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उत्तर प्रदेश : ‘आज तक’ ने हाथरस मामले में किया HC के आदेश का उलंघन

न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैण्डर्ड अथॉरिटी (NBSA) ने ‘इंडिया टुडे मीडिया नेटवर्क’ के समाचार चैनल ‘आज तक’ को नोटिस भेजा है। ये नोटिस इलाहबाद हाईकोर्ट के आदेश के उल्लंघन को लेकर भेजा गया, जिसमें उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना की जाँच को लेकर गोपनीयता बरतने की बात कही गई थी। इस मामले में अब समाचार चैनल ‘आज तक’ के खिलाफ कार्रवाई होगी। ये नोटिस बृहस्पतिवार (नवंबर 5, 2020) को भेजा गया। ज्ञात हो कि यूपी के हाथरस में एक अनुसूचित जाति की युवती की मौत को विपक्षी दलों ने राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने NBSA को निर्देश दिए हैं कि वो ‘आज तक’ चैनल के खिलाफ उचित कार्रवाई करे। कॉन्ग्रेस पार्टी के समर्थक साकेत गोखले द्वारा दायर की गई शिकायत के बाद ये आदेश दिया गया। गोखले ने उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल मुख्य सचिव को पत्र लिख कर आरोप लगाया था कि ‘आज तक’ ने हाथरस मामले में चल रही सीबीआई जाँच को लेकर खबर चलाई, जबकि इलाहबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में गोपनीयता बरतने के स्पष्ट आदेश दिए थे।

                                                  केंद्रीय मंत्रालय ने NBSA को लिखा पत्र (फोटो साभार: LiveLaw)
समाचार चैनल ‘आज तक’ ने सीबीआई द्वारा मृतका के परिवार से पूछे गए प्रश्नों को लेकर खबर चलाई थी, जिसे साकेत गोखले ने इलाहबाद हाईकोर्ट के आदेश के उलंघन का मामला बताया। गोखले ने इसे ‘शर्मनाक’ करार दिया। अब केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने NBSA से कहा है कि वो 15 दिनों के भीतर इस मामले में एक्शन ले। ‘इंडिया टुडे मीडिया नेटवर्क’ इससे पहले भी कई नियमों के उल्लंघन के मामलों में एजेंसियों की जाँच का सामना कर रहा है।

इससे पहले, न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (NBSA) ने इंडिया टुडे समूह के हिंदी भाषा समाचार चैनल ‘आज तक’, ज़ी न्यूज़, न्यूज़ 24 और इंडिया टीवी को अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की असंवेदनशील और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए माफी माँगने का आदेश दिया था। ब्रॉडकास्टिंग अथॉरिटी ने ‘आज तक’ को 27 अक्टूबर को रात 8 बजे अपने चैनल पर ‘लाइव’ माफी माँगने का आदेश दिया था। हिंदी समाचार चैनल ने 28 अक्टूबर को रात 9 बजे के बाद अपनी माफी को प्रसारित किया।

जनेऊधारी राहुल गांधी वायनाड जाते ही जेल में बंद जिहादी सिद्दीकी के परिवार के साथ

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस की चाल, चरित्र और चेहरा सब देश विरोधी है। चाहे चीन से गुप्त समझौते करना हो, या भारत को बदनाम कर पाकिस्तान की तारीफ करना हो, या फिर देश के टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में खड़ा होना हो। कांग्रेस हमेशा देश के खिलाफ काम करती रहती है। 
देश के आम लोगों में धारणा बन चुकी है कि कांग्रेस का हाथ हमेशा दंगाइयों, आतंकियों और जिहादियों के साथ रहता है। लोगों की इस धारणा की फिर पुष्टि हुई है। अपने संसदीय क्षेत्र केरल के वायनाड जाते ही जनेऊधारी राहुल गांधी के रंग-ढंग बदल गए। उन्होंने दंगा फैलाने के लिए कुख्यात पीएफआई के सक्रिय सदस्य और देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार सिद्दीकी कप्पन के परिवार से मुलाकात की।

सभी सियासतबाज जानते हैं कि पीएफआई हिन्दू विरोधी होने के साथ-साथ देश विरोधी भी है, फिर इसे आज तक बैन नहीं किया गया, क्यों? क्या संविधान की शपथ लेकर संविधान को ढेंगा दिखाने वालों को सिर पर बैठाने से ही इन राजनीतिज्ञों की नहीं बल्कि कहना चाहिए सियासतबाजों की शपथ पूरी होती है? जिन्होंने कहीं से सेकुलरिज्म शब्द तो सिख लिया, परन्तु सेकुलरिज्म का भावार्थ नहीं सीखा। 80 के दशक में प्रदर्शित हुई चर्चित फिल्म "गोपी" का गीत "धर्म भी होगा, कर्म भी होगा, परन्तु शर्म नहीं होगी..." शत-प्रतिशत चरितार्थ हो रहा है। जिस तरह अदालतों में भागवत गीता, कुरान, गुरुग्रंथ और बाइबिल पर हाथ रख सच बोलने की शपथ लेते हैं, लेकिन बोलते झूठ हैं, यदि धर्म का आदर किया जाए, अदालतों में 80 प्रतिशत केस अपने-आप ही स्वाह हो जाएंगे, न्यायाधीश झूठी शपथ लेने वाले के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करती, ठीक उसी तरह संविधान की शपथ लेकर संविधान की शपथ को स्वयं ही झुठला देते हैं, और जनता भी उनके प्रलोभनों की लॉलीपॉप के लालच में उन्हें ही देशभक्त और जनहितैषी समझ लेते हैं। 

मलप्पुरम में एक प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक में राहुल गांधी ने सिद्दीकी कप्पन की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया और उसके परिवार को हर तरह से मदद करने का भरोसा दिया। राहुल गांधी ने कहा कि सिद्दीकी की गिरफ्तारी एक गंभीर मामला है। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को पूरी गंभीरता के साथ उठाएगी।

