अपने आवेदन में लिखा कि वो 28 अगस्त को मालमो की एक मस्जिद के बाहर एक रैली करना चाहते हैं। इस रैली में रासमुस जो भाषण देने वाले था, उसका मुद्दा था- नॉर्डिक देशों में हो रहा इस्लामीकरण। नॉर्डिक देश माने डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड और आइसलैंड। स्वीडिश पुलिस की वेबसाइट पर इस आवेदन से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है। इसमें लिखा है-
रासमुस ने अपने आवेदन में मस्जिद के बाहर खड़े होकर इस्लाम के खिलाफ प्रदर्शन करने की इजाज़त मांगी
इस आवेदन पर 26 अगस्त को स्वीडिश पुलिस का जवाब आया। उन्होंने प्रदर्शन की इजाज़त देने से इनकार कर दिया। पुलिस का कहना था कि इस सभा से पब्लिक ऑर्डर प्रभावित हो सकता है। 27 अगस्त को रासमुस की पार्टी स्ट्राम कुर्स ने एक और आवेदन दिया। मगर पुलिस ने ये आवेदन भी खारिज़ कर दिया।स्वीडन की अडमिनिस्ट्रेटिव कोर्ट ने भी पुलिस के इस फैसले को सही बताया।
रासमुस के स्वीडन आने पर दो साल की पाबंदी भी लगा दी गई
आवेदन खारिज़ किए जाने के बाद भी रैली के आयोजक अड़े रहे। 28 अगस्त को रैली करने की मंशा से रासमुस डेनमार्क से स्वीडन आने के लिए निकले। स्वीडिश अथॉरिटीज़ ने उन्हें सीमा पर ही रोक दिया। ख़बरों के मुताबिक, स्वीडिश पुलिस को भनक लगी थी कि रासमोस और उनके समर्थक क़ुरान जलाने की प्लानिंग कर रहे हैं। ऐसा होता, तो तनाव भड़क सकता था. इसीलिए स्वीडन ने रासमुस को बॉर्डर से ही लौटा दिया।रासमुस के विवादित रेकॉर्ड को देखते हुए उनके स्वीडन आने पर दो साल की पाबंदी भी लगा दी गई।
रासमुस को सीमा से ही लौटाए जाने पर मालमो में उनके समर्थक बौखला गए। इनमें से कुछ लोग पुलिस की नज़रों से बचकर एक सुनसान इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंचे। यहां उन्होंने क़ुरान की एक प्रति में आग लगाई।फिर उसका विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। ये लोग यहीं नहीं रुके. रैली की इजाज़त नहीं होने के बावजूद इन्होंने मालमो में एक सभा की। वहां क़ुरान की एक प्रति को पैर से मारकर ज़मीन पर फेंका। इस हरकत का भी विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला गया।
Malmo Riots
मुस्लिम इमिग्रेंट्स ने प्रशासन के साथ मिलकर सफ़ाई करवाई
जब मालमो के मुस्लिम समुदाय में क़ुरान के अपमान की बात फैली, तो उनमें नाराज़गी पैदा हुई। कई लोग प्रोटेस्ट के लिए जमा होने लगे। शाम साढ़े सात बजे ऐसे ही एक प्रोटेस्ट ने दंगे का रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों ने पटाखे जलाए. टायरों में आग लगाई।पुलिस के ऊपर भी चीजें फेंकी। रात पौने नौ बजे तक भीड़ बड़ी हो गई। इस भीड़ ने कई कारों को फूंक दिया। मगर स्वीडिश पुलिस के मुताबिक, ये लोग क़ुरान के अपमान से भड़ककर उत्पात करने वालों के ही साथ थे, ये कन्फर्म नहीं है।
स्वीडिश पुलिस वेबसाइट के मुताबिक, रात 3 बजे तक ये सारा उत्पात ख़त्म हो गया। जिन इलाकों में फ़साद हुआ था, वहां रहने वाले मुस्लिम इमिग्रेंट्स घरों से बाहर निकले। उन्होंने प्रशासन के साथ मिलकर सफ़ाई करवाई।
इस घटना पर स्वीडन में क्या हुआ?