राहुल गांधी के सिद्दीकी कप्पन के परिवार से मुलाकात पर सोशल मीडिया में लोगोंं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। लोगों ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस हमेंशा देश विरोधी ताकतों को संरक्षण देने का काम करती है। लोगों ने ट्वीट के माध्यम से कांग्रेस के नापाक गठजोड़ पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कांग्रेस के पुराने कारनामोंं की भी याद दिलाई। 

उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाथरस में सांप्रदायिक और जातीय दंगा फैलाने की साजिश में शामिल होने के आरोप में मथुरा से पीएफआई के जिन चार सदस्यों को गिरफ्तार किया था, उसमें केरल के मलप्पुरम के रहने वाला तथाकथित पत्रकार सिद्दीकी कप्पन भी शामिल था। इनके पास से हाथरस में दंगा फैलाने के लिए बनाई गई वेबसाइट जस्टिस फॉर हाथरस से जुड़े होने के भी सुराग मिले। इनके पास से भड़काऊ और आपत्तिजनक कंटेंट भी बरामद किए गए। इसके बाद पुलिस ने इनके खिलाफ देशद्रोह समेत 20 अलग अलग धाराओं में केस दर्ज किया।


हाथरस केस में PFI के बाद अब नक्सल कनेक्शन, हाथरस ‘भाभी’ पर चला सरकारी डंडा

                                                                               हाथरस ‘भाभी’
हाथरस गैंगरेप केस में एक बड़ा खुलासा हुआ है। यहां पीएफआइ के बाद अब नक्सल कनेक्शन भी सामने आया है। हाथरस के बूलगढ़ी गांव की मृत दलित लड़की के घर पर 16 सितंबर के बाद से ही सक्रिय फर्जी ‘भाभी’ अब गायब हैं। फर्जी रिश्तेदार बन घर में रहकर पीड़ित परिवार को भड़काने के साथ मीडिया में काफी बयान देने वाली भाभी अब सीन से गायब हैं। हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पूरे देश का माहौल खराब करने वाली इस महिला का नक्सल कनेक्शन है। देश को दलित राजनीति की आग में झौंकने के लिए यह महिला गांव में दो दिन बाद से ही सक्रिय हो गई थी। बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा इस महिला के साथ गले मिलकर रोई भी थी।

नक्सली महिला भाभी पहचान छिपाने के लिए हमेशा घूंघट में रहती थी। इस फेक भाभी ने दलित-सवर्ण के बीच संघर्ष के लिए उसकाने के साथ मीडिया में बार-बार इंटरव्यू देकर लोगों को भड़काने का भी काम किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जिस महिला ने खुद को हाथरस मृतका की भाभी बताया था, उसके विरुद्ध मामला दर्ज किया जा चुका है। इसके अलावा नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर नोटिस भी भेज चुका है, जहाँ वह कार्यरत हैं। मेडिकल कॉलेज के डीन ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि उन्होंने महिला (भाभी) को नोटिस जारी कर दिया है। 

मेडिकल कॉलेज के डीन पीके कसर ने बताया कि फॉरेंसिक विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉक्टर राजकुमारी बंसल ने 4 अक्टूबर से 6 अक्टूबर तक का अवकाश लिया था। इस दौरान वह बिना कॉलेज प्रशासन को सूचित किए हाथरस मामले में मृतका के परिजनों से मिलने गई थीं। इसके बाद डीन ने बताया कि वह इस तरह के मामलों में होने वाले प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बन सकती हैं क्योंकि वह सरकारी कर्मचारी हैं। 

उनका कहना था, “हमें इस बात की जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स के ज़रिए मिली कि राजकुमार बंसल हाथरस घटनाक्रम के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुई थीं। फ़िलहाल उन्हें हमारी तरफ से नोटिस जारी किया जा चुका है और उनसे एक हफ्ते के भीतर जवाब भी माँगा गया है। राजकुमारी बंसल के जवाब के आधार पर हम इस मामले पर आगे की कार्रवाई करेंगे।”     

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राजकुमारी बंसल ने दावा किया था कि वह मेडिकल रिपोर्ट की जाँच करने के लिए हाथरस गई थी क्योंकि वह फॉरेंसिक एक्सपर्ट हैं। इसके अलावा उनका ऐसा भी कहना था कि वह मानवता के नाते मृतका के परिवार वालों से मिलने गई थी। 

राजकुमारी बंसल ने अपने बयान में कहा था कि हाथरस घटना की जानकारी मिलने के बाद उन्हें दो दिन तक नींद नहीं आई थी। वह परिजनों को सहानुभूति देने और संवेदना व्यक्त करने के लिए हाथरस गई थी और उनके निवेदन पर रुकने का फैसला किया। उनके रुकने के दौरान भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर भी परिजनों से मिलने आए थे। तभी कई मीडिया वालों ने इस मुद्दे पर उसके वीडियो रिकॉर्ड किए थे, जो फ़िलहाल सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं। 

इसके बाद राजकुमारी बंसल ने अपने बयान में कहा, “बहुत से लोग मुझे माओवादी बुला रहे हैं, मेरे ऊपर झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं। जितने भी लोग मेरी छवि को बदनाम करने के लिए मेरे वीडियो वायरल कर रहे हैं, मुझ पर झूठे आरोप लगा रहे हैं… मैं उन सभी के विरुद्ध मामला दर्ज कराऊँगी।”

19 साल की लड़की का गला दबाया गया था और 29 सितंबर को गम्भीर चोटों और गहरे घावों की वजह से उसकी मृत्यु हो गई थी। इसके बाद से ही हाथरस मामला मीडिया और राजनेताओं के लिए प्रोपेगेंडा का माध्यम बन गया है। ख़बरों के अनुसार नक्सलवादियों से जुड़ी महिला ने खुद को लड़की की भाभी बताया था। वह महिला (भाभी) लड़की के परिजनों के घर रह रही थी और उस पर यह भी आरोप है कि वह उन्हें सिखा रही थी कि मीडिया के सामने क्या और कैसे बोलना है।  

हाथरस रेप को लेकर राज्य में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए विदेश से 100 करोड़ रुपये की फंडिग के साथ सिर्फ दो दिन के लिए बनी ‘जस्टिसफॉरहाथरस’ नाम की वेबसाइट की संदिग्ध भूमिका के बाद अब फेक भाभी… यह सब किसी बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं है? वैसे हाथरस रेप मामले की फोरेंसिक रिपोर्ट्स में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई है। इस मामले में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार SIT का गठन कर चुकी है। एसआईटी मामले की जांच कर रही है। एसआईटी ने इस नक्सली फेक भाभी को गिरफ्तार करने के लिए तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। इस नक्सली महिला के बारे में खुलासा होने पर सोशल मीडिया पर यूजर्स कांग्रेस और प्रियंका गांधी वाड्रा को निशाना बना रहे हैं। ट्विटर पर #FakeBhabhi और #FakeNaxalBhabhi टॉप ट्रेंड कर रहा है।

पीड़िता की भाभी बनकर रह रही थी प्रियंका वाड्रा से गले मिलने वाली संदिग्ध महिला

ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि "क्या प्रियंका वाड्रा और राहुल गाँधी जो बंद कमरे में पीड़ित परिवार से मिलना, षड़यंत्र की पटकथा पूर्व नियोजित थी?" दूसरे, यह कि योगी पुलिस पीड़ित परिवार से सहानुभूति दिखाने की बजाए पूछे कि "किस कारण से किसी अपरिजित को घर में रखा? क्यों किसी प्रलोभन के लालच में प्रदेश का माहौल ख़राब करने का प्रयास किया?" इन संदिग्ध परिस्थितियों में इस घटना की गंभीर ही नहीं अति गंभीरता से जाँच जरुरी हो जाती है।  

राजस्थान: पुजारी ने मरने से पहले बताया जलाने वाले का नाम, फिर भी आत्मदाह बताती रही पुलिस

         राजस्थान में पुजारी बाबूलाल वैष्णव की हत्या के बाद भाजपा सांसद किरोड़ीलाल मीणा ने गाँव में दिया धरना
भाजपा शासित उत्तर प्रदेश के हाथरस को आसमान को सिर उठाने वाले कांग्रेस शासित राजस्थान में हो रहे बलात्कार और हत्याओं पर क्यों खामोश हैं? आखिर ये दोगली सियासत क्यों? क्यों इस बेसिर-पैर की सियासत से जनता को भटकाया जा रहा है? महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की हत्या पर भी ये ही ढोंगी समाज सेवक यानि सियासतखोर खामोश थे। इन कांग्रेस शासित राज्यों में हो रहे बलात्कार और हत्याएं न राहुल गाँधी को दिखाई देती हैं, न प्रियंका वाड्रा, न आम आदमी पार्टी को और न ही किसी भीम आर्मी को। जो पार्टी देख पार्टी देख न्याय की बात करे, वह जनहितैषी नहीं, बल्कि अराजक पार्टी है, जिसका प्रमाण सबके सम्मुख है। 

राजस्थान के करौली स्थित बूकना गाँव में जमीन विवाद को लेकर एक पुजारी को ज़िंदा जला कर मार डाला गया था। अब राधा-गोविन्द मंदिर के मृतक पुजारी बाबूलाल वैष्णव के परिजनों ने विरोध में शव का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि जब तक राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार उनकी माँगें नहीं मानती, तब तक अंतिम संस्कार नहीं होगा। राजस्थान में पुजारी बाबूलाल की हत्या के मामले में प्रमुख अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया है।

इस घटना को लेकर बीजेपी की राज्य यूनिट भी पद्रेश सरकार पर हमलावर है। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी के सांसद किरोड़ीलाल मीणा ने बूकना पहुँच कर गाँव के सैकड़ों लोगों के साथ धरना दिया और राज्य की बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था को लेकर अशोक गहलोत सरकार पर निशाना साधा। मृतक पुजारी के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा 6 बेटियाँ और एक बेटा है।

जिंदा जलाकर मार डाले गए पुजारी के परिजनों का अंतिम संस्कार से इनकार

मृतक पुजारी बाबूलाल की पत्नी विमला देवी ने राजस्थान सरकार से माँग की है कि सभी अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा दी जाए, तभी इस मामले में न्याय हो पाएगा। परिजनों के एक रिश्तेदार ने परिवार के 5लिए 0 लाख रुपए और साथ ही बेटे के लिए सरकारी नौकरी की माँग की है। पुजारी बाबूलाल वैष्णव की हत्या के बाद राजस्थान स्थित करौली के बूकना गाँव पहुँचे सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने कहा:

“मैं सपोटरा के बूकना गाँव में हूँ। गाँव के सभी जातियों के पंच-पटेलों के साथ वार्तानुसार यह निर्णय हुआ है कि मृतक परिवार को हर स्थिति में न्याय मिलना चाहिए। अपराधियों को सख्त सजा होनी चाहिए। मैंने मृतक पुजारी बाबूलाल वैष्णव के परिवार की एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता की है। जिम्मेदार लोगों को पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहना चाहिए, जिससे समाज में ऐसे कुकृत्यों की पुनरावृत्ति नहीं हो। मैं बूकना में मृतक बाबूलाल वैष्णव को न्याय दिलाने के लिए उनके परिवार व पंच-पटेलों के साथ धरने पर बैठ गया हूँ। अशोक गहलोत सरकार अपनी नींद तोड़े और न्याय करे।”

Rajasthan: Family members of priest Babulal, who was allegedly burnt alive by land encroachers in Karauli’s Bukna village, refuse to perform last rites of his body till all their demands are met by state govt.