इसका जवाब है, कुछ भी बहुत बड़ा नहीं। यहां तक कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी दंगाइयों को सपोर्ट नहीं किया। उन्होंने दंगा-फ़साद करने वालों की मजम्मत की। कहा कि उपद्रव करने वाले अराजक तत्व हैं।
ये तो बात हुई मुस्लिम समुदाय की. बाकी पब्लिक की क्या प्रतिक्रिया रही इस पर? बहुसंख्यक स्वीडिश जनता क़ुरान जलाए जाने को फ़साद भड़कने की वजह मान रही है। लोगों का कहना है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने तनाव भड़काने के लिए क़ुरान जलाया। इसके जवाब में दूसरे समुदाय के कुछ उपद्रवी ऐलिमेंट्स ने दंगा-फ़साद किया। स्वीडिश जनता का कहना है कि ये बेवकूफ़ाना हरक़ते हैं।




जनता के अलावा स्वीडन के नेताओं ने भी जिम्मेदारी दिखाई
यहां सत्ता में है सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी। उसके किसी नेता ने इस घटना पर बयान नहीं दिया। बयान न देने का मतलब ये नहीं कि उन्हें देश की कोई परवाह नहीं. बयान न देने का कारण स्वीडन की संस्कृति है। यहां नेता ऐसे मामलों में जिम्मेदारी दिखाते हैं। उन्हें लगता है कि कोई बयान दिया और मीडिया ने उन्हें ग़लत कोट कर दिया, तो कहीं हालात और न बिगड़ जाएं। ऐसे में नेता ग़ैर-ज़रूरी टिप्पणी से बचते हैं और संबंधित विभाग को अपना काम करने देते हैं।
स्वीडिश पुलिस ने इस मामले में दोनों तरफ के लोगों को अरेस्ट किया है। धार्मिक तनाव भड़काने वाले और जवाबी प्रतिक्रिया में हिंसा करने वाले, दोनों पर ही कार्रवाई हुई है। वहां इसे लॉ ऐंड ऑर्डर सिचुएशन की तरह डील किया गया है। इसके अलावा इस मामले में कोई बड़ा अपडेट नहीं है। यहां तक कि स्वीडिश मीडिया ने भी 24 घंटे बाद इस मामले की रिपोर्टिंग बंद कर दी। अब वो कोरोना और इकॉनमी जैसे मुद्दों पर बात कर रहे हैं।
स्वीडन में भले ये मामला बहुत न उछला हो, मगर बाहर के कई देशों में ये काफी रिपोर्ट हुआ। हमारे यहां भी सोशल मीडिया पर इस दंगे पर ख़ूब चीजें लिखी गईं। ज़्यादातर पोस्ट्स में इस बहाने समूचे मुस्लिम वर्ग को टारगेट किया जा रहा है। ऐसे में ज़रूरी बात ध्यान रखनी चाहिए। रासमुस और उनके जैसे दक्षिणपंथी नेता केवल मुस्लिम-विरोधी नहीं हैं। उन्हें किसी भी विदेशी के अपने यहां आने से दिक्कत है। उनका मानना है कि उनके देश में बस उनकी ही नस्ल के लोग रहें। आज मुस्लिम इमिग्रेंट ज़्यादा हैं, तो ये क़ुरान जला रहे हैं।अगर ये अपने अजेंडे में कामयाब रहे, तो केवल मुस्लिम विरोध तक नहीं रहेंगे। उनका फ़ोकस बाकी धर्मों के इमिग्रेंट्स पर भी शिफ़्ट हो सकता है। ऐसा हुआ, तो वहां रहने वाले भारतीय समुदाय के लोग भी निशाना बन सकते हैं।(एजेंसीज इनपुट्स सहित)