Main accused has been arrested since priest succumbed to his injuries pic.twitter.com/1hjPqxMCCQ

— ANI (@ANI) October 10, 2020

मौत से पहले बयान देते हुए पुजारी बाबूलाल ने बताया था कि मंदिर की जमीन पर कब्ज़ा करने की इच्छा रखने वाले अतिक्रमणकारियों ने पेट्रोल डाल कर उन्हें जला दिया। ये घटना बुधवार (अक्टूबर 7, 2020) की है। इस मामले में कैलाश, शंकर, रामलखन और नमो को आरोपित बनाया गया है, जो मंदिर की जमीन पर छप्पर डाल रहे थे। सपोटरा अस्पताल से जयपुर रेफर किए गए पुजारी की अक्टूबर 9 की शाम मौत हो गई।


मंदिर को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा था और इस मामले में हुई पंचायत में पंच पटेलों ने आरोपितों को अतिक्रमण न करने को कहा था। साथ ही मंदिर की भूमि से कब्ज़ा हटाने का भी आदेश दिया था। हालाँकि, आरोपितों ने बात नहीं मानी और कब्ज़ा करना जारी रखा। पुजारी ने जब रोका तो उनके ऊपर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दिया गया। ‘परशुराम सेना’ ने भी इस घटना पर आक्रोश जताया है।

7 सितम्बर 2020 को हुई पंचायत के बाद 100 ग्रामीणों ने पुजारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इससे सम्बंधित दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन आरोपितों ने उनकी एक न सुनी। भाजपा ने माँग की है कि सरकार को परिजनों की सहायता करनी चाहिए। साथ ही राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को भी यहाँ आकर पीड़ित परिवार से मिलने को कहा है। इस मामले में 5 आरोपित अभी भी फरार चल रहे हैं।

स्थानीय लोगों ने ऑपइंडिया को बताया था कि इस इलाके में भीम आर्मी की हिन्दू-घृणा की मानसिकता को खूब फैलाया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप यह घटना हुई है। स्थानीय हिंदूवादी संगठन के लोगों ने ऑपइंडिया को बताया कि पंडित जी राधा-गोविन्द मंदिर की सेवा करते थे। पुजारी को मंदिर के नाम पर जमीन दान की गई थी और इसी जमीन पर 50 साल के पुजारी अपना घर बना रहे थे। भू-माफिया इस जमीन का अतिक्रमण करना चाहते थे।

पुजारी ने मरने से पहले बताया जलाने वाले का नाम, फिर भी आत्मदाह बताती रही पुलिस

राजस्थान के करौली जिला स्थित सपोटरा तहसील के बूकना गाँव में पुजारी बाबूलाल वैष्णव की मौत के मामले ने प्रदेश में हलचल मचा दी है। मामला वैसे तो सिर्फ एक जमीन से जुड़े विवाद का है, लेकिन यह मामला जिस जातीय विवाद की ओर जाता दिख रहा है, उसे रोका नहीं गया तो बात बिगड़ सकती है। जातीय विद्वेष की आग कई जगह फैलाने की कोशिशें चल रही है। ऐसे में यह मामला बाहरी तत्वों के हाथ में ना जाए- इसकी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और पुलिस की ही नहीं, वहाँ के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भी है।

हालाँकि पूरे मामले में पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, प्रशासन इस मामले को शुरुआत में ‘आत्मदाह’ बताती रही। पुजारी ने मौत से पहले ही आरोपित कैलाश का नाम ले लिया था, बावजूद इसके उसे गिरफ्तार करने में पुलिस ने 24 घंटे का समय लगा दिया। लोगों की माँग है कि इस मामले के जाँच अधिकारी को भी हटाया जाए। शाम 6 बजे पुजारी का शव गाँव पहुँचा, जिसके बाद पीड़ित परिजनों ने दाह संस्कार से इनकार कर दिया।

करौली की सपोटरा तहसील का बूकना गाँव करीब 5000 की आबादी वाला है। यहाँ एक राधाकृष्ण का मंदिर है, जो करीब 200 साल पुराना बताया जाता है। गाँव में 70 प्रतिशत लोग मीणा हैं। गाँव की पंचायत में भी इस इस समुदाय के कई लोग शामिल हैं। बूकना गाँव के इस मंदिर की सेवा पूजा काफी वर्षों से बाबूलाल वैष्णव ही करते आ रहे थे। यह मंदिर इस गाँव का ही नहीं, बल्कि आसपास के कई गाँवों की आस्था का केन्द्र है।

बूकना के पुजारी की गुजर-बसर के लिए गाँव के ही लोगों ने कुछ जमीन मंदिर के नाम कर रखी थी। इसी जमीन से सटती हुई कुछ जमीन और है, जो कुछ समय पहले तक एक पहाड़ी जैसी थी। मंदिर के पुजारी को वह जमीन उपयोगी लगी तो उन्होंने उसे समतल करवा लिया और गाँव की पंचायत बुला कर यह जमीन भी मंदिर के नाम कराने की सहमति ले ली। गाँव की पंचायत ने एकमत हो कर यह जमीन मंदिर के नाम करवा देने की सहमति दे दी।

पंचायत में कैलाश मीणा के परिवार ने इस फैसले का विरोध किया, लेकिन पंचों ने पुजारी के पक्ष में फैसला दिया। सात अक्टूबर को कैलाश मीणा और उसके परिवार के कुछ लोग जब इस समतल की हुई जमीन पर कब्जा करने पहुँचे तो पुजारी ने इसका विरोध किया और कहा कि पंचायत जमीन मंदिर को दे चुकी है तो अब तुम कब्जा क्यों कर रहे हो। इस बात को लेकर दोनो के बीच विवाद हुआ और गर्मागर्मी में ही कैलाश मीणा और इसके साथियों ने बाबूलाल वैष्णव पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी।

पुजारी के परिवार वालों और गाँव वालो ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया, जहाँ से उन्हें जयपुर रेफर कर दिया गया और शुक्रवार यानी नौ अक्टूबर को उपचार के दौरान पुजारी की मौत हो गई। इस घटना के एक तथ्य में असमंजस है कि पुजारी ने स्वयं आत्मदाह किया अथवा कैलाश और उसके समर्थकों ने जलाया या कैलाश मीणा जो छप्पर बना रहे थे, बाबूलाल वैष्णव उसको आग लगाने गए और उसमें झुलस गए ।

गाँव से जुड़े लोग बताते हैं कि यह घटना सिर्फ एक जमीनी विवाद है और बिल्कुल अचानक हुई है। आरोपित कैलाश का परिवार भी गाँव का दबंग या रसूखदार परिवार नहीं है, बल्कि एक सामान्य परिवार है। परिवार या आरोपित का कोई अपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं बताया जाता है। आरोपित कैलाश मीणा पुलिस की गिरफ्त में आ भी गया है और जिले के पुलिस अधीक्षक मृदुल कच्छावा का कहना है कि पहले मामला धारा 307 में दर्ज किया गया था, लेकिन पीड़ित की मृत्यु के बाद धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया गया है। बाकी आरोपितों को पकड़ने के लिए पुलिस की छह टीमें लगाई गई हैं और वे भी जल्द ही पकड़ में आ जाएँगे।

स्थानीय विधायक रमेश मीणा ने भी इस घटना की निंदा की है और पीड़ित परिवार को सहायता देने की बात कही है। ऐसे में पुलिस और प्रशासन ही नहीं, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधियो और स्वयं ग्रामीणों का इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि यह मामला ग्राम स्तर पर ही निपट जाए। मामले की निष्पक्ष जाँच हो और पीड़ित परिवार की सुरक्षा व मुआवजे की पूरी व्यवस्था कर दी जाए।

इस मामले में बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप हो गया तो यह मामला गलत दिशा में चला जाएगा। प्रदेश जातीय विद्वेष की आग को हाल में डूंगरपुर में देख चुका है। ऐसे तत्व पूरे देश में इन मामलों अलग-अलग तरह से हवा दे रहे हैं। ऐसे में प्रशासन और स्थानीय समाज की सतर्कता बहुत जरूरी है। विशेषकर युवाओं के बीच ऐसे तत्व सक्रिय ना हों, इसका ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

इसमें कोई शक नहीं है कि पुजारी बाबूलाल वैष्णव की बहुत दुःखद मौत हुई है, इसलिए उनके परिवार की जो सहायता चाहिए, वह जरूर मिले, लेकिन यह मामला इससे आगे नहीं बढ़े, अन्यथा स्थितियाँ भविष्य के लिए गम्भीर हो सकती हैं।

हाथरस : 100 करोड़ की फंडिंग, जातीय दंगों और हिन्दुओं में फूट डालने की साजिश

हाथरस मामले में योगी सरकार को भेजी गई खुफिया जाँच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जाँच एजेंसियों को योगी सरकार के खिलाफ खतरनाक साजिश के अहम सुराग मिले हैं। हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए बड़ी साजिश रचने की बात सामने आ रही है। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की साजिश भी रची गई थी। इसके लिए बकायदा फंडिंग की बात भी सामने आई है। यूपी सरकार को भेजी गई खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

दंगे भड़काने के लिए अफवाहों और फर्जी सूचनाओं का सहारा लिया जा रहा। साजिश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और सरकार के निशाने पर रहे माफियाओं की मिलीभगत के ठोस सबूत मिले हैं। प्रदेश में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। इस रिपोर्ट में योगी सरकार को बदनाम करने के लिए 100 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात भी सामने आ रही है।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हो रहे महिलाओं के शील भंग होने पर इस तरह कोहराम नहीं मचा, जो आज हाथरस कांड में देखने को मिल रहा है। ये दोहरा मापदंड वास्तव में किसी बड़ी साज़िश होने का प्रमाण स्वयं प्रस्तुत कर रहे हैं।  

बताया जा रहा है कि पीड़ित लड़की की जीभ काटे जाने, अंग-भंग करने और गैंगरेप से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर नफरत की आग भड़काने की कोशिश की गई। वहीं अफवाह फैलाने के लिए ढेरों वेरिफाइड सोशल मीडिया अकाउंट का भी इस्तेमाल किया गया। जाँच एजेसियाँ वेरिफाइड अकाउंट्स का ब्योरा तैयार करने में जुटी हैं।

ऐसे में प्रश्न यह भी होता है कि जब पीड़िता की जीभ काट दी थी, फिर पीड़िता ने पुलिस को बयान कैसे दिया? परिवार सीबीआई और नार्को टेस्ट से क्यों पीछे भाग रहा है, जबकि आरोपित परिवार इन्हीं जांचों के लिए मांग कर रहा है?

बताया गया कि हाथरस साजिश में CAA को लेकर हुए उपद्रव में शामिल रहे संगठनों की भूमिका के भी सबूत मिले हैं। उपद्रवियों के पोस्टर लगाए जाने, उपद्रवियों से वसूली कराए जाने और घरों की कुर्की कराने जाने की सीएम योगी की कार्रवाइयों से परेशान तत्वों ने बड़ी साजिश रची। इस दौरान कथित गैंगरेप पीड़ित लड़की से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर मामले को तूल दिया गया।

इसके साथ ही हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है, जिसके सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे है। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

ऑडियो टेप से खुलासा हुआ है कि सीएम से पीड़ित परिवार की बातचीत के तुरंत बाद एक महिला पत्रकार ने उन्हें भड़काया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अगर सीएम की बात मान ली तो पुलिस म्हें ही अपराधी साबित कर देगी। इस बातचीत के बाद परिवार दहशत में आ गई।

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हाथरस : योगी विरोधी पहुंचे UNSC
कुछ लोगों को दूसरे की फटी में पैर फंसाने की आदत होती है, जो उत्तर प्रदेश के मु

ऑडियो टेप की फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आते ही भड़काने वालों का पॉलीग्राफ और नार्को की तैयारी में जाँच एजेंसियाँ जुटी हैं। पीड़ित परिवार द्वारा नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट और सीबीआई जाँच से मना करने पर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपित पक्ष हर तरह की जाँच के लिए तैयार है।

मोदी-योगी सरकार को बदनाम करने के लिए इस्लामी मुल्कों की फंडिंग

ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस मामले में बड़े सुराग हाथ लगे हैं। इसके लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ-साथ कई इस्लामी मुल्कों ने भी फंडिंग की थी। रातोंरात ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम से एक वेबसाइट भी बना ली गई थी। इस वेबसाइट पर विरोध प्रदर्शन की आड़ में देश-प्रदेश में दंगे करने और उसके बाद उससे बचने के तौर-तरीके बताए गए थे।

अफवाहों का बाजार गर्म करने के लिए मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया का भी भरपूर उपयोग किया गया था। ख़ुफ़िया एजेंसियों के अनुसार, ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नामक वेबसाइट को एक साजिश के तहत सुर्ख़ियों में लाया गया और हजारों लोग देखते ही देखते इससे जुड़ गए। इस वेबसाइट से जुड़े लोगों में से अधिकतर की आईडी फर्जी निकली है। इस वेबसाइट के डिटेल्स खँगालने के बाद इस मामले में और भी खुलासे हो सकते हैं।

‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, जिस तरह से अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दंगे भड़क गए थे, ठीक उसी तरह से उत्तर प्रदेश को दंगों की आग में झोंकने की तैयारी थी। मुस्लिम मुल्कों और इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने हिन्दू समुदाय में फूट डालने के लिए फंडिंग की थी। ये भी सामने आया है कि हाथरस पर बनाई गई वेबसाइट के पीछे सीएए विरोधियों और देशविरोधी तत्वों का हाथ था, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बदला लेना चाहते थे।

साथ ही कोरोना वायरस की आड़ में पुलिस-प्रशासन से बचने के ‘नुस्खे’ भी इस वेबसाइट पर बताए गए थे। इस पर बताया गया था कि चेहरे पर मास्क लगा कर दंगे करने के बाद पुलिस-प्रशासन से बचा जा सकता है क्योंकि आजकल मास्क लगाना अनिवार्य भी है। साथ ही हिन्दू समुदाय में फूट डालने और उत्तर प्रदेश को नफरत की आग में झोंकने की ‘तरकीबें’ समझाई गई थीं। वेबसाइट पर कई अन्य आपत्तिजनक सामग्रियाँ भी थीं।

इस वेबसाइट पर ‘वॉलंटियर्स’ की मदद से हेट स्पीच और भड़काऊ राजनीति करने के लिए कई सामग्रियाँ तैयार की गई थीं, ताकि देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठा सकें। पूरी स्क्रिप्ट तैयार करने और इसकी फंडिंग में पीएफआई और एसडीपीआई जैसे संगठनों का नाम सामने आ रहा है। रविवार (अक्टूबर 4, 2020) की देर रात जैसे ही पुलिस का तलाशी अभियान और छापेमारी शुरू हुई, ये वेबसाइट अचानक से बंद हो गया।

इसके लिए फेक न्यूज़ की एक बड़ी खेप तैयार की गई थी। साथ ही फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी डाली गई थीं, जिन्हें वायरल कर नफरत का माहौल बनाया जा सके। दंगे भड़काने के लिए छेड़छाड़ किए हुए विजुअल्स का इस्तेमाल भी किया गया था। इसमें ये भी समझाया गया था कि पुलिसकर्मियों को कैसे निशाना बनाया जाए। इसके लिए मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया के एकाउंट्स का भी इस्तेमाल किया गया।

इससे पहले खबर आई थी कि हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश के मामले में सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे हैं। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

हाथरस : इंडिया टुडे की पत्रकार का लम्बा ऑडियो लीक

                                       हाथरस केस से जुड़ा इंडिया टुडे पत्रकार तनुश्री पांडे का ऑडियो लीक
जैसाकि सर्वविदित है कि देश में जब कभी चुनाव होने को होते, भाजपा शासित किसी भी राज्य में हुई घटना को जी का जंजाल बनाने में भाजपा विरोधी पार्टियां और मीडिया इस प्रकार उछालती है, मानो कहर टूट पड़ा है। जबकि गैर-भाजपा शासित राज्यों में उससे अधिक जघन्न अपराध होने पर चुप्पी साध ली जाती है। क्या इसी का नाम सियासत है? अगर इसी का सियासत है, नहीं चाहिए ऐसे सियासतखोर। आज हाथरस पर आसमान सर पर उठाने वाले राजस्थान और अन्य गैर-भाजपा शासित राज्यों में हो रही ऐसी ही घटनाओं पर क्यों मौन रहे? अपराध अपराथ ही होता है, वह चाहे भाजपा शासित राज्य में हो अथवा गैर-भाजपाई राज्य में। ये सियासत और पत्रकारिता में दोहरा मापदंड क्यों? 

वैसे भी 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से देश में होने वाले चुनावों से पूर्व मोदी विरोधी गैंग जैसे: #metoo, #intolerance, #not in my name, #award vapasi, #mob lynching, #freedom of speech आदि बिकाऊ गैंग सड़क पर उतर आते हैं, और मतदान होते ही कालकोठरी में जाकर बैठ जाते हैं। बिहार में मतदान होते ही, कोई नेता एवं मीडिया हाथरस को घास तक नहीं डालेगा। यह कटु सच्चाई है। दूसरे, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे निम्न वीडियो में लगाए जा रहे धन के आदान-प्रदान की योगी सरकार को जाँच करवानी चाहिए। अगर वीडियो में धन के लेन-देन की बात सत्यापित होती है, परिवार पर अन्यथा वीडियो में इस व्यक्ति पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।  

हाथरस की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। हालाँकि इस मामले में अब भी कई पहलुओं से राज उठना बाकी है। मगर कुछ राजनेता इस केस के जरिए अपनी राजनीति करने में जुटे हैं। इसी दौरान सोशल मीडिया पर भी मुख्यधारा मीडिया अपना अजेंडा चलाने के लिए कई झूठ फैला रहा है और इसी बीच एसआईटी को पूरे मामले की जाँच भी सौंप दी गई हैं। 

हाथरस की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। हालाँकि इस मामले में अब भी कई पहलुओं से राज उठना बाकी है। मगर कुछ राजनेता इस केस के जरिए अपनी राजनीति करने में जुटे हैं। इसी दौरान सोशल मीडिया पर भी मुख्यधारा मीडिया अपना अजेंडा चलाने के लिए कई झूठ फैला रहा है और इसी बीच एसआईटी को पूरे मामले की जाँच भी सौंप दी गई हैं।

बातचीत को सुनकर यह साफ पता चलता है कि तनुश्री पीड़िता के भाई से एक निश्चित बयान दिलवाने का प्रयास कर रही हैं और संदीप की दबी आवाज सुनकर लग रहा है जैसे वह ऐसा नहीं करना चाहते। संदीप इस ऑडियो में पहले दबाव की बात कहते हैं। मगर बाद में कहते हैं कि उनके पिता इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं है कि उन पर दबाव बनाया गया या नहीं।

इसके बाद तनुश्री, संदीप से कहती हैं कि उसे कहीं से पता चला है कि परिवार पर ही बहन की मौत का इल्जाम लगाने का प्रयास किया जा रहा है। ये इस बातचीत का ऐसा हिस्सा है जिसे सुन कर लगता है कि ये सवाल खुद ही गढ़े गए, क्योंकि अभी तक कहीं भी मीडिया में ऐसी बात निकल कर सामने नहीं आई है। इससे पता चलता है कि पॉलिटिकल अजेंडा चलाने के लिए कैसे परिवार की स्थिति का फायदा उठाया गया।

कुल मिलाकर इस बातचीत का मकसद सिर्फ़ मृतका के पिता का वीडियो निकलवाना था, जिसमें पिता किसी भी तरह बस यही बोल दें कि उनपर दबाव बनवाकर बयान दिलवाया गया कि वह संतुष्ट हैं।

उन्हें ऑडियो में कहते सुना जा सकता है, “संदीप, प्लीज मेरे लिए एक चीज कर दो। मैं तुमसे वादा करती हूँ कि जब तक तुम्हारे परिवार को इंसाफ नहीं मिल जाता मैं यहाँ से हिलूँगी भी नहीं… संदीप एक वीडियो अपने पिता की बनाओ जिसमें वो कहें, ‘हाँ, मुझ पर ऐसा बयान जारी करने का बहुत प्रेशर था कि मैं संतुष्ट हूँ। मैं जाँच चाहता हूँ क्योंकि हमारी बेटी मरी है और हमें न उसे देखने का मौका मिला और न उसके अंतिम संस्कार का।”

वे आगे कहती हैं, ”सिर्फ 5 मिनट लगेंगे। जल्दी से वीडियो बनाओ और सिर्फ़ मुझे भेज दो।” इस बातचीत में तनुश्री बार-बार संदीप को एसआईटी के ख़िलाफ़ भड़काती है। मगर, लड़की का भाई कहता है कि जाँच टीम सिर्फ़ उसे जरूरी सवाल कर रही थी और फिर वह चली गई।

पूरी बातचीत को सुनिए। मृतका का भाई वीडियो बनाने में अनिच्छुक नजर आता है और हिचकिचाता है। मगर तनुश्री उसे यह कहकर समझाती हैं कि वो भी उनकी बहन हैं।

इस मामले में एक अन्य ऑडियो भी सामने आई है। यह ग्रामीणों और संदीप के बीच की है। इसमें मृतका के भाई को सलाह दी जाती है कि उसे 25 लाख रुपए नहीं स्वीकारने चाहिए। इस बातचीत में महिला का कहना है कि कुछ राजनेता कह रहे हैं कि ‘फैसला’ नहीं होना चाहिए। बता दें कि इस बातचीत में, किसी राहुल, मनीष सिसोदिया और बरखा दत्त का नाम भी आता है।

उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है जब तनुश्री का नाम ऐसे किसी मामले में सामने आया हो। सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान, उन्होंने जेएनयू में एक वामपंथी छात्र के साथ कान में फुसफुसाकर बातचीत करते देखा गया था। उस वीडियो को देखककर ऐसा लग रहा था जैसे वह उसे कैमरे पर बोलने की कोचिंग दे रही हैं। वीडियो में, पत्रकार को स्पष्ट रूप से छात्र से चर्चा करते देखा गया था। हालाँकि फुसफुसाने के कारण उनकी बात कैमरे व माइक में सुनाई नहीं पड़ी थी।

अवलोकन करें:-

राजस्थान जल रहा है और सेक्युलर मीडिया खामोश, क्यों?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एसटी आरक्षण की माँग के कारण राजस्थान का

पुलिस भी संदेह के घेरे में 

पीड़िता के कज़िन ने इंडिया टुडे को बताया कि पुलिस लगातार उन पर, परिवार पर बयान बदलने के लिए दबाव बना रही है। उन्होंने आरोप लगाया है कि पुलिसवाले परिवार के लोगों को डरा-धमका रहे हैं, पीट भी रहे हैं। साथ ही परिवार के सभी लोगों को घर से निकलने नहीं दिया जा रहा है, सबके फोन ले लिए गए है।ताकि कोई भी मीडिया से बात न कर सके। पीड़िता के कज़िन ने बताया कि वे किसी तरह पुलिस से बचकर बाहर निकले तो मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि परिवार गांव में बिल्कुल भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा। उन्हें पुलिस और राजनेताओं पर भरोसा नहीं है। परिवार को डर है कि कल को उन्हें गांव छोड़कर भी जाना पड़ सकता है।

पीड़िता के परिवार का आरोप- पुलिस ने पीटा, फोन ज़ब्त कर लिए, घर से निकलने नहीं दे रहे

इससे पहले एक अक्टूबर को हाथरस के डीएम प्रवीण कुमार का एक वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वो परिवारवालों को धमकी भरे अंदाज में कह रहे हैं कि आधे मीडिया वाले आज चले गए, आधे कल चले जाएंगे। फिर हम लोग ही बचेंगे।

हालांकि पुलिस-प्रशासन को लेकर लगातार आ रही शिकायतों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अक्टूबर को पूरे मामले में स्वतः संज्ञान भी ले लिया है। जस्टिस राजन रॉय और जसप्रीत सिंह की बेंच ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव, डीजी, एडीजी-लॉ एंड ऑर्डर, डीएम हाथरस, एसपी हाथरस को नोटिस जारी किया है। कहा है कि 12 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में आकर अब तक की जांच के बारे में बताएं।

शेखर गुप्ता और उनके प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘दी प्रिंट’ ने दक्षिणपंथी समाचार पोर्टल ‘स्वराज्य मैगजीन’ की जर्नलिस्ट स्वाति गोयल शर्मा पर एक कथित ‘विचार’ प्रकाशित किया, जिस पर हुए भारी विरोध के बाद आखिर में ‘दी प्रिंट’ को माफ़ी माँगते हुए अपनी वेबसाइट से चुपके हटाना पड़ा।

दरअसल, दी प्रिंट ने एक रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए इसमें स्वाति गोयल शर्मा का नाम घसीटते हुए ‘लव जिहाद’ पर की गई उनकी रिपोर्टिंग के तरीकों पर कई तरह के आरोप लगाए थे। लेकिन स्वाति गोयल ने ना सिर्फ दी प्रिंट के अजेंडा को बेनकाब किया बल्कि उन्हें जमकर लताड़ा भी।

करवा ली बेइज्जती? ‘दी प्रिंट’ ने पहले थूका, फिर पकड़े जाने पर चाटा

दी प्रिंट ने एक रिपोर्ट (विचार)  प्रकाशित की जिसमें उन्होंने स्वाति गोयल शर्मा पर आरोप लगे कि उन्होंने ट्विटर पर ‘लव-जिहाद’ का कैम्पेन चलाया। यही नहीं, दी प्रिंट ने अपनी इस रिपोर्ट में स्वाति गोयल शर्मा पर आरोप लगाया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के हाथरस कांड में पीड़िता और आरोपितों की जाति को भी विवादित तरीके से पेश किया।

1 अक्टूबर को, शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ ने यह ‘विचार’ प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने स्वाति गोयल शर्मा पर हाथरस हत्या मामले में जाति के नजरिए को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। साथ ही, उन्होंने ट्विटर पर ‘लव जिहाद’ के बारे में ‘एक अभियान चलाने’ के लिए भी स्वाति गोयल को निशाना बनाया और कहा कि उन्होंने ‘लव’ में ‘जिहाद’ देखा।

स्वाति गोयल शर्मा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेखर गुप्ता को टैग किया और ‘दी प्रिंट’ की इस रिपोर्ट के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “यह गटर के स्तर की चीज है। क्या आपके कम अनभिज्ञ लेखकों की यह आदत है और उनके काम की जाँच के बिना ही उन पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हैं? आपने आईआईटी-कानपुर के वाशी शर्मा के साथ भी ऐसा ही किया और बाद में माफी माँगी थी।”

स्वाति शर्मा ने लिखा, “तुम्हारे अनपढ़ लेखक मुझे यह स्पष्ट करें कि मैंने हाथरस मामले में जाति की बात को कब नकारा या फिर माफ़ी माँगे।”

प्रिंट के इस लेख का शीर्षक था – “आप हाथरस बलात्कार के बारे में अन्य बलात्कारों को भी रखते हुए बात नहीं कर सकते – आईटी सेल की व्हाटअबाउट्री को धन्यवाद।”

‘व्हाटअबाउट्री’ का सामान्य शद्बों में अर्थ गुमराह करने की कला होता है। इस ‘विचार’ में स्वाति शर्मा पर यह कहते हुए हमला किया गया कि जब वह ‘लव’ में ‘जिहाद’ देख सकती हैं, तो वह ‘जाति के नजरिए’ को नहीं देख पाई क्योंकि ‘4 ऊँची जाति के पुरुषों ने एक दलित महिला का बलात्कार किया था’।

‘दी प्रिंट’ ने जो लिखा है, वह ट्विटर पर पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा द्वारा साझा किए गए इन स्क्रीनशॉट्स में देखा जा सकता है –

दिलचस्प बात यह है कि, ‘दी प्रिंट’ इस लेख को प्रकाशित करने से पहले मूल तथ्यों की भी जाँच नहीं कर पाए। स्वाति गोयल शर्मा एक ग्राउंड रिपोर्टर हैं, जिन्होंने दलितों के अधिकारों और उनके खिलाफ अपराधों के बारे में कई मामले सामने रखे हैं। यहाँ तक ​​कि वह दलित कार्यकर्ता संजीव नेवार या अज्ञेय के साथ एक एनजीओ भी चलाती हैं।

स्वाति गोयल शर्मा द्वारा दी प्रिंट के झूठ को उजागर करने के बाद ‘दी प्रिंट’ ने चुपचाप अपने इस ‘विचार’ को हटा दिया। लेकिन तब तक स्वाति गोयल शर्मा लेख के स्क्रीनशॉट ले चुकी थीं। स्वाति गोयल शर्मा ने ट्विटर पर लिखा कि उन्हें ख़ुशी है कि यह लेख हटा लिया गया है लेकिन लेखक फैक्ट चेक करने का ध्यान अवश्य रखें।

यह देखने के बाद कि ‘दी प्रिंट’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो चुका है, उन्होंने एक ट्वीट के माध्यम से स्वाति गोयल शर्मा से माफ़ी माँगी जिसमें कि डिलीट भी स्क्रीनशॉट रह गया था। दी प्रिंट ने अपने आर्टिकल की ही तरह फिर इस ट्वीट को भी डिलीट किया और दोबारा ट्वीट किया और इस बार स्वाति गोयल के ट्वीट को इसमें लिंक नहीं किया।

हाथरस कांड

सितम्बर 29, 2020 की सुबह दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पीड़िता की मौत के बाद से हाथरस मामले को लेकर काफी बहस और राजनीतिक उथल-पुथल देखी जा सकती हैं। हाथरस पुलिस ने बृहस्पतिवार को कहा कि ‘जबरन यौन क्रिया’ अभी तक भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुष्टि नहीं हो पाई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटने से मौत को मौत का कारण बताया गया था।

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक कथित सामूहिक बलात्कार पीड़िता की मौत हो गई। उसके साथ दो सप्ताह पहले कथित तौर पर बलात्कार किया गया था। इस मामले ने देशव्यापी आक्रोश देखा जा रहा है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि हाथरस पुलिस ने परिवार के सदस्यों की सहमति के बिना मंगलवार रात लड़की का जबरन अंतिम संस्कार कर दिया। हालाँकि, पुलिस ने बाद में कहा था कि दाह संस्कार के दौरान पीड़िता के पिता मौजूद थे।